जयंती सिंह


नाम -श्रीमती जयंती सिंह लोधी पिता -स्व श्री मोहन सिंह लोधी माता-स्व.श्रीमती काशी देवी जन्म स्थान-देवरी कलां जिला सागर शिक्षा-M.A.हिंदी पति -श्री भगत सिंह लोधी S.T.Aसर हरिसिंह गौर सेंट्रल यूनिवर्सिटी सागर मध्यप्रदेश पुस्तक-पथ कविता संग्रह लेखन विधा-कविता,गीत गजल ,कहानी सम्मान लोधी क्षत्रिय जिला सभा द्वारा वीरांगना अवंति बाई प्रतिभा सम्मान,विभिन्न साहित्यिक समूह द्वारा अनेकों सम्मान,पत्रिका समूह द्वारा नारी सम्मान पता -H.I.G 18 राजीव नगर शिवाजी वार्ड सागर मेल jslodhi69@gmail.com
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पिता
मार्गदर्शक
पिता जीवन दाता
सुख प्रदाता।

वरद हस्त
शीतल वट वृक्ष
पिता रक्षक।
कर्तव्यरत
कठोर अनुशासन
गृहस्थ पथ।
रचनाकार
जयंती सिंह

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नमन भावों के मोती
दिनाँक-6/4/19
विषय -मत ,वोट
विधा-लघु कविता
मत ,वोट
मत वोट उन्हें देना,
जो नेता भृष्टाचारी हैं
देश का धन खाते है,
और करें देश से गद्दारी।।
सत्ता को हथियाने वाले,
बिन दूल्हे की बारात वाले।।
इनको वोट नहीं देना,
संसद से इन्हें दूर ही रखना।।
राष्ट्र हित हो सर्वोपरी,
भारत माँ का सच्चा प्रहरी।
उसका ही सम्मान करें,
आओ मिलकर मतदान करें ।।
जयंती सिंह
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नमन भावों के मोती
दिनाँक २0/९ २0१८
विषय- कीर्ति ,यश
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मात पिता के आशीषों से,
यश, कीर्ति,सम्मान मिले।
सद्गुरु की कृपा से हमको,
सद्ग्रन्थों का ज्ञान मिले।।
मानव जीवन हमें मिला,
ये प्रभु की सौगात हैं।
धूप छाँव में सम रहना है,
अब डरने की क्या बात है।।
कहीं राह में काँटे हैं तो,
कहीं कहीं पर फूल खिले।
यश पाकर न इतराना है,
अपयश से न घबराना है।
निष्काम समर्पण कर्म करें
सहज भाव में रहना है।।
हर दिन जो श्रम बिंदु बहाते
सदा सफलता उनको मिले।।
मात पिता के आशीषों से,
यश कीर्ति सम्मान मिले।।
स्वरचित
रचनाकार
जयंती सिंह
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विधा -छन्द 

हे बुद्धि प्रदायिनी, हे मात वरदायिनी।
वीणा कर धारिणी ,नमन मात शारदे।।

वर मोक्षदायिनी, मात हंसवाहिनी।
त्रिय ताप हारणी ,नमन मातु शारदे।।

अज्ञान विनाशनी,निर्मल मति दात्री
भवसागर तारणी, नमन मातु शारदे।।

सरस्वती भवानी, दे दो विमल वाणी।
वेद ज्ञान दायिनी,नमन मातु शारदे।।

रचनाकार
जयंती सिंह

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वेदों का आधार यही है
गीता का सार यही है।
शरीर तो यह क्षण भंगुर है,
आत्मा अजर अमर अनश्वर है।।

त्रिविध ताप का नहीं असर,
आत्मा में ही रहता परमेश्वर।
परम् पिता की अंश यही,
जगत नियन्ता जगदीश्वर।।

मानवता का धर्म यही है,
आत्मा किसी की नहीं दुखाये।
परहित में सर्वस्य निछावर कर,
आत्म तत्व को सुख पहुचायें।।
रचनाकार
जयंती सिंह

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मन के सूने गलियारों में,
दस्तक दे गया कोई।
टिमटिमाते रहे उम्मीद के दिये,
आबताब चुराकर ले गया कोई।।

गमों ने दस्तक दी जिंदगी में,
दूर तक अपना दिखाई न दिया।
सुखों का सूरज चमकने लगा तो
सब कहने लगे हम भी है आपके।।

गजब फलसफा है जिंदगी तेरा
सुख नजर तो आता है,
द्वार पर दस्तक तो देता है ,
पर पल भर ठहरता नहीं है।।

रचनाकार
जयंती सिंह

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जीवन के सफर में
न हो हमसफ़र तो,
ये जीवन नहीं फिर,
सुहाना रहेगा।।

मिले लाख खुशियाँ,
मगर दिल मिले ना।
तो दिल का ये खाली
खजाना रहेगा।।

सांसों की सरगम,
बेसुरी ही रहेगी।
सदा ही अधूरा ,
तराना रहेगा।।

निभाये सदा साथ,
ऐसा साथी मिले तो।
ये जीवन हमेशा,
सुहाना रहेगा ।।

रचनाकार
जयंती सिंह

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नारी मन की यही अभिलाषा,
सदा सुखी रहे घर परिवार।
सदा सुहागन रहूँ जीवन भर,
खुशियाँ होवै अपरम्पार।।

हाथों में मेंहदी माथे बिंदी
गले में हो मोतिन के हार।
सर पर ओढ़ूँ लाल चुनरिया
करूँ सदा सोलह श्रंगार।।

भारत की नारी का गौरव ,
भारत के परिधान से।
भारत की संस्कृति सदा से,
नारी के सम्मान से।।

रचनाकार
जयंती सिंह

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नारी का अवतार है दुर्गा,
सृष्टि की सृजनहार दुर्गा।
दानव दल पर भारी है ये,
सबकी पालनहार है दुर्गा।।

दुर्गा दुर्गति शमनी माँ
हमको दे दो माँ वरदान।
जीवन सफल हमारा होवै,
कर दो माँ जग का कल्याण।।

पावन इन नवरात्रों में,
करते माँ तेरा अराधन।
मनवांछित फल वो पाते,
सर्वस्व जो करते माँ अर्पण।।

रचनाकार
जयंती सिंह

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घर का सारा काम निबटाकर चन्दा बाई जाने लगी ,तो सुधा ने आवाज लगाते हुए कहा,
चन्दा बाई आज सुप्रिया का जन्म दिन है ;शाम के समय तू अपने बच्चों को भी ले आना यही खाना खायेंगें ।
ठीक है मेम साब ,कहते हुए चन्दा चली गई ,वह मन ही मन बहुत खुश हो रही थी कि आज मेम साब ने मेरे बच्चों को भी बुलाया है।पर कुछ उपहार भी तो देना पड़ेगा बिटिया को।

शाम का समय हो चला था ,गुलाबी फ्रॉक में सुप्रिया बहुत सुंदर लग रही थी,उसके सभी दोस्त आ गए थे, मौज मस्ती शुरू हो गई ।सुप्रिया ने केक काटा मम्मी पापा और सभी दोस्तों को खिलाया, तभी चन्दा अपने बच्चों के साथ आ गई ।
सभी लोग सुप्रिया को गिफ्ट दे रहे थे, चन्दा भी अपने साथ लाये डिब्बे को खोलकर चम्मच से सुप्रिया को खीर खिलाने लगी तो सुधा एकदम से बोल पड़ी ।
अरे चन्दा ये सब रहने दो,
सुप्रिया अभी केक खा रही है न;
चन्दा सहम गई उसे लगा जैसे उससे भूल हो गई हो। वह तो मंहगे उपहार दे नहीं सकती थी इसलिए दूध वाली खीर बनाकर कर लाई थी ।

एक चम्मच खीर खा लेती 
बिटिया तो क्या हो जाता । 
ये अमीर आदमी ये भी नहीं समझते कि गरीब आदमी में भी भावनाएं होती है
चन्दा मन ही मन दुखी हो गई
उसकी" भावना "को चोट जो पहुंची थी।

रचनाकार
जयंती सिंह


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आज शीर्षक
सत्य ,अहिंसा,
जय जवान जय किसान
विधा लघु कविता

हे राष्ट्र पिता सारे जग के,
हे सत्य अहिंसा व्रत धारी।
आज तुम्हारे जन्म दिवस पर
सारा देश है बलिहारी।।

वो लाल बहादुर शास्त्री,
सरल सहज उनकी मुस्कान।
कर्मयोग का दिया है नारा,
जय जवान और जय किसान।।

देखो इन महापुरुषों का जीवन,
कितने त्यागी और महान।
आज सियासत करने वालों।
कुछ तो सीखो इनसे ज्ञान।।

स्वरचित 
रचनाकार
जयंती सिंह

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मेरे साँवरे,

अनथक, अपलक
निहारती हूँ तुम्हारा पथ
लिए हूँ हाथों में पुष्पहार।
कर रही हूँ तुम्हारा इंतजार।।
जा बसे हो तुम परदेश,
न कोई पाती न सन्देश।
बागों में खिल उठी है कलियाँ,
तुम्हारे बिन सूनी हैं गलियाँ।
मेरे मन के अंदर लेकिन,
चल रही है पतझड़ी ब्यार।
कर रही हूँ तुम्हारा इंतजार।।
वादा किया था तुमने,
एक दिन लौट के आओगे।
मेरे मन के मधुवन में ,
फिर से रास रचाओगे।।
आशाओं के दीप जलाकर
कब से खड़ी हूँ द्वार।
कर रही हूँ तेरा इंतजार।।
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स्वरचित
रचनाकार 



सरकारी योजनायें,
कागजों पर कुछ और
हकीकत में कुछ और
नजर आएं।
बी पी एल कार्ड बनवाने
के लिए गरीबों की
लगी थी लंबी कतार
सर्वेक्षण कार्य चल रहा था ।
कुर्सी पर बैठे थे सरकारी बाबू
टेबल पर लगा था कागजों का ढेर
टेबिल के नीचे से कुछ लोग 
कुछ कुछ सरका रहे थे।
ऊपर रखे रजिस्टर में उनके
नाम लिखे जा रहे थे।
जिन गरीबों के जेब में
देने को न थी दो पाई
सरकारी योजना उन्हें 
राहत न दे पाई।।
हाय गरीबी
इस गरीबी ने ही 
गरीबों को डस लिया
गरीब के हिस्से का राशन पानी,
रिश्वत देने वालों ने पचा लिया।।

रचनाकार
जयंती सिंह

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नारी का अवतार है दुर्गा,
सृष्टि की सृजनहार दुर्गा।
दानव दल पर भारी है ये,
सबकी पालनहार है दुर्गा।।

दुर्गा दुर्गति शमनी माँ
हमको दे दो माँ वरदान।
जीवन सफल हमारा होवै,
कर दो माँ जग का कल्याण।।

पावन इन नवरात्रों में,
करते माँ तेरा अराधन।
मनवांछित फल वो पाते,
सर्वस्व जो करते माँ अर्पण।।

रचनाकार
जयंती सिंह

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नारी मन की यही अभिलाषा,
सदा सुखी रहे घर परिवार।
सदा सुहागन रहूँ जीवन भर,
खुशियाँ होवै अपरम्पार।।

हाथों में मेंहदी माथे बिंदी
गले में हो मोतिन के हार।
सर पर ओढ़ूँ लाल चुनरिया
करूँ सदा सोलह श्रंगार।।

भारत की नारी का गौरव ,
भारत के परिधान से।
भारत की संस्कृति सदा से,
नारी के सम्मान से।।

रचनाकार
जयंती सिंह


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