गोविन्द प्रसाद गौतम








लेखक परिचय

01 नाम गोविन्द प्रसाद गौतम् 02 जन्मतिथि 18 जुलाई 1952 03जन्म स्थान कोटा,राजस्थान 04 शिक्षा एम0 ए0 हिंदी,राज0 विज्ञान,बी0 एड0 05 सृजन की विधाएं कविता,कहानी 06 प्रकाशित रचनाएं नहीं 07 कोई सम्मान जिलाधीश द्वारा पुरस्कृत 08 सम्प्रति व्यवसाय सेवनिवर्त शिक्षक 09सम्पर्क सूत्र 3b 26 महावीर नगर विस्तार योजना कोटा,राजस्थान 10 मोबाइल नम्बर 94 606 77 429 11 ई मेल आई डी govind3b26@gmail.com@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ शीर्षक अपराध,गुनाह
विधा लघुकविता

04 जुलाई 2019,गुरुवार

स्व लाभ हित करनी करते
बन अपराधी जीवन जीते।
नित अपराध करे अनवरत
जन जीवन मे वे सब पिटते।

अपराधों की बड़ी सूची हैं
मानव पर दानव हैं भारी।
निज कर्तव्य सदा भूलते
सभी दुःखी उनसे नर नारी।

अपहरण चोरी करते नित
लोभी लंपट घूम रहे सब।
वकीलों का मिंले संरक्षण
न्याय मौन होजाता है तब।

संसद बैठी मौन क्यों है
कड़े कानून क्यों नहीं बनते?
सद्बुद्धि संस्कार गए कँहा
सुपथ पे नर क्यों नहीं चलते ?

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
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छाते नभ कजरारे बदरा
रिमझिम नभ से पानी बरसे।
स्वाति नक्षत्र एक बूंद को
चातक पक्षी शाख पर तरसे।

उड़े लहरिया हरा भरा सा
ललना झूले ऊपर लचके।
बोले दादुर मोर पपीहे
मन मानस सभी का हरखे।

नदी नाले नीर सरोवर 
सबको आकर्षित करते ।
वन भ्रमण में गाते हँसते
खिले सुमन मन को हरते ।

सावन मन भावन होता
वसुधा पर छाई हरियाली।
त्योहारों का पावन मौसम
झूम रही हर डाली डाली।

ढोलक झांझ मजीरे बाजे
देवालय में करते नर्तन।
व्रत अर्चन करे सावन में
बेलपत्र शिवजी को अर्पण।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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विधा लघुकविता
02 जुलाई 2019,मंगलवार

एक सिक्के के दो पहलू
होते हैं अधिकार कर्तव्य।
सुखमय सुन्दर जीवन का
महल बनता है अति भव्य।

मातपिता का प्रिय अधिकार
सदसँस्कार बालक में भरना।
कलुषित आदत सदा हटाकर
प्रगति पथ नित इंगित करना।

शस्य श्यामल वसुंधरा सुत
अधिकारों से आगे बढ़ते ।
डटे हुये कर्तव्य पथ पर
मंजिल ऊपर वे नित चढ़ते।

परमपिता सबका परमेश्वर
बागवान है वह धरती का।
सर्वाधिकार वह सम्पन्न है
रखे ध्यान सर्व करनी का।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
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कोई वजह नहीं जानता
प्रकृति का अद्भुत परिवर्तन।
कठपुतली से घूम रहे हम
प्रभु करवाता है नित नर्तन।

मायाजाल फैला जग में
तेरा मेरा हम नित करते।
कोई वजह नहीं जानता
कैसे जन्मे और क्यो मरते?

सारहीन जीवन पथ पर
उत्तम कर्तव्य पथ होता।
यही वजह है कर्महीन तो
वह जीवन में नित रोता।

ज्ञान भक्ति के अद्भुत बल से
नर जीवन साकारित करता।
इसी वजह के कारण मानव
प्रभु नाम जीवन भर भजता।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।


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30 जून 2019,रविवार

जन्म मृत्यु मध्य जीवन
साकारित प्रभु देन यह।
पर हिताय पर सुखाय
अद्भुत जीवन होता वह।

खुद का जीना पशुतुल्य है
परहित जीना होता जीना।
जय जवान जय किसान से
सीखो श्रम जीवन में करना।

प्रभु अवतारित भव्य जीवन
सदा प्रेरणा का स्रोत यह।
दानव से जो बन गए मानव
प्रेरणादायक सोच है वह।

जीवन सार है जगति का
आओ कुछ ऐसा कर जाओ।
नश्वर चँचल इस काया से
कर्म सहारे प्रभु पद पाओ।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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विषय जनतंत्र
विधा लघुकविता

28 जून 2019

जन के द्वारा जन के लिये
होता है जनतंत्र उपयोगी।
मतदान अति आवश्यक
दृढ़ विपक्ष अति है संयोगी।

राजा रंक सभी सम होते
है जनतंत्र प्रिय पहिचान।
प्रतिभा का आदर करना
आन मान भारत की शान।

यह जनता का कल्याणक
जनता के द्वारा निर्वाचित।
अभिव्यक्ति की है आजादी
होते विद्वजन गौरवान्वित।

लोकतांत्रिक गरिमा शाली
सबको नव सँविधान मिला।
प्रगतिपथ नित आगे बढ़ना
चलता रहे सदा सिलसिला।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
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27 जून 2019,गुरुवार

प्रकृति स्वयं परिवर्तनशील है।
कलियां चटके पुष्प महकते।
षड ऋतुओं का अद्भुत संगम
अति आनंदित कभी बहकते।

सुख दुःख लाभ हानि यश 
धूप छाँव जीवन भर चलती।
कभी नाव को मिंले किनारा
कभी सागर लहरों में बहती।

बचपन गया बुढ़ापा आया
पर जीवन ने बहुत सिखाया।
चँचल काया चँचल माया 
भक्ति पथ नव मार्ग बताया।

जन्म मृत्यु शाश्वत परिवर्तन
अवगत होकर नर अनजाना।
परोपकार के पथ चल नित
मुक्तिधाम बस तेरा ठिकाना।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
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विधा लघुकविता
26 जून 2019,बुधवार

गगन पटल पर रवि रश्मि से
भिन्न भिन्न स्वरूप सजाता।
सप्त रँगी अद्भुत रंगों से
इंद्रधनुष वह स्वयम बनाता।

रिमझिम बूंदे रवि निहारे
श्यामल बदरी के अंचल में।
अद्भुत अलौकिक रूप भव्य
दिखता है वह जल थल में।

इंद्रधनुष उपहार प्रकृति का
मन आकर्षित सबका करता।
अर्जुन के गांडीव धनुष को
मानो वह सप्त रंगों से भरता।

इंद्रधनुष आनंद प्रतीक जग
स्नेह नयनों से सभी निहारे।
वर्षा के पावनमय मौसम में
जन जन देखे कोई न हारे।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
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नमन मंच भावोंके मोती
विषय     मोबाइल
विधा      लघुकविता
25 जून 2019,मंगलवार

दूर देश में बातें करते हम
सुख दुःख से अवगत होते।
मोबाइल जीवन पर्याय है
हँसते गाते लेकर कर सोते।

कला सन्निहित मोबाइल
सर्व गुणों का यह आगार।
सकारात्मक अगर सोच है
खुशियां मिलती अपरम्पार।

दूर रखो अबोध बच्चों को
शुभ अशुभ वे क्या जाने?
वह मात्र खिलौना समझे
मोबाइल सुख साधन माने।

भावों के मोती सजते नित
काव्य बेल नित फैल रही है।
अंजाने होकर भी हम सब
स्नेह किरण हिय खेल रही है।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
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भावों के मोती अद्भुत हैं
स्वर वर्ण की सुन्दर माला
कण्ठ विराजे मात शारदे
काव्य कुंज मन मतवाला
भावों के मोती में बहती
भावों की पावनमय गङ्गा
ऋतुराज मुकेश शंभो
वीणा सुरमय होती संध्या
चंद्रप्रकाश रश्मि प्रीति
पूनम चँदा और पूर्णिमा
रामप्रसाद राम सेवक से
बनी हुई भावों की गरिमा
अभय अशोक और मनीष
देवेंद्र उषा प्रिय सारिका
शीला रचना अति भव्य है
गीत खुशी गावे संगीता 
सुलोचना सुरेंद्र संतोष
रेणु संतोष मय कृतिंया
नीलम देवेंद्र और अंजू
करे काव्य सुंदर बतिया
स्वस्थ तन हो स्वस्थ मन हो
स्वस्थ करे आचार विचार
दोहरा चरित्र मुखौटा पहने
ऐसा जीवन अति धिक्कार।।
गणना करना अति मुश्किल
भावों के उज्ज्वल मोती की
अखंडित आलोकित करती
जयति जय दिव्य ज्योति की।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।।

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नमन मंच भावोंके मोती
स्वतंत्र लेखन
विधा    लघुकविता
23 जून 2019,रविवार।

पर्यावरण विश्व समस्या 
इस पर कुछ करना होगा।
वन सुरक्षा नव पौधों से 
धरती पर रंग भरना होगा।

मानसून उठता सागर से
शीतलता आकर्षित करती।
संवहन की क्रिया से ही
वसुंधरा को जल से भरती।

ध्वनि वायु जल प्रदूषण 
हाहाकार मचा धरती पर।
इनका केवल एक उपाय है
ध्यान रखें स्वयं करनी पर।

जल,वायु ध्वनि हो निर्मल
नव पुष्पों से धरा पुष्पित हो।
मलय बयार चले धरती पर
सुख समृद्धि सदा फलित हो।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
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शयन वक्त ही करवट नहीं है
करवट होती सदा जागरण
शुद्ध कर्म पर अड़े रहो जग
है कर्म पूजन नित आमरण
करवट है हुंकार जीवन की
मानव आखिर क्या न करता
तूफानों से संघर्षित वह नित
सदा लक्ष्य मुठ्ठी में है भरता
सतयुग त्रेता द्वापर कलियुग
कालचक्र अद्भुत करवट है
जो जाना है अद्भुल पल को
सदा जग में वह नर वर है
ऋतुएँ भी करवट लेती 
गर्मी बरखा सर्दी आती
कभी काया होती कंपित
कभी गर्मी आग लगाती
करवट लेता है जीवन भी
जन्म युवा बुढ़ापा आता
मायावी मतलबी जग में
न स्वयं पहिचान है पाता
करवट राह बदल देता है
दानव से मानव बन जाता
अगर स्वयं से भिज्ञ रहे तो
सुख चैन जीवन नित आता
लोकतंत्र महायज्ञ आहुति
करवट बदले राजनीति की
निर्वाचन जन एकाधिकार से
सूरत बदले रीति नीति की।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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हरित वसन पहने वसुधा
श्वेत वसना मात शारदे
नीलाम्बर नभ शौभित है
पीत वसन पहने माधवे
तन ढकने को वस्त्र जरूरी
वसन मान सम्मान हैं देते
शीत ऋतु बयार चले ठंडी
कंपित काया को ढक लेते
प्रिय बापू ने वसन हेतु ही
स्व हस्त चर्खा नित काता
वस्त्र एक पहना जीवन में
हो सम्पन्न प्रिय भारतमाता
भरी सभा में द्रोपदी का
कौरव चीर हरण किया
दुःशासन थककर हारा
स्वयं वसन कृष्ण दिया
कपड़े अब फ़ैशन बन गए
तन सृंगारित और दिखावा
नर नारी करते आकर्षित
वस्त्र बन गया मात्र छलावा
रंग वस्त्र प्रतीक बन गए
खाकी वर्दी पुलिस सुरक्षा
जल थल नभ भिन्न वसन
वतन सैनिक करते रक्षा
प्रिय तिरंगा वस्त्र नहीं है
आन बान सम्मान प्रतीक
जन जन प्राण न्यौछावर 
वतन मादरे यह सटीक।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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विषय    गवाह ,सबूत
विधा      लघुकविता
22 जून 2019,शनिवार

सतयुग से कलयुग स्वयं
कालचक्र गवाह जगत का।
जैसी करनी वैसी भरणी
बहुत फर्क पड़ता संगत का।

जीवन जीना क्या होता है
राम कृष्ण स्वयं गवाह हैं।
सद्ग्रन्थ सब लिखे हुये हैं
कोई नहीं करता परवाह है।

धरती अम्बर सूरज चन्दा
वनस्पति स्वंय गवाह है।
जग नियन्ता स्वयं ईश्वर
सत्य पथ ही श्रेष्ठ राह  है।

अच्छे बुरे का गवाह है ईश्वर
हर पल उससे छिपा नहीं है।
जन्म मृत्यु विवाह नियन्ता
पत्ता उस बिन हिलता नहीं है।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
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नमन मंच,भावों के मोती
विषय    योग,स्वास्थ्य
विधा      लघु कविता
21 जून 2019,शुक्रवार

योगदिवस है अंतर्राष्ट्रीय
योगदिवस नित्य मनाएं।
तन मन स्वस्थ रखे जीवन
कंचन काया भव्य सजाएं।

ओमकार उदगीत सुहाना
अनुलोम प्राणवायु देता है।
कपाल भांति वसा घटावे
तनाव कम भ्रामरी करता है।

पैर गरम हो, पेट नरम हो
सिर सदा रहता हो शीतल।
दौड़ लगालो नित जीवन में
देह रोगाणु रहित हो निर्मल।

पहला सुख निरोगी काया
माया तो चलकर आती है।
जीवन अद्भुत अति सुहाना
सुख शांति सबको भाती है।

गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
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नमन मंच,भावोंके मोती
विषय   दर्पण,आईना
विधा     लघुकविता
20 जून 2019,गुरुवार

मन दर्पण में धूल जमी है
मैं दर्पण तुझसे कुछ कहता।
मायावी अंधकार जगत से
तू क्यों नहीं बाहर निकलता?

मुझमें मत तुम मुँह देखो रे
मैं टूट फूटकर अति रोऊंगा।
देख रहा हूँ पाप गठरिया
कैसे स्वयम को मैं रोकूंगा?

दर्पण मिथ्या कभी न बोले
हर झूँठ उजागर करता है।
सुधरो अब तो अरे मानवी
सत्य पथ ,क्यों न चलता है?

बाह्य आवरण दर्पण देखे
स्वविवेक देखे अंतर को।
चार दिन की यह जिंदगानी
अब भूल जंतर मंतर को।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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नमन मंच,भावों के मोती
शीर्षक   किनारा,तट
विधा      लघुकविता
19 जून 2019,बुधवार

भवसागर फेंका हमको
कभी तैरते कभी डूबते।
हवा प्रभंजन चले थपेड़े
हर पल मात्र तट ढूंढते।

मोटे मोटे मगर मच्छ हैं
मुँह फाड़कर हम देखते।
गर्जन करती आती लहरें
हम सागर अति सहमते।

संघर्षों से लड़ते प्रति पल
नहीं मिलता हमें किनारा।
दूर क्षितिज दिखता केवल
नहीं मिलता है कोई सहारा।

प्रभु एक आसरा बस तेरा
भवसागर से पार लगादो।
भटके भूले सहमे हम सब
आप किनारा हमें दिखादो।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
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नमन मंच भावोंके मोती
शीर्षक     पदक
विधा       लघुकविता
18 जून 2019,मंगलवार

स्वर्ण रजत कांस्य पदक
यह ग्रीवा की शोभा नहीं।
खून पसीना कड़ी तपस्या
जो करता जग पाता वही।

पदक प्रतीक होते गौरव के
लगन परिश्रम का परिणाम।
जो जूझते प्रतियोगी बनकर
उसको मिलता है यह दाम।

उच्च मध्य निम्न स्तर जग
जँहा चाहो स्थान बनाओ।
मानव जीवन मिला हमें तो
परहित भक्ति भाव सजाओ।

पदक नहीं हैं खोटे सिक्के
जौहरी कीमत इनकी जाने।
समूचा जीवन करे समपर्ण
कोहिनूर को सब पहिचाने।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
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नमन मंच भावोंके मोती
शीर्षक    नीयत
विधा       लघुकविता
17 जून 2019 ,सोमवार

संस्कार संस्कारित करते
अच्छी बुरी सभी नीयत ।
मातपिता गुरु आशीष से
कृपा होती सदा अनवरत।

नीयत पतन और विकास 
सबकी अपनीं निजी सोच ।
सोचो समझो कदम बढ़ाओ
आवे कभी न जीवन मोच।

नीयत साफ़ होती है तब 
प्रभु भक्ति स्वीकार करते।
आना जाना होता जीवन 
जैसा करते वैसा ही भरते।

नीयत पर संसार है निर्भर
सद सोच तो यंही स्वर्ग है।
बद नियत तुम अगर रखोगे
तब जीवन नरकीय नर्क है।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम


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नमन मंच भावोंके मोती
शीर्षक   डाल, शाख
विधा     लघुकविता
14 जून 2019,शुक्रवार

बीज रूप होता वृक्ष  है
जड़ पर ही वह निर्भर है।
पल्लवित पुष्पित फलित
भव्य डाली के ऊपर है।

सम्प्रदाय की कई शाखाएं
परमपिता सबका एक है।
जाति वर्ण भिन्न भिन्न सब
स्नेह दया ममता  एक है।

हम गमले में सुमन खिले हैं
अलग अलग सबकी डाली।
यह प्रकृति की नव भव्यता
कब गमला हो जावे खाली?

तना सहारा देता शाखा को
डाली होती वृक्ष की शौभा।
सुमन सरीखे हँसो जीवन मे
जीवन जीता है ज्यो भँवरा।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम


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नमन मंच भावों के मोती
शीर्षक     चक्रव्यूह
विधा        काव्य
12 जून 2019,बुधवार

हर संघर्ष चक्रव्यूह होता
साहस धैर्य,हल इसका है।
आती जाती रहती विपदाएँ
करे परिश्रम फल उसका है

जीवन स्वयं एक चक्रव्यूह 
सुख दुःख आते जाते रहते
कभी भीषण तपती है गर्मी
नदी नाल फिर निर्झर बहते

ममता माया मोह आच्छादित
चक्रव्यूह में निशदिन डोलते
गांठें बड़ी बड़ी है जगति में
उलझी गांठ कर्मवीर  खोलते

चक्रव्यूह से क्या डरना है
मानव जीवन श्रेष्ठ मिला है
जैसी करणी वैसी भरणी
पंक मध्य कमल खिला है।।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम्
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नमन मंच भावों के मोती
शीर्षक      घर
विधा       लघुकविता
11 जून 2019,मंगलवार

खग कुल मिल नीड बनाते
तिनका लाकर उसे सजाते।
वायु प्रकाश समाहित करते
सुख स्वर्गीम निज घर पाते।

जँहा आश्रय मिलता हमको
सब आवश्यकता पूरी होती।
सुख शांति संस्कार संजोते
उस घर में नित दमके मोती।

भाव भक्ति भगवन अर्चन
स्नेह सुधा की सरिता बहती।
वह निकेतन स्वयम स्वर्ग है
दया ममता हिय नित रहती।

पर सत्कार सदा घर होता
मन सन्तोषी सदा सुखी है।
माया मोह अस्थाई यह घर
सत्य सदन प्रभु चहुर्मुखी है।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम

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स्वस्थ निरोगी तन मन हो
तभी समाहित होते हैं सुख
स्वच्छ जल वायु ध्वनि हो
फिर कौनसा जग में दुःख
भौतिकवादी इस जीवन मे
दिखावा सब मिल करते हैं
दौडधूप करते जीवन भर
निज स्वार्थ जग में भरते हैं
कई रोग हम स्वयं पालते
चोरी चुगली दिनभर करते
मन मुटाव द्वेष ईर्षा वाचन
से जीवन मे क्षणभर मरते
योगा कसरत जो करते हैं
स्वस्थ निरोगी वह् रहते हैं
स्वयं सुखी रहते जीवन भर
परहित पर पीड़ा हरते हैं
अति खा लेना अति बोलना
सदा मर्ज़ के यह कारण हैं
सावधान सचेत रहो प्रतिदिन
ताज़ा भौज्य सत्य निवारण है
तन स्वस्थ तो मन स्वस्थ है
सदा संतोषी स्वस्थ रहता है
परहित डग पर चरण धरे जो
नित रोगी के आँसू हरता है।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविंद प्रसाद गौतम

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नमन मंच भावों के मोती
शीर्षक    कोयल
विधा       लघुकविता
10 जून 2019,सोमवार

कोकिलकंठी लता माधुर्य
जिसने नाम बढ़ाया जग में।
मिस्री घुली अपनी वाणी से
राज करे जग के तन मन में।

कोयल बैठी वृक्ष शाख पर
कुहू कह आकर्षित करती।
अपनी मधुर प्रिय वाणी से
स्नेह सुधा जीवन में भरती।

कौआ काला कोयल काली
रंग रूप भी अलग नहीं है।
वाणी का चातुर्य कोयल में
वह मीठापन कँही नहीं है।

जीवन में कोयल सम बोलो
यह जीवन की एक कला है।
परहित डग पर चरण धरो 
मधुर वाणी में सदा भला है।

स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
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मेघ गरजते मेघ बरसते
मेघों की अपनी लीला है
नीले पीले काले मटमैले
दूर गगन यह सिलसीला है
बादल पानी को जग देते
जिससे जीवन का संचरण
बिन जल के है जीवन सूना
हर प्राणी जरूरत आमरण
शस्यश्यामल वसुधा हँसती
प्रकृति पावन हरी हरी है
बिन पानी के जग है सूना
फसल सूखती मरी मरी है
जल जीवन है जल सर्वोपरि
जलदाता मेघा हैं पावन
मेघा हरषे बरसे वसुधा पर
चलता नित आवन जावन
सागर नदियां ताल तलैया
निर्भर करता है मेघों पर
यही सदा मरहम जीवन
लेप लगावे दुख दर्दो पर
श्यामल मेघ बिना क्या जीवन
दूर गगन का यह सृंगार है
काले बादल पानी बरसा दे
तब ही जगति में बहार है
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।


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धन दौलत लक्ष्मी माँ देती
उल्लू उसका वाहन होता
उल्लू गृह अपार सम्पदा
ईमानदार जीवन मे रोता
जग बाज़ार अजीब है यह
हर वस्तु का सौदा होता
ग्रन्थ मंत्र भजन बिकते
कोई रोता कोई है हँसता
बिकती है भगवान की मूरत
नीर अगन प्राणवायु बिकती
बिन पैसे के सब कुछ सुना 
हर विपदा जीवन हर लेती
स्वर्ण जड़ित कुर्सियां बिकती
कुर्सी दौड़ चलती जीवन भर
ज्ञान विज्ञान वातानुकूलित घर
मान ईमान डिग जाते पैसों पर
सब पैसों के पीछे भगते
छीना झपटी दिन रात चले
कौन चौर है कौन सिपाही
नहले ऊपर होते सब दहले
जीवन के ओ पालनहारा
कोई राजा कोई रंक है
अद्भुत तेरी जग की लीला
घुली हुई चंहु ओर भंग है
मात शारदे विद्या देती जग
वह भी पैसों में बिक जाती
बिन पैसों के माँ की ममता
हर पल जीवन उसे रुलाती
शिक्षित रोज़गार तरसते
मान ईमान पैसा ही होता
पैसा है तो सब जीवन में
बिन पैसों के मानव खोता
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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आहत को राहत देता बस
परमपिता सबका परमेश्वर
करो भरोसा उसके ऊपर
परम् पूजनीय वह् सर्वेश्वर
राहत देते मातपिता निज
राहत दे आदरनीय गुरुजन
राहत तिनके का काफ़ी है
आनंदित कर देते तन मन
पंचतत्व प्रकृति की राहत
जीवन का सुखद संचरण
स्वस्थ सुखद रखे चराचर
प्राणवायु मिंले आमरण
राहत देते सदा पूजनीय
नित नव सीख वे देते 
मन ही मन वे खुद रोते
सदा जीवन हमें हंसाते
अस्वस्थ को स्वस्थ बनाते
चिकित्सक स्वयं रब होता
दुःखी अपाहिज रोते आते
मर्ज हटाकर सदा हंसाता
नमन करते जय जवान को
सदा वतन को राहत देता है 
गरल घूंट निशदिन वह पीता
सुख शांति वतन नित भरता है
सुपात्र राहत नित देना
यही हमारा सद्कर्म है
परहित जीना मरना ही
यही हमारा परम धर्म है।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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जो जगता है वह पाता है
जो नर सोता वह खोता है
जो उठ गया भाग्य उठ गया
कर्महीन जीवन भर रोता है
नींद हमें विश्राम दिलाती
श्रम थकावट सदा मिटाती
दिवास्वप्न नर देखे मिथ्या
उनकी चाहत धूल मिलाती
माया ममता जाल नींद है
मकड़ जाल में घुसते सब
झूठे सपने सदा देखते नर
सबका मालिक एक है रब
सपना होता एक छलावा
सपने में हम क्या न पाते
नींद टूटती सपना गायब
झूठे गीत खुशी हम गाते
मरु मरीचिका जीवन नींद है
भौतिक साधन में सब उलझे
धर्म सत्य जीवन जो पकड़े
वे उलझे नहीं वे जग सुलझे
जन्म मृत्यु मध्य नींद है
रंगबिरंगे अद्भुत सपने
प्रिय परिवार और हितेषी
हँसने वाले न नर अपने
नींद छलावा नींद दिखावा
जगकर भी जो सोते रहते
कर्महीन जीवन नित खोते
कर्मवीर जग जीवन हँसते।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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महा कालेश्वर ओम कारेश्वर
सोमनाथ श्री नागेश्वर
बेघनाथ त्र्यम्बकेश्वर
भक्ति भाव पूजन रामेश्वर
घुश्मेश्वर मल्लिकार्जुन
पशुपतिनाथम है केदारं
जग वैतरणी हाथ तुम्हारे
प्रभु आप करदो उद्धारम
आक धतूरा सेवन करते
नील कण्ठ में प्रिय भुजंगा
जटा जूट से निर्मल बहती
पावन मनोहारी श्री गङ्गा
शिवरात्रि दिन अति पावन
गौरीशंकर आप सुसज्जित
परिणय सूत्र बंधे दोनों मिल
गिरिजा वदन अति लज्जित
मृगछाला आप विराजित
शीश सुशोभित भव्य चँदा
गौरीशंकर श्री गणपति सह
बैल सदा नित रहता संगा
महादेव श्री भोले शंकर
भक्तिभाव प्रभु तुमको पाये
सब मिलकर एक स्वर बोले
नमः शिवायः नमः शिवायः
बम बम भोले हो त्रिनेत्री
नटराजन ओ तांडव कर्ता
एक आसरा है प्रभु तेरा
प्रिय आप खुद पीड़ा हर्ता।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।


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अभिनन्दन वन्दन है चंदन
शौर्य पराक्रम तन में धारी
दुश्मन की सरहद से लौटे 
धन्य धन्य हो तुम बनवारी
आनबान शान सरहद है
सरहद हाथ छाला होता
वीर सिपाही के नित आगे
रिपुदल है अविरल रोता
ये भारत के वीर सिपाही
शौर्य पराक्रम के वे धारी
आगे बढ़ना मूल मंत्र नित
जग में यह पड़ते हैं भारी
सरहद निशदिन जगते वे
हमको मीठी नींद सुलाते
बर्फीली चोटी घाटी पर
थरथर कम्पन गीत सुनाते
सरहद अगर सुरक्षित है तो
वतन सदा सुरक्षित होता
अमन चैन की गङ्गा बहती 
हर नर मीठी नींद सुलाता
अदम्य साहस जाबाज़ों से
कौन यँहा टकरा सकता है
गङ्गा जमुना निर्झर बहता
विश्व शांति सन्देशक बनता
नमन करते प्रिय सरहद को
नमन करते वीर सिपाही
नमन करते जगति के त्राता
कर देता जग त्राहि त्राहि।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविंद प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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मलय पवन चलते झोंखे
मधुमास मधुरता छाई
वन उपवन में उड़े बहारें
सौरभता जगति में लाई
जाड़े में अति शीतल होकर
पवन कंपाती तन मन को
तेज हवाएं भू पर चलती है
पीड़ा पहुँचे है जन जन को
कालचक्र पवन प्रवर्तक है
ये मौसम परिवर्तित करती
कभी शीत है कभी उष्ण है
सुख शांति वह् जग भरती
पञ्च तत्व से जीवन बनता
प्राण वायु है प्रमुख सहारा
बढ़ता लड़ता संघर्षों से वह
नहीं कभी जगति में हारा
रवीरश्मिया पूर्व उदित हो
पवन शांति सन्देशा देती
सर्वभवन्तु सुखिनः जग हो
पवन नव सबक सिखाती
हवा प्रभंजन घन घौर घटाए
सुखद दुःखद क्रम चलता
ममता दया करुणामय हिय में
सुख निर्झर अविरल बहता ।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।


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सहनशीलता कायरता नहीं
समझ सम्भलने का अवसर
उसमें भी नाकाम हुये तुम
कहर ढा दिया घोला जहर
संकल्पों के बल के ऊपर
असंभव संभव बनता है
निष्ठा लगन और वजूद पर
रिपु कायर रिक्त रहता है
ईंट का बदला पत्थर होता
भारत के इतिहास में
खून का बदला खून ही होता
रण बाँकुरे साहस में
कई बार ललकारा तुमने
शांत धीर गम्भीर रहे हैं
सत्तर सालों से झेला तुमको
नद रक्त अब नाल बहे हैं
दृढ़ प्रतिज्ञ संकल्पित सब
हर नर दे भारत बलिदान
अरे नापाकी मुठ्ठी भर तू
कितनी सी है तेरी जान
हिमालय से तुम टकराते
शेरों से कायर तुम लड़ते
अपनी अवकात ही देखलो
मुँह की खाकर भी भिड़ते
संकल्पों से हम जीते हैं
जो सोचते वह् करते हैं
आँख उठाई गर तुमने तो
धुंवा के गुबार उड़ते हैं।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविंद प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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आग धधकती इंतकाम की
हिय में सदा जज्बात उमड़ते
संकल्पों पर नित रहते दृढ़
ऐसे वीर विजय पथ वे बढ़ते
साहस धैर्य कभी न खोते
वे जीवन मे कभी न रोते
विजयपथ गौरव पथ आगे
कातिल पथ पर कांटे बोते
चिड़िया की बस आँख देखते
कौन्तेय से सम तीर चलाते
आगे बढ़ते कभी न रूकते
दानव को नित रण रुलाते
विजय पथ बढ़ना गौरवता है
वीर सिपाही शौर्यता होती है
रिपुमर्दन कर वापस सुरक्षित
नापाकी रिपु आँखे मलती है
सहनशक्ति की सीमा होती
पानी जब सिर के ऊपर हो
तबाह ठिकाने तब होते हैं
वतन हमारा सर्व प्रिय हो
भरतों का मिश्रित भारत है
शेर पकड़ कर दन्त गिनते
शौर्य पराक्रम अदम्य साहस
देख देख रिपु खुद गिरते
कर तिरंगा हम बढ़ते हैं
गङ्गा की सौगंध हमें है
विजय पथ सदा अडिग हैं
आज चुनौती खुली तुम्हे है।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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बाल साहित्य
विधा लघुकविता

26 02 2019,मंगलवार
बच्चे मन के सच्चे होते
द्वेष ईर्षा वे नहीं जानते
मनमौजी हटीले रहते वे
सर्वसुखाय मस्त मानते
रोते खाते रहते दिन भर
हँसते रहते खिलखिलाकर
नव नूतन वे खेल खेलते
उछल कूद करते वे दिनभर
बचपन याद सदा आती है
दादी नानी की अद्भुत गोदी
सुनते रोज़ नित नयी कथा 
जब गुम होते तब माँ रोती
चँदा मामा से बातें करते
नित नव मित्र सदा बनाते
हँसते गाते और चिल्लाते
नयी कविता रोज सुनाते
मम्मी पापा की बांहों में
सदा झूलते रहते झूला
जन्मदिन आता प्रतिवर्ष तो
आनंदित होता हिय फूला
आसमान से बातें करते थे
पेड़ो पर जाकर चढ़ जाते
जामुन आम स्वयं तोड़ते
स्व कर मीठे फल हम खाते 
बचपन का अतुलित आनन्द
हर इंसा को रहता स्मरण
यादें ही बस रह जाती हैं
स्वप्न मात्र बनता आमरण
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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भाग्य कर्म अद्भुत संगम
कोई मावा मिस्री खाता
हँसता गाता और खेलता
अभागा नर कोई न भाता
पूर्व जन्म के संस्कारों से
रंक कभी राजा बन जाता
शहंशाह फकीरी करता है
नर से कोई नारायण बनता
राम लखन वनवास गये थे
सीता खुद वन वन में घूमी
पांडव खाक छानते फिरते
हरदम उनने माटी ही चूमी
मीरा के गिरधर गोपाला
गटक गई विष का प्याला
भक्ति भाव मे तन्मय होकर
पहन गई वह् सर्पो की माला
कर्मप्रधान होते जीवन मे
कर्मशील भाग्य निज लिखते
जैसी करनी वैसी भरनी है
कर्मवीर जग कभी न बिकते 
जीवन देने से पहले ही
कर्ता ने खुद भाग्य लिखा है 
ईमानदार का भाव बड़ा है
कोई कौड़ी भाव बिका है
लगन मेहनत जज्बातों से
जीवन मे लाली आती है
तिमिर हरण पल में होता 
नयी रोशनी जगमगाती है
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@कलमकार हैं दिशा बताते

नित नित नव मार्ग बनाते
खुद रोते हैं मन ही मन में
सबको मधुरम गान सुनाते
सद्साहित्य नित लिखते हैं
ज्योति किरण जग को देते 
सत्यमेव सुंदरतम पथ है
हर नर नारी से नित कहते
कवि धर्म जग सद धर्म है
भर्म तोड़ते हम जीवन का
परमपिता से बड़ा न कोई
चयन करो मार्ग भक्ति का
आना जाना जग जीवन है
अब आये तो कुछ तो करलो
पीड़ित असहाय निर्बल को
परहित मान उसे हिय भरलो
जो चलता मंजिल मिलती
कर्महीन जीवन भर रोता
कायरता और आलस्य में
वह् जीवन सब कुछ खोता
एक पिता की सब संताने
सबकुछ छोड़ यँहा से जाते
तेरा मेरा जीवन झूठा सब
पुण्य कमाओ सब कुछ पाते
सब सुखी हो सभी खुशमय
द्वेष ईर्ष्या फिर क्यों पालते
पावन धरा को स्वर्ग बनालो
क्यों अमृत में जहर डालते?
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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जलमग्न है सब कुछ ही तो
जल मध्य कुछ द्वीप बने
उन द्वीपो में जनजन बसता
भव्य जीवन वितान तने
आसमान से बातें करता
हिमाच्छादित प्रिय हिमालय
झर झर सरिता बहती नित
पावन सुन्दर भव्य जलाशय
खारा कडुवा मधुर कसैला
भिन्न भिन्न स्वादों से मिश्रित
जल का अपना बहुत् महत्व
जन करता पावन दिव्य हित
जल जीवन है सभी जानते
जल बिन जीवन सारा सूना
काले बदरा गरजे बरसे तब
धरतीपुत्र सुख बनता दूना
प्रकृति के हर कण कण में
नीर समाहित ही होता है
आशा और विश्वास सहारे
नव बीज धरा पर बोता है
जल है तो उत्कृष्ट राष्ट्र है
वनस्पतियों का आगारा
विश्व विकास जल निर्भर
है जीवन का मात्र सहारा
जल स्वच्छ तो तन स्वच्छ है
प्रदूषण से नीर बचालो
अति अमूल्य है यह जीवन
सद्कर्म से इसे सजालो।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान

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चोट वार प्रहार न करते हम
सत्य अहिंसा के पथ चलते
सर्व सुखाय हो जगति जन
परोपकार पथ पर हम बढ़ते
कायराना कोई वार करे तो
फिर आँखो में शोला बरसे
नापाक धरती ऊपर हर जन
बूँद बूँद पानी नित तरसे
वार चोट हमले नित करते
खण्ड खण्ड तुम्हे किया है
हमने तुमको दूध पिलाया
तेने सदा जहर उगला है
पीठ पीछे कभी न लड़ते
सदा प्रहार आगे बढ़ करते
वीर भूमि भारत की धरती
हम जग के संताप ही हरते
उल्टी गिनती शुरू हो गई 
चोट वार प्रहार बाकी है
अरे सपोलों शर्म डूब मरो
मौत नाच रही रब साक्षी है
वार किया था जब हमने तो
मुण्ड मुण्ड पर मुण्ड कटे थे
शोणित धार बही पाक थी
रुंड प्रचंड बन वँहा खड़े थे
दन दना दन गोली बरसी थी
वार किया था भारत माता ने
चोट चोट पर चोट निराली
सर कलम कर दिये दाता ने
खून का बदला खून ही होता
वार कभी खाली नहीं जाता
वार प्रहार चोट सब देंगे अब
सुन्दर सुखमय भारत माता।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम

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पूर्वांचल से रवि रश्मियां
शनै शनै वसुधा उतरे
स्वर्णिम दिव्य किरणों से
धरणि पर उजास भरे
ज्ञान उजास है कर्म उजास हैं
दया ममता स्नेह उजास है
परोपकारी बन जग जीता नर
हर्ष प्रसन्नता और हुलास है
अंधा बनकर जो चलता हो
उसको कँहा उजास मिलेगा
सत्यमेव जयते जीवन है
कीचड़ में भी कमल खिलेगा
आसमान में पंछी उड़ते नित
तिनका तिनका वह् लाते हैं
उनको मिलता सदा उजास है
गीत खुशी के वे नित गाते हैं
नहीं उजास कँही मिलता है
कर्मशील पद वह् झुकता है
संघर्षों से जूझता लड़ता वह्
फिर जग में आगे बढ़ता है
मातृभूमि उजास हेतु ही
सैनिक हँस कुर्बानी देते
रक्तरंजित लथपथ होके
निज मस्तक अर्पण करते
गर उजास तो जग जीवन है
अंधकार में रखा क्या है
स्वर्णिम अक्षर नाम लिखाते
कर्महीनता जीवन क्या है
जीवन मे देना पड़ता है
नित आगे ही लड़ना पड़ता
हर पल उजास ढूंढने वाला
पीछे कभी नहीं आगे बढ़ता
अंगारों से जो खेलें हैं
वे श्रम बिंदु फल खाते
तूफानों से वे लड़ते नर
गीत खुशी हरदम गाते।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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जिंदगी जीना कला है
और जीवन साधना है
जिंदगी सोना नहीं है
जिंदगी बस जागना है
गायन वादन नृत्य कला है
सरल सहजता सत्य शिव है
मनोरंजन जग सुख रंजन
मुस्कुराहट आनंद नींव है
समर विजय भी एक कला है
रिपु को घर मे घुसकर मारे
जब कायर की मौत हो निश्चित
गीदड़ सदा शहर में भागे
कला चमक दमकता हीरा
संघर्षों से सदा निरखता
कर्मशील नित आगे बढ़ते 
सुख शांति रस वह् चखता
कला राम है कला कृष्ण है
सर्व कला धारक माँ शारदे
सुखदा वरदा रसदा लय दा
हर विपदा को क्षण में हर दे।
स्व0 रचित ,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
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जन्म हुआ तो अंत भी होगा

सद कर्मी जग कभी न मरते
जो कायराना हमले करते हैं
कुकर्मी जग कभी नहीं बचते
जुल्म सितम ढहाने वालों
दानवता का अंत ही होता
अविवेक निर्णय करता जो
हर पल वह् जीवन में रोता
कुकर्मो का एक तंत्र है
वह् स्वतंत्र न मात्र अंत है
कुपथ पर ओ चलने वालों
यह भारत का लोकतन्त्र है
पन्ने खोलो इतिहासों के
जंग कभी तुमने जीता है
भिक्षावर्ती ये नर भक्षी
गीदड़ तू रीता का रीता है
रिपुमर्दन कैसे करते हैं
सिंहो के हम रद गिनते हैं
सीना ताने जब उठते हम
रिपुदल फिर धरती गिरते हैं
खुली चुनौती हम देते हैं
कायराना हमला नहीं करते
पीठ ऊपर वार करे जो
वे तो बस जीवन में मरते 
छिप जाओ जहरीले नागों
एक एक को हम खोजेंगे
अंत तुम्हारा पक्का समझो
कायर मस्तक अब फोड़ेंगे।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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विधा लघुकविता
धर्म आसरा कर्म आसरा
मात पिता का प्रिय आसरा
जननी जन्म भूमि गरियसि
मन निर्मल स्वविवेक आसरा
एक आसरा परमपिता का
जो जग का है कर्ता धर्ता
अंधा लंगड़ा और अपाहिज
जिनका बनता रोज सहारा
आस पराई वह् करता है
कर्महीन जो जग में होता
खून पसीना सदा बहाकर
जीवन में सुखमय हो हँसता
तूफानों से हम लड़ते है
घर मे घुसकर हम मारेंगे
एक आसरा आत्मनिर्भरता
अब भारत के तलवे चाटेंगे 
वायु जल नभ सैन्य आसरा
हथियारों से हम खेलेंगे
नापाक जहरीले सांपो को
बिल उनके विध्वंस कर देंगें
आग लगाई है भारत में
शेरों को तुमने ललकारा
अरे सपेंलो कायर नर तुम
वीर शूरता प्रिय आसरा
निर्मल पावन गंग आसरा
स्वर्गीम प्रिय कश्मीर आसरा
रन बाँकुरे भारी भरकम हैं
किसका लोगे कायर सहारा?
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम्
कोटा,राजस्थान।

विधा लघुकविता
16 02 2019,शनिवार
मानवतावादी इस जग में
मीठे मधुर अमर फल खाते
स्वर्णिम अक्षर वे बनते हैं
भावी यश गान उन्हीं का गाते
मानव हो तो मानव बन लो
मानवता की ओर चलो
सत्य अहिंसा परोपकारिता
पुरुष से पुरुषोत्तम बन लो
भटके को सन्मार्ग दिखाओ
मातपिता गुरु जन की सेवा
सुख शांति संतोषी जीवन को
नित मिलते मिस्री और मेवा
राष्ट्र धर्म का पालन कर लो
तन मन धन वतन को अर्पण
जीवन चञ्चल एक बुलबुला
ज्ञान ध्यान है मुल्क समर्पण
दानवता मानवता द्विपथ
चयन आपको खुद करना है
आन बान शान से जीना
या दरिंदा सा बन मरना है
बैसाखी पर चलो कभी मत
बैसाखी जन जन की बन लो
कड़ी परिश्रम और लगन से
मोती माणक अंचल भर लो
मानव हित होती मानवता
जीवन गरल पीना पड़ता है
स्वंय हेतु तो सब जीती नर
पर हित जग आगे बढ़ता है।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविंद प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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अमरनाथ श्री शंकर का
श्री नगर डमरू गूँजेगा
कोई आका नहीं बचेगा
बम बारूद सिर फटेगा
कायराना हमला करके
नाग नहीं बच पाएंगे
अब तो तेरे फन कुचलेंगे
बिल में घुस कर मारेंगे
अमर शहीदों की शहादत
व्यर्थ कभी न जायेगी
दिव्य वीर पराक्रम सेना
पाक धरा घुस मारेगी
विषधारी अब सर्पो भागो
जंहा चाह जाकर छिपलो
मोदी की हुंकार के आगे
बच न पाओगे तुम पिल्लों
हर कतरे का बदला लेंगे
रावलपिंडी या करांची
ना पाक धरा के ऊपर 
तेरे सिर अब मौत ही नाची
शहीदों के यह अमर शहादत
अश्रु व्यर्थ कभी न होंगे
वंदेमातरम मधुर गान से
नींद चैन की खोओ गे 
सृधांजली वीर सपूतों
नत मस्तक हो करें नमन
नहीं बचेंगे वे हत्यारे
होगा अब समूल दमन।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविंद प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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लौ अनल है लौ चिंगारी
जब जले कौहराम होता
घर मकान अट्टारीकाये
नर जीवन सब कुछ खोता
लौ लगे जब शिक्षा की
दानव भी मानव बन जाता
परम् ज्यौति से अज्ञानी भी
कविकुल कालिदास कहाता
लौ लगे जब क्रीड़ा में
स्वर्ण पदक भी भागे आते
निष्ठा विश्वास और लगन से
विश्व कप कर हाथ उठाते
लौ लगे जब भक्ति की
भिलनी झूठे बैर खिलावे
छप्पन भोग त्याग दुर्योधन
साग मधुर विदुर घर खावे
लौ लगे जब देश प्रेम की
भगतसिंह फाँसी पर झूले
इन्कलाब जय भारत के
नारे सदा वतन पर गूँजे
लौ लगे जब सत्य स्नेह की
केवट राम निज पांव पखारे
गोप गोपियां पागल बनकर
श्री कृष्ण पद पदम् निहारे
लौ सनक है लौ भनक है
लौ सदा मंजिल पंहुचाती
लौ प्रज्वलित मन मानस में
हर मुश्किल संभव हो जाती।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम


नमन करूँ माँ चरण वँरु
कलम को माँ शक्ति दे दे
तिमिर हिय में ज्ञानामृत से
तमसोमाज्योतिर्गमय करदे
मधुमास ऋतुराज पधारे
रंगबिरंगे सुमन सुहाय
गेंदा और गुलाब चमेली
जन मन प्रिय अति भाये
काव्य में मोती माँ भरदे
रसना में मीठे स्वर करदे
वरदे वरदे मात सरस्वती
खाली झोली माँ तू भरदे
है कल्याणी वीणापाणी
तेरा नहीं कोई जग सानी
श्वेता पद्मासना सुहानी
हो तुम जग प्रिय महादानी
जगति का कल्याण करो माँ
छल कपट मन द्वेष हरो माँ
तुम हरति जगति हर पीड़ा
शांति सुख संतोष भरो माँ।।
स्व0 रचित
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गोविन्द प्रसाद गौतम्




दहलीज़ होती मर्यादा
दहलीज़ होती है सीमा
दहलीज़ में रहकर ही
कभी नही पड़ता है धीमा 
दहलीज़ होती हद है
दहलीज़ होती ज़ीद है
भक्तिभाव प्रिय भक्ति में
दर्शन देता प्रिय गोविंद है
दहलीज़ में हम सब रहते
जैसा करते वैसा भरते
कर्म प्रधान इस जीवन मे
कोई बनते कोई बिगड़ते
घर दहलीज़ सदा पावन हो
नित खुशियों का गायन हो
स्वर्गीम सा घर हो अपना
सदा प्रभु को नव नमन हो
जीवन स्वयं है मर्यादित
सद चरित्र है दहलीज
जो तुम चाहो पा जोओगे
कोई बड़ी नहीं है चीज
जो खुद दहलीज़ लांघता
वह् जीवन मे रोता धोता है
पाता नहीं है वह् जीवन मे
नारकीय जग निज रोता है
दहलीज़ में रहना सीखो
जनमन में बसना सीखो
निज स्वार्थ परहित छोड़ो
भारत माँ से खुद को जोड़ो
जगजीवन है सुन्दर सपना
नहीं पराया कोई अपना
कर्तव्य दहलीज में रहकर
नहीं किसी से कोई डरना।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

सबसे पहले प्रश्न यही है
हम दुनियां में आये कैसे
अद्भुत भव्य जीवन दाता
आखिर हम पहचाने कैसे
अनल अनिल भू नभ पानी
पंचतत्व का कौन है स्वामी
शस्यश्यामल वसुंधरा कर्ता
चित्र चितेरा कँहा वह् नामी
अगणित प्रश्न उठे मानस में
कुछ उत्तर तो मिल जाते हैं
सूर्य चन्द्र गगन सितारे भव्य
षड ऋतुओं को क्यों लाते हैं
सत्य अहिंसा दया ममता
परोपकार मानव धर्म है
घृणा द्वेष निजी स्वार्थ में
क्यों चलते जो अधर्म है
सामान्य ज्ञान परीक्षा देकर
प्रशासनिक पद को पाते
निज स्वयं कर्तव्य भूलते
जनता से बस घूस खाते
प्रश्न अधूरे रह जाते हैं
प्रश्नो का न पारावार
कर्तव्य मार्ग पर डटे रहो
जीत पाओगे तुम संसार
जन्म मृत्यु भी एक पहेली
जाने सब अंजाने बनते हैं
कुछ तो निजी स्वार्थ मस्त
कुछ पहने भक्ति गहने हैं।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम।
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शुद्ध विशुद्ध परम् ज्ञान को
सब कहते जग में विज्ञान
जल भू नभ आच्छादित है
जग में तना हुआ वितान
हिमाच्छादित उच्च हिमालय
संत महऋषि रचे विज्ञान
चार वेद ऋचाएं लिख दी
वे रखते जगति का मान
त्रेतायुग में स्वयं दशानन
स्वयं विमान वह् जग नापे
वह् धरती पर चले अकेला
जन जन थर थर थर कांपे
लेपटॉप मोबाइल से तो
मिटी दूरियां इस जगति की
वसुधैव कुटुंबकम सीख दे
तमसोमाज्योतिर्ग मय करती
आवश्यकता आविष्कार है
जग में मानो होड़ लगी है
अंतरिक्ष नित बातें करते 
सागर में पनडुब्बी खड़ी है
सीमा सुरक्षा मुस्तेद हुई है
स्वास्थ्य सुरक्षा प्रिय विज्ञान
बिन विज्ञान जी नहीं सकते
रक्तदान भव्य महति है दान
पुराकाल से चला आ रहा
नव क्रांति विज्ञान ही लाई
विद्वानों के महा ज्ञान जग
धरती पर हरियाली छाई।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
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शीर्षक     सोच
03  02  2019 रविवार

सोच सोच  में बड़ा फर्क है
सोच बनाती मन को अंधा
नारकीय होजाता तन मन
जीवन बन जाता अति गंदा
     बढ़ती सोच सकारात्मकता
     जन जन का सौभाग्य जागे
     माया मोह बंधन सब खोले
     द्वेष  ईर्ष्या जग नित  त्यागे
सोच भक्ति है सोच मुक्ति है
सोच पावन हर दुःख हरति
जैसा जीवन कर्म करे नित
वैसा फल ही उसको भरती
      सद संगति सद सोच है
      बद संगति बद सोच है
      पूरा जीवन जी कर भी
      नहीं बदलती यह सोच है
सोच कर्म है सोच धर्म है
सोच है रामायण गीता
सोच मर्म है सोच शर्म है
सोच रखे रीता का रीता
      अच्छी बुरी एक सोच है
      पाप पुण्य जग सोच है
      सत्य असत्य मार्ग चलावे
      अहिंसा परमोधर्म सोच है
सही सोच मंजिल पंहुचाती
शिक्षा के नव दीप जलाती
नहीं रुलाती सदा हँसा ती
असम्भव को सम्भव बनाती।।
स्व0 रचित ,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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खिलौना बचपन का
 साथी

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हाथ पैर से गेंद खेले नित
माटी निर्मित घोड़े हाथी
कभी खेलता कभी रूठता
नटखट चञ्चल होता बचपन
हट करता रोता ही रहता वह्
अद्भुत सुन्दर प्रिय लड़कपन
झूंठे आँसू वह् भर लेता
रुदन करे पल में हँस देता
मात यशोदा प्रिय लाडला
नयी नयी क्रीड़ाएँ करता
छोटी पतली कोमल ऊँगली
मोबाइल पर चटपट चलती
खेल खेलता कार्टून देखता
दिनभर करता रहता मस्ती
कभी कभी जो बातें करता
प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते
मधुर अतुलनीय वाणी से
ताली पीटे हम सब हँसते
चञ्चल चपल मधुर वाणी से
वह् सबको सम्मोहित करता
आसमान सी ऊँची बातों से
दिनभर सबका वह् मन हरता
बालक होता राजदुलारा
मातपिता आँखो का तारा
बालक से जब युवा बनता
बूढ़ी आँख का वही सहारा।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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सचराचर कई जीव बनाये
नर मादा कई आकार
इंसानियत पथ चलता जो
स्वप्न करे वही साकार
सोच समझ इंसान बनाया
बुद्धि शिक्षा उसमें भर दी
करनी जैसी करेगा मानव
वैसी ही फल सिद्धि कर दी
जो हिंसा से दूर ही रहता
अहिंसा परमोधर्म निभाता
मंगल गीत सदा वह गाता
ऐसा नर इंसान कहलाता
आसमान से बातें करता
अंतरिक्ष में ध्वज लहराता
सागर की सतह में जाकर
मन मोती माणक बहलाता
हैवानियत पर कभी न चलता
परोपकार नित हाथ बढ़ाता
कीर्तिमान बनाता अपने वह्
मन निर्मल जन इंसान कहाता
पर आत्मा परमात्मा समझे
कर्तव्य मार्ग सदा वह् चलता
स्वार्थ त्यागता मन से हँसता
कथा कविता वह् खुद बनता
नमन योग्य वह् महापुरुष है
जो जगति को दिशा दिखाता
पुरुषों में पुरूषोत्तम बनता
जन जीवन इंसा कहलाता।।
स्व0 रचित,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
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दूर गगन में प्राची लाली
तन मन कली कली खिले
दूर क्षितिज में अवनी जाकर
वह् नभ प्रियतम गले मिले
सूर्योदय लाली नभ फैले
कलरव करे उड़े मिल साथ
दूर गगन मन वांछित होकर
मिलकर करते रहते हैं बात
शरद ऋतु कौहरे की चादर
हाड़ कम्पाते शीतल झौखे
झम झमाझम मावट बरसे
अम्बर से गिरते नित ओले
चले गगन में तेज हवाएं
ऋतु परिवर्तन हो जाता
भीषण गर्मी आग बरसती
तन बदन तर तर हो जाता
अद्भुत काले बदरा आते
कड़के बिजली जल का शौर
मूसल धार तेजी से बरसे जल
अद्भुत नृत्य करे नित मिल मोर
पश्चिम में जाता नित सूरज
गगन मध्य सुहावनी लाली
निहारिकायें गगन सजाती
पहने निशा स्वर्णिल बाली
उत्तर में ध्रुव तारा शौभित
रजनी रानी गगन सुहाती
तारों की साड़ी पहने वह्
कभी लजाती या इठलाती
नीलाम्बर परिधान पहनकर
पल पल गगन रूप बदलता
जगति की सारी विपदा खुद
स्वयं अकेला वह् खुद हरता।।
स्व0 रचित
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।



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ता नित नित नव बिखरे
अज्ञान नित घूंघट खोलते

ज्ञान ज्यौति सदा माँ निरखे।
यवनिका जग मंच हटे तो
साक्षात्कार जगत का होता
भावों की गङ्गा में हम सब
खाते हम सब पावन गोता
घृणा द्वेष घूंघट पट खोलो
तिमिर घूंघट मात हटाओ
भोले भाले सीधे साधे हम
माँ प्रिय अपने गले लगाओ
घूंघट तो बंधन जीवन का
स्वतंत्रता है जग बाधक
मिथ्या असत्य दूर रहें नित
कविकुल हम तेरे साधक
मायावी घूंघट जग फैला
सत्य सनातन मार्ग चंले
तिमिर हटा दो मात शारदे
झिलमिल ज्ञान जोत जले।।
स्व0 रचित
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
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कभी संत का अंत न होता
गुंजा करती उसकी वाणी
परहित ही जीवन जीता वह्
जिव्हा बसे माँ कल्याणी
दुःख सुख धन वह् क्या जाने
काम वासना से कोसों दूर
गर्मी सर्दी वर्षा सहता वह् नित
पीता सदा रामामृत भरपूर
काम क्रोध लोभ न छूता
जीवन उसका है एकांकी
संत सुधामय प्याला पीता
जीवन उसका है बैरागी
संत सूर थे संत कबीरा
अक्खड़पन से रहे फकीरा
महाकवि तुलसी की वाणी
जपे जगत में श्री रघुवीरा
सच्चे पक्के भक्त संत है
दुनियांदारी वे क्या जाने
जब भी भीर पड़े भक्तों पे
तब कर देते हैं वारे न्यारे
संत अमोलक हीरा होता
जनहित वह् बीजों को बोता
सुमन हँसी अधरों पर रहती
वह् जीवन मे कभी न रोता
संत आस्था बस ईश्वर में
निराकार सुनसान जपे
साधक बनकर करे साधना
रब खातिर वह् खपे तपे।।
स्व0 रचित
गोविंद प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
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जन जन का तुम बनो सहारा
पावन उत्तम निर्मल है पूजा
परहित में जो जग जीता नित
इसे से बड़ा न धर्म कोई दूजा
पूजा सेवा आत्मसमर्पण
पूजा सृद्धा और भक्ति है
पूजा से बन गए वरदानी
भक्ति नित ऊँची शक्ति है
पूजनीयों की होती पूजा
विप्र धेनु जग पूजनीय हैं
भारत माँ की अर्चन करते
सर्वजने नित प्रशंसनीय है
सर्वसुखाय होती है पूजा
आत्मा सो परमात्मा पूजा।
प्रकृति के हर कण समाहित
स्नेह सुधा स्वर अद्भुत गूंजा
आडम्बर न ढोंग है पूजा
पर हित नेक सदा चार है 
सत्य अहिंसा सद्भावनाएँ
सद श्रेष्ठ आचार विचार हैं।।
स्व0 रचित
गोविन्द प्रसाद गौतम

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