लज्जाराम राघव तरुण







नमन "भावों के मोती"
विषय:- "स्वतन्त्र लेखन, दृश्य श्रव्य गीत प्रस्तुति"
दिनांक :- 03/11/2019.
विधा :- "गीत"

संयम सेवा न्याय नीति पर, अपनी आंख जमालो प्यारे।
कामुकता में फंस अपना मत, नाहक तेज गंवाओ प्यारे।
हिंसा की मजबूत तरंगें, तेज न उनका सह पाओगे।
गर मकसद से दूर रहे तो, मीत सफलता क्या पाओगे।

साहस दूर भाग जाएगा, तिल तिल कर मर जाओगे तुम।
शाख़ से सूखी पत्ती झरती, वैसे ही झर जाओगे तुम।
युक्त न यदि तुम हुए गुणों से, जीवन सार गवां बैठोगे।
अवसर द्वारे से लौटा तो, इक त्यौहार गवां बैठोगे।

ईर्ष्या स्वार्थ द्वेष तजो अब, सबको आंख दिखाना छोड़ो। मन की कुंठित इच्छाओं पर हरपल-छिन भरमाना छोड़ो।
लहरों पर सागर की तुमको, पाँव जमा कर चलना होगा।
देश फंसा है बीच भंवर में, पार तुम्हीं को करना होगा।

सोच समझ पग धरो अगाड़ी, मग में कांटे बिछे बहुत हैं।
रहजन, चोर, लुटेरे, डाकू, छद्म वेष में छिपे बहुत हैं।
उठो जवानों! भारत मां की, बेड़ी की जंजीरें खोलो।
कर दो मुक्त दुराचारों से, भारत माता की जय बोलो।
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विषय :- "समाधान/ हल"
दिनांक :- 16/10/2019.
विधा :- "मुक्त छन्द"

घिर गया हूं व्याधि में, मैं जगत की।
आश का सूरज कहीं दिखता नहीं।
पात-सम रहे काँपते मेरे कदम,
आलोड़ित स्थिर जमीँ।
काम की कुछ, लोभ की, कुछ मोह की।
जंजीरें पड़ी राह रोके हर घड़ी।
दीवार से आदमीयत,
वो खड़ी है कोसों दूर।
दिख रही बीमार सी यहाँ,
खड़ी खलकत सभी।
कुछ तो हल होगा विपति का,
आन जो सम्मुख खड़ी।
समाधान कर दो समय पर,
निस्तार गर चाहो।
गर मानवता, सद्भाव का विस्तार चाहो।

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विषय :- "स्वतंत्र लेखन"
दिनांक :- 8/9/19.
विधा :- "गीत"

तज निराशा उड़ दुबारा हौसलों के पंख पाकर।....

तेरी मेहनत को नमन, साधना तेरी लगन में।
रात-दिन कर एक तूने, जोश भर अपने बदन में।
ये करिश्मा देख तेरा, हौसला जागा वतन में।

नींव जो तुमने रखी है, वो रहेगी रंग लाकर।....
तज निराशा उड़ दुबारा हौसलों के पंख पाकर।....

व्योम सारा पार कर के, चाँद के सिर पर चढा है।
अब तलक जो स्वप्न था इतिहास वो तूने गढा है।
देश को आगे बढ़ाने, कदम जो तेरा बढ़ा है।

देश तेरा साथ सारा, झूमे सब तुझ संग पाकर।...
तज निराशा उड़ दुबारा,हौसलोंके पंख पाकर।....

विजयगाथा लिखी तूने,साथले सब संगसाथी।
काम ये आसाँ नहीं था,मापने का चाँद थाती।
सफल होना था तुझे ये, कोशिशें तेरी बताती।

स्वप्न पूरे सभी होंगे, भारती का अंक पाकर।.....
तज निराशाउड़ दुबारा,हौसलोंके पंखपाकर।.....

कौनसी चिंता तुझे जब,अडिग यौद्धा साथ तेरे।
विजय चूमेगी चरण तव,लिखा सीवन माथतेरे।
रात काली ढले तब ही, उदित होते हैं सवेरे।

सामने मंजिलखडी है,कर फतहपथ संगजाकर।
तज निराशा उड़ दुबारा,हौसलों के पंख पाकर।...

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नमन "भावों के मोती"
विषय:- "स्वतन्त्र लेखन, दृश्य श्रव्य गीत प्रस्तुति"
दिनांक :- 03/11/2019.
विधा :- "गीत"

संयम सेवा न्याय नीति पर, अपनी आंख जमालो प्यारे।
कामुकता में फंस अपना मत, नाहक तेज गंवाओ प्यारे।
हिंसा की मजबूत तरंगें, तेज न उनका सह पाओगे।
गर मकसद से दूर रहे तो, मीत सफलता क्या पाओगे।

साहस दूर भाग जाएगा, तिल तिल कर मर जाओगे तुम।
शाख़ से सूखी पत्ती झरती, वैसे ही झर जाओगे तुम।
युक्त न यदि तुम हुए गुणों से, जीवन सार गवां बैठोगे।
अवसर द्वारे से लौटा तो, इक त्यौहार गवां बैठोगे।

ईर्ष्या स्वार्थ द्वेष तजो अब, सबको आंख दिखाना छोड़ो। मन की कुंठित इच्छाओं पर हरपल-छिन भरमाना छोड़ो।
लहरों पर सागर की तुमको, पाँव जमा कर चलना होगा।
देश फंसा है बीच भंवर में, पार तुम्हीं को करना होगा।

सोच समझ पग धरो अगाड़ी, मग में कांटे बिछे बहुत हैं।
रहजन, चोर, लुटेरे, डाकू, छद्म वेष में छिपे बहुत हैं।
उठो जवानों! भारत मां की, बेड़ी की जंजीरें खोलो।
कर दो मुक्त दुराचारों से, भारत माता की जय बोलो।
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विषय " प्रतिभा"
दिनांक " 1/10/19.

विधा "दोहा"

1.
कौशल कैसे देखता, उज्जवल नवल बसंत।
आरक्षण जब कर गया, प्रतिभा का अन्त।
2.
प्रतिभा उन्नति की धुरी, जानै सकल ज़हान।
प्रतिभा जहाँ विनष्ट तो,समझो जन-गण हानि।
3.
जिसको ईश्वर ने दिया, प्रतिभा का वरदान।
जन-जन का प्यारा रहे, पाता है सम्मान।
4.
प्रतिभा की चाबी लगा, खोलो उन्नति द्वार।
सुगम करै सब जटिलता, हो जग का उद्धार।
5.
आरक्षण हावी हुआ, प्रतिभा है लाचार।
वोट-बैंक की नीतियाँ, कर गीं बंटाधार।

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विषय :- "स्वतन्त्र सृजन"
दिनांक :- 22/9/19.

विधा :- "गज़ल"

जहर सा घुलने लगा है,आज के वातावरण में।
रक्त की दुर्गंध दुर्गंध फिर,आने लगी पर्यावरण में।

द्वेष-तम अब चौगुनी, रफ्तार से बढ़ने लगा है,
रोक दे सामर्थ्य ये दिखती नहीं सूरज किरण में।

अब न रावण तनिक दोषी राम का मिथ्या भ्रम ये।
मुख्य-प्रभारी हुआ जब, लक्ष्मण सीता हरण में।

चील कौओं की व्यवस्था से न कुछ उम्मीद रखना,
दोष निकलेंगे हजारों, हंस ही के आचरण में।

आज कह दो द्रोपदी से,चीर की ना रट लगाए,
कृष्ण ही नंगा खड़ा नव-सभ्यता के आवरण में।

सदाचारी आचरण औ', धर्म मरणासन्न हैं अब,
स्वार्थ और अन्याय फलते जिंदगी के हर चरण में।

देह की बोली लगा दे भूख रोटी के लिए जब,
रह गया क्या फर्क ऐसी जिंदगी में औ' मरण में।

ऐ-"तरुण" उम्मीद न रख, वो व्यथा तेरी सुनेगा,
अब मसीहा व्यस्तदिखता स्वयं के पोषणभरण में।


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विषय :-"हाट /दुकान, आदि"
दिनांक :- 21/9/19.

विधा :- "दोहा"

1.
हाट लगीं बाजार में, सब कुछ मिलता मीत।
खोज खोज कर मैं थका, मिली न सच्ची प्रीत।
2.
लगी दिखी बाज़ार में, अद्भुत एक दुकान।
मनमोहक पैकिट सजा, बेच रहे ईमान।
3.
विविध वस्तुओं से सजा, दिखता था बाज़ार।
हाट-हाट ढूंढत फ़िरा, मिले नहीं संस्कार।
4.
रहा शराफ़त का यहाँ, सबसे हलका तोल।
बिकी आज बाज़ार में, दो कौड़ी के मोल।
5.
सीख अगर नीकी लगे, तो मानो श्रीमान।
सब कुछ बिके बज़ार में, पर राखो ईमान।
6.
सत्ता के बाज़ार में, हावी हुए दलाल।
निर्धन जन पिसते रहे, पूछे कौन सवाल।

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विषय :- "संगत / सत्संग"
दिनांक :- 20/9/19.

विधा :- "दोहा"
1.
संगत सहज न सत्य की, गर मन में लो ठान।
अन्तर उजियारा करे, हो आत्म - उत्थान।
2.
मन यदि रमा कुसंग में, क्षणिक मिले आराम।
लोभ, मोह, मद घेरते, जीवन हो निष्काम।
3.
संगत हो पहचान जो, कभी न धोखा होय।
आदर मिले समाज में, बांह न पकड़े कोय।
4.
संग न दुर्जन का भला, लाँछन मिले अनेक।
नेक अकेला भी रहे, पशुपति राखै टेक।
5.
निपट अकेला ही भला, पर मत बैठ कुसंग।
जन्म - जन्म उतरै नहीं, बदनामी को रंग।


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दिनांक :- 17/9/19.

फिर कहीं धुआँ उठा इस शहर में।
हर गली कूचा जला इस शहर में।

हर किसी को छल गई सियासत यहां,
स्वार्थ के परचम उठा इस शहर में।

गिरगिटी अंदाज़ जबसे हो गए हैं,
अब हुक्मराँ आने लगे इस शहर में।

लो आदमीयत अब यहां बेवा हुई,
मर गया उसका सजन इस शहर में।

मात जिनसे खा गया शैतान भी,
वो ही मसीहा बन गए इस शहर में।

होने को तो हर मकाँ आबाद है,
बस आदमी ही मिट गया शहर में।

तीरगी में हर मकाँ डूबा 'तरुण',
अब उजाला मर गया इस शहर में।

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नमन, "भावों के मोती"
विषय :- "पहला खत"
दिनांक :- 11/9/19.


प्रथम पाती लिखूं कैसे, चांद मेरा खो गया है।....
रात की, रानी खिली है,
प्रीत के हैं, गीत गाती।
भ्रमरों ने, राग छेड़ा,
पवन है, खुशबू लुटाती।
दिल हुआ अवसाद का घर,
अब नहीं, दुनिया सुहाती।
विरहिणी का रुदन जागा,
वेदना तन को जलाती।
हवाएं खामोश हैं अब,
छुप गए हैं, लो सितारे।
दिशाएं हैं, मूक सारी,
शिखर पर है, रवि चढ़ा रे।
राह तकते, दिवस बीता,
कन्त की ना, खबर पायी।
दिन ढ़ला, रवि भी गया घर,
घोर काली, रात छायी।
प्रीत के सब बंधनों को लांघ बागी हो गया है।...
प्रथम पाती लिखूं कैसे चांद मेरा खो गया है।
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दिनांक :- 10/9/19.
विषय :- "चैन की बंशी"

वृंदावन बंशी बजी, मोहे तीनों लोक।
वे कुण से मोहे नहीं, रहे कौन से लोक।
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"छंद-मुक्त रचना"
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भये 'चैन की बंशी' सुनकर,
नयन राधिका के रतनारे।
विह्वल व्है सुन बंशी की धुन,
लोक-लाज तज छाड़ि चौबारे।
सुधि-बुधि सब बिसराई तन की,
सखियन के, पीछे चले लारे।
लख ये रूप, श्याम बंशी में,
'सुर' भर राधा नाम पुकारे।
छलिया छुप कै कुंजगलिन में,
छेडै़ राग रागिनी न्यारे।
राधा ढूंढत फिरै बावरी,
दर्शन नाय दे श्याम सुकारे।
ढूंढत-ढूंढत हार थकी फिर,
बैठ रही वृषभानु दुलारी।
प्रेम अटूट रह्यौ मोहन सौं,
धर धीरज बैठी सुकुमारी।
कहा खोट भयौ मोसौं प्रीतम,
अब तो दै दर्शन त्रिपुरारी।
प्रेम-पाश में बंध राघा के,
दौड़े आये कृष्ण मुरारी।
ऐसो ही नेह करौ मोहन सौं,
तब, मनशुद्धी होय तुम्हारी।
'चैन की बंशी' सुन पाएंगे,

आत्म-शुद्धि गर होय हमारी।
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"स्वतंत्र विषय लेखन "08दिसम्बर 2019

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