इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय






लेखक परिचय
1)नाम.शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय 2)जन्म तिथिःः16/6/1952 वास्तविक 3)जन्म स्थान ःःमगराना,गुना म.प्र. 4)शिक्षा ःबी.एससी. डी.सी.ए. 5)सृजन विधाऐंःःकविता,मुक्तक ( सभी लेकिन पारंगत नहीं) 6)प्रकाशित कृतियां ःःविचाराधीन 7)कोई भी सम्मान ःःशी.सा.प.एवं साहित्यदीप ग्रुप द्वारा वैसे अनेक कुछ संस्थाओं ने भी सम्मानित किया। 7)संप्रति, व्यवसाय ःःसेवानिवृत इंजी. 8)पता ःसिद्धिविनायक सदन लूसन बगीचा कैंट रोड गुना म.प्र.473001 9)मो.नं.ःःः9425762471 इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय मगराना गुना म.प्र.
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बिषयः#मर्यादा/राम नवमी #
विधाःःःकाव्यःःः


आपश्री हैं मर्यादा पुरूषोत्तम 
जय आदर्श पुरूष हे श्रीराम।
अवतरित हुए चैत्र नवमी को,
सरयूतट पवित्र अयोध्या धाम।

जय जय मर्यादा पुरूषोत्तम।
जय जय सीतापति श्रीराम।
मर्यादा कभी ना तोडी तुमने,
जय जय जय प्रभु राजाराम।

धीर वीर गंभीर रहे रघुनंदन।
आप श्री के चरणों में वंदन।
आज पुनीत वेला नवमी की,
जय जय जय श्री रघुचंन्दन।

जय रघुपति राघव राजाराम।
जय रघुवंशमणि जयरघुराम।
एकबार दर्शन दें पुरूषोत्तम,
हे रघुकुलदीपक श्रीसुखराम।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
1भा.9/3/2019(शनिवार)
बिषयःःधन/ दौलत /पैसा ः
विधाःःःकाव्यःः
माँ लक्ष्मी तुम नारायण की
कमलारानी धनलक्ष्मी तुम।
मात शारदे नमन करूं मै,
बुद्धिदेवी माँ सर्वश्रेष्ठ तुम।


रिद्धि सिद्धि पीछे हो जाऐं।
ज्ञानवृद्धि सबकुछ हो जाऐ।
यदि बुद्धिदात्री आप पधारें,
चहुंओर सुखशांति हो जाऐ।

धन दौलत मुझे नहीं चाहिए।
पैसा प्रशंसा भी नहीं चाहिए।
बस मात शारदे की हो सुदृष्टि,
जीवन भर कुछ नहीं चाहिए।

ये धन दौलत आनी जानी है।
लक्ष्मी नारायण की पटरानी है।
सुखद शांति मनचैन मिले तो,
अपने घर की यह महारानी है।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी

9/3/2019(शनिवार
1भा .धन/ दौलत/ पैसा
काव्यः ःः
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6,भा8/3/2019( शुक्रवार)नारी/वीरांगना
विधाःःःकाव्यः ःः
भोग्या नहीं पगले
मै आराध्या हूँ।
सौम्या नहीं मै,
बिष की पुडिया हूँ।
कभी छूने की भूल नहीं करना
मै रणचंडी महाकाली हूँ
सचमुच दुर्गा बलशाली हूँ।
लक्ष्मी समाई मुझमें
मै वीर शिवा की जीजाबाई
राणा प्रताप मेरी कोख से जन्मे
मै अनुसुइया अहिल्या नारी
सभी देव मैने गोद खिलाऐ
अपने आंचल क्या
पालने सुलाऐ।
किसे चाहिए परीक्षा मेरी
जब चाहे मुझे अंतर्मन में देखे
मै वीरांगना ,समता ममता की मूरत
मैने सब झंझावात झेले
लेकिन कभी पग नहीं पीछे हटाऐ
ऐवरेस्ट चढा दौढकर मैने
सभी जगह हर क्षेत्र में
अपनी प्रगति के झंडे गाडे।

स्वरचित ःःइं.शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.


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5भा.8/3/2019(शुक्रवार )बिषयःःनारी/ वीरांगनाः
काव्यः ःःछंदमुक्त ः
सृष्टि सृजन तुम्हारा
शुभाशीष मिलता हमें माता का
तुम्हें नित वंदन है हमारा।
माँ, बहन,पत्नी बेटी ।
नारी जननी
सास बहू स्वयं में ही समेटी।
तू अबला सबला।
लक्ष्मी स्वरूपा
तू ही कहलाती है कमला।
नारी से ही नर बना।
ये जगत कहां
तुम बिन सुहावना।
नारी प्रीति रीति।
हर घर की होती है
इससे सुयश और कीर्ति।
आशा प्रत्याशा हमारी संस्कृति
परंम्पराओं की नारी है मूर्ति।
बनिता विश्व तुझसे
नहीं है नारी सुरक्षित हमसे।
सबकी सुनती सहनशील महिला
दुखसुख सहती रहती
फिर भी नहीं गिला।
रूखा सूखा खाना
जैसा भी मिल जाऐ
अपना जीवन जीना।
सचमुच नारी त्याग तपस्या
फिर भी भ्रूण हत्या जैसी
बडती जा रही विकराल समस्या।
स्वरचितः ः
इंजी.शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय

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विधाःःक्षणिकाःःः
तू अस्मिता पूज्या
सृजनशील कर्मशील
तपस्विनी योगिनी
फिर क्यों भोग्या
रामकृष्ण जाया
वीरांगना नारी महारानी
सबला क्यों बनती अबला।
स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.


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2भा 8/3/2019(शुक्रवार)नारी/वीरांगना ः
काव्यः ःः
नारी घर संसार नारी प्यार।
नारी ममता है नारी दुलार।
बिन बनिता घर लगता सूना,
नारी से ही यह सब संसार।
नारी से ही नर नारायण है।
नारी से ही जग पारायण है।
नारी बिन सब यहां अधूरा,
नारी से ही यह रामायण है।
उमा रमा कमला बृह्माणी,
नहीं अबला नारी सबला है।
वीरांगना थी रानी लक्ष्मीबाई,
महिला बिगडी बडी बला है।
नारी संस्कृति संस्कार है नारी ।
नारी बहन अपनी बेटी है नारी।
नारी जननी सत्य प्रीति है नारी।
नारी दुर्गा ये महाकाली है नारी।
स्वरचितः ः
इंजी.शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.


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1भा. 8/3/2019(शुक्रवार )बिषयःनारी/वीरांगना ःः
विधाःःःकाव्यःःः
जय मातृशक्ति माँ तेरावंदन।
निशदिन करें मात का वंदन।
माँ जगजननी में सृष्टि समाई,
उमा रमा बृह्माणी अभिनंदन
जन्मे तूने राम कृष्ण रघुनंदन।
तेरी चरणधूल माथे का चंदन।
प्रतिदिन ही शुभाशीष मिले माँ,
कभी ना हो कहीं कोई क्रंदन।
ये नारी ही सबकी जीवन दाता।
नारी जगत की भाग्य विधाता।
यहां हर नारी सचमुच महारानी है,
क्या नारी नहीं सदा सुख प्रदाता।
माँ तुझसे ही तो ये जीवन मेरा।
तुझसे माँ हो नित सुखद सबेरा।
यह रोम रोम माता का ऋणी है,
है माता से ये सुखशांति घनेरा।
स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी
1भा##नारी/वीरांगना##

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2भा.7/3/219(गुरुवार)बिषयःःमूक /मौन
विधाःःःकाव्यः
मौन रहकर भी बहुत कुछ,
कह जाते हैं नयन तुम्हारे।
प्राणी भाव भंगिमाओं से ,
करें पेश जैसे वचन हमारे।
कुछ लोग कहते हैं यहां तक
मूर्ख के लिए मौन अच्छा है।
सयाने मानते इस जमाने में,
सुसंगति साथ मौन बच्चा है।
निशब्द रहना कोई बात नहीं।
क्या वाणी मधुर सौगात नहीं।
पशुओं को मूक कहते हैं मगर,
क्या सच इनके जज्बात नहीं।
गर मैत्री करुणा भाव आ जाऐं।
मन में सुमधुरता भाव आ जाऐं।
मृदुता वाणी में मिश्री घुली हो,
मूक स्वमेव सुखद भाव पा जाऐं।
स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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1भा.7/3/2019( गुरूवार)बिषयःःमूक/मौन
काव्यः ःः
मौनव्रत रख सकूं प्रभुजी,
मुझे इतना संबल देना।
रख पाऊं शब्दों की मर्यादा,
इतना गुरूवर बल देना।
धीर वीर गंभीर बनूं मैं,
सदा निश्छल भाव रखूं।
वाद विवाद नहीं करूं किसी से,
सदैव स्वस्थ संवाद रखूं।
मूक रहूं सुन आलोचना,
आवश्यक वही बात करूं।
मन निर्मल हो जाऐ मेरा,
जीवनभर नहीं घात करूं।
मौन रहूं अधिकांश यदि मैं,
विवाद कहीं ना हो पाऐं।
शांत चित्त रह पाऊं गर तो,
नहीं झगडे झंझट हो पाऐं।
स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय


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3भा6/5/2019( बुधवार)बिषयः#राहत#
विधाःःःकाव्यः ः
कैसी विडंबना यह मेरे देश की,
जो राहत सबको पहुंचाता।
उसी राम को राहत नहीं मिलती,
जो हम सबके मन भाता।
रामलला बैठे कबसे तंम्बू में,
क्यों राहत नहीं मिली अभीतक।
राजनीति सदा होती रहती है,
भगवान फंसे हुऐ हैं अभीतक।
श्रीराम अपना जलवा दिखलाऐं,
तभी शायद मिल पाएगी राहत।
हम सभीजन व्याकुल रहते हैं,
क्या कभी पूरी हो पाऐगी चाहत।
शंकरजी अब त्रिनेत्र खोल दें।
इन नेताओं की पोल खोल दें।
मिले नहीं इनको कहीं राहत,
जय जय जय श्री राम बोल दें।
कशम आज हम सब मिल खाऐं।
श्रीराम मंन्दिर सभी मिल बनाऐं।
सचमुच राहत हमें तभी मिलेगी,
अयोध्या में जब श्री रामजी आऐं।
स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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2भा.6/3/2019(बुधवार )बिषयःःराहतःःः
विधाःःःकाव्यः
कौन कहां कैसे रहता है
नहीं किसी की कोई चिंता।
राहत कहां कैसे पहुंचाऐं,
सबसे बडी हो अपनी चिंता।
रोजगार मिल जाऐ हाथों में,
पालनपोषण हो जाऐ निश्चित।
राहत मिले हम सबको जब,
जीवन ना कहीं बने निरर्थक।
राहत अपनों से नहीं मिलती
समस्या सबसे बडे विपक्षी।
सेना को ही ये शर्मिंदा करते,
ज्यों यहां पाकिस्तानी पक्षी।
कुछ गद्धार देश में पलते हैं,
खाते पीते भारत का सारे।
राहत इन्हें राष्ट्र से मिलती है,
फिर भी रोते गाते हैं बेचारे।
बंद करें इन्हें राहत पहुंचाना।
बंद करें हम सब पानी दाना।
जयचंदों को ढूंढ कर मारें हम,
बंद करें मीरजाफर का खाना।
स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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1भा6/3/2019(बुधवार)बिषयः#राहतः#
विधाःःःकाव्यःःः
श्रीगणेश राहत दें दुष्टों से,
यहां सभीजन सुखद रहें।
हो उदरपूर्ति हर जीव की,
सब रामराज्य से बसत रहें।
ज्ञानवान सभी बन जाऐं,
संस्कार संयम से पूरित।
धीर वीर गंभीर बनें सब,
नहीं दिखें कोई अश्रुपूरित।
राहत सब तुम कर देते हो।
सबके ही दुख हर लेते हो।
हे सिद्धिविनायक बुद्धिदाता,
तुम सबको शुभ वर देते हो।
दुष्टविनाशक जनसुखदायक,
हे मंगलमूर्ति हमें चाहत देना।
तुम पाप विनाशक मंगलकारक
श्री लंम्बोदर हमें राहत देना।
स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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2 भा5/3/2019( मंगलवार)बिषयःःनींद विधाःःःःःकाव्यःः
1)
नींद कहीं खोई मेरी
दिवास्वप्न देखता
मै प्रधान बन गया
समझें उत्तीर्ण हो गया।
नींद जनता की उडाऊं
पांच साल मौज कराऊं
अपने परिवार चमचों के लिए
नींद की दवाई पिलाऊं
जनता जनार्दन के लिए।
2)
नींद उडाना मेरा काम
चैन की नींद सोऊं मै।
देश के दुश्मनों को गले लगाऊं
सेना का सम्मान घटाऊं मै।
चीथड़े जिनके उडे
उनसे मुझे मतलब नहीं
विपक्ष में हूं अभी
नींद उडाना जारी है
चैन से सोऊंगा मगर
किसी को सोने नहीं दूंगा।
पांच बर्ष तक लगातार
धरने यहीं दूंगा।
ना खाऊंगा पता नहीं
पर खाने वालों की नींद उडा
सुख से रहने नहीं दूंगा।
स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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1भा5/3/2019( मंगलवार)बिषयःःनींदःः
विधाःःःकाव्यःः
उडी नींद आंखों की भगवन,
जब से बेलगाम हुए आतंकी।
क्यों कांटों सी चुभती लगती
जब यहां वहे वयार बासंती।
तुझने दिया है हमें सभी कुछ,
नहीं किसी की कमी यहां पर।
असीम कृपा है त्रिपुरारी लेकिन
ये मानवता की कमी यहां पर।
सब कुछ मिला है फिर क्यों,
सुख की नींद नहीं आती है।
लुप्तप्राय सब संस्कारों हमारे,
संस्कृति शायद कहीं रोती है।
स्वरचितः ःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी

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1भा।4/3/2029(सोमवार)बिषयःशिव/ शिवरात्रि/ सृष्टिविधाःःः काव्यः ः
जय भंडारी डमरुधारी
हम प्रभु शरण तिहारी।
कणकण में बसते तुम,
शिव लेलें सुधि हमारी।
भस्मी तुमको रोज लगाऐं
हम भांग धतूरे तुम्हें चढाऐं।
भोले तुम सचमुच ही भोले,
बेलपत्र कुछ कुसुम चढाऐं।
उमापति गौरी शिवशंकर।
तुम ज्ञानेश्वर हो परमेश्वर।
गंगा तुमरी जटा बिराजी,
जय जय जय हे सोमेश्वर।
स्वरचितः ः
इंजी शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी

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1भा. 2/3/2019( शनिवार)बिषयःसरहदःः
विधाःःःकाव्यः
जय जय जय बजरंगबली,
रक्षा तुम्हें सरहद की करना।
डटे हुऐ सीमाओं पै सैनिक,
उनपर वरदहस्त ही रखना।
जो नहीं देखते कोई मौसम,
सदैव खडे रहें सीमाओं पर।
गर्मी सर्दी बर्षा झेलें हरदम,
सजग रहें अपनी सरहद पर।
बलशाली बजरंगबली तुम,
सचमुच महावीर बलवान हो।
सदा चिरंजीवी रहें जवान ये,
इन्हें अमर सुखद वरदान दो।
है सुरक्षित सैनिक के हाथों,
यह भारत और भारतवासी।
वीर जवानों की शहादत पर,
अभिमान करें सब रहवासी।
अजर अमर तुम वीर सपूतो,
स्वर्ण इतिहास में नाम रहेगा।
युगों युगों तक सरहद पर वीरो,
ये सबका अंकित काम रहेगा।
स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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2भा13/2019( शुक्रवार)
बिषयःपवन /समीर
विधाःःःगीतःःःः
मस्त पवन पुरवैया प्यारी
चलै खूब जा सबसै न्यारी
आऐ बसंत घर सबई के,
सुरभित समीर बहे भुनसारी।
मस्त पवन पुरवैया प्यारी..........
आजा तू अब कृष्ण कन्हैया
अच्छौ लगथै मुरली बजैया
पनघट बैठ मथनिया फोरै
रोवत हैं सब गोपी न्यारी।
वहे मस्त पवन पुरवैया प्यारी.......
लच्छन तेरे बहुत बिगर गये
जैसे तेरे रूप निखर गये
फैली कैसी कारी घटाऐं
जा बदरा सै तेरी यारी
चले मस्त पवन पुरवैया प्यारी........
रूपरंग तेरो अच्छौ लगथैगौ
नटखटपन तेरौ फबथैगौ
सब लेथैंगे तेरी बलैयां
कैसै तू ऐसौ सजथैगौ
तेरी कौन सगी महतारी
चले मस्त पवन पुरवैया प्यारी..........
तू चाहै जित्तौ परेशान हमें करलै
सबकौ माखन मुंह मे भरलै
लेकिन जरा सौ रास रचा दै
मधुवन सारौ सुरभित करदै
फूल जाऐं सारी फुलवारी
चले मस्त पवन पुरवैया प्यारी........
आऐ बसंत घर सबई के
सुरभित समय र चलै भुनसारी।
स्वरचित ःस्वप्रमाणित
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी
2भा.गीत ःश्रंगार

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1 भा.1/3/2019(शुक्रवार )बिषयःपवन/समीर,वयार/ हवाःविधाःःः काव्यः ः
जय जय माँ हे शारदे
भवसे हमको तार दे
सुरभित समीर वहे जगत में,
प्रेमभक्ति और प्यार दे।
सबको अनुपम वहार दे।जय जय माँ......।
जग मे फैले शांत वयार माँ
त्राहि त्राहि ना मचे कहीं।
रहें प्रेमपात्र एकदूजे के हम,
नहीं झगडे झंझट दिखें कहीं।
हमको शक्ति अपार दे।जय जय माँ.......
प्रफुल्लित हों चेहरे सबके,
सभी स्नेह से सिंचित हों।
प्रेमपुष्प विकसित हों माते,
नहीं अपनत्व से बंचित हों।
आशिष बारंम्बार दे।जय जय माँ..........।
वहे वयार बासंती यहां पर,
मकरंद मधुरिमा घुले पवन में।
घर घर में खुशियां आ जाऐं,
हो प्रेमपराग अनुराग भवन में।
सारा जग उजियार दे।जय जय माँ........
स्वरचित ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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3भा 28/2/2019( गुरुवार)
बिषयःःप्रण /संकल्प
विधाःःःकाव्यःः
मत लो अब तुम धैर्य परीक्षा
हमने बहुत सहिष्णुता बरती।
एक एक मारेंगे चुन चुन कर,
दृढ़ संकल्पित बोली ये कहती।
गिनगिन के हम लाश बिछाऐं।
अब बोटी तुम्हारी कौऐ खाऐं।
मूंग दलें दुश्मन की छाती पर,
संकल्प शत्रु दोजख पहुंचाऐं।
हम भारत माँ के वीर सिपाही,
शान तिरंगे की नहीं जाने देंगें।
शीश कटा देंगे सरहद पर लेकिन,
कभी आनबान नहीं जाने देंगे।
प्रण हम सभी ने कर लिया है।
सच मनमानस में धर लिया है।
मिराज सुखोई छोडें वैरी पर,
ये सदबिचार प्रण कर लिया है।
हम गोला बारूद सभी दागेंगे।
अब घर में घुस घुस कर मारेंगे।
नहीं छोडेंगे बंकर में दुश्मन को,
मिशाइल तोप सब कुछ घालेंगे।
स्वरचित ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी
28/2/2019(गुरुवार)
ःप्रण /संकल्प/ जवानः

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2 भा.28/2/2019( गुरुवार)बिषयःःप्रण /संकल्पःःः विधाःःःकाव्यःःः
प्रण करलें ये आज अभी हम,
माँ का शीश नहीं झुकने देंगे।
कितने भी व्यवधान आऐं पर,
दुश्मन कभी नहीं टिकने देंगे।
ये चीख रहीं प्यासी शमशीरें,
अब रक्त पिपासु बनी हुईं हैं।
निकल रहीं म्यानों से तलवारें,
बहुत बर्षों से जो टंगी हुई हैं।
चुन चुन कर बदला हमें लेना है।
हिसाब अब चुकता ही करना है।
देखें कितना दम इसके गोलों में,
हमें मिलजुलकर आगे बढना है।
दृढ़संकल्पित हैं सब भारतवासी,
नहीं कभी किसी शत्रु को छोडेंगे।
मिराज,सुखोई विमान अपने जो
सचमुच एक एक वैरी को फोडेंगे।
स्वरचित ःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी
28/2/2019( गुरुवार)
2भा.प्रण /संकल्प
काव्यः ःः

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1भा,28/2/2019( गुरुवार)बिषयःसंकल्प/प्रणःःकाव्यःः
कुछ पुरूषार्थ परोपकार करूं मै
दृढ़ संकल्पित हो प्रभु मन मेरा।
सदाचार सद्व्यवहार करूं मैं,
हो सुखद शांतिमय जीवन मेरा।
रघुवंशम श्री राम का वंशज ,
अपने वचनों को सदा निभाऊँ।
मुझे गर्व रघुकुल पर है तो,
कुछ शुभकर्म कर नाम कमाऊँ।
प्राण जाऐं पर वचन ना जाऐ,
प्रभु राम आशीष दें मुझको।
सदमार्ग पर चलता जाऊँ ,
भगवान आर्शीवाद दें मुझको।
अबतक संकल्प निभाया मैने,
हो सका संभव जितना भगवन।
अगर वचन दूं आजन्म निभाऊँ,
ये सत्य दृढ़ संकल्प हो श्रीमन।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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2 भा.27/2/2019( बुधवार)विजयपथःःः
काव्यः ःः
समय नहीं अब रूकने का,
बढते आगे ही जाना है।
चुन चुन कर वैरी को मारें,
सारी ऐंठ भुलाना है।
सबक सिखाना आवश्यक है,
विजयश्री वर लाना है।
नहीं कपूत भारतमाता के,
हमें वीरसपूत कहलाना है।
जबाव दिया ईंट का पत्थर से
दुश्मन ये सब याद रखेगा।
विजयपथ पर बढकर भारत
हर शत्रु को बर्बाद करेगा।
सदैव शांति के रहे पुजारी,
शायद इसने कायर समझा।
इसे बता दिया बाहुवल अपना,
इसने कैसे कातर समझा।
स्वरचित ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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1भा.26/2/2019(मंगलवार )
विषयःःबाल साहित्यःःविधाःःकाव्यःः
जय जय जय हे मात शारदा।
तुम हो सचमुच की माँ वरदा।
बाल साहित्य सृजन कर पाऊं,
ऐसा मुझे कुछ सुख दो सुखदा।
बिन आशीष नहीं लिख पाऊं।
गीत संगीत कुछ तुम्हें सुनाऊं।
गुजरा बचपन वापिस लौटा दें,
सुख साहित्य सृजन कर जाऊं।
उन्मुक्त रहे बचपन बच्च्चों का।
जीवन स्वछन्द रहे बच्चों का।
नहीं विरक्त हों अपनों से कभी,
होता प्रेमासक्त मन बच्चों का।
प्रफुल्लित रहें स्वजन बच्चों के,
जब भी आनंदविभोर यह होते।
नहीं सुहाते किसी को ऐसे बच्चे,
जो हंसमुख नहीं दिखते हैं रोते।
स्वरचित ःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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1भा.26/2/2019(मंगलवार )
विषयःःबाल साहित्यःःविधाःःकाव्यःः
जय जय जय हे मात शारदा।
तुम हो सचमुच की माँ वरदा।
बाल साहित्य सृजन कर पाऊं,
ऐसा मुझे कुछ सुख दो सुखदा।
बिन आशीष नहीं लिख पाऊं।
गीत संगीत कुछ तुम्हें सुनाऊं।
गुजरा बचपन वापिस लौटा दें,
सुख साहित्य सृजन कर जाऊं।
उन्मुक्त रहे बचपन बच्च्चों का।
जीवन स्वछन्द रहे बच्चों का।
नहीं विरक्त हों अपनों से कभी,
होता प्रेमासक्त मन बच्चों का।
प्रफुल्लित रहें स्वजन बच्चों के,
जब भी आनंदविभोर यह होते।
नहीं सुहाते किसी को ऐसे बच्चे,
जो हंसमुख नहीं दिखते हैं रोते।
स्वरचित ःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी
1 भा.##बाल साहित्य##
26/2/2019( मंगलवार)
काव्यः ःः

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1भा.25/2019( सोमवार)बिषयःभाग्य/ तकदीर/नसीब/किश्मतःः
विधाःकाव्यःःः
कर्म करते रहें नित स्वधर्म रत,
नसीब हमारा बलवान होता है।
एक उसका वरदहस्त रहे ऊपर,
भाग्य हमारा भगवान होता है।
कर्म से तकदीर बदल सकते हैं।
सत्कर्म से तस्वीर बदल सकते हैं।
किश्मत धर्म के साथ रहती सदा,
मेहनत से तस्वीर बदल सकते हैं।
कर्मशील के साथ इनसान होता है।
हर कर्मवीर साथ भगवान होता है।
जो कोसता रहे तकदीर को हमेशा,
ऐसा आदमी तो जिंदगी भर रोता है।
मानते हैं कुछ भाग्य भी होता मगर
कर्म प्रधान सारे जमाने में होता है।
रोते रहें यदि अकर्मण्य हम बैठे रहे,
यह निष्कर्मी सिर्फ जिंदगी ढोता है।
स्वरचितःःः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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2भा24/2/2019(रविवार)बिषयःःअध्यातम
विधाःःःकाव्यःः
भग्न करें वासनाओं को मनसे,
भगवान स्वयं बन सकते हैं।
भरे व्यर्थ यदि बिचार मन में तो,
शुभकर्म नहीं कर सकते हैं।
बने युगपुरुष महामानव जो भी
सबने परोपकार सत्कर्म किऐ।
वे महावीर पुरूषोत्तम कहलाऐ,
जो सदव्यवहार स्वधर्म जिऐ।
क्रांतिवीर जन्मे कुछ योगेश्वर।
शांतिदूत जन्मे यहां ज्ञानेश्वर।
महान तपस्वी हुऐ धरती पर,
श्री राम कृष्ण जन्मे सर्वेश्वर।
संकल्प विकल्प मन में उठते हैं।
जब अशांत चित्त उद्वेग उठते हैं।
महामानव क्या दानव बन जाते,
यदि क्रोधित मन सवेग उठते हैं।
बस अच्छे मानव हम बन जाऐं।
सुकमल पत्राक्ष निर्मल हो पाऐं।
करें पुरूषार्थ मर्यादित रहकर तो
कुछ आदर्श पुरूष उपाधि पाऐं।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय

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आज का कार्यःःस्वपसंदःः
तिथिःःः24/2/2019( रविवार) बिषयःःअध्यात्म
विधाःःःकाव्यः
अहम वहम से दूर रहूँ और
प्रभु प्रेमालय में रहूँ सदा।
रहूँ वासनाओं से बंचित तो
नहीं कलुषालय में रहूँ कदा।
विकार कभी मन में नहीं आऐं,
अपने इष्ट का भजन करूँ।
संम्पूर्ण विश्व की सुखद चाह हो
यह सदा ईश से विनय करूँ।
कभी हरि भूलूँ न जग भूलूँ,
कमल समान ही प्रभु रहूँ।
जग के कीचड में रहकर भी,
प्रभु गंगाजल सा बना रहूँ।
ऊंचनीच कभी नहीं मानूं मैं,
सबजन का उपयोगी होऊँ।
परोपकार परमार्थ करूं कुछ,
यथायोग्य सहयोगी होऊँ।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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2भा24/2/2019(रविवार)बिषयःःअध्यातम
विधाःःःकाव्यःः
भग्न करें वासनाओं को मनसे,
भगवान स्वयं बन सकते हैं।
भरे व्यर्थ यदि बिचार मन में तो,
कैसे शुभकर्म कर सकते हैं।
बने युगपुरुष महामानव जो भी
सबन परोपकार सत्कर्म किऐ।
वे महावीर पुरूषोत्तम कहलाऐ,
यहां सदावहार स्वधर्म जिऐ।
क्रांतिवीर जन्मे कुछ योगेश्वर।
शांतिदूत जन्मे यहां ज्ञानेश्वर।
सभी तपस्वी आऐ इस भू पर,
श्रीरामकृष्ण जन्मे यहां सर्वेश्वर।
संकल्प विकल्प मन में उठते हैं।
जब अशांत चित्त उद्वेग उठते हैं।
महामानव क्या दानव बन जाते,
यदि क्रोधित मन सवेग उठते हैं।
बस अच्छे मानव हम बन जाऐं।
सुकमल पत्राक्ष निर्मल हो पाऐं।
करें पुरूषार्थ मर्यादित रहकर तो
शायद आदर्शपुरूष उपाधि पाऐं।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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4 भा.23/2/2019( शनिवार)बिषयःपानी,/जल/नीर
विधाःःःकाव्यःःः
नदी ,ताल ,तलेयां ,झील
सभी सूख रहे बंध।
पानी नहीं मिलता पीने अब,
सूखे रहे कंठ।
हमने हाथ कुल्हाड़ी मारी
अपने ही पांवों पर।
पेड पहाड काट काटकर
रोते अब अपने पापों पर।
पर्यावरण प्रदूषित कर डाला
पानी कहां से आऐ।
मृगमरीचिका से व्याकुल हुऐ
हम सभी घबराऐ।
गंगा यमुना सरस्वती
चंबल,क्षिप्रा, नर्मदा सूख रही।
पहाड हिमालय से खोदे हमने,
इसीलिए सरिताऐं चिडा रहीं।
नहीं चेते यदि अभी भी
अब जलाभाव नहीं सह पाऐंगे।
शतप्रतिशत निश्चित मानें
हम सब प्यासे ही मर जाऐंगे।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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3 भा.23 /2/2019( शनिवार)बिषयःनीर/ जल/ पानीःःविधाःःःकाव्यः ःः
पानी जीवनदायी इस दुनिया का
यह प्रकृति प्रदत्त निधि है सबकी।
यूं ही नहीं व्यर्थ वहाऐं पानी हम,
यह विशेष जिम्मेवारी हम सबकी।
पशुपक्षी ये सभी वन वनस्पतियां।
चलतीं अपनी सारी गतिविधियां।
पानी बिना यहां कुछ नहीं रहेगा,
आओ बचाऐं ये मिलकर दुनियां।
हमें पानी की हर बूंद बहुमूल्य है,
सबको इसका संरक्षण करना है।
महत्वपूर्ण भूमिका हमें निभाना,
जानें कैसे जल संरक्षण रहना है।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय

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2भा.23/2/2019(शनिवार )बिषयःःपानी/ जल/ नीरःः विधा ःःहाइकुः
जल प्रपात
तपती दुपहरी
ईश आघात
पानी
पिलाऐं।
अमृत बरसाऐं
जीवनदायी
खुश खबरी
गंगोत्र जलधार
जटाशंकर
जलप्रलय
सूखे ताल तलैयों
बडा विस्मय
सूखे हलक
ध्वस्त परियोजना
जल रोकना
पवित्र पानी
हुऐ वेचैन प्राणी
सूखते कंठ
क्षीर सागर
मन भरी गागर
रूका प्रवाह
जल भराव
हुआ मनमुटाव
वही सडक
तैरती नाव
बहे शहर गांव
पानी न ठांव
तोडते दम
बढे नहीं कदम
प्यासे तडाग
स्वरचितःःः ःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी
23/2/2019( शनिवार)
2भा.हाइकु ः
पानी /जल /नीर

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3भा.22/2/2019( शुक्रवार)बिषयःःवार /प्रहार/ चोटःःः
विधाःःःकाव्यः
कई प्रहार जवान सरहद पे सहते।
सीना तान सभी डटकर ये लडते।
सदैव ऋणी रहेंगे अपने वीरों के,
जबकि वार जवान सरहद पे सहते।
सरहद पे जवान डटा है अपनी
क्यों कर हमें चिंता कुछ करना।
चाहे कैसा मौसम ऋतु आऐं जाऐं,
सदा सावधान सैनिक को रहना।
इनके रहने से हम सुरक्षित रहते,
चैन की नींद भारतवासी सोते।
सैनिक सीमा पर कष्ट झेल कर
कभी ये वलिदान राष्ट्रहित होते।
अपना भी हम कुछ फर्ज निभाऐं।
हम साथ जवानों के हो दिखलाऐं।
होसला अफजाई करें सब इनका,
हम भी साथ आपके इन्हें बतलाऐं।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय

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2भा.22/2/2019(शुक्रवार )
बिषयःवार /प्रहार /चोट ः
विधाःःकाव्य
भर जाते हैं घाव जिस्म के
मगर दिल के घाव नहीं भरते।
बहुत बडा प्रहार सह लेते पर,
दिल पर आघात नहीं करते।
अपना दूध पिलाया जिसने।
अपना खून बहाया जिसने।
भूल गये अपने माँ बापों को,
चलना हमें सिखाया जिसने।
प्रहार उन्हीं के सीने पर करते।
चोट सदा उसी छाती पर करते।
चंदन रज का तिलक लगाकर,
क्यों घात उसी माटी पर करते।
सहते रहे प्रहार सीने पर अपने
देश उनकी कुर्बानी याद रखेगा।
सर्वस्व निछावर कर दिया अपना
उन्हें हर भारतवासी याद करेगा।
स्वरचितःःः
इंजी शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय


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1 भा.22/2/2019(शुक्रवार )बिषयःःवार/ प्रहार /चोटःः
कोई प्रहार सहूं मैं लेकिन
वार पीठ पर नहीं ले पाऊँ।
नीच समझता हूं उनको मै,
जबाव अगर नहीं दे पाऊँ।
हृदय विदीर्ण होता है मेरा
चोट कहीं दिल पर लगती है।
आघात सभी सामने झेलूं,
मगर बात सीने में खलती है।
नहीं चाहता स्वयं कभी मै
पीठ पीछे से वार करूँ।
यह स्वाभाव नहीं है मेरा,
निहत्थे पर प्रहार करूँ।
अस्त्र शस्त्र की बात ही छोडें,
वाणी ही हथियार बडा है।
इसके आगे सभी हुए भोंथरे,
इस वाणी का प्रहार बला है।
कटुता कभी न आऐ मन में,
मै चोट करूं तो मीठी बोली से।
इतनी सहिष्णुता देना भगवन,
बिचलित न हो पाऊं गोली से।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय

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3.भा21/2/2019(गुरुवार) उजास /उजाला
विधाःःःकाव्यःःः
उजास करें अंतस में भगवन
जिससे दर्श आपके कर पाऊँ।
मनमलिन मेरा है जब प्रभुजी,
कैसे मन में तुम्हें बिठा पाऊँ।
मार्ग नहीं दिखता है मुझको,
नहीं सतपथ पर मै चल पाऊँ।
करें उजाला मनमंन्दिर में तो,
बडता सुगम राह पर मै जाऊँ।
कर्म करूं लोकहित हितार्थ के।
सत्कर्म करूँ यहां परमार्थ के।
उज्जवलित उर हो जाऐ यदि मेरा,
शुभकर्मी बनूँ मै बिना स्वार्थ के।
स्वरचितःःः ः
इंजी शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय

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1भा21/2/2019( गुरुवार)बिषयःःःउजास/उजाला ःविधाःःःकाव्यः
हर हृदय में उजास भरें माँ।
सुरभित हर सांस करें माँ।
रश्मि सदैव प्रेम की निकलें,
ऐसे मन में उल्लास भरें माँ।
हर मन प्रफुल्लित हो जाऐ।
ये जन मन प्रदीप्त हो जाऐ।
मंगल भवन अमंगल हारी ये,
मनमलिन सुदीप्त हो जाऐ।
जीवनज्योत जले ये जबतक
उजास नहीं कलुषित मन हो।
मनमनोरंजन हो मनभावन,
प्रेमप्रकाश नहीं दूषित तन हो।
मनमंन्दिर उज्जवल हों सबके।
हरे भरे प्राण पल्लव हों सबके।
आत्मविकार नहीं सुविकास हो,
हो उजाला उर धवल हों सबके।
क्यों न प्रीत के गीत गुनगुनाऐं।
फैलाऐं रोशनी ये सत चेतनाऐं।
उजागर हो उजास मनमयूरी,
प्रस्फुटित होने लगें सद्भावनाएँ।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय

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3भा. 20/2/2019(बुधवार )बिषयःकला ः
विधाःःःकाव्यः
कला सभी ईशाशीष के रुप में
इस धरती के हरजन को मिलती।
कौई नहीं शायद इस वसुधा पर,
जिसे कुछ कलाऐं नहीं मिलती।
नृत्य कला कहीं मिलें वाद्य कला ।
वास्तु कला कहीं दिखे बडी वला।
विभिन्न प्रकार की कलाऐं दीं प्रभु ने,
गीत मीत उपहार सच वाक कला।
साहित्यदीप जलाते हम मिलकर,
क्या नहीं है यह ईश प्रदत कला।
ये रणनीति रणवीरों नहीं जानें हम,
सर्वाधिक चर्चित राजनीति कला।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम

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1भा20/2/2019( बुधवार)बिषय ःकलाःः
चित्र कला कहीं केश कलाऐं।
दिखती कुछ नैसर्गिक कलाऐं।
कितनी सुंन्दर ये मूर्ति बनाता,
इस कलाकार की बहुत कलाऐं।
अपने मनमंदिर में छिपी हुई हैं,
ढूंढें मिल जाऐंगी बहुत कलाऐं।
चित्रकार चित्रांकित कर दे जब
मंत्रमुग्ध करती जीवंत कलाऐं।
मन से प्रस्फुटित होती हैं कुछ,
मनोभावनाऐं प्रगटित होती हैं।
सच्चा कलाकार वही है जिससे
ये कलाकृति विकसित होती हैं।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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1भा.19/2/2019(मंगलवार )बिषयःःअंत
विधाःःःकाव्यः
तुम तो पतझर में बसंत हो गये।
जन्मे भारत में अरिहंत हो गये।
किसने कहा तुम्हारा अंत हुआ है,
वीर अजर अमर भगवंत हो गये।
ये ऋणी हमेंशा के लिए कर गये।
जीवन अपना समर्पण कर गये।
है अंतहीन नहीं अस्तित्व तुम्हारा,
वैसे तुम सर्वस्व समर्पित कर गये।
वीर तुम्हारा वलिदान नहीं भूलेंगे।
हम भारतवासी तुम्हें नहीं भूलेंगे।
अंतस मे अंकित हो छवि तुम्हारी,
शहीदो जीवन पर्यंन्त नहीं भूलेंगे।
देशद्रोही का हम सर्वनाश करेंगे।
अंत निश्चित जोभी विनाश करेंगे।
ठान लिया दुष्ट जन्नत में पहुंचाना,
इनका अब हम पूर्णविनाश करेंगे।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय

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18/2/2019( सोमवार)पिरामिड लेखन शब्दःःःयत्न ःइतर
1)
मै
करूँ
प्रयत्न
श्रमसाध्य
कर्म महान
हमारे जवान
जय भारतबर्ष
2)
ये
धन
सेवार्थ
पुरूषार्थ
यत्न भावार्थ
जीवन हितार्थ
सुखी हृदयालय
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय

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1 18/2/2019(सोमवार )बिषयःःः आसरा
विधाःःःकाव्यः
ईश आसरा मिल जाऐ तो
नहीं कुछ दुर्लभ हो पाऐगा।
प्रभु सहारा हमें सदा जब,
सब कुछ सुलभ हो जाऐगा।
सबसे बडा सहारा किसका
वरदहस्त रहता है जिसका
परमपिता तो वही कहलाऐ
मिले सुखद आसरा जिसका।
जीवन सुगम सफल हो जाऐ।
ये उन्नति मार्ग सरल हो जाऐ।
कहीं कोई अवरोध नहीं आऐंगे
अगर सहाय निश्छल हो जाऐ।
दयानिधान सदा दया करते हैं।
कृपानिधान सद्कृपा करते हैं।
दीनदयाल हैं अपने जगदात्मा,
सब झोली खुशियों से भरते हैं।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय

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1 भा.17/2/2019( रविवार)बिषयःःशहादतःः
विधाःःःगीत /देशप्रेम/देशद्रोह
कब तक गाओगे गाथाऐं ,
इस पापी पाकिस्तान की।
छोड क्यों नहीं देते गद्धारो,
यह धरती हिंन्दुस्तान की।
खाते पीते सब भारत में तुम।
लेते शिक्षा दीक्षा कहां से तुम।
दिया देश ने सबकुछ तुमको,
क्या नहीं दबे उपकारों में तुम,
मेरे हिंदुस्तान की।
क्यों छोड़ नहीं देते तुम............
वीर जवान रोज शहादत दे रहे।
रणभेरी वह रोज बजा रहे
अपना शोणित बहा बहा कर,
हम सबका जीवन बचा रहे।
बोलें मिल हम जय जय हिंदुस्तान की
क्यों छोड़ नहीं देते............
लालच मोह माया से नहीं।
मोह इन्हें काया से नहीं।
लोभ लालसा तजी इन्होंने
फिर बोलें जय देश महान की।
क्यों छोड नहीं देते............
सदा प्यार स्वदेश से करते
जय जय कार देश की करते
करें शहादत देश की खातिर
कभी अभिमान नहीं ये करते
नहीं चाहत सम्मान की।
क्यों छोड़ नहीं देते............
जान हथेली पर लेकर चलते हैं।
मृत्यु वरन सरहद पर करते हैं
धीर वीर गंभीर हमेशा रहकर,
ये सावधान सीमा पर रहते हैं।
इच्छा मातृभूमि पै वलिदान की।
क्यों छोड नहीं देते तुम....................
कब तक गाओगे गाथाऐं तुम,
इस पापी पाकिस्तान की।
क्यों छोड़ नहीं देते तुम,
यह धरती हिंदुस्तान की।...........
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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विधाःःःकाव्यः
शीर्षक ःआदमी ही आदमी को खा रहा है,
आदमी ही आदमी को खा रहा है,
किससे शिकायत करें हम आपकी
कोई कभी सुनता कहाँ है ध्यान से।
मै कहूं और तुम तुम जल्दी करो,
पर कोई करता नहीं है प्यार से।
क्योंकि हमें स्वार्थ से फुरसत नहीं है
पाप में फिर पाप पलता जा रहा है।
आदमी ही आदमी.........।
पेट ने कुछ को कर दिया है आज व्याकुल
जिंदगी माटी से सस्ती हो गई है।
मारकर गाल में तमको तमाचा
भूख चौराहे पे नंगी सो गई है।
आचरण छोडकर आज हमने
मानवीयता को ठुकरा दिया है।
ओढकर परिधान विदेशी सभ्यता के
स्वयं को ही लज्जित किया है।
जो कभी खाते थे कश्में,
अपनी संस्कृति के नाम की
ना रहा नाता किसी को देश से
खून ही खून से लडता जा रहा है।
आदमी ही आदमी..........।
थोथी सभ्यता की होड में
रूप की नुमाइशें लग गई हैं।
शराफत की गली में थीं जो कतारें
आज इनकी दर्शन बन गई हैं।
जीवन की हर खुशी को हम
प्यार से पाना ही भूल गये हैं।
समाज के पर्दे पर गंदगी उछाल कर
हम मानवमूल्य भूल गये हैं।
निर्माण की दे देकर दुहाई आदमी
विध्वंस ही विध्वंस करता जा रहा है।
आदमी ही आदमी............
आज मानवीयता शिष्टता छोड कर
नहीं लिया है किसी गैर से
जिंदगी गर जर्जर हो गई तो
नहीं शिकायत है हमें भी आपसे
क्योंकि कर्म का फल हर आदमी को मिला है।
दे देकर दोष औरों को
झूठ से ही झूठ बडता जा रहा है।
आदमी ही आदमी को खा रहा है।
स्वरचितःःः
इंजी.शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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विधाःःःकाव्यःः
केवल थोथी मानवता ओढे,
मानवता का हम गला घोंटते।
सत्य अहिंसा के बस द्योतक,
झुठली सत्कर्मी कला ओढते।
मनमंन्दिर में मानवता पलती।
सद्व्यवहार सदाचार में रहती।
जब भी जहर उगलती दानवता,
तबतब कहीं मानवता दहलती।
ये मनोमलिन्य रखें नहीं मन में।
हम सभी सद्भाव रखें जहन में।
जीवनज्योत जले परोपकार तक,
ये सुखद भाव हो सभी भवन में।
पुरूषार्थ भाव शुभकामनाऐं हो।
अपने जीवन में सद्भावनाऐं हों।
हम कर्महीन कभी नहीं बन पाऐं,
जीवंत अपनी शुद्धभावनाऐं हों।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.


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विषयःःशहादत,वलिदान
विधाःःः मुक्तक
कबतक बहने दें शोणित कोआप हमेंबतलाऐं।
कबतक इस पापी को छोडें आप हमेंजतलाऐं
नहीं रहा अब धैर्य खून खौल उठा है वीरों का,
क्योंखून पिलाऐंग द्धारों कोआप हमेंसमझाऐं।
कबतक आतंकी हमले हम सब रोज सहेंगे।
कबतक वीरजवान हमारे यहां पर रोज मरेंगे।
कैसे पालेआस्तीन में सांप आप हमें बतलाऐं
कबतक ऐसे गद्धारी इस भूमि पर रोज पलेंगे।
वीर सपूत भारत के अब हम नहीं मरने देंगे।
खुली छूट है इनको अब सब कुछ करने देंगे।
पत्थरबाज चैनुऐ अब पत्थर फेंकें मारे जाऐंगे,
मीरजाफर जयचंदों को यहां नहीं पलने देंगे।
वलिदान व्यर्थ नहीं जाऐ हमें ध्यान में रखना।
खूनीबदला खूनसे लेना नहीं फजीहत सहना।
श्रद्धासुमन अर्पित करते हम वीर शहादत को
आरपार की हो जाने दो यही सभी का कहना।
स्वरचितःःः स्वप्रमाणित
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय

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1 भा.15/2/2019(शुक्रवार )शहादत ःः
शत शत नमन करते हैं हम,
वीर सपूतों की शहादत को।
अमर रहें वीर जवान देश के,
अर्पित श्रद्धासुमन इवादत को।
तुम जन्म जन्म तक अमर रहोगे,
इतिहासों में नाम लिखा जाऐगा।
कभी व्यर्थ नहीं जाऐगी शहादत,
तुम्हारा स्वर्णाक्षरों में नाम रचेगा।
धन्य मातपिता तुम सब वीरों के,
जन्मे जिन्होंने ऐसे महान सपूत।
सदैव रहोगे चिरंजीव तुम सबही,
इस धरती माता के हो वीर सपूत।
चीत्कार है भारत की गलियों में,
सब अश्रपूरित श्रद्धांजलि दे रहे।
नम नयन हुऐ हर भारतवासी के,
सभी अश्रुपूर्ण भावांजली दे रहे।
तुम अजर अमर हो गये सपूतो,
हम नहीं भूलें वलिदान तुम्हारा।
चिरस्मरणीय रहेगा हमको दिन
सदा रहेगा यहां सम्मान तुम्हारा।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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3.भा.14/2/2019( गुरुवार)बिषयःःमिट्टीःःः
विधाःःःकाव्यः
क्या माटी का कर्ज चुकाया हमने।
क्या भारत का फर्ज निभाया हमने।
यह मिट्टी हम सबके माथे का चंदन,
नहीं स्वयं को खुदगर्ज बनाया हमने।
दुश्मन को क्यों नहीं पहचाना हमने।
किस मिट्टी का बना नहीं जाना हमने।
वीर जवान सने हैं भारत की माटी में,
क्यों इस माटी राज नहीं माना हमने।
अब तक खुद को ही भरमाया हमने।
जानबूझकर मिट्टी को शरमाया हमने।
वलिदान करें हम इस मिट्टी की खातिर,
समझें क्या स्वदेश नहीं गरमाया हमने।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय

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14/2/2019( गुरुवार)बिषयःःमिट्टीःःः
विधाःःःकाव्यः
कुंभकार तुम तो हो भगवन,
यहां सुघड़ खिलौने रच डाले।
माया मोह भरा इस माटी में,
फिर सान सान कर मथ डाले।
नहीं कोई ऐसा शेष गुण जो,
तुमने इसमें नहीं डाला।
इसके रग रग में है भरी क्रूरता,
ये बिष वाणी में भर डाला।
कभी नहीं प्रेम से रह पाते हम
बस अपना अपना सोच रहे।
नहीं पुरूषार्थ करना चाहें कुछ
क्यों हरामखोरी की सोच रहे।
हम हाथ कटोरा आस में बैठे ,
सबकुछ सरकारें ही कर डालें।
हम सभी गंदगी खूब मचाऐं,
यह सब सरकारें धोकर जाऐं।
मिट्टी की भली बनाई ये काया,
पर बुद्धि गजब की भर डाली।
प्रभु तेरे इशारे पा इस पुतले ने,
ये विकट सी रचना कर डाली।
कैसे मैं गुणगान करूं माटी का,
नहीं काम ये तुच्छ बुद्धि करती।
ईशाशीष मिले गर कहीं इसको ,
शायद ये कुछ बुद्धि शुद्धि करती।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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1 भा14/2/2019(गुरुवार )बिषयःमिट्टीःःःः
विधाःःःकाव्यः
मैं मिट्टी का पुतला भगवन,
तुमने मुझे बनाया है।
कर्मक्षेत्र यह जगत है मेरा,
कुछ कुछ समझ में आया है।
सान सान माटी को तुमने,
कितनी मूर्ति बनाईं हैं।
समझ नहीं पाया इनमें क्यों
मुझको जगह दिलाई है।
मिट्टी का पुतला जब प्रभुजी,
मिट्टी में मिल जाऊंगा।
पाप पुण्य सत्कर्मों के बल पर,
शरण तुम्हारी आऊंगा।
सेवा भाव जगाऐं परमेश्वर,
कुछ परोपकार कर पाऊँ मै।
जिस माटी में जन्म लिया है,
कभी उसका कर्ज चुकाऊं मैं।
शुभचिंतन मनन दिनचर्या में आऐ।
कुछ भक्ति भाव मन में जग जाऐ।
रहूँ सदैव सत्य निष्ठ सचरित्र फिर,
जब चाहे मिट्टी,मिट्टी में मिल जाऐ।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय

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2भा.13/2/2019(बुधवार)बिषयःदागःःः
विधाःःःकाव्यः
क्यों दागदार बनाते मेरे भारत को तुम।
सदैव याद रखो इसके गौरव को तुम।
गंगा जमुनी संस्कृति है जिस माटी की,
शायद भूल रहे हो इसके सौरव को तुम।
नहीं दागदार हो सकता मेरा भारत देश।
कैसा गौरवशाली सुंन्दर इसका परिवेश।
बखान नहीं कर पाऊँ गौरवगाथाओं का ,
इससे मिला जग को सुखद शांति संदेश।
थूको चाँद पर दाग नहीं लगा पाओगे।
थाथी कभी नहीं इसकी मिटा पाओगे।
थूको चाहे जितना तुम सुन लो गद्धारो,
आजीवन इसे कभी पोंछ नहीं पाओगे।
भारत की माटी में है चंदन और अबीर।
इसकी मिट्टी में जन्मे तुलसी सूर कबीर।
हिंन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई पारसी जन्मे,
सब मिलजुल रहते निर्धन अमीर फकीर।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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8भा.12/2/2019(मंगलवार )बिषयःलौःः
लौ जलती रहे सदाचार की
लौ जलती रहे सद्व्यवहार की
भ्रष्टाचार की लौ नहीं दिखे हमें,
लौ जलती रहे शिष्टाचार की।
शिक्षा की लौ जले चहुंओर,
कोई नहीं रहे अशिक्षित यहां।
भाईचारे की लौ जले भगवन,
भारतवर्ष हो उल्लेखित यहां।
दीप प्रज्वलित हो प्रेम का
प्रीतभाव हो मनमानस में।
जलती रहे लौ मिलने की,
रहे उमंग सबके अंतस में।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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बिषयःःःलौः
विधाःःः दोहा
लौ लागी है हमारी तुमसे ही कन्हाई।
दर्शन देंगे गिरधारी सच्ची सुखदा भाई।(1)
जले स्नेह की लौ अगर प्रेमभाव ही आए।
भजनभावना ईश की हमको बहुत सुहाए।(2)
सुमधुरम मकरंद मिले मीठी वाणी बोल।
जले लौअगर प्यार की खोले सबकी पोल।(3)
सदव्यवहार करें सभी रहें सुखी हम लोग।
जो चाहे खाऐ पियें खूब करें सुख भोग।(4)
जीवन सबका हो सुखद रहें प्रीत के संग।
मिटता द्वेषभाव यहां जलती लौ बहुरंग।(5)
स्वरचितःःःस्वप्रमाणित
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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भा.11/2/2019( सोमवार) छंदमुक्त लेखन प्रतियोगिता से इतरः शीर्षक ःअंजामःःः
विधाःःः छंदमुक्तःःः
अपने कर्मों का अंजाम
हमें भुगतना ही पडता है
जैसे कर्म करेंगे
हमें स्वयं भोगना ही होगा।
प्रकृति से खिलवाड़ कर रहे
इसका प्रतिफल भोग रहे हैं
पर्यावरण प्रदूषित करते हैं नित
अंजाम भी देख रहे हैं
नहीं मानते गौमाता को
केरल में मारी गौमाताऐं
बीच चौराहे पर रंग जमाया
अपनी हैवानियत का इन्होंने देखो
कितना नंगा नाच नचाया
अंजाम आप सभी हम देख रहे हैं
अरबपति आऐ सडकों पर
भीख सभी अब मांग रहे हैं
जो भी पाप पुण्य हम करते
उसका अंजाम भी देखते
नहीं डरें जब मन से अच्छे
हम सभी उस पर विश्वास करें
कर्म करें फिर फल की इच्छा
सब ईश के चरण धरें।
अंतस में अंजाम टटोलें
परोपकार शुभ कर्म करें तो
निश्चित शुभफल पाऐंगे
करते रहें पुरूषार्थ हमेशा
अंजाम सुखद हम पाऐंगे।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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3भा.11/2/2019(सोमवार )बिषयःजहरःः
जहर भरा हरा हरजन के मन में।
नहीं प्रेम परिलक्षित होता मन में।
क्यों मलिन बस्तियों में झांकूं मै,
गंदला भरा जब स्वयं मेरे मन में।
सच नाग सभी नहीं जहर बनाते।
कल कारखाने सभी जहर उगाते।
सब सरिताऐं प्रदूषित होती दिखतीं,
फिर भी क्यों हमें ये जहर लुभाते।
ये प्राणवायु सब प्रदूषित हो गई।
हम सबकी मति कलुषित हो गई।
पशु पक्षी सभी परेशान हो रहे हैं,
कहीं मानवीयता बिचलित हो गई।
ढूंढ रहा अपने मानवमूल्यों को
शायद मुझको कहीं मिल जाऐं।
जो पाल रखे हैं बिषधर अबतक,
किसी कोने में कभी मिल जाऐं।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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3भा,10/2/2019(रविवार )बिषयःबसंत मौसम
अपना जीवन मौसम जैसा
मुझको कुछ कुछ लगता है।
समय समय पर रंग बदलता,
सचमुच ऋतुओं सा लगता है।
शिशु रूप में ये कुछ मुझको,
ऋतुराज बसंत सा भाता है।
पावस किच किच यौवन सी,
बृद्धावस्था जैसे गर्मी लाता है।
उपवन जब सुमन खिले हों
मनको प्रफुल्लित करता है।
उजडे जब अपनी बगिया तो,
कैसे पतझड सा लगता है।
इस जीवन के अनेक रूप हैं
जैसे गिरगिट रंग बदलता है।
कभी गर्मी सर्दी बर्षा दिखती,
कभी यह ऋतुराज में ढलता है।
जैसे भी हो हमको जीना है
मौसम जैसे सबको जीना है।
चाहे जैसी ऋतुऐं बदलें बसंती,
प्रभु इच्छा हमें यहीं जीना है।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुनाम.प्र.

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3भा 9/2/2019( शनिवार)बिषयःःशारदे, सरस्वती, बसंत, ऋतुराज ःः
पीतवर्ण पीताम्बर धारी।
मनमोहक लगते गिरधारी।
सारी वसुधा दिखती पीली,
रंगबिरंगी कुछ फुलवारी।
मनमयूर नृत्य करते हैं।
दृश्य देख नित्य करते हैं।
बासंती धरती दिखती है,
गुंजन मधुर भंवरे करते हैं।
नववधु श्रंगार करती है जैसे,
यह प्रकृति श्रंगार करती है।
आती बसंत ऋतु ये जब भी,
सखियों संग विहार करती है।
कहीं धानी कहीं पीली चूनर।
ओढे कभी कई रंगों की चूनर।
कोयल कुहि कुहि करती तो,
दिखती मिश्रित रंगों की चूनर।
मनमोहन मनोरंजन करते।
अलि अलग सा गुंजन करते।
स्नान किऐ पीतरंग में धरनी,
मधुवन नृत्य राधेरमन करते।
बसन बसंती सभी पहनकर,
कलरव सब पक्षी करते हैं।
हरसिंगार कचनार कलि सा,
श्रंगार बृक्ष बासंती करते हैं।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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1.भा.8/2/2019( शुक्रवार)बिषयःःदहलीज
विधाःःः काव्यः ः
आप सभी के मंगल हित हेतु
विनय ईश से करता हूँ।
सब सुखी स्वस्थ प्रसन्न रहें
यही कामना करता हूँ।
आया दहलीज मै प्रभु की,
श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ।
प्रेमपात्र बन जाऐं एक दूजे के,
यही प्रार्थना करता हूँ।
परोपकार सहयोग करें हम
एकदूजे का सद परस्पर।
नहीं छोडें मर्यादाऐं अपनी,
रहें हमेशा ही मिलजुलकर।
हित सुरक्षित रखेंगे भगवन
ईश दहलीज पर शीश झुकाऐं।
सबकी पूर्ण हो मनोकामना,
हम सदैव ही ईशाशीष पाऐं।
जय राघव जय माधव मेरे,
हम सभी वंन्दना करते हैं।
अपना शीश द्वार पर धरकर,
हम प्रभु दंण्डवत करते हैं।
स्वरचितःःः
इंजी शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय

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3भा7/2/2019( गुरुवार)बिषयःःप्रश्न /सवाल
विधाःःः काव्यः
मेरे प्रश्न ःः
कभी कभी तो मुझे तुम्हारी हंसी ठिठोली भाती है।
कभी कभी क्यों मेरे मन में ये शोले भडकाती है।
मेरे वश की बात नहीं ये,
न ही है कोई गल्ती मेरी।
मन का अंतर्द्वंद ये अपना,
यही भावना शायद मेरी।
ये दुनिया रंग बदलती जैसे, गिरगिट रंग बदलता है।
सुंन्दर दिखती हमें कभी पर क्यों नागिन सी डसती है।
कभी कभी तो.........
स्वार्थ पूर्ण ये सारा जग है,
न ही है अपनत्व भावना।
अपना अपना हर कोई चाहे,
हर मानव की अलग कामना।
मन मयूर पुलकित हो उठता,ऋतु बसंन्त जब आती है।
महिनों बाद बदलकर फिर वह क्यों पतझर बन जाती है।
कभी कभी तो..........
इस मिट्टी के पुतले में तो
जीव आत्मा पडे हुऐ हैं।
प्राण हमें दो दिन को जैसे,
दानस्वरूप ही मिले हुऐ हैं।
आत्मा का तो काम यही है,आवागमन ही करती है।
जानबूझकर सारी दुनिया फिर क्यों पाप कमाती है।
कभी कभी तो.............
प्यार प्यार का नाम नहीं यहां
अर्थ रूपमय सारी दुनिया।
चंद चांदी के सिक्कों पर ये
न्योछावर बेचारी दुनिया।
जीना मरना हमें यहां ये,गीता कुरान सिखाती है।
नश्वर जब संसार ही सारा फिर क्यों दुनिया रोती है।
कभी कभी................
ईमान धर्म न अपना कोई
दौलत से ही रिश्ते हैं।
जिसकी खातिर देखो हमने,
सबसे नाते तोडे हैं।
पैसा ही भगवान यहां पर,पैसा ही ईमान है।
बेचो तुम ईमान भी अपना क्यों न आत्मा कहती है।
कभी कभी तो..............
रूपरंग के बाजारों में
सरेआम नीलामी होती।
क्षुधा तृप्ति के लिए यहां पर
दो कौडी में इज्ज़त बिकती।
तनमन सब तुम यहां खरीदो माया का बाजार लगा है।
धन से फिर भी बोलो प्यारे सत्यप्रीत कब मिलती है।
कभी कभी तो............
सत्य अहिंसा कू रखवारे
ईश्वर के भी यहां शिकारी।
दिल का देवालय दूषित कर,
लक्ष्मी के बस यहां पुजारी।
धर्म कर्म यदि नहीं यहां पर,बदमाशों का शासन है।
कौन शक्ति है जिससे फिर भी जगमग करती धरती है।
कभी कभी तो..........
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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2भा7/2/2019( गुरुवार)बिषयःःप्रश्न सवाल
विधाःःः काव्यः ःः
बहुत सवाल अनुत्तरित से हैं
जिनसे मै नित जूझ रहा हूँ।
इनका जबाव कोई नहीं देता
अब ईश्वर से ही पूछ रहा हूँ।
दिखते पापी प्रगति करते से।
ईमानदार यहाँ भूखों मरते से।
पाखंडी कैसे बृह्मचारी बन गये,
रहते ठाटबाट शानोशौकत से।
ईमानदार कुछ परेशान रहता है।
झूठ तिलस्मों से सदैव डरता है।
बेचारगी झलके चेहरे पर लेकिन,
सीना तान अपनी राह चलता है।
अर्द्धसत्य की बात नहीं करें हम,
सत्य सदा सर्वोत्तम ही रहता है।
कितने पाप पुण्य करते रहते हैं,
कोई अमीर क्यों उत्तम रहता है।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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2 भा.62/2019( बुधवार)बिषयःडोर/पतंग
प्रभु जीवनडोर आपके हाथों,
इसे ढील कभी नहीं देना है।
ये मन पतंग सा उडना चाहे,
इसे सदैव खींच कर रखना है।
कभी पथभ्रष्ट होऊँ नहीं भगवन,
बस तुमसे इतनी विनती है मेरी।
चाहे जैसी परिस्थिति आऐ,
यह डोर खींच कर रखनी है मेरी।
अपना जीवन है पतंग सा
जिसकी डोर ईश के हाथ।
किसका कितना करें भरोसा,
कब तक कोई देगा साथ।
जब आश निराश में बदली।
मानें पतंग की डोर है पतली।
गर निष्ठा आस्था हिली हमारी,
सच्ची अपनी कहानी बदली।
कटी पतंग क्या न उड पाऐगी।
कटे पंख पछी सी गिर जाऐगी।
जीवन का कुछ अता पता नहीं,
कटी पतंग आत्मा उड जाऐगी।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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2भा.5/2/2019(मंगलवार )बिषयःःः विज्ञान ः
विज्ञान बहुत बड गया लेकिन
कब ऊंचनीच का भाव मिटा है।
शिक्षा स्तर बढता दिखता पर ये,
कब निर्धन अमीर प्रभाव पटा है।
मिल भेदभाव जात पात मिटाऐं।
हम विज्ञान ज्ञान कुछ ऐसे लाऐं।
भौतिकता हमको सुख नहीं देती,
सुखशांति सुविधा वैज्ञानिक लाऐं।
सुई विमान सब विज्ञान ने बनाऐ।
सभी उपकरण विज्ञान ने बनाऐ।
क्या कुछ नहीं बनाया विज्ञान ने,
येऔजार मशीन विज्ञान ने बनाऐ।
आज मशीनी मानव बन गया है।
यह रोबोट नहीं दानव बन गया है।
जिसने क्षबना दिया है हमें आलसी,
क्या विज्ञान महामानव बन गया है।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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2भा. 4/2/2019(सोमवार)बिषयःकागजःः
कागज कलम दवात से,
सुखद साहित्य सृजन करना चाहूँ।
अपने मनोभाव मोती से,
हे वीणावादिनी मै शुभ करना चाहूँ।
गर दे मात मुझे आशीष तू,
मेरा साहित्य सृजन सफल हो जाऐ।
जब चाहूँ सुंन्दर लिख पाऊँ,
ये नश्वर शरीर माँ निष्फल नहीं जाऐ।
मन के भाव सदा लिख पाऊँ,
जो हो स्वतंत्र स्वछंद बिचार लिखूं मै।
नहीं डिगूँ कर्तव्य पथ से अपने,
नहीं चापलूसी मां सद्सार लिखूं मै।
हृदय दवात मेरी बन जाऐ
सिर्फ प्रेमप्रीति इसमें स्याही भर आऐ।
जन मनोरंजन कागज से तो
लाग लपेट नहीं सब छन बाहर आऐ।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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1भा.4/2/2019(सोमवार )बिषयःःः कागजःःः
कोरा कागज कहां रहा ये,
मेरा दिल गंदला है भगवन।
ऐसा कर दें इसे अखिलेश्वर
जिससे बन जाऐ ये पावन।
भजन श्रीराम के लिख पाऊँ।
उनके यश कीरत गुण गाऊँ।
प्रभु हृदय प्रकाशित कर दें मेरा,
कोरा कागज भले रह जाऊँ।
गीत मीत के भजन लिखूं मैं।
प्रेमप्रीति कर मनन लिखूं मै।
कागज अगर साफ स्वच्छ हो,
इसपर शुभ स्वजन लिखूं मै।
मन ये कोरा कागज बन जाऐ ।
सुखद साहित्य सृजन हो पाऐ।
नित चित्रबिचित्र उकेरूं इसपर ,
ये खुशियां सारे जगत को लाऐ।
नहीं वैर भाव के गीत लिखूं मै।
रागद्वेष नहीं सदप्रीत लिखूं मै।
जब भी रहे उर कोरा कागज,
प्रभु सृजन करूं संगीत रचूं मै।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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भा.3/2/2019(रविवार)लघुकथा लेखन ः
शब्दःःः आदतःःः
विधाःःः गद्य
हमारे अनेक साथी अपनी बुरी आदतों के कारण असमय ही काल कवलित हो चुके हैं।
आज मै इसी संदर्भ में एक लघुकथा के रूप में सभी को बताना चाह रहा हूँ।
मेरे साले सा.स्व.श्री मोहनसिंहजी को कुछ नशा करने की आदत पड गई थी वह सिगरेट पीने के आदी हो गये थे फलस्वरूप उन्हें कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की शिकायत
हो गई।हम इन्हें भोपाल के कैंसर हास्पिटल में जांच करवाने ले गये वहां परीक्षण उपरांत कैंसर जैसी बीमारी की वास्तविकता का पता चला।इन्हें डाँ. सा.ने भविष्य में किसी भी प्रकार का नशा नहीं करने के लिए आगाह किया।मैने भी इन्हें काफी समझाया।
डा. सा.से साले सा. बोले यदि सिगरेट पीने से ही कैंसर होता है तो हमारे बहनोई तो सुपारी भी नहीं खाते थे फिर इन्हें क्यों हुआ।
डा.सा.का प्रतिउत्तर सुनकर मैं भी अवाक रह गया उनका कहना था कि कोई जरूरी नहीं यह भी सिगरेट पीते हैं इन्हें आप जैसे लोंगो के पास बैठने से भी हो सकता है क्योंकि
जो भ धुआं निकलता है वह पास बैठे हुए
मनुष्य के अंदर भी पहुंच जाता है।जो धुंआ वातावरण में रहता है वह हमारे फेंफडों मेंभी जाता है।
खैर स्व.मोहनसिंह जी का आपरेशन भी कराया इनसे परहेज़ भी कराया गया परंतु चोरी छिपे यह सिगरेट पी लेते थे।
फिर और अधिक स्वास्थ्य खराब होने पर
यह अपने बच्चों के साथ हास्पिटल आते जाते रहे आयुर्वेदिक इलाज भी कराते रहे मगर कोई लाभ नहीं हुआ।
साले सा. स्वयं एक शिक्षक( प्रधानाध्यापक)
थे फिर भी नशे की आदत नहीं छोड सके।
अनेक तरह की दवाओं का सेवन करने के बाद भी यह नहीं बच सके आज हमारे बीच नहीं हैं मुख्य कारण अनावश्यक लत नशे की आदत ने इनकी जान ले ली।
हमें भी ऐसी आदतों के प्रति सभी को सचेत करना चाहिए।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म।प्र.

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4 भा.3/2/2019(रविवार)बिषयःःः
अन्न,भोजन,आदि की रोकें बर्बादीःः
विधाःःः काव्य
अन्न देव का हो नहीं अपमान।
यह हैं हम सबके ही भगवान।
भोजन कहीं यूं व्यर्थ नहीं जाऐ,
परीक्षण कर लेते नहीं संज्ञान।
जितनी जरूरत उतना लेवें।
बेकार कभी नहीं जाने देंवें।
जूठा कुछ खाने को मजबूर,
भरपेट खाऐं कम कम लेवें।
शादी व्याह में भोजन फेंकते।
हमें खाने से कोई नहीं रोकते।
यहां राजनीति गरीब पर होती,
तो कुछ गरीब क्यों भूखों मरते ।
निश्चित कर दृढ संकल्प करें हम।
नहीं अनाज कहीं बर्बाद करें हम।
किसान उत्पादन करते मेहनत से,
सच्चाई जांचें तब भोजन करें हम।
वादस्वरचितःःः
इंजी.शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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7भा.2/2/2019( शनिवार)बिषय ःःखिलौना,नटखट,बालमन
क्यों खिलौना बन गया है आदमी।
दीवारों में दफना रहा है आदमी।
माँबाप बन रहे औलाद के दुश्मन,
आज पेट में ही मर रहा है आदमी।
क्यों संतान की वैरी माता हो गई है।
भ्रूण हत्याऐं नित निश्चित हो गई है।
माया का अब खिलौना बनी दुनिया,
केवल स्वार्थ के वशीभूत हो गई है।
कोई मतलब नहीं रहा हमें अपनत्व से।
नहीं कोई मतलब रहा मां को स्वत्व से।
पता नहीं कहां मर गई हमारी संवेदनाऐं,
दिखाई देता है बंचित बालमन ममत्व से।
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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5भा2/2/2019( शनिवार)बिषयःखिलौना ,नटखट, बालमन,
विधाःःः पिरामिड ः
1)
हे 
मन
खिलौना
क्यों डोलता
कठपुतली
ईश्वर बोलता
कौन वैर घोलता।
2)
क्यों
खेल
दुश्वार
बालमन
सदावहार
फुटबॉल प्यार
उछालते कदम
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय

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6 भा.2/2/2019(शनिवार )बिषयःखिलौना, नटखट, बालमनःःःविधाःःहाइकुःःः
1)
कठपुतली
खिलौना भगवान
कौन महान
2)
ये बालमन
खेलता स्वाभिमान
जीवंत मान
3)
क्यों नटखट
तू चुलबुलापन
सुहाता जन
4)
चंद्र तोडता
क्यों खिलौने फोडता
मुंह जोडता
5)
माटी जीवन
खेलता बालमन
पहलवान
स्वरचितःःः
इंजी.शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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2 भा.2/2/2919( शनिवार)बिषयःःखिलौना, नटखट, बालमनः
विधाःःः गीतलेखनःःः
मै माटी का एक खिलौना
टूट जाऊँ कब पता नहीं है।
खेले मुझसे सारी दुनिया।
तुम भी खेलो कृष्ण कन्हैया।
इधरउधर फेंकें सब मुझको
माया ठगनी मुझे बनाया
कैसे क्या बतलाऊँ तुमको
क्यों झंझट में मुझे फंसाया।
सदा रहे यह आनाजाना
मै माटी का एक खिलौना।............
नटखट श्याम सलोने मेरे
हम सब घनश्याम खिलौने
महिमा जिसकी अपरंम्पार।
सिर्फ चाहिए उसका प्यार
तूने बनाया हमें खिलौना
मै माटी का एक खिलौना।.........
ध्यान लगाऊँ प्रभु चरणों में
अलमस्त रहूँ ईश भजनों में।
टूट फूट चलती रहे मेरी
तू चाहे जो मर्जी मेरी ।
तेरा ही मैं बनूँ बिछोना।
मै माटी का एक खिलौना.........
तू सबका है नटवरनागर
तुझे उतारैया है भवसागर
कृपादृष्टि तेरी हम पाऐं।
क्यों सृष्टि यह हमें लुभाऐ।
बस श्याम हमें बंशी सुनाना
मै माटी का एक खिलौना।............
स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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2.भा.1/2/2019( शुक्रवार)
बिषयःःइंसानः
विधाःःः मुक्तक
प्रभु चाहूँ तुमसे मै यही एक वरदान।
सदाचार करूँ रहूँ सही एक इंसान।
जीवन परोपकार पुरूषार्थ में बीते ,
करें कुछ ऐसाकि तुम्हीं एक भगवान।
इंसान इंसानियत ही भूल गया अब।
सच काबिलियत ही भूल गया अब।
संवेदनशील कोई दिखाई नहीं देता,
क्यों कैसे अकस्मात भूल गया सब।
आपस में कुछ मेलजोल बढाऐं हम।
एकदूजे से सीखें कुछ सिखलाऐं हम।
सहयोग करें मिलजुलकर रहकर ही,
क्यों नहीं अपना अपनत्व दिखाऐं हम।
स्वरचितःःःस्वप्रमाणित
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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भा. 31/1/219( गुरुवार)तांका लेखन प्रतियोगिता से इतरःःबिषय शब्दःःःमूल्यःःः
1)
अपना मूल्य
परिणाम प्रतीक्षा।
स्वयं समीक्षा।
जीवन प्रभावित
सांसारिक अपेक्षा।
2)
मूल्य महिमा
महानता गरिमा
गुण बिशेष
व्यवहार मानव
बिखरता गौरव
स्वरचितःःः.
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र।


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1भा. 29/1/2019(मंगलवार )बिषयःःसंतःः
विधःःःकाव्य ःमुक्तक
संत असंत यहां मिलते हैं।
संत सुसंगति से मिलते हैं।
पहचान करें कैसे हम सब,
संत समाज में ही मिलते हैं।
मनमंदिर में संत छिपा है।
ढूँढें इसको कहीं लुपा है।
अंतस में झांका जब मैने,
संत कहां ये पता चला है।
संत सद्व्यवहार करते हैं।
संत सदा सदाचार करते हैं।
कर पुरूषार्थ मान पाते सब,
उनका चरण स्पर्श करते हैं।
संत समागम होता रहता है।
हमें सदानंन्द होता रहता है।
संत अहिंसक दया के सागर,
संत सत्यप्रेम बोता रहता है।
तुलसी संत कबीर सूरदासजी
मीराबाई अहिल्या अनुसुइया।
जन्में संत अनेक भारतभू पर
संत बताऐं जग भूल भुलइया।
प्रवचण सुनें साधुसंतों के हम।
हृदयांगम करें सदविचार हम।
संतों की जीवनशैली से सीखें,
कितने धर्मज्ञान पा सकते हम।
स्वरचितःःः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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भा.19/6/2018( मंगलवार) फरिश्ता ः
फरिश्ते हर समय जन्म नहीं होते।
फरिश्ते हर किसी को नहीं मिलते।

फरिश्ते धरा पर तभी आते हैं जब मानवमूल्य ह्रास होते इन्हें दिखते।

बढते अत्याचार जब इस धरती पर,
भगवान अवतरित निश्चित ही होते।
फरिश्ते तभी आते हैं इस धरनी पर,
जब उनसे दुराचार सहन नहीं होते।

फरिश्तों का रूप निश्चित नहीं होता।
कहाँ मिल जाऐं सुनिश्चित नहीं होता।
परमात्मा सहायता सबकी ही करते हैं,
किस रूप में आऐं नियत नहीं होता।

फरिश्ता वही जो समय पर काम आ जाऐ।
बिगडी परिस्थितियों में जो काम आ जाऐ।
मानवीयता हमें तभी सच्ची दिखाई देती है,
जब ये मानव फरिश्ते सा बक्त पर आ जाऐ।
स्वरचितः
इंजी शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
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भा.21/6/2018( गुरुवार)शीर्षकःचंचलःःः विधाःः कविता ःः
बस यही प्रार्थना है परमेश्वर,
ये चंचल मन वश में हो जाऐ।

नहीं भटके ये इधर उधर अब,
श्री राम भक्ति में लग जाऐ।
भटक रहा मन अकारण यूंही,
लगा रहता है अपनी मस्ति में।
तत्पर रहता अशुद्ध कर्म करने
नहीं लगता है भगवतभक्ति में।
मन बहुत चलायमान भगवन,
इससे बडा नहीं चंचल दिखता।
बहुत सताता है ये हम सबको,
अभी यहाँ पल में कहीं पहुंचता।
चंचल चपल जटिलता मन की
इसकी गति प्रभु अपरंम्पार ।
वैज्ञानिकों का पता नहीं इसे,
अभी पकड़ नहीं सका संसार।
स्वरचितः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.


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भा.22/6/2018(शुक्रवार )शीर्षकःकवि ः
कवि के शब्दों में छिपी तलवार होती है।
कवि की वाणी ही अप्रत्यक्ष वार होती है।

देख लें पलटकर इतिहास के पन्ने अगर,
कवि की हुंकार वीरों का प्रहार होती है।

कविता ही कवि का आभूषण होती है।
रचना कवि का सुंन्दर भूषण होती है। 
अश्लील रचनाओं से नाम नहीं होता,
फूहडपन की रचनाऐं प्रदूषण होती हैं।

नहीं पहुंचता तन वहाँ कवि पहुंच जाता है।
कवि पाताल में से भी खजाना ढूँढ लाता है।
रचनाकारों से कोई कुछ छिपा नहीं सकता,
कवि आसमान में से भी तारे तोड लाता है।

कवि की आँख में दुरवीन लगा रहता।
इसी सहारे मसाला ढूँढने लगा रहता।
साहित्यकारों को त्रिनेत्र शिव से मिला,
इसीलिये साहित्य सृजन में जुटा रहता।
स्वरचितः ं
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म।प्र.

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.25/6/2018( सोमवार)शीर्षकःभाव ः
ये मनोभावनाऐं ही हर
मानव मन की अभिव्यक्ति होती है।

मन में उठते अपने भक्ति भाव,
वही सच्ची मन की भक्ति होती है।
मनोभाव निरंन्तर बदलते रहते है ,
इनमें छिपी कोई अदृश्य शक्ति होती है।
भाव भंगिमाऐं परिवर्तित होती रहतीं हैं,
इनपर अपना काबू नहीं रहता।
मनोभावनाओं कामनाओं पर
कभी किसी का जादू नहीं चलता।
भाव कभी भक्ति के उठते हैं तो,
कभी पल भर में ही बदलते हैं।
भाव अगर हृदय से निकले तो,
निश्चित माधुर्य बखेरते हैं।
कभी दया भाव जाग्रत हो जाता
कहीं मिलने दिल मचलते हैं।
कभी भाव चेहरे पर परिलक्षित होकर
मन के भाव बताते हैं।
कभी किसी मानस पटल पर उठते
क्रोधित भाव बताते हैं।
हमने अपने घर में देखा है
अपनी माँ की ममता का भाव।
सामाजिक जीवन में देखा
कुछ लोगों में समता का भाव।
कुछ नहीं कह सकते हम
भाव विव्हल मानव के बारे में
कभी कहीं दिख जाता हमको
मन में उठती घृणा का भाव।
जैसी मनोभावना होती हैं अपनी
उसी रूप में मन समझता।
तुमने जैसा भाव बनाया,
वैसा ही ये मष्तिष्क मानता।
स्वरचितः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.


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भा.27/6/2018(बुधवार )शीर्षकःमिलनःःः
मेरा मिलन ईश से हो जाऐ।
मन लीन भक्ति में हो जाऐ।

छूटे इस जगत मोह से बंधन,
प्रभुजी भव से मुक्ति हो जाऐ। 

व्याह के पश्चात बिदाई होती है।
मिलन के बाद जुदाई होती है।
नियति बनाई भगवान ने ऐसी,
एकदिन काया से मुक्ति होती है।

ये जीवन चक्र यूंही चलता है।
मानव थकता कब रूकता है।
प्रकृति के नहीं नियम बदलते,
मानव जो करता वैसा भरता है।

आज आऐ हैं कल जाना होगा।
हमें अपना कर्तव्य निभाना होगा।
सांसारिकता के जो नियम बने हैं,
उनका पालन करना कराना होगा ।

दुख से सुख का मिलन होता है।
चंदा का चांदनी से संगम होता है।
सबके निश्चित नियम प्राकृतिक हैं,
जुदाई अपना जुडा मिलन होता है।
स्वरचितः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना, गुना म.प्र.

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शीर्षकःसुबहःःः
प्रतिदिन सुबह की शाम होती है।
कभी कालिमा घनश्याम होती है।

करते रहें निरंन्तर प्रभु ध्यान तो,
सुबह सुखद सुंन्दर शाम होती है।

प्रार्थना हमें सहारा सुबह शाम देती है।
वतन से वफाऐं सदा सदनाम देती हैं।
महकता प्रफुल्लित रहे जीवन हमारा,
ये आशीष सदैव शुभकामनाऐं देती हैं।

नहीं सोचें परोपकार अहसान हो जाऐ।
किसी के काम आऐं इंन्सान हो जाऐं।
करलें कुछ शुभकाम तो ठीक है वरना,
क्या पता जिंंदगी का अवसान हो जाऐ।
स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना, गुना म.प्र.
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हृदय के आईने में निहारूँ सियाराम को।
दिल के आईने में निहारूँ सीताराम को।

निर्मल हो जाऐ कहीं मेरे मन का आईना,
निश्चित निशदिन मै निहारूं घनश्याम को।

कैसे करूँ साफ अपने दिल का आईना।
प्रभु धरूँ ध्यान फिर देखूं मनका आईना।
हृदय पटल उज्जवल कर पहुचूँ सामने ,
दर्प छोड निहार सकूँ आत्मा का आईना।

रागद्वेष से पुता हुआ सब मेरा ये आईना।
वैरभाव से लिपा हुआ सब मेरा ये आईना।
आत्मग्लानि से सना आत्मावलोकन करूँ,
बर्षों से धूल चढी साफ करूँ मेरा ये आईना।

ईश कृपा से ही साफ कर सकूँ मै ये आईना।
भक्ति भजन से कहीं धो सकूँ मै ये आईना।
 मनोविकारमुक्त हो अगर अभिमान हट सके,
निश्चित ही चमकदार बना सकूँ मै ये आईना।
स्वरचितः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना, म.प्र.
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गुरूर करूँ किस बात का मै,
यहाँ मेरी क्या औकात है।
जो कुछ भी मिला मुझे सब,
उस अखिलश्वर की सौगात है।

मात्र दिखावा करता हूँ मै,
सब बनावटी है ये मस्ती।
जीवनाधार प्रभु चरण हैं मेरे,
नहीं कुछ भी है मेरी हस्ती।

तनमनधन सब उसका है तो,
गुरूर करूँ किस चीज का मै।
सबकुछ ही जब उस दाता का,
क्यों किसका अभिमान करूँ मै।

ये महिमा तो उस परमेश्वर की है,
क्यों नहीं उसका गुण गाऊँगा।
मै तो केवल मिट्टी का पुतला हूँ, 
एकदिन मिट्टी में ही मिल जाऊँगा।

सर्वस्व यहीं छोडकर जाना है,
इस रजकण में मिल जाऊँगा।
सदकर्म किऐ कुछ मैने तो फिर,
इस मातृभूमि पर खिल आऊँगा।
स्वरचितः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.



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हे प्रभु मै चाहूँ उत्सव घर घर होय।
इसमें झूमें सभी ये पसंद हर कोय।

उत्सव मिलजुलकर ऐसे मनाऐं कि
हंसमुख चेहरे खुशियाँ हर घर होंय।

उत्सव मन की बात है जब चाहे मनाऐं।
संगसाथ परिवार के मित्र पडौसी बुलाऐ।
निर्मल तनमनधन लगे परोपकार में सब,
प्रेमोत्सव में सबको मिलकर खूब हंसाऐं।

उछलकूद करें सभी अपने बच्चों के संग,
उत्सव सबको भाते हैं राजा रंक या भूप।
नहीं चाहें कोई बुराई दिखे ऐसा पर्व मनाऐं,
कूडा करकट अलग करें ज्यों करता है सूप।

होली दिवाली ईद सब उत्सव कहलाते।
हिंदू मुस्लिम भाई मिलकर खूब मनाते।
उत्सव में नहीं देखते जातपात हम लोग,
जो देखें मानें ऐसे सब विध्वंसी कहलाते।
स्वरचितः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
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प्रभु कलम सद् साहित्य सृजन करती रहे।
मेरी कलम सदा तुम्हारे भजन लिखती रहे।

कलम चले ऐसी चले हे परमेश परमपिता,
यह रूके नहीं कुछ मादरे वतन लिखती रहे।

कलम लिखे तो कुछ समाजोपयोगी बने।
कलम लिख सके वही जो सदुपयोगी बने।
जब कलम हाथ में थामूँ हो सुखद सृजन,
लिखूँ तो हे परमात्मा जो जनोपयोगी बने।

कलम चलाऊँ जिसमें मातृभूमि विजय हो।
कलम चलाऊँ जिसमें मेरे वीरों की जय हो।
कलम सदैव चलती रहे मेरी ये अखिलेश्वर,
जिसमे सदियों तक माँ भारती की जय हो।

लिखूँ तो ऐसा कि मै झकझोर सरकार दूँ।
लिखूँ कुछ व्यभिचारियों को तिरस्कार दूँ।
गर चले कलम मेरी कहीं तो ऐसी चले प्रभु,
लिखूँ तो कुछ ऐसा कि समाज को उपहार दूँ।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
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ईश्वर की ही है ये सब माया ,
जो भी देखते हम सब रचना।

सुबह शाम दिन रात बनाऐ,
सुंन्दर सुखद प्राकृतिक रचना।

यह हरित धरा हरयाली छाई।
रक्तिम रश्मियां रवि की आई।
मोती समान जो चमकती बूँदे,
ओस की हैं जो सब प्रकृति लाई।

जीव जंन्तु सभी प्राणी बनाऐं।
ताल,तडाग, तरू ईश बनाऐ।
सुंन्दर बाग बगीचे ये फुलवारी,
प्रभु ने यहाँ मधुरम दृश्य बनाऐ।

प्रकृति की सब अलौकिक रचना।
यहाँ कितनी अजीब अद्भुत रचना।
सुखद अनुभूति होती है हम सबको,
जब हम सबजन निहारते हैं ये रचना।

परमपिता परमात्मा परमेश्वर,
ये सभी नाम तो हैं इस ईश्वर के।
राम, रहीम, ईशा, गुरूनानक जी,
हम सभी वंन्दे हैं अखिलेश्वर के।

जीवन मरण सब है ईश के हाथों में
इन पर नहीं चलता जोर किसी का।
क्षणभंगुर है जब ये जीवन अपना,
क्यों दुखाऐं हम हृदय किसी का।

आओ मिलजुल कर प्रेमाश्रय ढूँढें,
प्रेमपूर्ण हम ये सुखी जीवन जी लें।
सुसंस्कार और मर्यादाओं में रहकर,
हम इस जीवन को मनभावन जी लें।
स्वरचितः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना, गुना म.प्र.
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कितना भी प्रयास करे कोई ,
भावनाऐं हमारी बदल नहीं सकते।

जबतक हम स्वयं नहीं चाहें,
कामनाऐं हमारी बदल नहीं सकते।
इंन्द्रियों को दूसरा कोई वश में 
कभी कर नहीं सकता
जबतक हम मानसिक रूपसे
ये दुर्भावनाऐं बेदखल नहीं करते।

इन प्रवृत्तियों पर कोई नहीं 
हम स्वयं लगाम लगा पाऐगे।
यह तभी संभव होगा जब हम
सुसंस्कृति संस्कार अपनाऐंगे।
मानवीय संवेदनाओं को हमें
मनसे कभी दूर नहीं करना,
कामनाऐं परिमार्जित करें हम,
तभी शुद्ध मानस बना पाऐंंगे।
स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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प्रभु चरणों में जो पुष्पार्पण करते।
सभी इस बसुधा से हमको मिलते।
बृक्षारोपण से हरीतिमा छाऐ तब,
हृदय सुमन हम सबके ही खिलते।

आओ मिलजुलकर हम बृक्ष लगाऐं।
इस वसुंधरा को अपने हाथ सजाऐं।
रंगबिरंगी पुष्पित फुलबगियां हो ये,
हम हरित क्रांति दुनिया में फैलाऐं।

ऐसी हरीतिमा कर दें हम पृथ्वी पर,
मनमयूर सबका पुलकित हो जाऐ।
 देखें इसे जब इस जगत के प्राणी,
उन सबके मन प्रफुल्लित हो जाऐं।

हरीभरी वसुधा हमको खुश कर देगी।
ये अप्रतिम खुशियाँ मनको हर लैंगी।
हृदय कुसुम अपने खिल जाऐंगे जब,
हरित क्रांति हरीतिमा यहाँ बिखरेगी।

सुखद प्रसून खिलाऐं सब धरनी।
मधुर फलों से लदी हो यह अवनी।
फल खाऐंगे इसके हम सब प्राणी,
माँ भारती भारतभूमि सब अपनी।
स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
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महके गुलदस्ता हर बस्ती का।
तू ही खिवैया है हर कश्ती का
महके कुसुमित हो फुलबगिया,
दिखे नजारा प्रभु की हस्ती का।

हृदय सुमन सबके खिल जाऐं।
रागद्वेष हम सबके धुल जाऐं।
महका दो तुम ये भारतभूमि,
कण कण में सोरभ घुल जाऐ।

महकें तन और सुरभित हों मन।
सुगंधित हो हर दिल का गुलशन।
मानवीयता सहिष्णुता के आभूषण,
परमेश्वर पहने इसभारत का जनजन।

मानव मानस का मनोरंजन हो।
सबके दुखद कष्टों का भंजन हो।
भयभीत किसी से हो नहीं प्राणी,
महकें अखिलेश अलख निरंजन हो।

सुरभित सुगठित शरीर विकसित हों।
नहीं ये जीवन पर्यावरण प्रदूषित हो।
रहें सदा चहकते सभी प्रभु बालवृन्द,
जो भी हो सब हर्षित यहाँ सुघटित हो।
स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी "अजेय"
मगराना गुना म.प्र.

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सुखद सबेरा हो सबका,
प्रभु भक्ति में लीन रहें।
रहें सुखी सभीजन जग में,
नहीं कोई गमगीन रहे।

ईश प्रार्थना करूँ सबेरे,
प्रभु ऐसा मुझे आशीष मिले।
क्या चाहिए मुझे जीवन में,
गुरूजनों का शुभाशीष मिले।

हृदय निर्मल हो जाऐ मेरा, 
कुछ किसी के काम आऊँ।
चंद दिनों के इस पुतले को,
सुखद सृजन में लगा पाऊँ।

कुत्सित विचार भावनाओं से,
रोज सुबह सबेरे मुक्ति पाऊँ।
अंतर्मन प्रफुल्लित हो जाऐ,
ईश विनय कर भक्ति वर पाऊँ।
स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.



क्यों नहीं पहुंचा संन्देश हमारा
अभी तुझ तक मेरा हे भगवान।

तुम मस्त पडे हो क्षीरसागर में
यहाँ परेशान होता हर इंन्सान।

हम कितनी और मुसीबतें झेलें,
इधर विह्वल व्याकुल है जनजन।
संतापों से प्रभुजी बचा ना कोई,
व्यथित हुआ यहाँ हर जन मन।

संन्देशे बहुत पहुंचाऐ गिरधारी,
मस्त घूम रहे कहीं गगनविहारी।
कहाँ कहाँ नहीं देखा तुम्हें हमने,
ढूँढें सब वन मधुवन कुंजविहारी।

बहुत हुआ अब सुधि लेलो बनवारी,
कुछ सुखशांति से जी लें हम भगवन।
ये दुनिया बहुत दुखित है मुरलीधर,
अब सबके कष्ट निवारें दुखभंजन।
स्वरचितः ः
इंजी.शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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तस्वीर रहे प्रभु की हृदय में,
बदलेगी निश्चित ये तकदीर।

सतकर्म करें भक्ति भाव से,
बदल सकें सांसारिक तस्वीर।

काम क्रोध मोह लोभ बसा है,
यहाँ जन जन के मानस में।
परमेश्वर को हम नहीं मानते,
जब रागद्वेष सबके मानस में।

तस्वीरें टांगें कुछ नहीं मिलता,
सुंन्दर छवि सुखद भावना हो,
रहें सभी सुखीजन दुनिया में,
नहीं कोईभी दुखद कामना हो।

मनमंदिर गर दूषित है अपना,
प्रतिदिन पूजा करें तस्वीरों की।
नहीं कर सकते परोपकार हम,
छोड सपन दें शुभ तकदीरों का।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.




हम सेना के वीर सिपाही,
आगे कदम बढाऐंगे।

जो भी मिलेगा दुश्मन देश का,
उसको मार भगाऐंगे्।
अपनी भारतमाता की रक्षा ही
अब हमें हमेशा करनी है,
तिरछी आँख से जिसने देखा
पाक उसे पहुंचाऐंगे।
जन्म लिया है इस धरती पर
एकमात्र कर्तव्य हमारा।
धन दौलत क्या है इसकी खातिर
न्यौछावर सर्वस्व हमारा।
सब कुछ मिला है जन्मभूमि से,
इसपर तनमनधन अर्पण
इस मातभूमि की सेवा हेतु
तत्पर हम, प्राणोत्सर्ग हमारा।
हम भारत माता के वीर सपूत हैं
हम पर कभी अविश्वास ना करना।
यही चाहते भारत की जनता से,
नहीं विवादित सेना को करना।
हम सैनिक मर्यादाओं में रहते
जाति धर्म का भेद न करते
आप सभीजनों से बस यही निवेदन
नहीं अमर्यादित हमको करना।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म,प्र.
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पलकें उठाऊँ तो प्रभु दर्शन हों।
पलकें झुकाऊँ सबशुभ मंगलहो।

नहीं कोई दिखे मुझे यहां दुखी,
प्रभु सबका ही दुख भंजन हो।

नहीं पलकें कभी दुख पीडित हों।
नहीं कोई जन किसी से तृषित हो।
परमेश्वर प्रेमाश्रय हो इन पलको में,
इस जग का जन जन पुलकित हो।

मेरे सदा पलक पांवडे बिछे रहे ,
आतिथ्य अतिथि का कर पाऊँ।
कोई नहीं जा पाऐ भूखा प्यासा,
 यहाँ कुछ परमार्थ भी कर पाऊँ।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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सावन आया आओ कन्हैया,
झूला तुम्हें झुलाऐं।
मनमयूर कैसे हर्षित होता है,
तुमको यहाँ बताऐं।
स्याह घने बदरा छा रहे,
रिमझिम मेह बरसता है।
तेरे दीदार को मेरे कान्हा,
सबका दिल तरसता है।
मनोरम दृश्य दिखाई देते,
चहुंओर हरयाली छाई है।
मनभावन जी बहुत सुहावन,
ये बर्षा खुशहाली लाई है।
सावन ने सबके मन मोहे,
दादुर झींगुर तान सुनाते हैं।
मधुर कुहकती कोयलिया कुछ,
राग मेघ मल्हार सा गाते हैं।
भर गऐ ताल तलैया सारे,
पूरे यौवन में नदियां बहती हैं।
चलो चलें सब मौज मनाऐं,
ये सब तुमसे सखियां कहती हैं।

स्वरचित ः
इंजी शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना, गुना म.प्र.


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गोधूलि वेला को कहते हैं हम संध्या
जब आते हैं जंगल से पशुधन गायें भैसें

जिनके होते थे हरकारे अपने कृष्ण कन्हैया।
कलरव करते आते हैं पक्षी अपने नीड में सोने।
अपने बच्चों से मिलकर खुश होते हैं ये
चहक चहक कर इनके छौने चाहें बिछौने।
संध्या वंदन करते हैं कुछ पंडे और पुजारी।
करते भक्ति भाव से पूजन दर्शन दें त्रिपुरारी।
संध्या जाऐ रात घिर आऐ फिर से जग में
प्रतिदिन होय सबेरा ।
इसी चक्र में चलता जीवन मानव एक चितेरा।
सुबह शाम गैया दुहते हैं ग्वाले।
दूध अपने बच्चों को कुछ बछडों के हवाले।
हलधर सुबह सांझ खेतों में आते जाते
निशदिन अपनी खेती करते।
जीवन मरण भरण पोषण के चक्रव्यूह में
फंसा है फंसा रहेगा हर प्राणी इस जग का
यही नियति का खेल है प्यारे . . हम सब उसके राजदुलारे।
प्रभु के हाथों की कठपुतली हम
चाहे जैसा नाच नचाऐ।
हमको उसकी शरण में रहना है वो चाहें
खुश रक्खे या रूलाऐ।
सुबह सांझ वंदन करते रहे
यही चाहते हम ईश्वर से।
सबजन सुखी रहें मिलजुलकर
बस यही मनोरथ परमेश्वर से।
स्वरचित
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय

मगराना गुना म.प्र.
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प्रकृति ने ओढी रंगीन चुनरिया,
यहाँ चहुंओर हरयाली छाई है।

हरित परिधान पहनकर जैसे,
खुशियाँ वसुधा पर फैलाई हैं।

रंग बिरंगे फूल खिले हैं,
धरती के इस गुलशन में
प्रकृति पुलकित होती है,
खुशबू फैलाती जनजन में।

गिरगिट जैसे रंग बदलता,
कैसे ये सभी जानते मानव।
आज हाथ में फूल लिए हैं,
कल बन जानता है ये दानव।

रंग तिरंगा भारत के झंडे का,
कुछ कैनवास पर खींचे चित्र।
इंन्द्र धनुष धरा पर सजता है,
रंगे सुंंन्दर आकाश लगे बिचित्र।

सतरंगी रंगों में रंग लें हम दिल को
कुसमित और प्रफुल्लित होये मन।
सौहार्दपूर्ण वातावरण रंगों में भीगें,
सुरभित रंगीन आनंन्दित होये जन।

स्वरचित ः

इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
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नहीं दिल में लगे आघात लाया हूँ।
मै कन्हैया प्रम की सौगात लाया हूँ।
सुनते रहें मुरलिया कानों में कन्हाई,
बहुत ढूँढकर इन्हें मै साथ लाया हूँ।

प्रेम की सौगात सबको हो मुबारक।
खुदा की इबादत सबको हो मुबारक।
स्नेह सरिताओं की धारा निरंन्तर बहें ,

 प्रेम की मुलाकात सबको हो मुबारक।

प्रेम की सौगात प्रभु ने बांटी बहुत हैं।
यहाँ सुहावन रात हमने काटी बहुत हैं।
कुछ दिनों से फिजाओं में फैला जहर,
फिर भी जलाईं प्रेम की बाती बहुत हैं।
साहित्य सृजन मै करूँ हो प्रेम सिंचित।
नहीं दिखे जगत में कोई जो प्रेम बंचित।
मिली जो तुझसे प्रेम की सौगात मनोहर,
नहीं हो कभीे वसुंधरा प्रभु ये रक्त रंजित।
स्वरचित ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय


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रिमझिम रिमझिम बदरा बरसें।
पिया मिलन को हम तो तरसे।
ऋतु सुहानी आई रे
भन को बहुत लुभाई रे।
मनमयूर पुलकित होता 
जब नेहा मेह बरसता है।
कुहु कुहु बोले कोयलिया,
जैसे कंठ नेह हर्षता है।
सावन भादों की छवि आई रे। सुहानी................
हरित ओढनी ओढी धरती ने
रंग बिरंगी चूनर ओढी धरनी ने
फूल खिले हैं रंगबिरंगे
झूम उठे अब खूब पतंगे
ऋतु सुहावन आई रे।
ऋतु सुहानी..................
मेघ मल्हार सुनाते मेघा
जैसे हरषित हुए सब देवा
पावस ऋतु आई तो समझें
प्रफुल्लित हुए सब देवी देवा।
ये ऋतु हरसाने आई रे
ऋतु सुहानी.............
टर्र टर्र मेंढक टर्राते
झींगुर अच्छा राग सुनाते
उडगन उतर उतर कर जैसे
रस्ते शायद हमें बतलाते।
अब तो वसुधा खुश होई रे।
ऋतु सुहानी..........
ताल तलैया पूरे भर गये
बांध लवालव पूरे भर गये। 
रिमझिम रिमझिम बरसे पानी,
प्यास धरा की पूरी कर गये।
हमें बरखा बहुत सुहाई रे
ऋतु सुहानी.............
चातक मोर पपीहा बोले
पशुपक्षी मानव सब डोलें
हिय प्रसन्न सबही का कैसे,
एकहु राज कोई नहीं खोले।
यह अमृत बरसाने आई रे।
ऋतु सुहानी.................

स्वरचित ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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हर घर आंगन में खुशियाँ आऐं,
यहाँ सब घर घर ही खुशहाल हो। 
नहीं दुखित रहे दुनिया में मानव, 
प्रभु कोई कभी नहीं बदहाल हो।

सदा रहे प्रफुल्लित ये सारा जग ,
चिरशांति हो दीप जलें खुशियों के।
मिलजुलकर यहाँ रहें सभी जन,
सभी कष्टनिवारण हों दुखियों के।

परमात्मा ने जो कुछ दिया है हमको
उस में खुश रहकर खुशियाँ फैलाऐं।
सम्मिलित हो एकदूजे की खुशियों में
क्यों नहीं भारतवासी खुशहाली लाऐं।

यहाँ खुशियाँ की कहीं खेती नहीं होती।
यदि ऐसा होता तो क्या ये दुनिया रोती।
खुशियाँ अगर खरीद सकता कोई फिर,
यह केवल अमीर गरीबों की नहीं होती।

स्वरचित ः
इंजी.शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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जीवन दिया है तो शक्ति भी देना।
कर सकूँ हृदय से भक्ति भी देना।
निभाऊँ उत्तरदायित्व अपने सारे,
हे ईश्वर मुझे इतनी शक्ति भी देना।

लडाई लडूँ तो बुराईयों से प्रभु जी,
नहीं हटूँ दूर कभी सच्चाई के पथ से।
जिंंन्दगी जिऊँ तो सदा ऐसी जिऊँ मै,
नहीं उतरूँ कभी स्व कर्तव्य के रथ से।

दायित्व निभाऊँ सब समाज के लिये मै।
कर्तव्य निभाऊँ कुछ परिवार के लिये मै।
परोपकारी बनकर हमेशा रहूँ हे भगवन,
वलिवेदी पर चढूँ तो स्वदेश के लिये मै।

भय मुझे कभी इन शत्रुओं से नहीं हो।
दुश्मनी मेरी कभी किसी से नहीं हो।
शुभाशीष प्यार सबका ही मिलता रहे
दायित्व निभाने में कोई कसर नहीं हो।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
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भा. 29/7/2018( रविवार)पीडा तो मेरी रानी है ः( बहुत पुरानी रचना)ःः

पीडा तो मेरी रानी है,
मैने इससे प्यार किया है।
बचपन से ले बर्तमान तक
जिसने मेरा साथ दिया है।पीडा तो.........

ओ,प्राणप्रिय मै प्रियतम तेरा
तेरा मेरा एक बसेरा।
अपार नेह को पाकर मैने,
मृत्यु नगर में डाला डेरा।
दुर्गम पथ की बाधाओं से,
हम दोनों ने सुलह किया है।पीडा तो.........

सुख की गंध निकट जब आई,
इसने मुझको आँख दिखाई।
थोड़ा इसने किया इशारा,
मैने तब फिर लिया किनारा ।
वपदाओं से होड लगाने,
सका दामन थम लिया है।पीडा तो..........

हिम्मत इसकी निपट सहेली
जिसकी संगति एक पहेली।
मुझकों तो ये अमृत जैसी,
होगी तुमको विष की वेली।
मैने जिसका हाथ थाम के,
आत्मशांति पथ खोज लिया है।
पीडा तो..........
हर प्रेमी का प्रेम रहे ज्यों,
साथ रहेगा मेरा इसका।
मेरा तो संकल्प एक है,
आशीष चाहिए केवल उसका,
जिसनें परिचय पीडा से करने ही
मृत्युलोक में भेज दिया है।
पीड तो मेरी रानी है,
मैने जिसको प्यार किया है
बचपन से ले बर्तमान तक,
जिसने मेरा साथ दिया है।

स्वरचितः
इंजी शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
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भा. 30/7/2018( सोमवार)शिव,ईश वंन्दनाः

ऊँ जय शिवशंकर जय डमरूधर जय भोलेभंडारी
जय सोमेश्वर जय कामेश्वर जय जय शिव
त्रिपुरारी।
जय कैलाशपति जय कैलाश नाथ जय हो कैलाशी,
जय रामेश्वर जय घृश्नेश्वर जय हो प्रभु घटघटवासी।
जय भाग्यविधाता जय सुखदाता हे शोभा सिंन्धु खरारी।
कष्ट हरें इस जग के सारे हम जाऐं सब वलिहारी।
सोमवार ये सावन मास का सबको ही मन भाये,
हृदय प्रफुल्लित हों सावन में शिवशंकर जनजन हर्षाऐ।

स्वरचितः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

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"भाषा"19 जुलाई 2019

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