भार्गवी रविन्द्र





नाम : श्रीमति भार्गवी रविन्द्र जन्मतिथि : २९/०७/१९४९ जन्मस्थान : नागपुर ,महाराष्ट्र शिक्षा : M SC (Physics) B.Ed सृजन की विधा: हिंदी पदय कविता/ग़ज़ल/नज़्म ; गद्य -निबंध,लेख अंग्रेज़ी में कविताएँ प्रकाशित कृतियाँ। काव्य संग्रह : बचपन ....काश ! कहीं ठहर जाता व्यवसाय शिक्षिका (सेवा निवृत ) संपर्क सूत्र : Bhargavi Ravindra ; #1347 ‘satvik’ 5th Stage,1st Phase ,5th Main, 5th Cross BEML Layout ,Rajarajeshwari Nagar BANGALURU 560098 , KARNATAKA ;INDIA Mail ID 1 ) bhargavi.r29@gmail.com 2)cv_ravindra@yahoo.com

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ये दुनिया भागती है उनके पीछे भरी हो जिनकी जेब
धन दौलत पास जिनके नहीं देखती उनमें कोई ऐब।

अजीब दस्तूर यहाँ का , अजीबोग़रीब रीति रिवाज
झूठी शान और खोखले विचार वालों का ये समाज।

सारी दुनिया अपनी है जब हो कोई मतलब की बात
काम हो जाने पर पल भर में याद दिला देते औक़ात ।

आँखों के सपने ऐसे टूटते,जैसे अंबर से कोई तारा टूटे
संगी साथी बस कहने की बात,मोड़ आया तो सब छूटे ।

जेबों की खनखन के अलावा कुछ और नहीं सुनाई देता है
पैसे की चमक से धुँधलाई नज़र को कुछ नहीं दिखाई देता है।

मान सम्मान कहने की बातें ,यहाँ पैसा ही ईमान सभी का 
जेबें भरी हो तो जिनकी वही है दीन धर्म, भगवान सभी का ।

पैसे के पीछे -पीछे यूँ ही जाने कब तक दौड़ेता रहेगा इंसान 
जाने कब इनकी मति बदलेगी कब पहचानेगा ख़ुद को नादान ।
स्वरचित(c) भार्गवी रविन्द्र ......बेंगलूर .


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बाद मुद्दत के कुछ इस तरह तुम्हारा मिलना हुआ

दश्त-ओ-सहरा में जैसे गुल का खिलना हुआ है ।

जहेनसीब,जिसकी थी जुस्तज़ू वो आज मुख़ातिब हैं
शाम के आग़ोश में जैसे शम्स का पिघलना हुआ है ।

न पूछ कितना फासला तय करना है जानिबे मंज़िल
अभी इबतिदा ए सफर है,बस अभी चलना हुआ है।

ऐ!बादे-ए-सबा ज़रा आहिस्ता गुजर सहने चमन से,कहीं
कलियाँ ख़ौफ़ज़दा न हो,अभी तो उनका सँभलना हुआ है।

इल्म नहीं था रिश्ते ज़िंदगी के,काँच से भी नाज़ुक होते हैं 
बग़ैर ठोकर के भी अकसर बेआवाज इनका टूटना हुआ है ।

न राहें ख़त्म होती हैं न मंज़िल नज़र आती है दूर दूर तलक
‘मैं’से ‘मेरे’तक का सफ़र तय करना कितना मुश्किल हुआ है ।

स्वरचित (c)भार्गवी रविन्द्र .....बेंगलूर ८/४/२०१९
दशत - जंगल, सहरा - मरुस्थल ,ज़हे-नसीब - ख़ुश क़िस्मत
ज़ुस्तज़ू -तलाश , मुख़ातिब -सामने ,आग़ोश -बाँहें ,शम्स-सूरज
ज़ानिब ए मंज़िल -मंज़िल की ओर

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भाव के मोती :स्वतंत्र लेखन
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फिर लौट आई हूँ मैं अपने पास
ज़िदगी की उलझनों में
ऐसा उलझा रहा मन
वकत कब मुझे दोराहे पर छोड़
आगे निकल गया याद नहीं!
सुबह सवेरे आँगन में उतरी धूप
खिसकते -खिसकते दहलीज़ को लाँघ
घर से बाहर निकल गई
उधर शाम भी अपनी ख़्वाहिशों को
रात के सुपुर्द कर 
दबे क़दमों से गुज़र गई!
रात अनमनी सी मुझे देखती रही
ठहर जाना उसके भी बस में न था।
मैं जडवत सी उन्से जाते देखती रही
न उन्हें रोक पाई
न उनके संग जा पाई
दिन बदले , मौसम बदले
और धीरे धीरे  बहुत कुछ बदल गया
तब जाना
अनजानी राहों पे चलते चलते
मै तो बहुत आगे निकल गई
पर खुद को कहीं बहुत पीछे छोड़ दिया।
मगर ,अब और नहीं
मैं अब थोड़ा वकत ख़ुद के साथ बिताना चाहती हूँ
और ,यही सोचकर
फिर लौट आई हूँ अपने पास !

स्वरचित (c)भार्गवी रविन्द्र .....बेंगलूर

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सफर के दौरान अकसर कुछ नये लोगों का साथ मिल जाता है ....जो फिर यादें बन जातीं हैं ....कुछ सुहानी तो कुछ तल्ख़........

चलो अच्छा है .....
**************

सफ़र में जितना भी मिले साथ,चलो अच्छा है
चलते-चलते हो जाए मुलाक़ात,चलो अच्छा है।

अपने ग़म की हो नुमाइश हमें कभी गवारा नहीं
पोशीदा ही रहे दिल में जज़्बात,चलो अच्छा है।

तसववुर में भी कोई,मुक़कमल साथ नहीं होता
कुछ आधे-अधूरे से हैं ख़यालात,चलो अच्छा है।

मानिनद-ए-दरिया नहीं,अब चश्मे-नम की रवानी 
अब सहमी सी गुज़रती है बरसात,चलो अच्छा है।

तन्हा इक हम ही नहीं,अहल-ए-ज़हाँ! तेरी बज़्म में 
चाँद भी तन्हा सा है आज की रात ,चलो अच्छा है।

ख़्वाहिशों का हुज़म और मुख़्तसर सी ये ज़िंदगी 
वक्त रहते याद आ गई औक़ात,चलो अच्छा है।

क्यूँ करे रायगाँ ये ज़िंदगी ज़वाबों की जुस्तज़ू में
रह जाए कुछ उलझे से सवालात,चलो अच्छा है।

जन्नत की आरज़ू भी जाती रही बशर के दिल से 
शायद उधर भी है ग़रदिश -ए-हालात,चलो अच्छा है।

शब-ए-हिज्रात लंबी सही,मगर ख़त्म तो होगी कभी
दिल बहलाने को क़ाफी ये एहसासात,चलो अच्छा है
स्वरचित(C) भार्गवी रविन्द्र...... oct 2018
All rights reserved (C)Bhargavi Ravindra

पोशीदा -छुपा हुआ ; तसववुर -ख़याल ; मुककमल - पूरा 

चश्मे - नम - आँखों का पानी ,आँसू ; हुजूम - भीड़ ; 

अहल ए जहाँ - दुनिया वाले ; बज़्म -महफ़िल ,मुख़्तसर - छोटी सी 

रायगाँ - व्यर्थ , जु़स्तज़ू - तलाश ; बशर - इंसान ,शब ए हिज्रात -जुदाई की रात
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कौन माँगेगा ?
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उन ख़ामोश होंठों से कौन अब जवाब माँगेगा,
उखड़ती साँसों से सासों का हिसाब माँगेगा ?

तारीक़ी सयाह सी बन फैली है जिन पन्नों पर,
कौन पढ़ने को ज़िंदगी की वो किताब माँगेगा ?

आँसूओं का दरिया और कश्ती नाउममीदों की,
कौन उन आँखों से वो आधे-अधूरे खाब माँगेगा ।

चाँदनी तार तार और चाँद भी जरद-जरद सा हो,
कौन उस चाँद की ख़ुमारी और शबाब माँगेगा ?

वो शाख़ ही नहीं जिस पर आशियाना था कभी,
दर्द छुपाने दरख़्त किन-किन से हिज़ाब माँगेगा ?

उधार में मिली खुशियाँ,कहाँ अपनी होती भला,
कौन दरोदीवार की तलखियों से सैलाब माँगेगा ?
इक अदना सी चिंगारी सही,फूँक देती है नशेमन ही,
कौन उस राख की ढेरी से शुआ-ए-आफ़ताब माँगेगा?
तुमने तो हक़ अदा किया अपने जान की बाज़ी लगाकर,
बाकी बची साँसों से कौन अब हिसाब किताब माँगेगा ?
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स्वरचित (c)भार्गवी रविन्द्र
तारीक़ी -अंधेरा ; दरख़्त - पेड़ ,हिज़ाब -परदा , तल्ख़ी -कटुता
सैलाब - बाढ़।, नशेमन -घर, घोंसले , शुआ ए आफ़ताब - सूरज की किरण
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हो दुआओं से भरा ...,....नया साल !
कुछ नये रिश्ते जोड़कर
कुछ हँसी यादें छोड़कर,
कुछ क़समें-वादे तोड़कर 
फिर गुज़र गया एक और साल
अलविदा कह गया एक और साल !
कुछ ख़ुशगवार लमहें लेकर,
कुछ बोझिल- तनहा रातें लेकर
कुछ अपनों की सौग़ातें लेकर,
फिर आगया लो साल नया !
आँखों में हँसी खाब सजाने,
दिलों में नये अरमान जगाने,
घर - आँगन में यादें महकाने,
अब आगया लो साल नया !
आशाओं से झोली भरी रहे
दोस्तों की टोली बनी रहे,
नये रंगों से होली सजी रहे,
हो सबको मुबारक साल नया!
अपनों का साथ न छूटे
दिलों के रिश्ते न रुठे,
उम्मीदों के महल न टूटे,
हो सबको मुबारक साल नया!
जशन ए दोस्ती का आलम रहे
मौसम ए बहारां हमकदम रहे,
और सब पर "उसका" करम रहे,
कहता हमसे तुमसे ये साल नया
हो दुआओं से भरा ये साल नया !
न भूलो अपनी संस्कृति,अपनी परंपरा
जीवन का है इनसे रिश्ता गहरा
मैं वकत हूँ ,मैं कैसे रुक जाऊँ भला
बस .....अलविदा .....अब मैं चला
भार्गवी १ जनवरी २०१६
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भावों के मोती - स्वतंत्र लेखन
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नहीं मुझे किसी बात पर अब रोना आता है
क्यूँकि मुझे प्यार में ख़ुद को खोना आता है।
किसी पर क्यूँ धरूँ इल्ज़ाम अपनी हार का
अपने कंधों पर ये बोझ मुझे ढोना आता है ।
ख़ुशी मिले न मिले ,ये मर्ज़ी ऊपर वाले की
इंतज़ार में उसकी हमें बाँट जोहना आता है।
खोने में भी अजीब सी कशिश है इन दिनों
बिखरे मोतियों को फिर से पिरोना आता है।
सपने मेरे कभी सच हो कि न हो,किसे पता ?
मगर ,इन्हें अब आँखों में संजोना आता है ।
ज़िंदगी तुझसे कोई गिला,कोई शिकायत नहीं
मुड़ती राहों पर हमें ख़ुद को मोड़ना आता है ।
हम रुक जाते जो किसी ने दिल से पुकारा होता
दिल की सदा पर हमें बढ़ते क़दम रोकना आता है ।
रिश्तों की अहमियत की अब समझ आने लगी है
दिल से दिल के तारों को अब जोड़ना आता है ।
नहीं मुझे अब किसी बात पर रोना आता है .....
सर्वाधिकार सुरक्षित (C)भार्गवी रविन्द्र
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जीवन में में जैसे आगे बढ़ते जाते हैं नये लोग जुड़ते जाते हैं। कुछ पुराने छूट जाते हैं पर वो हमेशा हमारी जिंदगी से जुड़े होते हैं , बहुत याद आते हैं ....ये मेरी पंक्तियाँ कुछ ऐसी ही भाव को वर्णित करती हुई ....
हर मौसम दोस्तों के आने जाने का मौसम बन जाए
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दर्द को इतना न समेटो ख़ुद में कि वो ज़ख़्म बन जाए
वकत को इतना तो वकत दो कि वो मरहम बन जाए
बादल कारे गुज़रना मेरी गली से आहिस्ता-आहिस्ता
यूँ न हो कि ये तेरा पानी कहीं चश्मे- नम बन जाए ।
दस्तुरे-वफ़ा पर आकर ख़त्म हो जाती हैं दलीलें सारी
डरता हूँ , मैं कोई बात करुँ और वो क़सम बन जाए।
इंतज़ार का हक़ चलो हम अपने हिस्से में कर लेते हैं
हलकी सी आहट भी न कहीं तुम्हारा वहम बन जाए।
तसववुर में ही सही, यारब कोई तो ऐसा करिश्मा हो
हर मौसम दोस्तों के आने जाने का मौसम बन जाए।
मेरी तन्हाई करती रही गुफ़्तगू,माहोअँजुम से ता-शब
आग़ोशे-सहर वो एहसास अकसर शबनम बन जाए।
फिर यही सोचकर आदतन निकल पड़े हैं सफर में
अज़नबी ही सही,दौराने-सफ़र वो हमक़दम बन जाए।
ऐसे ख़्वाब न सज़ा बेनूर सी इन आँखों में ऐ जिंदगी !
जिसे मैं हक़ीक़त समझूँ और वो मेरा भरम बन जाए ।
All rights reserved(C)भार्गवी रविन्द्र ;नवंबर २०१८
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स्वतंत्र लेखन के तहत प्रस्तुत है मेरी रचना
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जन सामान्य का विचार मुक्त होना संभव ही नहीं....वह नाना प्रकार की आँशंकाओं / विचारधाराओं /संभावनाओं में घिरा होता है, ख़ुद को उलझाये रखता है, ....शायद यही मनुष्य के अस्तित्व का प्रथम व आख़री सत्य है ...और ऐसे ही किसी क्षण में मेरे अंदर निहित विचारों मे लिखी मेरी ये पंक्तिया प्रस्तुत है -----
मैं हूँ
पर मेरा अस्तित्व क्या है ?
इस समस्त सृष्टि में
तृण मात्र ,
धूल मात्र ,
तुहिन कण मात्र ,
या महज़ बिंदू मात्र !
यह तय कर पाना ,
शायद ,मुमकिन न हो
इस दिशा में प्रयास करना भी
अंतहीन आसमान की परिधि को मापने जैसा
या,
इंद्रधनुष के दो सिरों को पाने जैसा है !
मगर,
सुबह- सबेरे ऊगते सूरज को
पेड़ों की शाख़ों से छनकर हरित धरा को
अपने में समेटता देख
मेरे मन का भाव विभोर हो जाना।
वसंत ऋतु के आगमन में
दिशाओं का नव वधू सा
सजते संवरते देख
मेरे मन का पुलकित हो जाना ।
साँझ ढले क्षितिज में चमचमाते सूरज को
चाँद को निमंत्रण देकर
सागर में विलीन होता देख
मेरे मन का रोमांचित हो जाना ।
माँ का अपने नवजात शिशु को
अपलक निहारते देख
मेरे मन का विस्मृत हो जाना
गोधूली की बेला में
निज गृह लौटते खगवृंद का
मधुर कलरव देख
मेरे मन का विस्मित हो जाना ।
पतझर में शाख़ से जुदा होते
पत्तों का मौन रुदन देख
मेरे मन का क्षत विक्षत हो जाना ।
आँखों को चकाचौंध करने वाली रौशनी कहीं
और कहीं पसरता अँधेरा देख
मेरे मन का भ्रमित हो जाना ।
कया मेरे अस्तित्व को प्रमाणित नहीं करता ?
तृण मात्र ही सही,
धूल मात्र ही सही,
तुहिन कण मात्र ही सही,
एक बिंदू मात्र ही सही,
जब तक मैं हूँ
मेरा अस्तित्व भी है ।
और ,यही सत्य है !
सरवाधिकार सुरक्षित(c) भार्गवी रविन्द्र
(C)भार्गवी रविन्द्र ....oct 2018
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मेरी हाल ही में लिखी ग़ज़ल पेशे -ख़िदमत है-
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सफर के दौरान अकसर कुछ नये लोगों का साथ मिल जाता है ....जो फिर यादें बन जातीं हैं ....कुछ सुहानी तो कुछ तल्ख़........
चलो अच्छा है .....
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सफर में जितना भी मिले साथ,चलो अच्छा है
चलते-चलते हो जाए मुलाक़ात,चलो अच्छा है।
अपने ग़म की हो नुमाइश हमें कभी गवारा नहीं
पोशीदा ही रहे दिल में जज़्बात,चलो अच्छा है।
तसववुर में भी कोई मुककमल साथ नहीं होता
कुछ आधे-अधूरे से हैं ख़यालात,चलो अच्छा है।
मानिनद-ए-दरिया नहीं,अब चश्मे-नम की रवानी
सहमी सी गुजरती है बरसात अब,चलो अच्छा है।
तन्हा इक हम ही नहीं अहल-ए-जहाँ!तेरी बज़्म में
चाँद भी तन्हा सा है आज की रात ,चलो अच्छा है।
ख़्वाहिशों का हुज़म और मुख़्तसर सी ये जिंदगी
वक्त रहते याद आ गई औक़ात,चलो अच्छा है।
क्यूँ करे रायगाँ ये जिंदगी जवाबों की जुस्तज़ू में
रह जाए कुछ उलझ से सवालात,चलो अच्छा है।
जन्नत की आरज़ू भी जाती रही बशर के दिल से
शायद उधर भी है गर्दिश-ए-हालात,चलो अच्छा है।
शब-ए-हिज्रात लंबी सही,मगर ख़त्म तो होगी कभी
दिल बहलाने को काफी ये एहसासात,चलो अच्छा है
(C) भार्गवी रविन्द्र...... oct 2018
All rights reserved (C)Bhargavi Ravindra
पोशीदा -छुपा हुआ ; तसववुर -ख़याल ; मुककमल - पूरा
चश्मे - नम - आँखों का पानी ,आँसू ; हुजूम - भीड़ ;
अहल ए जहाँ - दुनिया वाले ; बज़्म -महफ़िल ,मुख़्तसर - छोटी सी
रायगाँ - व्यर्थ , जु़स्तज़ू - तलाश ; बशर - इंसान ,शब ए हिज्रात -जुदाई की रात
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सफर के दौरान अकसर कुछ नये लोगों का साथ मिल जाता है ....जो फिर यादें बन जातीं हैं ....कुछ सुहानी तो कुछ तल्ख़........
चलो अच्छा है .....
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सफर में जितना भी मिले साथ,चलो अच्छा है
चलते-चलते हो जाए मुलाक़ात,चलो अच्छा है।
अपने ग़म की हो नुमाइश हमें कभी गवारा नहीं
पोशीदा ही रहे दिल में जज़्बात,चलो अच्छा है।
तसववुर में भी कोई मुककमल साथ नहीं होता
कुछ आधे-अधूरे से हैं ख़यालात,चलो अच्छा है।
मानिनद-ए-दरिया नहीं,अब चश्मे-नम की रवानी
सहमी सी गुजरती है बरसात अब,चलो अच्छा है।
तन्हा इक हम ही नहीं अहल-ए-जहाँ!तेरी बज़्म में
चाँद भी तन्हा सा है आज की रात ,चलो अच्छा है।
ख़्वाहिशों का हुज़म और मुख़्तसर सी ये जिंदगी
वक्त रहते याद आ गई औक़ात,चलो अच्छा है।
क्यूँ करे रायगाँ ये जिंदगी जवाबों की जुस्तज़ू में
रह जाए कुछ उलझ से सवालात,चलो अच्छा है।
जन्नत की आरज़ू भी जाती रही बशर के दिल से
शायद उधर भी है गर्दिश-ए-हालात,चलो अच्छा है।
शब-ए-हिज्रात लंबी सही,मगर ख़त्म तो होगी कभी
दिल बहलाने को काफी ये एहसासात,चलो अच्छा है
(C) भार्गवी रविन्द्र...... oct 2018
All rights reserved (C)Bhargavi Ravindra
पोशीदा -छुपा हुआ ; तसववुर -ख़याल ; मुककमल - पूरा
चश्मे - नम - आँखों का पानी ,आँसू ; हुजूम - भीड़ ;
अहल ए जहाँ - दुनिया वाले ; बज़्म -महफ़िल ,मुख़्तसर - छोटी सी
रायगाँ - व्यर्थ , जु़स्तज़ू - तलाश ; बशर - इंसान ,शब ए हिज्रात -जुदाई की रात
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माना मैं ठहरा नहीं,पर आवाज़ दी नहीं तुमने भी
गीत मैंने गाया नहीं ,पर साज़ छेड़ा नहीं तुमने भी।

मंज़िल की जुस्तज़ू में निकल गए मंज़िल से दूर बहुत
रुकना कहाँ है हमें न मालूम,ये जाना नहीं तुमने भी।

रात बडी तनहा - सी ,ठहरी रही दरख़्त के साये तले
अनजानी सी वो लगी मुझे,उसे पहचाना नहीं तुमने भी।

देर तक गूँजती रही दरोदीवार में ख़ामोशी की आवाज़.
दबे पाँव गुज़रते वकत ने क्या कहा,सुना नहीं तुमने भी ।
(C)भार्गवी रविन्द्र १०/०९/२०१८
All rights reserved Smt Bhargavi Ravindra

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भावों के मोती - स्वतंत्र लेखन 
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मैं कश्ती हूँ तुम्हारी , तुम पतवार बन जाना

मेरी अनकही कहानी के किरदार बन जाना 

जहाँ से तुम गुज़रो ,मैं काँटे समेट लूँ सारे 
मुरझाए फूल महक उठे वो बहार बन जाना ।

सब जीते हैं अपने लिए,यही दस्तूरे-ज़माना है
दुनिया बसा लूँ दिल में वो विस्तार बन जाना ।

एक ऐसी इमारत बनाने की चाह है मन में मेरे
प्यार ही प्यार का प्रवेश हो वो द्वार बन जाना ।

पता नहीं कब पूरे होंगे वो वादे जो ख़ुद से किए
वादा ख़िलाफ़ी न हो,तुम वो एतबार बन जाना ।

पाया बहुत इस जहाँ में, दिया बहुत इस जहाँ ने
अब देने की है मेरी बारी ,मेरा संस्कार बन जाना ।

'मैं'और 'तुम' की परिधी से परे सिर्फ़'हम'हो जहाँ 
तुम मेरे सपनों का वो सुखद संसार बन जाना ।

इस साल के साथ ही ख़त्म हो जाएँ दिलों की रंजिशें
दिल से जो दुआ बन निकले तुम वो आभार बन जाना ।

स्वरचित (c) भारगवी रविन्द्र ३०/१२/२०१८


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शब्द - दिल 
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१) निकटता भी कर देती है दूर कभी-कभी
न चाहकर भी हो जाते हैं मज़बूर कभी -कभी।
एहसास भी जिनका दिल को होने नहीं पाता
ऐसे भी हो जाते हैं क़सूर कभी - कभी ।

२) मिलना -बिछुड़ना जीवन की कहानी है 
आँखों में आँसू , रिश्तों की निशानी है।
मिले सबसे यूँ कि दिलों में दूरियाँ नहो 
दुनिया बड़ी सही,पर जानी पहचानी है।

३) ये मज़हब की दीवार न होती काश ! इंसानों के दरम्याँ
न माशरे से शिकायत होती,न होती रिश्तों में तल्खियाँ।
मुहब्बतों के चिराग़ों से रौशन होती काश! ये दरोदीवार 
फिर न होते गुमनामी के अँधेरे , न दिलों में तारीक़ियाँ ।

स्वरचित (c)भार्गवी रविन्द्र
माशरा - समाज , तल्खियाँ -कटुता , तारीक़ियाँ -अंधेरा
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भावों के मोती : प्रेषित शब्द : किनारा 
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१)ज़िदगी की कश्ती  उतार तो दी है मँझधार में 
    ढूँढ रहे है किनारा सागर से विशाल संसार में ।

२)लोगों का कारवाँ साथ होता है , राहें जब तलक आसाँ होती है 
  परछाईं तक किनारा कर लेती है वो अँधेरे में साथ कहाँ होती है ।

३)इंद्रधनुष का एक किनारा पकड़ सपने लगे हैं आसमां छूने
   बडे हौसले से हवा के परों पर बनाया है एक आशियाँ हमने ।

४)वो माँ की आँचल का किनारा , वो ममता की छाँव
 शहर की भीड़ में कहीं खो गया वो मेरे बुज़ुर्गों का गाँव ।

 ५) फैली है दूर दूर तलक खामोशी ,सागर किनारे 
    अब बच्चे नज़र नहीं आते , रेत में बनाते घरौंदे ।
     स्वरचित(c)भार्गवी रविन्द्र .....बेंगलुर...१९/६/२०१९

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1*भा#नीयत#काव्यः ः
17/6/2019/सोमवार



भावों के मोती : प्रेषित शब्द : नीयत 
***************(************
१)जानें कब अपने बेगाने बन जाए ,ख़ूनी रिशतों  में दरार  पड़ जाए
  इंसान की नीयत कब बदल जाए ,दिलों पर कब अँधेरा छा जाए।

२)दिलों में प्यार हो ,अपनापन हो और  मुहब्बत सच्ची हो ,
   रिश्ते-नाते तब ही तक साथ है जबतक नीयत अच्छी हो ।

 ३)इंसान बिगड़ी क़िस्मत को सँवार कर जीत जाता है ,
   अगर नीयत में खोट हो तो जीती बाज़ी हार जाता है ।

४) खुश रहने के लिये अच्छी आदत और अच्छी नीयत जरुरी है ,
    और तो जयादा कुछ नहीं दिलों में,थोड़ी सी मुहब्बत जरुरी है ।

५)मेहनत और लगन से दौलत और शोहरत मिल जाते हैं ,
    मगर,अच्छी नीयत वाले लोग जमाने में कम मिल पाते हैं।

   स्वरचित(c)भार्गवी रविन्द्र .....बेंगलूर .....१६/६/२०१९


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भावों के मोती  : शब्द : डाल/शाख़ 
*****************************
वो मुस्कुराते दिन,वो मधुर तराने
 कैसे बिसरा दूँ वो दिन सुहाने ?

     हरी-हरी दूब पर लोट 
     खुश होते थे कितना 
   देख - देख वैभव अपना !
डाल - डाल लटकते झूलों पर 
 उन्मादित हो विहंगम जैसा
झूल - झूल जाता शैशव अपना !
वो सुंदर सपने , वो गुज़रे जमाने 
   कैसे बिसरा दूँ वे दिन सुहाने !

    पात -पात जब झर जाता 
    सूखी डालियों को पकड़ 
   कल्पना छू लेते आकाश !
    और निस्तब्ध निशा में 
  जाने किन -किन भावों में ,
 भर लाते झिलमिल प्रकाश !
वो फूलों में आशियाँ ,चमन में ठिकाने !
     कैसे बिसरा दूँ वो दिन सुहाने ?

    गोधूली की बेला में 
   घनी झाड़ियों में कहीं 
    पत्तों की सरसराहट!
और आँगन में हौले -हौले 
   उतर आई स्वप्निल 
     शाम की आहट !
बातों के , कहानियों के अनमोल ख़ज़ाने 
    कैसे बिसरा दूँ वो दिन सुहाने !
स्वरचित(c)भार्गवी रविन्द्र .....१४/६/२०१९

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भावों के मोती : शब्द :घर 
****************(***(*(*
वो घर जहाँ मेरे अपने बसते थे
वो घर जहाँ मेरे सपने हँसते थे
बहुत दूर निकल आए है हम 
चलते चलते कहाँ आगए हम 
चलो , अब अपने घर चलते हैं 

जहाँ बच्चों की किलकारियाँ 
गूँजती थींआँगन में 
गीत सजते थे सावन में ।
जहाँ जिंदगी की तस्वीर से 
दीवारें भरी होती थी.
हर तस्वीर का अपना ही रंग होता था 
और उनकी अपनी  कहानियाँ होती थी 
और हर तस्वीर अपने ही रंग में रंगे होते थे
चलो चलते हैं फिर उस घर में ।

जहाँ छत से होकर 
बारिश का पानी टपकता रहता था 
और छम छम बूँदें नाचती थीं 
छोटी बडी काग़ज़ की नाव 
पानी में तैरा करती थीं।
उन नावों में होकर सवार 
हमारे सपने गाँव गलियों की सैर करते
हम तब कितना खुश होते ।
चलो चलते हैं फिर उस घर में !

जहाँ दोपहर को खुले आकाश में 
अपने पतंग की डोर थामे 
इधर  उधर थिरकते फिरते ।
छोटे बडे रंग बिरंगी पतंगों से भरा आसमान
कितना प्यारा लगता था 
आसमान बँट जाता था हिस्सों में
और सबका अपना हिस्सा होता था 
चलो चलते हैं फिर उस घर में!

शाम को घर के अहाते में यार दोस्त आकर मिलते 
बडे बूढ़े बच्चे हँसी ठिठोली करते नहीं थकते ।
दादी नानी कहानियों की गठहरी खोलते 
और सुनाती परियों की कहानी 
हम बेसुध से उनकी गोदी में सर छपाकर सोजाते ।
ठंडी हवा थपकी देकर हमें छेड़ती 
माँ प्यार से माथा चूम लोरी गाती ।
चलो चलते हैं उस घर में!
स्वरचित(c) भार्गवी रविन्द्र ....बेंगलूर ....११/६/२०१९


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"भाषा"19 जुलाई 2019

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