ऊषा सेठी

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12-4-2019
विषय:-सुख -दुख 
विधा:-दोहा

सुख दुख में ही है छिपा , जीवन का आनंद ।
नर इनकी अनुभूति से , खोजे परमानंद ।।१।।

जीवन के उद्यान में , सुख दुख जैसे फूल ।
संग गुलाबों के लगे , चुभ जाते ज्यों शूल ।।२।।

किंकर्तव्य विमूढ हो , दुख समझें अभिशाप ।
गुरु सच्चा दुख ही बने , गूढ़ ज्ञान दे आप ।।३।।

सुख शीतल हैं ओस सम , खिल जाती मुस्कान ।
दुख की बने कठोरता ,जीवन की पहचान ।।४।।

दुख पीछे सुख है खड़ा , निशि पीछे परभात ।
सुख दुख की अनुभूति से ,किस को मिली निजात ।।५।।

सुख दुख दोनों की बनें , इच्छाएँ आधार ।
इच्छाओं की पूर्ति से , मिलती खुशी अपार ।।६।।

इच्छाओं को डालता , मन जैसी भी खाद । 
सुख दुख उसके फूल हैं , कहते हर्ष विषाद ।।७।।

दीर्घ श्वास भरिए सदा , करिए प्राणायाम ।
सुख दुख से ऊपर उठो , जपिए प्रभु का नाम ।।८।।

स्वरचित :-
ऊषा सेठी 
सिरसा 125055 ( हरियाणा )

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13-3-2019
विषय:-भ्रम
विधा :-ताँका


भ्रम संकेत
अंतहीन शृंखला
कहाँ उत्पत्ति
जीव भ्रम में जीता
तिक्त घूँट है पीता

जीवन सुखी
सुंदर बने भ्रम
परांगमुखी
बदले रूपरेखा
परिस्थिति का लेखा

भ्रम का जादू
बदले आकृतियाँ
नहीं स्मृतियाँ
मोहक भ्रम जाल
नशा चढ़े तत्काल

भ्रम है रोग
जीवन में जरूरी
रखे निरोग
जिंदगी हो आसान
एक मनोविज्ञान

स्वरचित :-
ऊषा सेठी
सिरसा 125055 ( हरियाणा )


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27-02-2019
विषय:- फाग
विधा :- ताँका


🌺
मस्ताना फाग
होरी रसिया राग
चूनर पाग
अनंग अनुराग
प्रेम सरस आग
🌺
फाग उल्लास
रसभीना प्रत्यंग
रंग विलास
अलि संग कलियाँ
पीत अमलतास
🌺
पलाश रंग
विरहिणी निस्संग
फाग अंगार
समीर गदराई
पुष्पित कचनार
🌺
फाग आनंद
रसिक घनानंद
मृदु समीर
प्रेम छंद अधीर
आकुल नैन नीर
🌺
रवि रश्मियाँ
कण कण उल्लास
शीत प्रवास
फाग फूली सरसों
संगीत मधुमास
🌺
स्वरचित :-
ऊषा सेठी
सिरसा 125055 ( हरियाणा )
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26-02-2019
विषय:-सर्जिकल स्ट्राइक -२
विधा :-दोहा
कोटि नमन सेनानियो , सिद्ध हुए जाँबाज़ ।
झंडे गाड़े विश्व में , ले ऊँची परवाज़ ।।१।।


हिंद फ़ौज की विश्व में , होती जय जयकार ।
लोहा माना शत्रु ने , खाकर मुँह की मार ।।२।।
शत्रु तीन सौ मार के , ठान लिया प्रतिशोध ।
मारें गे हर शत्रु को , जो भी बने गतिरोध ।।३।।
शत्रु धराशायी करो , बचे नहीं कुछ शेष ।
ऐसा नृशंस मारिए , दिखे नहीं अवशेष ।।४।।
स्वरचित :-
ऊषा सेठी
सिरसा 125055 ( हरियाणा )
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13-12-2018
विषय:- कोहरा
विधा :-हाइकु
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दिल में चाव
कोहरे की चादर
प्रेम अलाव

एक कोहरा
प्रेम से अनुरक्त
हो न विभक्त

कोहरा ओढ़
बेदर्दी प्रेम सिंधु
मुख ले मोड़

निशा ओढ़ती
कोहरे का लिबास
शशि उदास

रश्मि की पीठ
रवि के हस्ताक्षर
लुप्त कोहरा

श्वेत कोहरा
पारदर्शी रश्मियाँ
निर्वस्त्र दिन

मस्त कोहरा
अंकपाश भरता
बना छिछोरा

जीवन थोरा
ठाट बाट का राज्य
करे कोहरा

शरद गाए
कोहरे दुकूल में
प्रात:लजाए

रवि आज़ान
कोहरे की मध्याह्न
दिनावसान
१०
मद्धम रवि
कोहरा भ्रष्ट छवि
बालेन्दु जैसा
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स्वरचित कॉपी राइट
ऊषा सेठी
सिरसा 125055 ( हरियाणा )

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22-10-2018
भावों के मोती - मंच को नमन
विषय :- 🌺अर्द्धवार्षिक पूर्णता 🌺
छ: ऋतुओं से छ: माह
अच्छे हुए व्यतीत ।
भावों के मोती बनें ,
चारु छंद अरु गीत ।।


वीणा वीणा वादिनी ,
रहे निभाती साथ ।
जो भी आए पटल पर ,
रख लेती सिर माथ ।।
विदुषी गार्गी सी दिखे ,
ज्ञान दिखे चहुँ ओर ।
प्रेम स्नेह देते सभी ,
होती भाव विभोर ।।
प्रिय वीणा स्वीकार हो ,
प्रेम भरी आशीष ।
रहो सफल निज लक्ष्य में ,
संग रहे वह ईश ।।
स्वरचित
ऊषा सेठी
सिरसा ( हरियाणा )

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भावों के मोती
06-10-2018
विषय:-पड़ाव
विधा :-हाइकु



आह पड़ाव
पुकारते ही रहे
ब्रह्म दर्शन

रहे ढूँढते
विरहिणी के आँसू
योग पड़ाव

मन क्यों रुके
पड़ाव जिंदगी के
पाँव ही थके

तू आफताब
क्यों देखता पड़ाव
चला चल रे

एक पड़ाव
जहाँ महकी साँसे
रुकी जिंदगी
स्वरचित :-
ऊषा सेठी
सिरसा 125055
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01-10-2018
विषय :-कृष्ण राधा प्रेम



कुंज निकुंज में मिलते कान्हा ,
कितनी सदियां बीत गई है ।
हाथ पकडते अंक में भरते ,
प्रेम गगरियाँ रीत गई हैं ।


प्रेम पुष्प है देव लोक का ,
जिसे देख प्रकृति है खिलती ।
प्रकृति रूप में तू ही राधिके ,
यत्र तत्र सर्वत्र है मिलती ।

हाथ पकड कर रम्य कुंज में ,
पुष्पों से कर कच विन्यास ।
मैं योगेश्वर निर्लिप्त नृत्य से ,
सारी रैन रचाऊँ महा रास ।

प्रेम हृदय की वस्तु अनमोल ,
कौन सका है इसको तोल ।
छाया रहता मन पर उन्माद ,
जैसे हो गूँगे का गुड स्वाद ।
कर छोडूँ अब मैं नहीं कान्हा ,
देख हुई मैं प्रेम में बावरी ।
तुझे छोड मैं घर नहीं जाऊँ ,
बीते गी संग तेरे विभावरी ।
तू अनंत शुचिता की आकर ,
अथाह प्रेम सिंधु रत्नाकर ।
नील स्याम तन सोहे तुम से ,
जैसे किरणों संग दिवाकर ।
मेरे विरह विषाद में हो गई ,
सब भँवरों की आवली काली ।
मैं आह्लादिनी शक्ति हूँ तेरी ,
तेरे प्रेम की हूँ मतवाली ।
यह प्रेम लीला जो है राधिके
पुरुष प्रकृति की लीला रचाई ।
दिव्य विशुद्ध अखंड प्रेम की ,
सबके हृदय में ज्योति जगाई ।
हे कृष्णा ! अभिन्न हूँ तुमसे ,
प्यासी भटकी देह काया में ।
मैं ही सनातन प्रकृति रूप में
विचरण करती जग माया में ।,
स्वरचित :-
ऊषा सेठी
सिरसा 125055 ( हरियाणा )
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15-9-2018
विषय :-काग़ज़
विधा :-डमरु
अथाह समंदर
मन के अंदर
भीगे काग़ज़
प्रेम कथा
विरह
लिखूँ
मैं
पढ़ो
प्रेमाश्रु
बने स्याही
पीड़ित व्यथा
विरहिणी बनी
काग़ज़ कहे कथा


स्वरचित :-
ऊषा सेठी
सिरसा १२५०५५ ( हरियाणा )

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15-9-2018
वीणा कितनी गुणी है , यह जाना है आज ।
वरद हस्त माँ शारदा , जाने सकल समाज ।।१।।


वीणा सार्थक नाम है ,करते काम बखान ।
सर्वगुण सम्पन्न बनी , रखती मधुर ज़ुबान ।।२।।
संस्कारी भार्या बनी , जन्म लिया कुल श्रेष्ठ ।
सबकी सेवा में लगी , मिलता मान यथेष्ट ।।३।।
हाथ जोड़ आदर करे , रखती सबका मान ।
अपने इस गुण से सदा , पाती निज सम्मान ।।४।।
भव्य रूप मृग लोचनी , दिखती कुशल प्रवीण ।
विद्या का वर्चस्व है , रहता रूप नवीन ।।५।।
वीणा प्रिय अनुजा लगे , पूर्व जन्म पहचान ।
सबको अपनी सी लगे , रखती सबका ध्यान ।।६।।
स्वरचित :-
ऊषा सेठी
सिरसा 125055 ( हरियाणा )
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12-9-2018
विषय :- इंसानियत
विधा :- कुण्डलिया छंद


चाहो जो इंसानियत , ऊँचे रखो उसूल ।
मौत खड़ी हो सामने , करिए उसे क़बूल ।।
करिए उसे क़बूल , लगे प्राणों की बाज़ी ,
धर्म नहीं जागीर , होय पंडित या क़ाज़ी ।
दिखे जहाँ हैवान , उसे कोल्हू में गाहो,
उन्नत दिखे समाज ,सब इंसानियत चाहो ।
स्वरचित :-
ऊषा सेठी
सिरसा 125055 ( हरियाणा )
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25-8-2018
विषय :- सृजन
विधा :- दोहे
दया करो माँ शारदे! , करो क़लम का स्पर्श ।
मन वाणी से जो लिखूँ , होय काव्य उत्कर्ष ।।१।।


दोहे हों निज से परे, हों समष्टि आधार ।
हरि !हित में जग के सकल ,होय शब्द संचार ।।२।।
सुरसरि सम दोहे बनें , पढ़े मिले आनंद ।
कस्तूरी सम यश मिले , हो माधुर्य अमंद ।।३।।
शुभ विचार शुभ भाव से , किया सृजित है काव्य ।
पठन करें विद्वान जो , हो उनके संभाव्य ।।४।।
करुणा करो उदार प्रभु , दो मुझको वरदान ।
दोहे जो मैं लिख रही , बन जाएँ रसखान ।।५।।
करूँ सृजन जो शारदे , करना तुम उपकार ।
बहुजन हित साहित्य हो , मिले यही उपहार ।।६।।
पढ कर श्रुति पुराण निगम , पाया जो भी ज्ञान ।
वह समर्पित समाज को , सबका हो कल्याण ।।७।।

स्वरचित :-
ऊषा सेठी
सिरसा 125055 ( हरियाणा )

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हिंदी का सिंहासन हिमाद्रि ,
और पग पखारता है सिंधु ।
माथे का चंदन मलयाचल ,
सोहे है शीश पर रवि बिंदु ।

जनजन की वाणी है हिंदी ,
देव नागरी में माधुर्य है ।
छुप रही गुणवता शब्दों में ,
अर्थों में सौष्ठव प्राचुर्य है ।

सम्प्रेषण करती भावों का ,
विश्व वंद्य भाषा है हिंदी ।
मात्राओं के भूषण पहने ,
माथे पर सूरज सम बिंदी ।

जब गीत फूटते हैं मन से ,
भाषा देती है धार उसे ।
हृदय के उमड़ते भावों को , 
निज भाषा दे शृंगार उसे ।

सूर , तुलसी , केशव ,घना,
रहीम , बिहारी अरु रसखान ।
अगनित सपूत माँ हिंदी के ,
बढ़ाई जिन्हों ने इसकी शान ।

भारतेंदु , द्विवेदी, श्री निवास,
दिनकर, निराला अरु प्रसाद ।
राष्ट्रीय स्वाभिमान हिंदी के , 
करते ऐतिहासिक शंखनाद ।

करवाती पहचान प्रवास में ,
सहोदर सा आभास दिलाती ।
इससे जन्मी सब भाषाएँ ,
माँ जननी को शीश झुकाती ।

राजनीति की दुर्नीतियों से ,
अस्मिता न इसकी खोने दो ।
हिंदी के विस्तृत आँचल में , 
सब भाषाओं को होने दो ।

रखो न सीमित फ़ाइलों तक,
इसके प्रवाह को बहने दो ।
वर्चस्वी वाणी कवियों की ,
इसको गरिमामय रहने दो ।

हिंदी है भारत की बोली ,
इसे विश्व तक पनपने दो ।
भारत के भाल की बिंदी को , 
सुंदर साकार तुम सपने दो ।

स्वरचित :-
ऊषा सेठी 
House No 839
Sector 14
Gurgaon 122001 Haryana
Mo:- 9812284001



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ठहरी है न ठहरे गी कहीं ,
करती स्पर्श आसमानों का ।
मत
 आँको कम क्षमता उसकी ,
देख प्रतिभा के मुहानों को ।

जिसने पहचानी है प्रतिभा ,
होती मंज़िल हासिल उसको ।
करता उन्नति वह अविरल है ,
कौन कह सके गाफ़िल उसको ।

निखरे प्रतिभा उद्यम से है ,
रहता आलस्य कोसों दूर ,
क़दमों को सफलता है चूमे ,
विफलता जाती हो मजबूर ।

प्रतिभा पर काई लगे नहीं ,
मस्तक के पारस घिसने दो ।
निखरे गा रंग प्रतिभा का ,
मेहँदी की भाँति पिसने दो ।

मूर्द्धन्य कुशल ओजस्वी जो ,
देखो उसका इतिहास गवाह ।
आँधी तूफ़ान सहे तन पर ,
तब ऐश्वर्य का विलास बना ।

स्वरचित:-
ऊषा सेठी 
सिरसा १२५०५५ ( हरियाणा )



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जब तक नारी ने सहन किया ,
कहलाई वह संस्कारी है ।
आवाज उठाई जब उसने , 
सहनी वह नर को भारी है ।

अब अबला नारी रही नहीं ,
कहलाय नहीं बेचारी है ।
लड़ना सीखी हालातों से ,
सुनना पड़ता व्यभिचारी है ।

दुनिया के सारे क्षेत्रों में , 
बराबर पुरुष के आई है ।
कठिन हुआ नर को सहना , 
कहता उसकी अधमाई है ।

उस दासत्व के औचित्य पर , 
पुरुष क़ौम बलिहारी थी ,
कैसी विडम्बना है नर की , 
वह शक्ति बनी बेचारी थी ।

पुरुषों के मन को भाती थी , 
वह श्रद्धा बनी कामायनी थी ।
अबला सबने स्वीकारी थी ,
जो वास्तव में नारायणो थी ।

वह सर्व मंगला दुर्गा 
है ,
वह गार्गी जैसी कुशाग्र है ।
दोहरी भूमिका में आगे ,
प्रभुत्व वर्चस्वी आगर है ।

स्वरचित :-
ऊषा सेठी 
सिरसा १२५०५५ ( हरियाणा )


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विषय:- कृष्ण जन्मोत्सव

कृष्णमय हो सब प्राणी गए ,
पूर्ण सृष्टि में दिखे उल्लास ।
कृष्ण जन्म उत्सव की लहरें ,
वर्षा के संग करें विलास ।

मंदिर में हैं सजी झाँकियाँ ,
दिखती नहीं अंधेरी रात ।
चारों ओर प्रकाश पुंज है ,
निकला हो ज्यों सूरज प्रभात ।

शिशु गोपाल मुकुट वंशी से ,
स्वर्ण पालने में राजे हैं ।
पुष्प सजी रेशम की डोरी ,
हाथों में अनुपम साजे है ।

स्नान कराते पंचामृत से ,
माखन मिश्री भोग लगाएँ ।
नंद यशुदा को दें बधाई ,
नाचे गाएँ जन्म मनाएँ ।

नव वसनों में रंग बिरंगी , 
सजी टोलियाँ घूम रही हैं 
लल्ला की बधाइयाँ गाती, 
बाज़ारों में झूम रही हैं ।

स्वरचित:-
ऊषा सेठी 
सिरसा १२५०५५ ( हरियाणा )


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विधा :-दोहे

गो शालाएँ बन रही , गो है मात समान ।
सुरभि यजन हैं हो रहे , करते महिमा गान । ।१।।

श्याम सुरभि का दुग्ध हो , रहे कन्हैया याद ।
संस्कारी बच्चे बने , दुग्ध पान के बाद ।।२।।

गौ,गंगा, गीता करें , सबका ही कल्याण ।
जाति भेद को छोड़ कर, करो सुरभि यश गान ।।३।।

पथमेड़ा में है बनी , शाला सुरभि विशाल ।
पंचगव्य उपचार से , सम्पदा बेमिसाल ।।४।।

गोधन नंद बाबा का , रखा कृष्ण संभाल ।
गोचारण कारण बना , कहलाए गोपाल ।।५।।

अचल सम्पदा सुरभि है , करिए बहु संभाल ।
दूध पूत सम्पन्नता , करती मालामाल ।।६।।

गोवर्धन कान्हा किया , दूध दही भण्डार ।
सुरभि बोझ मत जानिए , देती क़र्ज़ उतार ।।७।।

गो वध कारण नाश का , होती संस्कृति ह्रास ।
सुरभि महक के सुरभि की, करती बुद्धि विकास ।।८।।

स्वरचित :-
ऊषा सेठी 
सिरसा 125055 ( हरियाणा )

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गर्भ -काल में सुनते रहते, 
माँ की नीतियाँ और विचार 
शीश झुका कर करो वंदना ,
मानो हृदय से अति आभार ।

उठना चलना खाना पीना ,
सब बातें माँ ने सिखलाई ,
उँगली पकड कर मैया ने ही , 
विद्यालय की राह दिखाई ।

श्याम पट पर श्वेत चॉक से ,
वर्ण लकीरों से बनवाए ।
नमस्कार उस गुरु शिक्षक को ,
जो विद्या के पथ पर लाए ।

दुर्गम पथ आते जीवन में ,
रखना जीवन में चतुराई ।
टल जाते तूफ़ान बड़े भी ,
झुकने की तदबीर बताई ।

सखी गुरु बन गई जीवन की , 
मूल मंत्र बनी उसकी बात ।
सबसे मिली खूब सराहना ,
भोगी ख़ुशियों की बरसात ।

गुरु अनेक बनें चराचर में,
वंदन करती हूँ मैं आज ।
समझूँ जीवन धन्य मैं अपना , 
सिखाए जिन्हें ने जो भी काज ।

स्वरचित :-
ऊषा सेठी 
सिरसा 125055( हरियाणा )

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मैं पतित पावनी गंगा हूँ ,
मैली क्यों कह बुलाते हो ?
नहीं नाम बिगाड़ो तुम मेरा ,
क्यों पीड़ा मुझे पहुँचाते हो ।

सदियों से भार है वहन किया , 
ख़ुशियाँ बाँटी दुख सहन किया ।
मल जो भी आँचल में डाला ,
उस सब को मैंने ग्रहण किया ।

गोमुख से जब मैं निकली थी ,
हृदय बहुत संकीर्ण था ।
जब देखी ज़रूरत संतति की ,
दिल को किया विस्तीर्ण था ।

गंगा मैली की प्रत्यंचा जब,
खिंच जाती है वक्ष मेरे ।
लहूलुहान रूह होती है ,
होते प्रश्न मौन समक्ष मेरे ।

संगम पर पहुँचने से पहले , 
उज्ज्वल कर शृंगार करो ।
'मैला' शब्द लगे दुखदायी ,
निर्मला कह मनुहार करो ।

राह में न रुकी ठिठकी ठहरी ,
सिंधु पर ही जा रुकती हूँ ।
करती हूँ समर्पण मैं उसको , 
बिंदु असीम पर झुकती हूँ ।

स्वरचित :-
ऊषा सेठी 
सिरसा 125055 ( हरियाणा )



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ठहरी है न ठहरे गी कहीं ,
करती स्पर्श आसमानों का ।
मत आँको कम क्षमता उसकी ,
देख प्रतिभा के मुहानों को ।

जिसने पहचानी है प्रतिभा ,
होती मंज़िल हासिल उसको ।
करता उन्नति वह अविरल है ,
कौन कह सके गाफ़िल उसको ।

निखरे प्रतिभा उद्यम से है ,
रहता आलस्य कोसों दूर ,
क़दमों को सफलता है चूमे ,
विफलता जाती हो मजबूर ।

प्रतिभा पर काई लगे नहीं ,
मस्तक के पारस घिसने दो ।
निखरे गा रंग प्रतिभा का ,
मेहँदी की भाँति पिसने दो ।

मूर्द्धन्य कुशल ओजस्वी जो ,
देखो उसका इतिहास गवाह ।
आँधी तूफ़ान सहे तन पर ,
तब ऐश्वर्य का विलास बना ।

स्वरचित:-
ऊषा सेठी 
सिरसा १२५०५५ ( हरियाणा )

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हिंदी का सिंहासन हिमाद्रि ,
और पग पखारता है सिंधु ।
माथे का चंदन मलयाचल ,
सोहे है शीश पर रवि बिंदु ।

जनजन की वाणी है हिंदी ,
देव नागरी में माधुर्य है ।
छुप रही गुणवता शब्दों में ,
अर्थों में सौष्ठव प्राचुर्य है ।

सम्प्रेषण करती भावों का ,
विश्व वंद्य भाषा है हिंदी ।
मात्राओं के भूषण पहने ,
माथे पर सूरज सम बिंदी ।

जब गीत फूटते हैं मन से ,
भाषा देती है धार उसे ।
हृदय के उमड़ते भावों को , 
निज भाषा दे शृंगार उसे ।

सूर , तुलसी , केशव ,घना,
रहीम , बिहारी अरु रसखान ।
अगनित सपूत माँ हिंदी के ,
बढ़ाई जिन्हों ने इसकी शान ।

भारतेंदु , द्विवेदी, श्री निवास,
दिनकर, निराला अरु प्रसाद ।
राष्ट्रीय स्वाभिमान हिंदी के , 
करते ऐतिहासिक शंखनाद ।

करवाती पहचान प्रवास में ,
सहोदर सा आभास दिलाती ।
इससे जन्मी सब भाषाएँ ,
माँ जननी को शीश झुकाती ।

राजनीति की दुर्नीतियों से ,
अस्मिता न इसकी खोने दो ।
हिंदी के विस्तृत आँचल में , 
सब भाषाओं को होने दो ।

रखो न सीमित फ़ाइलों तक,
इसके प्रवाह को बहने दो ।
वर्चस्वी वाणी कवियों की ,
इसको गरिमामय रहने दो ।

हिंदी है भारत की बोली ,
इसे विश्व तक पनपने दो ।
भारत के भाल की बिंदी को , 
सुंदर साकार तुम सपने दो ।

स्वरचित :-
ऊषा सेठी 
House No 839
Sector 14
Gurgaon 122001 Haryana

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"विधि/विधान"20नवम्बर 2019

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