पूर्णिमा साह



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"लेखिका परिचय"

01)नाम:- पूर्णिमा साह(भकत)
02)जन्मतिथि:- सहित):-9th जूलाई 1976
03)जन्म स्थान:-Jharkhand
04)शिक्षा:-B.Com.Hon's(accountancy)
05)सृजन की विधाएँ:- सारी लघु विधाएँ,मुक्तक छंद मुक्त लघुकविता,एवं गजल।
06)प्रकाशित कृतियाँ:-
07)कोई भी सम्मान:-भावो के मोती,एवं "सोपान"से सर्वश्रेष्ठ रचनाकार सम्मान, अंकुर साहित्य में प्रकाशित अनेक रचनाएँ।
08)संप्रति(पेशा/व्यवसाय):-Housewife


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छंदमुक्त
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मैं प्रेम.., अर्पिता... समर्पिता
मैं जड़.....चेतन.....अचेतन
मैं गीत....संगीत.....राग...
सुर....ताल...लय...छंद।।

मैं मुक्त....उन्मुक्त...सुप्त.
मैं विलय...विलीन..तरल
मैं ठोस...सख्त... प्रमाण
मैं शक्ति.... मैं विरक्ति..।।

मैं अनूभूति... .रस....स्पर्श.
मैं दृश्य..श्रव्य...गंध..जागृति
मैं तृप्ति... तृष्णा... .आशा
मैं भावुक..... . .मैं धैर्य
मैं ग्राह्य.........मैं ग्रहिता।।

मैं आकांक्षा..चहक...ललक
मैं भोर... ..किरण.....तरंग
मैं दिवा....ज्वलंत.... दहक
मैं निशा...शीतल...शांत।।

मैं चंचल....चपल....तेज
मैं निस्तेज...विश्राम..शाम
मैं सहिष्णु......मैं त्याग..
मैं शून्य.. सीमित..परिमित।

मै ज्ञान...ज्योति...विभूति
मैं अनुराग..वैराग्य...मिलन
मैं सहचरी.....अनुगामिनी
मैं तरंगिणी.....सुशोभीनी।।

मैं परा....अपरा.....शक्ति
मैं चाण्डालिनी... मैं मृणमयी
मैं स्वामिनी....मैं अभिमानी
मैं कल्याणी... मैं कात्यायिनी

तू स्रष्टा....... मैं सृष्टि.
तू आकाश.... मैं पृथ्वी
तू स्थिर........मैं गति
तू रहस्य......मैं नियति।।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल



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"मान/अपमान"
1
अहं नादान
मन से अस्वीकार
मान-सम्मान
2
स्वार्थ निजता
अपमान परता
है निराधार
3
अपना हाथ
मान सम्मान साथ
है जगन्नाथ
4
स्वार्थ का त्याग
न कर अहंकार
मिले सम्मान
5
जग का अहं
मान व अपमान
घायल मन

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल

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फुरसत किसने कब पाया है
मिला क्या और खोया क्या
जिंदगी की इस भागदौड़ में
हासिल किसे क्या हो पाया है

फुरसत नहीं है मुझको
ये तो बस एक बहाना है
कहके ऐसा नजरें चुराना है
अपनो को बना रहे बेगाना है

अपनों संग बैठो फुरसत से 
पल दो पल साथ बिताके
थोड़ी खुशियों को जी लेना है
कुछ और हमें मिले न मिले
एक मीठी मुस्कान तो आना है।।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल

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"मौका/अवसर"
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रंजिशों को भूलकर यारों
दिल से दिल मिलाना सीखो
दीवार नफरतों की तोड़कर
गले तो लगाना सीखो यारों।

इर्ष्या, द्वैष त्याग कर मन में
प्यार पालना सीखो यारों
अकड़कर न चलना राहो में
थोड़ा सा झुक जाना यारों।

मौका है अवसर है
इसको यूं ही न गंवाओ यारो
दो दिन की है जिंदगानी
खुशियां तो लुटाओ यारो।

गर हासिल हो मुकाम कोई
खुद पर न इतराओ यारो
गुरुजनों के चरणों में झुक के
शुकराना करना सीखो यारों।।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल

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"खबर/समाचार"
1
खुश खबरी
तरंगित लहर
मन आँगन
2
चाय की प्याली
सुबह की खबर
परमानंद
3
देश,विदेश
समाचार दर्शन
ज्ञान अर्जन
4
सच्ची औ झूठी
खबरों की लहर
गाँव व शहर
5
सुबह,शाम
खबरी सिलसिला
हो रहे आम



स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल



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"खबर"
😊😊😊😊😊😊😊
बस गई दिल में तेरी ही सूरत,
हर जगह तू ही तू नजर आए।
कोई आहट हुई अगर दिलबर
सोचती हूँ तेरी खबर आए।।




गम में भी ढूंढ लूँगी खुशियाँ
जिन्दगी में अगर तू आए।
मुश्किल से मगर दुनिया में
तुझ जैसा हमसफर आए।।

भीग गया एहसासों से ये मन
ख्यालों की दरिया में बह गए।
किसी ने अपना बना लिया हमको,
क्यूं इसकी न कभी खबर आए।।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल

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गीतिका
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इस अनजान शहर में आके होश तेरे चुराने थे।
आँखों में मेरी छलकते जाम के मयखाने थे।।


दास्तां हम अब अपने दिल की सुनाये किसको।
अपने भी अब इस जहां में बने अनजाने थे।।

मेरी धड़कनों में तेरे गीतों के ही नग़में थे।
मेरे होठों पे तेरे मोहब्बत के तराने थे।।

दिल की गलियों ने एक नाम तेरा ही पहचाने थे।
भरी इस महफिल में चेहरा सभी के अनजाने थे।।

दरख्ते उन रिश्तों में भी मुझे प्रीत ही पालने थे।
तूफानी मंजरों में भी इक दीया जलाने थे।।

ये मत पूछो इन आँखों के कितने हुए दीवाने थे।
मुझको तो बस तेरी मुहब्बत में जां लुटाने थे।।
स्वरचित पूर्णिमा साह (भकत)
पश्चिम बंगाल
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"किनारा"
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इस किनारे मैं हूँ खड़ी
उस किनारे है तू खड़ा
हमारे बीच बह रही
नदी की कलकल धारा।


तेरे बिन मैं अधूरी
मेरे बिन तू अधूरा
हमारी नियति है यही
दूर से ही बने सहारा।

कश्तियों को मौजो ने लुभाया
कितनी कश्तियाँ डूबते देखी
किसी को तूने है संभाला
किसी को मैंने भी संभाला।

हम दोनों हैं दो प्रेमी
मिलन नही है हमारा
जैसे हो समानांतर रेखा
बीच बह रही जीवन धारा।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल


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"हास्य व्यंग्य"
😊बुरा ना मानों होली है😊
😛😛
होली घर-घर खुशियाँ लाई
प्रकृति लुटा रही है प्यार....
धरती पीली ओढ़नी ओढ़ी
सतरंगी फूलों की पहनी
चुनरिया
सखी, रे!..सा...रा...रा...रा.!


श्वेत थी मेरी चुनरिया...
प्रीत रंग से रंग दिये मोहे,
तन गुलाबी मन शराबी..
हो गई आज मैं बावरिया
सखी,रे!सा..रा..रा..रा...!

कैसा नशा चढ़ा सजन को..
हवा में उड़ रहे भंग देखो तो
नवरसों का बरस रहे फूहार
होश में नहीं हैं मेरे सजनवा
सखी,रे!सा..रा..रा..रा....!

लाज से हो गई मैं शर्मसार
लाल हो गये मेरे तो गाल.
देखो पकड़े है गोरीयों की बहिंयाँ
नशे में है हरजाई बलमुआ.
सखी,रे!सा..रा..रा..रा..!

रंग डारे भर-भर पिचकारी
ताना दे रही मेरी सखियाँ.
खुद को समझे है कन्हैय्या
सखी,रे!सा..रा..रा..रा..!

ना जाऊँगी पिया की अटरिया
मैं तो बन जाऊँगी जोगनिया
सखि,रे!सा..रा..रा..रा...!
☺️☺️
स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल।
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रंग/फाग/होली/होली"
विधा:--"छंदमुक्त"
🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔹
फागुन है आया देखो सजन
दहक रहा पलाश का वन
टेसू भी है मस्त मलंग
महक रहा दिक-दिगंत
बहक रहा चितवन.....
ओढ़ ली धरा सतरंगी चुनर।


फागुन है आया देखो सजन
ब्रज की गलियों में उड़ रहा रंग
गोरी खेल रही होली ....
राधा-कृष्ण के संग....
खिला ना इसबार मेरा जीवन।

फागुन है आया देखो सजन
चाँद इतरा रहा चाँदनी के संग
याद आ रहा पल वो तेरे संग
गुजारे थे हमने लम्हों के रंग
तू भी होते काश!फाग के संग
है दिल में बस यही कसक।

फागुन है आया देखो सजन
उड़ रहा गुलाल व रंग...
हवा ने ज्यों पी ली हो भंग
मेरे मन में लगी है अगन
नहीं भूली मैं कभी....
लहू से रंगा वो तेरा वदन

फागुन से पहले खेला था तुमने
सरहद में होली ओ मेरे सजन
फिर बेरंग ही रहा मेरा वसंत
फागुन है आया देखो सजन।।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल
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नमन "भावो के मोती"
17/03/2019
"स्वतंत्र लेखन"
वज्न:-12122 12122
"गजल़"
न रहगुज़र को थी कोई परवाह
मैं जिसके खातिर मचल रही थी।।


बड़ा है खुदगर्ज मेरा हमदम
मैं थी कि रिश्तों पे चल रही थी।।

हवा का मंजर बदल गया अब
मैं जिनसे अब तक संभल रही थी।।

वो आ न पाया है ख्वाब में जब
तो क्यूं मै करवट बदल रही थी।।

वो कांच सा दिल को तोडता है
मैं जिस पे कह ये गजल़ रही थी।।

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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"अंकुर"
🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱
प्रेम का अंकुरण हुआ
जब से मेरे जीवन में
सुंदर लगने लगी ये दुनिया
नव वसंत का आगमन हुआ


नूतन सवेरा, नव आनंद
हर पल खुशियों का मेला
दूर हुआ जीवन का अँधेरा
कैसी है प्रभु की माया।।

भूलकर तेरा और मेरा
पल्लवित हुआ प्रेम हमारा
मन में उमंग भी जाग रहा
प्रीत के रंग से रंग रहा।।

तन मेरा चहक रहा
किसलय से सज रहा
तन का तरुवर खिल रहा
नित-नित पुष्पों से भर रहा

वृक्ष फलों से भर गया
उस दिन मैं परिपूर्ण हुई
वसुंधरा भी अब तृप्त हुई
जीवन आनंद से सतुष्ट हुई

नित पल्लव झड़ने लगे
जीवन का पतझड़ आया
उस दिन मै बुढ़ी हुई
तन सूख के ठूंठ हुआ।।
फल से कुछ बीज बना
मिट्टी में था वो मिला
पुन:प्रेम का अंकुरण हुआ
फिर से नूतन जन्म मिला।।
नव जीवन का अंकुर फुटा
जीवन का हर रुप मिला
सुख-दुख का यही क्रम रहा
जन्म -मृत्यु का चक्र चला।।
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"करवट"
☺️☺️☺️☺️☺️☺️☺️
यादों के करवटें बदलती रही
संग तेरे जीती मरती रही
नैन अपना भिगोती रही
अश्कों के दरिया में डूबती रही


यादों के करवटें बदलती रही
चैन अपना मैं लुटाती रही
तारों संग टिमटिमाती रही
रातों को मै जागती रही।

यादों के करवटें बदलती रही
मुझे देख चाँद भी छुपता रहा
मन पलाश सा दहकता रहा
तेरे नाम का दीया जलाती रही

यादों के करवटें बदलती रही
बेला की खुशबू आती रही
रात रानी भी महकती रही
मेरे रुहों में समाती रही।।

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"गजल़"
बह़र :-22. 22. 22. 22
22. 22. 22 22
अर्कान:-फैलुन,फैलुन,फैलुन, फैलुन
काफिया:-आ(स्वर)
रदिफ :- होगा।


हमदम मेरा कैसा होगा।
शायद तेरे जैसा होगा।।

सच्चा होगा झूठा होगा।
हमदम वो ही मेरा होगा।।

दिल का लेना देना होगा।
काहे का शरमाना होगा।।

जग मे छाया पहरा होगा।
तेरा मेरा किस्सा होगा।।

जाने क्या क्या कहता होगा
थोड़ा सा वो पगला होगा।।
हँसते हँसते रूठा होगा।
फिर तो जानेजाना होगा
हार के भी जीता होगा।
संग अब जीना मरना होगा।
चुप चुप के ही रहना होगा।
मेरा ही वो यारा होगा।।
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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"दौलत/पैसा"
छंद मुक्त
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दौलत का नशा जब
किसी को हो जाता है
फिर इंसानियत उसकी
मर ही जाती है
येन केन प्रकारेण
दौलत पाने के लिए
मचल जाता है
भौतिक सुखों में ही
जीवन का आनंद ढूँढता है
ऊँचे महलों में रहकर भी
नींद को तरस जाता है।


"स्वास्थ्य तन और मन"
यह दौलत खूशनसीबों को
ही मिल पाता है...
स्वास्थ्य तन में ही
स्वास्थ्य मन का वास
होता है।

चरित्र हर इंसान का
अनमोल दौलत है
चरित्र के दामन पर
लगा दाग ना कभी
मिट पाता है
फिर तो सम्पूर्ण व्यक्तित्व
ही धूमिल पड़ जाता है
यह ऐसी दौलत है जो
इंसान की प्रतिष्ठा का
सबब बनता है
एक बार यह खो जाये
तो आजीवन दरिद्र
हो जाता है।।
पैसों से यह दौलत
ना खरीदी जा सकती है।

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"नारी"
छंद मुक्त सृजन
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नारी को मिलता कैसा जीवन
पुरुषों के बनाए पथ में...
चलता है जीवन का संग्राम


पति के रुप में......
भाई सम पुरुष ......
कितनों को मिलते हैं
और कितनों को मिलता
पिता का द्वितीय रुप....
होता गर ऐसा.......
तो मन ये कहके झूम उठता
#स्वामी सुहागिनी,
#प्रेम अनुरागिनी...

बहुतों को है मिलता....
बर्बरता से परिपूर्ण..
अमानवीय व्यवहार
मन में उसके ......
पुरुष के नाम से ही...
आता है संत्रास।।

चौका-चूल्हा में ही....
जल रही दिन-रात....
मन से स्वाधीन होने की ..
चाहत ही है,उसका अपराध

एक नारी को ......
जितनी सहजता से.
कुलटा कहा जाए...
क्या किसी पुरुष को
कहना है आसान....।

माँ,बहनों और सखि....
जागो...उठो......!!
सब मिलकर इस समाज को
बदलो...
अंदर की दुनिया से बाहर आकर
इस दुनिया की हाल हकीकत जानो...
नारी मन की व्यथा को समझो
उसकी आवाज बनो....!!!
एक दूजे का थामके हाथ..
कंधे से कंधा मिला...
ताकि पुरुष वर्ग..
कलुषित ना कर सके
कोई नारी का तन!!!
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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"मूक/मौन"
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भारतीय किसान...
हमारे अन्नदाता.....
सारी कमाई दाँव पे लगाके
मूक नजरों से गगन निहारा करे


टूट जाये चाहे कमर
इन्द्र का ना कहर टूटे
हाथ जोड़ मौन निगाहों से
मन ही मन नमन करे..

इसबार आस हो पूरी
परिवार की ख्वाहिशें ....
ना रह जाये अधूरी..
मूक रहकर अपने ...
कर्मों का अर्पण करे.

खेतों में ही सजते सपने
खेती से ही जीवन अपना
निर्वहान करे.......
देख फसलों को लहलहाते
मूक आँखों में आस जगे

इस बार तमन्नाएँ ना रहे अधूरी
फसल सूद-मूल में ना बिक जाये
सूद का समापन होकर......
साहूकारों से छुटकारा मिल जाये

हर वक्त मन से यही दुआ करे
इस बार बच्चों की मुस्कान...
ना मौन रहे.........।।
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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"राहत"
##############
सुबह से शाम
दौड़ रहा इंसान
भाग रही जिंदगी
रात भी है गमों के नाम
राहत कहाँ ढूँढें ये मन


सामाजिक व्यभिचार
कचोटता है बार-बार
सभी को है अपनी फिकर
मिल रहा आघात
राहत कहाँ ढूँढें ये मन

कर्णभेदी स्वर
मासूमों का चित्कार
सिहर उठा रोम-रोम
असहाय हुआ नादान
राहत कहाँ ढूँढें ये मन

भारतीय परंम्परा
खो रही अपनी गरिमा
भूल रहे हम संस्कृति
पनप रही विकृति
राहत कहाँ ढूँढें ये मन

वीरों की जन्मभूमि
आतंकियों से लहूलुहान
मिट्टी भी रक्तरंजित
राहत कहाँ ढूँढें ये मन

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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"नींद"
😴😴😴😴😴😴😴
उठो! नौजवानों !!
नींद से जागो,
सपने को तुम साकार करो
अपने कर्मों का आह्वान करो
इस मिट्टी की शान बनो!!


उठो!नौजवानों !!
नींद से जागो,
मजबूत इरादों से
सर्वांगीण विकास में
सहायक बनो,
देश की बागडोर
अपने हाथों से संभाल लो।

उठो!नौजवानों!!
नींद से जागो,
माँ भारती के संतान तुम
वर्तमान ही नहीं,
देश के भविष्य हो।

उठो!नौजवानों!!
नींद से जागो,
तुम विज्ञान की नई
तकनीक हो,
समृद्धि के पथ पर
देश को अग्रसारित करो।

उठो!नौजवानों!!
नींद से जागो,
लेकर संकल्प
बुलंद हौसले से
नशेमुक्त भारत का
नव निर्माण करो ।।

स्वरचित पूर्णिमा साह (भकत)
पश्चिम बंगाल।
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सभी सदस्यों को महा शिवरात्रि की हार्दिक बधाई शिव की कृपा
आप सभी पर बनी रहे🙏
"शिव/शिवरात्रि/सृष्टि"
हाइकु
1
शिव विवाह
भूत,प्रेत बाराती
द्वारे शिवानी
2
देवाधिदेव
मर्त्यलोक के स्वामी
औघड़दानी
3
तप तल्लीन
जपते राम माला
होश ना हाला
4
शिव आलय
शिवरात्रि की धूम
पूजा औ होम
5
है चतुर्मास
शिव के अधिपत्य
पूरा जगत
6
शिव त्रिनेत्र
प्रलय भयंकर
खुला है जब
7
रुद्राभिषेक
शिवरात्रि के दिन
पूण्य की प्राप्ति
8
शिव पुराण
शंकराचार्य संत
महान ग्रंथ
9
शक्ति का दंभ
रावण शिवभक्त
मिला जो दान
10
क्रोधित शिव
जग हुआ अस्थिर
तांडव नृत्य


स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल।



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बेबहर गजल
काफिया---(आ)
रदिफ----(जाये)
🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼
खामोश निगाहें रुलाती है,
कुछ ईशारे मन को भा जाये।


बात जो दिल को तड़पाती है,
कह दूँ तो कयामत आ जाये।

हरकतें तेरी यूँ उलझाती है,
बतला दूँ तो शामत आ जाये।

यादें भी तेरी तड़पाती है,
भूला दूँ तो शमां बुझा जाये।

महफिलें भी ना अब भाती है,
रुठ जाऊँ तो तूफां आ जाये।।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल
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"सरहद"
🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
अभिनंदन,का वंदन है
देश को तुमपर अभिमान है


सरहद के इस पार
किया सबने तेरा दीदार
लौट आया हमारा जांबाज
फिर आया सभी को ऐतबार
कि सलामत है वीर हमारा।

सरहद के इस पार
कर रहा था देश इंतजार
मानों है कोई त्योहार..
शाम से हो गई थी रात
कम ना हुआ था जनसैलाब

देख रही थी दुनिया सारी
शेरों सी चाल थी तुम्हारी
पड़ रहे थे उनके चारो
सेना पर भारी....।

सरहद के इस पार की
है एक ही कहानी
हम हैं सच्चे दिलवाले
🇮🇳हिंदुस्तानी🇮🇳

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल।
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"पवन"
💠💠💠💠💠💠
ऐ!पवन!!
सरहद के पार
तू जा पवन!!
है वहाँ हमारा
अभिनंदन!!
देना संदेशा
देश कर रहा
इंतजार तेरा
हो तू भारत माँ का
नंदन!!!
ऐ!पवन!!!
तू जा पवन!!
हौले से उसे
सहलाके आ पवन,
देश कर रहा
तुझे नमन!!
बुला रही देश की मिट्टी
इंतजार में तेरे
गिन रही घड़ी
ऐ!पवन!!
तू जा पवन!!
छूकर उस वीर का चरण,
रहना तू होश में पवन
अभिमान से तू,
ना बन जाना तूफान
अभी तो करना है
अभिनंदन,का अभिनंदन!!
ऐ!पवन!!
सरहद के पार
तू जा पवन!!!


स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल

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"प्रण/संकल्प"

जिंदगी के इस सफर में
प्रण ना कभी मैनै लिया
परिस्थितियों को झेलते 
वर्तमान का सामना किया।


रहकर अपनों के बीच में
प्रण ना कभी मैंने लिया,
गमों को भी गले लगाके
सबकी ख्वाहिशों को पूरा किया

जिंदगी के इम्तिहान में
प्रण ना कभी मैंने लिया
अपनी ख्वाहिशों को छोड़के
सबके सपनों को पूरा किया।

अपनी बेरंग सी जिंदगी में
प्रण ना कभी मैंने लिया
हर रुपों में ढलकर
तरलता से ही जिया।

मानवता का संकल्प लेके
प्रीत का ही संदेशा दिया
ईर्ष्या, द्वेष, घृणा को भूलके
सिर्फ चाहतों को ही जिया।।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल
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"विजयपथ"
🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
हे !वीर पुत्र,
तुमसे है देश का अभिमान
रखी तूने आज फिर से
भारत माँ की लाज।


हे!वीर पुत्र,
तुमसे है तिरंगे की शान
शत्रुओं के आगे खड़े सीना तान
सरहद पर रहते तैनात।

हे!वीर पुत्र,
घर में घुसकर मारके आये
शत्रुओं को धूल चटाके आये
डर से तेरे दुश्मन भागे।

हे!वीर पुत्र,
आतंकी का करके काम तमाम
शौर्य तिलक लगाके आये
विजय पताका फहराके आये।

हे!वीर पुत्र,
कैसे करुँ तेरी गुणगान
अखंड दीप प्रज्वलित करुँ
रखूँ "विजयपथ"का मान।।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
"बाल साहित्य"
😊😊😊😊😊😊😊
"चंपक"के मनमौजी 'चीकू'जी
करते बड़ी चुहलबाजी जी ।


"नंदन "की कहानियाँ
मन को बड़े लुभाते जी।

"बाल भारती"में बतलाते
चिजें कैसे है बनते जी।

मन में हरपल घूमता था
परियों की कहानी जी ।

विशालकाय हमारे"साबूजी"
बहादुरी ही दिखलाते जी।

तारिफें करते ना थकते ,
"चाचा चौधरी"की बुद्धिमानी जी
था बड़ा ही भयंकर मामला
"ड्रेकुला"का आ जाना जी।
"तेनालीराम"के किस्से
आहा! क्या कहने जी।
"अकबर-बिरबल"के चर्चे
दोस्तों के संग जमते जी।
उन दिनों की बात निराली
सोच-सोच अब हँसती जी।
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"किस्मत/भाग्य"
💥💥💥💥💥💥💥
मेहनत और लगन गर हो तुम्हारे
भाग्य चमकते हैं कर्मों के सहारे
सफलता चूमते कदम तुम्हारे
फिर किस्मत भी होते साथ तेरे


छोड़ो ना कश्ती भाग्य भरोसे
डूब जायेंगे ये बीच ही धारे
हाथों में लेकर पतवार सहारे
हौसले से ही कश्ती पार उतारे

पथ हो दुर्गम चले चलो
विश्वास के संग बढ़े चलो
लड़खड़ाते कदम संभालते चलो
प्रेम का संदेशा देते चलो

सतकर्मों से भाग्य बदल जाते है
ये विश्वास मन में मान के चलो
प्रेम से भाग्य भी सँवर जाते हैं
गर्दिश के तारे भी चमक जाते हैं
ऐसा तुम ठान के चलो ।।।

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"यादों के झरोखे"
###########
रिश्तों की मर्यादा....
परिवार की गरिमा...
कर्तव्यों का निर्वहन
सांसारिक व्यस्तता..
निभाती रही........


आज अनायास ये मन..
यादों के पन्ने पलटता रहा
कुछ क्षण तो लगा जैसे..
रुक सा गया है पल..
थम सी गई है जिंदगी

प्यारा सा एहसास था
सुना रही दास्तां थी
फूलों सी खुशबू थी
होठों पे खिलीं मुस्कान थी

बहुत कुछ कह रहा....
बीता हुआ मेरा कल

सपने बुने थे जो तूने
क्या खोया....क्या पाया
हाथों में जो कुछ है आया
आजतक मैंनें नहीं गुना.

उधेड़बुन में मैं....
मूक ........निःशब्द..
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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"नीर/जल/पानी"
1
तू ले संकल्प
जल का संरक्षण
नहीं विकल्प
2
जल व आग
प्रकृति है अलग
रहे ना संग
3
पिया की याद
सावन की है रात
पानी में आग
4
चाँदनी रात
बिन जल नहाई
क्यों हरजाई
5
निशा सजनी
लेके आई चाँदनी
नीर या पीर
6
कोई ना शक
बिन जल मछली
जी नहीं पाती
7
सुख व दुःख
अश्रु जल छलका
रोके ना रुका
8
नैनों से नीर
लेके काजल साथ
बहते पीर
9
अश्रु जल से
शहिदों को आहूति
भीगा आँचल
10
सृष्टि आधार
"जल ही जीवन है"
तृप्त संसार


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"वार/चोट/प्रहार"

दिल पे जब लगती है चोट,
रुह भी तड़प उठती है।

जज्बातों पर प्रहार क्यों
लोग बार-बार करते हैं।

चोट से मन में टीस उठती है जब
आँखों से आँसू छलक जाते हैं।

घृणा से ना कुछ हासिल हुआ,
फिर भी ये दीवारें खड़ी करते हैं।

प्रेम का एहसास करने वाले
पलटवार कभी ना करते हैं।

नफरत की आग में देखो,
घृणा करने वाले ही जलते हैं।
शिकवे गिले भूलाकर हम ..
शांति का पैगाम लिए चलते हैं
बार-बार जज्बाती चोट खाकेभी
अपने संस्कारों से झुक जाते है।
गुलाब काँटों के संग रहके भी
सुगंध अपना नहीं खोते हैं।
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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"उजाला/उजास"
उजाले की आस लिए
गहन अंधेरे में चल रही थी
दिशा का नहीं ज्ञान था
पथ में अँधेरा विराजमान था


आचानक एक कुटिया दिखा
अंदर से आ रहा..........
दीपक का मद्धिम प्रकाश था
दीये की लौ से......
अंधेरों में भी उजास था

झाँककर देखी......
माता के आँचल में
सो रहा नौनिहाल था
आँखों को दे रहा शकुन था

जेहन में उठ रहे ........
हर सवाल का जवाब था

बाहरी चकाचौंध से
कभी ना होता उजाला
अंतर्मन के सद्ज्ञान से ही
जीवन का उजास है।

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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"कला"
1
कला,विज्ञान
सिक्के के दो पहलू
परिपूरक
2
इंद्र धनुष
आकाश सतरंगी
कला प्रकृति
3
माटी पुतला
ईश्वर कलाकार
जग में खेला
4
ईश प्रदत्त
"मकबूल "की कला
दक्ष थे हस्त
5
मेघों के संग
कलात्मक आकृति
बनके मिटा
6
कला,संस्कृति
हमारी धरोहर
है संजीवनी
7
लेखन कला
अंतर्मन भावना
शब्दों से खिला


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"अंत"
प्रेम का होता नहीं अंत
खामोश हो,बेजूबां हो
चाहे दूर हो या पास हो
दृश्य हो या अदृश्य हो
एहसास है ये अंतरंग


प्रेम का होता नहीं अंत
नफरत की हो दीवार
या जुल्म का हो संहार
शूलों के संग भी खिली अनंत

प्रेम का होता नहीं अंत
प्रदीप्त है मन में ज्वलंत
बिखरी आभा है दिक् दिगंत
एहसास है ज्यूँ लगे संत

प्रेम का होता नहीं अंत
सत्य हो यदि प्रीत की लगन
हो मीरा की भक्ति सी मगन
राधा की दीवानगी सी अगन

प्रेम का होता नहीं अंत
एहसास है ये अंतरंग

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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"आसरा"
हे!प्रभु विनती मेरी स्वीकार करो
तेरी चरणों में ही एक आसरा हो
दुनिया के भीड़ में ना खो जाऊँ
स्वयं को अहंकार से दूर रखुँ।


दीन दुखियों का उपकार करुँ
खुशियों का आह्वान कर सकूँ

मानवता को कायम रख सकूँ
निर्बलों का संबल बन सकूँ

असहाय का ना कभी बोध हो
बैसाखियों के सहारे चल सकूँ

हे!प्रभु विनती मेरी स्वीकार करो
तेरी चरणों को छोड़ ना किसी का आसरा हो।।

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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"वेदना"
लहू के रंग से रंगा है
इसबार वसंत
दुःखों का नहीं है अंत
अश्रु जल से भीग रहा
माँ का आँचल.....।


हे री!पुरवाई........
कैसे लेगी तू अँगडाई,
घर-घर मातम जो छाई

मुँह छुपा के रो रहा
देखो आज आकाश
जल रहा मन में आग

आह!पलाश....
धूमिल पड़ा है तू..
क्यों नहीं दहक रहा
तेरा बाग....
कैसा होगा अबकी फाग

कुछ तो कहो ..ओ !मेघ,
वेदना से तड़प रहा तू
कहाँ गुम हो गया तेरा गर्जन
ना घबरा,अब होगा सिंहनाद
शत्रुओं का होगा विनाश।।

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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"मानवता"
हम भारत देश के वासी
मानवता है पहचान हमारी
संस्कार हमारे है परोपकारी
शांति के हम हैं पुजारी।


तू कैसा है अत्याचारी
पहचान तेरी है गद्दारी
छल,कुबुद्धि के हो व्यापारी
पीछे से करता हमला भारी
दानवता के हो अनुरागी।

माँ भारती के हम हैं पूजारी
सुन ले तू ललकार हमारी
हिम्मत है तो सामने आ
दुम दबाकर तू ना भाग
सीने में तू गोली मार

जब-जब हमने कसमें खाई
छठी का दूध तूझे याद दिलाई
गीदड़ों सी है तेरी चतुराई।

अब फिर से हमने तिलक लगाई
शेर की दहाड़ दे रही होगी सुनाई
सामने होगी बारुदी खेल हमारी

घबराकर ना मैदान छोड़ना
उस दिन तुम ना पीठ दिखाना
संस्कारों से हम झुके हुए थे
मानवता के कारण रुके हुए थे
ना समझो इसे हमारी लाचारी
शेरों की छाती होगी सामने तेरी
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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🙏नमन वीर🙏
😥अश्रुपूरित श्रद्धांजलि😥
माँ भारती का आँचल
आज फिर लहू से
लथपथ हुआ।


मानवता को ताख में रख
आतंकियों ने ऐसा
घृणित कार्य किया।

व्यथित है मन,
दुःखों के कारण
मन में शून्यता का बोध हुआ

ऐ!आतंकियों,धिक्कार है तूझे
दिल नहीं तेरे सीने में
मानवता को भी शर्मसार किया
कैसे क्रूर यह काम किया

ना समझो हम चुप हैं रहने वाले
अब ये चिंगारी बनकर शोला
सीने पे तेरे गाज गिरेगा।
देश के हर कोने से
ऐसा आगाज हुआ।।
🇮🇳नमन वीर🇮🇳

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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"दाग/कलंक"
सच्चाई के पथ पर
चलकर भी.....
लग जाते हैं अक्सर
कलंक का टीका....


कलंकिनी बनकर ....
दूभर हो जाता है जीना
फिर देनी पड़ती है...
अग्नि परीक्षा......

कभी सीता और कभी
चांडाली बनकर...
धोनी पड़ती है..
कलंक का टीका..

इस दुनिया में रहके ही
करनी पड़ेगी तूझे.......
अपने स्वाभिमान की रक्षा

जग का ये दस्तूर है
हे नारी!नारी ही देती
अक्सर तेरे माथे .....
कलंक का टीका.।

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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"लौ
🔥
स्वज्ञान की लौ
अज्ञानता का त्याग
धधकी आग
🔥
मन दीपक
नयन उद्दीपक
प्रीत बनी लौ
🔥
विश्वास की लौ
बनी है प्रीत ज्योति
कभी ना बुझी
🔥
है मद्धिम लौ
पचपन के पार
जीव लाचार
🔥
भोर का तारा
हर दिल सवेरा
जली आशा लौ
🔥
सत्कर्मों की लौ
उद्देश्य परमार्थ
भाव नि:स्वार्थ
🔥
दीपक की लौ
बूढ़ी आँखों की आस
निराशा हाथ
🔥
प्रीत का दीया
अन्तर्मन की ज्योति
आस्था लौ जली
🔥
देश का पुत्र
शहीद"पायलट"
बुझ गई लौ


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"लौ"
क्षणिका
1
मुहाने में फाग,
दहक रहा पलाश
लगी है मन में आग
तेरी यादों के संग
जल रही प्रीत की लौ।।
3
मन के आँगन में,
नेह का दीया है जलाया।
नफरत की आँधी भी
बुझा ना पाया,
जल रही थी ,
विश्वास की लौ।।
3
रक्तिम शाम,
दहक उठा आसमान।
जल रहा था एक दीया
चेहरा था तेरा,
दीये की लौ में,
निहारे नयन
बेजूबां।।


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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माँ शारदे को नमन🙏करते हुए अपने गुरुदेव आ०"ऋतुराज"जी के सम्मान में समर्पित🙏आज के हाइकु🙏
1
माँ सरस्वती
है प्राकट्य पंचमी
ज्ञान की देवी
2
मन भ्रमर
पीतांबरी चूनर
धरा वसन
3
नव आनंद
ऋतुराज वसंत
दिक दिगंत
4
बौराया मन
महका मकरंद
वसंत संग
5
ऋतु वसंत
नूतन किसलय
तरु आलय
6
पलाश सम
ऋतुराज वसंत
दहका मन
7
ऋतु वसंत
मन मस्त मलंग
धरा नर्तन


🙏🌹🙏🌹🙏
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"दहलीज"
1
दुखिया मन
ईश्वर दहलीज
माँगे जतन
2
गृह मर्यादा
दहलीज दायरा
लाज सर्वदा
3
लाँघ के गई
साँसों की दहलीज
चिता पे सोई
4
यादों का तूफां
दहलीज तोड़ता
मन को लूटा
5
नारी सम्मान
दहलीज है लाज
लक्ष्मी स्वरुपा


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"प्रश्न/सवाल"
सेदोका
1
आम बजट
प्रक्रिया है जटिल
सवालों के घेरों में
प्रत्येक वर्ष
खर्च राष्ट्र उत्कर्ष
कुछ मिलते हर्ष
2
एक सवाल
धड़कनों का हाल
किसीने नहीं पूछा
क्या हुई बात
गैरों से क्यों हो आस
दिल मेरा है खास


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल



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"प्रश्न/सवाल"
1
प्रत्येक वर्ष
उभरते हैं प्रश्न
बजट जश्न
2
दिल ने पूछा
धड़कनों का हाल
एक सवाल
3
उठे सवाल
वहम के शिकार
बढ़ी दूरियाँ
4
गिरते अश्क
गालों ने किए प्रश्न
दर्द का जश्न
5
यूँ मदहोश
सवाल व जवाब
दोनों खामोश
6
अहं में चूर
खामोश है सवाल
वक्त हलाल
7
दर्द के गीत
लेखनी का सवाल
कैसा है मीत
8
सूखे हैं अश्क
वक्त की फरियाद
बेजूबां प्रश्न
9
मूल्यों का ह्रास
अन्तराष्ट्रीय मान
स्वयं सवाल
10
है प्रश्न चिन्ह
कठघरे में रिश्ते
विश्वास रोते


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"डोर/पतंग"
1

मन
पतंग
डोरी संग
प्रेम बंधन
विश्वास पवन
चल दूर गगन
2
मैं
देखूँ
गगन
आस नैन
आस्था की डोरी
साहस बटोरी
एक कटी पतंग


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"विज्ञान"
1
देन विज्ञान
रोबोट करे काम
अद्भुत ज्ञान
2
वेद पुराण
दे विज्ञान का ज्ञान
अब प्रमाण
3
सूर्य से पृथ्वी
"हनुमान चालीसा"
वर्णित दूरी
4
"मंगल"यान
विज्ञान का सफर
आगे कदम
5
खोज विज्ञान
सतत् अनुसंधान
है वरदान


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"कागज"
1
"बुल" "बियर"
चढ़ते औ गिरते
कागजी अंक
2
शेयर अंक
नामी-दामी कंपनी
कागजी बिके
3
पंजीकरण
है कागजी प्रक्रिया
जन्म व मृत्यु
4
कागज कश्ती
बरसाती नालों पे
बच्चों की मस्ती
5
प्रीत का रंग
कागज पे बिखरा
फूल सा खिला
6
हवा का झोंका
कागजों सा था रिश्ता
लेकर उड़ा
7
कागज फूल
सुगंध की हो चाह
मिले ना राह
8
शब्दों के फूल
कोरे कागज खिले
काव्य महके
9
प्रेम संदेशा
कोरे कागज पर
लिखके भेजा


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"खिलौना/बालमन"
वर्ण पिरामिड
1
हो
हल
सवाल
बालमन
चाँद का घर
आँचल गगन
खुशियों का चमन
2
है
मन
दर्पण
सुकोमल
रुप सलोना
खुशियों का दोना
दिल नहीं खिलौना


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल



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बालमन"
बालमन में उभरते कुछ
मासूम से सवाल:----
चँदा मामा का घर
है नीला आकाश
जहाँ रात को निकलती
सितारों की बारात
चँदा मामा दूर हैं हमसे
क्यों नहीं है पास ??


बालमन की है उलझन
मन में उठते हैं सवाल
कैसा है ....??
सूरज दादा का घरबार
अपने नन्हे हाथों से
आसमान छूने की बात

दादा-दादी के साथ बैठकर
गप्पें मारते हैं मजेदार
पूछ ही लेते अपने
मासूम से सवाल
दूरदर्शन के अंदर है
कितना छोटा सा संसार
काश!अन्दर जाकर..
संग उनके ...
मिल आता एक बार।
😊😊😊😊😊😊
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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🙏 "पूजा"🙏
वो बचपन के दिन थे खिले
मन में मेरे भाव थे जगे
लेखन का विचार लिए
हाथों नें कलम थामे
मन मे पूजा भाव भरे
गुरुदेव के चरणों में
कलम को अर्पण किये।

कलम पकड़ लिखती रही
मन के उद्गारों को उढ़ेलती रही
लेकिन, जाने क्यों.....
पढ़ती और फाड़ देती
शब्दों की समझ ना थी
भावो को कैसे पिरोती..

एक दिन अनायास...
भाव थे दिल के पास..
वर्णों का भी मिला साथ
लिख डाली कुछ खास..
मन में जागी थी एक आस

नन्हे-नन्हे हाथों से.....
कापी ले पहूँची माँ के पास
इठलाती बोली--
'माँ पढ़ लो ना एक बार
मैंने लिखा है ये आज'
माँ थी खाना पकाने में व्यस्त
हँसकर बोली-----पगली...
जा फिर कभी पढ़ती हूँ..
तूझे भूख लगी होगी...
अभी खाना पका लूँ..

बुझे मन से दौड़ी बापी के पास
बोली--बापी बापी देखो ना..
मैंने लिखा है आज कुछ खास
बापी ने कहा----
मैं तो जरूर पढ़ूँगा....
मेरी बिटिया ने लिखा क्या
है आज.......
पर पहले तो कर लूँ
बही-खाते का हिसाब

भारी कदमों से दीदी के
पास जा पहूँची....
बोली दीदी पढ़ लो ना
मैने लिखा है क्या खास
दीदी थी टेलीविजन
देखने में व्यस्त...
बोली जा अभी ना
करो मुझे तंग
डबडबाई आँखों से
गुरुदेव(रविंद्रनाथ ठाकुर)
की तस्वीर निहारती
मन ही मन कहने लगी
हे गुरुदेव!आप तो देख लो
मैंने लिखा है क्या खास..
आचानक....
फूलों की माला गिर पड़ी...
जिसमें लिखा था कुछ खास
जैसे मुझे मिला था आशीर्वाद
उस दिन के बाद फिर मैंने...
कभी लिखा नहीं कुछ खास
आज साहस बटोर कर फिर से
लिखने लगी मन के भाव
मेरे लिए ये "पूजा के फूल"हैं
अब प्रस्तुत हैं आपके पास.
अर्पण किया था गुरुदेव के
चरणों में पहली बार।
(बापी---पिताजी)
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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"गंणतंत्र दिवस"
🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
पर्व "गणतंत्र दिवस"
मना रहा है भारत वर्ष
दिल्ली का राजपथ
झाँकियों से दमकता रहा


हमारे वीर जवानों के
हौसले देखते ही बनते थे
कदम से कदम मिला
साथ-साथ चल रहे थे

"आजाद हिंद फौज "
कहानी वर्षों पुरानी
वयोवृद्ध सेनानी थे
चल रहे सीना ताने थे
सभी दे रहे सलामी थे

"पीर पराई जानिए"
बापूजी की थी स्तुति
झाँकियों की थी प्रस्तुति

"एकला चलो रे"
कविगुरु की थी वाणी
बापू संग मित्रता थी पूरानी

गाँधीजी का था सपना
स्वच्छता का संदेशा देना
अपना चरखा अपनी तकली
अपनाये धर्म स्वदेशी
सत्य अहिंसा के पूजारी
डांडी यात्रा रंग लायी
सत्याग्रह की लड़ाई
रेल सफर से शुरु हुई
फूलों से सजा 'शांतिदूत'
शांति का संदेशा देता
राजपथ पर मुस्कुरा रहा
घर-घर चल बिजली रानी
भिन्न-भिन्न राज्यों की थी
अपनी-अपनी कहानी
मन मेरा तल्लीन था
समापन का जयघोष हुआ
भाव देशप्रेम से भरा रहा
🇮🇳 वंदे मातरम 🇮🇳
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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26/01/2019
"गणतंत्र दिवस/देश प्रेम"
सेदोका
🇮🇳
राष्ट्रीय पर्व
"गणतंत्र दिवस"
दमका राजपथ
हमारा गर्व
झाँकियों का था वेश
"गाँधीजी"के संदेश
🇮🇳
माता चरण
नफरत दीवार
जात-पात दरार
आज का दौर
देश प्रेम है कहाँ
क्यों हम झूम रहे
🇮🇳 जय हिंद 🇮🇳


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"कलम"
चार दीवारी में बंद मासूम है
चौराहे में भी सन्नाटा है
बच्चों की सिमटती दुनिया है
लेखन शिल्प का घाटा है
कलम को मिला टाटा है


कम्प्यूटर का चढ़ा बुखार है
नाचती अब ऊँगलियाँ है
लेखन का सुधार बेकार है
कलम से छूट रहा नाता है

अपनो के संग दूरी है
रिश्ते भी तंगहाल हैं
आधुनिकता की मजबूरी है
कलम की भी खामोशी है

प्रेम भाव किसके पास है
घर में भी पड़ी दरार है
यह देख मन हैरान है
आज कलम भी बेजुबां है

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"चित्र/तस्वीर"
आसमां के कनवास पर
बादलों को ले संग
प्रीत के रंगों से
तेरी तस्वीर बनाई


मेरी निगाहों में
तेरा अक्स उभर आया
तस्वीर के पीछे से
तेरी मुस्कान नजर आई

तस्वीर ने जो कहा
वो सारी बातें दिल ने सुना
तुम कह ना सके जो कभी
तेरी तस्वीर कह गई

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"प्रवाह"
1
प्रेम प्रवाह
आलाप व विलाप
मन के भाव
2
पुष्प स्वछंद
प्रवाह मकरंद
पवन मंद
3
बेला,चमेली
प्रवाहित खुशबू
महकी धरा
4
सार्थक कर्म
निरंतर प्रवाह
प्राप्त सुफल
5
ओस की बूँदें
तरुवर प्रवाह
शीतल धरा
6
उज्ज्वल चाँद
प्रवाहित चाँदनी
सुंदर निशा
7
निर्झर धार
सरगम प्रवाह
मन झंकार
8
जीवन कश्ती
चली धारा प्रवाह
मौजों की मस्ती
9
सूर्य किरण
त्वरित विकिरण
उर्जा प्रवाह
10
प्रेरणास्रोत
अन्तर्मन प्रवाह
जागा कर्म
11
भक्ति प्रवाह
है प्रेम सुधा रस
जाग्रत चक्र
12
सुख व दु:ख
कजरारे नयन
अश्रु प्रवाह
13
ध्वनि प्रवाह
वायु समानांतर
तरंग मध्य
14
"भावो के मोती"
साहित्यिक प्रवाह
सृजन धार
15
"भावो के मोती"
साहित्यिक सरिता
प्रवाहमान


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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🙏गुरूजनों को नमन🙏
🌹मित्रों का अभिनंदन🌹
समूह के सभी सदस्यों को
मकर संक्रांति की हार्दिक शुभेच्छा
1
पूण्य लालसा
शीत को लाँघकर
संक्रांति स्नान
2
मकर राशि
खिचड़ी की संक्रांति
रवि प्रवेश
3
पूस पार्वण
आहार बहुरंगी
पिठा व पूल्ली
4
प्रयाग स्नान
रहा मन का मैल
पूण्य कामना
5
सच्ची संक्रांति
सुविचारों से स्नान
मन की शुद्धि
6
मन का मैल
यदि धो पाते हम
संक्रांति स्नान
7
आशा की डोरी
संक्रांति की उमंग
उड़ी पतंग
8
दूर गगन
जागा मन तरंग
संग पतंग
9
त्याग कुबुद्धि
महाकुंभ का स्नान
सच्ची है दान
10
सूर्य सा तेज
जग को दे प्रकाश
स्व जलकर
11
तिल का दान
है मकर संक्रांति
मन की शांति
12
सच्ची संक्रांति
बेसहारा को दान
बना संबल
13
सूर्योपासना
महाकुंभ प्रयाग
संक्रांति स्नान


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"शहर"
छोटा सा एक गाँव
प्यारा सा मेरा घर
प्यार की कमी ना थी


शहरी आकर्षण की वशीभूत
मैं शहर की ओर चली
नई जिंदगी, नया सवेरा
लग रहा था खूब भला

गाँव की मैं भोली
भूल भूलैय्या में भूली
करना क्या था मुझको
और क्या मैं कर गई

किसी से मन मिला
दिल उसको दे दिया
जुबान में मिश्री थी घुली
पर प्रीत कहीं ना दिखी

आकाँक्षा मन में लिए
पाने की आस लिए
शहर में थी पड़ी
खुशियाँ थी मेरी अपनी
शहर के शोर में खो गई

शहर की दुनिया
मुझे रास ना आई
औरों की तरह
मुखौटा ना पहन पाई
नाजुक सा दिल था मेरा
टूटकर बिखर गया
समेटकर टुकड़ों को
गाँव की ओर चली
दिल के हर टूकड़े से
एक ही आवाज आई
चल अब घर लौट चलें
"हर चमकती चिज
सोना नहीं होती"।
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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"गीतिका"
शिकायत नहीं गर हमसे तो,
कहने से क्यों घबराते हो।
अक्सर यूँ काम कर जाते हो,
तू क्यों दिल मेरा जलाते हो।


तीर निगाहों से चलाते हो,
जिगर को घायल कर जाते हो।

शिकवा खामोशी से जताते हो,
अक्सर यूँ मुझे सताते हो।

याद हर शाम तुम आते हो,
रातों को निदें चुराते हो।

दिन को यादों में सताते हो,
रात सपनों में आ जाते हो।

दिलों जान से चाहती हूँ मैं,
बार-बार कयों आजमाते हो।
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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"भ्रम"
शकुन का बचपन था
आइसक्रीम के पहाड़ थे
चाकलेट की नदी थी
ख्वाबों की दुनिया में
प्यारा सा भ्रम था


सिंड्रिला व थम्बालीन
की कहानी जुबानी थी
परीयों की दुनिया थी
उम्र की नादानी थी
निश्छल भ्रम में जीती थी

सतरंगी सपने अपने थे
चाँद तारों संग रिश्ते थे
फूलों की बरसात थी
आकाश छूने की चाहत थी
मन को जगाता भ्रम था

नैनों में चमक रही ज्योति थी
बढ़ रही उम्र थी
यथार्थ से हो रही रुबरु थी
नाजुक सा दिल में
हो रहा प्रहार था

वास्तव दुनिया सम्पूर्ण
अलग थी
आहिस्ता-आहिस्ता
टुट रहा भ्रम था।

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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हाइकु
हिंदी भाषण
"स्वामी विवेकानंद"
राष्ट्र गौरव


"हिंदी दिवस"
साहित्य जागरण
आनंदमय

आदर्श भाषा
हिंदी हमारी शान
गरिमामय

मन की भाषा
उभरते जज्बात
हिंदी आधार

हिंदी उदार
विदेशी शिरोधार्य
प्रेम की भाषा

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

"अतिथि"
मध्यम वर्गीय परिवार था
प्रेम ही परिवार की नींव थी
ईमान और सच्चाई से जीते थे
मुश्किलों से ग्रहस्थी चलाते थे


एक दिन अतिथि देव पधारे
पुराने दिनों के मित्र वो ठहरे
साथ-साथ पल थे बिताये
विश्वविद्यालय के सहपाठी थे

सुबह से शाम खातिरदारी हुई
दो दिनों तक घर में रौनक रही
बच्चों की खुशियाँ भरपूर थी
निगाहें पकवान पर टिकी रही
जमकर दावत खूब हुई

भरे मन से विदाई हुई
स्वागत में ना कुछ कमी रही
हाथ जोड़ मित्र ने कहा
मित्र तू बड़ा खुशनसीब है
घर में तेरे साक्षात् लक्ष्मी है

मुखिया के मन में प्रश्न जागा
घर में इतना रौनक कैसे आया
पत्नी से अपने पूछ ही डाला

गृहलक्ष्मी ने अपनी नजरे चुराई
सहमते हुए यह बात बताई
गृहस्थी के सम्मान की खातिर
बेचे उसने कंगन थे
मुँहदिखाई के रश्म में
सासु माँ से मिली निशानी थी
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"आहट"
रात गहराती
हवा सनसनाती
खयालों में तेरे
जाग रही थी
मन में लिए
एक ही चाहत
हो शायद मुलाकात
बस था इंतजार
'तेरे कदमों की आहट'


यादों में तेरे
भीगती रही, नहाती रही
चैन अपना लुटाती रही
साथ मेरे
भीगी थी रात
दिल में थी
एक ही चाहत
ऐ काश!सुन लूँ
'तेरे कदमों की आहट'

स्याह रात नें
ली विदाई
भोर हुई, लालिमा छाई
शर्माई, उषा आई
बूँदें थी ओस की
रात को जो थी
यादों की चाहत में नहाई
लेकिन,
वो घड़ी ना आई
जिसके लिए बेताब थी
सुन सकती काश!
'तेरे कदमों की आहट'

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल



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"तरंग"
1
ध्वनि तरंग
आवृत्ति परिसर
करे नर्तन
2
भूमिकम्पन
पृथ्वी अंत:तरंग
त्रस्त जीवन
3
नभ पटल
प्रकाशित तरंग
नयन दंग
4
मन दबंग
उद्वेलित तरंग
मस्त मलंग
5
चमगादड़
पराश्रव्य तरंगें
है कर्णप्रिय
6
प्रेम तरंग
धड़कनों के संग
जैसे हो जंग


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल



"भावो के मोती"नमन
05/01/2019
"मोह"
हाइकु
1
बुद्धि ने कहा
मोह का बाहुपाश
ना होता काश!
2
"नारद"मोह
नारायण का छल
माया के द्वार
3
मोह से हारा
जगमाया का खेला
मन बेचारा
4
विवेकी मन
मोह,माया से परे
भक्ति में खरे
5
संतान मोह
आजीवन आशक्त
कारण सृष्टि
6
"चिरकुमार"
ब्रह्म ज्ञान से भरे
मोह भी परे


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"नव वर्ष/नव भोर/नया सवेरा"
🙏💐
"भावो के मोती"
प्रवेश नववर्ष
सबका हर्ष
🙏💐
"भावो के मोती"
साहित्य का सितारा
नया सवेरा
🙏💐
आशाऐं जगी
दामन नववर्ष
खुशियाँ मिली
🙏💐
सूरज आया
दूर हुआ अंधेरा
नया सवेरा
🙏💐
शीत के संग
त्योहार नववर्ष
जागा उमंग
🙏💐
वर्ष विदाई
नववर्ष बधाई
सबने पाई
🙏💐
अधूरे ख्वाब
नववर्ष में काश!
पूरी हो आस
🙏💐
खुश मिठाई
स्वागत नववर्ष
मिली बधाई
🙏💐
घर, आँगन
धनधान्य से भरा
ज्यों नववर्ष
🙏💐
ये वसुंधरा
उत्सव नववर्ष
मनाने चली
🙏💐
नशे में युवा
जश्न-ए नववर्ष
झूमते रहे
🙏💐
दु:खी मेमना
नया साल जो आया
कुछ ना खाया


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"नववर्ष"
फिसल रहा है वक्त यहाँ
संग दौड़ रही जिंदगी यहाँ
नहीं किसी को फुर्सत यहाँ
किसी से नहीं मतलब यहाँ


रुसवाई भरी है बातों में
अपनापन नहीं आँखों में
बेरुखी भरी है जज्बातों में
टूट जाते हैं रिश्ते नाजुक हालातों में

शांति का पैगाम लिए
प्रीत प्रेम का सौगात लिए
मुट्ठी में कुछ आस लिए
आओ मिलकर साथ चले

दो कदम मैं चलूँ
दो कदम तुम चलो
गिले शिकवे भूलकर
एक नई राह चलें

मीठी यादों को साथ लिए
पुराने जख्मों को भूलकर
नववर्ष का स्वागत साथ करें

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

💖हाइकु💖
💖
ये मेरा दिल
धक धक धड़का
देश के लिए
💖
तेरे या मेरे
है प्यार भरा दिल
किसके पास
💖
मुझसे खफा
दिल भी है बेवफा
रूठा ना करो
💖
नादान दिल
रुठना व मनाना
मासूम बड़ा
💖
दिल का चोर
खतरो का है खेल
खाली है हाथ
💖
आया लुटेरा
दिल का दरवाजा
कर लो बंद
💖
सुबह शाम
दिल मानता नहीं
करो ना याद
💖
साँकरी बड़ी
राह नहीं है सीधी
दिल की गली


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"धरती"
🌎
प्यासी धरती
आकाश भी है मौन
शुष्क नयन
🌎
दूर क्षितिज
धरती व गगन
कैसा मिलन
🌎
ना हो दोहन
धरती पुकारती
करो जतन
🌎
धरती माता
जीवन प्रदायिनी
रत्न धारिणी
🌎
धरती पुत्र
भारतीय किसान
है अन्नदाता


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"परिवार"
1
खुशी हजार
संयुक्त परिवार
प्यार आधार
2
एक मुखिया
परिवार पहिया
सुखी संसार
3
प्रेम अभाव
बिखरे परिवार
स्वार्थ खातिर
4
वृद्ध लाचार
एकल परिवार
एकाकी मन
5
राष्ट्र निर्माण
परिवार ईकाई
मिल बनाई
6
रक्षा संस्कार
समाज धरोहर
ये परिवार
7
सुख व दु:ख
झेलते परिवार
सभी के साथ
8
मान करते
सदस्य परिवार
एक दूजे का
9
"भावो के मोती"
हमारा परिवार
प्यार अपार


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"किसान दिवस "पर किसान को समर्पित कुछ हाइकु🙏
"कृषक"
##
कर्म बुआई
कृषक हाथ खाली
ऋण कटाई
##
वर्षा की आस
खामोश है आकाश
रोता किसान
##
कर्मों को बोता
किसान खेत सोता
फिर भी रोता
##
सूखे की मार
टूटा कृषक आस
नैन पाषाण


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
(जब भी भोजन करें किसान को याद करें)

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हाइकु :-"निशा"
@
दस्तक रवि
जागो हुआ सवेरा
सिमटी निशा
@
ले अँगड़ाई
नाचती निशा आई
साँझ विदाई
@
ओस की बूँदें
मोती बन चमके
निशा के आँसू
@
सूझे ना रास्ता
मन भी दिशाहारा
अँधेरी रात
@
मन को घेरा
ये रात की कालिमा
द्वंद का डेरा
@
दादी व नानी
रात का इंतजार
किस्सा सुनाती
@
निशा की गोद
झिलमिल आकाश
हँसता चाँद
@
भीगी है रात
सताती तेरी याद
रूठा ना करो
@
गाँव, शहर
प्रकोप शीत लहर
रात कहर
@
पूस की रात
दु:खी हुआ किसान
खेतों में धान
@
पूस की रात
जाना पड़ेगा खेत
"रामुकाका"को
@
पूस की सर्द
ठिठुरती है निशा
गरीबी दर्द
@
रात्रि पहरा
ठिठुरकर बोला
'जागते रहो'


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"साक्षात्कार"

उम्र का अंतिम पड़ाव था
आत्मा संग साक्षात्कार था
मन मेरा नाच रहा था


मेरे कर्मों का कच्चा चिट्ठा
आत्मा ने खोलकर देखा
फिर उदास हो मुझसे बोली
दिया है तूने स्वयं को धोखा

आँकड़े तेरे बता रहे है
योग वियोग मिलकर शून्य हैं
तेरे सामने ही हिसाब हैं

बात कुछ कुछ समझ रही थी
नाकामियों से भरी हुई थी
सर पर हाथ रख सोच रही थी

मैंने कैसा यह काम किया
स्वयं को ही धोखा दिया
धूमिल पड़ा था अक्स मेरा

आत्मा मुझसे कह रही थी
किया तूने अपराध है
दंड की तू हकदार है
साक्षात्कार में असफल रही
भारी कदमों से लौट आई
टूटकर बिखर ही गई
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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"समझौता"
जीवन एक समझौता है
कुछ खोना और कुछ पाना है
कभी खुशियों का मेला
कभी गमों का दरिया है


जीवन एक समझौता है
कभी तपती धूप तो
कभी मिलती छाया है
इन राहों में हमें चलना है

जीवन एक समझौता है
कुछ पल को हँसना
कुछ पल को रोना है
हर एक पल को जीना है

जीवन एक समझौता है
मिलते फूल यहाँ तो
काँटे भी हजार हैं
यही तो संसार है
जीवन एक समझौता है

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल


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"कर्तव्य/फर्ज"
हूँ मैं गृहिणी ,पिया की संगिनी
सुबह से शाम
करती हर काम
आये ना कभी
कोई व्यवधान
मन्द मन्द मुस्काते
बहु का फर्ज अदा करती


हूँ मैं गृहिणी, पिया की संगिनी
ममता का बीजारोपण कर
एक माली की तरह
अपने परिवार को
कर्मों से सिंचती
अपनी मृदुल वाणी से
माँ का फर्ज अदा करती

हूँ मैं गृहिणी, पिया की संगिनी
घर आँगन में खिले
हर फूल की
रखवाली करती
अपने पवित्र
आचरण से
माँ स्वरुपा सासु माँ का
फर्ज अदा करती

हूँ मैं गृहिणी, पिया की संगिनी
धार्मिकता का लावण्य लिए
बगिया में खिले
नन्ही-नन्हीं कलियों
को देख देख
प्रभु का गुणगान करती
गरिमा प्रतिष्ठा के साथ
एक दादी का फर्ज अदा करती

हूँ मैं गृहिणी, पिया की संगिनी
मान सम्मान मर्यादा और
संस्कारों का श्रृंगार किए
भारतीय नारी का फर्ज अदा करती

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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वर्ण पिरामिड
1
है
भव
सागर
अन्तहीन
जीवन नैय्या
पतवार बिन
दिशाहीन खेवैय्या
2
ये
कश्ती
तैरती
मझधार
तूफां झेलती
विपरीत धार
सहारा पतवार


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"प्रेरणा"

मेरी कलम की है सच्ची कहानी
कह रही मैं अपनी ही जुबानी
बात नहीं है ये बरसों पुरानी

फरिश्ता सा कोई आया था
लेखन शैली दिल में गहराया था
लिखने की मेरी चाहत पुरानी थी

मन के भाव मेरे अपने थे
कोने में जाग रहे सपने थे
सच सामने ही खड़े थे

प्रेरणा मुझे वो दे गया
एक पथ नया दिखा गया
हाथ में कलम पकड़ा गया

हवा का एक झोंका था
अभिमान ने रास्ता रोका था
फिर मिला आघात था

देख यह मैं घबरा गई
संघर्षों से भी टकरा गई
राह अकेली चल पड़ी
मुझे राह अकेला छोड़ गया
पथ दिखा बादलों में छुप गया
मन में यह कसक रह गई
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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"चंचल"
😊
चंचल मृग
कस्तूरी ढूँढे वन
बौराया मन
😊
मृगनयनी
चंचल कौमुदिनी
मन मोहिनी
😊
पिया की याद
चंचल चितवन
सताती रात
😊
चंचल नैना
संभल के रहना
लूट ले चैना


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"सादगी"
देखकर तेरी सादगी
दंग मेरा ये दिल हुआ
किस्सा वही पुराना हुआ
मेरा कहना ही ना माना
और दिल ये दिवाना हुआ
फिर देखता जमाना रहा


जब हम मिले थे
तेरी सादगी को
तिरछी नजरों ने देखा था
मोती से झलके थे
ये तो वक्त का तकाजा था
ना तुम कुछ कह सके
ना मैं कुछ कह सकी
लब दोनों के सिले थे

सादगी तेरी भूलाई ना जाती
याद आती जब रात गहराती
बातें तेरी चाँद तारों संग होती
एक कसक सी उठती
फिर मदहोशी छा जाती
कभी तो कह देते
#तेरी याद सताती है #

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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" साया"
रात का सन्नाटा था
खयालों में खोई थी
मन के झरोखे से
अक्स एक उभर आया था

ले रही अँगडाई थी
देख उसे मैं घबराई थी
दहशत से आँखें बंद हुई
कानों ने कुछ बात सुनी

मुझमें समाया मेरा साया था
उसमें दिखा मेरा चेहरा था
ना जाने क्यूँ मुझसे रुठा था
रुह से आज वह टूटा था

मान अभिमान की बातें हुईं
खुद की ना कोई पहचान बनी
दुनिया की रीत में खोई रही
पहचान अपनी ही भूल गई

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"दीदार"
तेरी चाहतों ने दिल पर मेरे
तेरा ही नाम लिख दिया
धड़कनों ने भी ये पैगाम 
सरेआम बाजार कर दिया


दिल 💛की गलियों में
मुझे बदनाम कर दिया

इन हालातों ने आँसुओं को
मेहरबान कर दिया

होंठों ने मुस्कानों में
गमों का नाम लिख दिया

मेरी नीन्दों को चुराकर
तूने कत्लेआम कर दिया

महफ़िल की शमां-ए-श़ाम
को भी तेरे नाम कर दिया
जिन्दगी की नज़्मों को मैंने
यूँ ही बर्बाद कर दिया
जलते चाँद में मैंने ऐ ख़ुदा
रातों को तेरा दीदार कर लिया
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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"न्याय"
हाइकु
**
पैसों का खेला
झूठे का बोलबाला
न्याय खोखला
**
न्याय ,अन्याय
यौवन दहलीज
माने ना दिल
**
झूठ की जीत
कठघरे में न्याय
रोता है सत्य
**
सत्य की लूट
न्यायमूर्ति समक्ष
दामन झूठ
**
झूठ के साथ
रखते गीता हाथ
न्याय लाचार
**
रिश्तों से न्याय
करबद्ध प्रणाम
दुश्चिंता जाय


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल




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"अनुशासन"
विद्यालय की थी जो सीढ़ियाँ
अनुशासन का पाठ पढ़ती पीढियाँ
फिर भी करती थी शैतानियाँ
हम बच्चों की थी नादानियाँ


कक्षा में प्रश्नोत्तर की घड़ी
गुरुजी की पड़ती थी छड़ी
आदेश पालन में डटी
धूप में भी रहती खड़ी

गुरुजी का सम्मान किया
अनुशासन का पाठ लिया
बड़े बुजुर्गो ने भी साथ दिया
नहीं था किसी को गिला

अब तो बहुत कुछ बदल गया
कुछ-कुछ कारणों से
शिक्षकों के हाथों ने
छड़ी का साथ छोड़ दिया
अनुशासन ने भी मुंह फेर लिया

मानते नहीं विद्यार्थी दंड
बनते जा रहे हैं उदण्ड
व्यवस्था बिगाड़ रहे पाखण्ड
शिक्षा को कर रहे खण्ड-खण्ड

बच्चे तमाशा देख रहे
एक के कारण
सौ-सौ बच्चे बिगड़ रहे
विवेक शून्य से हो रहे
बड़े होकर
माता-पिता से ही झगड़ रहे
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल


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" दर्पण"
नैनों के दर्पण में देखा
तेरा ही प्रतिरूप था
फूलों की मुस्कान थी
जीवन की पहचान थी


उम्र के दर्पण में देखा
सवेरा कहीं गुम था
ढलता हुआ रवि था
साँझ की दस्तक थी

कर्मों के दर्पण में देखा
एक पंख कटा परिंदा था
कोरा सा कैनवस था
रंग बिखरे पड़े हुए थे

मन के दर्पण में देखा
एक टिमटिमाता तारा था
चाँद की शीतल चाँदनी थी
गुमशुम सी रात थी

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल


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"उपहार"
चुटकी भर सिंदूर का
दिया तूने उपहार पिया
झिलमिलाता आँगन मिला
दो वदन एक जान हुआ


बगिया में एक फूल खिला
जीवन मेरा महक उठा
मिलन का प्रतीक उपहार मिला
मन से यह स्वीकार हुआ

रुनझुन बजती पाजेबों से
घर आँगन चहक उठा
ईश्वर का वरदान मिला
मेरा मन भाव विभोर हुआ

नन्हीं परि पुकारती जब माँ मुझे
सुंदर यह संसार लगा
मन मयूर सा नाच उठा
सपना मेरा साकार हुआ

स्वयं को ढूंढती उस चेहरे पर
प्यारा सा एहसास जगा
मुझे मेरा बचपन उपहार मिला
मन मेरा चंचल हुआ

मेहनत उसकी रंग लाई
झूमती हुई खुशियां आई
सफलता जब हासिल हुआ
उपहार स्वरूप ताज मिला
जीवन से नहीं कोई गिला
नारी जीवन परिपूर्ण हुआ
जन्म मेरा सार्थक हुआ
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल


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"आत्मा"
दुनिया की भीड़ में
खो जाती हूँ जब भी
मन के कोने से
पुकारती है आत्मा


देख इस जगत में
इंसानों की हैवानियत
मन के सागर में
उफनती है आत्मा

गैरों की जुबान से
सुन मिठे दो बोल
मन के आँगन में
झूमती है आत्मा

देखकर अपनों के
बदलते रूप को
अन्तर्मन को
उद्वेलित करती है आत्मा

किसी बेबस की
बनती जब बैसाखियां
मन के आकाश में
चमकती है आत्मा

इस जीवन सफर में
सुकर्मों से ही महकती
है आत्मा
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल


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"प्रेम"
श्रद्धा अराधना और सम्मान
मन की ये भावनायें
प्रेम के उच्च स्वरुप हैं


पाने की कुछ चाहत नहीं
और ना ही खोने का डर
मिलेगा मुझे जो मेरा नसीब है

कभी था जो अजनबी
लगते अब वही अपने
किस्मत से नहीं फकीर हैं

आजादी की तमन्ना
हर दिल अजीज है
फिर भी चाहती वही
जैसी तेरी चाहत है

जिद पर अड़ गई कभी तो
ना समझो इसे तकरार है
ये तो प्यारा सा अभिमान है

जिस राह मिले हो तुम
उन राहों के हमसफ़र हैं
फिर भी पूछते हो
"हम तुम्हारे कौन है"
मन अर्पण चरणों में तेरे
भावना यह बारम्बार है
यह प्रेम नहीं तो क्या है
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल



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" नसीब "
बड़े नसीब से मिले थे हम
पल ठहर गया था यों
राहें रुक गई हो ज्यों
हम गुम हो गये थे क्यों


बड़े नसीब से मिले थे हम
लफ्ज़ सीले थे यों
जज़्बात थम से गए हो ज्यों
नज़रें झुकी हुई थी क्यों

बड़े नसीब से मिले थे हम
दिल धड़कता था यों
बादल गरजते हैं ज्यों
कदम बहके से थे क्यों

बड़े नसीब से मिले थे हम
सांसें महकी थी यों
बेला महकती है ज्यों
मन मिले थे क्यों

बड़े नसीब से मिले थे हम
दिल रौशन हुआ था यों
शमां जलते हैं ज्यों
चांद हंसा था क्यों

बड़े नसीब से मिले थे हम
हम भीगे थे यों
पत्ते ओस से नहाये हो ज्यों
फूहार सी चाहत जगी थी क्यों
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल


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विषय:- "ज्योति"
हाइकु
💥
ज्ञान की ज्योति
एक नया सवेरा 
दूर अंधेरा
💥
कृष्ण दर्शन
अद्भुत दिव्य ज्योति
है आकर्षण
💥
दीपों से ज्योति
दीपावली की रात्रि
जगमगाती
💥
अखंड ज्योति
शहीदों की निशानी
ममता रोती
💥
ज्ञान की ज्योति
अज्ञानता को धोती
बनते मोती
💥
प्रेम है ज्योति
मन की अनुभूति
ईश विभूति
💥
आस है ज्योति
सफलता चूमती
खुशी नाचती
💥
उल्का की वृष्टि
ज्योतिर्मय आकाश
अद्भुत सृष्टि
💥
सूर्य की ज्योति
अनुपम है कृति
ईश्वर सृष्टि
💥
देव दीवाली
मनाते ज्योति पर्व
गंगा का गर्व


स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)पश्चिम बंगाल


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"क्षण"
चल उस गगन को चले
हर क्षण अपने सपनों को
जी लें


चल उस गगन .........
जहाँ तन्हाइयां हो डरे
हर क्षण खुशियों से भरे

चल उस गगन .............
ऐसे एक पलकों तले
हर क्षण प्रीत नैनो में बसे

चल उस गगन ...............
एक दूजे के लफ़्ज़ हो सिले
हर क्षण मन में गीत बजे

चल उस गगन .................
गमों को भूलकर ऐसे जीये
हर क्षण यादगार लम्हे बने

चल उस गगन ..............
एक ऐसे आशियाना तले
कुछ क्षण तो मुस्कुरा के जी ले
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल



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"दस्तक "
जल रहा चाँद गगन में
मन भीग रहा चाँदनी में
कहाँ से आ रही ये आहट
या है पत्तों की सरसराहट
कैसी है ये दस्तक


गुम थी सुनहरी यादों में
खोयी थी कहीं खयालों में
कहाँ से आ रही ये आहट
या है हवा की सनसनाहट
कैसी है ये दस्तक

ख्वाब सजते रहे सपनों में
नींदे सताती रही पलकों में
कहाँ से आ रही ये आहट
या है मेढकों की टरटराहट
कैसी है ये दस्तक

तलाशती रही हस्त लकीरों में
ढूँढती रही दर व दीवारों में
कहाँ से आ रही ये आहट
या झिंगुरो की झनझनाहट
कैसी है ये दस्तक

रात बीती इंतजार में
हो रही क्यों ये घबराहट
करीब आ रही कदमों की आहट
किसने दी दिल पे मेरे दस्तक

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल



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शरद पूर्णिमा की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ 🌹🌹
वर्ण पिरामिड
" दस्तक "
है
रात
चाँदनी
सुकामिनी
मनमोहिनी
दस्तक यामिनी
शरद सुहावनी


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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हाइकु

"भावों के मोती "
अनूठा परिवार
प्यारा संसार

"भावों के मोती "
स्वर्णिम पथ ज्योति
मन की शक्ति

"भावों के मोती "
सपनों को सजाती
दिल चुराती

मन सागर
भाव हैं लहराते
मोती ढूँढते

शब्दों के मोती
रचना को सजाते
भाव पिरोते

भाव विभोर
खुशियाँ सराबोर
भिगते कोर


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल




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वर्ण पिरामिड

है
प्रीति
सुनीति 
अनुभूति
"भावों के मोती"
सुनहरी ज्योति
अन्तर्मन की शक्ति


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल





पिरामिड
1
ये
पाँव
नाचते
धिरकते
ताल मिलाते
घुंघरू बजते
धुन में रम जाते


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल




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" दुर्गा नवरुपा"
🙏
माँ शैलपुत्री
सर्वोत्तम शिखर
दिव्य चेतना
🙏
ब्रह्मचारिणी
सर्वव्यापी चेतना
कौमार्यावस्था
3🙏
माँ चन्द्रघंटा
है शक्ति प्रदायिणी
एकाग्रचित्त
🙏
सर्वोच्च ज्ञान
प्रज्ञा बुद्धि कूष्माण्डा
माँ उर्जावान
5🙏
स्कन्दतत्व माँ
व्यवहारिक ज्ञान
पंचम रुपा
6🙏
कात्यायनी माँ
सृष्टि की सृजनता
गुप्त रहस्य
7🙏
कालरात्रि माँ
ज्ञान वैराग प्राप्ति
है उग्ररुपा
8🙏
माँ महागौरी
अलौकिक सौन्दर्य
प्रकाशवान
9🙏
सिद्धिदात्रि माँ
परिपूर्ण क्षमता
अद्भुत सिद्धि


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल


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" माँ/ दुर्गा "
आओ सखी आरती उतारे आज
घर घर आई है दुर्गा माँ
उलुक ध्वनी और है शंख नाद


आओ सखी आरती उतारे आज
शक्ति से भरी है धरा
हवा भी है हरश्रृंगार से महका

आओ सखी आरती उतारे आज
डगर डगर खिले हैं फूल काश
तालाब भी हैं कमल से भरा

आओ सखी आरती उतारे आज
ढोल नगाड़े भी बजने लगे
दशों दिशायें करते जयगान

आओ सखी आरती उतारे आज
देवताओं ने किये शक्ति का आह्वान
स्वर्ग से धरा पर आई "दुर्गा माँ "

आओ सखी आरती उतारे आज
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल


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वर्ण पिरामिड
1
माँ
शक्ति
स्वरूपा
अपरुपा
करुणामयी
दुर्गति नाशिनी
असुर संहारिणी


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल


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********डगर********
दो डगर चलना आसान नहीं होता
जिंदगी की दो राहों में
चलूँ एक डगर तो एक
थम जाती है


दो डगर चलना आसान नहीं होता
जिन्दगी के भागमभाग में
चलते अपनों के संग
कुछ सपने टूट जाते हैं

दो डगर चलना आसान नहीं होता
कर्तव्यों के मेले में
खो जाऊँ तो
कुछ यादें छूट जाती है

दो डगर चलना आसान नहीं होता
खुशियों को लुटाते
अक्सर गमों के प्याले ही
मिल जाते हैं

दो डगर चलना आसान नहीं होता
इस अनजानी राहों में
चलते चलते
कुछ मनमीत बन जाते हैं

दो डगर चलना आसान नहीं होता
जी लूँ खुद को तो
जिन्दगी रुठ जाती है
दो डगर चलना आसान नहीं होता
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल



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"इंतज़ार "
हाइकु
♥️
बेबस खड़ी
इंतजार की घड़ी 
तपस्या बड़ी
♥️
प्रेम की आशा
मन में इंतजार
मिली निराशा
♥️
प्यासे नयन
चाहत इंतजार
है ऐतबार
♥️
माँ दुर्गा आई
दिन का इंतज़ार
खुशियाँ लाई
♥️
विद्यार्थी शिक्षा
भविष्य की परीक्षा
फल प्रतीक्षा
♥️
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल


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" माटी"
माटी तेरी महिमा अद्भुत
खुशबू से महकाती हो


जगत् की सारी सृष्टि
अपने आँचल में पालती हो

लाल काली मटमैली माटी
जीवन के रंगों को दर्शाती हो

"वीरभूम" की लाल माटी
कहानी रविन्द्र की बताती हो

विश्व कवि के गीतों को
कण कण से सुनाती हो

लाल रंगों में रंगकर
महिमा "बाउल"की बताती हो
विश्व के कोने कोने में
"रविन्द्र संगीत "महकाती हो
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
नोट:: यह "रविन्द्र नाथ टैगोर " द्वारा स्थापित "शान्तिनिकेतन विश्वविद्यालय " का एक दृश्य है ( सोनार झूरी)



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🤹‍♀️"पल/लमहें"🤹‍♀️
तेरी यादों को लम्हा लम्हा जीती रही
ख्वाहिशें मेरी पल पल सिमटती रही
तेरे संग खुशियों को ढूँढती रही
गमों की परछाई मुझे मिलती रही


नैय्या मेरी बीचमझधार जूझती रही
साहिल से टकराकर वो टूटती रही

यादें तेरी मुझे पल पल सताती रही
धड़कन मेरी बेसुध गुनगुनाती रही

ये मस्तानी शाम तुझे बुलाती रही
तेरा ही नाम लेकर पुकारती रही

रातों को सितारों संग बातें होती रही
अंधेरों में भी रौशनी मिलती रही

सूनी सूनी रातों को सपने सजाती रही
बुझी बुझी सी पलकें निन्दें चुराती रही
सांसे मेरी मुझसे ही रुठती रही
खुद को खुद में ही तलाशती रही
स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला


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"आदर्श "
हाइकु
1
आदर्श नारी
रखे मर्यादा मान
नहीं बेचारी
2
आदर्श "राम"
पत्नी का परित्याग
प्रजा का मान
3
आदर्श पथ
मुश्किल है सफर
चलना काम
4
मान सम्मान
आदर्श परिवार
महत्वाकांक्षी
5
आदर्श राष्ट्र
सु सामाजिक स्तर
उच्च विचार


6
आदर्श ग्राम
स्वच्छता अभियान
देश की शान

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला




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"दीपक "
एक दीप जलाया मैंने
मेरे मन में तेरे नाम
बूझने ना दिया अबतक
निहारती रही सुबह शाम


इंतज़ार में बैठी हूँ तेरी
अपनी साँसों को थाम

चमकेगा ये दीया
तेरे आने के बाद

फिर रौशन होगी शमाॅ
हर शाम बस तेरे नाम

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला



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"खामोशी"
1
खामोशी टूटी
सुन मधुर बोली
दुनिया डोली
2
झुकी निगाहें
खामोश शरारतें
क्षमा माँगते
3
मन की बोली
गहरी थी खामोशी
नैनो ने खोली
4
खामोश चाँद
अमावस की रात
सताती याद
5
शब्दों के तीर
खामोश है जुबान
घायल दिल


स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला




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"यादें "
यादें तेरी आये आकर
मुझे सताये
ये जरुरी तो नहीं


यादें तेरी आयेआकर
फूलों सा महकाये
ये जरुरी तो नही

यादें तेरी आये आकर
खुशबू संग मन छू जाये
ये जरुरी तो नहीं

यादें तेरी आयेआकर
काँटों सी चुभन दे जाये
ये जरुरी तो नहीं

यादें तेरी आये आकर
चाँदनी ही बरसाए
ये जरुरी तो नहीं

यादें तेरी आये आकर
शमा रौशन कर जाये
ये जरुरी तो नहीं
यादें तेरी आये आकर
गमों के प्याले दे जाये
ये जरुरी तो नहीं
यादें तेरी आये आकर
आशाओं को रुलाये
ये जरुरी तो नहीं
यादें तेरी आये आकर
अमृत सुधा बरसाए
ये जरुरी तो नहीं
यादें तेरी आये आकर
जीवन राग ही गाये
ये जरुरी तो नहीं
यादें तेरी आये आकर
भँवरा सा गुनगुनाये
ये जरुरी तो नहीं
यादें तेरी आये आकर
पल पल यूँ तड़पाये
ये जरुरी तो नहीं
यादें तेरी आये आकर
सपनों को सजाये
ये जरुरी तो नहीं
यादें तेरी आये आकर
रातों को जगाये
ये जरुरी तो नहीं
यादें तेरी आये आकर
रुह में समाये
ये जरुरी तो नहीं
स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला



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" कल्पना "
इंसानों की कल्पना में खोई
हकीकत में निराशा मिली है
आशाओं के कल्पना में खोई 
हकीकत में भाग्य मिला है


ईमान की कल्पना में खोई
हकीकत में बेईमानी मिली है

राहत की कल्पना में खोई
हकीकत में बेचैनी मिली है

मुस्कुराने की कल्पना में खोई
हकीकत में रुसवाई मिली है

कल्पनाओं के समंदर मे खोई
हकीकत में रेतों का सागर मिला है

खुशबू की कल्पना में खोई
हकीकत में काँटे मिले हैं
सहिष्णुता की कल्पना में खोई
हकीकत में स्वार्थान्धता मिली है
सुख की कल्पना में खोई
हकीकत में लाचारी मिली है
भविष्य की कल्पना में खोई
हकीकत में वर्तमान मिला है
आसमानों की कल्पना में खोई
हकीकत में जमीन मिली है
सपनों की कल्पना में खोई
हकीकत में कर्म मिले हैं
अप्रकाशित एवं स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला



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""तेरी यादें """
बदल गई जिन्दगी भी मेरी
जब से मेरी जिंदगी में आया है तू
ढूँढती है निगाहें तुझे हर घड़ी 
जब से आँखों में समाया है तू


महफिल भी अब विराना लगे
पल पल यादों में सताया है तू

आसमानों में लिख दूँ नाम तेरा
सितारों में भी अब छाया है तू

याद मेरी भी आयी हो तुझको कभी
ये बात मुझको नहीं बताया है तू

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला



ऐ जिन्दगी! रुप कितने दिखा रही है तू
मुझसे रुठ रही है या कुछ बता रही है तू
ऐ जिन्दगी! नादानियाॅ कम नहीं है मेरी
ना चाहते हुए भी हैरानियाॅ समझा रही है तू


ऐ जिन्दगी! खेलकर मुझसे आँख मिचोली
छुप छुप कर कौन सा गीत गा रही है तू

ऐ जिन्दगी! अनसुलझी पहेलियों में
मुझको क्यों उलझा रही है तू

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला




"र्चाँद"
मानव तू भी सीख ले
चाँद सा जीवन जी ले
चाँद के हैं कितने रूप
जीवन के भी ऐसे रुप 
दूज तक है बचपन तेरा
रुप इसका सुन्दर सलोना
मस्ती भरा जीवन इसका
कुछ पल का है खेलना
फिर आँचल में छुप जाना
है चौथ का जो चन्द्रमा
सीधी नजरों से ना देखना
कलंक लगेगी तूझको वरना
यौवन की दहलीज जब आई
अर्द्ध चन्द्र को पार कर आई
पूर्णता मिला जब चाँद को
पूर्णिमा का चाँद बन चाँदनी बिखराई
मंजिल अब है अमावस तक जाना
चाँद को है अंधेरे में खो जाना
लुप्त होकर अपना यह जीवन
मृत्यु को है अपनाता
नूतन जन्म लेकर फिर आता
नव जीवन का संचार है देता



स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला




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फिसल रहा है वक्त यहाँ
संग दौड़ रही जिंदगी यहाँ
नहीं किसी को फुर्सत यहाँ
किसी से नहीं मतलब यहाँ

रुसवाई भरी है बातों में
अपनापन नहीं आँखों में
बेरुखी भरी है जज्बातों में
टूट जाते हैं रिश्ते नाजुक हालातों में

शांति का पैगाम लिए
प्रीत प्रेम का सौगात लिए
मुट्ठी में कुछ आस लिए
आओ मिलकर साथ चले

दो कदम मैं चलूँ
दो कदम तुम चलो
गिले शिकवे भूलकर
एक नई राह चलें

मीठी यादों को साथ लिए
पुराने जख्मों को भूलकर
नववर्ष का स्वागत मिल कर करें
स्वरचित पूर्णिमा साह


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मातृभूमि की है यह पुकार
सौदेबाजी ना करने की गुहार

इस देश की भूमि को
शहीदों ने लहू से सिंचा हैं
उनके लहू को तुम सुनों
होने ना देना बेकार कभी

हाथ में लिए जान की बाजी
सीमा पर डटे हैं प्रहरी
जो करोगे उनसे सौदेबाजी
होगी तेरी ही बर्बादी

हमको मिली है आजादी
वीरों ने दी है अपनी कुर्बानी
मत करना उनसे गद्दारी
कि कुर्बानी से ही सौदेबाजी

तिरंगा है हम सबका अभिमान
कभी ना इसको झुकने देना
रक्षा इसकी है तेरा ईमान
सबसे बड़ा धर्म है देश का मान

करे सौदा अगर कोई बेईमान
करना वहीं तुम काम तमाम
कभी ना करना उनको माफ
फिर करना स्व अभिमान

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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धक धक धड़का
देश के लिए
💖
तेरे या मेरे
है प्यार भरा दिल
किसके पास
💖
मुझसे खफा
दिल भी है बेवफा
रूठा ना करो
💖
नादान दिल
रुठना व मनाना
मासूम बड़ा
💖
दिल का चोर
खतरो का है खेल
खाली है हाथ
💖
आया लुटेरा
दिल का दरवाजा
कर लो बंद
💖
सुबह शाम
दिल मानता नहीं
करो ना याद
💖
साँकरी बड़ी
राह नहीं है सीधी
दिल की गली

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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"धरती"
लघु कविता

मैं धरती जगत जननी
है सृष्टि मुझसे
सीने में अपने
भार सहती

मैं धरती जगत जननी
धुरी में नाचती
रिश्तों का संतुलन
कभी ना खोती

मैं धरती जगत जननी
दिन और रात
हूँ गतिमान
समय का मोल
बड़ा अनमोल
बखूबी समझती

मैं धरती जगत जननी
आकर्षण है मुझमें
सूर्य की किरणों से
हूँ उर्जावान

मैं धरती जगत जननी
गर्भ में मेरी
है रत्नों की खान
परिधि में समृद्धि
मैं धरती जगत जननी

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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हाइकु
1
खुशी हजार
संयुक्त परिवार
प्यार आधार
2
एक मुखिया
परिवार पहिया
सुखी संसार
3
प्रेम अभाव
बिखरे परिवार
स्वार्थ खातिर
4
वृद्ध लाचार
एकल परिवार
एकाकी मन
5
राष्ट्र निर्माण
परिवार ईकाई
मिल बनाई
6
रक्षा संस्कार 
समाज धरोहर
ये परिवार
7
सुख व दु:ख
झेलते परिवार
सभी के साथ
8
मान करते
सदस्य परिवार
एक दूजे का
9
"भावो के मोती"
हमारा परिवार
प्यार अपार

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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*जिजीविषा *
जिजीविषा सपनों को देती बहुआयाम

दुःखों में भी सपने दिखाती हजार 
अपाहिजों को भी चलना सिखलाती
देती अपने हाथों को थाम 
चंचलता की सहेली बनती
मस्त मगन हो झूमती रंगीन शाम 
हवाई किला भी बनवाती
जीने के हैं इनसे
अपने अपने अंदाज़ 

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला
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सागर सी है ये दुनिया 
जीवन है सरिता की धारा 
जीवन के राहों से रेत मिट्टी 
समेटते बटोरते
सागर तक है जाना
सागर से मिलकर
विलुप्त हुई नदियाँ 
नदियों के उफान को
जीवों के अहंकार को
गहराइयों में विलीन कर
सागर करता उच्छास
जैसे हो परिहास 
भाटाओं में कभी सिमटता
दुःखों को दर्शाता
बाहर जब शांत दिखता
गहराइयों में मोती बनाता
तटों तक आता रेत बहा ले जाता 
रत्नों को फिर तटों पर बिखराता
सागर देता बहूमूल्य नज़राना 

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला
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*रंग *
सबको मिलता कोरा जीवन 

इनमें रंग भरते संसार 
सात रंगों की है दुनिया 
रंग मिलकर बनते रंग हजार 
धरती के आँगन में देखो
कुदरत ने दिया रंगों का भंडार 
प्रकृति ओढ़े सतरंगी चादर
बहते जब वसंती बयार
हरी धरती हर्षित जीवन
सावन जब गाता मल्हार
सुनहरी धूप तपता जीवन 
बनते कुंदन पड़ते जब वार
खुशियों के रंग से रंगीन हुए
तो बजते दिल के तार तार 
दुःखों से गमगीन हुआ मन
तो गिरते अश्रु के धार 
धवल चाँदनी मन्द मन्द मुस्काती
सपने होते जब साकार
कोरा जीवन रंगों से सजकर
जाना है प्रभु के द्वार 

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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साँझ को रवि लेता विश्राम 
घर लौटता कर पूरा काम
घर घर बजते शंख नाद
झिलमिल करते गंगा घाट 
---------------------------------
सूर्य की आभा हुई सिन्दूरी 
दिन की कहानी हुई पूरी 
रात और दिन की है मिलन बेला 
लाती रोज रोज अनुपम मेला

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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ओढ़ ली धरती हरी चुनरिया
सावन रोता मन बावरिया

पुकारता मन तूझे ओ साँवरिया 
दे दो संदेशा ओ कारी बदरिया 

आ जाओ पिया भेजी है पतिया 
विरह गीत गाती झनकती पायलिया 

रात सताती तेरी ही बतियां 
अगन लगाती चँदा की चँदनिया

रात जागती ना थकती अँखियां 
देख देख हँसती सारी सखियाँ 

भर दो सजन प्रेम की गगरिया 
महके जीवन बहके रतिया

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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पलकें मेरी आज भी बिछी है 
तेरे आने के इंतजार में 
छोड़ गये थे जिस दिन
मुझे तड़पता मधुमास में 
सहमी सी शरमाई सी
देखी थी तुम्हें 
तेरी वही छवि बसती है
दिल के कोने कोने में 
बेला की महक भर देती मुझे 
आज भी मदहोशी के आलम में 
महसूस करती तेरी छुअन आज भी 
बिखरे गजरे के फूलों में 
शर्मो हया से सिकुड़कर
खो जाती हूँ आज भी
तेरे बाजूओं के घेरे में 
सम्पूर्ण हुई थी उस दिन मैं 
तेरे प्यार की रंगत में 
तेरे लहू की कुछ बूँदें 
छूट गयी थी मेरे अंशों में 
तेरे अंशों को पालती रही मैं 
चाहतों के सपनों में 
अपने लहू के रंग से 
लाल हुए थे तुम 
सरहद की सीमा में 
आये थे मुझसे मिलने 
लिपटकर तिरंगे में 
अब मासूम निगाहें ढूंढती तूझे 
कैसे बसा दूँ तेरी छवि 
उन नन्ही सी पलकों में 
है पूछती तेरा पता
अतृप्त सी निगाहों से 
बेबसी अपनी मैं बयाॅ करती
झूकी झूकी नजरों से 
बता दूँगी तेरा ठिकाना 
है आसमान में 
ढूँढेगी तूझे तेरी ही निशानी
बादलों की लहरों में। ।

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

कर जयगान हिंद की सेना का
उनक
े त्याग और बलिदान का
माँ के वीर सपूत हैं 
शत्रु के यमदूत हैं 
आसमान के तारें है 
हिन्दुस्तान के दुलारे हैं 
अश्वों सी शक्ति है 
दिल में वतन की भक्ति है
है तपती रेत या ठंड की कहर
सरहद की सीमा पर तत्पर हैं 
देश के अवतार हैं 
वतन के लिए जान भी कुरबान है 
हिन्द की सेना हमारी शान है
🇮🇳 जय हिंद 🇮🇳
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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**सवेरा **
*******************

नयी शुरुआत लेकर आया
नया सवेरा 
उमंगें लेकर आया 
आशाओं का मेला
उड़ा परिन्दा आसमान में 
छोड़ा अपना बसेरा 
मुट्ठी भर सपने लाया
नया सवेरा 
कुछ स्वपनिल सृष्टि 
और मीठी अनुभूति लाया 
नया सवेरा 
जीवन पथ में चलते रहना
लड़ते रहना
शौर्य तिलक है सजाना
ऐसा नव संचार लाया 
नया सवेरा 

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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हे ईश्वर!जगत् रचिता 
तूझे कोटि कोटि प्रणाम है 
तू ही आदि तू ही अंत है
तू ही शून्य तू ही अनंत है
परा अपरा तेरी शक्ति है
तूझसे ही अंधकार और ज्योति है
तू ही सृष्टि का आधार है 
हम सब तेरे ही संतान हैं 
जीवों में तेरा ही अंश है(सूक्ष्म अंश)
तेरे विस्तार ही ब्रह्मांड है
अद्भुत तेरी रचना है
तू ही सृष्टि तू ही विनाश है

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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* सुबह *
बनी रश्मि नव ज्योती 
सुन्दर स्वर्णिम प्रभात हुआ

मिटाकर तम जागा मन
सुखद सुबह नव विहान हुआ

नई रौशनी नया सबेरा
नई चेतना से मन विभोर हुआ

प्रस्फुटित सुमन महकता चमन
सुहावना सुरभित प्रभात हुआ

नया जोश नई कहानी 
नव सृजन से जग हर्षित हुआ

ईश स्मरण कर वंदन
नित कर्मों से गतिशील हुआ 

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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कलम हमारी शक्ति है 
भावों की अभिव्यक्ति है 
अक्षर अक्षर का ज्ञान सिखलाती 
बच्चों का भविष्य संवारती

कलम दिल को दिल से मिलाती
दिल में आग भी लगाती
यह प्रियतम की बातें बताती
रुठे यार को भी मनाती

कलम से कभी मुसकाती खुशियाँ 
कभी-कभी बह जाते आँसू भी
कभी पराये हो जाते अपने
कभी टूट जाते रिश्ते भी

कलम से सत्य की समझ है
तो अपनाती भूल की ग्लानि भी
कलम हमारे मन की निचोड़ है 

कलम की भी क्या तकदीर है
बिना तलवार कत्ल करती है 
आज के जीवन की जादूई छड़ी है

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल


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गुरूर
जिस मिट्टी के कण कण में 

ईश्वर का वास है 
जहाँ स्वर्ण सा सबेरा है
चिड़ियों का बसेरा है
हरियाली आँचल में 
ममता की छाँव है 
जिसकी रक्षा को
वीर कुरबान है
जन्म ऐसी वीर भूमि पर 
मन मेरा मगरुर है
तकदीर पर अपने गुरुर है
************************
तेरे सादगी की मैं पूजा करुँ 
तेरे प्रेम की मैं वंदना करुँ 
आचरणों पर तेरे 
मैं जीवन अर्पण करुँ 
मिला ऐसा सुहाग का
वरदान मुझे
भाग्य पर अपने गुरुर करुँ 

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल


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जीवन के राहों में सुख छाँव है 
यह नहीं हमारी मंजिल है
सुख में जो लिप्त है
वो धरा में सुप्त है

दुःख तपती धूप है
मिलती जीवों को ऊर्जा है
जीवन में जिसने यह पाया है 
जग उसी से उजियारा है 

सुख दुःख जीवन में पूरक हैं 
एक ही सिक्के के दो पहलू हैं 
दुःख का साथी बनकर
सुख का एहसास ही अपनी जीत है

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
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जन्मभूमि 
********************

हे जन्मभूमि आपको मेरा बारम्बार प्रणाम है
कण कण में यहाँ कृष्ण के वास हैं 
यही हमारे संस्कार हैं 

हे जन्मभूमि आपको मेरा बारम्बार प्रणाम है 
बहती यहाँ गंगा यमुना सरस्वती है
यह अमृत सुधा सी धारा है 

हे जन्मभूमि आपको मेरा बारम्बार प्रणाम है 
ऋषिमुनी और संतों की तपोभूमि है
संस्कृति ये हमारी है 

हे जन्मभूमि आपको मेरा बारम्बार प्रणाम है 
यह प्रताप अशोक गुप्त की वीरभूमि है
इसी भूमि ने लक्ष्मी बाई सी वीरांगना पाई है

हे जन्मभूमि आपको मेरा बारम्बार प्रणाम है 
पूरब से आती पवन भी यहाँ इठलाती है 
हरियाली लेती यहाँ अँगड़ाई है

हे जन्मभूमिआपको मेरा बारम्बार प्रणाम है 
रंग बिरंगे फूलों से भरा चमन हमारा है 
हर ॠतु की छटा यहाँ निराली है 

हे जन्मभूमिआपको मेरा बारम्बार प्रणाम है 
जन्म लिया इस पावन धरा पर 
ऐसा सौभाग्य हमारा है 

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
जन्मभूमि 
********************

हे जन्मभूमि आपको मेरा बारम्बार प्रणाम है
कण कण में यहाँ कृष्ण के वास हैं 
यही हमारे संस्कार हैं 

हे जन्मभूमि आपको मेरा बारम्बार प्रणाम है 
बहती यहाँ गंगा यमुना सरस्वती है
यह अमृत सुधा सी धारा है 

हे जन्मभूमि आपको मेरा बारम्बार प्रणाम है 
ऋषिमुनी और संतों की तपोभूमि है
संस्कृति ये हमारी है 

हे जन्मभूमि आपको मेरा बारम्बार प्रणाम है 
यह प्रताप अशोक गुप्त की वीरभूमि है
इसी भूमि ने लक्ष्मी बाई सी वीरांगना पाई है

हे जन्मभूमि आपको मेरा बारम्बार प्रणाम है 
पूरब से आती पवन भी यहाँ इठलाती है 
हरियाली लेती यहाँ अँगड़ाई है

हे जन्मभूमिआपको मेरा बारम्बार प्रणाम है 
रंग बिरंगे फूलों से भरा चमन हमारा है 
हर ॠतु की छटा यहाँ निराली है 

हे जन्मभूमिआपको मेरा बारम्बार प्रणाम है 
जन्म लिया इस पावन धरा पर 
ऐसा सौभाग्य हमारा है 

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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लूट लिया किसी ने
मुझसे मेरी हँसी
खिलखिलाकर हँसने की
फितरत थी मेरी
नजर ये मुझपर
किसकी लगी

मीठी थी वो मुस्कान
बन गई चाहत मेरी
पत्थर दिल बन बैठा
बनाकर अफसाना कोई

मेरी चाहतों ने चाहा है जिसे
एक तू ही है नहीं दूजा कोई
अर्पण कर आई थी
चरणों में तेरी
वो पूजा के फूल थे मेरे

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


::फरिश्ता:::::
फरिश्ता स्वयं का विश्वास है
यह धैर्य और साहस है

शौर्य और पराक्रम है
रश्मि है ज्योति है 
आभा प्रभा है

यह समभाव सदाचार दयावान है
फरिश्ते में माँ सी ममता है
नन्हा सा निश्छल प्रेम है 
प्रेममय ज्योती है 

पहचान अपने फरिश्ते को
यह ईशवर की देन है
अद्भुत एक शक्ति है 
अनमोल विभूति है
निर्मल मन में फरिश्ते का वास है 

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

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भावों के मोती नमन 
कुमकुम
********************

गेरू रंग में ही रंग दे पिया 
महका दे मेरे जीवन की बगिया 
गोधुली में किरणें घुलती जैसे 
घुल जाऊँ मैं भी तेरे रंग में 
तुझ संग वो रसिया
माथे पर सजती रहे कुमकुम
बन जाऊँ मैं भी 
अखंड सौभाग्य की मलिका
उज्जवल धवल चाँदनी में भी 
चम चम चमके मेरी बिंदिया 

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल



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देश का नन्हा सिपाही हूँ 
कल 
का वीर जवान हूँ 

आजाद हिंद का सपूत हूँ 
इस मिट्टी का कर्जदार हूँ 

सीने में है शोंधी खुशबू भरी हुई 
बालक हूँ आँचल है लिपटी हुई 

सागर की एक बूँद हूँ 
वीरता से नहाई हुई 

नन्हा सा बच्चा हूँ मैं 
पर मासूम खयालात नहीं 

माँ के चरणों पर रखना
नजरें अपनी झुकाई हुई 

देखोगे वरना 
आँखें अपनी कटी हुई 

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला
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भारत देश वीरों की जन्मस्थली है
राम
 कृष्ण की अवतारी भूमि 
ऋषि मुनियों की तपोभूमि है 

भारत देश रत्नों की खान है 
लक्ष्मी धूल में लेटी
परम्परा यहाँ की निराली है 

मुश्किलों में भी परम्परा को जीते हैं 
भिन्न भिन्न संस्कृति यहाँ है 
पत्थर भी पूजे जाते हैं 

हर ॠतु की छटा निराली
सावन हरियाली लाती
बसंत महकते और दहकते हैं

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला


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* बलिदान * नये उपवन सजाने की खातिर 
सुहागन करती अपनी अस्मिता का बलिदान 


नर संग हाथ मिला चलने की खातिर 
नारी करती अपनी राहों का बलिदान 

घर के कर्तव्यों को निभाने की खातिर 
बेटियाँ करती अल्हड़पन का बलिदान 

परिवार को महकाने की खातिर 
स्वामिनी करती अरमानों का बलिदान 

स्वजनों की मान मर्यादा की खातिर 
गृहस्थी करती लफ्ज़ों का बलिदान 

गुरुजनों के संस्कारों की खातिर 
हम सब करते अभिमानों का बलिदान 

बच्चों के भविष्य सजाने की खातिर 
गृहिणी करती अपने सपनों का बलिदान 

सृष्टि के अंकुरण की खातिर 
धरा करती स्वयं का बलिदान 

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला


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गुलामी की जंजीरों को काटक
तिरंगे का कफन पहनकर
आजाद वतन को कर गये

जान की बाजी वो खेल गये
गोलियाँ सीने पर वो झेल गये
आजादी की खातिर सर अपना
कटा दिये

देश के वीर सपूत थे
अपने वतन के लिये 
फर्ज अपना निभा गये

देशवासियों कुर्बानीयों की लाज रखना
वतन की मिट्टी को मत मैला करना
इस मिट्टी की तिलक माथे पर वो लगा 
🇮🇳 गये🇮🇳
स्वरचित🇮🇳पूर्णिमा साह🇮🇳बांग्ला

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भावों के मोती समूह ,
दैनिक कार्य स्वरचित लघु कविता

दिनांक 16अगस्त , 2018
दिन वीरवार 
विषय ख्वाहिशें
रचयिता पूनम गोयल

मेरी ख्वाहिशों की फेहरिस्त ,
कुछ इस कदर बढ़ गई !
कि मेरी चादर , इन ख्वाहिशों से , 
काफी छोटी पड़ गई !!
हर रोज़ इनका ,
एक नया पुलिंदा !
जिसे देखकर , मैं ख़ुद भी ,
हो जाऊँ शर्मिंदा !!
क्योंकि मैं नहीं थी ऐसी ,
हरगिज़ नहीं थी !
बहुत कुछ था मेरे पास ,
सिर्फ और सिर्फ ये मेरी ख्वाहिशें ही नहीं थी !!
फिर , न जानें , कब ? कैसे ? और कहाँ से ?
ये आ गई !
और मेरी ज़िन्दगी में ,
एक अज़ीब सी हलचल मचा गई !!
समझ नहीं आता ,
कि करूँ , तो क्या करूँ !
कैसे ? मै , फिर से , अपनी इन ख्वाहिशों को ,
ख़ुद से जुदा करूँ !!
ज़िन्दगी एक अज़ब से 
ढर्रे पर चल रही है !
क्योंकि पल-पल ,
इन ख्वाहिशों की रफ्तार बदल रही है !!
अब तो ख़्वाब में भी ,
इनका मेला-सा लगा रहता है !
और ख़ुदा के नाम के बजाय ,
बस इनका ही बोलबाला बना रहता है !!
न जाने , ख़ुदा कभी इसके लिए ,
मुझे कभी मुआफ करेगा भी , या नहीं ?
न जाने , ज़िन्दगी की राह पर ,
मेरा कोई सही कदम ,
उठेगा भी , या नहीं !!
बेक़ाबू हूँ लगातार ,
ख़ुद के ज़ज़्बातों पर मैं !
और बढ़ रही हूँ , 
न जाने , किस डगर पर मैं !!
अ'ख़ुदा , 
तुझसे ग़ुज़ारिश है मेरी !
कि सभी भूलों को मुआफ कर,
तू राह बदल दे मेरी !!

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ख्वाहिशें सबकी कुछ रही अधूरी 
*कुछ हुई पूरी*
ख़्वाहिशें बचपन की---
गुड्डे गाड़ियों की बारात हो
खेलने के लिए दोस्तों की
भरमार हो
खिलौने चाॅकलेटों की
बरसात हो
ख़्वाहिशें किशोर की---
बिन पढ़े ही नम्बर 100के पास हो
जैसे तैसे इम्तिहान का बेड़ा पार हो 
कक्षा में प्रथम स्थान ही हर बार हो
ख्वाहिशें यौवन की---
अपना सुन्दर सपनों का संसार हो
मित्रों का हरपल साथ हो
प्यार की भरमार हो 
ख़्वाहिशें सुहागन की--- 
देहली के उसपार भी ममता की 
छाँव हो
पतिदेव जी से मिलता प्यार की 
सौगात हो
आँगन में गूँजती किलकारियां हो
माँ की ख्वाहिशें ---
बच्चों के सपने सँवारने हैं 
आई कठिनाइयों से बचाने है
आसमान भी कदम उनके चूमते हो
प्रौढ़ की ख्वाहिशें---
बच्चे संस्कारों को अपनाते हों
ईश्वर का आशीर्वाद मिलता हो
सुख चैन से वो जीते हों
वृद्धा की ख्वाहिशें---
स्वास्थ्य में कुछ सुधार हो 
बच्चों के सेवा भाव हो
जीवन नैय्या अब बेडा पार हो

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला
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अटल सत्य हिन्दुस्तान का लाल
जग को रौशन कर जायेगा 


युगपुरुष का नाम मानस पटल पर
स्वर्णाक्षरों से लिखा जायेगा 

युगों युगों तक गीतों में 
उनका नाम गाया जायेगा 

उनके कदमों के निशान
सत्य की पहचान बन जायेगा

धरती का फरिश्ता आसमानों में 
चमकता तारा बन जायेगा 

"भारत रत्न " था अटल 
विश्व का कोहिनूर बन जायेगा 

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला
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अपेक्षा अपनों से परायों से मित्रों से
अपेक्षायें हैं कितने कितनों से

अपेक्षा भाग्य से सपनों से आशाओं से
अपेक्षायें हैं जीवन की राहों से

अपेक्षा धरा से गगन से हवाओं से
अपेक्षायें हैं उषा की लाली से

अपेक्षा मिट्टी से धूप से बरसातों से 
अपेक्षायें किसानों के श्रम से

अपेक्षा दिन से निशा से संध्या बेला से
अपेक्षायें हैं जलते चरागों से

अपेक्षा नौनिहालों से शिक्षकों से ज्ञान से
अपेक्षायें हैं ज्ञान और प्रतिभा से

अपेक्षा ललना से वीरों से नौजवानों से 
अपेक्षायें हैं माता के आँचल से 

अपेक्षा परिवार से समाज से स्वराष्ट्र से
अपेक्षायें हैं प्रेम और विश्वास से

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला


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#जख्म #
जिंदगी में कैसे कैसे 

जख्म मिलें हैं मुझे 
कुछ हालातों ने दिये 
कुछ लफ्ज़ है सीये मेरे 

जख्म ही शायद 
जीवन को तराशते हैं
बनके कोहिनूर 
चमकने हैं मुझे 

आयी हर मुश्किलों को
काटने हैं मुझे 
दुःखों को टुकड़ों में
बाँटने हैं मुझे 

कठिन परिस्थितियों को
झेलने हैं मुझे 
जिंदगी में तपिश भी
सहने हैं मुझे 

टूटते रूठते हर रिश्तों को
निभाने हैं मुझे 
गर्म प्रहार को झेल
बन कुंदन चमकने हैं मुझे 

पड़ी मन की गंदगी 
पौंछने हैं मुझे 
दर्पन सा सत्य 
बताने हैं मुझे 

बिखरी हुई जिन्दगी को
समेटने हैं मुझे 
दुर्गम इन राहों को
सजाने हैं मुझे 

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला



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#आँसू #
नैनों से मेरे छलके क्यों आँसू,,,,,

जीवन में मेरी आयी
खुशियों की सौगातें
ढोल बाजे बजने लगी 
शहनाई,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
बनकर सुहागन 
हुई जब विदाई 
नैनों से ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,आँसू 
छोड़ माता पिता का घर
पहुच गयी अनजान नगर 
माँ सा आँचल,,,,,,,,,,,
पाकर पिता सा प्यार 
नैनों से ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,आँसू 
अनजान थी राहें 
अनजानी डगर
अनूठा प्रेम बंधन,,,,,,,,,,,
बंध गयी इस स्नेह बंधन से जब
नैनों से ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,आँसू 
सूना सूना अंगना
सूनी थी पालना
अंगना किलकारियों से 
जब गूँज उठी, उस दिन
नैनों से,,,,,,,,,,,,,,,,,,आँसू 
माँ सरस्वती के द्वारे
प्रथम दिन,,,,,,,,,,,,,,,
पाठशाला छोड़ आयी जब
नैनों से,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,आँसू 
सफलता उसके चूमने लगे कदम
सर्वोच्च स्थान उसने है पायी
देखकर उसका नाम,,,,,,,
जिलास्तर में तृतीय स्थान 
नैनों से,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,आँसू 
उज्जवल भविष्य की खातिर 
शिक्षा के लिए,,,,,,,,,,,,
दूर देश को गयी जिस दिन
नैनों से मेरे छलके क्यों आँसू 

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला

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बेईमान 
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ईमान बचा नहीं अब दुनिया में 
ईमान बेचकर करते बेईमानी 

अपने भी हो जाते पराये
करके रिश्तों संग बेईमानी 

ओहदेवालों की मनमानी 
कर्तव्यों संग करते बेईमानी 

अफसर करते तानाशाही 
पद से अपने करते बेईमानी 

पदों की होती हेराफेरी 
प्रतिभा के संग करते बेईमानी 

अरबों खरबों की लूट मची है 
नौ दो ग्यारह हुए मिट्टी संग करके बेईमानी 

ईमान को मिले हैं जेल
निराली खेल दिखाती बेईमानी 

सांसें भी एक दिन देगी चकमा 
करके बेईमानो संग बेईमानी 

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला

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"साथ"
1*

उलझा मन
झूठे का बोलबाला 
टूटा विश्वास 
2*
वक़्त की मार
कठिन इम्तिहान 
प्रभु का साथ
3*
सच का साथ
विश्वास है कायम
मिटाता तम
4*
स्वार्थी दुनिया 
कोई नहीं है साथ
कड़वा सच
स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला


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"गीत "
बहते अश्रु धार जब टूटा आसमान 
फिर बादल गाये कैसे गीत

धरा के सीने को चीर जख्म हैं मिले
फिर मिट्टी की खुशबू गाये कैसे गीत 

उजड़ा है चमन पतझड़ सा मौसम 
फिर बावरा भँवरा गाये कैसे गीत 

कटती गई अम्बुआ की डाली
फिर कोयल पपिहा गाये कैसे गीत 

भोर को छाया घना कोहरा बना आवरन
फिर उषा की लाली गाये कैसे गीत 

धूप की तपिशपेड़ों की नहीं ठंडी छाँव
फिर राहों में राही गाये कैसे गीत 

साँझ की बेला लुप्त हुई शंख ध्वनि 
फिर संध्या आरती गाये कैसे गीत 

सितारों की महफ़िल को घेरे काले मेघ
फिर ज्योत्सना रात गाये कैसे गीत 

वहशीपन का शिकार है मासूम 
फिर बाल मन गाये कैसे गीत 

बढ़ती आबादी भरते रहे तालाब 
फिर हंसो का जोड़ा गाये कैसे गीत 

जीवन के पथ में चुभते रहे काँटे 
फिर सीधा साधा सा दिल गाये कैसे 
#गीत#
स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला 
24/08/2018


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मित्रों , मेरे इस गीत में कुछ विशेषता है और वह यह है कि इसमें एक ही शब्द को , एक वाक्य में , 5 बार , वह भी अलग-अलग धुन के साथ प्रयुक्त किया गया है ! आशा है कि मेरा यह अंदाज आपको पसंद आएगा !

चाँद जैसे , चाँद जैसे , चाँद जैसे हो तुम ! चाँद जैसे हो तुम ! चाँद जैसे हो तुम !
मेरे हमदम , मेरे हमदम , मेरे हमदम हो तुम ! मेरे हमदम हो तुम ! मेरे हमदम हो तुम !!
चाँद जैसे.................................!
१--आए हो , जानम , जबसे , ज़िन्दगानी में तुम !
नूर बनके , चमके हम , कसम से , अ'हमदम !!
तुम हो मेरे , तुम हो मेरे , तुम हो मेरे सनम ! तुम हो मेरे सनम तुम हो मेरे सनम !
चाँद जैसे...................................!
२--जीते हैं , तेरे लिए , तेरे लिए मर जाएंगें !
जान ये तुझपे , सनम , हम फिदा कर जाएंगें !!
चाहें तुमको , चाहें तुमको , चाहें तुमको ही सनम ! चाहें तुमको ही सनम !
चाँद जैसे....................................!
३--चाह है , तू ही मिले , हर जनम में सनम ! 
प्यार तेरा मिले , हर जनम में सनम !!
तुमसे बिछुड़े , तुमसे बिछुड़े , तुमसे बिछुड़े ना हम ! तुम से बिछुड़े ना हम ! तुमसे बिछुड़े ना हम !
चाँद जैसे.....................................!



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"सृजन "
कृष्ण की बांसुरी:

सृजन है वर्णों का
सृजन त्वरित ध्वनी का
सृजन सुर और लय का
सृजन सरगम और ताल का
सृजन प्रेम अनुराग का
सृजन मन के झंकारों का
सृजन है परा अपरा शक्ति का 
सृजन है दिव्य ज्ञान का 

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला 
25/08/2018

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1*
श्वेत चाँदनी 
पूर्णिमा का चन्द्रमा 
सुहानी रात
2*
पहुँचा चाँद 
कठिन इम्तिहान 
सुफल ज्ञान 
3*
चाँद का दाग
है नजर का टीका
कुदृष्टि रक्षा 
4*
छूपता चाँद 
बादलों की ओट में 
घनेरी रात
5*
विलुप्त चाँद 
अमावस की रात 
तारे चमके
6*
राहू का ग्रास 
अपहरण चाँद 
त्रस्त जीवन 
7*
दूज का चाँद 
शरमाकर भागा
खेल अनोखा
8*
कलंकित चाँद 
यूँ नजर चुराता
दामन दाग
9*
चाँद चकोर
अधूरी है कहानी 
अद्भुत प्रेम 
10*
नीला आकाश 
सितारों संग बात
हँसता चाँद 

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला

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लघु कथा 
शीर्षक: " इंसानियत "

मैं अपने बेटे और बेटी के साथ ट्रेन में सफर कर रही थी।बेटे की उम्र 3साल और बिटिया 5साल की थी।
हमारे ही कम्पार्टमेंट में एक गुब्बारा वाला आया।शाम हो चली थी घर लौट रहा था अतः6-7 ही गुब्बारे थे
बच्चे गुब्बारे के लिए ज़िद करने लगे तो दोनों के लिये एक- एक गुब्बारे खरीद दी।बेटी खुश हुई और अपनी गोद में संभाल कर रख ली पर बेटा गुब्बारा हाथ में लेते ही हाथों से दबाकर फ़ोड़ डाला।उसे मैंने दूसरा दिया फिर तीसरे चौथे औरपाँच ........ बारी-बारी से ......इसे उसने अपना खेल समझ लिया।अब तो गुब्बारा भी नहीं बचा था फिर तो वह दीदी का गुब्बारा लेने के लिए ज़िद करने लगा।बेटी ने मना किया तो रोने लगा। यह देखकर गुब्बारा वाला थैले से पैकेट निकाल हवा भरकर बेटे को दे दिया। लेकिन बेटे के लिए तो यह खेल बन चूका था उसने फिर........इसी तरह3-6 ..... फिर मैं देने से मना कर दी सुनकर बेटी भी बोल पड़ी-मुझे तो सिर्फ एक गुब्बारा मिला मैंने संभाल कर रखा, भाई ने तो सारे फोड़ डाले सुनकर गुब्बारावाला बोला- "बेटा तू तो घर की लक्ष्मी है तेरा भाई नासमझ है इसे भी तूझे ही संभालना पड़ेगा। " कहकर 2-4 और गुब्बारे दे डाले।
सभी यात्री भी इसी खेल में मशगूल थे
तबतक गुब्बारे वाले की मंजिल आ चुकी थी। मैं उसके गुब्बारे की कीमत देने लगी तो लेने से इंकार कर दिया और बोलकर चला गया- इस नादान बच्चे में मैने ईश्वर का दर्शन किया है मैंने आज ईश्वर को भेंट चढ़ाई है।मैं देखती रह गई।उस इंसान की इंसानियत को मैं आज भी याद करती हूँ ।
स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला 
(यह घटना बिल्कुल सत्य है)

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शीर्षक: "संतुलन"
विधा : हाइकु

एक प्रयास 
1
सौर मंडल 
संतुलन ब्रह्मांड 
गतिशील है 
2
सुबह शाम 
दिवस संतुलन 
कर्म सफल
3
खाद्य संयम
स्वास्थ्य का संतुलन 
सुखी जीवन
4
धनी निर्धन
असंतुलित राष्ट्र
है भेदभाव 
5
जीवन नैय्या 
असंतुलित धारा 
डूबा खेवैय्या
6
डूबता कश्ती 
संतुलन अभाव
वृथा प्रयास 
7
न्याय की मूर्ति 
संतुलित तराजू
सत्य की जय
8
खोज विज्ञान
प्रयास संतुलन 
राष्ट्र गौरव
9
है संतुलन 
संध्या संधि प्रहर
दिवस रात
10
निष्प्राण जीव
भू संतुलन खोता
भूकंप होता

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला

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" नारी"
मैं नारी बीजों की जननी

जगत सृजन सृष्टि हूँ 

मैं नारी बीजों की जननी 
करती जीवों का अंकुरण हूँ 

मैं नारी मृणमयी 
सर्वव्यापी शक्ति हूँ 

मैं नारी असुर संहारिणी
जीवन शरणदायिणी हूँ 

मैं नारी ममता की मूर्ति 
तो कहीं चाण्डाली हूँ 

मैं नारी वीरों की जननी 
शहीदों की आहुति देख 
पाषाण हूँ 

मैं नारी शांतिदायिणी
युद्धभूमी की ललकार हूँ 

मैं नारी धीर स्थिर
सागर की निचोड़ हूँ 

मैं नारी ज़ुल्मों को
झेलकर भी सहनशील हूँ 

मैं नारी वक्षों को चीर 
बुझाती सबकी प्यास हूँ 

मैं नारी अदम्य साहस धैर्य 
अनंत प्रेम अनुराग हूँ 

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला
01/09/2018

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लघु कथा
" अधूरी चाहत"

गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामी......ब्रह्म मुहूर्त,मंगलारति।
पूरानी यादें ..शीतल मंद पवन संग कभी-कभी अंतस को झकझोर जाती है।बचपन से ही मैं माँ के साथ सूर्योदय के पहले बिस्तर छोड़ उठ जाती हूँ ।"ISKCON"मंदिर में मंगलारति में माँ के साथ जाया करती थी कभी कभार अकेली भी..।मंदिर ढाई-तीन किलोमीटर दूर था तो जाते-आते सुबह की सैर भी हो जाती थी।वहाँ बहुत तो नहीं पर कुछ लोग प्रतिदिन आते थे सभी के साथ भावनात्मक रूप से लगाव हो गया था।एक-दूसरे को ना जानते हुए भी चेहरे से पहचान हो गई थी।आरती के बाद कुछ लोगों के साथ वार्तालाप हो जाया करती थी।वक्त बीतता गया लोग आते जाते मिलते जुलते रहे..।
इसी बीच एक शख्स दिल में घर कर गया था...शख्सियत ही कुछ ऐसी थी।दो-तीन साल गुजर गये कि आचानक उसने मंदिर आना बंद कर दिया।मेरी नजरें किसी को ढूंढती रही पर नाकाम.. मैं प्रतिदिन यह सोचकर जाती थी कि शायद आज...।रात को सोचती सो जाती कि शायद कोई काम..कल आ .. ।
एक रात मैं सपनों में उनसे बातें कर रही थी।मैने क्या पूछा उन्होंने क्या कहा ..सुबह उठकर कुछ याद नहीं रहा।उस दिन भी मैं मंदिर पहुँच गयी पर अकेली। आरती समाप्ति के बाद मेरे कदम अनायास ही उस ओर चल दिए ...कभी एक दो बार अपने निवास के बारे में बता चूके थे लेकिन सटीक मालूम ना था।मैं पूछते पूछते पहुँच गयी,नाम बताया तो किसी ने सामने गेट की तरफ इशारा किया। मेरे बेल बजाने से जिस शख्स ने दरवाजा खोला वो वही था, मुस्कुरा कर अन्दर आने को कहा तो...।मंदिर मे अनुपस्थिति का कारण पूछी तो बताया कि उसका तबादला हो गया हैजाना है इसलिये कुछ दिन से घर बैठे मानसिक रूप से सबसे रिश्ता तोड़ रहा हूँ।
कुछ देर वार्तालाप के बाद बाइक निकालकर कहा चलो घर तक छोड़ आता हूँ। मैं चुपचाप पीछे बैठ गई। रास्ते में मेरी मुलाकात भाई के साथ हुई तो मैं भाई के साथ घर आ गई। 
उसके बाद काफी दिनों तक सुबह मैं मंदिर तक का सफर तय नहीं कर पाती। उसके कुछ बातों ने मुझे व्याकुल कर दिया था।
ऐसा भी एक अधूरा सफर था हमारा।एक अधूरी कहानी या फिर अधूरी चाहत ......।
"समंदर का आना और तट बहा ले जाना.......
वक़्त का फिसलना और यादों को पीछे छोड़ देना........।"

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला 
02/09/2018



हे कृष्ण! तुम फिर एक बार
इस धरा में आ जाओ
घृणा और व्याभिचार को
प्रेम से सिंचित कर जाओ

हे मुरारी! फिर से एक बार

वंशी की राग छेड़ दो
हवाओं को भी वही
संगीत सुना दो

हे जड़ चेतन के स्वामी
धरती फिर से तुझे पुकार रही
मानवता भी अब शरमा रही
जीवों के मन में प्रीत का
बीजारोपण कर दो

हे कृष्ण! तुम फिर एक बार
इस धरा में आ जाओ 

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला




आया शरद सुरभि अहसास लिये हुये
सकल फुलें काश संदेशा हैं खिले हुये 

हो शक्ति प्रवेश श्वेत आभा लिये हुये 
माता का हो आगमन महिमा लिये हुये

खिले हैं पारिजात खुशबू से भरे हुये
धरा में हैं खुशियाँ उमंगों से भरे हुये 

आसुरी शक्तियाँ है उफान लिये हुये
होगी पराजय,देवी हैं शांति लिये हुये 

शरद में बजते नगाड़े शक्ति से भरे हुये 
नवरुपों का करो वंदना भक्ति है भरे 
हुये
स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला


शीर्षक:"गंगा "
हाइकु 
1
निर्मल गंगा 
कलकल है धारा 
हरि के द्वार 
2
आकाशगंगा 
रहस्यमय ज्ञान 
खगोल शास्त्र 
3
गंगा के घाट 
जगमगाते रात्रि 
देव दीवाली 
4
गंगा भारती
मन को मिली शांति 
संध्या आरती 
5
शांत है गंगा 
सागर मिलकर
बंग की खाड़ी 
6
नमामि गंगे
स्वच्छ गंगा योजना
ठोस कदम 

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला

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शीर्षक:" बंधन "
हाइकु 
1
मंगलसूत्र
विवाह है बंधन 
जन्मों का नाता 
2
धर्म बंधन 
कृष्ण संग अर्जुन 
गीता का ज्ञान 
3
कर्म प्रधान 
सांसारिक बंधन 
है मृत्यु तक
4
नित्य वंदन 
गुरु शिष्य बंधन 
शिक्षा प्रदान 
5
फूल व काँटे 
अनोखा है बंधन 
साथ निभाते
6
शाश्वत आत्मा 
मुक्त भव बंधन 
नश्वर काया
7
प्रेम बंधन 
दिव्य ये अनुराग 
कृष्ण राधिका 
8
विवेक ज्ञान 
नीतियों का बंधन 
मानव मात्र 
9
प्रेम बंधन 
गहन अनुभूति 
भाव महान

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला


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हाइकु 
1
जीवन नैय्या 
डूबा सागर धारा 
प्रभु सहारा
2
दया व प्रेम 
है गहरा सागर
अमूल्य निधि 
3
गहरी निशा
सागर सी तन्हाई 
बेचैन मन

चंचल चित्त
लहराता सागर
मचाता शोर
5
प्यार के पल
है गहरा सागर
डूबता मन
6
मायावी जग
है दुःखों का सागर
जीवन ठग
7
गंगा सागर
भव बंधन मुक्ति 
मन की शुद्धि 
8
अश्रु की धार
नयनों के सागर 
खुशियाँ छाई

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला



उनिंदी पलकों में तेरा मुस्कुराना
है सांसों की सरगम को छेड़ जाना

महकती फिजाओ में है 
तेरे सांसों का एहसास 

हौले हौले से आकर बहकाना
बात तो कुछ है कोई खास

छुप छुप कर मुझे ना भरमाना
तेरे सांसों से बंधी है मेरी सांस 

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला


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सदियों पुरानी है भारतीय परम्परा 
आधुनिक दौर में भूलते जा रहे हैं 
सूर्य प्रणाम को छोड़ 
पाश्चात्य नमन में मग्न हो रहें हैं 
अपनी तो परम्परा है निराली
हमारे रीति रिवाज और परम्परा
पूरक हैं 
वेद हमारी पौराणिक परम्परा 
कवि साहित्य की परम्परा 
गुरु शिष्य की परम्परा (गुरुकुल)
नृत्य संगीत की परम्परा 
इससे युवा भाग रहे हैं 
ओढ़कर आधुनिकता की चादर
दिग्भ्रमित हो रहे है
परिवर्तन परम्परा का हिस्सा है
इससे परम्परा को तराशते हैं
इसके पीछे का तर्क इसे जीवित 
रखता है
वरना यह सिर्फ प्रथा बनके रह जाती है 

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला


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वचन लेने या देने के लिये नहीं 
वचन निभाने होते हैं 
कुछ मूक वचन संग हमारे होते हैं 
इसे समझने होते हैं 
" सृष्टि बंधन "--ईश्वर संग लिया हमारा "वचन "
माया नगरी आकर जीव इसे
भूलते क्यों है !!
"मातृ पितृ ॠण"--जन्मोपरांत माता पिता संग हमारे" वचन "
संतान इसे छोड़ते क्यों हैं!!
"प्रकृति बंधन "--है प्रकृति संग हमारे "वचन" 
फिर इंसान इसे लुटते 
क्यों हैं!!
"विवाह बंधन "--"सात वचन" संग लेते फेरे 
पति पत्नी इसे तोड़ते क्यों हैं!!
"पारिवारिक बंधन "-- सुख दुःख में साथ निभाने के" वचन"
रिश्ते रुठते क्यों हैं !!
"सामाजिक बंधन "--साथ साथ मिलकर रहने का " वचन"
लोग बैर भाव रखते क्यों हैं!!
" मित्रता बंधन "--विश्वास और प्रेम भाव के ये "वचन"
मित्र बनकर धोखा देते क्यों हैं!!
"स्वराष्ट्र बंधन "--मिट्टी की खुशबू संग हमारे "वचन"
कुछ लोग इसे बेचते क्यों हैं!!

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला

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नाजुक सा दिल था मेरा
तन्हाईयों ने मार डाला

फूल सा दिल था मेरा 
हवाओं ने कुचल डाला

मोम सा दिल था मेरा
संवेदनाओं ने पिघला डाला

राह चलते बेदर्दी दुनिया नें
इस दिल को पत्थर बना डाला

बनकर पत्थर इतराने लगा दिल मेरा 
लोहे से प्रहार कर इसे भी तोड़ डाला

टूटकर बिखर गया पत्थर दिल मेरा
टुकड़ों की चूभन से इल्जाम मुझपे ही
दे डाला

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला

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जीवन पथ चलना संभव ना होता
अगर ना मिलता माता पिता का
आशीर्वाद 
जीवन में मुस्कान है आशीर्वाद 
माता पिता संग बड़ों का भी
अगर मिल जाये आशीर्वाद 
हमारी बगिया खिलकर महक
जाती है
उनके आशीर्वाद के बिना 
फूल सुगन्ध बिखराये बगैर ही 
मुरझा जाती है
हमारे मधुबन की आस है
आशीर्वाद 
सेवा निष्ठा की सांस है आशीर्वाद 
बड़ों संग हमारा व्यवहार 
उनकी खुशी से ही मिलता हमें 
"आशीर्वाद "
अप्रकाशित एवं स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला

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र्यावरण की रक्षा करना 
यह कर्तव्य हमारा है 🌲

वृक्षों से छाई हरियाली 
मिलते पथिक को छाया है

है वृक्ष जीवन दायिनी 
यह धरती का श्रृंगार है

इनसे ही आते जीवन में 
सुन्दर सुहावना सवेरा है 

है वन्यजीवों का घरौंदा
और चिड़ियों का बसेरा है

इनसे झोली भर भर लेते हम
और सिर्फ जख्म ही देते हैं 

एक वृक्ष के बदले सौ वृक्ष 
यह संस्कार बच्चों को सिखाना हैं 

पौधे लगाकर नहीं भूलें 
इसकी देखरेख भी हमें करना हैं 
🌲🌳🌲🌳🌲🌳🌲🌳🌲
स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला


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इंसानों की कल्पना में खोई 
हकीकत में निराशा मिली है 

आशाओं के कल्पना में खोई 
हकीकत में भाग्य मिला है 

ईमान की कल्पना में खोई 
हकीकत में बेईमानी मिली है 

राहत की कल्पना में खोई 
हकीकत में बेचैनी मिली है 

मुस्कुराने की कल्पना में खोई 
हकीकत में रुसवाई मिली है 

कल्पनाओं के समंदर मे खोई 
हकीकत में रेतों का सागर मिला है 

खुशबू की कल्पना में खोई 
हकीकत में काँटे मिले हैं 

सहिष्णुता की कल्पना में खोई 
हकीकत में स्वार्थान्धता मिली है 

सुख की कल्पना में खोई 
हकीकत में लाचारी मिली है

भविष्य की कल्पना में खोई 
हकीकत में वर्तमान मिला है 

आसमानों की कल्पना में खोई 
हकीकत में जमीन मिली है 

सपनों की कल्पना में खोई 
हकीकत में कर्म मिले हैं 

अप्रकाशित एवं स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला


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"गुमनाम"12नवम्बर 2019

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