गोविन्द सिंह चौहान


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"लेखक परिचय"



नाम- गोविन्द सिंह चौहान

पिता- श्री नारायण सिंह चौहान
माता- श्रीमती कँवरी देवी
शिक्षा- एम. ए. राजनीति विज्ञान (1988 )
जन्म- 16-04-1966
विशेष- 25-01-1992 को सिरोही में एक सड़क दुर्घटना में गर्दन से नीचे का भाग निष्क्रिय हो गया। एक हाथ के सहारे व कोहनियों के बल पर जीवन से सतत संघर्ष।
रुचि- लेखन व अध्ययन। #प्रकाशित पुस्तकें """""""""""""""""""" 1. "क्षत्रिय रावत राजपूत समाज-इक आईना" (ऐतिहासिक संदर्भ की पुस्तक )
4. कविता संग्रह "मैं खुद ही को खुद लिख दूँ"--बोधिप्रकाशन-जयपुर से प्रकाशित
2. "अजमेर मेरवाड़ा-क्षत्रिय रावत दर्शन" (सामाजिक विश्लेषणात्मक पुस्तक ) 3. "चौहान वंश और ऐतिहासिक तथ्य"( शोध पुस्तिका )
# पुष्कर-2014, ब्यावर-2017, भीम-2018 के प्रतिभा सम्मान समारोह में हिंदी साहित्य लेखन हेतु सम्मानित।
# साहित्यालोचन मंच ब्यावर के काव्य संकलन"आहिस्ता-आहिस्ता" में चार रचनाएं व विभिन्न सामुहिक संग्रह पुस्तकों में रचनाएं प्रकाशित। # उदयपुर की प्रतिष्ठित साहित्यिक,सामाजिक व वैचारिक संस्था द्वारा "राष्ट्रीय युगधारा सम्मान-2017" से सम्मानित।
# काव्य गोष्ठी मंच-कांकरोली से "काव्य मित्र सम्मान" से सम्मानित तथा राजस्थान साहित्यकार परिषद द्वारा "श्री गोकुलानंद तैलंग स्मृति सम्मान" से विभूषित।
# सृजन-सम्मान बहुआयामी सांस्कृतिक साहित्यिक संस्था रायपुर छत्तीसगढ़ द्वारा चौहदवें अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन जयपुर में "हिन्दी मित्र सम्मान 2017" से सम्मानित। # मंज़िल ग्रुप साहित्यिक मंच (मगसम) गाज़ियाबाद-उत्तरप्रदेश द्वारा "शतकवीर सम्मान-2019" से सम्मानित। # एक कविता संग्रह प्रकाशनाधीन। प्रतिष्ठित समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में लेख,कविताएं,लघुकथाएं प्रकाशित।
मो. 9783207045
# रावत-राजपूत समाज जागरण हेतु पाक्षिक विचारोत्तेजक लेखन । स्थाई पता -- """"""""""""" नाम -गोविन्द सिंह चौहान गाँव - भागावड़ पोस्ट - भीम जिला - राजसमन्द ( राज.) पिन. 305921 ----------------------------------------
मो. 9588921285

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नमन भावों के मोती
22/10/19
आज के शीर्षक पर एक प्रयास सादर🙏🌹
गुजरो गली से तो इतना तो ताल्लुक़ात रखना।
फुलों के साथ कांटो से भी मुलाक़ात रखना।।

गोशा-ए-गुलशन से जब भी तुम ग़र ग़ुजर करो।
परिन्दों की नींद में मीठे- मीठे ज़ज़्बात रखना।।

आँधियों की गुस्ताख़ियों को नजर अंदाज करना।
आशियां के तिनकों में एकता के सलीक़ात रखना।।

आसमां छूने में परिन्दों अगर तुम्हारे घर उजड़े।
जमीनों से तुम परिन्दों थोड़ी मुलाकात रखना।।

इज़हारे-मुहब्बत की कुछ रश्मे-इबारत रखना।
गुज़ारिश है ख्वाबों में पुराने तजुर्बात रखना।।

✍🏻गोविन्द सिंह चौहान


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पुतले
""""""

मय्यत से महज़ दो कदम दूर खड़े हैं
वह भी सब पुतले हैं,
ओढ़ कफ़न हलचल रहित ज़मीन पर लेटा है
वह भी शख़्स पुतला है...।

आँखों की पुतलियों में जो प्रतिबिंबित हैं
वह भी पुतले हैं,
ख़्यालों के बिछड़े अवशेषों में लम्बित हैं
वह भी पुतला है...।

फड़फड़ाती जिन्दगी की लौ में आस के दिये लिए खड़े हैं
वह भी पुतले हैं,
हाथों में विध्वंस की मशाल लिए सन्नाटे का शोरगुल
वह भी पुतला है...।

अन्तहीन मधुर स्वप्न जगाए,मासूमियत की प्यास लिए
वह भी पुतले हैं,
गुनगुने गालों पर धीमें से धड़कने सजाए बैठा
वह भी पुतला है...।

फिसलते हुए पलों में नादानियाँ सजा रहे
वह भी सब पुतले हैं,
गुदगुदी कर कठपुतलियों को ऊपर बैठ नचा रहा
वह भी पुतला है...।

कठपुतलियों की भरमार हैं दुनिया के मंच पर
करतब दिखाते पुतले हैं
डोर-डोर में अटकी है साँसों की लय ताल
टूटा जिसका तार वह पुतला है..।।

✍🏻 गोविन्द सिंह चौहान


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धर्म की उपत्यका
"""""""""""""""""""""


धर्म की उपत्यकाओं के
कगार पर टँगा छद्म आदमी
कभी आदमी नहीं होता,
वो तो बस!
होंठ हिलाता हैं छूने को
चंद मरे हुए शब्दों का स्वाद
बाहर गरदन निकल के
देखता है धर्मभीरूओं में
अंधेरे गलियारों से
गर्मरक्त आल्हाद का सार...।

निःस्तब्ध शोर और धुन्ध की
गहरी तराई से कभी
टँगा छद्म आदमी आहिस्ता से
सुबह को नकारते हुए
धर्मभीरूओं की भीड़ पर
करता हैं अक्षरों की बारिश
और...
समझाता हैं अंतिम कारण का
मतलब मोहनी मुस्कान से,
उसकी महती आँखों का ध्यान
दुनिया की पारम्परिक दीवार पे
चस्पा मृत और परित्यक्त शरीर से
उम्मीदों की रोशनी दिखाकर
पाप के ताप से मुक्ति की
राह दिखाता हैं।

✍🏻 गोविन्द सिंह चौहान,,,भागावड़, भीम, राजसमंद


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✍🏻स्पर्श (मुक्त हो जाना)✍🏻
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सादर भावों के मोती

अब बचा है नम हथेलियों में
केवल वह पहला स्पर्श.....
तुम्हारी हथेलियों का स्पर्श......
कहीं कुछ अनछुआ-सा स्पर्श.....
काश!
मैं सहेज पाता उसे मुट्ठियों में
उससे कहा भी था मैनें
"क्या हममें से कोई याद रखेगा
इन लम्हों को,या
कोई एक भूल जाऐगा?"
और वह शर्माती, सकुचाती,
निहारते सिर्फ मुस्कुराई थी
मैनें तो वादा किया था,
"मैं खुशी-खुशी तकूँगा उस राह
को,उस लम्हें को।"
"तुम भी याद रखना,जब
चला जाऊँ मैं कहीं बहुत दूर
मेरे ख़यालों के बिछुड़े
अवशेषों को छोड़ कर
तुम्हारे हृदय के किनारों पर।"
सूनो!
यादों के झरोखों से,
ना ग्लानि के आँसू बहाना
याद रखना वह पहला स्पर्श.....
तुम्हारी हथेलियों का स्पर्श....और
खोल देना अपने हृदय के द्वार
मुक्त हो जाना जैसे
मुक्त हो जाती है सुबह की
पवित्र ओस सूरज की पहली
किरण में।।


->गोविन्दसिंग चौहान।


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आज का विषय
"""""""""""""""""""""
जेब
"""""

कहते हैं कि "कफ़न में जेब नहीं होती"
अर्थी पर दुनिया मुर्दे के साथ नहीं सोती
फिर क्यूं जमानेभर की दौलत चाहिए
कुछ दिनों के बाद कोई आँख नहीं रोती..।।

हक मारकर दूसरे का जेब अपनी भरेंगे
राम-रावण भी मरे,मौत सब अपनी मरेंगे
मय्यत का खर्च भी उस दिन लोग उठाते हैं
धन के बँटवारे में अपने तो अपनी करेंगे...।।

भरी हुई जेब पर ना इतना इतरा पगले
माँ-बाप की भूख पर तू झाकेगा बगले
सिक्कों की खनक तो कुछ वर्ष की होगी
महल सूने हो गये,सूने हो जाएंगे बंगले....।।

स्वरचित
गोविन्द सिंह चौहान


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काश! मैं जायदाद होती

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घर के बाहर घर्रर्र्रर्रर्र घर्र्रर्रर्र की आवाज से

एक माँ का ममता भरा दिल घबराया

भरापूरा घर अपने बेटे-बहु ने ठुकराया

पोते-पोतियों को जी भर के निहारा

पास बुलाकर आँचल का प्यार दिया सारा
पूछा,,,कहाँ जा रहे हो छोड़ मुझे बेसहारा..?
बेटा बोला,,, माँ, यह घर मौहल्ला तेरी बहु को लगता नहीं प्यारा..
छोटा है घर,गंदा है मौहल्ला माहौल ही सारा...
जाना पड़ेगा वहाँ, जहाँ बड़ा फ्लेट है न्यारा...।
यहाँ भाईयों का है हक और होगा कभी बँटवारा...
हम अभी से चले जाते हैं लेके सामान हमारा...
आँसुओं से तरबर आँखें देखती रही नजारा
बेटे-बहु हो गये घर से नौ दो ग्यारह
डबडबाई आँखों ने फिर खाली घर को निहारा
कुछ टूटे खिलौने जूते चप्पल सामान बिखरा था सारा
माँ सोचने लगी..
काश! मैं "माँ" ना होकर जायदाद होती तो...
कोई तो साथ ले जाता, यहाँ बैठकर ना रोती...
बेटों के बीच एक बेटी भी मेरे होती,,,तो
आज बेघर,बेसहारा उसके घर जा सोती...।।

गोविन्द सिंह चौहान



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बलिदानी
"""""""""""
(28)

सुन कहानी बलिदानों की
हर आँख भर आती हैं..
आजादी की खुशियां सदा
युद्धों पर चलकर आती हैं...।

रोती,राह तकती,थकती फिर
जगती,सिसकती-आहें भरती हैं..
ममता की सब ख़्वाहिशें मरती
दुःख दर्द से मां की छाती भरती है..।
बंकर में रह करता पहरेदारी
रक्षक बन हर हाल रखी खुद्दारी थी..
जख़्म जब भरे सीने में गोली से
आँसू भी मोती बने,मौत भी हारी थी..।
खबरें बनती चन्द राशि तमगों की
रोता छोड़ वीर चला,बातें रही बलिदानी की...
किस हाल लड़ा था लाल,यह कहानी थी...
मेले शेष रहे चिता पर, जय जयकार बलिदान की।
नेताओं को अहसास नहीं, शहीद क्या होते हैं
शब्दों के तूफान उठाते उनके बेटे महफ़ूज़ होते हैं
याद शहीदों की बिसराकर,नसीहतें दे जाते हैं
संसद के बयानों से,सर सैनिक के झुक जाते हैं...।
वरण कर मृत्यु का, भारत का गौरव लिख जाते हैं
ये मत पूछना दर्द कितना है,सेज पर सो जाते हैं
चन्द फूलों की माला पहन वीर सपूत कहलाते हैं
तस्वीरों में स्मृति बन, बलिदानी बन जाते हैं...।।
💐💐💐अश्रुपूरित श्रद्धांजलि💐💐💐
गोविन्द सिंह चौहान


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हे...वीर
"""""""""
(24)
हे,,,वीर
क्या बांध रखे हैं हाथ सियासतदानों ने
क्या कमजोर किये इरादे संसद के गलियारों ने
क्या रोकती हैं राह पत्थरबाजों की भीड़
क्या रूलाती हैं अपनों की बलिदानी तुम्हें भी
आजाद कहाँ है ??भगत कहाँ है??
तुम अब गांधी ना बनो
मौन से निकल, आगे बढ़ो
वीर, तुम वीर हो
कर्तव्य पालन करो
कुछ गद्दार देश में है,
कुछ सीमा पर
समेट लो , हे वीर !
समय आ गया
इन्हें घेर लो
व्यर्थ ना जाएगी कुर्बानियां
लहू से ही लिखी जाएगी आजाद कहानियां....
रो रहे किसान और
जवान के परिजन
परेशान अब सिर्फ
आम हिन्दुस्तान हैं
सियासत की परिभाषाएं अंतःवस्त्र सी
नित सुबह बदल रही हैं
देश में गुलामी की नई जंजीरें
बन रही....
हे वीर...तुम जागो..उठो..चल पड़ो
हे वीर...तुम बढ़ो...शस्त्र उठा...निशाना साधो...।।
गोविन्द सिंह चौहान

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उम्र का पहाड़ अब दरकने लगा है
रेत सा मुठ्ठी से फिसलने लगा है
जज्बात-एहसास पत्थरों से लुढ़कने लगे
उदास मन भी सांझ सा यूँ ढ़लने लगा है....।
जहां में कोई दूर है कोई पास है मेरा
सहमी सी रात में सूना 'काश है मेरा
पंछी भटक गया है क्षितिज तक जाके
आज पतझड़ है और ना मधुमास है मेरा....।
ऐ! उदास मन चल कहीं बहुत दूर चलते है
मंजिल यह नहीं किसी ओर मुकाम चलते है
आँख खुली, सपने टूटे, सपनों की क्या बात करें
पीड़ा से पिघले नीर, उस बहते झरने पर चलते है...।
जिन्दगी में तो लाख मुश्किलें आएगी
बन्दगी बुरे वक्त पर राख डाले जाएगी
"आज" बीत कर बन जाएगा यह भी "कल"
धर धीरज मन उदास, मसले- खाक हो जाएगी...।।
✍🏻 गोविन्द सिंह चौहान
18-1-19


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सुरमई सी शाम भी सिमट आई है,
रात ने होले से पायल खनकाई है,
ख्वाब सजा कर सिरहाने रख दो
दहलीज से यादोंकी आहट आई है।।
🙏गोविन्द


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पहचान सिर्फ और सिर्फ
जीते जी होती है
ऐसा नही है....।
कुछ ठेकेदार हैं
धर्म के,सम्प्रदाय के
ग्रंथों की तहरीरे लेकर
खड़े हो जाते हैं
मुर्दा जिस्मों के सिरहाने
नहलाने,धुलाने के बाद
कफ़न को नाम देते हैं
मुर्दों को भी पहचान देते हैं
तब रोती बिलखती
कथित आत्मा
आँसूओं में अटक,भटकने लगती है
कब्रिस्तान में,शवदाहगृह में
अपनी ही पहचान खोजती
नाम,दौलत,शोहरत
सब कुछ स्थान्तरण के
आदेश में रूपांतरित हो जाती है।
🙏🌹गोविन्द

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मैं,,,मैं हूँ तरंगीत
गीत, स्वरलहरियों में
बन्धी,जकड़ी
और तुमने मुझे उठाकर
रख दिया साज समझकर
हर धुन पर सजाकर
रस्वादन करने के लिए...
कभी पूजा स्थल पर बैठाकर
पूजता रहा
कभी विसर्जन कर दिया
तुमने अपने समन्दर की
लहरों में फूलों के साथ
मैं,,,लहराते लहराते
ओझल होती गई..
दूर और बहुत दूर....
तुमने जब चाहा मुझे
मैं सजती रही
सलवटों में सिमटकर
तरंगीत होता रहा
तन-मन मेरा भी
तेरा भी सलवटों पर बिखरा
झटक कर साफ कर
उठ चले तुम ...और
मैं..मैं हूँ तरंगीत
तेरे हाथों में
लहराती तरंगों सी तरंगीत
तुम्हें बहलाने,गुनगुनाने के लिए..।।
गोविन्द सिंह चौहान
""""""""""""""""""""""""""३१/८/१८


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✍🏻 समन्दर
"""""""""""""""""गोविन्द सिंह चौहान
भीम, राजसमन्द
समन्दर
अकेला धुन रहा है सर
और
व्यर्थ व्याकुल मत्त लहरें
हृदयतल में भर चपलता
फ़ेन-झालर छोड़ तटों पर
लौट पड़ती है तड़फती
पंक्तियों में टूटती-गिरती
पूतलियों सी मूँदती आँखें
डरकर उन्मादी समन्दर से।
और ! समन्दर
अकेला धुन रहा है सर
दहाड़ता,पछाड़ता पानी को
तोड़ता रहता है हाड़-तटबन्ध
अति कठोर निर्जन पहाड़ तट
रक्त रक्तिम हृदय तन-मन समेटे
गरज़ता है उन्मुक्त उर अकेला
खा जाता है कितनी ही नदियां
विराट स्वरूप स्वनिर्वासित समन्दर
यह! समन्दर
अकेला धुन रहा है सर
कभी बर्फ़,कभी बादल, पानी
ख़ुद अपने आप पर बरस रहा
असंयमित उछाल की है सज़ा,या
धरा से तिगुना होने का अभिमान
धरती का सारा नमक लिऐ पेट में
प्यासों को अब क्या मुँह दिखाए
कहाँ जाकर डूब मरे समन्दर।।

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✍🏻 उड़ती संसद
""""""""""""""""""""""
गोविन्द सिंह चौहान
""""""""""""""""""""""""
न्याय, कानून और कर्तव्य मंदिर
जन-गन-मन अधिनायक सुन्दर
जहाँ की गतिविधियां करती है
मन को अकेले अतिउत्साहित
वहाँ उठती तरंगे, तिरंगे को भी
बादलों के कोलाहल में स्थितप्रज्ञ रखती है
अन्दर बैठे जन-नायक शपथ लेते हैं
रक्षा लोकतंत्र परिणाम की
उनका परिणाम क्षति ना पहुंचा सके
अंतिम आदमी को,गरीब को
पर...
सबसे सम्पन्न, सम्मानित, चुनिंदा होकर भी
कीर्ति को बरबाद कर रही है
यह उड़ती संसद...।
भीड़तंत्र के नुकसान, विनाश और विध्वंस
उनकी सारी ताकत को पूर्णता देते हैं सांसद
एक आसन की परिक्रमा और
सिर हिलाते या मंजूरी देते मुखौटों से
सजी-धजी महफिल, महफूज बैठकर
खुशनुमा अनुग्रह के क्षणों की जुगाली कर
पावन आत्मा में छिपा बैठी है घिनौना चेहरा
यह उड़ती संसद...।
बूढ़ी, पके बालों वाली,नींद से बोझिल
राजनीति खड़ी है खतरों से अनजान
जन सरोकारों से लबालब भरे
अंधेरे गलियारों में..
रक्त पीपासू भीड़ में अट्ठहास करती
सपने देख रही है पुरानी निराशा में
अर्थहीन, विनम्र बातें करती
गठबंधनों को बेताब नगरवधू सी
भयानक सौंदर्य व अबोध सद्भाव में
यह उड़ती संसद...।।

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हे,,,वीर
क्या बांध रखे हैं हाथ सियासतदानों ने
क्या कमजोर करे इरादे संसद के गलियारों ने
क्या रोकती हैं राह पत्थरबाजों की भीड़
क्या रूलाती हैं अपनों की बलिदानी तुम्हें भी
आजाद कहाँ है ??भगत कहाँ है??
तुम अब गांधी ना बनो
मौन से निकल, आगे बढ़ो
वीर, तुम वीर हो
कर्तव्य पालन करो
कुछ गद्धार देश में है,कुछ सीमा पर समेट लो
हे वीर, समय आ गया इन्हें घेर लो
व्यर्थ ना जाऐगी कुर्बानियां
लहू से ही आऐगी आजाद कहानियां....
रो रहे किसान और जवान के परिजन
परेशान अब सिर्फ आम हिन्दुस्तान हैं
सियासत की परिभाषाएं अंतःवस्त्र सी
नीत सुबह बदल रही हैं देश में
गुलामी की नई जंजीरें बन रही....
हे वीर...तुम जागो..उठो..चल पड़ो
हे वीर...तुम बढ़ो...शस्त्र उठा...निशाना साधो...।।
गोविन्द


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बेबसियों के तंज
🌷🌷🌷🌷🌷
चेहरे की लकीरों में
दफ़्न है एक उम्र
और हमसफ़र की मुस्कान
प्रेरित करती है जीने को
अनगिनत गहरी खाईयों में
जमा है परत दर परत
अनुभव दुःखों के...
अनुभव सुखों के...
बेबसियों के तंज
उपेक्षित लम्हों में आता है
गर्म लावा बहता हुआ....
उसकी तेजाबी गंध चाहती है
जला देना रिश्तों की कहानी..तब
दो डरावनी छायाएं थामें हाथ
सहारा बन चुपके से निकल पड़ती है
चहलकदमी करते हुए
अतीत की गुलज़ार दुनियां में....
लाचारी,बेबसी और पराश्रित
ओह! खेत में बेतरतीब
हल-जोत के निशान है अब
कुछ भी पैदावार नहीं देते
कंकड़ पत्थर के टूकड़े ही
बिखरे-बिखरे पड़े है बीज पर
आहत है उर्वरता तन की
धुँआ-धुँआ उड़ रही है सुल्फे से
झुर्रियां कहानी बन कर ....।।
गोविन्द सिंह चौहान, भागावड़

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कितने ख़्वाब हैं जो
हमसे पहले जागते हैं और
चल पड़ते हैं दशों दिशाओं में
अपनी इच्छा पूर्ति के
पायदानों की तलाश में...
थकाहारे हर शाम दहलीज पर
आकर बीते दिन का हिसाब
देखते हैं तो अपने ख़्वाब
मुँह लटकाए हमारे पीछे
खड़े नजर आते हैं...
परचून से लेकर दवा स्टोर
मासिक किस्तें और बील
जरूरतें और फरमाईश
परिवार और परिजनों के बीच
ख़्वाब और ख़्वाहिशों का
बेचारापन बैचेन करता है...
रात सोने से पहले फिर
ख़्वाब देखते हैं दुनायावी
कोई फर्क नहीं पड़ता कि
आँखें बन्द या खुली
जिन्दगी जीने की जीद्द
जागती है पलको पर
कुछ नया करने का...।।
गोविन्द


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✍🏻 मजदूर दिवस
"""""""""""""""""""""""""
बेताल उसी डाल पर बैठा
सवाल वही दोहराता है
मजदूर दिवस तो आयात कर लाए
पर...एक दिवस का मान कब दे पाए
चौपाल सूनी हो गई गांवो की
राजा लाश लादने को मजबूर
मण्डियां लगती है आज भी
शहरों कस्बों में सवेरे
जो बिक गये उनके घर
शाम को चूल्हा जला...और
जो ना बिका वो बेचैन बेचारे
सरकारी नलके से पानी पी
घर थके कदम उठा घर चला
यह इन्सान कब कहलाऐगा??
बेताल उसी डाल पर बैठा है
सवाल वही दोहराता है
मई का मजदूर दिवस मजबूर है
जो खून पसीने की से कमाकर
क्यूँ आधा खाकर सो जाता है
ख़्वाबों के हिंडोले टूटे आँखों में
व्याकुल बच्चों के चेहरे देख
स्वेद रक्त बहाकर भी इन्सान
श्रमिक सबल कब बन जाऐगा.
यह इन्सान कब कहलाऐगा??
गोविन्द सिंह चौहान

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वसंत उपवन बचपन
और पतझड़ है उम्र बुढ़ापे की
मन की कोमल क्यारियों में
नीत नये पुष्प खिलते हैं....
पतझड़ में बागवां
झड़ते,बिखरते अपनो को
अपराध बोध सा
निहारने लगता है
महक घर छोड़कर
फ़िजां की आवारगी करती है...
वसंत और पतझड़ को
दर्दनाक हवाएं बिखेर देती है
उपवन के कोनों और
सड़क के किनारों में
पीलापन कड़कड़ाहट डराता है
जीवन डगर में......।।
गोविन्द सिंह चौहान


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मां
""""""
कभी-मेरे मन भी ख़्याल आता है
उम्र आधी बीत गई....अब भी
मां की थपकीयां याद आती है..
ममता और स्नेहिल स्पर्शों का
अहसास, चुम्बन और पुचकार
बचपन को ले जगाता है...
अधेड़ उम्र में मां की याद दिलाता है..
थपकियाँ-थपकियाँ मां की ही
सुहाती है,,,,
उम्र बढ़े और बढ़ती जाए
मुझे कोई गम नहीं,,,,, पर
मां और बचपन
साथ रहे उम्र की चरखी में
उन्मुक्त उड़ान मिल सके पतंग सी
मां की प्रेम पुरवाईयों में....।।
गोविन्द सिंह चौहान

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"स्वतंत्र विषय लेखन "08दिसम्बर 2019

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