रेणु रंजन


"लेखक परिचय" 01)नाम:- रेणु रंजन 02)जन्मतिथि:- सहित):- 25/06/1979 03)जन्म स्थान:- रेपुरा, मीनापुर, मुजफ्फरपुर 04)शिक्षा:- स्नातकोत्तर द्वय ( मनोविज्ञान, इतिहास ) 05)सृजन की विधाएँ:-हायकु , तांका, वर्ण पिरामिड, छंद मुक्त , मुक्तक, दोहा, ग़ज़ल, गीत आदि। 06)प्रकाशित कृतियाँ:-संक्षिप्त परिचय---नहीं चाहता (दैनिक भास्कर ), वो और मैं (दैनिक भास्कर ), सुबह की सुंदरता (दैनिक भास्कर), ना सखि मोबाइल (दैनिक भास्कर), कल अंधेरा था आज सवेरा है (दैनिक भास्कर) हस्ताक्षर, मार्च अंक में---- सृजन के अंकुर, व्यथित हिन्दीकुंज में---- विघटन संवेदना का, मां तुम हो, फागुन की मस्ती, बसंत का आगाज, अनाथ लड़की, मिलजुल ऐसा समाज बनाएं, समर्पण, नारी तू अबला नही, महत्व परिवार का, खोल देना दिल के दरवाजे, वजूद नारी का, अविचलित कर्म पथ पर बढ़ते रहना, मुसीबतों से न घबराना, चढ़ने लगा दिवस का रंग, चाहत बिंदास जीवन की, तेरा दर्द जो है सीने में, तजुर्बे, तेरी अठखेलियां, जीवन के होर, मधुर तान, मन के मीत, चाहत, नया सवेरा । दैनिक विजय दर्पण टाइम्स में --- अज्ञात रास्तों पर, जब भी पुकारे भारत माता, सलोना बचपन, साजन आया फागुन नारी शक्ति सागर पत्रिका में-- मधुर तराना। 07)कोई भी सम्मान:-विश्व रचनाकार मंच द्वारा " सर्वश्रेष्ठ रचनाकार सम्मान", "नारी शक्ति सागर सम्मान" 08)संप्रति(पेशा/व्यवसाय):- शिक्षिका

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**तुम कभी तो बुलाओगे** 
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आस लगी रही तुम कभी तो बुलाओगे 
प्रेम की बारिश से मुझे नहलाओगे। 

दिल के दरमियान है खालीपन पसरा 
अपनी मधुर वाणी से मन हुलसाओगे।

जीवन हो गया है अब ताप से व्याकुल 
शीतल मेघ के बूँद से हर्षाओगे।

सारे सुख औ वैभव त्याग किया हमने
आकर मुझपर सरस स्नेह बरसाओगे।

जीना चाहती खुशी से अपना जीवन 
उदासी से अब तो पीछा छुड़ाओगे।

वक्त है आ मिलकर जीवन संवार लें 
जुदाई के गम से अब तो उबारोगे। 

इस प्रेम - आँगन में हसीं बहार लाकर
कुसुम सौरभ से तन-मन महकाओगे।

नैन में प्रेम की ज्योति जलाकर साजन
तेज धवल प्रभा हर ओर बिखराओगे।

बिखरा - बिखरा-सा है जो जीवन मेरा 
अपने प्रेम की बारिश से सरसाओगे।

जोड़ कर अपने नाम से तुम नाम मेरा
गुमनामी से निकाल मुझे चमकाओगे।
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-- रेणु रंजन 
( स्वरचित )


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आज बाल- साहित्य शीर्षकांतर्गत मेरे पुत्र द्वारा रचित रचना --

आ रहा बसंत बहार
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विद्या की देवी सरस्वती की 
हुई जगत में जय-जयकार,
शीत नृप अपने सिंहासन दिए
आ गया बसंत बहार।

हरित धरा पर सौरभ बिखेरता 
फूलों का संसार,
साल बाद फिर से 
आ गया बसंत बहार।

कोयल कुहके, पपीहा बोले,
उड़े आकाश में लाल गुलाल,
गोरी नाचे आज मगन में 
आ गया बसंत बहार।

भ्रमरों जैसे फूलों पर 
मंडरा रहे हैं बाल गोपाल,
इस हर्षित मौसम में देखो 
आ गया बसंत बहार।
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-- अवनींद्र मधुरेश गिरी
राकेश निकेतन, नरगी जीवनाथ 
मुजफ्फरपुर, बिहार 
843123




**सलोना बचपन**
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सुखद, सुंदर, सलोना बचपन 
मस्त पवन-सा बहता है।
न हित कोई, नहीं दुश्मन 
यह सबसे मेल रखता है।
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झगड़े कर फिर दोस्त बन, 
हमें भाईचारा सीखलाता है।
सबके साथ बिंदास जीवन, 
इनका खूब ही निभता है।
सुखद, सुंदर, सलोना बचपन 
मस्त पवन-सा बहता है।
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किसी से नफरत या द्वेष की, 
भाषा इन्हें आता नहीं है।
इनका हर किसी से सिर्फ, 
सहज मेल का नाता रहता है।
सुखद, सुंदर, सलोना बचपन 
मस्त पवन-सा बहता है।
***************************
नहीं खुद्दारी होती इनमें, 
नहीं गद्दारी का भय खाता है।
सिर्फ सहज सरल व्यवहार, 
सबको हमेशा दिखता है।
सुखद, सुंदर, सलोना बचपन 
मस्त पवन-सा बहता है।
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मन बचपन का इतना निर्मल 
किसी से राग-द्वेष नहीं।
मस्त-मगन सुंदर- सुखद 
जीवन यह जीता रहता है।
सुखद, सुंदर, सलोना बचपन 
मस्त पवन-सा बहता है।
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खेल प्रपंच का यह नहीं जाने ,
प्रेम भरी नजर पहचाने।
अपनों के वात्सल्य के लिए 
हरपल यह लालायित रहता है।
सुखद, सुंदर, सलोना बचपन 
मस्त पवन-सा बहता है।
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सुखद, सुंदर, सलोना बचपन 
मस्त पवन-सा बहता है।
न हित कोई, नहीं दुश्मन 
यह सबसे मेल रखता है।
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-- रेणु रंजन 
( स्वरचित )
26/02/2019

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*साजन आया फागुन**
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साजन आया फागुन, ला दे लाल पीली चुड़ियाँ।
मँगा दे धानी चुनर, मिटा दे फिर दिल की दूरियाँ।।
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साजन आए जब - जब फागुन के महीना।
अनेक रंग देख बज उठे मन की वीणा।।
देख चारों ओर मगन बहे पछुआ ब्यार।
तब याद आए साजन तेरा प्रीत प्यार।।
जिया ललचे हर बार सुनती रहूँ तेरी मीठी बोलियाँ।
साजन आया फागुन, ला दे लाल पीली चुड़ियाँ।।
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साजन आया फागुन, ला दे लाल पीली चुड़ियाँ।
मँगा दे धानी चुनर, मिटा दे फिर दिल की दूरियाँ।।
******************************************
ढोलक थाप पर नाचे हर ओर नर - नार।
मस्त बसंत चारों ओर दिखे बार - बार।।
देख साजन खिले- खिले हैं सबके तन-मन।
सुख-दुख भूल जिंदगी जिए हैं मस्त मगन।।
खिला दे सजना मुझे भी अपने प्रेम की गोलियाँ।
साजन आया फागुन, ला दे लाल पीली चुड़ियाँ।
******************************************
साजन आया फागुन, ला दे लाल पीली चुड़ियाँ।
मँगा दे धानी चुनर, मिटा दे फिर दिल की दूरियाँ।।
******************************************
कितने सजे हैं सब रंगीन परिधान में।
फूलों पर मँडराए भँवरा रसपान में।।
मेरे मन भाए तितली की अठखेलियाँ।
सुंदर लुभावन है प्रिये तेरी शोखियाँ।।
सजा दे मेरी माँग, डालो फिर मुझे गले बहियाँ।।
साजन आया फागुन, ला दे लाल पीली चुड़ियाँ।
*******************************************
साजन आया फागुन, ला दे लाल पीली चुड़ियाँ।
मँगा दे धानी चुनर, मिटा दे फिर दिल की दूरियाँ।।
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-- रेणु रंजन
( स्वरचित )

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"मानवता" शीर्षकांतर्गत हायकु रचना का प्रयास--

(1)
बढ़ा उन्माद
"मानवता" कुंठित
व्यर्थ संवाद।

(2)
सोई जनता
कुहके "मानवता"
स्वार्थांध नेता।

(3)
स्वार्थ रोटी
"मानवता" सहमी
भावना सोती।
(4)
सीमा से पार
"मानवता" विचार
हुआ व्यापार।

(5)
रोए विकास
"मानवता" विकार
करो विचार।

(6)
रहे सद्भाव
"मानवता" विकास
सुखी संसार।

(7)
महके जग
"मानवता" सजग
सब कुशल।

(8)
जग उलझे
"मानवता" सुलझे
दिल समझे।

(9)
स्वार्थ त्याग
"मानवता" सौभाग्य
मिटे दुर्भाग्य।

(10)
कटु स्वभाव
"मानवता" हनन
भाव मनन।

--रेणु रंजन
(स्वरचित)
16/02/2019

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माँ सरस्वतीआराधना
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हे जगदीश्वरी, हे वागिश्वरी,
हममें बुद्धि ज्ञान प्रकाश भरो।
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फैले हुए मन मैल हटाओ,
हर हृदय सुंदर भाव सजाओ।
हे कल्याणी, वीणावादिनी,
हर जन पर माँ कल्याण करो।

हे जगदीश्वरी, हे वागिश्वरी,
हममें बुद्धि ज्ञान प्रकाश भरो।
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रहे न किसी में अज्ञान का तम,
मिटे सभी के मन का हर भ्रम।
हे वीणापाणी , हे हंसवाहिनी,
जीवन का सब संताप हरो।

हे जगदीश्वरी, हे वागिश्वरी,
हममें बुद्धि ज्ञान प्रकाश भरो।
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दुखी जग, सुख आभास कराओ,
ज्ञान बुद्धि माँ सबमें विकसाओ।
हे माँ शारदा, हे माँ भारती,
संकट से जगत का त्राण करो।

हे जगदीश्वरी, हे वागिश्वरी,
हममें बुद्धि ज्ञान प्रकाश भरो।
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--रेणु रंजन
( स्वरचित)
10/02/2019

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"पंछी बनूँ, उड़ती जाऊं, नील-गगन में"
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नाचे मनमा मयूर बन, आज मगन में।
पंछी बनूँ, उड़ती फिरूँ, नील - गगन में।-2(टेक)
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अंतरा-
होकर मगन, खत भेजा है मेरा सजन,
अब मिट गया है रे, मेरे दिल की अगन। 
हँसती रहूँ, डोलती फिरूँ, आज मगन में।
पंछी बनूँ, उड़ती जाऊं, नील - गगन में।

नाचे मनमा मयूर बन, आज मगन में।
पंछी बनूँ, उड़ती जाऊं, नील - गगन में।
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अंतरा -
दिख रहा चारों ओर, सब कुछ खिला-खिला,
लोग भी दिखने लगे, हर ओर मिला-जुला।
गाती रहूँ , नाचती रहूँ, आज लगन में।
पंछी बनूँ, उड़ती जाऊं, नील - गगन में।

नाचे मनमा मयूर बन, आज मगन में।
पंछी बनूँ, उड़ती जाऊं, नील - गगन में।
*********************************
अंतरा-
हृदय से आयी आवाज, भुला हर बात,
मधुर मिलन को, निहारूँ प्रियतम का बाट। 
गाड़ी बनूं , दौड़ती जाऊं, मैं मगन में।
पंछी बनूँ, उड़ती जाऊं, नील - गगन; में।

नाचे मनमा मयूर बन, आज मगन में।
पंछी बनूँ, उड़ती जाऊं, नील - गगन में।
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--रेणु रंजन 
( स्वरचित )
31/01/2019

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(1)
है
सूर्य 
किरण 
उल्लासित 
उत्तरायण 
मकर गमन
दान कार्य उत्तम 

(1)
है 
सूर्य 
संक्रांत
प्रसन्नता 
गंगा महत्व 
दुःख का क्षरण
मन पाप हरण

-- रेणु रंजन 
( स्वरचित )
15/01/2019
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(1)
है

तान
सुरीली 
सरगम 
वर्षा की थाप 
अवनि हँसती
हरियाली भरती।

(2)
है
मौज
दुनिया 
सरगम 
गीत-गजल
थकान मिटाए
मन को अति भाए
-- रेणु रंजन 
( स्वरचित )
11/01/2019

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(1)
है
शूल 
कुबोल 
उर बेधे
निंदा कराए
जगत हँसाए
मन पीर बढ़ाए
(2)
है
शस्त्र 
त्रिशूल 
भूतनाथ 
असुर डरे
जग पाप बढ़े
नृत्य- तांडव करे

-- रेणु रंजन 
( स्वरचित )
10/01/ 2019

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जन-जन में ज्ञान का ऐसी जोत जलाना 
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मां शारदे कुछ देना या नहीं देना
पर जन-जन में ज्ञान का ऐसी जोत जलाना।

ताकि मिट सके हमारे देश से
भ्रष्टाचार की फैली विसंगतियां,
और मिट सके देश समाज से
अश्लीलता,व्याभिचार की कुसंस्कृतियां।

मां शारदे कुछ देना या नहीं देना
पर जन-जन में ज्ञान का ऐसी जोत जलाना।

ताकि बदल सके हमारा समाज 
छोड़ सके संकीर्ण मानसिकता 
और समझ सके हर रिश्तों की भूमिका 
निभा सके अपने हिस्से की व्यवहारिकता।

मां शारदे कुछ देना या नहीं देना
पर जन-जन में ज्ञान का ऐसी जोत जलाना।

ताकि सबों का दिल सागर हो 
जो विलय कर सके मन मैलों को
और हर दिल प्रकाशमान सूर्य हो
जो मोम-सा पिघला दे दिल शैलों को।

मां शारदे कुछ देना या नहीं देना
पर जन-जन में ज्ञान का ऐसी जोत जलाना।

ताकि मानसिकता हो सबका विशुद्ध 
जो कर सके सदा ही अच्छे कर्म 
और मन हो सबका बिल्कुल पावन
जो समझ सके सभी धर्म का मर्म।

मां शारदे कुछ देना या नहीं देना
पर जन-जन में ज्ञान का ऐसी जोत जलाना।

--रेणु रंजन

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आओ हे भद्र जन! सब मिलजुल ऐसा त्योहार मनाते हैं,
सुंदर, स्वच्छ मन जन-जन में हो,ऐसी जागृति फैलाते हैं।

लीक से हटकर कुछ कर दिखाने का जज्बा सबमें हो,
कुछ खास नही जीवों से स्नेह करने का गूर सिखाते हैं।

अज्ञानता रूपी अंधकार से खुद को मुक्त करके रखना 
सवेरा के असल तात्पर्य से जीवन बगिया को महकाते हैं।

सभ्य आचरण को नित्य कर्म में हम सभी अपनाकर
स्वच्छ, स्वस्थ और सफल जीवन का बुनियाद बनाते हैं।

आधुनिकता का नंगापन हमारी संस्कृति नही है बंधुओं
आधुनिक स्वच्छ विकास का अपना ध्येय विकसाते हैं।

सबसे सबका भला हो ऐसी जागृति का आगाज करें हम
सुख-दुख मिलकर झेलें, ऐसा स्वभाव विश्वास जगाते हैं।

कमजोर, लाचार, बेसहारों, बुजुर्गों का सहारा बनकर
सुंदर, सहज, मानवता का अपना व्यवहार अपनाते हैं।

होली, दिवाली, ईद, गुरुपर्व, क्रिसमस त्योहार संग मना,
हम सब एक ही धर्म भाईचारा का जन-जन में फैलाते हैं।

आओ हे भद्र जन! सब मिलजुल ऐसा त्योहार मनाते हैं,
सुंदर, स्वच्छ मन जन-जन में हो,ऐसी जागृति फैलाते हैं।

----रेणु रंजन'

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* बेपर्दा हो रहे लोग *

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ऐतबार नहीं होता है मुझे अब इस दुनिया पर,
जलते-भुनते हैं लोग यहां दूसरों को बढ़ते देख।

घिन आती है दिखावों की व्यवहारिकता पर,
कुढ़ते पल-पल लोग यहां दूसरों को हंसते देख।

असलियत दिखता नहीं किसी के चेहरों पर
इठलाते हैं लोग यहां दूसरों को झुकते देख।

राज दिल का समझ न आए, किसी को देख,
सकुचाते हैं लोग यहां दूसरों को संभलते देख।

अपनों की खुशी में शामिल नहीं होने के सौ बहाने,
बेचैन रहती आत्मा दूसरों को जंग जीतते देख।

शर्मों हया दिखती नही है अब सबकी आंखों में,
बेपर्दा है लोग यहां दूसरों को पर्दा करते देख।


--रेणु रंजन
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गुरु कृपा बिन जगत में निखरता नहीं इंसान,
संकटों से जुझकर भी बिखरता नहीं इंसान। 

जो करे नहीं जीवन में गुरु का आदर सम्मान, 
उसको जगत में मिले नही किसी का भी मान।

गुरुदक्षिणा है रखना अपना मर्यादित आचरण, 
तभी सुंदर सुफल है इंसान का संपूर्ण जीवन।

गुरु का रखना जीवन में हे इंसां, देवतुल्य स्थान ।
मिलता रहेगा आजीवन सुख,समृद्धि और वरदान।

अगर गुरु का होगा जीवन में, हाथ तुम्हारे माथ,
दुख तुम्हारे सब्र से भागेगा, मिलेगा सुख का साथ।

प्रथम गुरु जननी माता का रखना हरदम ख्याल,
उनकी खुशी से ही रहेंगे हम आजीवन मालामाल।

*रेणु रंजन 
( शिक्षिका ) 
रा0प्रा0वि0 नरगी जगदीश ' यज्ञशाला
सरैया, मुजफ्फरपुर ( बिहार )

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जीवन के घरौंदे में खुशी के पल है अनमोल, 
इसे पाना चाहो तो मिल जाते हैं बिन मोल।

खुशी ऐसे मिलती नही, इसे पायी जाती है, 
कर्म के रास्ते बढ़ इसे अनुभूत की जाती है।

खुशियां पाने का मन का अलग अंदाज है, 
जीवन झंझावातों से उबरने का आगाज है।

मन चाहे तो कदम-कदम पर खुशी ढूंढ लेते,
नहीं तो खुशी के पल में भी नाखुशी ढूंढ लेते।

सच्ची खुशियां बिन बताए ही पास आती है, 
मन के खोट में आकर भी दूर चली जाती है।

दोषरहित कर्म पथ पर निरंतर बढ़ते रहिए, 
खुशियों भरे पल खुद-ब-खुद गढ़ते रहिए।

●रेणु रंजन 
( शिक्षिका ) 
रा0प्रा0वि0 नरगी जगदीश ' यज्ञशाला ' 
सरैया, मुजफ्फरपुर ( बिहार ) 
दिनांक 25/07/2018.


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मेरी जान, मेरी शान, मेरी आन है तिरंगा 
सब धर्मों से बड़ा है अपना देश 
देश पर बलि-बलि जाएंगे हम।
जान भले जाए पर झुकने न देंगे तिरंगा।
मेरी जान, मेरी शान, मेरी आन है तिरंगा।

हम शिक्षक हैं राष्ट्रनिर्माता, शिक्षा जोत जलाएंगे हम-2
जब भी पुकारे भारत माता, दौड़े चले आएंगे हम-2
जान भले जाए पर झुकने न देंगे तिरंगा।
मेरी जान, मेरी शान, मेरी आन है तिरंगा।

रहे न कोई मूरख अज्ञानी ऐसी युक्ति भिराएंगे हम।-2
रहेगा न कोई यहां गुलाम जश्न-ए-आजादी मनाएंगे हम।-2
जान भले जाए पर झुकने न देंगे तिरंगा।
मेरी जान, मेरी शान, मेरी आन है तिरंगा।

मेरी जान, मेरी शान, मेरी आन है तिरंगा 
सब धर्मों से बड़ा है अपना देश 
देश पर बलि-बलि जाएंगे हम।
जान भले जाए पर झुकने न देंगे तिरंगा।
मेरी जान, मेरी शान, मेरी आन है तिरंगा।-2


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मन के मीत
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मन के मीत
हर पल ढूंढा प्यारे
दिशा - दिशा कोना कोना
तुझ सा कहीं न मिला
मेरा मन मीत रे।

किया रोशन जहां मेरा
तो , तिमिर का डर भी
दिखाया तुने कभी- कभी
है कैसी तेरी रीत रे।

जीवन के झंझावातों से
झंकृत-विकृत जिंदगी
फिर भी साहस मिलता
जब गाऊं तेरी गीत रे।

खुशबू का दामन थामे,
बदबू के कुछ झोंके भी आए
सब पर तेरी महक भारी
ये कैसी तेरी जीत रे।

थकती हारती जब जिंदगी
आ जाता हंसाने तू
करतब तेरी ऐसी प्रभु
मन होता शीत रे।

मन के अंतःस्थल में
झलक तेरी ही मिलती
एक पल ओझल न होते
है तुझसे मेरी प्रीत रे।

हर पल ढूंढा प्यारे
दिशा - दिशा कोना कोना
तुझ सा कहीं न मिला
मेरा मन मीत रे।

रेणु रंजन
शिक्षिका, राप्रावि नरगी जगदीश
पत्रालय : सरैया, मुजफ्फरपुर


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अजब सी उलझन है दिल में
तुम बदलते गए इस तरह क्यूं,
कभी मेरी बात रही सबसे अच्छी 
अब बना दिये मुझे गलत क्यों।

तुम्हारी खुशी का रखा ख्याल हरदम
फिर मुझे दुखकारी बना दिये क्यूं,
कभी थी मेरी परवाह तुझे बहुत 
अब तुम बेपरवाह बन गए क्यूं।

जीवन के सुख दुख में साथ निभाए 
अब अकेले मुझे छोड़ दिए क्यूं,
रिश्ते नातों की फिकर बहुत थी
अब सबसे नाता टूट रहा क्यूं।

थकने लगी हूं अब जीवन के राह में
उलझनें दिन-ब-दिन बढ़ता रहा क्यूं,
छूटता जा रहा है तेरा साथ मुझसे 
दिल पर जख्म और बढ़ता रहा क्यूं।

अजब सी उलझन है दिल में
तुम बदलते गए इस तरह क्यूं,
कभी मेरी बात रही सबसे अच्छी 
अब बना दिये मुझे गलत क्यों।

--रेणु रंजन 
(स्वरचित )
23/08/2018
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हुई जो खताएं मुझसे, उसे तू बिसार दे
मेरे मन के गीत बन जा जिंदगी संवार दे।

दिल में बसाकर तू जीवन विस्तार दे
मेरे मन के मीत बन जा जिंदगी संवार दे।

खुशबू हरपल तेरी ही रहती है सांसों में
मेरे मन के प्रीत बन जा जिंदगी संवार दे।

उलझ-उलझ जाती हूं तेरी बातों-बातों में
मेरे मन के जीत बन जा जिंदगी संवार दे।

तुझसे है गुलशन-सा बहार मेरे जीवन में
मेरे मन के शीत बन जा जिंदगी संवार दे।

जीवन की खुशियां है तुझसे इस जग में
मेरे मन के रीत बन जा जिंदगी संवार दे।

- *रेणु रंजन*
24/08/2018


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मन की चाहत 
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चाहुं तुझे ऐसे
जैसे चकोर चंदा को चाहे।

खिलखिलाना, चहकना मेरा
मन का उल्लास हो तुम
प्रेम का स्पंदन ऐसे
जैसे श्याम को राधा चाहे।
चाहुं तुझे ऐसे
जैसे चकोर चंदा को चाहे।

महकना, संवरना मेरा
तन पर बिंदास हो तुम
प्रेम की बरसात ऐसे
जैसे सूखी धरा सावन को चाहे।
चाहुं तुझे ऐसे
जैसे चकोर चंदा को चाहे।

हलचल, द्रुमदल मेरा
माथे की लाली हो तुम
मन की दशा ऐसे
जैसे पुष्प-पराग को भंवरा चाहे।
चाहुं तुझे ऐसे 
जैसे चकोर चंदा को चाहे ।

इठलाना, इतराना मेरा
मन का विश्वास हो तुम
मिलन की तत्परता ऐसे
जैसे नद-धारा सागर को चाहे।
चाहुं तुझे ऐसे
जैसे चकोर चंदा को चाहे।

जब अपने मन को टटोलती 
सर्वत्र तुझको ही पाती
बेचैनी बेसब्री ऐसे
जैसे निशा उजाला को चाहे। 
चाहुं तुझे ऐसे
जैसे चकोर चंदा को चाहे।
--रेणु रंजन 
(स्वरचित )
27/08/2018

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वो और मैं
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वो गीत मेरे 
मैं उसकी कविता 
वो शब्दों की श्रृंखला 
मैं उसकी वाणी 
वो जलधि का विस्तार 
मैं उसकी लहरें
वो गहराई में
मैं उसके समतल में
वो आकाश-सा असीमित 
मैं धरती की सहनशीलता 
वो बादल की घनघोर घटा
मैं उसकी बारिश की बूंदें
मैं उसकी कलकल ध्वनि
वो दिनकर -सा आभासित
मैं चांद की चांदनी 
वो मुझमें प्रतिबिंबित 
मैं उसमें प्रतिबिंबित 
बस वो और मैं
जगत सृष्टि की सुंदर कृति।
--रेणु रंजन 
(स्वरचित )


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जीवन मार्ग
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छूने का हौसला गर है
तो छू लो आसमां को
मेहनतकश बन तोड़ दो
हर उस पत्थर पहाड़ को
जो तेरे कर्म के रास्ते आए,
हिम्मत की पराकाष्ठा से
पाट दो उस खाई को 
जो तुझे नीचे धकेलने का
कोई साजिश करे।
जीवन का मजा तभी है
जिसमें सुख-दुख का संगम हो,
जो सुख पाने पर 
अपने सारे उसूल भूला दे
अहंकारिता के बस में हो जाए,
या जो दुख से घबराकर 
जीवन जीना छोड़ दे,
ये तो बुजदिली होगी उसकी
जीवन का मजा क्या यारों 
जो कष्ट सहे नही 
जीवन को जीने में।
----रेणु रंजन
( स्वरचित )
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संतुलन बिगड़ने लगा है 
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हे मानव अब तो रूक जाओ 
स्वार्थ पर अपने अंकुश लगाओ
मेरी निधि जीवन मात्र के लिए है
तेरे बढ़ते असीम स्वार्थ के लिए नहीं।

तेरे बढ़ते असीम लालच के कारण 
हरे भरे आंचल छलनी हो गए है 
मेरी सहनशीलता अब टूटने लगी है 
मेरे अंतस में हलचल मचने लगी है।

अति लोभ तेरा मतिभ्रष्ट कर दिया है
मेरे संतानो को ही मिटाने लगा है 
कई प्राणियों का अस्तित्व मिट गया 
कुछ प्राणी मिटने के कगार लगे हैं। 

प्रकृति हमारी विकृत हो रही है
वन-संपदा दिनोंदिन क्षीण हो रही है 
मेरे गर्भ में संचित संपदाएं भी 
तेरे लालच की भेंट चढ़ती रही है।

प्राकृतिक आपदाएं बढ़ने लगी है
कभी व्याकुलता में हलचल होती तो
कहते हो कि बचो भूकंप हो रहा है 
पर समझते नही मेरी पीड़ा बढ़ रही है।

अकसर अतिवृष्टि, ओलावृष्टि होते 
बाढ़ की विनाशकारी लीला दीखती 
अति ताप मेरे ग्लेशियर गला रहे
फिर भी तुम्हें अक्ल क्यों नही आती।

देखो मानव अब भी होश में आओ
अब मेरा संतुलन बिगड़ने लगा है 
प्रकृति के कोप से बच नहीं पाओगे 
तब तुम भी धरा से समूल मिट जाओगे।

--रेणु रंजन 
( स्वरचित ) 
31/08/2018

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तू जीत गए रे मैं हारी
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दुनिया के मेले मे भीड़ पड़ी रे भारी...
तू जीत गए रे मैं हारी। -2

सुख के साए में सब साथ निभाए।
दुख पड़े जब तो सब देते बिसराए।।---2
जगत में है खेल तेरी रची सारी।
तू जीत गए रे मैं हारी।-2

आस लगी है इस दीनन की तुम पर ।
कर दे नैया पार फंसी मझधार पर।। 2
सुख दुख में डोले रे दुनिया सारी।
तू जीत गए रे मैं हारी।--2

करतब तेरी अजब रही है वसुंधरा पर।
कोई हंस रहा है कोई रो रहा यहां पर।। 2
हृदय में हाहाकार मची रे भारी
तू जीत गए रे मैं हारी। - 2

नाम जपते रहे हम सुबहो - शाम तेरा।
फिर क्यों बिगड़ता रहा है घर मेरा।। 2 
आई तेरे दर रे किस्मत हारी।
तू जीत गए रे मैं हारी।-2

दुनिया के मेले मे भीड़ पड़ी रे भारी...
तू जीत गए रे मैं हारी। -2
-- रेणु रंजन
( स्वरचित )

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ये जिंदगी मेरी तन्हा-तन्हा-सा क्यूं है।
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तुमसे जुड़ी है मेरे जीवन की आशाएं
फिर कुछ कमी खलती रहती क्यूं है।
ये जिंदगी मेरी तन्हा-तन्हा-सा क्यूं है।

रास नहीं आता है कुछ भी यहां मुझे 
मेरा मन पल-पल बेचैन रहता क्यूं है।
ये जिंदगी मेरी तन्हा-तन्हा-सा क्यूं है।

हर वक्त मन ढूंढता रहता है तुम्हें ही
दूरियाँ, मजबूरियां मेरे हिस्से क्यूं है।
ये जिंदगी मेरी तन्हा-तन्हा-सा क्यूं है।

कब तलक यह जीवन जीना है मुझे 
यह सफर हमारा धीमा-धीमा क्यूं है।
ये जिंदगी मेरी तन्हा-तन्हा-सा क्यूं है।

जुदाई का जहर अब पीना मुश्किल 
यादों में दिन-रात कटती रहती क्यूं है। 
ये जिंदगी मेरी तन्हा-तन्हा-सा क्यूं है।

देख नहीं पाती हूं तुम्हें रोज नजरों में
नजरें राहों पर भटकती रहती क्यूं है।
ये जिंदगी मेरी तन्हा-तन्हा-सा क्यूं है।

इंतजार में सावन छलकते हैं नयनों में
हमें वक्त का गहरा जख्म लगा क्यूं है।
ये जिंदगी मेरी तन्हा-तन्हा-सा क्यूं है।

नासूर नही बन जाए जिंदगी रहम कर
दिल मेरा अब सहमा-सहमा-सा क्यूं है।
ये जिंदगी मेरी तन्हा-तन्हा-सा क्यूं है।
---रेणु रंजन 
(स्वरचित )



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हिंदी 
महान
भाषा ज्ञान 
जाने जहा
"हिंदी" भाषा पर पिरामिड विधा में रचना--


1.

है
पूरा अरमान 
इसका करें मान।

2.
है 
हिंदी 
हमारी 
खूब प्यारी
दुनिया सारी 
ले लें जानकारी 
सब भाषा पे भारी।

3.
ये
हिंदी 
दिवस 
है कालिक
भाषा माणिक 
नियति जालिक
न हो औपचारिक।

--रेणु रंजन 




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एक लकड़हारा 
कुल्हाड़ी लेकर जा रहा था 
तेज कदमों से जंगल की ओर,
आते देख लकड़हारे को
जंगल के पेड़-पौधे 
कुहकने लगे
आज किसकी बारी है कटने की
जंगल में मच गया शोर।

लकड़हारा आया 
काटने लगा
एक हरे-भरे पेड़ को,
कुल्हाड़ी की प्रत्येक चोट से 
पेड़ लगा 'आह' भरने-
"हा-मानव, हा-मानव
क्या करोगे मुझे काटकर 
पलंग बनवाओगे, 
किवाड़-खिड़कियाँ बनवाओगे, 
फर्नीचर बनवाओगे?"

झल्लाकर लकड़हारा बोला-
"तुझे काटकर 
मन की आस पुराऊंगा, 
नाना प्रकार के सुख-साधन जुटाऊंगा,
आराम से जीवन सुख भोगुंगा।"

पेड़ बोला- "ना-ना-ना,
तुम कुछ न कर पाओगे, 
पर्यावरण के रक्षक हम 
अभाव में मेरे 
प्रकृति अपना रूप दिखाएगी, 
तूफान आएगा 
बसेरा उड़ा ले जाएगा, 
बाढ़ आएगी 
सब बहा ले जाएगी,
दिनकर प्रचंड बनकर
प्राणियों को झुलसाएगा,
धरती पर जीवन का 
नामोनिशान नहीं रह पाएगा 
तब तो तुम्हारा भी
अस्तित्व ही मिट जाएगा।"

--रेणु रंजन 
(स्वरचित )



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यादों के तानेबाने 
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उदासी छोड़कर जरा-सा मुस्कुरा तो ले
देखना दिल में उमंग-ही-उमंग खिलते हैं।

लबों पर प्यारी-सी मुस्कान बिखरा तो ले
देखना तन-मन की सारी थकान मिटते है।

भूला दे उन्हें जो वक्त-बेवक्त याद आते हैं 
तेरे तन-मन को दुख से आहत करते हैं।

बस याद कर लेना सिर्फ उन यादों को 
जो तन-मन में मीठी-मीठी सिहरन भरते हैं।

संजोए रखना हर खूबसूरत पल यादों में
जो तेरे घर प्रेम पियूष की बारिश करते हैं।

इंसानो की हमेशा से यही फितरत रही है 
अक्सर यादों के तानेबाने बुना करते हैं।

--रेणु रंजन
( स्वरचित )




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तुझे चंडी बननी होगी 
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उसकी खामोशी मुझे अक्सर डराती रहती है
कौन-सी आग उसके अंदर भड़कती रहती है 
गुमसुम बनकर आकाश की ओर दृष्टि जमाए
न जाने अंदर-ही-अंदर क्या घुटकती रहती है।

उसके चेहरे की मासूमियत कहीं खोने लगा है
उसकी सजल आंखों में पीलापन पड़ने लगा है
लाख शोर-गुल हो पर उस पर कोई असर नहीं
नहीं जाने उसका दिमाग क्यों अब सोने लगा है।

किसी को देखती तो आंखों में हजार सवाल होते,
आए दिन लड़कियों के अस्मिता पर बबाल होते,
गंदी नजरों से नारी देह का क्यों होते अवलोकन, 
क्यों नहीं उन्हें अपनी बहन-बेटी जैसे ख्याल होते?

जमाना बहुत सभ्य होने लगा है और लोग भी 
पशु, पशु ठहरे, पशु बनने लगे हैं अब लोग भी
आज अपने घर में भी महफूज नहीं है लड़कियां
चारों ओर फैले मिलते मानव दरिंदे से लोग भी।

मासूम बेटियों अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होगी 
मानव भेड़ियों से निपटने को हिम्मत रखनी होगी 
सबक ऐसा मिले कि भूल जाए लड़की कमजोर है 
ऐसे दरिंदों का संहार करने को चंडी बननी होगी।

तोड़ अपनी खामोशी आगे तुझे अब बढ़नी होगी 
लेकर प्रण मन में दरिंदों को धरा से मिटानी होगी 
फिर किसी मासूम पर उनका कहर नहीं टूट पाए
शस्त्र अपने हाथों में लेकर हुंकार तुझे भरनी होगी। 

---रेणु रंजन 
(स्वरचित )



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तुम्हारे सिवा नहीं कोई तृष्णा 
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मोहब्बत है मुझे 
तो सिर्फ तुमसे,
दिल में बसाया अपने
तो सिर्फ तुमको,
अब जीना है तुमसे 
और मरना भी तुमसे,
दिल में भरे उमंग 
मन की चांदनी तुम, 
गम का सैलाब, 
खुशी का तूफान तुम, 
जिंदगी की हर एक 
हकीकत तुम, 
होंठो की मुस्कान 
और हर ख्वाब तुम, 
तुम्हारे सिवा चाहत नही मुझे 
किसी और वस्तु की,
तुम हो जीवन में तो 
भ्रमित नही कर पाएंगी
जगत की कोई भी मृगतृष्णा।

--रेणु रंजन
(स्वरचित )




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टूटने लगी थी मैं, बिखरने लगी थी, 
फिर से आकर वह मुझे जोड़ गया,
सपने टूट गए थे, फिर से दिखा गया,
मन में मेरे नया एहसास वह जगा गया।

खिलने लगी हूं मैं, महकने लगी हूं,
फिर से आकर वह मुझे सौरभ दे गया,
जीवन में बहारों का गुलशन खिला गया,
नव उमंग से तन-मन मेरा फिर भर गया।

हमारा खुबसूरत पल यादों में कैद था,
वह फिर उस पल को आजाद करा गया,
जीवन में मेरे आनंद भरा क्षण दे गया,
भूलायी नहीं, वह मेरे रूह में ही बसा रहा।

जब-जब जीवन धारा क्षीण होती थी,
आकर धारा को प्रवाहमान करता रहा,
मेरी खुशियों खातिर तकलीफें सहता रहा
मुझे आग में तपा-तपा कुंदन बनाता रहा।

जब जब जीवन हारने लगती थी,
वह मुझे फिर से विजय-श्री दिलाता रहा,
साहस बनकर मेरा हर दुख हरता रहा, 
जीवन को मेरे ऊंचाईयों तक पहुँचाता रहा।
--रेणु रंजन 
( स्वरचित )




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जुदाई सही नही जाती
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वो लम्हें जब याद आते हैं 
दिल बेचैन-सा हो जाता है।

उसकी बेकरारी की बातें
मेरी तड़प यूं बढ़ा जाता है।

प्यार भरे लम्हें जब आते
वह बेतहाशा घर आता है।

उसके चेहरे की मासूमियत 
पल-पल नयनों को भाता है।

खुशी बेहद उसे होती तो
मेरे बालों को सहलाता है।

बीते लम्हों के ख्यालों में
वह मुझे निहारा करता है। 

बिन बोले नयनों की बातें
वह तुरंत समझ जाता है।

मुझे भी अच्छा नही लगता
जब वह दूर चला जाता है।

उससे जुदाई सही नही जाती
पल-पल नागिन सा डँसता है। 

--रेणु रंजन 
( स्वरचित )



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नयी पीढ़ी कुछ खोने लगी है 
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आजकल मोहब्बत शब्द बदनाम हो चला है 
बाह्य आकर्षण का आडंबर ओढ़ चला है।

दिल की सुंदरता किसी को दिखती नही 
बाह्य सुंदरता पर ही मर मिटने चला है।

लोग मोहब्बत का भी ढोंग करने लगे हैं 
निज स्वार्थ में मोहब्बत ही साधने चला है।

फैल रहा है समाज में आदिम युग-सा हाल 
सभ्य लोगों का भी हाल पशुता का हो चला है।

भावनाएं ही तो है जो शब्दों में उतर जाती 
कुछ ऐसा जो सबकी नजरों से बच चला है।

सच कहने की जुर्रत हिम्मती ही करते हैं
झूठ भले ही आज सच को दबाता चला है।

बुजुर्ग जन पुस्तकों में अपना सुकून ढूंढ रहे 
जीवन संध्या आ गयी आराम खोजने चला है।

बेगैरत जमाने में नयी पीढ़ी कुछ खोने लगी 
अपने ही पालनहार को वो भुलाने चला है।

आधुनिकता के दौर में लोग शहर बसने लगे
गांव में जन्मदाता को ही तन्हा छोड़ चला है।

सबको जीवन में हर खुशियां नसीब तो नही 
पर शुष्क खुशियाँ ही दामन में भरने चला है।

क्षितिज पर धरती आकाश का मिलन 
मिलन लगता है दिल के करीब हो चला है।

---रेणु रंजन
(स्वरचित )




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1. है
जय 
जवान 
समर्पित 
शक्ति अर्पित 
देश अधिकृत 
जनता सुरक्षित।

2. है
सत्य
अहिंसा 
व्रत धारी
महात्मा गांधी 
दिलायी आजादी 
सुखी है देशवासी।

3. था
सादा
जीवन 
उद्धारक 
सच्चे शासक 
भारत के 'लाल'
जाने देश कमाल।

4. थे
धर्म 
अहिंसा 
देश जान
सादा जीवन 
कार्य थे महान 
बापू जाने जहान।

--रेणु रंजन 
(स्वरचित )
02/10/2018




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माटी की सुगंध सोंधी-सोंधी
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धरातल पर जीवन की उत्पत्ति माटी की ही देन है,
जल संयोग कर यह हर जीवों की जिंदगी सींचती।

सब जीवों का रहन-सहन, हर कार्य-कर्म माटी पर,
जीव-जीवन की हर लीला इसी पर तो है सरसती।

जगह-जगह माटी उगलती अन्न के दाने सोना सरीखे,
जिससे जन-जीवन में भरपूर नव ऊर्जा की पूर्ति होती।

घन-घनघोर बारिश की बूंदें जब-जब पड़ती माटी पर, 
चारों ओर अपने यौवन पर हरियाली रहती इठलाती।

हर्षातिरेक होते कृषक, हल बैलों संग जाते हैं खेत में,
माटी कोड़-कोड़ बीज डालते, फिर अन्न ढेर ऊपजती।

बसुंधरा पर फैली हरियालियां, माटी की ही ऊपज,
तभी तो सुगंध सोंधी-सोंधी हवा में बिखरती रहती।

--रेणु रंजन 
( स्वरचित ) 
03/10/2018



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(1)
निश्छल मन
इंतजार की हद
प्रेम अगाध।

(2)
है इंतजार 
सुखद एहसास 
प्रिय प्रवास।

(3)
मन व्याकुल 
इंतजार कठिन 
दिल यकीन।

(4)
मन का बोझ
इंतजार अमोघ
हर्षातिरेक।

(5)
दिल की बात 
प्रिय का इंतजार 
धूले जज्बात।

(6)
सागर बीच 
लहरें इंतजार 
प्यासा है मन।

(7)
सुखी भावना 
इंतजार उसका 
होगा सबेरा।

--रेणुरंजन 
(स्वरचित )




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ऋतुराज का आगमन
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फिजाओं में,
हर जगह
हर दिशा
हर कोने-कोने में
बसंती बयार बिखरी है,
करके सोलह श्रृंगार 
अवनि खुब निखरी है ।

ऋतुराज के आते ही 
हर ओर अजब-सी
सुगंधी फैली है 
मदहोश करने वाली 
रंग-बिरंगी समां
चारों ओर बिखरी है,
करके सोलह श्रृंगार 
अवनि खुब निखरी है।

पुष्पलता के 
ढेरों परिवार 
रंग-रंगीली रूपों में
अवतरित होकर
अवनि के आंचल में
सौरभ बिखेरी है,
करके सोलह श्रृंगार 
अवनि खुब निखरी है ।

ऋतुराज की रानी
सज-धज कर
सबको खुब लुभाती
जीव-जगत में
मधुर मिलन की आस जगाती
सब ओर महक बिखरी है,
करके सोलह श्रृंगार 
अवनि खुब निखरी है ।

रेणु रंजन
(स्वरचित )



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जीवन का सफर 
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लम्हा-लम्हा यह जिंदगी बीतती रही।
कभी रोती तो कभी यह हंसती रही।

नभ में आजाद पंछी बन उड़ती रही
कभी स्वछंद हो हवा संग बहती रही।
लम्हा-लम्हा.........।

भयाक्रांत कभी भयमुक्त होती रही
नदियों-सी निरंतर आगे बढ़ती रही। 
लम्हा-लम्हा.........।

कई साथी छुट गए कई जुड़ते रहे
जीवन की यात्रा यूं ही चलती रही।
लम्हा-लम्हा.........।

जिंदगी हमेशा एक सी होती नही 
कभी गम तो कभी खुश होती रही।
लम्हा-लम्हा.........।

एहसास कभी खट्टे कभी मीठे मिले 
फिर भी जिंदगी चक्की पीसती रही।
लम्हा-लम्हा.........।

सुकून हर पल सभी को मिलता नही 
सुकून पाने के लिए कर्म करती रही।
लम्हा-लम्हा.........।

सफर सुहाना मगर दिल वैरी होता है
कभी सुख कभी दुःख झेलती रही।
लम्हा-लम्हा.........।

साथ होते बाजार, तो कभी तन्हाई 
खींचा-तानी में जिंदगी घिसती रही।
लम्हा-लम्हा.........।

--रेणु रंजन
(स्वरचित )
07/10/2018




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वक्त का ज्ञान 
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धन के अमीर तो बहुतेरे दिखें
पर दिल के अमीर विरले दिखे।

जहाँ-तहाँ भूख तड़पती फिरती
दौलतमंद ही ज्यादा गरीब दिखे।

संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है 
लाचारी किसी की मजबूर दिखे।

असंवेदना मूक दर्शक बनी है 
संवेदना की अर्थी उठती दिखे।

गरीब नही कोई धन से होता है 
मेहनतकश गरीबों में चैन दिखे।

सुख-दुःख से रूबरू हर कोई 
अमीरी की नशा अधिक दिखे।

कथनी-करनी आज है अलग
समरसता में ही कठोरता दिखे।

पैसों की चक्की में पीसती गरीबी 
वक्त का न्याय कभी-कभी दिखे।

---रेणु रंजन
(स्वरचित )



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चलिए जी एक राग प्रीत के गाएं
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चलिए जी आज एक राग प्रीत के गाएं,
आकर चुपके से दिल में उतर जाए।-2

अपनी हसरतों में वो मुझको बसाए,
जिंदगी प्यार से भरा और मिले वफाएं।-2
उसके एहसास से मन गुदगुदाए।
आकर चुपके से दिल में उतर जाए।
चलिए जी आज एक राग प्रीत के गाएं,
आकर चुपके से दिल में उतर जाए।

नाचे मयूर मन सावन बरसात से,
तन-मन सराबोर है बासंती सौगात से।-2
मस्त फाग ताल पर हम गुनगुनाए।
आकर चुपके से दिल में उतर जाए।
चलिए जी आज एक राग प्रीत के गाएं,
आकर चुपके से दिल में उतर जाए।

खेलूं मैं पिया के संग खेल प्रीत के कोई,
गाऊं पिया के संग मस्त मगन हो खोई।-2



मिलन एहसास से तन-मन शर्माए।
आकर चुपके से दिल में उतर जाए।
चलिए जी आज एक राग प्रीत के गाएं,
आकर चुपके से दिल में उतर जाए।

चलिए जी आज एक राग प्रीत के गाएं,
आकर चुपके से दिल में उतर जाए।-2

--रेणु रंजन
(स्वरचित )


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"खेल"24मई 2019

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