डॉ ललिता सेंगर





नमन भावों के मोती
03/11/19
रविवार
विषय - स्वैच्छिक
विधा- गीत

वतन के गीत हम सब साथ मिलकर आज गाएँगे,
उसी के वास्ते तन और मन सबकुछ लुटाएंगे।
वतन के गीत .......

इसी के अन्न-जल को प्राप्त कर पोषित हुए हैं हम,
कसम खाते हैं ,अपने देश का न सिर झुकाएंगे।
वतन के गीत .......

यहाँ गंगा की कल-कल धार बहती है दिशाओं में,
उसे करके प्रदूषण- मुक्त हम पावन बनाएँगे।
वतन के गीत .......

न जाति-धर्म की बातों से आपस में लड़ेंगे हम,
सभी को भाईचारे का सबक मिलकर सिखाएंगे।
वतन के गीत .......

हमारी संस्कृति संसार में है सबसे सुन्दरतम,
उसी पर कर अमल हम देश को सुंदर बनाएँगे।
वतन के गीत .......

यहाँ गणतंत्र की रक्षा करेंगे देश के वासी ,
कभी गणतंत्र को गनतंत्र न हरगिज़ बनाएँगे।
वतन के गीत .......

स्वरचित
डॉ ललिता सेंगर

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


विषय - एकता
31/10/19

गुरुवार
छंदमुक्त कविता

आज असम्भव सम्भव होगा
यदि जन-जन का एक रंग होगा
जाति- धर्म का भेद मिटाकर
मंत्र एकता का गूँजेगा
प्रगति-मार्ग पर साथ चलेंगे
हर मुश्किल को साथ सहेंगे
नामुमकिन को मुमकिन करके
हम असीम आकाश छुएंगे
सीमाएँ सब रहें सुरक्षित
ऐसे पहरेदार बनेंगे
शत्रु कभी न घात लगाए
ऐसे सावधान सब होंगे
भ्रष्टाचार का अंत निकट है
अब बन रहा विधान विकट है
जयचंदों पर भी संकट है
उनके जीवन में कंटक है
सूर्य सत्य का अब चमकेगा
न असत्य भू पर धमकेगा
सभी बनेंगे सत् आचारी
कोई न होगा अत्याचारी
जन परहित का काम करेंगे
सुख-दुख में समभाव रखेंगे
जीवन सुखमय हो जाएगा
कहीं न दुख गहरा पाएगा
बच्चे, वृद्ध और बालाएँ
हो उपलब्ध उन्हें सुविधाएँ
हरी-भरी यह प्रकृति रहेगी
नदियों में शुचि धार बहेगी
चारों ओर शान्ति व सुख की
शीतल - सुखद बयार चलेगी
एकसूत्रता से भारत फिर
नित नवीन आयाम गढ़ेगा
विश्व-पटल पर अपने दम से
अनुपम एक मिसाल बनेगा

स्वरचित
डॉ ललिता सेंगर


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
विषय - धन/धनवंतरि/यम/कुबेर
25/10/19

शुक्रवार
दोहे

दीवाली के पर्व पर , यम का होता मान ।
धनतेरस पर दीप का, होता उचित विधान।।

मृत्युलोक के देवता, वाहन महिष विशाल ।
कर में शोभित दण्ड है, नेत्र अग्नि सम लाल।।

दक्षिण के दिक्पाल हैं, करते कर्म विधान।
इनकी दृष्टि से कहीं , छिपे नहीं इंसान ।।

भाई दूज पर यम चलें , बहन यमी के धाम।
देकर शुभ आशीष वे , करते पूर्ण काम ।।

नरकलोक में व्यक्ति का, होता दण्ड- विधान।
इनके ही आदेश से, पाता फल इंसान ।।

स्वरचित
डॉ ललिता सेंगर

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


विषय -पवन /हवा/समीर
24/10/19

गुरुवार
दोहे

पंचभूत में पवन का , होता अधिक महत्त्व।
जिनसे मानव को मिला , भू पर जीवन-तत्त्व।।

आतप से तपकर मनुज, होता अधिक अधीर।
शीतल मंद पवन हरे , उसके तन की पीर।।

पवन - वेग से झूमती , वृक्षों की हर डाल।
रक्तिम-कोंपल गुच्छ छवि,लगे पुष्प की माल।।

प्रातः झोंका पवन का ,मन पुलकित कर जाय।
नवल -भाव सौन्दर्य से , जीवन में रस आय।।

पवन सिखाता है हमें, रखें पुनीत विचार ।
परहित को ही मान लें , जीवन का आधार।।

स्वरचित
डॉ ललिता सेंगर


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


नमन भावों के मोती
विषय - श्रद्धा
21/10/19

सोमवार
दोहे

श्रद्धा से हम सब जपें, उस ईश्वर का नाम।
जिसकी पूजा के बिना , मिलता नहीं मुकाम।।

श्रद्धा, भक्ति, प्रेम और , सत्य, अहिंसा भाव।
सद्गुण से पावन बने , नर का उचित स्वभाव।।

सदा बड़ों के प्रति रखें, हम श्रद्धा का भाव ।
इससे रिश्तों की बढ़े, महिमा और लगाव।।

गुरु के प्रति श्रद्धा जहाँ, वहीं मिले सत् ज्ञान।
उनके आशीर्वाद से , हो जीवन उत्थान।।

स्वरचित
डॉ ललिता सेंगर

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@



विषय - सरस
11/10/19

शुक्रवार
गीत

पहला-पहला प्यार हृदय का
पुण्य कोष बन जाता है,
जीवन के उदास लम्हों को
भी वह सरस बनाता है।
पहला - पहला प्यार हृदय का......

मन उन सुन्दर यादों में
इस कदर मगन होता क्षण में,
गम की किसी चुभन का फिर
अहसास नहीं रह जाता है।
पहला - पहला प्यार हृदय का......

आँखों के आगे वे प्यारे
दृश्य घूमने लगते हैं ,
प्रियतम के संग वादों का
सिलसिला याद आ जाता है।
पहला - पहला प्यार हृदय का......

मधुर चाँदनी रातों में
झिलमिल तारों के गगन तले ,
एक- दूजे के लिए गुनगुनाने
का पल याद आता है।
पहला - पहला प्यार हृदय का......

नहीं भुलाया जा सकता वह
प्रथम- प्रणय का अद्भुत क्षण,
जो जीवन को सदा प्रेम की
सरस राह दिखलाता है।
पहला - पहला प्यार हृदय का......

स्वरचित
डॉ ललिता सेंगर
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

08/09/19
रविवार
विषय- हादसे
कविता

कितनी कोशिश कर रही सरकार है ,
पर न रुकती हादसों की मार है।

बन रहे कानून यातायात के ,
पर न थमती सड़क पर रफ्तार है।

न स्वयं के स्वास्थ्य की चिंता कोई,
न किसी की जिंदगी से प्यार है।

धैर्य से चलता नहीं वाहन कोई,
सड़क पर अब व्याप्त अनाचार है।

कितने प्राणों की बलि चढ़ती मगर ,
नशे का न रुक रहा व्यापार है।

हादसे तब तक न कम हो पाएंगे,
जब तलक जनता में भ्रष्टाचार है।

स्वरचित
डॉ ललिता सेंगर
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

07/10/19
सोमवार
विषय- शान्ति
कविता

अमन, चैन और शान्ति शब्द अब तो बेगाने लगते हैं,
वर्तमान भारत में अब तो अलग तराने बजते हैं।

ऋषियों-मुनियों की धरती पर भीषण विप्लव आया है,
हर भारतवासी के मन में भ्रष्टाचार समाया है।

अपने गौरवमय अतीत को लगता है सब भूल गये,
वैभव की दुनिया को पाकर अहंकार में फूल गये ।

उनके शब्दकोश में अब न अमन -चैन की बातें हैं,
एक- दूजे पर षडयंत्रों की आज लग रही घातें हैं।

रिश्ते-नातों की कडियाँ सब एक-एक कर टूट रहीं,
मानव-मूल्यों की गरिमामय बातें पीछे छूट रही।

बच्चे, वृद्ध और महिलाएं नहीं सुरक्षित लगते हैं ,
उनके शोषण के किस्से प्रतिदिन मन विचलित करते हैं।

कब तक दानवता सबके मन को पीड़ा पहुँचाएगी,
कभी तो मानवता लोगों के हृदयों को पिघलाएगी।

समय जागने का है बस अब हम सब मिल संकल्प करें,
भारत -भू पर दानवता का हम अंतिम संस्कार करें।

तभी शान्ति-दूत भारत फिर उसी रूप में आएगा ,
फिर अपनी पावन वसुधा पर अमन -चैन छा जाएगा।

स्वरचित
डॉ ललिता सेंगर

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
विषय - स्पर्श
04/10/19

शुक्रवार
कविता

माँ तुम्हारा साथ जो मिल जाएगा,
स्वप्न मेरा सत्य ही हो जाएगा।
चाँद- तारे कुछ नहीं मेरे लिए,
यह जहां मुट्ठी में मेरी आएगा ।

चाँद को छू लूंगी मैं खुद हाथ से ,
मेरा जीवन-लक्ष्य ही मिल जाएगा।
तेरे हाथों के मथुर स्पर्श से
मुझको कोई कष्ट न हो पाएगा।

तेरी ममता का मिला संबल मुझे,
जिसके बल पर रास्ता कट जाएगा।
तूने ही मुझको दिखाया रास्ता ,
साथ तेरे हौसला बढ़ जाएगा।

लक्ष्य पा लूँगी मैं जीवन मार्ग का,
मन-सुमन आनंद से खिल जाएगा।
विघ्न -बाधा मुझको रोकेगी नहीं ,
तेरा आशीर्वाद जो मिल जाएगा।

स्वरचित
डॉ ललिता सेंगर


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
30/09/19
सोमवार

विषय - माँ
दोहे

कनक कलेवर पर सजे , लहंगा- चुनरी लाल ।
लाल तिलक से शोभता ,माँ का गर्वित भाल।।

घर- घर में है सज रहा , माता का दरबार।
श्रद्धा से करते सभी , माँ की जय-जयकार।।

माता के दरबार में , होता मंत्रोच्चार।
उसकी पूजा से मिले , सबको शांति अपार।।

सभी भक्त नवरात्र पर , भजते माँ का नाम।
अम्बे माता प्रेम से , करती पूरे काम।।

शक्ति, ज्ञान औ प्रेम की ,तू अतुलित भंडार।
माँ दुर्गे ! हम सब करें,तेरी जय-जयकार।।

रमा ,सरस्वति ,कालिका , की अद्भुत अवतार।
तेरे चरणों में मिले , जीवन-सुख का सार।।

धन, पौरुष, बल, ज्ञान की, माँ ! तू है आगार ।
तेरी महिमा का नहीं , कोई पारावार ।।

दुर्गा माँ ! शक्ति तेरी , सचमुच अपरंपार ।
तेरी करुणा कर रही , कष्टों का निस्तार।।

तुम महिषासुर-मर्दिनी , करती जग का त्राण।
तेरे चरणों में निहित , भक्तों का कल्याण।।

जगजननी,जगदम्बिका,जग की शान्ति-निधान।
सबको सुख-समृद्धि का , दो माता वरदान ।।

स्वरचित
डॉ ललिता सेंगर


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
27/09/19
शुक्रवार
विषय - विवेक
कविता

मानव ने विवेक खोकर यह कैसा कुत्सित मार्ग चुना,
मन की बेचैनी का कितना यह दूषित प्रतिकार गुना।

नशाखोर बनकर उसने जीवन अपना अभिशप्त किया ,
तन -मन-धन तीनों कोषों का वैभव समझो नष्ट हुआ।

इस शराबखोरी ने उसके जीवन का रस चूस लिया ,
मात्र हड्डियों का ढाँचा बन मृत्यु का दर ढूँढ लिया ।

उसको क्या मालूम कि उसपर कितनी जिम्मेदारी थी,
माँ की आस , पिता के सपने ,पत्नी की खुशहाली थी।

अब उसके अभाव में कैसे वे जीवित रह पाएँगे ,
गहन वेदना से आहत हो जीते जी मर जाएँगे ।

सच है नशा किसी व्यक्ति के हित में कार्य नहीं करता,
इस गंभीर समस्या का कोई प्रतिकार नहीं करता ।

स्वरचित
डॉ ललिता सेंगर

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

24/09/19
मंगलवार
विषय - बनारस
विधा- कुण्डलियां छंद

पावन गंगा-तीर पर , बसा बनारस धाम।
जयकारे शिव-शम्भु के, गूँजें आठों याम।।
गूँजें आठो याम , वहीं संकटमोचन हैं।
जिनकी महिमा देख , ठहर जाते लोचन हैं।।
स्वर्ग-प्राप्ति का नगर,लगे सबको मन भावन।
धुलते सबके पाप , भाव जगते हैं पावन।।

शिक्षा व आध्यात्म का , है यह पावन धाम।
इसीलिए है विश्व में , इसका ऊँचा नाम।।
इसका ऊँचा नाम , शिष्य सब पढ़ने आते।
बनकर वे सब योग्य, देश का मान बढ़ाते।।
लेते साधू- संत , यहाँ आध्यात्म- परीक्षा।
इसीलिए है उच्च , बनारस में हर शिक्षा।।

स्वरचित
डॉ ललिता सेंगर

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
विषय - शहनाई
12/09/19

गुरुवार
रोला छंद

जगमग पूरा भवन , सजा कोना- कोना है।
आज तो बेटी का , शुभ गठबंधन होना है।।
शहनाई की गूँज , बनाती मंगल - बेला ।
लगा हुआ है खूब , अतिथियों का तो रेला।।
शोभित बंदनवार , विवाह मण्डप में सुन्दर।
गाएँ मंगल गीत , सभी सखियाँ हिलमिल कर।।
छाया है उत्साह , सभी परिजन पुलकित हैं।
देने को आशीष , हृदय सबके हर्षित हैं।।
ले बाजा बारात , सुमुख वर द्वार पधारे।
कर मस्तक पर तिलक, मात ने पैसे वारे ।।
कर सोलह श्रृंगार, वधू आयी मण्डप में ।
लेकर फेरे सात , बंधी वह गठबंधन में।।
भर आँखों में अश्रु , चढ़ी डोली में बेटी ।
वार -फेर के लिए , ससुर ने खोली पेटी।।
मात -पिता का हृदय, हो रहा कितना भारी।
घर - आँगन से दूर , हो रही बिटिया प्यारी।।

स्वरचित
डॉ ललिता सेंगर


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

No comments:

"स्वतंत्र विषय लेखन "08दिसम्बर 2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें   ब्लॉग संख्या :-589 अभी सक्रिय है ...