पूनम गोयल






"लेखिका परिचय "

नाम पूनम गोयल
जन्मतिथि 27.1.1966
जन्मस्थान सोनीपत ( हरियाणा )
शिक्षा बी० ए० पासकोर्स
सृजन की विधाएँ लघु कविता
प्रकाशित कृतियाँ-कोई नहीं
सम्प्रति ( पेशा/व्यवसाय ) गृहणी

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शुभ सांयकाल, भावों के मोती
दैनिक कार्य स्वरचित लघु कविता दिनांक 13 अगस्त, 2018 दिन सोमवार विषय सावन, झूला, बहार रचयिता पूनम गोयल सावन की हल्की फुहार। उसपे आया, तीजों का त्यौहार।। फिर सोने पे सुहागा, प्यारी सखियों का साथ। आ गई हो जैसे, जीवन में बहार।। सोलह श्रंगार किए, सखियाँ खुशी से झूम रहीं। अपने साजन की लम्बी उम्र की, दुआएं वे मांग रहीं।। झूले पर बैठकर, गाएं वे मधुर गीत। आहा। कितना सुखद है, उनका यह साथ एवं संगीत।। ईश्वर करे कि यह साथ सदा बना रहे। और जीवन में खुशियों का मेला, यूँ ही लगा रहे़...........बस यूँ ही लगा रहे....... हाँ, यूँ ही लगा रहे।।
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विषय सुबह

दिनांक 29.6.18
रचयिता पूनम गोयल
हर रात को इन्तजार होता है , एक उजियाली सुबह का !
सूरज के निकलने का और कुछ कर गुजरने का !!
सुबह जो हुई , तो हर कोई व्यस्त हुआ ! 
गृहणी रसोई में , गृहस्थी अपने काम-काज में ,
और दाना चुगने के लिए आकाश में पक्षियों का शोर हुआ !!
रात बनाई विधाता ने , ढेरों सपने सजाने के लिए !
और सुबह बनाई उसने , उन सपनों को साकार करने के लिए !!
सुबह का उजाला , मन में ताज़गी भर देता है !
और आसमान को भी मुठ्ठी में भर लेने की , क्षमता ला देता है !!
इसलिए तू जाग , मुसाफिर , और अपने सफर पर निकल जा ! 
इस नई सुबह के लिए ईश्वर का शुक्रियादा कर , मंजिल पर आगे बढ़ जा !!
क्योंकि रात के अन्धेरों को चीरकर , फिर एक और सुबह आई !
व भावों के मोती ---समूह के लिए कुछ नए भाव पिरो लाई !!

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भावों के मोती
दैनिक कार्य स्वरचित लघु कविता
शीर्षक आशा

दिनांक 3.7.18
रचयिता पूनम गोयल

न जानें , क्यों ? हो जाते हैं हम ,
इतने आशावादी !
आशाएं बना देतीं हैं , 
हमें घोर निराशावादी !!
एक के बाद , दूसरी ,
फिर तीसरी , और , न जानें , कितनीं अनगिनत आशाएं !
हम आजीवन , 
अपने अपनों से लगाते जाएं !!
और जब पूरी न हों आशाएं ,
तो दुख के बादलों में घिर जाएं !
फिर स्वंय उदास होकर , 
बाकी सबको भी निराश कर जाएं !!
निकल कर , इनकी तृष्णा से बाहर ,
क्यों न ? यह जीवन सफल बनाएं !
खुशी-खुशी हम-सब अपना ,
पूरा जीवन बिताएं !!
सबको सब-कुछ नहीं मिलता , 
हर कोई भाग्य एवं पुरुषार्थ का फल ही पाए !
इसी अनुसार , उस परमात्मा ने ,
सबके खाँचे बनाएं !!
वैसे भी , विविधता के साथ , 
यदि हम यह जीवन बिताएं !
तो इसके विभिन्न रंगों का , 
हम आनन्द उठा पाएं !!
बँधकर , न रहें एक सूत्र में ,
और आशाओं के बन्धन में !
क्योंकि संतोष-धन सर्वोत्तम है ,
हमारे मानव-जीवन में !!
इसलिए आशावादी न बनकर ,
हम कर्म पर ध्यान लगाएँ !
और अच्छे कर्म करते हुए ,
स्वंय को भाग्यशाली बनाएँ !!

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ईश्वर निराकार है !
केवल एक अनुभूति , एक आभास है !!
उसका स्वंय का कोई आकार नहीं , किन्तु उसने सारी सृष्टि को साकार बनाया !
ब्रह्माण्ड के एक-एक कण को उसने ,
बड़ी खूबसूरती से है सजाया !!
कहीं प्राकृतिक सौन्दर्य है , तो कहीं भौतिक सुख के साधन !
कहीं है भक्ति-मार्ग सुहाना , कहीं टेढ़ा-मेढ़ा भी जीवन-यापन !!
विचित्र है उस प्रभु की माया , कहीं पर धूप , कहीं पर छाया !
उसका पार तो ब्रह्मा आदि , देवताओं ने भी नहीं पाया !!
हे ईश ! तुझसे प्रार्थना है कि दुर्गुणों से बचाते रहना !
एवं सद्बुद्धि देकर , सन्मार्ग पर चलाते रहना 
!!

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दैनिक कार्य स्वरचित लघु कविता
दिनांक 9.7.18

विषय हरितिमा
रचयिता पूनम गोयल

हरितिमा -हरियाली , मानव को प्रकृति-प्रदत्त एक अद्वितीय एवं अद्भुत देन !
जी चाहता है कि प्रकृति माँ , तेरी हरितिमा में खो जाऊँ !
व दीन-दुनिया से पृथक् , मैं अपनी एक दुनिया बसाऊँ !!
तेरी नदियों , झीलों एवं झरनों , के संग मैं खेलूँ !
तेरी सुन्दरता को मैं , अपने इस आँचल में भर लूँ !!
हरे वृक्षों की घनी छाँव , मुझे बहुत-अधिक भाती है !
जिससे मुझे अपनेपन की , महक सी आती है !!
कभी चाहूँ कि पर्वत की ऊँची चोटी पर जा बैठूँ !
कभी चाहूँ कि धरती को ही अपना बिस्तर बना बैठूँ !!
कभी घने बादलों की ओट में , जा छुप जाऊँ !
तो कभी बारिश की बूंदें बनकर , सबके ह्रदय को ठंडक दिलाऊँ!!
अनुपम , अद्भुत व मनोहारी , छटा है प्रकृति तेरी !
माँ के आँचल-सा सुकून देती है , यह गोद तेरी !!
अभिलाषा है मेरी कि तुझसे कभी-भी दूर न जाऊँ !
एवं तेरे इस सानिध्य में ही , मैं अपना पूरा जीवन बिताऊँ !!

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भावों के मोती
दैनिक कार्य स्वरचित लघु कविता
दिनांक 10.7.18

विषय अनुराग
रचयिता पूनम गोयल

अनुराग हो यदि प्रभु-चरणों में , तो यह जीवन सफल हो जाए !
आने वाली हर बाधा को , हम हँस के पार कर जाएं !!
जीवन-लीला बड़ी विचित्र , कभी सुख , तो कभी दुख आएँ !
दुख आने पर हम घबराएं , तो सुख आने पर खिलखिलाएं !!
और यदि अनुराग हमें , परम् पिता से हो जाए ! 
तो दुख-सुख , दोनों ही , हमें नहीं हिला पाएं !!
प्रभु की भक्ति शाश्वत भक्ति , उससे अनुराग दे शाश्वत सुख !
फिर क्या कोई कामना ? जिसका हो दुख !!
नित चरण-वन्दना है मेरी , हे प्रभु , तू यूँ ही स्वंय में रमाए रखना !
जब हो जाऊँ विचलित पथ से , तू झट से बाँह पकड़ लेना !!


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हुआ सवेरा , तो आकाश में सूर्यदेव का आगमन हुआ !
हुआ सवेरा , तो पंछियों का चहचहाना आरम्भ हुआ !!
होने पर सवेरा , एक उज्जवल भविष्य की आस में , सभी अपने काम पर निकल पड़े ! 
स्त्री ने रसोई सम्भाली , गृहस्थी ने कारोबार व पशु-पक्षी झुंड बनाकर , भोजन की तलाश में चल दिए !!
विधाता ने हर समय को बहुत सोच-समझ कर बनाया !
एवं कदम-कदम पर , हमें समय का महत्व समझाया !!
उसने सवेरा बनाया , भविष्य के उजाले के लिए !
उसने दिन बनाया , पुरुषार्थ करने के लिए !!
उसने रात बनाई , दिन-भर की थकान को दूर करने के लिए !
व उसके बाद , आने वाले समय के मधुर-मधुर सपनों में खो जाने के लिए !!
इसलिए हर समय का अपना एक अलग महत्व है !
जिसकी उपयोगिता को समझना , हम-सबके लिए अत्यंत आवश्यक है !!


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तेरी तस्वीर को सीने से लगा रक्खा है !
तेरी यादों को दिल में छुपा रक्खा है !!
कभी जी चाहे , तुझसे मिलने को अ'दोस्त ,
तो दिल की गहराइयों में , एक घर बसा रक्खा है !!
जहाँ तुम हो , मैं हूँ , कोई और नहीं है !
वहाँ दुनिया के लोगों का भी , कोई शोर नहीं है !!
वहाँ मोहब्बत ही मोहब्बत है , नहीं नफ़रत की दीवार !
और मिलता है वहाँ , प्यार बेशुमार !!
लाख़ चाहा कि तुमसे मिलकर , तुम्हारा जी-भरके दीदार करूँ !
और दिल में जो बातें हैं , वे सभी न सही , भले ही 2-4 करूँ !!
पर कभी भी ऐसा हो न सका !
बेरहम दुनिया से टकराव होता ही रहा !!
सो अब तेरी यह तस्वीर ही सहारा है ! 
जिसने हर पल मुझे सम्भाला है !!

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ज़िन्दगी का हर पल , नहीं होता एक जैसा !
कभी है खुशगवार , तो कभी मायूस सा !!
ग़म और खुशी --ज़िन्दगी के 2 अहम पहलू हैं ! 
जिनके साथ हम अपनी उम्र गुज़ार देते हैं !! 
खुशियों के पल , बड़े सुहाने लगते !
और ग़म हमें , ग़मग़ीन कर जाते !!
ये दोनों ही ज़रूरी हैं , ज़िन्दगी के लिए ! 
हमारे लिए इनका महत्व , समझने के लिए !!
दुख न हों , तो सुख की कीमत पता न लगे !
और सुख के अभाव में , दुख को सह न सकें !!
इसलिए ज़िन्दगी का हर पल , अपना विशेष महत्व रखता है !
और समय-समय पर , हमें एक नया सबक दे जाता है !!

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दिनांक 28.7.18
दिन शनिवार
विषय दायित्व
रचयिता पूनम गोयल

जीवन-पर्यन्त व्यक्ति , 
अनेक दायित्वों से घिरा रहता है !
मृत्यु तक भी , 
वह उनसे मुक्त न हो पाता है !!
क्योंकि जन्म के बाद से ही ,
वह सांसारिक-बन्धनों में जकड़ जाता है !
जिनसे चाहकर भी ,
वह छूट नहीं पाता है !!
रिश्तों का एक बहुत बड़ा मेला ,
उसके इर्द-गिर्द मँडराता है !
और उनके लिए वह , 
अपना पूरा जीवन समर्पित कर जाता है !!
इसी का नाम सृष्टि है ,
जिसका रचयिता , सबका भाग्यविधाता है !
सबको कर्मों के बन्धन में बाँधकर ,
वह अपने खेल रचाता है !!


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मुसाफिर है व्यक्ति , 
और दुनिया है सराय !
जो इस धरती पर आए ,
वह एक दिन अवश्य चला जाए !!
यही जीवन कहलाए ,
यही जीवन कहलाए !
जीवन के इस चक्र मेँ ,
मानव बार-बार फंसता जाए !!
कर्मो के बन्धन ,
उसे जकड़ते ही जाएं !
वह चाहकर भी ,
इनसे बाहर न निकल पाए !!
यदि सौभाग्य से कोई ,
सद्गुरु मिल जाए !
तो व्यक्ति मुसाफिर न बनकर ,
जन्म-मरण के बन्धन से छूट जाए !!

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पीड़ा का सागर है , 
मेरे हृदय का आंगन !
दुख से तप्त है ,
मेरा समस्त तन-मन !!
सागर की लहरों जैसी ,
मन में दुख की अनगिनत हिलोरें हैं !
वहाँ अनेक असहनीय , 
पीड़ा ही पीड़ाएं हैं !!
फिर भी , यही यत्न होता है
कि हंस के व्यतीत करें जीवन !
ताकि हंसते हुए हमें देखकर ,
बदल जाए , किसी और का जीवन !!

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त्यौहारों का देश है ,
यह हमारा भारतवर्ष !
मेला-सा लगा रहता है ,
लगभग समस्त वर्ष !!
एक के बाद , दूसरा ,
फिर तीसरा , होते हैं अनेक त्यौहार !
जो दे जाते हैं हमें ,
न जानें , कितनीं खुशियाँ अपार !!
क्योंकि खुशी का प्रतीक है , 
ये सभी त्यौहार ! 
इनके आ जाने से ,
जीवन मेँ , आ जाती है बहार !!
कभी-कभी कुछ पल भी ,
ऐसे आते यकायक !
कि जिनसे जीवन हो जाए , 
बिल्कुल चकाचक !!
मन झूम जाता है ,
कोई खुशी पाकर अचानक !
और वह पल लगता है
जैसे किसी त्यौहार की छम-छम !!

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दिनांक 8अगस्त , 2018
दिन बुधवार

विषय जिजीविषा
रचयिता पूनम गोयल

जिजीविषा नहीं मेरी 
कि मैं दीर्घायु रहूँ !
परन्तु इतना अवश्य है ,
कि जब तक जीऊँ , स्वस्थ जीऊँ !!
नहीं ऊँचे-ऊँचे स्वप्न मेरे ,
नहीं कोई विशेष अभिलाषा !
परस्पर स्नेह का वातावरण हो ,
बस इतनी छोटी-सी , मेरी आशा !!
कभी थी , मेरी भी जिजीविषा ,
चाहा था कि आयु लम्बी बिताऊँ मैं !
परन्तु समझा जबसे , स्वास्थ्य का महत्व ,
तो इसी को मूल-मन्त्र बनाऊँ मैं !!

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मौन क्यों बैठे , कन्हैया ,
कुछ तो बोल दो !
हुई क्यों ? किरपा नहीं अब तक , 
यह राज खोल दो !!
मौन क्यों.............
1)--बैठी हूँ दरस को तेरे ,
एक बार देख लो !
दृष्टि कृपा की , कान्हा , 
एक बार फेर दो !!
विनती सुनों , कन्हैया ,
ये पट खोल दो !
मौन क्यों.........
2)---भक्त तेरे कैसे भी हों , 
तू बड़ा दयालु !
करें वो भूलें कितनीं भी ,
तू बड़ा कृपालु !!
मेरी श्रद्धा को तुम , कान्हा ,
प्रेम-तुला में , तोल लो !
मौन क्यों..........
3)---जगत् में नाम है तेरा ,
तू सबका सहारा !
राजा हो , रंक हो कोई ,
तूने तो है सबको तारा !!
मेरे मन में भी , तुम कान्हा ,
मिश्री-सी घोल दो !
मौन क्यों..........

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भावों के मोती समूह ,
दैनिक कार्य स्वरचित लघु कविता

दिनांक 16अगस्त , 2018
दिन वीरवार 
विषय ख्वाहिशें
रचयिता पूनम गोयल

मेरी ख्वाहिशों की फेहरिस्त ,
कुछ इस कदर बढ़ गई !
कि मेरी चादर , इन ख्वाहिशों से , 
काफी छोटी पड़ गई !!
हर रोज़ इनका ,
एक नया पुलिंदा !
जिसे देखकर , मैं ख़ुद भी ,
हो जाऊँ शर्मिंदा !!
क्योंकि मैं नहीं थी ऐसी ,
हरगिज़ नहीं थी !
बहुत कुछ था मेरे पास ,
सिर्फ और सिर्फ ये मेरी ख्वाहिशें ही नहीं थी !!
फिर , न जानें , कब ? कैसे ? और कहाँ से ?
ये आ गई !
और मेरी ज़िन्दगी में ,
एक अज़ीब सी हलचल मचा गई !!
समझ नहीं आता ,
कि करूँ , तो क्या करूँ !
कैसे ? मै , फिर से , अपनी इन ख्वाहिशों को ,
ख़ुद से जुदा करूँ !!
ज़िन्दगी एक अज़ब से 
ढर्रे पर चल रही है !
क्योंकि पल-पल ,
इन ख्वाहिशों की रफ्तार बदल रही है !!
अब तो ख़्वाब में भी ,
इनका मेला-सा लगा रहता है !
और ख़ुदा के नाम के बजाय ,
बस इनका ही बोलबाला बना रहता है !!
न जाने , ख़ुदा कभी इसके लिए ,
मुझे कभी मुआफ करेगा भी , या नहीं ?
न जाने , ज़िन्दगी की राह पर ,
मेरा कोई सही कदम ,
उठेगा भी , या नहीं !!
बेक़ाबू हूँ लगातार ,
ख़ुद के ज़ज़्बातों पर मैं !
और बढ़ रही हूँ , 
न जाने , किस डगर पर मैं !!
अ'ख़ुदा , 
तुझसे ग़ुज़ारिश है मेरी !
कि सभी भूलों को मुआफ कर,
तू राह बदल दे मेरी !!

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दिनांक 21अगस्त , 2018
दिन मंगलवार
विषय बेईमान
रचयिता पूनम गोयल

सीने की गहराई में
छुपा रक्खा था , दर्द कहीं , 
आंसू बेईमान निकले
और एक झटके में ,
सब राज़ कह दिया ।
फिर तो बन गया समन्दर ,
जिसमें हर जख्म बह गया ।।
चाहा था कि उम्र-भर ,
पर्दे में रहेंगे हम ,
मगर इन आंसुओं ने तो ,
सब रूबरू कर दिया।
और छेड़कर , गम के फसाने ,
मेरे संग-संग , हर किसी को ,
गमगीन कर दिया ।।
वैसे भी , गम तो बहुत हैं जमाने में ,
और ग़मज़दा लोग भी ।
तो क्यों न , खुशियाँ बाँटी जाएं ।
ताकि खुश रह सकें हम सभी ।।
मिलकर हम सब , 
ज़िन्दगी का ढर्रा ही बदल दें ।
और खुशियों की सौगात देकर ,
ज़िन्दगी खुशनुमा बना लें।।


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