अभिलाषा चौहान






"लेखिका परिचय "

नाम:-अभिलाषा चौहान

जन्मतिथि:-15/12/1965
जन्मस्थान:-ग्वालियर
शिक्षा:-एम.ए.,एम.फिल(हिन्दी साहित्य)
सृजन की विधाएं:-कविता ,लघुकथा,संस्मरण ,विचारात्मक लेख आदि।
प्रकाशित कृतियां:-कक्षा-१०से लेकर स्नातक स्तर की प्रतियोगी पुस्तकों
का प्रकाशन।
कोई भी सम्मान:-स्कूल स्तर
पर शिक्षण में सम्मान, भावों
के मोती मंच,उड़ान, साहित्य पीडिया से साहित्यिक सम्मान।
संप्रति(पेशा/व्यवसाय):-शिक्षण कार्य और लेखन।

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विषय-पराग /मकरंद

आया वसंत
खिल उठे पुष्प
उड़ा पराग
ज्यों फागुन में फाग
प्रकृति का सौभाग्य।

उड़े भ्रमर
मकरंद की आस
पुष्प के पास
सौंदर्य में अटका
भ्रम में है भटका।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित, मौलिक
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बहता नीर हूं मैं !
हृदय की पीर हूं मैं !
कभी बन सरिता,
बहा बन पावन निर्मल।
करता सिंचित जीवन,
कभी बना मैं निर्झर,
करूं धरा को उर्वर।
जीवन का अमृत !
सृष्टि की जान !
प्रकृति की मुस्कान !
गाता मेघ मल्हार,
मुझसे ही मेघों का श्रृंगार,
नवजीवन का सृजनकार,
वसुधा का पालनहार,
बहता नीर हूं मैं !!
कभी बना मैं सागर,
कर समाहित,
संसार की समस्त पीड़ा !
खो गई मेरी मिठास,
पीड़ा के अतिरेक से,
अश्रुओं के वेग से,
घुल गया मुझमें छार ।
खो रही निर्मलता मेरी,
कलुषित होती ,
मेरी हर बूंद।
नयनों से बहता नीर,
नीर की बढ़ी है पीर,
प्रदूषित हो गया हूं मैं!
बहते-बहते चुक गया हूं मैं!
खत्म हो रही जिजीविषा।।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित, मौलिक
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चोट
*****************"
कलाकार के सुघड़ हाथ
अनगढ़ पत्थर पर
करते हल्की-हल्की चोट
निखरता पाषाण-रूप
साकार प्रतिमा
बोल पड़ेगी जैसे अभी।
प्रहार
*******************
बार-बार किया प्रहार
झुका पर्वत
पर्वत के समक्ष
बना रास्ता लिया दम
हो गए अमर
दशरथ मांझी।
वार
*****************
तीर-तलवार से
पैनी धार
करे ऐसा वार
दिल पर लगे
आंखें रोए
बने नासूर
वाणी के वार।
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अभिलाषा चौहान
स्वरचित ,मौलिक

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ख्याली पुलाव पकाते हैं,
ख्यालो के महल बनाते हैं।

बातों के बताशे फोडें जो,
वे युवा नहीं कहलाते हैं।

हैं सतरंगी सपने उनके,
घूमें वे भंवरा बनके।

करें हरकतें जो छिछोरों सी,
वे युवा नहीं कहलाते हैं।

फैशन के हैं दीवाने वे,
शमा के हैं परवाने वे।

मांबाप की सारी मेहनत को,
सरे राह धुएं में उडाते हैं।

वे युवा नहीं कहलाते हैं,

जीवन का भार लिए फिरते।
पतन की राह हैं जो चलते,

हैं ऐशो आराम की चाह जिन्हें।
परिवार की नहीं परवाह उन्हें,

वे युवा नहीं कहलाते हैं।

व्यसन जिन्हें अति प्यारा हो,
मेहनत से किया किनारा हो।

दुर्दैव का रोना रोते जो,
वे युवा कहां कहलाते हैं?

समय की बदले धारा जो,
मुटठी में जिनके आसमां हो।

जो चट्टानों से टकराए,
बस युवा वही कहलाते हैं।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित ,मौलिक

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बुरा न मानो होली है!!



प्रगति मैदान में

शायद कोई मेला लगा था।

एक ओर,

एक नेता 

भारत की प्रगति पर,

भाषण दे रहा था।

एक ओर,एक बच्चा

हाथ में कटोरा लिए खड़ा था।

नेता ने कहा,

देश के विकास की ,

योजनाएं बनाई हैं।

विकास कार्य जोरों पर है।

आर्थिक विकास के प्रयत्न

किए जा रहे हैं,

अभी कटोरों की संख्या कम है,

और कटोरे बनाए जा रहे हैं,

लोगों !!!

एक दिन ऐसा आएगा,

जब सभी भेदभाव मिट जाएंगे,

आज कुछ के हाथ में कटोरा है,

कल सबके हाथ में कटोरा थमाएंगे।

इस तरह,

देश का भविष्य बनाएंगे।

देश को उन्नति के ,

चरम शिखर पर पहुंचाएंगे।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित मौलिक

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होली का ये पावन त्योहार,
लेकर आए खुशियां अपार।
आओ मिल मनभेद मिटाएं,
छा जाए चहुं ओर बहार।

भूल जाएं सब बीती बातें,
भूल जाएं घातें-प्रतिघातें।
प्रेम-रंग में रंग कर हम सब,
पा लें जीवन की सौगातें।

क्यों जीवन में कटुता घोलें,
क्यों नफरत के रंग ले हम डोलें।
क्यों न लगाएं खुशियों के मेले,
धुल जाए जिसमें मन का मलाल।

वृंदावन हर घर बन जाए,
कान्हा प्रेम का रंग बरसाए।
तन-मन भींगे प्रेम के रंग में।
राधामय ये संसार हो जाए।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित ,मौलिक

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चिंतन मनन करो समुचित,
चयन करो जो पथ है उचित।
हो गए तुम यदि दिग्भ्रमित,
हो जाओगे सफलता से वंचित।

चयन लक्ष्य जो है अपेक्षित,
परिश्रम हो सदा वांछित।
श्रम से भागे जो किंचित,
फल न मिलेगा कभी इच्छित।

त्याग वासनाएं सदा अनुचित,
सत्पथ, सत्कर्म सदा ही उचित।
आकर्षण यौवन का किंचित,
कर देता है सदा पथ से भ्रमित।

चयन उचित जीवन हर्षित,
चयन सत्संगति जीवन गर्वित।
चयन प्राप्ति सदा मनोवांछित,
चयन सुधर्म जीवन पुष्पित।

अभिलाषा चौहान 
स्वरचित मौलिक



विषय-नारी/वीरांगना

वीरांगनाओं से है सुशोभित देश हमारा,
इनकी वीरता के समक्ष
शत्रु भी हारा।
बन काली-दुर्गा जब ये रौद्र रूप दिखाए,
हो पाप का नाश ,तांडव
मच जाए।
इतिहास के पन्नों पर सुनहरे अक्षरों से शोभित,
गाथाएं अनुपम उत्तम नारी चरित।
सीता बिन राम का क्या है अस्तित्व,
शक्ति के बिना शिव भी कहां
हैं पूरित।
नारी- पुरुषमय ये संसार है सारा,
नारी ने ममत्व से सृष्टि को
संवारा।
कर जौहर अपना सतीत्व बचाए,
शत्रु के लिए चंडिका बन जाए।
अंतरिक्ष तक परचम फहराए,
सीमा पर शत्रु को धूल चटाए।
है कौन सा काम जो उसके लिए है भारी,
सृष्टि-सृजन की भूमिका
निभाए नारी।
अर्द्धांगिनी बन पुरूष को
संपूर्ण करे,
धर्म-कर्म में सहभागिनी बने।
जननी बन कर अपना हर
कर्त्तव्य निभाए,
अपने जीवन को परिजनों
के लिए लुटाए।
मत समझो अबला और कमजोर उसे,
मत समझो भोग्या या दासी उसे।
जो संसार की बनकर बैठी है
धुरी,
उसके हितों पर न चलाना तुम
छुरी।
चुप्पी का यूं तुम लाभ न
उठाना
उसके बिना नहीं तुम्हारा
कोई ठिकाना।
असंभव को संभव जो कर जाए,
नारी बन वीरांगना अपना मान बढ़ाए।

सभी को हार्दिक शुभकामनाएं

अभिलाषा चौहान
स्वरचित, मौलिक
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तकदीर/भाग्य

भाग्य का लिखा कौन पढ़ पाया है,
भाग्य भरोसे जो रहा सदा पछताया है।
भाग्य के लिए पुरूषार्थ जरूरी है,
पुरूषार्थी ने सदा सफलता को पाया है।

दुर्भाग्य का रोना कायरों का काम हैं,
हवाई किले बनाना इनके लिए आम है।
कर्महीन बैठे-बैठे दूसरों को दोष देते,
भगवान तक को कर देते बदनाम हैं। 

कर्मवीरों के लिए कोई कठिन न काम है,
कांटों का ताज पहनना उनके लिए आम है।
मेहनत से अपना सौभाग्य वे बनाते हैं
ऊंचे पर्वतों पर विजय पताका फहराते हैं।

कोशिश करो तो भाग्य बन जाता है,
फिर भी कुछ न मिले दुर्भाग्य कहलाता है।
हिम्मत हार देना मनुष्यों का नहीं,
छोटे से छोटा जीव मेहनत से ही पाता है।

भाग्य के खेल अजब अनोखे हैं,
राजा-रंक के भाग्य बदलते देखें है।
कर्म ही इनके पीछे खड़ा नजर आता है,
जैसा कर्म होगा फल वैसा ही आता है।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित, मौलिक
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सुनसान वादियां
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ये वादियाँ,
ये लहराते दरख्त,
नीले आसमां तले,
नीली आभा में ढले,
दिखते हैं मायूस,
बिखरी नीम खामोशी,
बनती है गवाह हर पल की।

ये शांत सुरम्य वातावरण,
प्रकृति का अनंत सौंदर्य,
अनिर्वचनीय, अद्वितीय,
बन गया पनाहगार,
निर्मम आतंक का।

ये सूने मकान,
ये दरोदीवार,
जीवनोल्लास से रहित,
भय से ग्रसित,
ये जन्नत !!
बन गई कैद खाना,
दुबके घरों में लोग,
हताश व निराश।

छिन गई जीवन की सरलता,
हर और दिखती विकलता,
प्रकृति में भी नहीं सहजता,
जीवन में आ गई दुरूहता।।
चढ़ गयी आतंक की भेंट प्रसन्नता।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित, मौलिक

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चोट
*****************"
कलाकार के सुघड़ हाथ
अनगढ़ पत्थर पर
करते हल्की-हल्की चोट
निखरता पाषाण-रूप
साकार प्रतिमा
बोल पड़ेगी जैसे अभी।
प्रहार
*******************
बार-बार किया प्रहार
झुका पर्वत
पर्वत के समक्ष
बना रास्ता लिया दम
हो गए अमर
दशरथ मांझी।
वार
*****************
तीर-तलवार से
पैनी धार
करे ऐसा वार
दिल पर लगे
आंखें रोए
बने नासूर
वाणी के वार।
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अभिलाषा चौहान
स्वरचित ,मौलिक
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तीक्ष्ण वाणी के प्रहार,
झेलता वह मासूम।
सुबकता,सिसकता,
आंसू पौंछता।
खोजता अपने अपराध,
शनै-शनै मरता बचपन!
आक्रोश का ज्वालामुखी,
उसके अंदर लेता आकार।
शरीर पर चोटों की मार,
बनाती उसे पत्थर!
पनपता एक विष-वृक्ष
जलती प्रतिशोध की ज्वाला!
पी जाती उसकी मासूमियत।
वक्त से पहले ही होता बड़ा,
समझता शत्रु समाज को,
चल पड़ता पाप की राह।
कहलाता अपराधी!
यही तो होता है,
अक्सर मासूमों के साथ,
नहीं होती जिनकी मां!
होता जिनका अपहरण,
वे बेरहम वक्त की चोट से,
बन जाते पाषाण!
समाज लगता शत्रु सम,
लेते प्रतिकार,
बस करते जाते वार!
बिना सोचे बिना समझे,
अंदर की आग!
जलाती उन्हें पल-पल,
जिसमें जल जाता ,
कल आज और कल!!

अभिलाषा चौहान
स्वरचित मौलिक
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जीवन में जो छाए अंधेरे,
दुख कितने जीवन को घेरे।
आशा की छोटी सी चिंगारी,
ले आती है जीवन में उजास।

जब कोई हो न साथ तेरे,
जब खाली हो हाथ तेरे।
विश्वास की छोटी सी किरण,
तब ले आती है जीवन में उजास।

जब पथ में कांटे बिछ जाए,
जब राह नजर न कोई आए।
साहस की छोटी सी चिंगारी,
तब ले आती है जीवन में उजास।

जब जीवन सूना-सूना हो,
मन में छाया वीराना हो।
तब प्रेम की छोटी सी किरण,
भर ही देती है जीवन में उजास।

निराशा के बादल छाएं,
खुद को आप अकेला पाएं।
तब जिजीविषा शक्ति बन कर,
भर देती है जीवन में उजास।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित ,मौलिक
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विषय-कला

हैं
कला
सुंदर
मीठी वाणी
बनते रिश्ते
घुलती मिठास
संवरता जीवन।

है
कला
उत्तम
चित्रकारी
शिल्प स्थापत्य
गायन-वादन
साहित्य सृजनता।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित
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अंत समय जब आयेगा,
तब प्यारे पछतायेगा।
स्वामी बन बैठा है तू,
कुछ न लेकर जाएगा।

ये दुनिया का मेला है,
प्रभु ने खेल खेला है।
सब उसकी कठपुतली हैं,
वह जैसे चाहे नचाएगा।

आदि का अंत निश्चित है,
करले कर्म जो उचित हैं।
माया में तू क्यों भ्रमित है,
जब खाली हाथ ही जाएगा।

नश्वर है संसार ये सारा,
इस सत्य को कभी विचारा,
आंखों पर क्यों बांधे पट्टी,
जो आया सो जाएगा।

अंत शरीर का होना है,
जो पाया सो खोना है।
बांध पोटली सत्कर्मों की,
वही साथ ले जाएगा।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित, मौलिक
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विषय-आसरा

आसरा जब छूटता है,
पहाड़ दुख का टूटता है।
फिरते हैं दर-बदर बेचारे
रब जब किसी से रूठता है।

आसरा ही है जीवन-आधार
बिन आसरे बुजुर्ग लाचार।
भटकते फिरते राहों में,
सहते फिरते अपनों की मार।

दर-दर ठोकर खाए अनाथ,
कोई भी बन जाता है नाथ।
मंगवाते भीख जब उनसे,
मजूरी कराते हैं दिन-रात।

आसरा हर व्यक्ति चाहे,
सफल जीवन तभी पाए। 
प्यार का आसरा मिले गर,
असंभव कर्म वह कर जाए।

आसरा सबको प्यारा है,
इसने जीवन संवारा है।
जिन्हें मिलता नहीं है ये,
वही हालात का मारा है।

अभिलाषा चौहान

स्वरचित

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मानवता मरी नहीं,
अभी जिंदा है।
बस बढ़ते पापों से,
वह शर्मिंदा है।
भटक गए हैं रास्ते से ,
कुछ मानव।
भूल मनुज धर्म,
बन गए दानव।
जिंदगी को खिलौना,
समझते हैं वे।
कलंक बन बैठे हैं,
मानवता का वे।
मुखौटौं में छुपी होती ,
इनकी सच्चाई।
कैसे कोई जान पाए,
इनकी सच्चाई।
मानवता से होता नहीं,
नाता इनका।
बोलते बोल मीठे काम,
बनाते अपना।
ऐसे विश्वासघातियों से,
दुखी होती है।
मानवता कमर कस के,
खड़ी होती है।
दुनिया में करूणा ,दया,
क्षमा बाकी है।
परोपकार ,सद्भाव,समता,
न्याय अभी बाकी है।
एक-जुट होके खड़े होने,
का दम है अब भी।
मुसीबतों से टकराने का,
जज्बा है अब भी।
धर्म-जाति से कहीं ,
ऊंची है मानवता।
रोक सके राह उसकी है,
किसमें ये क्षमता।
मानवता जब तक,
जहां में है जिंदा। 
दानवों को होना ही पड़ेगा,
सदा शर्मिंदा।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित
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बुझ गए घर के चिराग,
लगी हुई ये कैसी आग।

किसकी शै पर पल रहा,
दानव आतंकवाद का।

कब तलक बैठे हुए,
खूनी खेल यूं हम देखेंगे ?

कब तलक चुपचाप यों,
सैनिकों की शहादत देखेंगे ?

क्यों नहीं अब खात्मा,
हो इस आतंकवाद का !!

कब तलक घरों के ,
चिराग बेवक्त यूं ही बुझेंगे ?

मां का कलेजा फट रहा,
बाप की टूट गई कमर।

पत्नी का उजड़ा संसार,
बच्चों के सिर से साया छिना।

कब तलक आतंकियों को,
यूं ही पनाह मिलती रहेगी।

क्यों‌ नहीं अब अखिल विश्व
आतंकवाद को नेस्तनाबूद करे।

विश्व की समस्त जनता
एकजुट हो आतंकवाद से लड़े।

मुट्ठी भर इन दानवों के समक्ष,
हमारे हौंसले क्यों पस्त हैं ?

क्यों नहीं खून‌ खौलता,
क्यों हम आतंकवाद से त्रस्त हैं ?

झकझोरती है नृशंसता,
पुलवामा के आतंकी हमले की।

कब तलक हम इस तरह,
वीर-रत्नों को खोते रहेंगे?

कब तलक नापाक हरकतों के,
अंजाम हमारे वीर जवान भोगते रहेंगे।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित
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 संसार मिट्टी का घड़ा,
मिट्टी में मिल जाएगा।
सोच रहा तू क्या बंदे!
क्या लेकर के जाएगा?

मिट्टी से बना शरीर,
मिट्टी में मिल जाएगा ।
सोच रहा तू क्या बंदे!
क्या लेकर के जाएगा?

बात सही थी लेकिन तुझको,
अब तक भी न खबर हुई।
मेरा-तेरा करते-करते,
तेरी पूरी उमर हुई।

ये मिट्टी का घड़ा शरीर,
आत्मा इसका निवास स्थान।
जिस दिन त्यागा उसने इसको,
पहुंच जाएगा तू श्मशान।

आंखे खोलकर देख सत्य को,
करले अपना जीवन आसान।
वेद-पुराण भी इस सत्य का,
करते आए सदा बखान।

मिट्टी से मिट्टी का नाता
कभी नहीं है टूटा ।
खाली हाथ जाना है सबको,
जो जोड़ा सब यहीं छूटा।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित
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लगा दाग तो फिर न छूटे,
मेरी आत्मा मुझसे रूठे।
बिना विचारे करे ऐसे काम
जाने कितने दिल हैं टूटे।
भाव-भक्ति में मन न रमाया,
छल-छंदों में समय बिताया।
हरि का नाम भुलाया तूने,
माया में खुद को लिपटाया।
कोरी चादर पहन कर आया,
मन में तेरे मैल समाया।
चादर होती गई मैली-मैली,
लगे दाग तू कहां शरमाया?
अहंकारी,क्रोधी,बना कामी,
बन बैठा तू अंतर्यामी।
खुद को मान देवता बैठा,
सबका बन बैठा है स्वामी।
तन भी मैला ,मन भी मैला,
जीवन भर तूने पाला झमेला।
भूल गया कर्तव्य सारे,
अंत समय जाएगा अकेला।
कैसे दाग छुटा पाएगा,
मन ही मन पछताएगा।
मैली चादर साथ में लेकर,
कैसे प्रभु दर जा पाएगा!

अभिलाषा चौहान
स्वरचित
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दीप की लौ सम
झिलमिलाती 
अंतस की लौ देती प्रेरणा।
जगाती साहस..
बनाती कर्मण्य..
तूफानों से लड़ती !
ये छोटी सी लौ..!
बनती जिजीविषा,
जगाती जिज्ञासा,
बलवती होती इच्छा,
लाती क्रांति,
होते परिवर्तन,
करके सर्वस्व समर्पण,
वीर-धीर-कर्मवीर,
बन उत्साही ,
सतत होते अग्रसर।
यह लौ है जगत का आधार,
सतत जगत चलायमान,
निरंतर दिपदिपाती,
इस नन्ही सी लौ से..!
देती संघर्ष की शक्ति,
जीवन को गति,
व्यक्ति को मति,
बनती स्वाभिमान,
आन -बान-शान,
जागता स्वावलंबन,
इस लौ का झिलमिलाना!
जीवन का प्रतीक,
जब तक जलती रहेगी,
अंतस में लौ !
मानवता खिलती रहेगी,
जिंदगी हंसती रहेगी,
भाव जगते रहेंगे,
सद्गुण जाग्रत रहेंगे।
देशभक्ति का भाव होगा,
इंसानियत का सम्मान होगा।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित
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आए हैं ऋतुराज वसंत,
वसुधा मुस्काई आ गए कंत।
ओढ़ी पीली चुनरिया उसने,
फूलों के पहने हैं गहने।
वृक्षों ने नवश्रृंगार किया है,
हरीतिमा को ओढ़ लिया है।
कोयल मीठे गीत सुनाए,
भंवरे गुन-गुन करते आए।
रंग-बिरंगी तितलियां उड़ती,
कोमल कलियां हैं खिलती।
बसंत में प्रकृति हुई बासंती,
बहती बयार हुई मधुमाती।
पीत वर्णी पुष्पों की शोभा,
देख-देख मन उठता लोभा।
खुशियां लेकर आया बसंत,
प्रकृति की शोभा हुई अनंत।
शब्द सुंदरता कैसे करें वर्णन,
अनुभूति का होता स्पंदन।
मां सरस्वती की होती पूजा
उन के सम न कोई दूजा
ज्ञानदीप वे मन में जलाएं
अंधकार को दूर भगाएं।
असत्य और अज्ञान मिटाएं,
जीवन-ज्योति उज्ज्वल हो जाएं।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित
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दहलीज प्रतीक,
मर्यादाओं की,
परिवार की आन की,
उसके सम्मान की,
होती है सुरक्षा घेरा।
जिसके अंदर
फलता-फूलता जीवन,
संस्कार लेते स्वरूप।
दहलीज है,
संस्कृति का प्रतीक,
घर की पहचान,
परंपराओं का मान।
दहलीज,
बांधती परिवार को,
बंधन में।
दहलीज है,
लक्ष्मण-रेखा।
जिसका उल्लंघन,
लाता मुसीबत,
संकट में पड़ती मर्यादा।
दहलीज,
पड़ाव है,ठहराव है।
जहां जिंदगी ,
करती है विश्राम।।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित

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पतंग-सी है जिंदगी,
उड़ान बस भर रही।
डोर किसके हाथ है!
साधता इसे कौन है?
पेंच नए लड़ रही,
ख्बाव नए गढ़ रही।
छूती आसमान को,
कल्पना की उड़ान को।
भूल कर सत्य ये,
लक्ष्य से भटक ये।
इधर-उधर डोलती,
वक्त को है तोलती।
टूटता गुमान है,
छूटता आसमान है।
डोर छोड़ती है साथ,
फिर पड़े ये किसके हाथ?
जिंदगी पतंग -सी,
बंधी सांसों की डोर से।
टूटती सांसों की डोर,
पतंग को न कोई ठौर।
निष्प्राण हो कर पड़ी,
जिंदगी की रीत है बड़ी।
डोर का ही काम सारा,
पतंग तो है बेसहारा।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित
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मासूम था बचपन,
दिल कोरा कागज!
सरकी उम्र धूप सम,
वक्त ने लिखी इबारत,
बनने लगी जिंदगी की किताब,
हर पन्ने पर लिखा जाने
लगा हिसाब,
सुख की धूप कागज पर
निखरी,
दुख की स्याही कागज पर
बिखरी।
जवानी ने देखे सपने सुहाने,
दिल की किताब पर लिखे
अफसाने।
हर ठोकर का बना बही-खाता,
हर कदम हमें था आजमाता।
बनते-बनते किताब बन गई,
हर पन्ने पर नई कहानी
गढ़ गई।
कोरे कागज पर कई
रंग बिखरे,
भावों के रूप उजले और
निखरे।
बुढ़ापे में अनुभव ने
अपना रौब जमाया,
कागज के हर पुर्जे
पर वही नजर आया।
कभी हंसाती है कभी रूलाती है,
जिंदगी हर रोज एक कहानी
लिख जाती है

अभिलाषा चौहान
स्वरचित
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तीक्ष्ण वाणी के प्रहार,
झेलता वह मासूम।
सुबकता,सिसकता,
आंसू पौंछता।
खोजता अपने अपराध,
शनै-शनै मरता बचपन!
आक्रोश का ज्वालामुखी,
उसके अंदर लेता आकार।
शरीर पर चोटों की मार,
बनाती उसे पत्थर!
पनपता एक विष-वृक्ष
जलती प्रतिशोध की ज्वाला!
पी जाती उसकी मासूमियत।
वक्त से पहले ही होता बड़ा,
समझता शत्रु समाज को,
चल पड़ता पाप की राह।
कहलाता अपराधी!
यही तो होता है,
अक्सर मासूमों के साथ,
नहीं होती जिनकी मां!
होता जिनका अपहरण,
वे बेरहम वक्त की चोट से,
बन जाते पाषाण!
समाज लगता शत्रु सम,
लेते प्रतिकार,
बस करते जाते वार!
बिना सोचे बिना समझे,
अंदर की आग!
जलाती उन्हें पल-पल,
जिसमें जल जाता ,
कल आज और कल!!

अभिलाषा चौहान

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जीवन में जो छाए अंधेरे,
दुख कितने जीवन को घेरे।
आशा की छोटी सी चिंगारी,
ले आती है जीवन में उजास।

जब कोई हो न साथ तेरे,
जब खाली हो हाथ तेरे।
विश्वास की छोटी सी किरण,
तब ले आती है जीवन में उजास।

जब पथ में कांटे बिछ जाए,
जब राह नजर न कोई आए।
साहस की छोटी सी चिंगारी,
तब ले आती है जीवन में उजास।

जब जीवन सूना-सूना हो,
मन में छाया वीराना हो।
तब प्रेम की छोटी सी किरण,
भर ही देती है जीवन में उजास।

निराशा के बादल छाएं,
खुद को आप अकेला पाएं।
तब जिजीविषा शक्ति बन कर,
भर देती है जीवन में उजास।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित ,मौलिक

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विषय-कला

हैं
कला
सुंदर
मीठी वाणी
बनते रिश्ते
घुलती मिठास
संवरता जीवन।

है
कला
उत्तम
चित्रकारी
शिल्प स्थापत्य
गायन-वादन
साहित्य सृजनता।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित

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अंत समय जब आयेगा,
तब प्यारे पछतायेगा।
स्वामी बन बैठा है तू,
कुछ न लेकर जाएगा।

ये दुनिया का मेला है,
प्रभु ने खेल खेला है।
सब उसकी कठपुतली हैं,
वह जैसे चाहे नचाएगा।

आदि का अंत निश्चित है,
करले कर्म जो उचित हैं।
माया में तू क्यों भ्रमित है,
जब खाली हाथ ही जाएगा।

नश्वर है संसार ये सारा,
इस सत्य को कभी विचारा,
आंखों पर क्यों बांधे पट्टी,
जो आया सो जाएगा।

अंत शरीर का होना है,
जो पाया सो खोना है।
बांध पोटली सत्कर्मों की,
वही साथ ले जाएगा।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित, मौलिक

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ए हैं ऋतुराज वसंत,
वसुधा मुस्काई आ गए कंत।
ओढ़ी पीली चुनरिया उसने,
फूलों के पहने हैं गहने।
वृक्षों ने नवश्रृंगार किया है,
हरीतिमा को ओढ़ लिया है।
कोयल मीठे गीत सुनाए,
भंवरे गुन-गुन करते आए।
रंग-बिरंगी तितलियां उड़ती,
कोमल कलियां हैं खिलती।
बसंत में प्रकृति हुई बासंती,
बहती बयार हुई मधुमाती।
पीत वर्णी पुष्पों की शोभा,
देख-देख मन उठता लोभा।
खुशियां लेकर आया बसंत,
प्रकृति की शोभा हुई अनंत।
शब्द सुंदरता कैसे करें वर्णन,
अनुभूति का होता स्पंदन।
मां सरस्वती की होती पूजा
उन के सम न कोई दूजा
ज्ञानदीप वे मन में जलाएं
अंधकार को दूर भगाएं।
असत्य और अज्ञान मिटाएं,
जीवन-ज्योति उज्ज्वल हो जाएं।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित

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विषय-आसरा

आसरा जब छूटता है,
पहाड़ दुख का टूटता है।
फिरते हैं दर-बदर बेचारे
रब जब किसी से रूठता है।

आसरा ही है जीवन-आधार
बिन आसरे बुजुर्ग लाचार।
भटकते फिरते राहों में,
सहते फिरते अपनों की मार।

दर-दर ठोकर खाए अनाथ,
कोई भी बन जाता है नाथ।
मंगवाते भीख जब उनसे,
मजूरी कराते हैं दिन-रात।

आसरा हर व्यक्ति चाहे,
सफल जीवन तभी पाए। 
प्यार का आसरा मिले गर,
असंभव कर्म वह कर जाए।

आसरा सबको प्यारा है,
इसने जीवन संवारा है।
जिन्हें मिलता नहीं है ये,
वही हालात का मारा है।

अभिलाषा चौहान

स्वरचित

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'जल रहा था चांद'
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जल रहा था चांद,
थी चांदनी दहक रही।
प्रकृति थी मौन,
वेदना तड़प रही।
खून में उबाल था,
बाजुएं फड़क रहीं।
हरकतें नापाक थीं,
आवाजें उठ रही।
खून का बदला खून,
पुकार ये मच रही।
माहौल था गमगीन,
आंखें थीं बरस रहीं।
खो दिए थे लाल,
माताएं तड़प रहीं।
शहीदों की पत्नियां,
सिंहनी ही गरज रहीं।
‌बलिदान न हो व्यर्थ,
मेरे सुहाग का।
क्यों हो न अंत,
अब आतंकवाद का।
देखना और सोचना,
अब बहुत हो चुका।
फैसले का वक्त ,
अब निकट आ चुका।
रक्त की बहीं बूंद,
अब न व्यर्थ जाएंगी।
भारतवासियों को,
कम मत आंकना।
अपनी पर आ गए,
बहुत कुछ कर जाएंगे।
जो तुम न सोच सको,
ऐसा करके दिखाएंगे।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित

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ये संसार मिट्टी का घड़ा,
मिट्टी में मिल जाएगा।
सोच रहा तू क्या बंदे!
क्या लेकर के जाएगा?

मिट्टी से बना शरीर,
मिट्टी में मिल जाएगा ।
सोच रहा तू क्या बंदे!
क्या लेकर के जाएगा?

बात सही थी लेकिन तुझको,
अब तक भी न खबर हुई।
मेरा-तेरा करते-करते,
तेरी पूरी उमर हुई।

ये मिट्टी का घड़ा शरीर,
आत्मा इसका निवास स्थान।
जिस दिन त्यागा उसने इसको,
पहुंच जाएगा तू श्मशान।

आंखे खोलकर देख सत्य को,
करले अपना जीवन आसान।
वेद-पुराण भी इस सत्य का,
करते आए सदा बखान।

मिट्टी से मिट्टी का नाता
कभी नहीं है टूटा ।
खाली हाथ जाना है सबको,
जो जोड़ा सब यहीं छूटा।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित
लगा दाग तो फिर न छूटे,
मेरी आत्मा मुझसे रूठे।
बिना विचारे करे ऐसे काम
जाने कितने दिल हैं टूटे।
भाव-भक्ति में मन न रमाया,
छल-छंदों में समय बिताया।
हरि का नाम भुलाया तूने,
माया में खुद को लिपटाया।
कोरी चादर पहन कर आया,
मन में तेरे मैल समाया।
चादर होती गई मैली-मैली,
लगे दाग तू कहां शरमाया?
अहंकारी,क्रोधी,बना कामी,
बन बैठा तू अंतर्यामी।
खुद को मान देवता बैठा,
सबका बन बैठा है स्वामी।
तन भी मैला ,मन भी मैला,
जीवन भर तूने पाला झमेला।
भूल गया कर्तव्य सारे,
अंत समय जाएगा अकेला।
कैसे दाग छुटा पाएगा,
मन ही मन पछताएगा।
मैली चादर साथ में लेकर,
कैसे प्रभु दर जा पाएगा!

अभिलाषा चौहान
स्वरचित

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दीप की लौ सम
झिलमिलाती 
अंतस की लौ देती प्रेरणा।
जगाती साहस..
बनाती कर्मण्य..
तूफानों से लड़ती !
ये छोटी सी लौ..!
बनती जिजीविषा,
जगाती जिज्ञासा,
बलवती होती इच्छा,
लाती क्रांति,
होते परिवर्तन,
करके सर्वस्व समर्पण,
वीर-धीर-कर्मवीर,
बन उत्साही ,
सतत होते अग्रसर।
यह लौ है जगत का आधार,
सतत जगत चलायमान,
निरंतर दिपदिपाती,
इस नन्ही सी लौ से..!
देती संघर्ष की शक्ति,
जीवन को गति,
व्यक्ति को मति,
बनती स्वाभिमान,
आन -बान-शान,
जागता स्वावलंबन,
इस लौ का झिलमिलाना!
जीवन का प्रतीक,
जब तक जलती रहेगी,
अंतस में लौ !
मानवता खिलती रहेगी,
जिंदगी हंसती रहेगी,
भाव जगते रहेंगे,
सद्गुण जाग्रत रहेंगे।
देशभक्ति का भाव होगा,
इंसानियत का सम्मान होगा।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित


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खामोशी की अपनी जुबान होती है

बिन कहे बहुत कुछ कह देती है ।

दिल का दर्द छलकता है खामोशी में

आंखें चुपचाप रोती रहती हैं।

सौ फसादों को मिटा देती है

क्रोध की अगन बुझा देती है

नफरतें रहती इससे दूर सदा

स्नेह बंधन को बांध देती है।

आंखों की बनके जुबां खामोशी

बिन कहे हाले दिल बता देती है ।

मजबूरी का बनके आईना जब

लबों को सिल देती है खामोशी

तब उमडता है दर्द का जो सागर

खामोशी बड़ी खामोशी से बता देती है।

कभी बन के कटार चुभती है

कभी रस की धार लगती है

कभी लगती किसी की बेबसी

कभी चुपचाप हंसती रहती है।

लफ्जहीन होकर ये खामोशी

अपनी ताकत को पता देती है
अभिलाषा चौहान
स्वरचित

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दीप देता है संदेश मनुष्य को
प्रतिपल प्रतिक्षण
देख मुझे जल मेरी तरह
मानवता का दे संदेश
पढा मनुष्यता का पाठ
कर औरों के लिए अर्पण
सच, तभी तू सच्चा मानव है
सीख दीप से लै सदैव
स्वयं जलता है, जल-जल कर राह दिखाता है
कर अपना समर्पण
एक अमिट इतिहास रचाता है
यह दीप है प्रतीक
अनंत इच्छाओं का
आस्थाओं, भावनाओं और विश्वास का
उम्मीद की किरण है
जीवन की उमंग है
झिलमिलाती हुई यह दीप की लौ
दीप जो सदा जलता है औरों के लिए
बनो दीप रहो दीप्त
फैला दो प्रकाश
मिट जाए अंधकार
छाए हर्ष चहुंओर

अभिलाषा चौहान
(स्वरचित)

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मेरी रचना 'बढ़ जाती है और तृष्णा
तृषित चातक सम मन

भटकता सदा इस संसार में

तृषा स्वाति बूंद की

है कभी मिटती नहीं

बढती जाती तृष्णा नित

अग्नि सम धधकती हुई

अनभिज्ञ है मन उस ज्योति से

जो हृदय में है जल रही

नहीं मिलता वह ज्योति पुंज

जो हृदय में है छुपा

ढूंढता फिरता उसे मन

ऐसे इस नश्वर संसार में

जैसे कस्तूरी मृग वन में

फिरे कस्तूरी को ढूंढता

मोह का अंधकार घना

लोभ का बढा मायाजाल है

संतोष और धैर्य से

मन हुआ कंगाल है

ध्यान की बात मन में कभी आती नहीं

तृष्णा से मुक्ति तभी तो मिल पाती नहीं

ढूंढती ही जा रही होके मैं बावरी

डूबकर माया में तृप्ति रस की गागरी

सांसारिकता की मृगमरीचिका

ध्यान अपनी ओर खींचती

बढ जाती है और तृष्णा

जब तक ज्ञानज्योति जलती नहीं।

अभिलाषा चौहान (स्वरचित)


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न डरना न रूकना न हारना 

कभी

रहता सदा सुरक्षित मेरा देश है तभी

सीमा पर चलती गोली

शत्रु की हो बंद बोली

खेलें वे खून की होली

सीने पर खाते गोली

विजय श्री मिलती है देश को तभी

न रूकना न थमना न हारना कभी

शत्रु के छुड़ाए छक्के

हैं इरादों के वे पक्के

दुश्मन के घर में घुसके

होश उड़ाए जो उसके

पाई थी विजय उन्होंने लक्ष्य पर तभी

लहराता है तिरंगा बड़े शान से तभी

मेरे देश की है सेना

उसका क्या कहना

झुकने कभी न देती

मातृभूमि का शीश है ना

बन राह का रोड़ा शत्रु की राह में खड़ी 

देख उसका हौंसला शत्रु की नींद है उडी

अभिलाषा चौहान (स्वरचित)


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दादी नानी दूर हुई

बच्चों से कहानी दूर हुई

न होती आदर्शों की बातें

न सुनते अब अच्छी बातें

नेता अभिनेता दो चेहरे

अब बच्चों को दिखते हैं

किन आदर्शों की बात करें

जो कहीं नहीं अब दिखते हैं

जो घटता सबके समक्ष

अनुसरण उसी का होता है

बदल गई है सोच सभी की

बदल रहे संस्कार तभी

आदर्शों की बातें करना

बीते कल की बात हुई

भरा हुआ इतिहास हमारा

कितने अनुपम आदर्शों से

वर्तमान में कौन प्रभावित

होता है इन आदर्शों से

बातें करते सब बडी़ बड़ी

सबको अपने सुख की पडी 

अब कोई नहीं उन आदर्शों पर

कहां खरा उतरता है ? 

अभिलाषा चौहान 

स्वरचित

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पल ही सत्य है


हर पल
कहता है कुछ
फुसफुसा कर
मेरे कानों में

मैं जा रहा हूँ
जी लो मुझे
चला गया तो
फिर लौट न पाऊंगा

बन जाऊंगा इतिहास
करोगे मुझे याद
मेरी याद में
कर दोगे फिर एक पल बर्बाद

इसलिए हर पल को जियो
उठो सीखो जीना
अतीत के लिए क्या रोना
भविष्य से क्या डरना

यह जो पल वर्तमान है
है वही परम सत्य
बाकी सब असत्य
यही कहता है हर पल
फुसफुसा कर मेरे कानों में ।

अभिलाषा चौहान

स्वरचित
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आकुल अंतर

चित अतृप्त व्यथित, व्याकुल चंचल, 
कुछ पाने को, नित रहे आकुल। 

सुप्त ज्ञान बुद्धि, विवेक निश्चल, 
इक पल को भी, न पड़ता कल। 

भावों की गगरी, भरी छल छल, 
हृदय मची, हलचल हलचल। 

मैं विवश व्यथित, प्यासी हरपल, 
नहीं स्वार्थ रहित, न हूं निश्छल। 

पीती रहती, चुपचाप गरल, 
हर ओर मचा, है कोलाहल ।

कुछ पाने को, अंतर आकुल, 
ये छलना छलती, पल पल पल। 

इन सबसे दूर, मैं जाऊं निकल, 
उर रस की धार, बहे अविरल ।

अभिलाषा चौहान
(स्वरचित)

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( 1 )

घिर रहा है तम घना,
हो तुम निर्भय मना।

आस का दीपक जला,
राह अपनी खुद बना।

दुख को तू साथी बना,
चल मना बस चल मना ।

करूणा दया प्रेम का,
जगती में तू बीज बो ।

सत्य अहिंसा शांति का,
पथ तुझको अजीज हो।

झुकना न डरना न तू,
चाहे आए कितनी आंधियां।

आंधियों के बाद ही, 
अमृत बरसता है घना। 

शक्ति और सामर्थ्य का, 
अब वीर परिचय दे घना।

चल मना बस चल मना ।

अभिलाषा चौहान
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मेरे वतन की माटी की बात अनोखी है, 
सारे जहाँ में इसकी शान अनोखी है।

धर्म भाषा संस्कृति के भेद कितने हो, 
एकता में बंधने की रीत अनोखी है। 

देख लो कुदरत के सारे रंग इसमें है, 
हिमगिरि रक्षा प्रहरी की साख अनोखी है। 

वादियां कश्मीर की इसकी जन्नत है, 
प्रकृति के रंगों की यहां शोभा अनोखी है। 

गले में हार गंगा का सोहता जिसके,
जलधि करे नित वंदन ये नीति अनोखी है। 

शस्य श्यामल भूमि जिसकी शोभा हो, 
अनोखा है वतन मेरा इसकी शान अनोखी है। 

वीरप्रसविनी भूमि इसकी वीर रत्न उगले, 
बनी वीरों से विश्व में पहचान अनोखी है। 

विश्वगुरू है ये वंदनीय इसकी माटी है, 
यहां प्राण अर्पण करने की रीत अनोखी है।

मेरे वतन की माटी मेरे माथे का चंदन है, 
वतन की माटी से प्रीत की रीत अनोखी है। 

अभिलाषा चौहान
स्वरचित

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प्रिय का करती इंतजार

हृदय हो रहा बेकरार

इक पल को नहीं करार

कब पूरा होगा इंतजार।

धीरे-धीरे गई रात गुजर

दिन के बीत रहे प्रहर

प्रियतम की नहीं कोई खबर

कैसे करूं उनका इंतजार !

घर-बाहर कहीं चैन न आवे

राह तकूं मेरा जी घबरावे

अब तो आओ प्रियतम प्यारे

अब और न होगा इंतजार।

तभी ईश्वर ने सुनी पुकार

प्रियतम छवि प्रत्यक्ष साकार

प्रेम मिलन ने लिया आकार

अब खत्म हुआ था इंतजार।

अभिलाषा चौहान

स्वरचित


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जिंदगी के सफर में
लोग मिलते हैं
मिलकर बिछड़ जाते हैं
कोई दिल में बस जाता है
कोई याद बन जाता है
कोई साथ निभाता है
कोई अपनी छाप छोड जाता है
कोई सच्चा दोस्त बन जाता है
कोई दोस्त बन दगा कर जाता है
कोई दूर होकर भी बहुत पास होता है
कोई पास होकर भी बडा दूर होता है
परिचय से परिचित होने की शुरुआत होती है
जब दो अजनबियों की मुलाकात होती है
परिचित होने पर आदमी की पहचान होती है
बातचीत इसका मुकाम होती है
ये सफर अनवरत चलता रहता है
रिश्ता बनता या बिगडता रहता है
मिलना बिछडना चलता रहता है
क्योंकि आदमी अकेला नहीं रहता है
ये मिलना बिछडना है खेल जिंदगी का
यह खेल ही है दस्तूर जिंदगी का ।। 

अभिलाषा चौहान
स्वरचित

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जो अनंत अभेद अछेद अजर है,

वो आत्मा सतत शाश्वत अमर है।

आत्मतत्व ही जीवन है इस जग का,

वस्त्र धारण किया है उसने इस तन का।

जो जीवन में पवित्र कर्म ध्येय अपनाता,

संसार युगों-युगों तक गीत उसी के गाता।

बनकर आदर्श जगत में स्थान उच्च है पाता,

बनकर प्रेरणा विश्व को राह नई दिखलाता। 

जग कल्याण निमित्त जो सब अर्पित कर देता,

बन विशिष्ट संसार में सदा अमर वह रहता।

नाम अमर है उनका जो लिखते नई कहानी,

जग के मंगल हेतु करते स्व की भी कुर्बानी।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित

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ऋतु चक्र में आया परिवर्तन,


रौद्र रूप में प्रकृति करे नर्तन। 


बसंत ऋतु नहीं सुखद सुहावन, 


जबसे कट गए हरे भरे वन। 


न अब भंवरे करते गुन गुन, 


न तितलियां अब करती नर्तन। 


ग्रीष्म ऋतु धरती तपे ऐसे,


जलती हुई भट्टी हो जैसे। 


विकल हुए हैं नभचर-थलचर,


करते रहते हैं पीड़ा हर हर। 


बर्षा ऋतु अब है दुखदायी, 


ऐसी बर्षा किसे सुहाई। 


कहीं डूबे हैं पूरी नगरियां, 


कहीं बूंद को तरसे अखियाँ । 


रे मानव तूने क्या कर डाला। 


ऋतु चक्र ही बदल दिया सारा । 


अभिलाषा चौहान 



स्वरचित
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"बतलाना मेरा स्थान"

सारा आसमान तुम रख लेना....
मुझको दे देना बस कोना,
जिसमें जब चाहूं मैं उड लूं !
थोडी सी मैं मन की कर लूं !
छूना चाहूं मैं आकाश,
पर रह जाता है मन में काश.....।
पर मेरा है विश्वाश...
कभी तो होगी पूरी आस ।
नहीं चाहती पूरा दिल मैं...
बस चाहूं छोटा सा कोना,
जिसमें मेरा अश्क बसा हो 
तुमको मेरी याद सदा हो,
न खो जाऊं कहीं भंवर में
साथी हूं जीवन के सफर में
दे देना इतना सम्मान,
रख लेना तुम मेरा मान..... ।
बतलाना मेरा स्थान !
सारा जहां तुम रख लेना...
मुझको दे देना बस कोना,
मैं अर्द्धांगिनी पहले तुम्हारी
बाद में आई जिम्मेदारियां सारी !
मत छीनना ये पहचान,
बतलाना मेरा स्थान ।
इसमें कहीं मैं खो न जाऊं,
ढूंढूं खुद को तो भी न पाऊं !
रख लेना बस इतना ध्यान,
बतलाना मेरा स्थान !!!

अभिलाषा चौहान
स्वरचित

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वो आंखें जो करती
सदा अच्छे दिन की उम्मीद!
उनके जीवन में भी कभी
आ जाए ईद! 
रहती है सदा उनकी
जेब खाली? 
नहीं मनती कभी
वहां दीवाली? 
खुशियां उनकी
हो जाती होली! 
चुभती हैं उन्हें
बडी बडी बोली। 
दो वक्त की रोटी के
पडे जहां लाले। 
वहां बडे बडे सपने
कोई कैसे पाले?? 
सर पर छत
न कपडे नसीब हो। 
गरीबी ने फोडे
जिनके नसीब हो। 
आंखों में जिनके
हर पल नमी हो, 
जिनके जीवन में
खुशियां ही नहीं हो। 
जो अपना भविष्य ही
अंधेरे में पाते हैं? 
देश के भविष्य को
कहां समझ पाते हैं?
सूनी आँखों से कहीं
सपने देखे जाते हैं! 
भूखे पेट कहीं
भजन किए जाते हैं ! !


अभिलाषा चौहान
स्वरचित


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करूं हे माता तेरा वंदन, 

नित प्रति करूं तेरा आराधन।

आदि शक्ति जगत कल्याणी, 

महिमा तेरी न जाए बखानी।

दुष्ट संहारक पतित उद्धारक,

सदा चमकती बन कर तारक। 

ममता की तू मूरत है मां, 

मन में बसी तेरी सूरत है मां।

मैं अज्ञानी बालक तेरा,

क्षमा करो अपराध मेरा। 

शक्ति स्वरूपा मात भवानी, 

कैसे सेवा करे अज्ञानी।

अंतरतम अंधकार से घिरा है,

मोह-माया का पर्दा पड़ा है। 

दे सद्बुद्धि कुछ बन जाऊं,

मात मैं तेरा बालक कहाऊं। 

कर कल्याण जगत का मैं भी,

तेरी आंखों का तारा बन जाऊं ।

बस इतना उपकार करो मां,

दुखियों का उद्धार करो मां ।

जगत में पाप बढ़ें हैं भारी,

आओ मां करके सिंह सवारी। 

अभिलाषा चौहान 

स्वरचित 

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कुछ तो कशिश है मां तेरी आंखों में,

बांध लिया मन को मेरे प्रेम के धागों में। 

नयन नहीं हटते मां तेरे स्वरूप से,

भीगते ही जा रहे भगवती के रूप से।

कुछ तो कशिश थी मां तेरी शक्ति में,

भावविभोर हो गई मां मैं तेरी भक्ति में।

डूबती गई मां के ओजमयी रूप में ,

पाती गई छाया जिंदगी की धूप में।

कुछ तो कशिश थी मां तेरी ममता में,

पाने को हूं व्याकुल सदा तेरी ममता मैं ।

कर दिया समर्पित जीवन अब तेरे चरणों में,

बरसती रहे कृपा जीवन के इन क्षणों में। 

कुछ तो कशिश थी मां के बुलावे में,

तभी तो न फंसी मैं माया के छलावे में।

अब मां मुझे बस तेरा ही सहारा है,

तेरी भक्ति मेरे जीवन का किनारा है। 

अभिलाषा चौहान 

स्वरचित

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अभिलाषाएं हैं अनंत, 
जा पहुंची दिग्दिगंत।
इनसे संचालित है जीवन,
व्याकुल सदा ही रहता मन।
अनवरत ये क्रम चलता है,
इच्छित फल तब मिलता है।
जब अभिलाषा कोई जगती है,
तो कर्म का साथ चाहती है।
जब दोनों का होता है संगम,
तब बन जाती है राह सुगम।
सबकी अभिलाषा एक ही हो,
इस जगती का कल्याण ही हो।
मिट जाएं सारी कुरीतियां,
सुंदर बने सारी नीतियां।
जीवन सुंदर सहज बने,
दूर हों दुख के बादल घने।
कोई दीन दुखी न जग में रहे,
शोषण के सारे महल ढहें। 
समता न्याय फिर पोषित हों
सद्भाव समाज में विकसित हो।
नारी पर अब अत्याचार न हो,
मासूम कलियों की चीत्कार न हो।
बस इतनी सी है अभिलाषा,
अभिलाषा की अभिलाषा।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित


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🌷🌷🌷धुन🌷🌷🌷

मेरे देश के प्यारे वीर जवान, 

देश पर करें जान कुर्बान। 

वे होते अपनी धुन के पक्के, 

न बैठे कभी वे थक कर के। 

चाहे सीने पर गोली चलती हो, 

या मौत ही सिर पर टहलती हो। 

वे रहते हैं अपनी धुन में सदा, 

रही मौत से यारी है उनकी सदा। 

लिया देश की रक्षा का जो प्रण, 

उस पर वारा है पूरा जीवन। 

चाहे पत्थर कोई भी बरसाए, 

चाहे कोई आपदा आ जाए। 

हर हाल में साथ खड़े रहते, 

वे हैं अपनी धुन के पक्के । 

बस एक बात सदा मन में, 

जब तक हैं प्राण इस तन में, 

मेरे देश पर आंच न आएगी, 

ये मौत मुझे न छू पाएगी, 

रहते हैं सदा इसी धुन में, 

मां भारती बसी उनके मन में। 

अभिलाषा चौहान 

स्वरचित

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🌷प्रेम ही सत्य है 🌷

प्रेम ही सत्य है
प्रेम ही शिव है
प्रेम ही सुंदर है
प्रेम ही सार है ।
प्रेम ही सुगंध है
प्रेम ही तरंग है
प्रेम में रचा-बसा
मनुज का संसार है ।
प्रेम ही अतुल्य है
प्रेम ही अमूल्य है
प्रेम ही शाश्वत है
साक्षात निराकार है।
प्रेम में त्याग है
प्रेम में समर्पण है
प्रेम ही जगती का जीवन
प्रेम ही सगुण साकार है ।
प्रेम में रचे बसे
पंच महाभूत हैं
प्रेम ही से सारी
सृष्टि उद्भूत है।
प्रेम के ढाई आखरों में
त्रिदेवों की शक्तियां समाई हैं
महापुरूषों की वाणी
मानवीय महानता समाई है। 
प्रेम के ढाई अक्षर 
वेदों का सार हैं
गीता का ज्ञान है
कुरान की पुकार है ।
इन अक्षरों में छिपा
ईश्वरीय प्रकाश है
जीवन की आस है
आस्था और विश्वास है।
इन अक्षरों के ज्ञान से
बना मनुज महात्मा
इनसे रहित मनुज
बन गया दुरात्मा।
प्रेम के ढाई अक्षर ही
इस सृष्टि का मूल हैं 
इनसे रहित मनुज जीवन
निस्सार और निर्मूल है।

***अभिलाषा चौहान***
स्वरचित\


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विषय - प्रीत

प्रीत की रीत बड़ी पुरानी,

मीरा कृष्ण प्रीत जग जानी।

जग न समझे प्रीत की वाणी, 

रही मीरा इससे अंजानी । 

जाने कितनी ऐसी कहानी, 

प्रीत में डूबी जग से बेगानी। 

प्रीत समर्पण पूरा मांगे, 

कुछ न भाता प्रीत के आगे। 

लोक लाज मर्यादा जग की, 

प्रीत के आगे पानी भरती । 

प्रीत दीवानी मीरा होई, 

राधा कृष्ण के प्रेम में खोई। 

सच्ची प्रीत की डगर कठिन है, 

कांटे राह बिछे अनगिन है। 

प्रीत का जग बैरी बन जाए,

प्रीत का भाव न जग को भाए। 

विष का प्याला पीना पड़े है, 

प्रीत तभी परवान चढ़े है। 

प्रीत न देखे अपना-पराया, 

प्रीत में प्रीतम ही मन भाया। 

अभिलाषा चौहान 

स्वरचित

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"हिंदी/हिंदी दिवस "14 सितम्बर 2019

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