Sunday, December 1

"स्वतंत्र लेखन "01दिसम्बर 2019

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ब्लॉग संख्या :-582
दिनांक-1/12/209
विषय- स्वतंत्र लेखन

दिन-रविवार

कोमल सर्दी की गुलाबी ठिठुरन.....

आ गई ठिठुरन की रातें

गहरी है अंतर्मन की बातें

मन निर्मोही ,मन की बाते

ठिठुरन रतियां कैसे काटें

गुत्थम गुत्था हो रहे

बच्चे अवोध ,गरीब अभागे

ठिठुरन से कांपे तनमन

कोहरे की झीनी चादर ओढ़े

रूप छिपाए मादक यौवन

धूप सखी की अंगुली पकड़े

इधर-उधर मँडराये

चौपाल में मुस्कान ठहाके

भींगी शाम, ठिठोली रातें

हेम रात्रि की कंपन आहे

चर्तु दिशाएं ठिठुर रही है

शिशिर बने हैं हिम के कण

कापँता अबोध गरीब का मन

रात्री स्तब्ध पड़ी हुई

मेघ ब्योम में घन -घन

यह कैसी ठिठुरन

यह है कैसी ठिठुरन

स्वरचित
सत्य प्रकाश सिंह
प्रयाग राज

दिनांक -1/12/2019
** पिता **


मेरे जन्म पर
सबसे बेचैन पापा मैंने आपको देखा
माँ के हर आह पर
आपको सिहरते देखा।

थके हुए आपकी आँख को
बार - बार डबडबाते देखा
सुखे कण्ठ से माँ को( दिलासा देते /सम्भालते ) देखा।

माँ के साथ मिलकर
रिस्तों की चादर बुनते देखा
गाँठ न पर जाए कहीं
बड़ी सावधानी से
हर धागे को सुलझाते देखा।

जीवन के क्रम में मैंने
आपको अपने फटे बनियान को
माँ से छुपाते देखा
बिन साबुन के ही
झट से नहाते देखा।

इसी बीच देखा मैने
आपके दबे हुए कन्धों को
जिसपर बोझ था
दादा - दादी के दवाई का
हमारे पढ़ाई का
दीदी के ब्याह का
पूरे परिवार के अरमानों का
रिश्तेदारों की खुशियों का
जिसे निर्वाह करने में मैंने
रात- रात भर जगते
अनथके बिनरूके
बस आपको चलते देखा।

लड़खडाए जब भी कदम मेरे
सम्भालते पापा आपको देखा
नहीं देखा परमात्मा को कभी
पर उनकी हर छवि
मैंने पापा आप में देखा।
सबको समान सींचते
दुलारते देखा।

स्वरचित :- मुन्नी कामत।

01/12/2019
"स्वतंत्र लेखन"

################
मुझे मत मारो ........माँ
मेरी आवाज़ सुनो....माँ
मुझे दुनिया देखने दो.....
जिंदगी जीने का हक दो..।

कराहती आवाज़ नन्ही सी जान.
कुँवारी माँ....बेबस लाचार........
करे क्या....दर्द कहे किसे.........
जवानी की हुई कैसी ये भूल.....।

किसी को चाहना,हद से ज्यादा
किसी पर विश्वास, खुद से ज्यादा
तन से खेलकर छोड़ गया........
मुझसे रिश्ता सारा तोड़ गया....।

माफी की भी हकदार नहीं......
माँ के लायक भी मैं नहीं........
तेरा चेहरा भी न देख पाई.......
बिन ब्याही माँ की कोख में जोआई।

दुनिया को न जानती तू अभी.....
सवालों के घेरों में कैसे जी पायेगी
........पापा कहाँ से तू लाएगी.....
दुनिया वालों को जवाब न दे पायेगी
फिर तू घुट-घुट कर मर जायेगी....।

इन सवालों को कैसे झेल पायेगी
.........इस जन्म में तुझे ........
कोख में ही मुक्ति मिल जायेगी
दूसरे जन्म में तू ही.......
मेरी बेटी बनकर आयेगी...
......मुक्ति मिल जायेगी...
......मुक्ति मिल जायेगी...
क्षमा!!क्षमा!!क्षमा!!
!!विदा!!विदा!!विदा!!

स्वरचित पूर्णिमा साह
पश्चिम बंगाल।।

विषय स्वतन्त्र लेखन
विधा काव्य

01 दिसम्बर 2019,रविवार

इस पृथ्वी पर एक रत्न है
भव्य रत्न है भारत माता।
विशाल लोकतंत्र समाहित
विश्व सदा गुण इसके गाता।

ताज हिमालय गङ्गा यमुना
ताजमहल अद्भुत जग में।
सद्कर्मो की फसल काटते
भरपूर शौर्य है रग रग में।

अद्भुत भव्य केसर क्यारी
शौभा इसकी जग में न्यारी।
मलय बहार सुगन्धित देती
भारत माता सबसे प्यारी।

जग के चारों धाम ईश के
सागर नित माँ पांव पखारे।
विविधता में लिये एकता
उड़े सदा सुख शांति बहारे।

मेरा वतन न्यारा प्यारा जग
चार वेद ऋचाएँ नित गाता।
बारह ज्योतिर्लिग की पूजन
धन्य धन्य प्रिय भारत माता।

यह भरतों का देश भारत
संघर्षो में पलता बढ़ता।
खून पसीना सदा बहाकर
श्री मंजिल पर नित चढ़ता।

स्वरचित ,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
दिनांक 01-12-19
विषय - स्वतंत्र लेखन

रिश्ते

रिश्ते जीवन की बगिया हैं,
रिश्ते हैं सबसे अनमोल l
कुछ रिश्ते दिल के सच्चे,
कुछ रिश्ते कल्पित कपोल l

परिभाषा में नहीं बंध पाते,
रिश्तों के प्यारे एहसास l
रिश्तों से जीवन जीवंत है,
रिश्ते ही जीवन का उजास l

पहला रिश्ता मात पिता से,
एक अनमोल खजाना है l
तुलना नहीं कभी जिसकी,
प्यार वो सबसे सुहाना है l

भाई बहन का पावन रिश्ता,
तकरार प्यार मनुहार भरा l
डोरी में बंधे रिश्ते हैं कई ,
बंधन है अभिसार भरा l

जीवनसाथी से रिश्ता तो,
ईश्वर का प्रत्यक्ष स्वरुप है l
अनुपम अलौकिक ये रिश्ता,
दिलों का ये मेल अनूप है l

मित्र भी मोती रिश्ते डोर के,
जीवन में भरते हास परिहास,
जीवन नीरस बिन मित्रों के,
आत्मीयता का ये आभास l

गुरु और शिष्य का रिश्ता तो,
पुनीत पवित्र उच्च महान l
गुरु चरणों की कृपा दृष्टि से,
मिलता हमें असीमित ज्ञान l

इक रिश्ता है इंसानियत का,
दुनिया जिसे भुलाए हुए है l
विडंबना ये हम सब जन की,
मानवता के सताए हुए हैं l

नव पीढ़ी को हम सबको अब ,
रिश्तों का मोल समझाना है l
मोती बिखर रहे रिश्तों के,
प्रेम डोर में इन्हें पिरोना है l

आओ सहेजें बिखरते रिश्ते ,
थोड़ा झुककर आगे बढ़ें l
शिकवा गिले न रखें मन में,
सदा दूसरों पर ही न दोष मढ़ें l

कुसुम लता पुन्डोरा
नई दिल्ली

दोस्ती देर तक चलाने को
मैं कुछ दूरी रखता हूँ ।
न चाह कर भी बताने को
एक मजबूरी रखता हूँ ।

मेरी ये बात जो है
अक्सर लोगों को खलती ।
उन्हे लगता मेरे अन्दर
कोई निष्ठुरता पलती ।

कुछ सीखें मिलीं हैं मुझे
जो मुझसे ये कहतीं हैं ।
स्वभाव आदतें सबकीं
कुछ अलग रहती हैं ।

सबमें पूर्णतः घुलना
होता है बहुत मुश्किल ।
घुलकर भी क्या हो भला
सबकी मुख़्तलिफ़ मंजिल ।

चलते इसके कुछ खोया
तो कुछ 'शिवम' पाया है ।
फिर हाल मिरी जिन्दगी ने
मुझको यही सिखाया है ।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 01/12/2019

दिनांक-1/12/2019
वार-रविवार


खो गई है हस्ती मेरी नाम हुआ बदनाम |
डूब गई है कश्ती मेरी काम हुआ तमाम ||

दोष दूँ किसे यहाँ मैं सब अनजाने चेहरे |
इज्जत लुटी आग लगाई हो गये गुमनाम ||

द्वार खड़ी होगी माँ तू इंतजार में मेरे |
पर लाश पहुँची होगी माँ आँचल में तेरे||

हो सके तो माँ तुम उनसे बदला जरुर लेना |
छोटी मोटी सजा नहीं फाँसी ही तुम देना ||

न्याय चाहती है ये भारत माँ तेरी बेटी |
वरना जी ना पाएगी जन्मदात्री माँ मेरी ||

स्वरचित कुसुम त्रिवेदी
विषय_ *अध्यात्म*
विधा॒॒॒ _मुक्तक(18)

देखो राम बनना चाहता हूं।
मगर राम को नहीं मानता हूं।
राम को अंतर में छिपाया है,
उन्हें कहीं ढूँढना चाहता हूं।

मै रामादर्श को जाना नहीं।
अपने रामजी पहचाना नहीं।
जन्मों से ही भूलें करता रहा,
आवाज अंतस मै माना नहीं।

भाषण गैरों को बांटता रहा।
कमियांऔरों की छांटता रहा।
बुराई अपनी कभी देखी नहीं,
बस अपनी बातें हांकता रहा।

राम गुणगान यहां करता रहूं।
ऊपरी मन माला करता रहूं।
क्या हो जब मंदिर बुहारा नहीं
सभी से राम राम करता रहूं।

स्वरचितःः
इंजी शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय मगराना गुना मध्य प्रदेश
विषय : मनपसंद लेखन
विधा: स्वतंत्र

दिनांक 01/12/2019

हिन्दी भाषा के दीवानें

बिगुल बज गया राष्ट्रभाषा का।
प्रत्येक बालक बालिका जगी।।
इंदौर जागा राजस्थान जागा।
हिंदी संगणक योद्धा भी जगा।।

भारत देश एक समाज अपना।
भारत का संविधान हमारा है।।
राजभाषा को राष्ट्रभाषा बनाना।
अधिकार और कर्तव्य हमारा है।।

गाँधी जी ने जो अलख जगाई।
गूँज उठी भारत के जन-जन में।।
हिन्दी राष्ट्रभाषा की जय गूँजी।
भाषा सारथी के समवेत स्वर में।।

राजस्थान भी नही रहा पीछे ।
राष्ट्रभाषा की नव दहलीज पर।।
ताज हिन्दी का चमक रहा था।
जननी मातृभूमि के मस्तक पर।।

महादेवी, ललद्यद, सुभद्रा, मीरा।
तुलसी, कबीर, रहीम, रसखान।।
दिनकर, पंत, निराला,बच्चन जी।
हिन्दी माता के उपासक कहलाए।।

हिन्दी भाषा के प्रिय अनुरागियों के।
नाम कहाँ तक 'रिखब'तुम्हें गिनाए ?
जीवन अर्पित किया जिन लोगो ने।
आओ श्रद्धा भाव से सुमन चढ़ाएँ।।

रचयिता
रिखब चन्द राँका 'कल्पेश'
स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित
जयपुर राजस्थान
भावों के मोती
विषय-- स्वतंत्र लेखन

____________________
उतरी धरा पर सोचती मैं हूँ कौन
देख इन्हें सबकी खुशियाँ मुरझाई
देखकर रहते सबके चेहरे मौन
बेटी हूँ घर की नहीं कोई पराई

बोझ मत समझो इन बेटियों को
इनसे ही सृष्टि,सृजन चल रहा है
यह धन यह वैभव सब इन्हीं से
इनमें भी लक्ष्मी का अंश जुड़ा है

परिवार पे कोई मुश्किल है आती
यही दुर्गा और काली बन जाती
सरस्वती का सदा स्नेह है इन पर
तभी बच्चों को संस्कार सिखाती

विविध रूप है इन बेटियों के
नहीं कोई बंधन इन्हें बाँध पाया
माँ-बहन और बेटी पत्नी
हर रिश्ता इन्होंने बखूबी निभाया

सिर्फ बेटी बनकर ही नहीं जीती
रिश्तों के लिए यह अश्रु घूँट पीतीं
पर,पुरुष ने न अपना पौरुष छोड़ा
पल-पल स्त्रियों के हृदय को तोड़ा

सदा उन्हें देखा भोग की नज़र से
पर दिल से कभी सम्मान न दिया
बेटी की चाहत कम है अभी-भी
उनको उचित स्थान मिला न अभी-भी

न फेंकों न मारो न तोड़ो इन्हें
खिलने दो नाज़ुक-सी कलियाँ इन्हें
जगा लो इंसानियत अपने अंदर
अनमोल धरोहर यह बचालो इन्हें

अगर भू से मिटा बेटियों का अस्तित्व
सृष्टि भी मिट जाएगी हो असंतुलित
जीवन व्याप्त है इनके उदर में
यही सृष्टि की हैं संचालिकाएं

क्यों काँपती नहीं है रूह तुम्हारी
जला देते ज़िंदा मासूम सुकुमारी
नारी से जन्म ले,उसे तड़पाते
जिस्मों को नोचते हाथ नहीं काँपते

***अनुराधा चौहान***स्वरचित

स्वतंत्र लेखन
1/12/19


सद बुद्धि मानव की कितनी तंगहो गई।
आधुनिकता की शैली अब विकृत हो गई।

संस्कृति सादगी मानवता कही खो गई।
मौजमस्ती की भयानक यहाँ जंग हो गई।

अपनेपन के रिस्ते खो गए है यही कही।
वो बिगड़े एहसासों की दामन की जीत हो गई।

खो गए वो हाथ जो बढ़ते थे मदद के लिए।

इंसानियत पे इंसानियत की बुरी नजर हो गई।

वेचैन है निगाहे उन बेटियों की अब सभी।
जिंदगी तो उनकी अब तो कटी पतंग हो गई।

जिस्म को जिस्म से क्रूर बन रौंदता है क्यू।
पाक दमन की कहानी जैसे अब अतीत हो गई।

भटकती संस्कृति की जैसे जीत हो गई।
अंधे कानून के दोस्ती अब इन के संग हो गई।

स्वरचित
मीना तिवारी

1/12/ 2019
बिषय,, स्वतंत्र लेखन

उतार चढ़ाव के झमेले में निकल गया जीवन
पर ठहर न पाया ऐ चंचल मन
मिले बहुत खट्टे मीठे अनुभव के पिटारे
कभी दहकते अंगार कभी चांद सितारे
बिछड़े जो अपने उनका आज भी है गम
यादों में खोकर आँखें हो जाती नम
जब आऐंगे बो याद बहुत आऐंगे
बट बृक्ष सी छत्रछाया को कैसे भुला पाऐगें
उनका साथ नहीं तो लगता कुछ भी नहीं है
वो प्यार दुलार सब नाटकीय है
काश एक बार मेरे सामने आते
ब्यथित हृदय को समझा जाते
क्या करुं मन मानता नहीं
तुम्हारे सिवाय किसी को पहचानता नहीं
माँ दद्दाजी पिताजी को आज की लेखनी समर्पित
शब्दभावना सुमन सादर अर्पित
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार

विषय -स्वतंत्र सृजन
दिनांक 1-12-2019
जहां को दिखाने,रिश्ते ऐसे निभा रहे हैं।
नहीं रहा अपनापन,दिखावा कर रहे हैं ।।

झूठी मुस्कुराहट,चेहरे पे रख जी रहे हैं।
अपनों बीच,देखो वो बेगाने हो रहे हैं।।

रिश्ते खून के,औपचारिकता निभा रहे हैं।
स्वार्थ रख मन में, वो करीब आ रहे हैं ।।

जीवन में कैसा,परिवर्तन दौर आ रहा है।
भीड़ में भी,अब तन्हा जीवन जी रहे हैं ।।

रिश्ते दिल से नहीं, दिमाग निभा रहे हैं।
अपनों को आहत,मन मन खुश हो रहे हैं।।

वक्त भी देखो,अब वो करवट ले रहा है।
दिल से निभाए रिश्ते,वह खास हो रहे हैं ।।

दर्द में रिश्तो का,जब अहसास हो रहा है।
नहीं की कद्र, तन्हा खून आंसू रो रहे है।।

रिश्तो का महत्व,वो महसूस कर रहे है ।
अपनेपन अनमोल निधि,सहेज रहे है।।

गैरों में पागल बने,अब अपनों को ढूंढ रहे हैं।
कांख छोरा गाँव ढिंढोरा,कहावत दोहरा रहे हैं।।

रिश्ते अहमियत,जिंदगी जन्नत बना रहे हैं।
शेष जीवन अपनों संग,सानंद बिता रहे हैं।।

वीणा वैष्णव
कांकरोली

दिनांक...........01/12/2019
विषय.............चलो गाँव की ओर

मात्रा भार........(16-12)
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
शहर चमक से दूर चित्त मन,
करता हृदय विभोर।
रिश्ते संग मिठास बिखेरने,
चलिए गाँव की ओर।।
★★★★
अपनो का अपनापन लेकर,
प्रेम भरा रस घोलें।
संस्कार की जननी धरती,
लेती है हिचकोले।
कोयल की सुकंठ करे शोर,
चलिए गाँव की ओर।।
★★★★★
खेत ताल सुंदर मधुबन से,
सजा है मेरा गांव।
डाल डाल पर पंछी बोले,
चहके अंबुआ छांव।
नील गगन शोभित भानु भोर,
चलिए गाँव की ओर।।
★★★★
शुद्ध वायु बहती जल थल पर,
सांस्कारिक सब लोग।
पावन पर्व संस्कार भरे,
सद आचरण के योग।
महका हर गली खोर,
चलिए गाँव की ओर।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
स्वलिखित
कन्हैया लाल श्रीवास
भाटापारा .छ.ग.
जि.बलौदाबाजार भाटापारा

०००००००००००००
1 - 13 - 19 , रविवार ,

आयोजन :---
मन पसंद लेखन
~~~~~~~~~~~~~~~~~~

मुक्तक
--------

अभिव्यक्ति की आजादी ने,
किया है बंटाढ़ार,
द्रोही चारों ओर बढ़ें हैं,
सोचे अब सरकार,
मर्यादा में बाँधो इनको,
ये हैं शातिर दुष्ट-
देश धर्म बदनाम हो रहा,
करो नहीं मनुहार ।।

जो मुँह आया बकते रहते,
शर्म हया सब छोड़,
एक नहीं लाखों आ बैठे,
लगी हुई है होड़,
बहुत जरूरी हुआ आज है,
बनें कड़े कानून-
सबक सिखाएँ दंडित करके,
देश रहे जो तोड़ ।।
~~~~~~~~~
मुरारि पचलंगिया

सरसी छन्द
शहर में अब कुछ भी नहीं है,

चलो गाँव की ओर।
रिश्ते नाते बिखर गये हैं,
बचा हुआ बस शोर।
अब सपने में व्यस्त सभी हैं,
सबको अपने काम।
अपनों को ही वक्त नहीं है,
क्या होगा अंजाम।
अपनों को अपनें ही लूटें,
सब हैं आदमखोर।
शहर में,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
दिखावे की प्रीत है देखो,
बस पैसे का मोल।
दोस्त दोस्ती का गला घोंटे,
मन में रखता झोल।
पहचान ही कहाँ पाता हूँ,
किसके मन में चोर।
शहर में,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
बहन बेटी सुरक्षित नहीं है,
बचा सकें ना आन।
खुले दानव सा घूमता है,
नर कर मदिरा पान।
अपनी ही बहु बेटी नोचें,
आया कलयुग घोर
शहर में,,,,,,,,,,,,,,,,,

श्रद्धान्जलि शुक्ला"अंजलि"

1.12.2019
रविवार

मन पसंद विषय लेखन
ग़ज़ल

शाख़ से पत्तों का रिश्ता

शाख़ से पत्तों का रिश्ता कितना गहरा है
वक़्त मौसम संग ,मानो ख़ुद ही ठहरा है ।।

है हवा की शोख़ियाँ ,पतझड़ के मौसम की
आसमाँ नीला बहुत ,सागर से गहरा है ।।

गुनगुनाती धूप है ,बदरी है बारिश है
ऐसा लगता है कि मानो ,आज पहरा है ।।

इन्द्रधनुषी रंग का ,सूरज है पूरब में
डूबता सूरज सदा ,दिखता सुनहरा है ।।

पंछियों की चहचहाहट ,गूँजती रहती
पढ़ रहा मानो ,कोई बच्चा ककहरा है ।।

है ‘ उदार ‘ दौलत यही,जीवन की मानव की
दोस्ती का रंग यहाँ, हर पल रुपहला है ।।

स्वरचित
🍁
डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘ उदार ‘
स्वतंत्र विषय
"कोई दरिंदा नहीं बचेगा"


कहीं देर न हो जाए, फांसी पर इन्हें झुलाने में।
आग लगादो बहसी को, कहीं देर न हो जाए जगने में।।

नारे बाजी कैंडल मार्च , अब बहुत हुई नेतागीरी।
चुन चुन के मारेंगे हम तो, बहुत हुई चमचागीरी।।

कहीं दामिनी कहीं प्रियंका, कब तक सहते जाएंगे।
यदि इनको अब भी नहीं रोका, तो घर से बेघर हो जाएंगे।।

आग लगाओ तन को इनके, जैसे कचरे की ढेरी को।
कुचलो इनके फन को ऐसे, जैसे कोल्हू में गन्ने को।।

पहले अंग कटें इनके सब,फिर लटकाओ सूली पर।
बहसी पन को साफ करो,फिर बात करेंगे टीवी पर।।

पहले अंग कटे उसका, जिससे उसने यह कृत्य किया।
इसके बाद गला रेतो,जिसने भी ऐसा कृत्य किया।।

कभी मंदसौर कभी अलीगढ़, कभी कलंकित दिल्ली है।
नहीं सुरक्षित दिखता कोई, चाहे गली कचहरी है।।

लुटी थी ट्विंकल लुटी निर्भया ,आज प्रियंका लुटती है।
अरे देखो तो संसद वालों, एक चिकित्सक की अर्थी उठती है।।

जब उठी प्रियंका की अर्थी ,संसद में खेल चल रहा था।
कौन बड़ा है देश भक्त, इस पर संवाद चल रहा था।।

अब और नहीं हिम्मत मेरी, अब और नहीं सह पाऊंगा।
अब भी यदि संसद नहीं जागी, तो बागी मैं बन जाऊंगा।।

मोदी जी कानून बनादो ,इस संसद के गलियारे में।
कोई दरिंदा नहीं बचेगा ,न्याय के गलियारे में।।
(अशोक राय वत्स)© स्वरचित
रैनी ,मऊ उत्तरप्रदेश
Damyanti Damyanti 
यमुना के तट पर देखो
मधुबन के करील की कुजंन मे

कान्हा ने बंशी पर छेडी सरगम |
सुन धुन मधुर बंशी की आई
दौड गैया बछचडनसंग |
देखो ग्वाल बाल,क्या गोपिया दौडी |
राधारानी बरसाने वाली कैसे रुके
वह तो दोबदन एक आत्मा
अरेरररररश्रीदामा अचरज भरे चिलाये |
बोले कान्हा काभयो दामा क्यों हंसी मे आग लगाई |
अरेउधर देख तनिक ये गुफा कहाते आई
देख श्याम बलराम सब समझगये |
रुको तनिक मै देखी आऊ पाछे सबकु दिखाऊँगो |
गये अंदर पल मे जबडा फाड मार डारो |
सांझ भई सबने बडन कौबात बताई नदंराय सो |
या तेरो लाल मानव नही देव हे |
स्वरचित_ दमयंती मिश्रा

दिनांक 01/12/19
विधा:छंद मुक्त

विषय:स्वतंत्र लेखन

दरिंदो के इस संसार में
खौफ मे जीता पूरा परिवार ।
जिस दिन बेटी जन्मी
सपने सजे माँ पिता के नयनों मे।
करते पालन पोषण उसका
जैसे परी आई आँगन मे।
बेटा बेटी का भेद न कर
भेजा उसको पढने स्कूल ।
ज्यो ही घर से बाहर निकाली
मन मे डर की शूल चुभी।
ज्यो आने का समय हो घर मे
देखूँ घडी घङी दरवाजे पे।
दरिंदो...
मै भी शिक्षित नारी हूँ ...
देखा मैंने पुरूष प्रधान समाज ।
सीखा अपनी माँ से संयमित रहना
समय पर घर वापस आना
न ज्यादा घूमना साथियों संग
पढना और गढना नया समाज ।

मुझे लगा अगली पीढ़ी ..
समझेगी बेटियों की उडान को।
खूब पढा कर ,समझा अब
अच्छा होगा उसके जीवन मे।
बेटी भी अव्वल आकर
करती मेरा सीना चौड़ा ।
अच्छी नौकरी, अच्छा पति
लगा जीवन लक्ष्य पूरे हो गया।

पर देख, निर्भया,जैसी प्रति दिन
खून पड गया सुन्न तभी.....
लग सिर्फ बेटी को सिखाना,पढाना
से न सुधरेंगा समाज कभी ।
बेटों को भी देनी होगी
समाज मे रहने की सीमाएं।

स्त्री का सम्मान सर्वोपरि
लिखना होगा कानून नया ।
जो ऑख देखे दरिंदगी से
निकाली जाय वह तभी वही।
पुलिस महिकमा सुदृढ़ होवे
तभी मिटेगा खौफ अमानवीय ।
बेटियों की बगिया महकेगा
हवा बहेगी शुद्ध तभी ।

स्वरचित
नीलम श्रीवास्तव

विषय-मन पसंद विषय लेखन
विधा-मुक्तक

दिनांकः 1/11/2019
रविवार

(1)
अब मैं न तो हिन्दू हूँ,और नहीं मैं मुसलमान,
नहीं है मेरा धर्म कोई,मेरा क्या कोई इमान।
अब हमें पेट के लिए नहीं,यहाँ दो जून की रोटी,
हमको अब जो रोटी देता,हमें वही धर्म भगवान ।।

(2)
अब कहने को तो धरती पर,यहाँ हम भी हैं इंसान,
शायद पिछले कर्मों से ,हमीं से रूठे हैं भगवान ।
अब कौन हमारी मदद करें,और सहारा दे हमको,
अब तो कमबख़्त इस भूख का,रोटी ही सभी सामान ।।

स्वरचित एवं स्वप्रमाणित
डॉ एन एल शर्मा जयपुर' निर्भय

दिनांक-०१/१२/१९
स्वतंत्र लेखन

एक सवाल पुछ रही- बेटी

मां बोलो तुमने मुझे क्यों जन्म दिया
रोज खौफ में जीती हूं
हैवानों से डर डर कर रहती हूं
क्योंकी मैं एक बेटी हूं?

प्यार बलिदान की मूरत हो तुम मां
केवल जन्म देती नहीं पलकों
पर बिठाती हो तुम मुझे मां
मेरी बातें बिन बोले समझ जाती हो

मेरी भावना,जरूरतों को भी समझ जाती हो
एक सवाल पुछ रही हूं आज
बेटी को मर्यादा का पाठ पढ़ाते सब
बेटों को क्यों भूल जाते हैं सब मां?

बेदर्दी से रौंदकर लूट ली
फिर आबरू एक बेटी की
देखो इज्जत तार तार कर दी
आज फिर एक बेटी की

कब तक बचती मैं भी मां,
आज उसने मुझे भी डस लिया
चिल्लाई, रोई,गिड़गिड़ाई मैं भी
नोच रहे थे जब सब मेरी आबरू,

सिसक रही थी तड़प रही थी
तेरे आंचल में आने को मां
रहम की भीख मांग रही थी
अपनी इज्जत बचाने को मैं

याद बहुत आई तेरे प्यार
भरे आंचल की मुझको
काश छिपा लेती तु मूंदे बचा
लेती उन दरिंदों से इज्जत मेरी

बहुत कुछ कहना चाह रही थी
चिल्लाकर आंसू बहा रही थी
जलती बेटियों को बचा लो,
एक फरमान तुम भी सुना दो

एक सवाल का ज़बाब बता दो
कब तक जलती रहेगी बेटी?
कब तक सिसकती रहेगी बेटी?
कब तक खौफ में जीती रहेगी?

बस आखिरी यही अब इच्छा है मेरी

नहीं चाहिए वो सम्मान जो
एक दिन का मोहताज हो
दें सको तो दे दो वो मान
जो बेटी के सर का ताज हो

स्वरचित
निक्की शर्मा रश्मि
मुम्बई
1/12/19
विषय-मन पसंद लेखन

विधा-छंद मुक्त

जीवन पल-पल एक परीक्षा
महाविलय की अग्रिम प्रतिक्षा।

अतृप्त सा मन कस्तुरी मृग सा,
भटकता खोजता अलब्ध सा,
तिमिराछन्न परिवेश में मूढ मना सा,
स्वर्णिम विहान की किरण ढूंढता,
छोड घटित अघटित अपेक्षा ।
जीवन पल-पल एक परीक्षा...

महासागर के महा द्वंद्व सा ,
जलता रहता बङवानल सा,
महत्वाकांक्षा की धुंध में घिरता
खुद से ही कभी न्याय न करता
सृजन में भी संहार आकांक्षा ।
जीवन पल-पल एक परीक्षा...

कभी होली भरोसे की जलाता
अगन अबूझ समझ नही पाता
अव्यक्त लौ सा जलता जाता
कभी मन प्रस्फुटित दिवाली मनाता,
खुश हो करता सत्य की उपेक्षा ।
जीवन पल-पल एक परीक्षा....

रातें गहरी, जितना भ्रमित मना
कमतर उजला दिन भी उतना ,
खण्डित आशा अश्रु बन बहती
मानवता विक्षत चित्कार करती,
अपूर्ण अविचल रहती,आकांक्षा
जीवन पल पल एक परीक्षा ....

स्वरचित

कुसुम कोठारी।

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"स्वतंत्र विषय लेखन "08दिसम्बर 2019

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