Sunday, December 8

"स्वतंत्र विषय लेखन "08दिसम्बर 2019

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ब्लॉग संख्या :-589
विषय मन पसन्द लेखन
विधा काव्य

08 दिसम्बर 2019,रविवार

धर्म गुरु धरती प्रिय पावन
पालन पौषण माँ नित करती।
सत्य अहिंसा कर्तव्य परायण
विपदा क्लेश सदा माँ हरती।

शस्यश्यामल प्रिय भारत माता
सत्यमेव जयति जय पावन।
वसुधैव परिवार स्वीकारती
नित बरसे प्रिय सुख का सावन।

गङ्गा यमुना ताज हिमालय
सागर करे चरण प्रक्षालन।
प्रिय भारत माँ सबसे सुंदर
दिव्य दमक ले चमके आनन।

यह भरतों का देश सुहाना
सुर मुनियों का आना जाना।
वैभवशाली अतीत है भारत
प्रिय गीता को जन जन गाता।

मेहनतकश प्रिय किसान सब
सीमा पर सैनिक हैं रक्षक।
चार धाम बारह जोतिर्लिंग
विस्फारित भारत की चमक।

स्वरचित
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

सर्दी के तेवर
💘💘💘💘💘

घूम
ते क़दम अस्पताल की ओर मुड़ गये
जब कुछ नये रोग आकर मुझ से जुड़ गये
इस सर्दी में औरों का क्या हुआ नहीं पता
पर अपने तो यारों बुरी तरह प्यूज़ उड़ गये।

शीत लहर कहर ढा गई
गुनगुनी धूप भी खा गई
लिहाफ स्वेटर से करीबी
मन को बहुत भा गई।

सर पर टोपी रम गई
कुल्फी हमारी जम गई
पानी की हर गतिविधि
एकदम ही थम गई।

चाय के दौर बढ़ गये
रात में घूँट चढ़ गये
अलाव ने मन मोह लिया
और वहीं क़दम पड़ गये।

08/12/2019
स्वतंत्र लेखन .....

"कहमुकरी"

शीत में साथ बड़ सुख पावे
छोड़ के कछु काम ना भावे
दिन साथ ना देत हरजाई
का सखि सजन?ना सखि रजाई।

सुबह-शाम मन को बहुत भाय
ना मिले तो जियरा तड़पाय
पास आये बाँछे खिल जाय
का सखि साजन?ना सखी चाय।

तोहरे बिन रतिया तड़पाय
गुलाबी शीत में मन लुभाय
दिन में कंचन से होते रुप
का सखि साजन?ना सखी धूप।

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल ।।

दिनांकः- 8-12- 2019
वारः-रविवार

विधाः-छन्द मुक्त
मनपसन्द विषय लेखन के अऩ्तर्गत
शीर्षकः-मानवता बचाओ अपराधी मिटाओ

रहे हैं संसार में सदा ही दुष्कर्मी व अत्याचारी।
रहते हैं पाप में लिप्त तथा हैं बड़े ही दुराचारी।।

लाभ के लिये अपने ही मचाते है वह मारामारी।
साधू संत भक्तों व नारी आदि पर पड़ते हैं भारी।।

बालि ने भाई की पत्नी छीनकर, भाई को सताया।
भगवान राम ने ही उसको था दूसरे लोक पठाया।।

ऐसे पापी मानवता पर कलंक व होते हैं जानवर।
समाज की रक्षा के लिये करो अब इनका संहार।।

मेरे कन्हैया ने, अत्याचारी कंस का संहार किया।
अपने नाना को फिर मथुरा का राजा बना दिया।।

पापी तथा अत्याचारियों को उन्होंने नर्क पठाया।
दुर्योधन व साथियों को पांडवों से संहार कराया।।

अब ऐसे दुष्टों ने दी हैं मानवता की सीमाये लांघ।
आगये हैं भारत मां की बेटियों के संकट मे प्राण।।

बार बार अवतार लेने को प्रभु को बाध्य न करो।
बेटियों को बचाने के लिये स्वयं ही करो या मरो।।

डा0 सुरेन्द्र सिंह यादव
"व्यथित हृदय मुरादाबादी"
स्वरचित

// बिल्ली की डिश //
// हुई डिशमिश //

नजर आपकी करूँ ये शेर
समझ आय जो देर सबेर ।।
कान खुजाकर बोली बिल्ली
चलवे कुत्ते मुझे न हेर ।।

मुझे न भाय बात ये तेरी
मेरे घर में रहे अँधेरी ।।
तूँ तो गलियों में घूमे
हालत खराब अब है मेरी ।।

दूध फ्रिज में रखें सारे
खुले न दिखें कहीं किवारे ।।
मेरे ऊपर गाज गिरी है
दे दे अपनी पूँछ ये प्यारे ।।

मैं भी जानूँ कोई हुनर
देखूँ रोज टुकर मुकर ।।
खाली पेट ही सो जाऊँ
कौन करे अब मिरी फिकर ।।

कितने जीव शोषित हैं
कितने जीव पोषित हैं ।।
किसे खबर आज 'शिवम'
बेजुबान भी मोहित हैं ।।

Moral of the story --
बिल्ली को दूध रखा करो 😀
बिल्ली से दुआ लिया करो 😀

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 08/12/2019
विषय-मन पसंद लेखन
08/12/2019

**********************
थका नही हूँ रुका नही हूँ,
हिम्मत जरा भी हारा नही,
मैं सूरज हूँ सुनहरी भोर का
ढलती शाम का तारा नही!

निराशाओं की मांग में,
नित सुहाग सिंदूर भरता,
आशाओं के माथे पर ,
तब जाकर तकदीर लिखता !
रुक जाऊं कहीं बंध जाने से,
वह सरिता की धारा नही!
मैं सूरज हूँ......

जब प्राची की लालिमा लिए,
किरणें छूकर गुजरती है
तब वेदनाएं मुझे तनिक भी,
छू लेने से डरती है!
उत्तर से दक्षिण तट तक,
प्रत्यक्ष हूँ इशारा नही!
मैं सूरज हूँ.......

दम उखड़ा नही अभी मेरा,
हौसला मेरा फौलादी है!
कलम ही ताकत,तलवार बनी,
ये भाषा मेरी उन्मादी है!
कण हूँ ज्वालामुखी ज्वाल का,
फुलझड़ियों सा नजारा नही!
मैं सूरज हूँ............

चलना है बहुत दूर मुझे,
लंबा है यह सफर मेरा,
खो जाने का डर कैसा ,
सारा संसार है घर मेरा!
दुआओं से दामन भरा हुआ,
खाली मन का किनारा नही!
मैं सूरज हूँ.........

भूधर सम विशाल हृदय में
बस छोटी सी यह कामना है ,
जीवन मद,लोभ,क्रोध से,
हो विलग यही अन्तर्भावना है !
मैं सूरज हूँ.....

**********************
स्वरचित रचना-
राजेन्द्र मेश्राम "नील"
चांगोटोला

8 / 12 /2019
बिषय,, स्वतंत्र लेखन

हम क्यों कहते सुरक्षित है नारी
आजाद भारत में बढ़ी हुई लाचारी
कथित भेड़िऐ नोंच नोंच खा रहे
नारी शक्ति का क्यों मजाक बना रहे
नहीं डरते ईश्वर से सरेआम जला रहे
देश में रहकर ही देश को बदनामी का कलंक. लगा रहे
अरे कायर हो पीठ पीछे करते हो वार
धोखा में देते लज्जा उतार
सामने आओगे तो कुचले जाओगे
कुत्ते की मौत फिर मारे जाओगे
लगता है इनका कोई धर्म नहीं है
माँ बहिन बेटी की इनको शर्म नहीं है
हमारी चुप्पी को मत समझो भ्रांति
तेलंगाना जैसे मरोगे तब मिलेगी शांति
स्वरचित ,सुषमा, ब्यौहार

08/12/19
आधार दोहा छन्द

**

जीवन ऐसा ही रहा ,जैसे खुली किताब,
कुछ प्रश्नों के क्यों नहीं,अब तक मिले जवाब।

पृष्ठ बंद जो है रखे,स्मृतियाँ उनमें शेष,
मिलन अधूरा रह गया,हुये न पूरे ख्वाब।

प्रीत निभाई रीत से,क्यों थी मैं मजबूर,
समझे नहिं दिल की व्यथा,रूठे रहे जनाब।

प्रेम चिन्ह संचित करे,विस्मृत नहीँ निमेष ,
फिर कैसे वो खो गये ,सूखे हुये गुलाब ।

चाहा था हमने सदा,सात जन्म का साथ,
सुलझ न पायी जिंदगी,ओढ़े रही नकाब।

नहीं मिला इस जन्म भी,मुझको तेरा प्यार,
बेताबी के पल रहे,कैसे करें हिसाब।

स्वरचित
अनिता सुधीर

दिनांक-08/12/2019
स्वतंत्र लेखन


सांझ को पंछी चले घोसले को ।

लिए पस्त हौसले मन ही मन ।

झुँझलाई.......

देखो शरद ऋतु है आयी।

नवल रूप बिखरा है भूवि पर

शरद का नील त्रिलोचन है आई।

आफताब निकला गगन पर

प्रभा किरन कमसिन लहराई।

ओंस की बूँदें गिरे दूबो पर

मणि वाले फणियो का मुख

विहवल मन मंद-मंद अकुलाई।

सरवर का शीतल जल मलय समीर

धवल किरणो को ओढे इठलाई।

कलरव चिडियों का कोलाहल

पड़ने लगा मधुर सुनाई।

मौसम संग उपवन ने ले ली

नूतन अगड़ाई।

खेतों में पीली सरसो

फूली है विहलाई।

गुंजित भौंरो के उपर भी

चढी खुमारी है छाई।

धान के पौधे लदे बालियों से

धीरे-धीरे बहती पूरवाई।

सन-सन चले हवा

काँपता तन,मन घबराई।

साँझ के पंक्षी चले घोसले को

लिये पस्त हौसले मन झुँझलाई।

सत्य प्रकाश सिंह
प्रयागराज

बोल इन कलियों का कातिल कौन है।
तू नाम ले गुस्ताख शामिल कौन है।।

जरूर कुछ तो गड़बड़ है हिसाब में।
गुजरी खताओ का हासिल कौन है।।

हैरत भरी नजरों से मुझको देख मत।
मेरी नज़र में तुझसा काबिल कौन है।।

मजबूर न कर धूप आग हो जाए।
न कहना पडे हमसा जाहिल कौन है।।

वक्त रहते भींच ले मुश्को को नादां।
फिर न कहना हमसा गाफिल कौन है।।

मै जानता हूँ ये नहीं मंजूर तुझको।
फिर तेरे खित्ते मे दाखिल कौन है।।

जाए उबल ना सोच कर रग में लहू।
आदमी इतना भी काहिल कौन है।।

विपिन सोहल स्वरचित

8.12.2019
गुरूवार

रविवारीय आयोजन
मनपसंद विषय लेखन

दुर्मिल सवैया
112 112 112 112
112 112 112 112

(1)
फल फूल सभी विकसें-मंहकें परिवेश सदा सुखमय कर दो
तुमसे अरमान हमें इतना
यह जीवन मंगलमय कर दो
हर लो मन पाप भरी गठरी
मन का अब द्वेष मिटे वर दो
भगवान् करो कुछ तो पल में
सबका मन पावन तुम कर दो।।

(2)
अपराध सभी करते जग में
सबने कुछ ना कुछ पाप किया
कुछ ने इतना मजबूर किया
कितनों पर अत्याचार किया
बहनें-बिटिया, सब भूल गए
अपने घर को बरबाद किया
उनको अब मौत मिली पल में रब ने उनको यह दण्ड दिया।।

स्वरचित
डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘ उदार ‘

विधा-गद्य
" भारतीय संस्कृति और समाज "


स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत माँ की गौरवशाली संस्कृति परंपरा व इतिहास को हम अगली पीढ़ी तक पहुंचा नहीं सके।इस कारण भारतीय सनातन संस्कृति का वास्तविक ज्ञान समाज में नजर नहीं आता।
उसके प्रति श्रद्धा भी परिलक्षित नहीं होती है।
सामान्य रूप से धार्मिक आयोजन भी केवल मनोरंजन का साधन मात्र रह गए हैं। राम कथा, भागवत कथा, भजन संध्या, आदि पहले की तुलना में गली गली बारहों महीने हो रहे हैं,नतीजा कुछ नहीं निकलता है।
सनातन संस्कृति के गूढ़ रहस्यों को व वेद, गीता, रामायण के दर्शन को सही अर्थों में विद्यालय के पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जाता तो शायद समाज में इतने अपराध न होते तथा इन विकृतियों पर अंकुश लगाया जा सकता था।
मैं ये नहीं कहती कि अपराध खत्म हो जाते पर यह तो अवश्य होता कि अपराध खत्म करने वाले मानवों की संख्या कहीं अधिक होती।
हर परिवार के मुखिया की भी जिम्मेदारी है कि वे अपने बच्चों को बचपन से ही घर में अपने धर्मग्रंथों का पठन पाठन कराएं,बच्चों को शिक्षाप्रद साहित्य पढ़ने की ललक जगाए। तभी कुछ हो सकता है।

स्वरचित, मधुबाला सक्सेना, गुना म प्र


8/12/19
विषय स्वतंत्र


अलसाई सी सुबह
छाई उदासी
किरणे है रूठी
मुट्ठी में रेत
फिसलते समय
की तरह
शायद है कुछ भूली
या दिल मे कुछ दर्द
सहमी हुई सी
या रोका है किसी ने
टोका किसी ने
रोज आ जाया करती थी
अपने समय से
वक्त की पाबंद
स्वर्ण आभा युक्त
है इंतजार सभी को
या नीद नही खुली
धुन्ध की एक परत
छाई है चारो तरफ
किसी ने फैलाई
प्रदूषण की चादर
डरने लगी वो भी
बेटियों की तरह
मानव के करतूतों से
अपने स्वार्थ के लिए
कुछ भी कर सकता
आज का स्वार्थी नर
फिर बेटी हो या प्रकृति.....

स्वरचित
मीना तिवारी

विषय- स्वतंत्र लेखन
दिनांक ८-१२-२०१९
लोग मुँह मिश्री घोल,आजकल यूं बोला करते हैं।
मुँह राम बगल में छुरी,कहावत चरितार्थ करते हैं।।

महकते हैं फूलों की तरह,खुशबू मिलावट रखते हैं।
पत्तों सी कोमलता नहीं, स्पर्श दर्द दिया करते हैं।।

बातें लच्छेदार कर,वो ऐसे बात करामात रखते हैं ।
मिले जब भी खबर,नमक मिर्च लगा पेश करते हैं।

गुनाह करते हैं बहुत,पर शर्म नहीं किया करते हैं ।
यह कलयुग,ऐसे लोग ही मजे से जिया करते हैं।।

सच बोलने वाले, सदा ही गुनहगार बना करते हैं।
झूठ बोलने वाले।,एकछत्र चहुँओर राज करते हैं।।

सौ सुनार एक लुहार,कहावत प्रभु यथार्थ करते हैं।
जवानी में किया गुनाह,सजा वो बुढ़ापे में पाते हैं।।

प्रभु घर देर अंधेर नहीं,हकीकत नहीं समझते हैं।
करते हैं हिसाब सब बराबर,उधार नहीं रखते हैं।।

कह रही वीणा, ये मनु फिर क्यूं नहीं संभलते हैं।
अपने संग अपनों का भी,जीवन बर्बाद करते हैं।।

वीणा वैष्णव
कांकरोली
स्वरचित

II मनपसंद विषय लेखन II नमन भावों के मोती....

विधा: अतुकांत कविता - अमिट रिश्ते....


खाली सा मकाँ है…
ईंट पत्थरों का….

कभी बोलते थे खिड़की दरवाज़े….
घंटियाँ बजती थी बच्चों की आवाज़ में…
कभी-कभी कोई कर्कश आवाज़…
झकझोर जाती थी दीवारों को….
मीठे नमकीन पल थे ये सभी….
तीखी मिर्ची सा स्वाद भी था जिनमें कभी…
ज़िन्दगी चल रही थी यूं ही….
पर आज…..सब वीरान सा….

हर तरफ खामोशी सी पसरी है…
दिल की धड़कन भी सहमी सी चलती है…
टूट न जाए खामोशी कहीं…
रिश्ता कहाँ टूटता है….
जिनमें ज़िन्दगी के दस साल गुज़ारे थे हमने…
मन बार बार आज देखता है….
उन्हीं ईंट पत्थरों को….
आँखों से छू के हर कोने को…
हर दीवार को…
यहाँ कभी तस्वीर हुआ करती थी…
बच्चों की…
तो वहां मेरी…

रिश्ते भी…
आँगन के पौधों की तरह हैं….
देखभाल ज़रूरी है….
प्यार से सींचने के लिए…
विश्वास ज़रूरी है…
धूप से बचाने के लिए…
छाँव…एक सुखद अहसास….

सब पन्ने ज़िन्दगी के अब…
सिमट गए दिल के कोने में…
अमिट हो कर…
ईंट पत्थरों का रिश्ता….
बच्चों…पौधों का रिश्ता…
और रिश्ता अपना टूटने का…
पत्थर पे एक लकीर की तरह….
अमिट…..

विषय-स्वतंत्र लेखन
वार-रविवार

दिनांक-8-12-2019

खो गई है हस्ती मेरी नाम हुआ बदनाम |
डूब गई है कश्ती मेरी काम हुआ तमाम ||

दोष दूँ किसे यहाँ मैं सब चेहरे अनजाने |
इज्जत लुटी आग लगाई हो गये गुमनाम ||

माँ तेरे इंतजार की हो गई है इंतहा|
आ गई आँचल तेरे सदैव करने आराम||

शरीर को मेरी छलनी कर किया लहू लुहान|
रूह मेरी भटके जीना सबका हुआ हराम|

आजाद जंगली जानवर घूमे ना अब कहीं|
है कोई यहाँ नकेल डाल खींचे इनकी लगाम|

स्वरचित कुसुम त्रिवेदी
दाहोद (गुजरात)

भारत का बुद्धिजीवी समाज केसे पाँचतारा होटल मे उत्सव मना सकता है जब कि देश का माहौल इन बलात्कारों से शोक संतप्त है । लगता है जैसे कही कुछ हुआ ही नही । क्या स्त्री की कोई अहमियत नही इस समाज को ?

बात एक दम सही कही है आपने । यह तो मेरी भी समझ म
े नही आता आज का मनुष्य इतना भाव शून्य कैसे हो सकता है । भारत की जमीन पर यह पाप रोज ही होता है कभी स्व घर ही ,कभी सडक कभी खेत कभी आफिस स्थान कुछ भी हो औरत हर स्थान और हर उम्र मे अपने अस्तित्व को खो रही है। भारतीय समाज का इतना अधिक सांस्कृतिक पतन हो चूका है इसका कारण कारण यह भी है आज का मनुष्य अकेला हो गया है ।जब बह समूह मे था तो बधन था । उसे नीति के अनुसार चलना होता था । आज कल तो बस कुछ समय का शोर मात्रहै । इसका एक बिषेश कारण है नोकरी पेसा आदमी घर से दूर रहते रहते भाव शून्य हो गया है उसका नसमूह होता है न पडोस तो चिन्ता किसकी करे ।दूसरी बात बचपन आज के समय का अकेला है क्योंकि मां बाप दोनो ही नौकरी करते है और बच्चे अनैतिक के प्रति आकर्षित हो जाते है ।
यह तो हुई समाज की बात परन्तु इस बिषय पर राजनीति करना ,किसी की मौत पर बतासे बाँटने के समान है । वास्तव मे भारत कैसे नेता से घिरा है जैसे भाव सून्य है।
समझ से बाहर है उनका यह कृत्य ।दुख में कोई कैसे जश्न मना सकता है ।
सरला सिंह शैल कृति- मौलिक विचार




आवाहनम शक्ति
*******
ओ शिवा

*****
ओ शिवा
कहां गई तुम्हारी शक्ति
रक्त की पिपाशा
क्यों क्यों #लुटती हो #रोज
रात के अधेरे में
दिन के उजाले में
#क्या #करोगी अब तुम
लुट चुकी हो मिट चुकी हो
ऐसिड से #ऐक #नेत्रीबनी
कुलच्छनी बनी
ओर मिटा दी गई सडक पर
कुल के नाम जाति के नाम।
ओ शिवा कहा गई तुम्हारी शक्ति
चापा कोल तुम्हारा मरण स्थल
बस तुम्हारा बलिस्थल
ओर घर बना समाधि स्थल
कैसे इतना सहती हो
#प्रतिकार क्यों मौन है
पांव मे आलता नहीं
ये रक्त है जो बचाव मे बहा
तुम्हारा
इसे धोना नहीं
शक्ति का आवाहन करो
ओ !ओ !शिवा
शिवत्व को जगा
तांडव करो
बन जा काली दुर्गा
करो #रक्त #बीजों का संघार
कालिका बन पी ले इनका रक्त
ओ #शिवा कहा गई तुम्हारी शक्ति
आंखों की ज्वाला
फुंकारती क्यों नहीं
उठा खडग
नपुंसको का बध कर
पापियों का दमन तो करो
एक बार बस एक
बार संघार तो करो
काल रात्रीबन के
मानवीय रुप धर
जटा को खोल ले
एक बार बस एक
बार कूद पडो
#नपुंसको के बध के लिये
रक्त भरी जिव्हा से
पशुता के अंत हेतु
चंडिका रुप धरो
नर मुंड माला पहन
एक बार अट्टहास करो
ओ #शिवा आओ तुम शक्ति हो
थोडा हलाहल तो पी चुकी
अब तांडव करो
ओ शिवा ओ शिवा।।
***सरला सिंह शैल कृति
विषय : मनपंसद लेखन
विधा: स्वतंत्र

दिनांक 08/12/2019

🙏गुरू वन्दना🙏

गुरु तुम महान हो,
अमृत गुण की खान हो।
ब्रह्मा तुम विष्णु तुम,
गुरु महेश्वर समान हो।
ज्ञानी तुम त्यागी तुम,
हृदय विशाल हो।
भाग्य तुम भविष्य तुम,
भूत वर्तमान हो।
भक्ति तुम शक्ति तुम,
तुम प्रभु समान हो।
तेज तुम शीतल तुम,
तुम प्रकाशवान हो।
वीर तुम धीर तुम,
तुम शीलवान हो।
चरित्र तुम पवित्र तुम,
सरस्वती की शान हो।
'रिखब'करे नमन तुम्हें,
तुम स्वर्ग से महान हो।

रिखब चन्द राँका 'कल्पेश'
स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित
जयपुर राजस्थान

आज का कार्य मनपसंद लेखन
तिथि 8/12/2019/रविवार

विषय _*नारायण संस्थान *
विधा॒॒॒ _कविता *

धन्य कहें नारायण संस्थान।
हैं धन्य यहां के सब इंसान।
लगे प्यार से सेवा करने
हम पर हुऐ हैं मेहरबान।

यहां कार्यरत जो कर्मचारी
सचमुच करते मधुर व्यवहार।
भोजन भजन है उत्तम सुरक्षा
इनका यही अनुपम उपकार।

ये नर नारायण सेवा है
देखे सुने इनके उदगार।
श्रद्धावनत मानव जी के प्रति
शतशत नमन है बारंम्बार।

स्वरचितः
इंजी शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना मध्य प्रदेश
जय श्रीराम रामजी

नारायण संस्थान*काव्य
8/12/3029/रविवार

स्वतंत्र लेखन विधा लघुकथा

सुरक्षा

" बेटी तेरी नौकरी से तो मुझे हमेशा चिंता लगी रहती है ? समय खराब है ।"
रमा ने बेटी श्यामा से कहा । वह एक कम्पनी में काम करती है और रात- बिरात उसे आने में देर हो जाती है ।
श्यामा आये दिन महिलाओ के साथ होने वाली घटनाओं के बारे में जानती थी , लेकिन घर चलाने के लिए श्यामा को जोखिम उठानी ही है । घर में वृद्ध माँ और छोटा भाई है । पिता जी का देहान्त हो गया था । कुछ दिन पेंशन से घर चलता रहा लेकिन भाई की पढाई और माँ की बीमारी के कारण उसका नौकरी करना जरूरी हो गया ।
इसके बाद श्यामा ने पीछे मुड़ कर नहीँ देखा । उसने पढाई के दिनों में कराटे सीखा ।
कम्पनी में नौकरी लगने के बाद श्यामा ने पहले ही दिन मिर्च स्प्रे, एक छोटा चाकू , रस्सी , एक जेन्टस शर्ट और केप खरीदी ।
श्यामा जब रात को एक बजे आफिस से घर के लिए निकली तो उसने शर्ट पहनी , बालों को अंदर समेट कर केप पहनी और बैग से सुरक्षा उपकरण निकाल कर जेब में रखे फिर स्कूटी से चल पड़ी। घर करीब चार किलोमीटर की दूरी पर है ।
श्यामा ने अपने चेहरे पर डर और घबराहट नहीँ
आने दी ।
घर आ कर जब उसने कालबेल बजाई तो रमा एक क्षण के लिए दरवाजे पर अनजान आदमी को देख कर
डर गयी । तभी श्यामा ने केप उतारी और सब बातें माँ
को बताई । अब रमा को निश्चित॔ता हुई कि उनकी बेटी किसी भी परिस्थितियों से निपटने में सक्षम है ।
एक दिन रात को श्यामा के साथ हादसा हो भी गया , दो बदमाशों ने रास्ता रोक लिया तब श्यामा ने फुर्ती से पहले मिर्च स्प्रे उनकी आखों मे डाला , कराटे के स्टेपस से गिरा कर रस्सी से उनके हाथ पैर बांध कर पुलिस हेल्पलाइन को फोन करके उनके हवाले कर दिया । पुलिस को भी इन बदमाशों की तलाश थी ।
अब श्यामा ने कम्पनी की दूसरी लड़कियों को भी इन सब बातों को बताया और हर विपरीत परिस्थितियों से निपटने के लिए तैयार किया ।
रमा सोच रही थी : " अगर आज हर लड़की अपनी सुरक्षा के लिए मानसिक तौर सचेत रहे और निपटने की तैयारी रखे तो कोई दरिन्दा बेटियों को नुकसान पहुंचाने की हिम्मत नहीँ कर सकेगा ।"

स्वलिखित
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल

विषय.............. असम्बाधा वार्णिक
मात्रा भार..........( 222 22,1 111 112 22 )

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बेटी लगती है,चुलबुल घर की दुलारी।
मात पिता सब की,चहकत तनया प्यारी।।
खुशबू बिखेरती,महकत घर के आँगन।
चंदा सी चंचल,बलखत लग सुकुमारी।।
***
दो कुल को जोड़े,सुख दुख सहकर रहती।
बेटी सम्बध में,मधुर मुस्कान रस बिखेरती।।
बाबा की बिटियाँ,घर भर की है रानी।
गोदी मे रहती,झुलन लगी नदान सी।।
***
क्यूँ तड़प रही है,बिटिया समाज में अब।
सिसकती चुनर में,कदर न सबने जानी।।
रानी है घर की,कर उसका भान जगत।
हृदय में रख ले,बिटियाँ को मान भगत।।

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कन्हैया लाल श्रीवास
भाटापारा छ.ग.
जि.बलौदाबाजार भाटापारा

विषय
Lajja Ram Raghav Tarun :- "स्वतंत्र लेखन"
दिनांक :- 08/12/2019.

"आह्वान"
********
बहुत लुटा ली ममता तूने,फिर भी वही कहानी।.....
अब बन झांसी की रानी.........!
बहुत निभाई घर गृहस्थी,बन माँ पर तुझे मिला क्या?
तेरी त्याग भावना का कह तुझको मिला शिला क्या?
शिकवा-गिला झेलती हरदम मर्दों की मनमानी।...
बन अब झांसी की रानी........!
सदाचारकी सीखप्यार से,तूनेबहुत सिखा ली।
दुष्ट दरिंदे ना समझे अब बनके खप्पर वाली।
लाली दिखा नेत्रों की तू, बन दुर्गा महारानी।....
अब बन झांसी की रानी.........!
बातों से नहीं बात बनेगी , लातों से सुलझा अब।
सौम्य रूप तेरा अबला,तव रौद्ररूप दिखला अब।
औकातदिखा नरदानव को,जिन के मनमें शैतानी।....
अब बन झांसी की रानी........!
लो खड़ग उठा अब हाथों में, दुष्टों का संहार करो।
रूह कांप जाए पापी की, अब ऐसा प्रहार करो।
जिव्ह-ज्वाल से भष्म करो,हे ज्वालामुखी भवानी।......
अब बन झांसी की रानी...........!

🍃गज़ल🍃

जिंदगी में हमने बड़े झमेले पाल रख्खें हैं।
ुछ फैसले हमने कल तक टाल रख्खें हैं।1।

बहुत महंगे हो गए है आजकल टमाटर।
हमने फ़्रिज में दो चार सम्भाल रख्खें हैं।2।

बहुत सी ख्वाहिशो का गला घोंट डाला।
बचा कर कुछ पैसे बैंक में डाल रख्खें हैं।3।

तहजीब से बोले है हमसे वही आज कल।
जिनसे हमने कुछ पैसे ले उधार रख्खें हैं।4।

दुश्मन भी करने लगे है मोहब्बत अब हमसे।
दोस्त ही हमने कुछ ऐसे बेमिसाल रख्खें हैं।5।

तेरी नज़रों ने कर रखा है घायल हम को।
तीरे नज़र तु यार ऐसी कमाल रख्खें हैं।6।

दुखे ना दिल किसी का हमारी कलम से।
"ऐश"इस बात का सदा ख्याल रख्खें हैं।7।

©ऐश...(स्व रचित)✍🏻
अश्वनी कुमार चावला,अनूपगढ़,श्री गंगानगर,

"स्वतंत्र विषय लेखन "08दिसम्बर 2019

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