'अ़क्स ' दौनेरिया



दिनांक-10.11.2019
शीर्षक-मनपसन्द विषय लेखन

विधा-ग़ज़ल
मात्राभार- 1222 1222 1222 1222
क़ाफ़िया- अर स्वर
रदीफ़-बैठ जाएगा ।
=============================
अगर मीठी सदा दोगे पिघलकर बैठ जाएगा ।
बुलाओगे मुहब्बत से बिरादर बैठ जाएगा ।।
**********************************
ख़ुदा जाने कहाँ से ताब आती है सदाओं में,
पड़ेगीं कान में जिसके वो रुककर बैठ जाएगा ।।
************************************
वफ़ा करना,निभा लेना ये लाज़िम है मुहब्बत में ,
दग़ा दोगे किसी को तुम लरजकर बैठ जाएगा ।।
************************************
लगी आबोहवा अच्छी गजरदम टहलने निकला,
बुलाऊँगा किसी को पास आकर बैठ जाएगा ।।
************************************
हक़ीक़त बात है मेरी भले इन्सां अजनबी हो,
अगर दोगे मुहब्बत तुम तो पलभर बैठ जाएगा ।।
=============================
'अ़क्स ' दौनेरिया


दिनांक-03.11.2019
विषय-स्वतंत्र लेखन

विधा- ग़ज़ल
मात्राभार-2122 2122 2122 212
अर्कान-फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
क़ाफ़िया- आने स्वर
रदीफ़- गए ।
===========================
हाल-ए-दिल किससे कहें जो दिल को बहलाने गए ।
प्यार का परचम तेरे कूचे में लहराने गए ।।
***********************************
टूटती रस्म-ए-मुहब्बत काँपते से हो़ंट थे ,
हाए ,क्या हो बेबसी पत्थर से टकराने गए ।।
***********************************
मैं सदा देता हूँ तुमको भाग कर आ जाइए ,
दिल को साथ अपने दिल को बहलाने गए ।।
**********************************
एक दिन ऐसा भी आया हम तिरे दीदार को,
छोड़ कर तेरी गली उठ करके मैख़ाने गए ।।
***********************************
पेंच कुछ ऐसे फँसे बेशक़ उन्हें तुहमत लगे ,
एक दिन उनके खड़े कर यार पहचाने गए ।।
============================
'अ़क्स ' दौनेरिया


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

दिनांक-26.10.2019
शीर्षक-🌹रूप/सौंदर्य🌹
िधा -मुक्तक
=====================
(01)
रूप का आगार तुमको देखकर कविता लिखूँ मैं ।
कीजिए श्रृंगार तुम को देखकर कविता लिखूँ मैं।।
वासनाएँ यज्ञवेदी पर हवन कर राख कर दूँ ,
प्रेम का आधार तुमको देखकर कविता लिखूँ मैं ।।
(02)
मैं प्रणय को भस्म तन पर यूँ रमाना चाहता हूँ ।
जो तुम्हारे रूप पर अधिकार पाना चाहता हूँ ।।
आकुल विरह पीड़ित तुम्हारा हूँ मुझे शाश्वत शरण दो,
पारश्ववर्ती परिधि से बाहर न जाना चाहता हूँ ।।
=====================
'अ़क्स' दौनेरिया


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

दिनांक-24.10.2019
शीर्षक- समीर/पवन/हवा

विधा- क्रमशः जुदा-जुदा
=====================
(01 )समीर *दोहा मुक्तक*
प्रियवर ! तेरे दीद से,चाहत बहा समीर ।
यह उर मम घायल हुआ,उठी विरह की पीर।।
विचलित सारी वृत्तियाँ,लगीं उगलने आह ,
समझ नहीं आता मुझे,कैसे राखों धीर ।।
(02)पवन*मुक्तक*
चले आइए टुक इधर कान्ह प्यारे,
मुरादों का तेरी पवन बह रहा है ।
महफ़िल सजी है कि यादों की दिल में,
तुम्हीं मेरे सब कुछ भजन कह रहा है।।
नहीं मुझको सूझें हसीं जग की राहें,
मुझे तेरी बंशी ने जग भर भुलाया,
दिल का ये अहवाल आकर मिलेगा,
बिना तेरे कैसे अमन रह रहा है ।।
(03)हवा *कुण्डलिया छन्द*
आई पश्चिम की हवा,खींच गई प्राचीर ।
आकर भारत देश की,यह बदली तसबीर।।
यह बदली तसबीर,जुड़ी अंग्रेजी कल्चर ।
जाति धर्म का चक्र,कर दिया उसको पंचर।।
पहनावों में खलल,सिमटती खादी पाई ।
तहस-नहस सब खेल,हवा पश्चिम की आई।।
=======================
'अ़क्स' दौनेरिया


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

आयोजन-स्वतंत्र लेखन
दिनांक- 13.10.2019

क़ाफ़िया-ई स्वर
रदीफ़-की तरह
वज़्न-212 212 212 212
=====================
तुमने देखा मुझे अजनबी की तरह ।
और फेरी नज़र वापसी की तरह ।।

दिल लगाकर बढ़ा रंज उफ़ तक न की,
दर्द सहता रहा खामुशी की तरह ।।

दिल लगाया कि तुम याद में बस गए,
जो उभरते रहे शायरी की तरह ।।

दिल को लेके सनम! तुम मदारी बने,
नाचता में रहा मर्कटी की तरह ।।

जाने मन!जाने दिल! तुम कहाँ छिप गए,
मैं रहा ढूँढ़ता नौकरी की तरह ।।
=========================
स्वरचित- राम सेवक दौनेरिया 'अ़क्स'
बाह -आगरा (उ०प्र०)


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

दि०-12.10.2019
शीर्षक शब्द- सिलसिला
विधा-चतुष्पदी
====================
(01)
मैं बैरी हूँ निज का स्वयं साहाय्य नहीं ठहराता है ।
उत्तुंग शिखर पर चढ़ने का सिलसिला नहीं बन पाता है ।।
यों सदा अधोगति मेरी है कलपता रहूँ कर हाथ खड़े ,
मेरे जीवट रह जाते हैं नैरास्यपुंज की माँद पड़े ।।
***************************
(02) सोरठा मुक्तक
=============
पहने गैरिक वस्त्र, कुछ-कुछ ऐसे सन्त हैं ।
जिन्हें समझते अस्त्र,जीवन यापन के निमित ।।
गात हुआ बलहीन ,जो घर से निर्गत करे ।
यत्र तत्र सर्वत्र , चलहि सिलसिला अनवरत ।।
=====================
'अ़क्स ' दौनेरिया


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
दिनांक -04.10.2019
शीर्षक-स्पर्श

विधा मुक्तक
======================
(01)
मन घायल हो गया कौन यह रण है ?
स्पर्श तुम्हारा हाथ चेत दूषण है ।।
प्रिय! रखतीं हैं हलकान तुम्हारी यादें,
बिना तुम्हारे व्याकुल यह छण-छण है।।
(02)
जब-जब तुमको स्पर्श किया करता हूँ ।
तब-तब मन को उत्कर्ष दिया करता हूँ।।
तुम्हें देख मन की झोली भर लेता,
स्मृतियाँ रख, साहर्ष जिया करता हूँ ।।
========================
'अ़क्स ' दौनेरिया

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
दिनांक-03.11.2019
विषय-स्वतंत्र लेखन

विधा- ग़ज़ल
मात्राभार-2122 2122 2122 212
अर्कान-फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
क़ाफ़िया- आने स्वर
रदीफ़- गए ।
===========================
हाल-ए-दिल किससे कहें जो दिल को बहलाने गए ।
प्यार का परचम तेरे कूचे में लहराने गए ।।
***********************************
टूटती रस्म-ए-मुहब्बत काँपते से हो़ंट थे ,
हाए ,क्या हो बेबसी पत्थर से टकराने गए ।।
***********************************
मैं सदा देता हूँ तुमको भाग कर आ जाइए ,
दिल को साथ अपने दिल को बहलाने गए ।।
**********************************
एक दिन ऐसा भी आया हम तिरे दीदार को,
छोड़ कर तेरी गली उठ करके मैख़ाने गए ।।
***********************************
पेंच कुछ ऐसे फँसे बेशक़ उन्हें तुहमत लगे ,
एक दिन उनके खड़े कर यार पहचाने गए ।।
============================
'अ़क्स ' दौनेरिया

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
स्वतन्त्र लेखन के तहत
प्रस्तुत ग़ज़ल

दिनांक-22.09.2019
मात्राभार- 2122 2122 2122 212
अर्कान-फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
क़ाफ़िया - आरी
रदीफ़- चिट्ठियाँ
============================
जो तुम्हें भेजी थीं लिखकर के करारी चिट्ठियाँँ ।
बे पढ़े ही फाड़कर तुमने बुहारी चिट्ठियाँ ।।

फूट मत डालो हमारे बीच में आकर कि यूँ ,
क़त्ल कर देंगीं बनेंगी जब कटारी चिट्ठियाँ ।।

चैन से रहने नहीं देता ज़माना जब हमें ,
जाने क्यूँ इम्दाद करती हैं हमारी चिट्ठियाँ ।।

कब मुझे मालूम पड़ता क्या सबब नाराज़ तुम?
जड़ नहीं मुझको बताती हैं तुम्हारी चिट्ठियाँ ।।

मत सिकोड़ो नाक भौं तुम आजकल की बात पर,
यह कि चुपके से पढ़ी जातीं अटारी चिट्ठियाँ ।।
==========================
'अ़क्स ' दौनेरिया



@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

No comments:

"स्वतंत्र विषय लेखन "08दिसम्बर 2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें   ब्लॉग संख्या :-589 अभी सक्रिय है ...