Tuesday, November 5

"गोवर्धन, गिरिराज,पर्वत"28अक्टुबर 2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें 
ब्लॉग संख्या :-549
प्रथम प्रस्तुति

गिरि को उठाय
अँगुली नचाय ।

इन्द्र के अहं को
पल में मिटाए ।

कान्हा मोहन से
गिरिधर कहाय ।

संकट से किसे न
कान्हा छुड़ाय ।

गोपियों के संग
रास वो रचाय ।

मुरली की धुन से
सबहि को लुभाय ।

गिरिराज आज
बैठे मनहि मुस्काय ।

बड़भागी हमसा
कौन है कहलाय ।

स्वयं प्रभु धारे
जन्म धन्य बनाय ।

अहेतुकी कृपा कब
किस पर हो जाय ।

कोई की रूष्टता
कोई भाग्य जगाय ।

निमित्त कब कौन
'शिवम' गुल खिलाय ।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 28/10/2019
विषय गोवर्धन, गिरिराज,पर्वत
विधा काव्य

28 अक्टूबर 2019,सोमवार

इन्द्र प्रकोप हुआ जब भारी
जल मूसलधार भयंकर था।
त्राहि त्राहि स्वर गूंज रहे थे
गोवर्धन गिरिधारी उँगली था।

नव दुर्गा पर्वत निवासिनी
भोले शिव कैलाश विराजे।
श्री विष्णु बद्रीनाथ पूजनीय
अमरनाथ गिरी शखर साजे।

हिम गिरी के उत्तुंग शिखर
संत ऋषि सतत साधना।
देवालय हैं उच्च पर्वत पर
जन मानस जुड़ी भावना।

गंगोत्री उद्भव गङ्गा जल
पर्वतराज हिमालय भूमि।
यमनोत्री सुधा रस बहती
भारतमाता है लूमी झूमि।

स्वरचित, मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

भगवान का प्रयोगात्मक संदेश
💘💘💘💘💘💘💘💘

इन्द्र
 दर्प का हुआ गर्जन
भगवान ने धारा गोवर्धन
यह भी बताया प्रकृति कैसे
करती है हमारा सँवर्धन।

प्राकृतिक सम्पदा का अदभुत सँदेश
इस माध्यम से उन्होंने दिया विशेष
यदि हमने नहीं सम्भाला इनको
तो हमारे ही मिलेंगे एक दिन अवशेष।

जो धरा देती वो अमूल्य धरोहर है
गोवर्धन उठा सबको कहता हरिहर है
मत छेडो़ प्रकृति को बहाने लेकर
इसमें ही प्राणों का जीवन्त स्वर है।

गोवर्धन लेकर इतना बडा़ प्रयोग
प्रकृति हमको देती कितना सहयोग
फल फूल जडी़ बूटी और क्या नहीं देती
मिटाती है हमारे यह कितने रोग।

कृष्णम् शरणम् गच्छामि

दिनांक २८/१०/२०१९
शीर्षक-गोवर्धन/ गिरिराज/पर्वत


नाना प्रकार का भोजन बना
गोवर्धन पूजा करें आज।
इन्द्रकोप से गोकुल वासियों को
बचाये कृष्ण भगवान।

छोटी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत
सहज उठाये भगवान
श्री कृष्ण की पूजा देख,
कुपित हुए इन्द्र भगवान।

भारी बर्षा गोकुल में दिये
किया भीषण अत्याचार
श्री कृष्ण उन्हें बचाये,
गोकुल वासी हुए निहाल।

गोवर्धन की पूजा करने से
खुश होते भगवान
हर मनोकामना पूरी करते
श्री कृष्ण भगवान।

स्वरचित आरती श्रीवास्तव।
28 /10 /2019
बिषय,, गोवर्धन, गिरिराज,, पर्वत

जय हो गोर्वधन महाराज तेरे माथे तिलक बिराजे
है कृष्ण कन्हैया प्यारो
नख पर गिरवर धारो
तुम कहलाए गिरिराज।।
तुम पर्वतों के राजा
तुम्हें ध्यावै सकल समाजा
तुम्हें पूज रहे नंदराय।।
मैं छप्पन व्यंजन बनाउं
तुम्हें रुच रुच भोग लगाउं
तुम खा जइयो महाराज।।
जो परिक्रमा पे आवै
वाके सकल पाप कट जावै
वाके भर जावे भंडार ।।
तुम्हें फूल चढ़े तोहे पान चढ़े
तोहे चढ़े दूध की धार
मैं शरण तुम्हारी आई
श्रद्धा सुमन हूँ लाई
मेरा कर देना उद्धार।।
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार
.

दिनांक..............28/10/2019
विषय ...............*🌷गोवर्धन पूजा🌷*
विध
ा.................*🌷दोहा छंद🌷*
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
*गोवर्धन पूजा*
🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴

*शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा,आया कातिक मास।*
*गौ पूजा सब मिल करें, कर गोवर्धन रास।*
🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴

*गाय मात सेवा करें , पावें गौ वरदान।*
*लगा तिलक गौ माथ पर,पूजा कर श्री मान।*
🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴

*इन्द्र देव के ताप से , सहमा गोकुल धाम।*
*छत्र बनाया कृष्ण ने, कृपा सिंधु भगवान।*
🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴

*गोकुल वासी खुश हुये, देख दृश्य घनश्याम।*
*महिमा गोवर्धन भये, झुमत गाय बृज धाम।*
🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴
स्वलिखित
*कन्हैया लाल श्रीवास*
भाटापारा छ.ग.
जि.बलौदाबाजार भाटापारा

विषय-गौवर्धन गिरिराज पर्वत
विधा-पद्य

दिनांकः 28:10:2019
सोमवार
आज के विषय पर मेरी रचना:

सदा से इन्द्र देव हैं वर्षा के,
बृजवासी पूजा करते थे ।
हो अन्न धान की कमी नहीं,
वे छप्पन भोग लगाते थे ।।

कहा कृष्ण ने सब लोगों को,
अब मत पूजो इन्द्र देव को ।
अन्न उपजाते गऊ धन है ,
तुम पूजो अब से गौ धन को।।

लगे पूजने गौधन लोग,
इन्द्र का पूजन छोडकर ।
वह कुपित हो गया था तभी,
तैयार हुआ रूख मोडकर ।।

सात दिवस तक लगातार,
वहां की वर्षा मूसलाधार ।
खेत खलिहान चौपट हुए,
रहा नहीं पशुधन का आधार ।।

वृक्ष गिर पड़े बड़े बड़े,
सब खाने को मोहताज हुये।
कहा कृष्ण कन्हाई से ,
ये हाल कन्हैया क्यों हुये।।

इन्द्र कुपित हो गये हैं,
अब हमें बचाये कौन ।
कोई युक्ति बताओ तुम,
अब क्यों हो धारे मौन ।।

उठा लिया इक ऊॅगली से,
पर्वत गौवर्धन गिरि राज ।
कहा सभी से आप लोग,
गिरि नीचे आ जायें आज।।

पशुधन और सामान जरूरी,
वहां लोग सब ले आये ।
भारी अचरज था सबको,
नन्हा कैसे पहाड़ उठाये ।।

चूर हुआ इन्द्र का गर्व,
आकर कान्हा चरण गिरा।
क्षमा कीजिये आप प्रभु,
मै हूँ बालक मूर्ख निरा ।।

तब से लेकर आज तक ,
हम गौवर्धन पूज रहे ।
जिसने बचा लिया बृज को,
याद हमें वह बनी रहे ।।

जीवित रहते हम सदा,
प्रकृति की ही देन से ।
जडी,बूटी,अन्न और फल,
सदा पाते हैं हम इसी से ।।

है प्राकृतिक जो सम्पदा,
हम उसको सदा बचायें ।
संदेश दिया श्री कृष्ण ने ,
सदा संवर्धन करते जायें।।

किसी तरह से भी करें,
संवर्धन इसका जिससे हो।
यदि नहीं बचाया अब भी,
बचाव हमारा कैसे हो ।।
स्वरचित
डॉ एन एल शर्मा जयपुर
(डॉ नरसिंह शर्मा 'निर्भय ,जयपुर)

28/10/2019
नमन मंच भावों के मोती समूह गुरूजनों मित्रों।


इन्द्रदेव जब कुपित हुए।
बरसन लगे दिन रात।

बाढ़ के जैसी हालात हो गई।
मच गयो गोकुल में हाहाकार।

तब कृष्ण ने उठाकर गोबर्धन।
रक्षा कियो सब गोकुल के जन की।

गोबर्धन पर्वत के नीचे आकर।
जान बचायो ग्वाल बाल की।

पूजा अर्चना करते हैं सब।
गोबर्धन के नाम पर।

पशुओं की भी पूजा करते इस दिन।
गोधन के नाम पर।

वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी
स्वरचित
दिनांक-28/10/2019
विषय -गिरिराज

. "श्री गोवरधन महाराज"
~~~~~~~~~~~
गो-इन्द्रियां
वर-स्वामी
धन-सम्पत्ति
अर्थात इन्द्रियौं के स्वामी भगवान हृषी केश
(श्री कृष्ण)
परिक्रम्मा श्री गोवरधन

इक्कीस किलो मीटर मथुरा वरसाना मग,
विराजैं ठाकुर गिर्राज महाराज हैं।
उत्तर दक्षिण लम्बे ग्यारह किलो मीटर,
तीस मीटर ऊंचाई नपा हुआ साज है।
देते भक्त परिक्रम्मा गिर्राज महाराज की,
ठाड़े या पिटरौअल हो कर अंदाज है।
सुनकर पुकार गिर्राज निज भक्तौं की,
करते क्षण में पूर्ण बिगड़े जो काज है।

मुखार विन्दु पड़ता गिरि की परिक्रम्मा में,
मानसी गंगा का बहे निर्मल सुनीर है।
मंदिर हरिदेव व लक्ष्मी नारायण का,
दान घाटी गौरांग में होती दूर पीर है।
भजन कुटी गोस्वामी सनातन स्थान है,
मंशा देवी ब्राह्मण घाट पै होती भीर है।
चकलेश्वर स्थान आदि जहां दर्शनीय,
दर्श कर भक्त यहां धरैं मन धीर हैं।

चंद्र सरोवर गोवर्धन ढिंग कुसुम सरोवर
जती पुरा।
गोविन्द नारद कुण्ड उद्धव के और ग्वाल
सखाऔं का पोखरा।
स्थान साधना पारसौली जहां बजाया था
सूर ने तान पूरा।
आन्यौर पूंछरी का लौटा करते भक्त विश्राम
यहां समय चुरा।

गोवर्धन पर्वत को श्री कृष्ण ने इन्द्र के कोप
की वर्षा से वृज वासियौं की रक्षार्थ अपनी
उंगली पर सात दिन सात रात एक दिन और
एक रात में आठ याम होते हैं धारण किया था
इसके बाद वृजबासियौं ने (7×8=56)तरह का
भोग श्री कृष्ण भगवान को लगाया था

भगवान कृष्ण की गोवर्धन लीला--

धर लयौ गिरधर ने गोवर्धन कर पर।
विपति भक्त हरने गोवर्धन कर पर।

उठायौ हरि ने गिरि जैसे छतरी तानी।
पर्वत के नीचे सभी वृज के हैं प्रानी।
लगे जै जै करने गोवर्धन कर पर।

कहैं वृजवासी कान्हा बारौ गिरि भारौ।
थोड़ौ थोड़ौ देउ भैया सब मिल सहारौ।
गिर पाये नहीं गिरने गोवर्धन कर पर।

कृष्ण वर्ष सात कौ गिरि कोस सात कौ।
सात दिन रात पानी घन घोर वरषात कौ।
लगौ पड़ पड़ पड़ परने गोवर्धन कर पर।

वरष वरष बादल सब अन्त में जब हारे।
रह्यौ नहीं पानी बिल्कुल खाली भये सारे।
तब लगे खुद उघरने गोवर्धन कर पर।

कवि महावीर सिकरवार
आगरा (उ.प्र.)

विषय__"पर्वत गोवर्धन गिरराज "
विधा॒॒॒__*काव्य

कुपित हुए इंद्रदेव एकदिन
बृज में बर्षा भरपूर कराई।
हुए परेशान बृजवासी कृष्णा
उंगली पर्वत नीचे लगाई।

बरखा अनवरत जारी रही
प्राणी नीचे गोवर्धन आऐ।
समझे हैसियत वरूणदेव तो
तुरंत शरण मनमोहन आऐ।

सुखी हुए नरनारी पशु पक्षी
सब ही जन नाचे कूदे गाऐ।
तब से ही सारे बृजमंडल में
गोवर्धन पूजा शुरू कराऐ।

ये गोबर से गोवर्धन बनवाते
सब उल्लहासित पर्व मनाते।
रंगकर अपने पशु पक्षी को
पूजन कर नैवेद्य खिलाते।

गाय भैंस क्या सभी जानवर
सजधजकर ही यहां दौड़ते।
यहां पटाखे चला चला कर
ग्वाल वाल भी पीछे दौड़ते।

विस्मय बहुत होता कृष्णा ने
कैसे भारी पर्वत उठा लिया।
किया मान मर्दन इंद्र देव फिर
सम्मान स्वयं का करा लिया।

स्वरचित
इंजी शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना मध्य प्रदेश
जय जय श्री राम रामजी

१भा पर्वत गोवर्धन गिरराज काव्य
28/10/2029/सोमवार

दि.28/10/19.
विषयः गोबर्धन

*
चौपाईः
निरखि कृष्न गोपन्ह बिललाता।
बरसा सीत हिमोपल घाता।।
निज संकल्प समुझि तिन्ह रच्छन।
खेलहिं खेल गिरिहिं गोबर्धन।।
लै उखारि बाएँ कर धारा।
ब्रजबासिन्ह कर दुःख निवारा।।
गोप बस्तु - बहु गोधन साथा।
ठाढ़ भये नीचे गिरिनाथा।।
सात दिवस बीते यहि भाँती।
कृष्न - प्रभाव बृत्र - आराती।।
समुझि सबिस्मय मेघन्ह रोंका।
थमें प्रलय - उत्पाती झोंका।।
-डा.'शितिकंठ':भागवत कथामृत,(अवधी प्रबंध काव्य) पृ.243

विषय-गोवर्धन, पर्वत
दि.सोमवार/28-10-19

विधा ---काव्य

गोवर्धन यानी ' गौ 'का वर्द्धन।
गौ वर्द्धन से बनता' गोबर'धन।
इस' गोबर धन ' का बड़ा ढेर हो,
बन जाय देर अबेर पर्वत वो।
इस पर्वत की साज सम्हाल का हो क्रम,
इसे सिर पर उठाने का साझा उपक्रम ।
गोपाल गिरधर बन जाते हैं ,
अथाह सम्मान वो पाते हैं।
सुरक्षा व बाधा से मुक्ति का मंत्र,
सब मिलकर बन जाएं इक तंत्र।
खरी तरक्की की ये गुनिया,
याद रखती अब तक दुनिया।

*****स्वरचित********
प्रबोध मिश्र 'हितैषी '
बड़वानी(म.प्र.)45155
28 /10 /2019 --सोमवार
आज का शीर्षक समूह की ओर से है..

💐"गोवर्धन/गिरिराज/पर्वत "💐
=============================
कुपित हो गये इंद्र जब,कलपे ग्वाल समाज।
गोवर्धन अंगुलि उठा ,कृष्ण बने गिरिराज।।
-------------------

अहंकार में इंद्र ने ,.. . . . . छोड़ा गोकुल साथ।
गोकुल रक्षण के लिये ,कृष्ण लियो गिरि हाथ।।
--------------------
अहंकार में इंद्र ने ,. कर डाली बरसात।
माधव गोवर्धन उठा ,देते उसको मात।।
--------------------
तेरा जो रक्षण करे ,. उसे देवता मान।
जो तेरा पालन करे ,उसे पूज इंसान।।
-------------------
क्यों देवों का दास हो ,सह मत तू अपमान।
अपना पौरुष साध ले ,बन तू कृष्ण महान।।
==========================
"दिनेश प्रताप सिंह चौहान"
(स्वरचित)
एटा --यूपी

दिनांक 28/10/2019
विषय: गोवर्धन/गिरिराज/पर्वत

विधा: हाइकु

कृष्णा गोकुल
गोवर्धन पर्वत
आस्था पैदल।

अनाज पूजा
गोवर्धन का पर्व
चौक गोबर।

श्री गिरिराज
गोकुल जीव जन्तु
इन्द्र कोप से।

बृज मे वर्षा
धारण गोवर्धन
छोटी उंगली ।

इन्द्र कुपित
मुसलाधार वर्षा
पर्वत शस्त्र ।

गोबर धन
औषधि बहुमूल्य
गौ माँ पूजन।

प्रहरी गिरि
निगरानी निश्चित
भरोसा नींद ।

स्वरचित
नीलम श्रीवास्तव
28/10/19
विषय-पर्वत


अप्रतिम सौन्दर्य

हिम से आच्छादित
अनुपम" पर्वत "श्रृंखलाएँ
मानो स्फटिक रेशम हो बिखर गया
उस पर ओझल होते
भानु की श्वेत स्वर्णिम रश्मियाँ
जैसे आई हो श्रृँगार करने उनका
कुहासे से ढकी उतंग चोटियाँ
मानो घूंघट में छुपाती निज को
धुएं सी उडती धुँध
ज्यों देव पाकशाला में
पकते पकवानों की वाष्प गंध
उजालों को आलिंगन में लेती
सुरमई सी तैरती मिहिकाएँ
पेड़ों पर छिटके हिम-कण
मानो हीरण्य कणिकाएँ बिखरी पड़ी हों
मैदानों तक पसरी बर्फ़ जैसे
किसी धवल परी ने आंचल फैलया हो
पर्वत से निकली कृष जल धाराएँ
मानो अनुभवी वृद्ध के
बालों की विभाजन रेखा
चीङ,देवदार,अखरोट,सफेदा,चिनार
चारों और बिखरे उतंग विशाल सुरम्य
कुछ सर्द की पीड़ा से उजड़े
कुछ आज भी तन के खड़े
आसमां को चुनौती देते
कल-कल के मद्धम स्वर में बहती नदियाँ
उनसे झांकते छोटे बड़े शिला खंड
उन पर बिछा कोमल हिम आसन
ज्यों ऋषियों को निमंत्रण देता साधना को
प्रकृति ने कितना रूप दिया काश्मीर को
हर ऋतु अपरिमित अभिराम अनुपम
शब्दों में वर्णन असम्भव।

स्वरचित

कुसुम कोठारी।

आज का विषय, गिरिराज, गोवर्धन पर्वत
सोमवार

2 8,10,2019,

गिरधारी जी
गोवर्धन पधारे
आनंद बर्षा ।

गोकुलवासी
आसरा गिरराज
कुपित इंद्र ।

श्रध्दा हमारी
विरासत है प्यारी
ऊँचे पर्वत ।

जीवन दान
गोवर्धन पर्वत
कृष्ण कन्हैया ।

भक्त वत्सल
पर्वत संरक्षण
इंद्र का कोप ।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,

No comments:

"जिम्मेदार"18नवम्बर 2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें   ब्लॉग संख्या :-569 Hari ...