अनिता सुधीर श्रीवास्तव









लेखिका परिचय

नाम :अनिता सुधीर श्रीवास्तव जन्मतिथि :2nd अक्टूबर 62 जन्मस्थान :लखनऊ शिक्षा :M.Sc Organic chemistry सृजन की विधा: छन्द मुक्त और छन्द युक्त ,सामाजिक विषयों पर लेख प्रकाशित कृतियां :पत्रिका में प्रकाशित सम्मान : दूसरे पटल पर सम्मानित रचना पेशा :अध्यापन पता : 13/103 ,सेक्टर 13 ,विकास नगर ,लखनऊ ,226022 ईमेल आईडी : luckysudhir02@gmail.com

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विषय अधिकार 
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कथित सभ्य सुसंस्कृत उन्नत समाज में 
मानव लड़ रहा अधिकारों के लिए 
क्यों नहीं ऐसी व्यवस्था बनती 
सभी सिर उठा कर जिये
समता का भाव लिए ।

शिक्षा ,कानून आजादी ,धर्म भाषा 
काम हो सबका मौलिक अधिकार 
क्या कभी चिंतन कर सुनिश्चित किया 
क्यों नहीं बना अब तक वो उसका हक़दार।

समता के नाम पर क्या किया तुमने 
आरक्षण का झुनझुना थमा हीन साबित किया
बांटते रहे रेवड़ियाँ अपने फायदे के लिए 
सब्सिडी और कर्ज माफी से उन्हें बाधित किया। 

मानव अधिकार की बातें कही जाती हैं 
अधिकार के नाम पर भीख थमाई जाती है 
देने वाला भी खुश और लेने वाला भी खुश 
इस लेनदेन में जनता की गाढ़ी कमाई जाती है।

क्यों नहीं ऐसी व्यवस्था बनाई जाती है 
जहां अधिकार की बातें बेमानी हो जाए 
ना कोई भूखा सोए ,न शिक्षा से वंचित हो
भेदभाव मिट जाए,हर हाथ को काम मिल जाये ।

योजनाएं तो बनाते हो पर लाभ नहीं मिलता 
बिचौलिए मार्ग में बाधक बन तिजोरी भरते है
कानून का अधिकार है,लड़ाई लंबी चलती है
लड़ने वाला टूट गया बाकी सब जेबें भरते है।

महंगी शिक्षा व्यवस्था है कर्ज ले कर पढ़ते है
नौकरी गर न मिली तो कर्ज कैसे चुकायेगें
कर्ज देने मे भी बीच के लोग कुछ खायेंगे
बेचारा किसान दोनो तरह से चपेटे में आएंगे।

आयोग बना देने से,एक दिवस मना लेने से
रैली निकाल लेने से ,कुछ नहीं होगा 
मानव पहल तुम करो ,दूसरे के अधिकार मत छीनो
खोई हुई प्रतिष्ठा के वापस लाने के हकदार बनो ।

स्वरचित
अनिता सुधीर

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12/04/19
सुख दुख
***
सुख दुख विस्तृत अर्थ लिये
कैसे इसे परिभाषित करें!
शब्द न कर पा रहे बखान
कलम बेबस ,बुद्धि अज्ञान ।

सुख का क्या है मापदण्ड
क्या एक सा हर काल खण्ड,
ये सबके लिए क्यों अलग 
कोई प्रसन्न ,कोई भोग रहा दण्ड।

फुटपाथ पर भी सुख चैन 
की नींद कोई सो जाता है 
नरम बिस्तर भी दुख दे कर
किसी को रात भर जगाता है।

सुख दुख जीवन की डगर,
है मन की स्थिति पर निर्भर
सुख दुख तो आने जाने हैं 
सम भाव रहना हर पल ।

वर्तमान में जो जी लेते हैं
वो ही जग में सुख पाते है
भूत और भविष्य मे उलझे 
दुख उनमें घर कर जाते हैं ।

सुख का गड़ा न खजाना
मेहनत से कमा कर लाना
किसी के दुख दर्द दूर कर 
अपने दुख को दफना आना ।

स्वरचित
अनिता सुधीर श्रीवास्तव


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विषय :वृक्ष /पेड़
विधा : दोहा

वृक्ष काटते जा रहे ,पारा हुआ पचास।
वृक्षारोपण सब करें ,इस आषाढ़ी मास ।।

धरती बंजर हो रही ,बचा न खग का ठौर।
बढ़ा प्रदूषण रोग दे ,करिये इसपर गौर ।।

भोजन का निर्माण कर ,वृक्ष करे उपकार।
स्वच्छ प्राण वायु बने ,जीवन का आधार ।।

देव रुप में पूज्य ये ,धरती का सिंगार ।
गुणों का भंडार लिये ,औषध की भरमार ।।

संतति रुप में वृक्ष ये ,करिये प्यार दुलार ।
उत्तम खाद पानी से ,लें रक्षा का भार ।।

स्वरचित
अनिता सुधीर

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नमन  मंच  भावों के मोती
तिथि         25/06/19
विषय      मोबाइल/ फ़ोन
**
विरोधाभास लिये ,
अपनी स्थिति पर मौन 
मैं मोबाइल फ़ोन !
सोचता ....
मैं कैसे गलत हो गया ..
सभी का दोष कैसे माथे चढ़ गया..
बड़ी आसानी से इल्जाम लगा देते हैं ..
गलतियां मेरे आवरण में छुपा देते है ..
एहसान फरामोश हैं ये ...
दूर   बैठे परिजनों के जब 
वीडियो दिखाता हूँ ..
बच्चों  की मासूमियत को 
दादी नानी  से रूबरू कराता हूँ..
कुशलक्षेम की पाती  हूँ..
विरह का साथी हूँ...
एक क्षण में जानकारी बताता हूँ ...
कहीं भी  दो के मध्य सेतु बन जाता  हूँ ..
दुरुपयोग तुम करो 
और दोष मेरे सर  मढ़ो...
मैं तो ठहरा एक यंत्र ...
मैं वही करूं जो तुम फूकों मंत्र 
मैं बुद्धि विवेक हीन हूँ...
तुम तो नहीं...
क्यों नही रिश्ते निभाते हो ..
अपनी सुविधा  के लिये 
बच्चों को मोबाइल थमाते हो ..
सही गलत का निर्णय तुम करो ..
जनक  हो तुम मेरे 
मेरे अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह क्यों..
मैं बेचारा मोबाइल फ़ोन

स्वरचित
अनिता सुधीर
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फासले /दूरी
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संग चलने के सपने देखे थे हमने
उनको यूँ पल मे बदलते देखा है।

जो पलकों पर ख़्वाब मचलते थे कभी 
बेबस हो आज उनको मरते देखा है।

जीवन भर खामोशियाँ डराती रही
दरमियाँ अब मौन पसरते देखा है ।

लब से बात जुबा पर आती नही
कोई तूफाँ दिल में पलते देखा है।

कुछ कागज के टुकड़ों खातिर 
दरमियां दूरियां बढ़ते देखा है।

लोगों की कलम बिकती है यहाँ
सच को झूठा कर बेचते देखा है।

स्वरचित
अनिता सुधीर

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विषय जनतंत्र 
जनतंत्र का युवा पीढ़ी से आह्वान
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मैं .......जनतंत्र बोल रहा हूँ

मैं बदलता भारत देख रहा हूँ
मैं युवा भारत की आहट सुन रहा हूँ
मैं ये सोच आनंदित हो रहा हूँ ( तुम) 
लक्ष्य निर्धारित कर ,कर्म पथ पर चले 
मिले मार्ग मे शूल ,निडर बढ़ते चले
सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर खड़े
सपनोँ को पूरा करने की ऊँची उड़ान भरे।

मुझे तुम पर है पूरा विश्वास ,मगर
मैं कभी ये देख कांप जाता हूँ
जब तुम्हें नशे की गिरफ्त में पाता हूँ
नारी का अपमान सहन न कर पाता हूँ
भ्रष्टाचार में लिप्त तुम्हे देख नही पाता हूँ
अपशब्द देश के लिये सुन नही पाता हूँ
हिंदी की अवस्था पर घबरा जाता हूँ।

मैं युवा भारत से आह्वान करता हूँ 
सांस्कृतिक विरासत को सहेज आगे बढ़ो
चरित्र निर्माण,पौरुष में सतत लगे रहो
राष्ट्रप्रेम के भाव से पूर्ण रहो
सत्कर्म करो ऐसे, जग मे अमर रहो
मैं ........जनतंत्र बोल रहा ......

स्वरचित
अनिता सुधीर
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 नमन मंच भावों के मोती 
तिथि 26/06/19 
विषय इंद्रधनुष

***
रिमझिम बरसात है, 
भीगे अल्फाज है,
अलसायी सी सुबह, 
प्रियतम का साथ है।
उठो न.....चलो........
निकलो बंद कमरे से
धूप निकली है
ले रही अंगड़ाई नभ से ।
किरणें अपवर्तित ,
परावर्तित ,विसरित 
हो आसमाँ को 
सात रंगों से सजा रही,
चिड़ियों की चहचहाहट,
मौसम को खुशनुमा बना रही।
भीगे अल्फाजों को 
प्यार से संजोते हैं
अपनी कल्पनाओं को 
आओ नई उड़ान देते है
सुनहरी धूप का एक छोर पकड़,
इन्द्रधनुष के रंग चुरा लाते है।
सात रंगों को जीवन मे भर
सतरंगी सपने सजाते है ।

स्वरचित
अनिता सुधीर
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नमन मंच 
23/06/19
गरमी   
दोहावली

*
सूरज उगले आग जब, बढ़े धरा का ताप।
मौसम गरमी का हुआ ,बढ़ता मन संताप।।

दिन अब लम्बे हो गये, छोटी होती रात ।
जेठ आषाढ़ मास में ,गरमी दे आघात ।।

वृक्ष  काटते जा रहे ,पारा हुआ पचास  ।
इस गरमी के ताप में ,बरखा की है आस ।।

अन्नदाता !गरमी  में ,बोयें फसल खरीफ ।
वर्षा पर निर्भर रहें ,पायें वो तकलीफ ।।

खान पान का ध्यान  रख,दें गरमी को मात।
शीतल जल अरु छाछ है,मौसम की सौगात ।।

बच्चों की मस्ती बढ़ी ,गरमी में अवकाश ।
सैर सपाटा कर रहे ,खुला मिला आकाश ।।

स्वरचित

अनिता सुधीर
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मृत्यु
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जीवन के चक्र में
मृत्यु है अटल सत्य 
आया जो इस जग में 
जाना है उसका निश्चित 
मनवा तू कर ऐसे कृत्य
जब हो सामने मृत्यु
तू निडर हो कर वरण।

जानता हूँ ये परम सत्य ...

पर असमय ,बिन आहट 
मृत्यु सामने आ जाये
देश की सुरक्षा हेतु 
हँसते हँसते वरण कर जाते
अपने लिए न मन डरे 
परिजन के लिए डरता हूँ 
माँ बाप के बुढापे की लाठी
बहन की राखी हूँ
बच्चों का भविष्य हूँ 
पत्नी का श्रृंगार हूँ 
मैं एक बार मृत्यु का वरण करूंगा
ये तो जीते जी रोज मरेंगे
जीवन की कठिनाई में 
ये कैसे सर उठा जी पाएंगें!
कुछ समय में ही ,लोगों का 
देशभक्ति का जोश उतर जाएगा 
नेता फिर से गन्दी राजनीति 
में उलझ जाएगा 
गैर तो गैर ,अपने भी 
धोखा देने आ जाएँगे 
जीवन के लम्बे सफ़र मे
माँ बाप बन वो 
अकेली कैसे बड़ा करेगी 
बहन की डोली को 
कैसे वो विदा करेगी ।
देश के हित के लिए 
मुझे मृत्यु से डर नहीं
ये सब सोच सहम जाता हूँ 
आप से समाधान चाहता हूँ 
आप से समाधान चाहता हूँ ...

स्वरचित
अनिता सुधीर

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नमन  मंच 
22/06/19
गवाह/सबूत
**

मैं कैसी 
चर्चा का विषय क्यों 
हर बार कसौटियों पर 
मैं ही परखी जाऊँ 
लहूलुहान होती रूह पर 
कब तक मरहम लगाऊं
सदियों से चुप रही 
कराहती रूह को 
थपथपा सुलाती रही 
पर अब नहीं ...
जैसी भी  मैं
क्यों दें सबूत 
साक्ष्य प्रमाण क्यों
एक एक कृत्य के 
गवाह क्यों  
नहीँ चाहिये मुझे 
तुम्हारी अदालत से 
कोई फैसला 
कोई सनद नहीं 
कोई प्रमाण पत्र नहीं 
स्वयं को बरी करती हूँ.....

स्वरचित
अनिता सुधीर
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नमन मंच
तिथि       21/06/19
 विषय      योग
योग दिवस और स्वस्थ जीवन  की शुभकामनाएं 
दोहावली
***
विश्व में सम्मान  बढ़ा ,मची योग की धूम ।
गर्व विरासत पर हमें ,धूलि देश की चूम ।।

करते प्रतिदिन योग जो ,रहें रोग से दूर।
साँसों का बस खेल है ,मुख पर आए नूर ।।

आसन बारह जो करे,हो बुद्धि में निखार ।
होता सूर्य नमन से ,ऊर्जा का संचार ।।

पद्मासन में बैठ कर ,रहिये ख़ाली पेट।
चित्त शुद्ध अरु शाँत हो,करिये ख़ुद से भेंट ।।

प्राणवायु  की कमी से , होते सारे रोग 
प्राणायाम करके सभी ,जीवन उत्तम भोग ।।  

ओम मंत्र के जाप से ,होते दूर विकार।
तन अरु मन को साधता ,बढ़े रक्त संचार।।

स्वरचित
अनिता सुधीर
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नमन  मंच  भावों के मोती 
तिथि          20/06/19
विषय         दर्पण
***
दर्पण  को आईना दिखाने का प्रयास किया है 

    दर्पण
*********
दर्पण, तू लोगों को 
आईना दिखाता है
बड़ा अभिमान है  तुम्हें 
अपने  पर ,कि
तू  सच दिखाता है।
आज तुम्हे  दर्पण,
दर्पण दिखाते हैं!
क्या अस्तित्व तुम्हारा टूट
बिखर नहीं जाएगा 
जब तू उजाले का संग
 नहीं पाएगा 
माना तू माध्यम आत्मदर्शन का
पर आत्मबोध तू कैसे करा पाएगा 
बिंब जो दिखाता है
वह आभासी और पीछे बनाता है 
दायें  को बायें
करना तेरी फितरत है 
और फिर तू इतराता  है
 कि तू सच बताता है ।
माना तुम हमारे बड़े काम के ,
समतल हो या वक्र लिए 
पर प्रकाश पुंज के बिना 
तेरा कोई अस्तित्व नहीं ।
दर्पण को दर्पण दिखलाना 
मन्तव्य  नहीं, 
लक्ष्य है
आत्मशक्ति के प्रकाशपुंज
से  गंतव्य तक जाना ।

स्वरचित
अनिता सुधीर
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नमन  मंच 
19/06/19
किनारा 
किनारा शब्द के  कई अर्थ को  लिखने का प्रयास
***
समन्दर का *किनारा 
ठंडी रेत पे नंगे पाँव
हाथों में हाथ  लिए 
दुनिया जहान से दूर 
अपने में रहते मशगूल
वो दिन भी क्या दिन थे।

वक़्त ने क्या सितम किया
गलतफहमियां दीवार बन  गयीं
रिश्ते बिखरते जा रहे थे 
एक दूजे से दूर जा रहे थे
*किनारे की तलाश में
बेड़ियोँ के भँवर में डूबते जा रहे थे ।

समय के चक्रव्यूह  में
उलझ कर रह गए हम
तुम तो गैर हो गए थे 
अपनों ने भी *किनारा कर लिया।

नदी के दो *किनारों की तरह 
हम समानांतर चलते रहे
मिलना न था नसीब में
*किनारे की तलाश में 
हम सहारा ढूँढते रहे ।

जल नदियों का *किनारा 
छोड़ता जा रहा है
सिकुड़ती  हुई नदियां 
सूखे की स्थिति ला रही हैं
जल, किनारा तोड़ निरंकुश हो जाये 
प्रलय और बाढ़ के  हालात बनते जाएं ।

स्वरचित
अनिता सुधीर

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नमन मंच 
12/06/19
विषय   चक्रव्यूह
विधा  मुक्तक
**

हर शख्स ने चेहरे पे इक चेहरा लगा रखा है
लबों  पर हंसी और सीने मे दर्द छुपा रखा है
फरेबी दुनिया में सुंदर मुखौटे पहने लोगों ने
रिश्तों की सच्चाई में कुछ झूठ छिपा रखा है।

धरा मानव मन की अब क्यों हो गयी बंजर
सिसकती कातरता से ,देख दोस्ती का मंजर
कैसे विश्वास के बदले विष भर गया रिश्ते मे
मुँह से  बोलते राम ,रखते पीठ पीछे खंजर।

किस चक्रव्यूह में उलझ कर रह गया इंसान 
किया जिस पर विश्वास,तोड़े रिश्तों का मान
जीवन के झंझावातों में साथ जिसका प्यारा था
विश्वास घात से पाया जीवन भर का अपमान ।

स्वरचित
अनिता सुधीर
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नमन  मंच  भावों के मोती 
तिथि          11/06/19 
विषय         घर
***
घर और माँ के  मध्य वार्तालाप
****
ईंट गारे की दीवारों में ख़्वाब को सजाया था
जद्दोजहद के साथ इस मकान को बनाया था 
प्यार ,विश्वास एहसास की सतरंगी चूनर से
मकान को अपना खूबसूरत घर बनाया था ।

अकेला देख मुझे,दिल पर वार करता है
चुभती निगाहों से, ये घर पूछ लिया करता है
तुम्हारे नीड़ के पंछी एक एक कर उड़ गए
ढूँढती उनके सामानों में ,तुम्हें तन्हा कर गए।

तन्हा नहीं  मैं ,पल पल साथ रहते वो मेरे
घर के  हर कोने मे अपने अहसास बिखेरे
उड़ने को आसमान हमने ही दिया  उन्हें
उन्मुक्त गगन में वो ऊंची उड़ान भर रहे ।

स्वार्थवश  हम उनके पंखों को क्यों काटे 
संस्कार के बीज पड़े वो अपनी जड़ों से जुड़े
हमारे सपनों को पूरा कर नया आयाम दे रहे
और अपना जीवन भी अपने सोच से जी रहे ।

जवाब  मेरा  सुन , घर  सुकून से  भर गया 
कहने लगा ,आशय तुम्हें चोट पहुँचाना नहीं ,
तुम्हारी ही तपस्या से  मै सजीव घर बना हूँ,
निश्चिन्त हुआ ,अस्तित्व मेरा यूँ ही बना रहेगा ।

स्वरचित
अनिता सुधीर
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नमन  मंच  
10/06/19
विषय     कोयल 
***
ये रचना प्रस्तुत  करने में किसी की भावनाएं आहत करने का मक़सद नहीं है ,पर कोयल के माध्यम से आज के समाज को  दिखाया है । 
मेरे विचार गलत भी हो सकते हैं । क्षमाप्रार्थी हूँ.
**
कौवे का केवल तन  काला 
कोयल का मन भी काला है ।
कौवे की कर्कश वाणी में 
सच्चाई का बोलबाला है ।
चाशनी  सी मीठी बोली 
में घोटाला ही घोटाला है ।
नर और मादा कोयल दोनों 
समाज की रीति बताते हैं ।
नर कोयल मीठा गा गा कर
अपना सिक्का चलाता है।
पुरुष प्रधान समाज का 
वो आईना बन जाता है ।
दूजा अंश नष्ट कर मादा
दूसरे नीड मे वंश बढ़ाती है।
नारी ही नारी की दुश्मन 
ये सच जग को बतलाती है
मीठी वाणी की शिक्षा 
पहले कभी अनमोल रही
आज का समय यही कहे 
जो मीठा बोले तो सतर्क रहो।प

स्वरचित
अनिता सुधीर
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नमन मंच   भावों के मोती 
तिथि          17/06/19
विषय          नीयत 
विधा            दोहा छन्द 
***
नीयत सुधरी जो रहे ,नियति सुधर खुद जाय ।
सन्त ऋषि की सीख यही,तब जीवन मुस्काय ।।

दो रोटी की भूख में ,नीयत जाती डोल ।
चोरी के आक्षेप से ,मनुज बिका बिन मोल।।

नीयत का आभास नहि,ओढ़ लिये हैं खोल।
पीठ पीछे वार करें , मीठी वाणी बोल ।।

नीयत में है खोट जो ,वो झूठा इन्सान ।
करता है दुष्कर्म वो ,बन जाता हैवान ।।

नीयत क्यों बिगड़ी हुई ,मासूमों को देख ।
डरो खुदा की मार से,क्या किस्मत का लेख।।

स्वरचित
अनिता सुधीर


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नमन मंच
07/04/19
जयति जगतजननी
**
माँ दुर्गा के नवरूप है
इस जीवन का सार
कल्याणकारिणी देवी तुम
करो जन जन का उद्धार
शैलपुत्री माता तुम
चेतना का संचार करो
ब्रहमचारिणी माता तुम
अनंत दिव्यता से मन भरो
चन्द्रघण्टा मन की अभिव्यक्ति
इच्छाओं को एकाग्र करो
कूष्मांडा प्राणशक्ति
ऊर्जा का भंडार भरो
स्कंदमाता ज्ञानदेवी
कर्मपथ पर ले चलो
कात्यायनी माता तुम
क्रोध का संहार करो
कालरात्रि माता तुम
जीवन में शक्ति भरो
महागौरी माँ
सौंदर्य से दैदीप्यमान करो
सिद्धिदात्री माता तुम
जीवन मे पूर्णता प्रदान करो
नवदुर्गे माँ जन जन के
जीवन को आलोकित करो
आत्मसात कर सके
ये अलौकिक रूप तुम्हारे
ऐसी कृपा हम पर करो ।

स्वरचित

अनिता सुधीर


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"हिंदी/हिंदी दिवस "14 सितम्बर 2019

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