वीणा झा








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जिंदगी लगती अधूरी,
गर कोई साथ ना हो।
हो जाती है पूरी,
साथी जो कोई साथ में हो।

मित्र गर साथ दे तो,
लगती हर मंजिल आसान।
हनुमान ने दिया साथ राम का,
कर लिया सागर में सेतु निर्माण।

हनुमान के साथ मिलकर,
हो गया हर काम आसान।
सीता को ले आये जाकर,
हनुमान के संग श्री राम।

कृष्ण सुदामा का साथ,
अजर अमर रहेगा।
वर्षों के बिछुड़े जो मिले,
उनका साथ याद रहेगा।

अकेले चना भांड नहीं फोड़ता,
अकेले कोई कुछ नहीं कर सकता।
साथ जो दे,दे कोई,
हर काम पूरा हो जाता।

जिंदगी में चलने को,
किसी का साथ जरूरी है।
अकेले जिंदगी वीरान लगती,
एक दूजे का चलना,साथ जरूरी है।।
🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी




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स्वतन्त्र विषय लेखन
💐💐💐
💐💐💐💐
राधा की विरह वेदना
🍀🍀🍀🍀🍀🍀
माने ना,माने ना,माने ना।
मोरा चंचल जियरा माने ना।

जब से श्याम ने छोड़ा ब्रज को,
उन बिन मोहे कछु भाये ना।
मोरा............

सूना आँगन,सूनी गलियाँ।
सूना है मधुबन।
सूनी आँखें राह तकत हारे,
अबहूँ श्याम आये ना।
मोरा.........

सुध,बुधखोकर,व्याकुल होकर,
दौड़ी जाऊँ यमुना तट पर।
गोप,ग्वाल सब रो,रोकर हारे,
पर अजहूँ श्याम आये ना।
मोरा.............
🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ हर जगह है सौदेबाजी।
गर्म है इसका बाजार।
बिना सौदे के कुछ नहीं मिलता।
चाहे हो कोई व्यापार।

लोगों ने तो राजनीति को भी।
बना लिया सौदे का बाजार।
जिधर दीखता है अच्छा सौदा।
उसी तरफ से करते हैं प्यार।।

वोट लेने के लिये।
करते हैं गरीबों से सौदा।
वोट लेने के बाद।
फिर शुरू करते हैं अपना धन्धा।

पैसा बटोरते रहते।
राजनीति में लोग।
फ़िक्र नहीं जनता की।
अपना उल्लू सीधा करते लोग।
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी


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रिवर्तन
याद आ गया वो बचपन का जमाना।
मिट्टी के खिलौने और कागज की नाव।
खेलते रहते थे दिन और रात।

कपड़े की गुड़िया बनाती थी दादी।
उसकी रचाते थे बड़े शौक से शादी।

कहाँ गये वे खेल,खिलौने।
मोबाइल,टेबलेट से आज खेलते हैं बच्चे।

फिर भी बच्चे होते नहीं खुश।
कैसा आ गया यह युग।

उँगलियाँ नाचती रहती मोबाइल पर।
पड़ोसियों से नहीं नहीं बातें होती मिलकर।

फिर भी सब रहते हैं टेंशन में।
ना जाने क्या चाहिये जीवन में।

क्या बच्चे,क्या बूढ़े, क्या जवान।
सबका बस एक हीं काम।

मोबाइल चलाना,वीडियो गेम खेलना।
यही हैसाराखेल,खिलौना।
पता नहीं कहाँ जा रहे हैं हम।
मशीनी युग में मशीन हो रहे हैं हम।।
वीणा झा
स्वरचित
वीणा झा

बोकारो स्टील सिटी

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मन तो बड़ा है चंचल।
इधर,उधर को भागे।
बाँध ना पाये इसको कोई।
लगाओ चाहे कितने ताले।

कभी चाँद पर जाये।
कभी समन्दर में गोते लगाये।
कभी चिड़ियों सा पँख फैलाकर।
गगन में उड़ता जाये।
स्वरचित
वीणा झा

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अनुशासन
अनुशासन से बनते हैं लोग महान।
होता है देश का कल्याण।
जब कोई अनुशासन तोड़ता।
घटता उसका मान।
सबकुछ जाये विनाश की ओर।
छूटे गर अनुशासन की डोर।
सूरज उगे ये उसका काम।
वो सिखाता हमें अनुशासन।
काम करो सदा वक्त पर।
तोड़ो नहीं कभी अनुशासन।
स्वरचित
वीणा झा


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पनियां भरन को चली पनघट पर।
सिर पर लिये गगरिया।
कभी ठिठके,कभी झटक चले है।
पहनकर चले लाल चुनरिया।
इधर,उधर से झाँके कान्हा।
फोड़े उसकी गगरिया।
सम्भालो गोरी,भीगी तोरी चुनरिया।
कैसे भीगी घर मैं जाऊँ कान्हा।
तूने फोड़ी मोरी गगरिया।
उलहन देने जाऊँ मैं यशोदा को।
कान्हा ने फोड़ी मोरी गगरिया।
वीणा झा
स्वरचित
बोकारो स्टील सिटी


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अहंकार
जब नाश मनुज का आता है।
तब अहंकार छा जाता है।
कितनों का नाश किया इसने।
कितने घर को फूँक डाले।
जब अहंकार आ गया रावण में।
तो हनुमान ने लंका जला डाले।
चाहे कितने भी बड़े हो जाओ।
या फिर हो जाओ महान।
अहंकार कभी ना करना।
जपना केवल हरिनाम।।
वीणा झा
स्वरचित
बोकारो स्टील सिटी


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थोड़ी सी खुशियाँ,थोड़े से गम।
यही है नाम जिंदगी का।
लोगों पे करो ऐतबार।
यही है सार जिंदगी का।
तुम करोगे गर ऐतबार।
तो उन्हें भी होगा तुमपर भरोसा।
चार दिन की है जिंदगी।
कल का क्या भरोसा जिंदगी का।
कोई धोखा देगा बस एक बार।
पर मेरा उठ जायेगा उसपे भरोसा।
इसलिये भरोसा मत तोड़ो किसीका।
ऐतबार पर हीं टिकी है दुनियाँ।
वरना कौन यहाँ किसीका।
कारण यही है लोगों से जुड़े रहने का।
वरना दुनियाँ में क्या मतलब है रिश्तों का।
वीणा झा
स्वरचित
बोकारो स्टील सिटी

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गरीबी
हाय,गरीबी ने ये कैसा दिन दिखाया।
कल रात गरीब बच्चों को,
खाना भी नहीं मिल पाया।

वो रोते रहे।
रोते, रोते हीं सो गये।
हाय,किसीको रहम ना आया।

ईश्वर ने।
उन्हें धरती पर भेजा क्यूँ।
नसीब अच्छा क्यूँ नहीं लिख पाया।

अरे,लोगों।
जागो भी,अब अपनी आँखें खोलो।
कुछ इन्हें भी खाने को दे दो।

ताकि मिले।
इन्हें अपने हिस्से की खुशियाँ भी।
थोड़ा सा सुख मिले इन्हें बचपन का भी।

ये बच्चे।
गरीब के भले हीं हैं।
पर इन्हें भी जीने का हक़ है।

ये भी।
हँसें, मुस्कुरायें, थोड़ी झुशियां मनायें।
अपने हिस्से का बचपन बितायें।
अपने जीवन में ये भी मुस्कुरायें।।
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी

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अमर
नाम अमर है उनका जग में।
जिसने रक्षा की सीमा की।
दिन रात रहे तैनात वहाँ।
मुँह से कभी उफ्फ तक ना की।
कितने हीं वीर शहीद हुये।
माँ की टूटी उनकी आस।
कितनी सुहागिनें हुई विद्यवा।
मेंहदी भी ना छूटी थी जिनके हाथ।
वही वीर हैं अमर सदा।
अमर रहेगी उनकी कुर्बानी।
गर्व है करता देश उनपर।
याद रहेगी सदा उनकी कुर्बानी।।
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी

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इस जीवन के रास्ते, टेढ़े,मेढ़े हैं।
चलना सम्भलकर तुम,दूर मंजिल है।
राह में लगेंगी ठोकड़ें भी बहुत।
गिरकर फिर सम्भलना होगा।
मंजिल तक पहुंचने के लिए।
बहुत कठिन श्रम करना होगा।
कितने तो गिर जाते हैं।
कितने हीं फिर पहुंच जाते हैं।
घबड़ाना नहीं कभी भी तुम।
चलते रहना फिर मंजिल दूर नहीं।
असफल हुए वे,जो चलने से डर गये।
सफल होंगे वे,जो चलते हीं रहे।
स्वरचित
बोकारो स्टील सिटी

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प्रेम की सौगात
प्रेम है जीवन दायिनी।
प्रेम है संजीवनी।
प्रेम पाकर इन्सां निखर जाये।
प्रेम पाकर किस्मत संवर जाये।
प्रेम के हीं कारण सबरी के बैर।
राम ने जूठे हीं सही,पर खाये।
प्रेम के हीं कारण मीरा ने।
जहर के प्याले को भी पिये।
पर जहर अमृत बन गया।
प्रेम जगत में जीत गया।
प्रेम तो प्रेम है।
इसकी कोई सौगात है कम।
गर देना हीं है सौगात।
खुशियाँ दो,प्रेमी को।
कभी प्रेमी को तुम दो ना गम।
ये सौगात सबसे अच्छी होगी।
यही एक प्रेम की सौगात।
सबसे सच्ची होगी।।
स्वरचित
बोकारो स्टील सिटी

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कई रंग हैं जीवन के।
सुख-दुःख जैसे जीवन में।
इसीलिये खुश होकर जियो।
प्रार्थना करते रहो मन में।
दुःख से मत घबड़ाना।
सुख भी आयेगा।
हवा के झोंकों की तरह।
दुःख तो टल जायेगा।
सुख में घमण्ड ना करना।
भजन करते रहो मन में।
कई.......
दुःख से घबड़ाकर जो भी।
ईश्वर को भूल जाते हैं।
वही अपने जीवन में कभी।
चैन नहीं पाते हैं।
भजते रहो प्राणी।
हरदम तुम ईश्वर को।
मन हीं मन में।
कई..........
स्वरचित
बोकारो स्टील सिटी

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सन्देश
ये किसका सन्देश आया।
मन मयूर मेरा नाच उठा।
धड़कन तेज हो गई मेरी।
सोया हुआ ख्वाब जाग उठा।
सजन तेरा हीं सन्देश है ये।
कि ऐसे मन मेरा व्याकुल है।
रोके से भी नहीं रुकता है।
हवा से भी तेज ये दिल पागल है।।
स्वरचित
बोकारो स्टील सिटी

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जय माँ शारदे
सबको नमन,वन्दन।
4जुलाई2018

B.s.city'
गुरुर
मुझे अपने देश पर गुरुर है।
जो भी बने हम आज हैं।
देश के भरोसे हीं आज हैं।
देश पर होते मगरूर हैं।
मुझे अपने देश पर गुरुर है।
तन,मन,धन करें न्योछावर।
धन्य हुए जन्मे जो इस धरती पर।
चिंता,फ़िक्र से हम दूर हैं।
मुझे अपने देश पर गुरुर है।
नाज करते हैं कि हम भारतीय हैं।
सब देशों से हम सभ्य हैं।
अपने देश का अलग नूर है।
मुझे अपने देश पर गुरुर है।
स्वरचित
वीणा झा

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जैसा मन का भाव होता है।
वैसा हीं कर्म करते हैं लोग।

इसीलिए तो दुष्ट प्रकृति लोग।
बनते हैं चोर।
और सहृदय लोग।
बनते हैं साधु।
या फिर सच्चे लोग कभी भी।
गलत काम नहीं करते।
वे सदा सबका भला हीं सोचते हैं।
पर झूठे लोग हमेशा।
झूठ बोलकर सबको ठगते हीं रहते हैं।
मन के भाव सही होंगे।
तो आगे हीं बढ़ते जाओगे।
गर गलत हो गया भाव।
तो पीछे पछताओगे।।
25जून2018
बोकारो स्टील सिटी
स्वरचित

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भारत देश
मेरा भारत देश महान।

तिरंगा इसकी शान।
सोने की चिड़ियाँ कहलाती है।
सबको शरण ये दे देती है।
गाय को भी यहाँ माता कहते।
रखे सबका ध्यान।
मेरा भारत देश महान।
तिरंगा इसकी शान।
गंगा,यमुना की धारा बहती।
सरयू,सतलज भी है बहती।
कितनी नदियाँ और पर्वत।
सब है इसकी शान।
मेरा भारत देश महान।
तिरंगा इसकी शान।
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी


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तिरंगा है हमारे देश की।
आन,बान, शान।
हमारे देश की है पहचान।
इसी तिरंगे की खातिर।
कितने वीरों ने बलिदान दिये।
कितने झूले फाँसी केफंदेसे
कितने जंजीरों में जीवन भर बंधे रहे।
फिर भी किया ना उफ्फ तक कभी।
नारे भारत माता के लगाके झूल गये।
देश सलामी देगा उनको।
जो अंत समय तक युद्ध किये।
इसी तिरंगे में लिपटाकर।
वीर सपूतों के शव को ले जाते हैं।
अंत समय भी यही झंडा देता है साथ उनका।
फिर ये बलिदानी वीर।
अमर हो जाते हैं।
मेरा झंडा है महान।
ये है शाने हिंदुस्तान।
इसको कभी भी हम।
नहीं झुकने देंगे।
कभी कोई दाग भी नहीं।
हम लगने देंगे।
क्योंकि ये है हमारे 
देश की पहचान।
ये तिरंगा है महान।।
तिरंगा है हमारे देश की आन,बान, शान
हमारे देश की है पहचान।।
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी"


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15अगस्त,आजादी,स्वतंत्रता दिवस
आजादी है सबको प्यारी।
सदा आजादी रहे हमारी।
मातृभूमि को स्वतंत्र रखने के लिये।
ऐ माँ तुझपर कुर्बान हो जायेंगे।
हम अपनी जां भी दे देंगे।

दुश्मन को नहीं घुसने देंगे सीमा में।
चाहे अपनी शीश कटे।
इस धरती पर जन्म लिया।
यहीं कुर्बान हो जायेंगे।
चाहे हम मिटें।

अपनी स्वतंत्रता आन हमारी।
बान हमारी,शान हमारी।
देश को परतंत्र नहीं होने देंगे।
जाये भले हीं जान हमारी।
ये है मातृभूमि हमारी।।
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ साथी तेरा साथ ना छूटे।
कैसे भी हों हालात।
चाहे जितनी आँधी आये।
या फिर हो बरसात।

अंधेरे में भी हरदम तुम।
पकड़े रहना मेरा हाथ।
बिजली कड़के तब भी ना डरूँ।
जो रहे तुम्हारा साथ।

ये जिंदगी के लम्हें होंगे।
बहुत हीं खुबसूरत।
जब दोनों होंगे हमेशा।
एक दूसरे के साथ।

चाहे कितने भी हों झमेले।
चाहे जितने बिगड़े हालात।
पर तुम ना मुँह मोड़ना कभी।
मैं निभाऊंगी सदा तेरा साथ।
स्वरचित
बोकारो स्टील सिटी

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गीत
सुर,लय,ताल जब मिलते हैं।
तब सरस,मधुर गीत बनते हैं।

गीत सुनकर चहके पंक्षी।
फूलों पे भी बहार आता है।

झूम,झमकर नाचे मयूरा।
जब राग मल्हार कोई गता है।

जब छेड़े कोई गीत,संगीत।
तो मन की उदास गाँठें खुल जाती है।

जब कोई छेड़े सरगम।
मन सबका नाच उठता है।

गीतों में है अपार शक्ति।
मन की सब पीड़ा हर लेता है।।
स्वरचित
बोकारो स्टील सिटी
वीणा झा


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धन्य है वो सृजनकर्ता।
जिसने मानव का सृजन किया।

पर मानव ने बदले में।
उसे क्या तोहफा दिया।

चरों तरफ आतंक मचा है।
सभी बेसब्र हो रहे।

मानवता छोड़ इन्सां।
दानव सभी बन गये।

कहीं गरीबी,कहीं हत्या।
कहीं बलात्कार हो रहा।

समझ में नहीं आता।
मानव को क्या हो गया।

देखकर ये कृति इन्सां का।
सृजनकर्ता भी सोच में पड़ गये।

मैंने ये कैसा सृजन किया।
सभी लालची हो रहे।।
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी

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पत्थर मे भी फूल खिला करते हैं कभी,कभी।
ग़ैरों में भी अपने मिला करते हैं कभी,कभी।
गम ना कर, अँधेरा छँट हीं जायेगा।
हौसला गर है बुंलद, तो किस्मत भी पलटती है कभी,कभी।।
हौसला हो दिल में तो डूबते, डूबते बच हीं जाते हैं लोग।
भटकने वाले सही रास्ते पे आ हीं जाते हैं।
हौसला हो बुलन्द,तो जंग जीत लोगे जिंदगी की।
पर हौसला बनाये रखना दिल में।
इंसान घबराना नहीं कभी।।
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी


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नारी
नारी तुम विश्वास हो।
तुम बहुत हीं खास हो।
तुम्हीं से जीवन पनपता है।
तुम सबके जीवन की आस हो।

नारी तुम अपनी हुनर को पहचानो।
उठो काम पे लग जाओ और सबको जगाओ।
तुम्हीं हो दुर्गा,तुम्हीं हो काली।
तुम्हीं करती सबकी रखवाली।

नारी तुम बच्चों की आस हो।
उनके लिये तुम खास हो।
तुममें कितना धैर्य भरा है।
सबको समेटे घर में पास हो।।
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी

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आया कृष्ण जन्माष्टमी।
धूम मची चहुँ ओर।

गोपियों की मटकी फोड़ने।
आये नंदकिशोर।

चोरी करते माखन,दधि।
ग्वाल,बाल संग में लेके।

घर,घर में सब कहते हैं।
कब आओगे माखनचोर।

भादो की अंधियारी रात थी।
कारगर में था पहरा।

वासुदेव,देवकी कैद वहाँ थे।
आधी रात समय सुनहरा।

जन्मे उसी वक्त थे कृष्ण।
माँ,बापू हर्षाये।

कारागार का ताला खुद टुटा।
वसुदेव कृष्ण को यशोदा घर पहुंचाये।

नन्द,यशोदा के घर देखो।
कृष्ण,कन्हैया आये।

गोकुल की गलियों में सब हर्षाये।
मिलकर सब जश्न मनाये।
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी


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4सितम्बर2018
देख ये तेरा अनुपम छवि।
मन में जगा उद्गार।
हृदय प्रफुल्लित हो गया।
देख ये रूप श्रृंगार।

मेरे दिल में बैठे हो कब से।
जाने कब सामने आओगे।
मेरा दिल सुरभित हो जायेगा।
जब तुम सामने आओगे।।

दर्शन की ये प्यासी अँखियाँ।
दे दो दर्शन घनश्याम
कब से मोहे लगन लगी है।
मन सुरभित कर दो श्याम।।
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी

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परम्परा
ये है मेरा देश भारत।

इसकी अद्भुत है परम्परा।
पत्थर में यहाँ भगवान का वास।
उनको हम पूजते।
माता,पिता का आदर करते।
गुरुजनों की आज्ञा मानते।
हम संयक्त परिवार में।
दस,दस लोग एक साथ।
हैं रहते।
कभी लड़ते,झगड़ते।
फिर रूठते,मनाते।
पर अगर विपत्ति आ जाये।
तो पूरे गाँव एक साथ जुटते।
यही है हमारी परम्परा।
हमारे भारत की परम्परा।।
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी
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"गुमनाम"12नवम्बर 2019

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