सुषमा ब्योहार





जी मैं सर्वप्रथम मध्यप्रदेश निवास नरसिंहपुर माँ नर्मदा क्षेत्र से हूं।
 मैं ग्रेजुएट हूँ ।
बचपन से ही मेरी रुचि लेखन में रही है तथा मेरी काव्य प्रस्तुति दो बार आकाशवाणी जबलपुर प्रसारण हो चुकी है । दूरदर्शन भोपाल से मुझे पुरस्कृत किया चा चुका है|
 नवभारत में मुझे अनेकों प्रतियोगिता में प्रथम तथा द्वितीय पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं ।
दैनिक भास्कर में काव्यांजलि प्रतियोगिता में मैंने कई बार प्रथम स्थान प्राप्त किया है ।। 
स्थानीय पत्रिकाओं में मेरी रचनाओं को स्थान दिया गया है। 
सबसे बड़ा सौभाग्य मेरा कि गीता प्रेस गोरखपुर से कल्याण पत्रिका में मेरी लेखनी को अवसर मिला ।जो कि मेरे लिए गौरव की बात है ।

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नमन मंच भावों के मोती
4 /11 /2019
बिषय ,चमक, तेज,, आभा,, कांति

चँदा चमके सूरज चमके चमक रहा है तारा
सीमा पर प्रहरी की आभा ज्यों
नभमंडल का सितारा
कलकल नदियां बहती जाती
.चमक रही जलधारा
पर्वतों की श्रंखलाओं पर भास्कर की किरणों ने डेरा डाला
सागर की लहरेंजैसे बिखरे मोती
अरुणोदय की लालिमा अपना मुंह धोती
प्रकृति की आभा ने खेतों की शोभा बढ़ाई
.अंबर ने धरती को जैसे हरित चूनर ओढ़ाई
अनुपम कांति मेरे देश की अदभुत देश है मेरा
चाँदी की होती हैं रातें सोने का है सबेरा
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार


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2 /11/2019
बिषय,, नजर

तेरी भक्ति का सुरुर है ए
कुछ तो मतलब जरूर है ए
अभी तक तुमको समझ न पाई
मेरी नजर का कुसूर है ए
तेरे मिलने के ख्वाब सजाए
दिल में दीप जलाए
दिल की बनी हुई दिल्लगी ए
शंका का मन में फितूर है ए
नजर पे पर्दा पड़ा हुआ था
जमाना सामने खड़ा हुआ था
सारे झमेलों में पड़कर देखा
माया का ही तो दस्तूर है ए
नहीं है कोई मेरा अपना
टूट चुका है अधूरा सपना
रिश्ते नाते अब नहीं भाते
मेरे लिए तो नासूर है ए
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार


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1 /11/2019
बिषय ,प्रार्थना,

विश्व विजयी देश हो मेरा
सर्वत्र शांति का हो डेरा
नित नव किरणों से हो सबेरा
शांति सद्भावना का हो बसेरा
परस्पर हो भाईचारा
फहरता रहे तिरंगा प्यारा
राग द्वेष से दूर सभी हों
आनंद से भरपूर सभी हों
पड़े न अमावस की काली छाया
रहे निरोगी सबकी काया
रोज रहे पूनम की रात
दुख सुख में हो इक दूजे का साथ
पूर्ण हो सभी की मनोकामना
प्रभु जी तुमसे यही प्रार्थना
मेरे मन की यही अभिलाषा
कोई भूखा नंगा न हो प्यासा
भाई,भाई में बहे प्रेम रस धारा
सारी दुनिया में श्रेष्ठ हो देश हमारा
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार


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31 / 10/2019/
बिषय,एकता

एकता में बल है एकता में संबल
विस्तृत विशाल है एकता का आंचल
एकता में झुकता सारा जहान है
एकता में झुकता धरती आसमान है
एकता से बनता समृद्ध परिवार
एकता से शुद्ध होते आचार विचार
एकता से चलता सारा समाज
अनेकता में एकता का आगाज
एकता में होता देश का विकास
ज्यों मलय में रहती सुवास
जहाँ एकता नहीं वह नहीं परिवार
दूषित रहते हैं सदा आचार विचार
एकता बगैर चलता नहीं देश
कुसंस्कारित रहते घर समाज के परिवेश
सुसंगठित रहकर स्वंय व देश को बनाऐं
सारी दुनिया में एकता का मूल मंत्र फैलाऐं
स्वरचित,, सुषमा, ब्यौहार



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30/10/2019/
बिषय,, अर्थ,,

जीवन का अर्थ जान लें
वक्त को पहचान लें
कटुता को लगाम दें
मानवता का पैगाम दें
बृद्धों को आराम दें
चंचलता को विश्राम दें
जरूरत से ज्यादा चले न अकल
जिंदगी हो जाएगी सफल
जीना तो बस उसी का जिसने जीने का अर्थ जाना
परोपकार परमोधर्मः जिसने माना
पर हित सरिस धर्म न दूजा
यही आराधना यही है पूजा
सत्कर्मों से परमेश्वर का संबंध
सद्व्यवहार से मन में आनंद
स्वरचित ,,सुषमा ब्यौहार

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29/10/2019
बिषय,, भाई दूज ,यम द्वितीया

भाई दूज का पावन त्यौहार
बढ़ाता रहे परस्पर प्यार
बहिनें टीका लगाऐं हर साल
भाई रखें बहिन का ख्याल
बहिनें देतीं यही दुआएं
दूर रहें सारी बलाऐं
भरे रहें सबके भंडार
रोग द्वेष न झांके द्वार
नेह प्रेम ज्यों गागर में सागर
बारहमास रहे ए अवसर
यम द्वितीया का पर्व ए प्यारा
रहे स्नेह ज्यों यमुना का धारा
टीका लगाकर मांगती भाई से सौगात
भैया मेरे सदा ही करना स्नेह प्रेम की बरसात
स्वरचित ,,सुषमा ब्यौहार


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28 /10 /2019
बिषय,, गोवर्धन, गिरिराज,, पर्वत

जय हो गोर्वधन महाराज तेरे माथे तिलक बिराजे
है कृष्ण कन्हैया प्यारो
नख पर गिरवर धारो
तुम कहलाए गिरिराज।।
तुम पर्वतों के राजा
तुम्हें ध्यावै सकल समाजा
तुम्हें पूज रहे नंदराय।।
मैं छप्पन व्यंजन बनाउं
तुम्हें रुच रुच भोग लगाउं
तुम खा जइयो महाराज।।
जो परिक्रमा पे आवै
वाके सकल पाप कट जावै
वाके भर जावे भंडार ।।
तुम्हें फूल चढ़े तोहे पान चढ़े
तोहे चढ़े दूध की धार
मैं शरण तुम्हारी आई
श्रद्धा सुमन हूँ लाई
मेरा कर देना उद्धार।।
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार

.
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27 /10 /2019
बिषय,, दीप ,दीपक,, दीपावली

मन के दीप प्रज्वलित कर हम सब मनाऐं दीपावली
रंग बिरंगे भावों के संग में खूब सजाऐं रंगोली
आज सभी के आंगन में मां लक्ष्मी जी पधारेंगी
दुख दारिद्र्य दूर कर जीवन सबका संवारेंगी
रंगोली से सजे आंगन दीपक सजेंगे देहरी द्वार
धूमधड़ाका सर्वत्र रहे फुलझड़ी की हो बौछार
न शिकवा शिकायत चहुंमुखी हो प्यार ही प्यार
चलो आज सब मिल मनाऐं दीपावली का पावन त्यौहार
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार

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26/10 /2019
बिषय ,,रुप,,सौंदर्य

मन के भावों में माधुर्य हो तो रुप खिल जाता है
मन ही दर्पण बन शाश्वत सत्य सामने लाता है
सौंदर्य क्या जिसके हृदय हो गुणों की खान
जिसको पूजता सारा जग वही श्री हनुमान
गजबदन श्री गणेश प्रथम पूजे जाते हैं
काली माँ के द्वारे से लोग न खाली जाते हैं
रुप सौंदर्य तो प्रकृति की देन है
परंतु अच्छी है तो शुकून चैन ही चैन है
लेकिन लोग तो सौंदर्य ,रुप के उपासक हैं
सौंदर्य जाल में फंसे हुए विस्वामित्र जैसे अधिनायक हैं
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार
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25/10 /2019
बिषय , धन धनवंतरी यम .कुबेर

शुभकामनाएं
धनत पर धन से हों भरपूर
धनवंतरी विराजें द्वार आपके
रोग हो कोसों दूर
नरक चतुर्दशी को हँसते हँसते रहना
दीपावली के दिन खूब सजना और संवरना
अन्नकूट को गोवर्धन को दूध दही चढ़ाना
छप्पन व्यंंजन बना बनाकर भोग लगाना
यम द्वितीया को भाई को सौहार्द प्रेम का टीका लगाना
पंचदिवसीय पर्व धूमधाम से मनाना
निरोग हो काया न दिखे नर्क का द्वार
माँ लक्ष्मी जी की कृपा भरा रहे कुबेर का भंडार
खुशियों की फुलझड़ी पकवानों की महक हो
हर एक आंगन में भाई बहिन की चहक हो
दीप माल से सुसज्जित हो आंगन द्वार
यही शुकामनाऐं दूर हो जीवन का अंधकार
तमसो मां ज्योतिर्गमय सुखी रहे आपका परिवार
शुकामनाऐं हमारी समृद्धशाली हो त्यौहार
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार

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24 /10/2019
बिषय,, समीर/पवन //हवा

अबकी हवा का रुख है उस ओर
नव नव पहनावा फैशन का दौर
बहू बेटी में.नहीं कोई अंतर
बेटी बेटों से हैं बढ़चढक़र
2,,
शीतल शीतल मंद समीर बह रही है
धीरे धीरे कानों में कुछ कह रही है
अबके बरष शीत लहर जो आएगी
ठिठुर ठिठुर बहुत सताएगी
3
पवन
ओ इठला के चलने वाली पवन
जरा धीमे धीमे से बहना
सीमा पर खड़े जो प्रहरी
मेरा संदेशा जाकर के कहना
उनकी सलामत के दीपक
ईश्वर के सामने मैं जलाउंगी
सदा सुरक्षित प्रसन्न रहो मैं
अपने इष़्ट को मनाऊंगी
ईमान धर्म से फर्ज निभाना
माता पिता के हृदय में खुशी के दीप जलाना
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार

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नमन मंच भावों के मोती
23 /10 /2019
बिषय,, वरदान,,

मन के अंधेरे दूर हों हरो हरि सारे संताप
अधम से अधम हूँ भगवन किए बहुत ही मैंने पाप
मूरख हूँ कुटिल अज्ञानी
लिया न नाम कभी तुम्हारा
करती रही हूं मनमानी
अब आई हूँ शरण तुम्हारी
जानों प्रभु व्यथा हमारी
करुणानिधि कहलाते हो तुम
नैया पार लगाते हो तुम
दूर करो मन का अभिमान
ऐसा कुछ देदो वरदान
राग द्वेष से मन हट जाऐ
प्रीति चरणों में लग जाए
स्वरचित,, सुषमा ,ब्यौहार

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22 /10 /2019
बिषय ,,पंछी,, परिंदा

पंछी बन मन उड़ चला
सितारों से गोद भर आसमान में घूमता
सागर की लहरों से अठखेलियां कर चूमता
नदियों की तरंगों को सुन सुन कर झूमता
परियों के संग आँख मिचौली कर ढूँढता
नित नव उड़ान भरता. परिंदों के संग
दोनों हाथ उलीचता नए नए रंग
सैर को जाता सात समुंदर पार
अंबर के आंचल में छिपता हर बार
धरा के मोतियों को बीन बीन सहेजता
प्रकृति की गोद में बालक बन लेटता
क्षणिक सुखों को भोग वापिस आ जाता
आटा दाल में पुनः रम जाता
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार

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21 / 10 /2019/
बिषय श्रद्धा

समर्पित प्रभुजी को श्रद्धा सुमन
शीतल निर्मल करो मेरा मन
न है ईर्ष्या विद्वेष की भावना
समानता की हो मेरी भावना
जमाने से बहुत धोखे खाए हुए हैं
अंतत: द्वार तुम्हारे आए हुए हैं
एक सच्चा मेरा तुम्हारा नाता
झूठा जगत बातों में फुसलाता
तुम सच्चे सौदागर सच्चा है व्यापार
व्याज के बदले में अपना दूं सब कुछ बार
प्रभुजी मेरे ब्याज पे ब्याज मत जोड़ना
सहारा देकर कभी हाथ मेरा मत छोड़ना
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार

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नमन मंच भावों के मोती
20 10 2019
बिषय,, स्वतंत्र लेखन

बढ़ती ही जाती आपस की दूरियां
संकुचित बिचारधारा या कहें मजबूरियां
पराए हुए माँ बाप
रह गए बीबी बच्चे आप
छोटी होती जाती परिवार की परिभाषा
क्या करें अपनों से आशा
पाल पोस बड़ा किया वही धोखा देते
स्वार्थ की खातिर पालकों से किनारा कर लेते
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार

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17 /10 /2019
बिषय ,,नारी, श्रृंगार,

कर सोलह श्रृंगार चली पिया मिलन को
करेगी बहुत मनुहार चली पिया मिलन को
माथे बिंदिया केश हैं काले
जैसे बदरवा छाए मतवाले
नयन कजरवा धार चली पिया मिलन को
नाक नथनियां होठों पे लाली
कमर में करधन कानों में बाली
गले में नौलख हार चली पिया मिलन को
हाथों की चूड़ी खनखन खनकें
पांव पायलिया छनछन छनके
ओढ़े चुनरी गोटेदार चली पिया मिलन को
नयन झुकाए लाज की मारी
सोच रही है पिय की प्यारी
करते होंगे वो इंतजार चली है पिया मिलन को
पास सजन के जब जाऊंगी
चूड़ी कंगना पायल छनकाउंगी
इकटक देखें नारी श्रंगार
चली है पिया मिलन को
स्वरचित,, सुषमा, ब्यौहार
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नमन मंच भावों के मोती
16 /10 /2019
बिषय, समाधान,, हल,
जहाँ समस्या है वहाँ समाधान भी है
कठनाइयों के पश्चात आराम भी है
बिषम परिस्थितियों का हल भी है
आज अंधकार तो नव किरणों का कल भी है
सुरसा सम मुख खोले परेशानियां खड़ी रहतीं हैं अक्सर
लेकिन बहुत कुछ सिखाता है हमको भास्कर
फैलाता है नित भोर की किरण प्रकाश
चमक उठते हैं धरती आकाश
चाहे कितना भी क्यों न करें बदली छाया
आसमान छटते ही पुन:निकल आया
इसी प्रकार मानव जीवन का आदान प्रदान
आज समस्या तो कल समाधान
स्वरचित,, सुषमा, ब्यौहार
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15 /10 /2019
बिषय, अनंत,

.मानव जीवन की अनंत कहानी
कभी गम की रात कभी सुबह सुहानी
कामनाओं वासनाओं का नहीं अंत
पूर्ण न होंगी जीवन पर्यंत
आधुनिक संसाधनों के ह़ गए गुलाम
संचय में व्यस्त तनिक भी न आराम
भौतिक सुखों के लिए बैचैन है आदमी
जाने क्यों इतना परेशान है आदमी
बुलबुले सी जिंदगी के लिए बेईमान है आदमी
स्वयंभू बना हुआ नादान है आदमी
क्या साथ लाए क्या लेकर जाना है
हाथ पसारे आए हाथ लटकाए जाना है
स्वरचित,सुषमा ब्यौहार

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14 /10 /2019
बिषय ,,प्रपंच,, षडयंत्र

आज के समय में किसी को किसी का भला नहीं सुहाता
टांग खींचने में बड़ा मजा आता
हित करते में कतराते हैं लोग
अहित करने सामने आ जाते हैं लोग
जहाँ तहाँ षडयंत्र बदले की भावना
आगे न बढ़ पाए की प्रबल कामना
मुफ्त के वकील हजारों मिलेंगे
ज्ञान बांटने को हुजूम में दिखेंगे
काम पड़ने पर नजरें चुराएंगे
मुफ्त का माल लूट लूट खाएंगे
पीठ पीछे आपका मखौल उड़ाएंगे
सामने आपके हितैषी बन जाएंगे
आज के लोगों को समझ न पाया है
यहाँ कौन अपना कौन पराया है
जिसने इन्हें पहचाना वो जग जीत गया
वरना दमुँही दुनिया में खाली घड़ा सा रीत गया
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार

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नमन मंच भावों के मोती
12 /10 /2019/
बिषय,, सिलसिला,,
काली निशा के आगोश में
शुरू हो गया बिचार मंथन का सिलसिला
नेकियां करने के बाद दिया लोगों ने बुराई का सिला
अच्छाइयां भुलाना. जमाने के उसूल हैं
पीठ पर वार करने में मशगूल हैं
किसी पर. विश्वास करना हमारी नादानी थी
उन्होंने हमें क्या दिया ए उनकी मेहरबानी थी
कांटे जिसके पास हैं वो फूल कहाँ से लाएंगे
आपके पैरों तले वह शूल ही बिछाएंगे
लेकिन हम भी कांटों पर चल कर दिखाएंगे
जख्म तो होंगे पर भर भी जाएंगे
निशान उनकी पल पल याद दिलाएंगे
मंजिल नहीं छोड़ेंगे चलत ही जाएंगे
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार
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11 /10 2019
बिषय,, सरस,

जहाँ साथ अपनों का हो
सरस हो जाता जीवन
सुखद जहाँ परिवेश हो प्रफुल्लित रहता है मन
सदभावना स्नेह की बहती हो अविरल धार
शुद्ध शाश्वत हों जहाँ आचार विचार
लगता है यूं ज्यों ऋतु बसंत हो मन भावन
दुख सुख दोनों का मिलकर हो आगम निगम
सौहार्द समानता का हो जहाँ पर संगम
ऐसे ही जैसे वरषा में लगता सावन
सरस सहजता से ही.बनते हैं. मधुर संबंध
उनकी जिंदगी में बस रहता है आनंद ही आनंद
जैसे ऋतुओं में बसंत ऋतु है मनभावन
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार
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10 /10 /2019
बिषय ,शीशा ,/काँच

दिल तोड़ देते हैं लोग काँच की तरह
आवाज नहीं हुई गिर पड़े डाल से पात की तरह
हम अपना उन्हें जान वक्त गंवाते रहे
वो हमें हँस हँस बेवकूफ बनाते रहे
भरोसे का उठाते हैं लोग नाजायज फायदा
यही रह गया है जमाने का उसूल कायदा
आज उनका नाम दिल से निकल गया
बह.गया मन का गुबार शीशा सा पिघल गया
वक्त आने पर साथ छोड़ देते हैं लोग
स्वार्थ सिद्ध करने भगवान को भी न छोड़ते हैं लोग
जिनके लिए बनाए हमनें हजारों सपने
वो और कोई नहीं थे वो अपने
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार

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हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 09/10/2019
9 /10/2019
बिषय अभियान

वर्तमान में चल रहा अभियान
अति श्रेष्ठतम अति महान
स्वच्छ रहें तो रहें निरोग
स्वस्थ रहने करिए योग
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ
पुरुषों के कदम से कदम मिलाओ
आरक्षण को जड़ से हटाओ
देश को समृद्ध बनाओ
अधिक से अधिक पेड़ लगाओ
हरित क्रांति को अपनाओ
रहे न कोई भूखा नंगा
समानता की बहे गंगा
वर्तमान में संवारें भविष्य सजेगा
तभी तो देश आगे बढ़ेगा
स्वरचित,, सुषमा, ब्यौहार
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नमन मंच भावों के मोती
8 //9//2019//
बिषय ,,स्वतंत्र लेखन

तुम रश्मियों के उजाले प्रिये
मुझे थोड़ी सी रोशनी दे दो
मुझे जमाने ने दिए
दिल पर नासूर जाने कितने
तनिक सी मरहम लग जाए
तुम प्रणय रागिनी दे दो
तुम तो नित ही सितारों के
समुंदर में डुबकी लगाते हो
मैं अंधेरे में बैठी जरा सी
चांदनी दे दो
मिली है बस उम्र तुमको
मैं तो पल पल मरती
शेष तुम्हें ही लग जाए
मुझे तुम यामिनी दे दो
बैठी हूँ यही सोच अधूरे
गीत करुं पूरे
तुम चाहो तो अधरों की संजीवनी दे दो
हजारों कोस रहे दूर
सर्वदा गम तुमसे
खुशियां तुम्हें मुबारक हो
वेदना मुझे सौगुनी दे दो
स्वरिचत,, सुषमा ब्यौहार

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7 /10 /2019
बिषय ,,शांति

शांति की तलाश में भटकते कहाँ कहाँ
बेचैनियां लिए फिरते यहाँ वहाँ
संतुष्ट जो हो.जाए कोई जरुरतमंद
प्रफुल्लित रहता आनंद हीआनंद
समदृष्टि स्नेह प्रेम का स्त्रोत है
वह तो शांति से ओतप्रोत है
पारिवारिक सामाजिक हो सद्भभावना
जहाँ सर्वत्र हो मंगल की कामना
परस्पर सौहार्दपूर्ण हो संबंध
शर्तें जहाँ न हो अनुबंध
अच्छा न कर सको तो बुरा न करें हम
उजाला न दे सकें तो क्यों फैलाऐं तम
क्यों करें किसी से व्यर्थ के विबाद
विवेक पूर्ण हो हमारे संवाद
अरुचिकर न हो हास परिहास
वहाँ लक्ष्मी,शांति सद्वुद्धि का रहता निवास
स्वरचित,, सुषमा,, ब्यौहार

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6 /10 /2019
बिषय,, स्वतंत्र लेखन

माँ तेरे दर पर दीवाने आ गए
रुठी माल को हम मनाने आ गए
तू ही शारदा तू ही है काली माँ
अम्बे भवानी तू ही शेरों बाली माँ
दुख अपने तुमको सुनाने आ गए
तू ही माँ ममता बरसाने बाली है
तेरे दर पे आए बनकर सवाली है
दर पे झोलियां फैलाने आ गए
बड़ा ही अनुपम है तेरा द्वारा माँ
सबका ही भरती है तू भंडारा माँ
भाग्य अपना आजमाने आ गए
मेरी भी अरजी तुम सुन लेना
दुखियारी हूं कष्ट मेरे हर लेना माँ
सोई किश्मत को जगाने आ गए
द्वारे हम तेरे दीवाने आ गए

स्वरचित ,सुषमा ब्यौहार
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4 /10/2019
बिषय ,स्पर्श

अति वृष्टि से गांवों में हाहाकार मचा
फसलें चौपट हो रहीं न कोई त्यौहार बचा
कभी फसलों को को देखे
कभी तकता है आसमान
इस बरबादी को देख रोता है किसान
गर्मी सर्दी में में मेहनत करता दिन रात
यही सोच कर प्रभु देंगें सौगात
पर प्रकृति को उसकी खुशियां रास नहीं आईं
नयनों को कर स्पर्श उल्टे पांव लौट गईं
इसके सिवाय और नहीं कोई चारा
अति वृष्टि अनावृष्टि की मार से जूझता बेचारा
समझौता ही इसकी नियति है
भगवान पर ही निर्भर अवनति उन्नति है
मौसमी मार को सदा ही सहता है
अब नहीं तो फिर सही कहता है
शहर में त्यौहार ,गाँव में मौसम की मार
किसान खुश तो देश खुशहाल
आशावादी होने से थोड़े में ही हो जाता निहाल
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार

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बिषय,, नि:शब्द

इस तरह खामोशी उनकी सह नहीं पाए
नि:शब्द ही रहे कुछ कह नहीं पाए
हाल दिल अपना सुनाऐंगे वो
अतीत में डुबकी लगाऐंगे वो
कुछ समय मेरे संग बिताऐंगे वो
पर एक पल भी ठहर न पाए वो
मैंने भी परिस्थितियों से समझौता कर लिया
उन पलों को सहेज आँचल में भर लिया
खुश हूं जो कुछ भी उन्होंने मुझे दिया
कतरा कतरा जीवन मैंने जी लिया
डूबते गए हम बह नहीं पाए
संजीदगियों उनकी बहुत कुछ पा लिया
नजरों के इशारों को दिल
में सजा लिया
यादों का दीपक दिल में जला लिया
नजदीक उनके हम भी रह नहीं पाए
स्वरचित,, सुषमा,, ब्यौहार

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नमन मंच भावों के मोती
2/ 10/2019
बिषय ,,शत्रु,,

आज का दिन है बड़ा महान
दो फूलों के खिलने से महक उठा था हिंदुस्तान
भारत माँ के अधिनायक सच्चे सपूत थे
शत्रु,, भी जिनसे मात खाए ऐसे देवदूत थे
सत्य अहिंसा हिंद स्वराज की परिकल्पना
कर्तव्यनिष्ठ सौहार्दपूर्ण आजादी की आराधना
अंतर्निहित आध्यात्मिक चिंतन की रही भावना
स्वदेशी में जीना मरने की उपासना
ऐसे ही हमारे श्री बहादुर लाल थे
सादा जीवन उच्च बिचार आदर्शों के प्रतिपाल थे
भारत माँ के लाल तुम्हें करुँ बहुबार नमन
वंदन है वंदन तुमको मेरा बहु वंदन
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार

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1/ 10/2019
बिषय ,,प्रतिभा,,

चहुंओर अड़चन ही अड़चन
चाहे बहुत घना हो कानन
मुशीबतों से कर मुकाबला
चाहे मंजिल का अधिक फासला
मन में कर दृढ़ विश्वास
संकल्पों की पूर्ण आस
यात्रा अरवरत जारी हो
मंजिल पाने की तैयारी हो
जो न होते कभी हताश
निरंतर करते रहते प्रयास
. उम्मीदों का हो विश्वास
पत्थरों को भी देते तराश
जिसमें प्रतिभा का भंडार हो
धैर्य क्षमता अपार हो
दुनिया की दीवारें उसका
क्या कर सकती हैं
पुष्प पल्लवित हो स्वयं महकती हैं
उसका जीवन निर्बाध आगे बढ़ता है
कोहनूर कितना ही छिपा हो
दूर से ही चमकता है
स्वरचित,, सुषमा,, ब्यौहार

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30//9//2019//
बिषय,, माँ

शारदेय नवरात्रि का महापर्व
माँ भगवती की आराधना
शक्ति स्वरुपा जगदम्बा
श्री चरणों में समर्पित मन भावना
माँ जगतारणि आदिशक्ति भवानी
अखलेश्वरी तुम मैं अज्ञानी
तुम्हीं ने रचा विस्तृत अपरिमित संसार
संपूर्ण ब्रह्मांड के रज रज में तेरी कला का संचार
तेरे ही कर कमलों में समस्त सृष्टि का प्रभार
माँ कल्याणी सारे जग की एक तुम्हीं हो पालनहार
पराशक्ति तुम ही पल में
दुष्टों का करतीं संहार
धनहीन बलहीन मनहीन मेरी अवस्था
ज्ञान चक्षुओं को जाग्रत कर मेरी भी कर दो ब्यबस्था
साधक की दृढ़ इच्छाशक्ति का दो माँ अभीष्ट वरदान
अर्थ धर्म काम का दो माँ मुझे ज्ञान
तुम ही मंगला काली भद्रकाली कपालनि
सिद्धि स्वरुपा आनंदरुपा लक्ष्मी शिवा पारायणि
मुझमें ऐसी क्षमता कहां जो करुं तेरी उपासना
हे जगमाता भाग्यबिधाता
अर्पित शब्दभावना
अम्बे तुम्हारी किस करुं आराधना बहुबार श्रीचरणों में मेरी वंदना
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार

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28 //9//2019
बिषय,, मंथन

सत्य असत्य का मंथन कर लें
जीवन निर्थक न जाएगा
राग द्वेष से मुक्त हो झूठ पर सत्य की विजय पाऐगा
समभाव का हो चिंतन
परहित का रहे मनन
माधुर्य का हो समावेश
प्रेम संचार का हो परिवेश
सर्वेभवन्तु सुखनः का मूल मंत्र अपनाएगा
सादा जीवन उच्च बिचार
जिसने समझा जीने का सार
परहित को बना आधार
सत्कर्म कर सारे बंधनों से मुक्ति पाएगा
फले हुए बृक्षों सा जिसने
झुकना सीखा है
भूत वर्तमान भविष्य सव उसी का है
सर्वगुणों की खान यश से अलंकृत हो जाएगा
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार
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27 //9//2019
बिषय,, विवेक,,

जहां विद्या विनय विवेक का मान
जहाँ सरस्वती का सम्मान
जहाँ न हो अभिमान
वहाँ स्वत:ही होते सारे काम
वहीं रहता लक्ष्मी का बास
वहीं रिध्दी सिद्धि करतीं निवास
जहाँ दया धर्म क्षमा का स्थान
उस हृदय में बसते भगवान
जहाँ त्याग सहनशीलता अरु प्यार
जहाँ धैर्य संयम मीठी वाणी का ब्यवहार
.वह घर नहीं स्वर्ग का है द्वार
. जहाँ सत्य सनातन का संचार
वहाँ ठहर नहीं सकते कुसंस्कार
स्वरचित,, सुषमा ब्यौहार

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26 /9 /2019/
बिषय स्वेद,, पसीना

मोतियों के कण सा पसीना
मेहनतकश के लिए नगीना
जिसकी होती खून पसीने की कमाई
मेहनत उसी की रंग लाई
जैसे परिश्रमी होते किसान
कभी खेत में कभी खलिहान
प्राकृतिक आपदाएं झेलता किसान
कठनाइयों से खेलता किसान
लहलहाती फसल से खुश होता किसान
स्वेद बूंदों से मुख धोता किसान
चिलचिलाती धूप को सहता किसान
सादा जीवन सादा परिधान
कभी बर्षा गर्मी धूप और छांव
मन को लुभाने बाला किसानों का गाँव
स्वरचित, सुषमा, ब्यौहार
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25/ 9 /2019
बिषय,, कलाकार,,

अद्वितीय अद्भभुत होते कलाकार
अपनी कला को देते हैं साकार
बिभिन्न क्षेत्रों में होते माहिर
कौशलता से हो जाते जग जाहिर
मिट्टी को देते देवी देवताओं का स्वरुप
मानो साक्षात दर्शन कल्पना अनुरूप
किसी में खेल का कोई नटनागर
किसी के कंठ में सरस्वती घोल देतीं सातों स्वर
कला अनोखी ईश्वरीय सौगात है
वरना किसी में न इतनी बिसात है
कला की दक्षता जग में जाने जाते
लोगों के दिलों में रातों रात छा जाते
कला के लिए सदा सर्वदा समर्पण
कला में ही इनका सब अर्पण
तभी तो शदी के महनायक माने जाते
दादा फाल्के पुरस्कार हैं पाते
स्वरचित,, सुषमा, ब्यौहार

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बिषय,, बनारस
जय जय बाबा विश्वनाथ
तुम्हीं हो अनाथों के नाथ
संग अन्नपूर्णा गंगा की धारा
मोक्षदायिनी तारे जग सारा
नगरी अद्भभुत बनारस नाम
शिव भोले ने बनाया अपना धाम
जहां से मिलता अंतिम विश्राम
करते बाबा पूरण काम
दही पूरी और कचौरी
जिनके बिन यात्रा अधूरी
पीलो गटागट भांग का प्याला
पान चबा हो जाए मतवाला
जो भी आता यहीं का हो जाता
भवबंधन से मुक्ति पा जाता
ऐसी है बनारस नगरी न्यारी
पार्वती संग बिराजे भोले भंडारी
स्वरिचत,, सुषमा, ब्यौहार
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23/9 2019/
बिषय,, लौह ,, लोहा

लौह पुरुष होते मेरे देश के जवान
सीमाओं पर खड़े हुए हैं सीना तान
सर्दी गर्मी की नहीं परवाह
दिल में बस भारत माँ की चाह
कठिन से कठिन राहों में हौसला बुलंद हैं
समय ही सब कुछ समय के पाबंद हैं
दुश्मन से लोहा लेने से न घबराते
हँसते हँसते देश के खातिर शहीद हो जाते
वर्तमान में नारी शक्ति का बराबर से योगदान
एक कदम आगे बढ़ करती आह्वान
घर बाहर सर्वत् पाती रही सम्मान
इनके हर रुप में रही अलग पहचान
.हर कर्तव्य वहन कर बनाई हुई शान
सहानुभूति की नहीं तमन्ना
रुकना नहीं बस आगे ही आगे बढ़ना
स्वरिचत,, सुषमा ब्यौहार

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22 / 9 /2019
बिषय ,, स्वतंत्र लेखन

सुर्ख हवाओ धीरे चलो तुम
. सितारे आंगन में उतर आओ
न वो आए न खबर आई
आज न जाने क्यों उनकी याद आई
पलकों में जाके डाला है डेरा
तन्हाइयों ने कुछ ऐसा घेरा
एक मैं संग निशा स्याह काली
नागिन सी डसती मतवाली
वक्त भी सारा ठहर गया है
नाम के उनकी देकर दुहाई
गमों से अभी तक अंजान थे
मुलाकातों की दिल में अरमान थे
गहरे सागर में गोते लगाते
कभी तैर जाते कभी डूब जाते
समझ न सके कितनी है गहराई।।
यादों को सजाने चमन आ गया है
दिल के द्वार पर कलियां बिछा गया है
खामोशियां गुनगुनाने लगीं हैं
मन की तरंगें लहराने लगीं हैं
रागनियों ने जब राग छेड़ा
पतझड़ के बाद बहार आई

स्वरिचत,, सुषमा ,ब्यौहार
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21 /9 / 2019
बिषय , हाट ,,दुकान ,, विपणी

ए जीवन दुकान की.तरह है
जिसकी जितनी चल जाए
जितना शुद्ध माल उतना ही नाम
विश्वास उत्तमता के मिलते हैं दाम
इस तरह तो हजारों आकर चले जाते हैं
कुछ को भूल जाते कुछ याद बहुत आते हैं
जैसे कि हाट में ऊँची दुकानों स्वादिष्ट पकवान
इसी तरह सज्जन पुरुष की पहचान
एक बड़े हाट की तरह है संसार
जिसकी जैसी दुकान वैसा ब्यापार
इसमें केवल गुणवत्ता की होती कमाई
जोड़ने वाले जोड़ लेते पाई पाई
ए दुनिया हमारे गुणों को तौलती है
जैसे कि जरा सी खुशबू चहुंओर फैलती है
इस बाजार की भीड़ में जाने कहाँ खो जाऐंगे
भावों के मोतियों को बिखराते जाऐंगे
रहें न रहें हम हमारी याद तो रहेगी
हमारी संजोई हुई दुकान हमारे नाम से चलेगी
स्वरिचत,, सुषमा,, ब्यौहार

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नमन मंच भावों के मोती
20 /9 /2019
बिषय,, संगत,, सत्संग,

जैसा खाऐं अन्न
वैसा होवे मन
ज्ञानी से ज्ञानी मिलें दो दो बातें होय
मूरख से मूरख मिलें दो दो लातें होय
दो घड़ी बैठ लीजिए जहाँ होत सत्संग
कबहुं तो जाय चढ़ेगो मेंहदी जैसो रंग
कांटे बिच फूले गुलाब और सुवास बिखराय
कीचड़ के बीच रहत कमल
फिर भी वह खिल जाय
एक चुटकी बिष से पानी जहर बन जाए
चार दाने शक्कर से मिठास आ जाय
वही पानी गंदगी में मिले तो नाली बन जाए
एक बूंद गंगा में मिल गंगाजल हो जाए
सत्संग में जाने से हरि हमें मिल जाऐं
मूरख की संगत जीवन अकारथ जाए
बड़े बुजुर्ग कह गए प्रवृत्ति उत्तम होय
सर्पों से चंदन घिरे फिर भी सुगंध न खोय
स्वरिचत,, सुषमा ब्यौहार
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19 /9 /2019 /
शीर्षक,, पलकें,

भीगी भीगी पलकें बहुत कुछ बता रही हैं
मेघों की तरह बरषती जा रही हैं
वैसे तो जमाने में अनेकों गम हैं
सभी के बराबर न किसी के कम हैं
पराए दिए गमों को लोग भूल जाते हैं
अपनों के नासूर बन जिंदगी भर सताते हैं
कुछ गम आंसू बन पलकों से निकल जाते हैं
जाने कितना सैलाब इस दिल में छिपा है
कुछ दफन हो गया कुछ बह निकला है
जिंदगी चली जा रही है झंझावातों में
सोए नहीं जागे सारी सारी रातों में
इसलिए पलकों से सारा गुबार निकल गया
फिर चल पड़ी जिंदगी मन संभल गया
स्वरिचत,, सुषमा ब्यौहार
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बिषय ,,"रस,,
जहाँ रस का अभाव वहाँ नीरसता का बास
झरने जैसी लय में रस ही रहता खास
रस से भरे प्याले पीते पिलाते विद्वान
रस की ही सारी कला जो छूते आसमान
नरसी मीरा सूर कवि
तुलसीदास
जन्मजन्मांतर करेंगे दिलों में बास
रस विहीन रूखा रूखा रहता जीवन
जैसे कि बरषा बिना सूखा जाता सावन
रस के बिना महफिल भी जैसे हो मातम
यत्र तत्र सर्वत्र रस का ही परचम
रंग छा जाए जहाँ रस की बरसात
आनंदोत्सव में रस की ही सौगात
इसीलिए मीठी रस से भरी राधा प्यारी लागे
बहुत रसीलो रसिकविहारी लागे
स्वरिचत,, सुषमा, ब्यौहार
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बिषय ,धुआँ,,
जहाँ तहाँ दिखता धुआँ ही धुआँ है
इधर खाई तो उधर कुआँ है
सत्य पर असत्य का धुआँ चढ़ा है
भ्रष्टाचार तिरंगा लिए खड़ा है
चहुँ दिश पैसे का बोलवाला ईमान पर लग चुका है ताला
सच्चाई दबी हुई झूठ के बोझ तले
अनाचार ब्यभिचार का व्यापार फूले फले
शर्म हया का खत्म हो गया नामों निशान
अधोवस्त्र हाय हैलो का होता है सम्मान
इन्हें ही कहते हैं आधुनिक बिचार
यही हमारी जिंदगी के बन चुके अहम संस्कार
हम भी इन्हें धुआं सा उड़ाते जाऐंगे
जब तक जीवन है निभाते जाऐंगे

स्वरिचत,, सुषमा ब्यौहार
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नमन मंच भावों के मोती
13/9/2019/
बिषय , बंजर ,, रेगिस्तान,,

ए मेघा अब तो तरस खाओ
अगले बरष फिर आना
अपने घर को लौट जाओ
जहँ तहँ बाढ़ों का मंजर है
चहुँ ओर समंदर ही समंदर है
बंजर भूमि भी उफनानी है
रेगिस्तान में भी पानी पानी है
तुम घने घने से छा जाते हो
मूसलधार वारिष लाते हो
क्यों करते नहीं मेहरबानी
क्यों बिनाश की तुमने ठानी
सर्वत्र मायूसी का नजारा है
हे प्रभु तेरा ही सहारा है
भगवान. भास्कर भी विलोप हुए
न जाने कहां आलोप हुए
जाने किस देश विदेश में कर लिया अपना ठिकाना
स्वरिचत,, सुषमा, ब्यौहार

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12 /9 /2019
बिषय ,,"शहनाई""

बड़े दिनों के बाद वो आज मेरे घर आए हैं
गूंज उठी मन की शहनाई
मैंने वीणा तार सजाए हैं
अंतर्मन की तरंगें स्वागत गीत गाती हैं
सातों स्वर से सरगम छेड़ा गीत खुशी के गाए हैं
कलियों ने घूंघट खोल दिया और कुमुदिनी खिल उठी
मलय पवन महक उठी वो बहार साथ में लाए हैं
ऐसा लगता मानो धरा आसमां हुए एक
चकवी बन इंतजार किया मैंने
गहरे समुद्र में गोते लगाए हैं
नजरों से नजरें क्या मिली
पल में सारा जीवन जी लिया
मैं तो मोरनी सी चहक उठी
फिर उड़ने को पंख फैलाए हैं
आज चांदनी स्वयं मेरे आंगन उतर आई है
मेरी सदाओं का असर
मैंने मनमंदिर में दीप जलाए हैं
स्वरिचत,, सुषमा ब्यौहार
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नमन मंच भावों के मोती
11 //9 //2019
पहला खत ,,पत्र

उनसे पिछड़े हुए जमाने हो गए
गैर अपने हुए हम बेगाने हो गए
सोचती थी पहला खत उन्हीं का आएगा
पल दो पल मन संभल जाएगा
खत न आने के सौ सौ बहाने हो गए
जब सामने होंगे शिकायत मैं करुंगी
कुछ उनकी सुनूंगी कुछ अपनी कहूंगी
वो तो आए नहीं हम क्यों दीवाने हो गए
आंखें भी थक चुकी उनके इंतजार में
सोचती थी बात होगी पत्र ब्यवहार में
उनका पता पुराना हो गया
हम अनजाने हो गए
हमको जो मिला ए उनकी मेहरबानी थी
हमने भरोसा किया ए हमारी नादानी थी
शमां को जलाने हम परवाने हो गए
स्वरिचत,, सुषमा ब्यौहार
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नमन मंच भावों के मोती
10 /9 / 2019
बिषय ,,चैन की बंशी ,,

कब.आओगे भारत में कान्हा
प्रेम सुधा बरसाने वाले
चहुंओर घोर अंधेरा है
झूठ छल कपट का डेरा है
कब कष्ट हरोगे कान्हा तुम
सुदर्शन चक्र चलाने वाले
आपस में झगड़ रहे
भाई से भाई लड़ रहे
इन्हें आकर कुछ तो समझा दो
गिरवर को उठाने वाले
यहां सरेआम लुटतीं बाला
शर्म हया पे लगा ताला
अब कोई नहीं है रखवाला
सुनो लाज बचाने वाले
आरत जन तुम्हें पुकारते हैं
आने की वाट निहारते हैं
फिर से चैनों अमन कर जाओ
चैन की बंशी बजाने वाले
स्वरचित,, सुषमा,, ब्यौहार
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नमन मंच भावों के मोती
9//9 // 2019//
बिषय ,,शिकार /शिकारी

तन मानव मन शिकारी
ऊपर से राम बगल में छुरी
देखने मिलते अनेकों ब्यभिचारी
बगला भगत ढूंढते रहते शिकार
कैंसर की तरह फैला अनाचार
कोई वस्तु नहीं शुद्ध मिलावट. का जमाना
व्यापारी भी अपना भरते खजाना
लूट खसोट चारों तरफ भारी
बेईमानी ऐसी जैसे हो महामारी
नेताओं से बढ़कर और कोई न शिकारी
सरेआम रिश्वत लेते अधिकारी
.दस ठगों के बीच में दो ही हों
वफादार
उसे बेबकूफ कह करते पागल करार
फिर भी देश की आन बान शान
इसलिए तो है मेरा भारत देश महान
स्वरिचत ,, सुषमा ब्यौहार
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"स्वतंत्र विषय लेखन "08दिसम्बर 2019

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