वेदप्रकाश लाम्बा लाम्बा






। । ओ३म् । ।
* * * अजनबी * * *
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खुशियाँ तेरे जहान की सब मैं जी गया
होंठों से छू लिया कभी आँखों से पी गया

आती हैं रास मुझको हुक्मरानों की हिदायतें
तेरी रज़ा जान के मैं होंठों को सी गया

करते हैं सब गिला कि अब मैं बोलता नहीं
उनको ख़बर नहीं कि दोस्त मेरा वज़ीर हो गया
दो-चार दिन की हुकूमतें दो-चार दिन है ज़िन्दगी
गूँजेगी बस यही सदा कोई अजनबी गया
पिछले पहर वीरानियाँ मुझसे ख़फा हुईं
शुक्रिया से मिला नहीं न उसके घर कभी गया
अच्छी नहीं तक़रार न सही हैं अदावतें
रिश्तों की झीनी चदरिया मैं सी - सी गया
मिलने को आईं दर तक मेरे दुनिया की नियामतें
सुकून भी आया था उठकर अभी गया
मेरे हुज़ूर मेरी मुहब्बत का रख ख़्याल
तू ही तो आया दिल में मेरे मैं नहीं गया
वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२
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~ यक्ष - प्रश्न ~
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हे यक्ष तेरे प्रश्न कहां हैं
अब काहे तू मौन है
रुधिर नहाया श्वान लपलपा रहा
मानव-अस्थि चबैन जिसका चबौन है
पाण्डुपुत्र स्वजन नहीं थे
यह दानव तेरा कौन है

हे यक्ष तेरे प्रश्न कहाँ हैं . . . . .
ह़स्तिनापुर की ढब वही है
वही जुलाहे वही ताने-बाने हैं
विधर्मी मन के मीत हुए अब
सुधर्मी अब बेगाने हैं
तब के राजा अंधे थे
अब के राजा काने हैं
हे यक्ष तेरे प्रश्न कहाँ हैं . . . . .
योगेश्वर कृष्ण से क्या कहें
योगी अब व्यापारी है
जन-मन की इच्छाओं पर
विश्वविजय की लालसा भारी है
गीता-जयन्ती मोक्षदा एकादशी
दिवस योग का तपती दुपहरी है
हे यक्ष तेरे प्रश्न कहाँ हैं . . . . .
अब अभिमन्यु की हत्या पर
कोई अर्जुन शपथ नहीं लेता
सबसे मारक अस्त्र निंदना
बिन रीढ़ का जीव नहीं चेता
सिर कटा रहा मिमिया रहा
नरपिशाच को दण्ड नहीं देता
हे यक्ष तेरे प्रश्न कहाँ हैं . . . . .
मॉं-बोली बोले अब लाज लगे
नीटी को नीति बना दिया
अगड़म-बगड़म उल्टा-पुल्टा करके
भीम झुनझुना थमा दिया
वर्षा से वर्ष का तोड़ के नाता
दासों का पंथ चला दिया
हे यक्ष तेरे प्रश्न कहाँ हैं . . . . .
हे यक्ष तुझसे कैसा उलाहना
सब समय समय का खेल है
द्वापर का वो प्रहर अंतिम
कलियुग की अब रेलमपेल है
बौनों की इस नगरी में
बौनों का घालमेल है
हे यक्ष तेरे प्रश्न कहाँ हैं . . . . .
आस-निरास के झूले में
इच्छा के फूल खिला देंगे
गंगा गाय और गायत्री
मिलकर पार लगा देंगे
तुम न बिके जो हम न बिके
लुटेरे मार भगा देंगे
हे यक्ष तेरे प्रश्न कहाँ हैं . . . . .
फिर भी शेष इक यक्ष - प्रश्न है
कौन जीता हारा कौन
लूला-लंगड़ा क्यों मेरा भाग्यविधाता
शेष सारे प्रश्न हैं गौण
दसों दिशाएं कूक रही हैं
पसरा बिखरा निर्लज्ज मौन !
हे यक्ष तेरे प्रश्न कहाँ हैं . . . . !
४-५-२०१७ वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२

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* * * राधा के पैरों के निशान * * *
जो चाँद-तारे न रहे
हवा भी इक दिन रुक गई
खो जाएंगे तब दिन और रात
जो भी होंगे उस घड़ी
तेरा नाम लेंगे मेरे नाम के साथ
जो चाँद-तारे न रहे . . . . .
जो कभी वक्त पत्थर हो गया
दरख़्त ऊँचे-लम्बे और घने
रहेंगे पंछियों के बिना
इक तेरा दिल इक मेरा दिल
फिर भी रहेंगे साथ-साथ
जो चाँद-तारे न रहे . . . . .
उलझनों-पहेलियों का मारा हुआ
जो कहीं मैं रुक गया
कहेंगे लोग जाने क्या और क्या
घड़ी सलोनी के समय
बैठेंगे जुड़-जुड़कर के साथ
जो चाँद-तारे न रहे . . . . .
न चाँद की तू चाँदनी
न फूलों जैसा तेरा रूप है
घड़ी-पलों में दोनों पकड़ेंगे राह
तेरी सुगंध उष्मिल-छुअन
मेरी सांसों में रहेंगे सदा-सदा
जो चाँद-तारे न रहे . . . . .
गंगा-स्नान करेंगे
एक ही कलश में बैठकर
जीवन-ताप सब होंगे विदा
राधा के पैरों के निशान
ढूंढेंगे लोग आसपास
जो चाँद-तारे न रहे . . . . . !
वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२
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* माँ गंगा से . . . ! * 'प्रयागराज' में कुम्भ के अवसर पर आयोजित 'काव्य गंगा' के अवसर पर मेरी विनम्र प्रस्तुति :
* * * माँ गंगा से . . . ! * * *
छलकती हुई बूँदों को पलकों से चुनने
शब्दों की बगिया से अर्थों को गुनने
लहरों से तेरी लोरी को सुनने
ताप मन और तन का बुझाने को आया
लुटा कैसे-कैसे बताने को आया
मन-पंछी रोते-रोते सो गया है
माँ वितस्ता से मेरा विछोह हो गया है . . . . .
गाली हुई आज खेती-किसानी
ज्योति जलाना बनी नादानी
मर ही गया माँ आँखों का पानी
मरने को जन्मे हैं गइया के बेटे
बेटों की पीड़ा को धरती समेटे
आँखों का अँजन दृष्टि धो गया है
विज्ञान टपकता लहू हो गया है . . . . .
खिड़कियों से क्यूँ हैं ऊँचे झरोखे
दरवाज़े आने-जाने के धोखे
बंटने-कटने से निखरेंगे रंग चोखे
विषैले प्रश्नों की गले में माला
बरसता है मेंह ज्यों धधकती ज्वाला
लगता है जैसे मनु रो गया है
आँगन गँधीला छत हो गया है . . . . .
देहली की धूलि माथे लगाने
आया हूँ रूठे सितारे मनाने
सगर के बेटों को फिर से जिलाने
इस युग फिर माँ अचम्भा हुआ है
सच की राहों में फैला धुआँ है
हिरदे में पीर कोई बो गया है
लोकराज के यज्ञ का अश्व खो गया है . . . . .
साँवरे हरे दिखते थे राधा के देखे
गालों की लाली थी मोहना के देखे
फूलों की रंगत कर्मों के लेखे
दुर्दिन की धूप कीकर की छाया
कष्टों का ककहरा कहने मैं आया
बगल में बगूला खड़ा हो गया है
हरा रंग आज प्राणहरा हो गया है . . . . .
कठुआ में लुटती केरल में बिकती
मुंबई की बांहों में गिरती-फिसलती
भँवर में भटकने को भँवरी मचलती
तंदूर भूखे ने शील को खाया
नैना जेसिका को घेर के लाया
कानून कालिख सब धो गया है
व्यभिचार-वन में भारत खो गया है . . . . .
धनपति जगत के दीन हुए हैं
श्रीमंत आज श्रीहीन हुए हैं
बगुले तपस्या में लीन हुए हैं
ऊँचे सिंहासन बौने विराजे
सत्य की जय बस कहने को साजे
शासन बिस्तुइया की दुम हो गया है
ऋषिकुल भिक्षुक नया हो गया है . . . . .
शंकर से कहना यह जगने की वेला
अपने-से काँटों के तजने की वेला
समरभूमि में अब कवि अकेला
कहना कि आएं शिवा संग लाएं
बिखरी जटाओं का जूड़ा बनाएं
लगे त्रिवेणी-संगम खरा हो गया है
अमृत-कलश फिर भरा हो गया है . . . . . !
६-२-२०१८
वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२
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* * * इक दूजे की टेक * * *
प्रिये तुम्हारे अधरों पर
स्वीकार तो है मुस्कान नहीं
स्वच्छंद तुम्हारे विचरण में
यह बंधन तो व्यवधान नहीं
प्रिये तुम्हारे अधरों पर . . .
*प्रियतम सुहानी भोर में
तुमसे अब मैं क्या कहूँ
भली करेंगे राम जी
भली है कि मैं चुप रहूँ
प्रियतम सुहानी भोर में . . .
एक मिलेगा एक से
फिर भी रहेंगे एक
हृदय में रक्त रक्त हृदय से
इक दूजे की टेक
एक मिलेगा एक से . . .
*प्राण सखा मृदंग मत छेड़ो
छेड़ो मुरली की तान
कल परसों की मत पूछो
बढ़े तुम्हारा मान
प्राण सखा मृदंग मत छेड़ो . . .
सौगंध प्रिये तुम्हें मात की
कुछ ऐसा मिलाओ मेल
प्रकाश रहे सहेज लें
दीपक बाती और तेल
सौगंध प्रिये तुम्हें मात की . . .
*तन दो इक हम प्राण हैं
सीधी-सच्ची तुम्हारी बात
उसके आगे की सोचूं
दिन में दीखे रात
तन दो इक हम प्राण हैं . . .
दो से होंगे तीन हम
इसका मुझे है भान
दायित्व संसार चलाने का
परमपिता का है वरदान
दो से होंगे तीन हम . . .
*कथनी तुम्हारी अटल है
ज्यों लछमन की रेख
राजा के बोल नित नये
जीवन रेखा में मेख
कथनी तुम्हारी अटल है . . .
प्रिये तुम्हारे अधरों पर
अक्षर के धर कमल देंगे
शपथ भावी संतान की
कल हम राजा बदल देंगे
प्रिये तुम्हारे अधरों पर . . .
*इक आता इक जा रहा
बदलें केवल नाम
साजन जीना तब जियें
डोरी अपने हाथ में थाम
रे साजन ! डोरी हाथ में थाम . . . !
वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२
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🚩 सब जान जाएंगे 🚩
मृत्यु को भी मृत्यु का भय रहा
जब तक तेरे हाथों खङ्ग रहा
इक-इक अक्षर सत्य रहा
जो-जो था तूने माँ से कहा
तेरी कथा वो सब कह देगी
मंदिर में जलती दीपशिखा
श्वान-श्रृगाल मरे-भगे कैसे
सब जान जाएंगे . . . . .
रणभूमि का रक्तिम रंग हुआ
दुर्जन इक-इक कटकर गिरा
ग्रीवा से असि का संग हुआ
विकल टिड्डीदल हर अंग हुआ
पीठ पीछे इक दानव जा पहुंचा
हा ! वीर से कैसा छल हुआ
भूलुंठित खंग हुआ कैसे
सब जान जाएंगे . . . . .
शत्रुदल रुई जैसा धुना
नर-नाहर वीरता-धर्म चुना
"आओ रण में !" सबने सुना
चूहा बिल में बाहर झुनझुना
अंधे-बहरे सब काँप गए
बिके हुओं ने जाल बुना
प्रस्तर-मेंह बरसा कैसे
सब जान जाएंगे . . . . .
नोचा-खोंचा बोया-बीना नहीं
रंग धरती का वापस दीना नहीं
धर्म-प्राण-प्रेम क्या कुछ छीना नहीं
वहाँ अब कोई पर्दा झीना नहीं
विषधर डोल रहे यूँ बोल रहे
मुझसा न जियो तो जीना नहीं
हवाएं हरी हुईं कैसे
सब जान जाएंगे . . . . .
प्राण हथेली जिनके नीड़ कहाँ
घाव कहाँ और पीड़ कहाँ
गमलों में उगता चीड़ कहाँ
छाती तो है पर रीढ़ कहाँ
प्रधानसेवक गरज रहा
सभासदों की भीड़ कहाँ
जीती बाज़ी हारे कैसे
सब जान जाएंगे . . . . .
नाथों के नाथ हे अमरनाथ
बौनों ने बीजी विषैली घास
कुदाल-लेखनी मेरे हाथ
स्वेदकणों से बुझती प्यास
काली सदियों में अल्प समय शेष
हे त्रिनेत्र जग में भरो उजास
तांडव कब-कब हुआ कैसे
सब जान जाएंगे . . . . . !
वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२

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हे राम !
••••••••
नहीं माँगती मृग सोने का
न चाहे तेरी अयोध्या का अधिकार
नहीं सुहाते पहरावे गहने
न फूलों का शृंगार
कलियाँ फूल सब मसल दिए
उजड़ा सपनों का संसार
महक मसली ललक कुचली
दानव की शेष रही फुँकार
उन्नाव कठुआ कलंक-कथा
किसी पर पड़े न इनकी छाँव
नगरोटा सासाराम सुलग रहे
धू-धू कर जलता नगाँव
भीतर-भीतर दहक रहे
केरल और वो बंग
जीने का कोई ठौर नहीं
गोदी ले ले माता गंग
भँवरी साथिन न रही
नैना जली तंदूर
जेसिका धाँय फूँक दी
सत्ता के नशे में चूर
किसको भूलें किसको याद करें
सबका अपना-अपना दाम
रावण भेस बदलकर निकल पड़े
मोम की बाती हाथ में थाम
इनसे तो कंजर भले
बांछड़ा बेड़िया लोग
बेटी बिकती तो पेट भरें
करते नहीं कुछ ढोंग
द्वारिकाधीश चुप-चुप-से हैं
सोये हैं महाकाल
कब खोलेंगे नेत्र तीसरा
भारत की बेटी करे सवाल
हे राम ! जानकी कारने
सागर-सेतु दिया बनाय
घर-घर लंका सज रही
करें अब कौन उपाय . . . ?
९४६६०-१७३१२ वेदप्रकाश लाम्बा
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* प्रहरी *
आँखों में तेरी सपनों के छौने
उछलते-मचलते मैं छोड़ आया था
गर्दन के नीचे चुनरी के पीछे
दिल को दिल से मैं जोड़ आया था
आशाओं की बगिया में बहता वो पानी
घर-आँगन से रिश्ता मैं जोड़ आया था
संभलना कि राहों में फिसलन बहुत है
रिमझिम फुहारें मैं छोड़ आया था
पिछवाड़े वो अपने जो उग रहे थे
काँटे वो इक-इक मैं तोड़ आया था
चढ़ते-उतरते हर मोड़ पर पुकारा करे थी
माँ प्यारी से मुख मैं मोड़ आया था
तेरे केशों की अनसुलझी मीठी पहेली
चेहरे पे इक लट मैं मोड़ आया था
यहाँ छेड़खानी करती है मौत ज्यों तेरी सहेली
वो जिसके इरादे मैं तोड़ आया था
सालों से चल रही थीं जो गर्म हवाएं
उनको मसलकर मैं निचोड़ आया था
आते-जाते लांघा करे थी मेरे घर की चौखट
विषैली वो आँखें मैं फोड़ आया था
हर जतन करेगी फिर से भरेगी
पाप की मटकी जो मैं फोड़ आया था
फिर जुड़ रही है म्लेच्छों-जयचंदों की टोली
जिसका लहू मैं निचोड़ आया था
हवाएं गुज़रती हैं मुझसे पूछकर के
जानती हैं मैं ज़िद्दी बड़ा हूँ
बापू से कहना अभी लाठी न थामें
आन-बान-शान पर मैं अड़ा हूँ
खेलो होली मनाओ दीवाली
जब तक सीमा पर मैं खड़ा हूँ
जब तक कि सीमा पर मैं खड़ा हूँ . . . !
वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२
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* * * अभी रात शेष है * * *
पुन: स्मरण करें आज
कैसे देश श्मशान हुआ था
पंख काटकर सोन-चिरैया के
स्वतंत्रता का गान हुआ था
बलिदानी शव बने थे सीढ़ी
लगाम थामना आसान हुआ था
सूरज उगते बदला नहीं दिनांक
बीच रात स्वामी गुणगान हुआ था
पुन: स्मरण करें आज . . . . .
नर्म गद्दों पर भारत की खोज उधर
इधर आकाश चूमता लाशों का अंबार
लाठी गोली फांसी माँ के सपूतों को
गोलमेज़ पर बैठे वार्ताकार यार
घर छिनने लुटने की खुशी मनाएं वो
नहीं धरती से जिनका सरोकार
काला पानी की कंदराओं में क़ैद भारत
हंसता इंडिया निभा रहा है भाईचार
पुन: स्मरण करें आज . . . . .
स्तन कटे माताओं-बहनों के
युवती बाला बालिका करतीं चीत्कार
धरती से उखड़ गए धरती के लाल
व्यर्थ रही गूँजती चीख-पुकार
और यह अंत नहीं था नासूर का
फैलता अंग-अंग धरता स्वआधार
निर्लज्ज हत्यारिन कानी यह सत्ता
बापू चाचा दोनों हुए सवार
पुन: स्मरण करें आज . . . . .
जब जेहलम का रंग लाल हुआ
छिन गया गुरु का ननकाना
ढाकेश्वरी पुत्रों के रक्त से नहा गई
रामसुत का लवपुर हो गया बेगाना
दुर्जनों को आँच लगी जब लगने
खिलाफती खेल खेल गया मनमाना
कुत्सित अँधी वासना का कीड़ा
सब सत्ताधीशों का जाना-पहचाना
पुन: स्मरण करें आज . . . . .
आग लगी रावी चिनाब के पानी में
बुझी नहीं अभी है जल रही
भूखी-प्यासी जनता बेचारी
वादों के अंगारों पर चल रही
अभी रात शेष है अंधियारी
यह बात हवा ने कल कही
यह जो दिख रहा प्रकाश है
सपनों की चिता है जल रही
पुन: स्मरण करें आज . . . . .
चमड़ी का रंग बदला सत्ताधीशों का
धरा तप रही अभी कैसे चरण धरें
विश्वगुरु को लांछित कर रही
पामारों की रीति-नीति का वरण करें
हम दास कभी थे औरों के
इसी कारण पुन:-पुन: स्मरण करें
विषैली मन:स्थिति जो दासता की
सबसे पहले इसका मरण करें
पुनः स्मरण करें आज . . . . .
भाषा-भूषा सब स्वदेशी हो
माँ भारती के गीत गाएं हम
हिंदी हैं हम वर्ण कर्मानुसार
सागर की लहरों-से मिल जाएं हम
जो कट गए जो बंट गए
वो सब वापिस लौटाएं हम
न कुरेदें रिसते ज़ख़्मों को
राम का राजतिलक-दिवस मनाएं हम . . . !
पुन: स्मरण करें आज . . . . . !
वेदप्रकाश लाम्बा
९४६६०-१७३१२ --- ७०२७२-१७३१२
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* * * बस, एक दिवस मेरी माँ का * * *
सौ दिन तो हैं डायन के
बस एक दिवस मेरी माँ का
मैं तो जानूं अपनी बोली
कोई गजल हायकू न तांका
सौ दिन तो हैं . . . . .
सबसे पहले अम्मा खाई
पीछे खाया बापू
लाज धर्म सब खा गई
जिस-जिस घर में झांका
सौ दिन तो हैं . . . . .
गऊरत पीने वाला भाई
नंगे संग होकर नंगा नाचे
बटमारों की टोली ने
गाँव में डाला डाका
सौ दिन तो हैं . . . . .
यारी लगी कुलच्छनी संग जिस
होना चाहे सब कोई नौकर
पटबीजने की पट बैठी
रात में सूरज ढांका
सौ दिन तो हैं . . . . .
कबीर का ताना-बाना उलझा
सूरदास का रस्ता औंधा
खेती करे गंवार नानक
मैं जिसका चेला बांका
सौ दिन तो हैं . . . . .
हिंदी हिंद की रीत सिखावे
फल लागे झुक जाओ
शुभ सुभाषित चमकावेंगे
ज्यों चाँद गगन में टांका
सौ दिन तो हैं . . . . .
पूरी वसुधा एक ही कुनबा
दसों दिशाएं गुंजित
गाय गायत्री गंगा मय्या
जुग-जुग जीवन हो गया सांचा
सौ दिन तो हैं . . . . .
पंचनद मेरे पिता की भूमि
जेहलम मेरी माता
जमुना-तीरे जनम लिया
जनमन में मेरा वासा
सौ दिन तो हैं . . . . .
माँ बोली जिस नाम लिखाया
जो हिंद की हिंदी जाने
वही बजावे ताली भैया
नहीं और से कोई नाता
सौ दिन तो हैं डायन के
बस एक दिवस मेरी माँ का . . . . . !
वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२
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* * * नई गाथा * * *
बिकते देख के जग में नाते
आँख मेरी भर आई
पीर मेरे हृदय की भगवन्
होवे जग के लिए सुखदायी
माटी से वात अलग कर दो
यह मिलन बड़ा दुखदायी
हे राम ! काहे यह ज्योति जलाई
हे राम ! काहे यह ज्योति जलाई . . . . .
रातें दिनों-सी धुली
दिनों में मिश्री घुली
भोर कोयल की कूक
साँझ साथिन चुलबुली
कर्म चुके मोल चुकाऊं कैसे
तूने तो हाट सजाई
हे राम ! काहे को ज्योति जलाई . . . . .
पंछी कैसे उड़े
पंख बोझिल बड़े
हत्यारे मनमोहन
नाते मोती जड़े
प्रेम की गलियाँ हो गईं मैली
रातों की कालिमा छाई
हे राम ! काहे यह ज्योति जलाई . . . . .
आँखों में सपने नहीं
अपनों-से अपने नहीं
आँच मोह की बुझी
कच्चे अब पकने नहीं
तेरा मेरा साथ पुराना
तेरी जगती न मेरे मन भायी
हे राम ! काहे यह ज्योति जलाई . . . . .
आस बुझने को है
सांस रुकने को है
सत्य-धर्म की ध्वजा
जैसे झुकने को है
न्यायतुला पाखंड-प्रपंच में
समकोण नहीं रह पाई
हे राम ! काहे यह ज्योति जलाई . . . . .
मन जब हारा करें
तुझे पुकारा करें
पानी नाक ऊपर बहे
कैसे धीरज धरें
मेरे रक्त से लिख नई गाथा
जो तेरे मन में आई
हे राम ! काहे यह ज्योति जलाई . . . . . !
वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२
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। । ओ३म् । ।
* * * सिंहानर अवतार * * *
अँखियाँ वणिक हाथ सहप्रेमपथिक
मिलन विरह मिलन की बातें करें
जन्मों के बाद मिला है
मिला है मानव - जीवन की बातें करें
मेरी मसें पल - विपल तेरी नासिका नीचे
जब पहली बार रुकीं
वो मेरी माँ के रतजगों
तेरे पिता के हाथों की सूजन की बातें करें
चाँदी सोना महल दुमहले
नाम दाम सब यहीं रहेंगे
उड़े हवा के साथ जो लहरों के साथ बहे
अपने तन बदन मन की बातें करें
हमारी अपनी प्रीतपगी रातें
और वो दिन अपने
रेचक पूरक से बड़ा सदा - सदा
कुम्भक के बड़ेपन की बातें करें
उठते गिरते उठते तेरे उभार
और मेरे तन की क्षुधित ज्वाला
माँ भारती के कटे हाथ
अंग - अंग सुलग रही अगन की बातें करें
नयनों के तीर हिरदे प्रेमपीर
मीठी - मीठी - सी चुभन की बातें करें
त्रिनेत्र त्रिशूलधारी राम धनुर्धारी
सुदर्शनचक्रधारी धर्म वरण की बातें करें
मेरा कहा मान मैं रहूँ भाग्यवान
या कि तेरी सुन लूँ
नराधमों का जीना ही एक जीना है
शेष समस्त विश्व के मरण की बातें करें
मणिकर्णिका के वार अजीत जुझार
ऊधम करतार के स्वअर्पण की बातें करें
वीर शिवा की चाल महाराणा का खिलता भाल
सावरकर सुभाष के बाँकपन की बातें करें
तू ही कह दे कि तेरा वंश मेरा अंश
धरा पर शेष रहे कि न रहे
आ, रक्तपिपासुओं के क्षरण की
स्वत्व में ईश्वरत्व के अवतरण की बातें करें . . . !
-वेदप्रकाश लाम्बा
९४६६०-१७३१२
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। । ओ३म् । ।
पंजाबी मासिक पत्रिका ' सत समुंदरों पार ' के संपादक श्री इन्द्रजीत सिंह जी के निरंतर आग्रह के चलते चालीस साल बाद दिसम्बर २०१३ में मैंने फिर से लिखना शुरु किया ।
मेरी मातृभाषा पंजाबी और राष्ट्रभाषा हिन्दी है । अत: मैं दोनों भाषाओं में लिखता हूँ ।
* * *
गणतन्त्र दिवस के अवसर पर हर साल दिल्ली के लाल किला में कवि सम्मेलन हुआ करता है। २०१४ के गणतन्त्र दिवस पर कुछ अवांछित लोगों द्वारा वरिष्ठ कवि श्री अशोक चक्रधर को अपमानित करने की कुचेष्टा की गई । प्रस्तुत कविता 'नए सौदागर' तभी लिखी गई थी ।
* * * नए सौदागर * * *
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नए सौदागर आए हैं
दिल - दिमाग पर छाए हैं
नई - नई इनकी बातें हैं
बातों के भीतर घातें हैं
इक पल में कुछ कह जाते हैं
फिर बात पलटते जाते हैं
इनके तो बनते हैं सब कोई
पर यह किसी के यार नहीं
किसी से इनको मोह नहीं
किसी से इनको प्यार नहीं
अपने ही बच्चों की यह
झूठी कसमें खाते हैं
नई - नई इनकी बातें हैं
बातों के भीतर घातें हैं
यह गीत नया इक गाते हैं
पैगाम उसे बतलाते हैं
अज्ञानी हैं सारे बंदे
इनको ही है सच्चा ज्ञान
यह ही एक महान हैं
बाकी सारे बेईमान
छोटे - बड़े को गरियाते हैं
सबको मारते लाते हैं
नई - नई इनकी बातें हैं
बातों के भीतर घातें हैं
यह बल कहाँ से पाते हैं
यह घास कौन - सी खाते हैं
यह रहे तो अपने मालिक को
जाने क्या सौगात में दे देंगे
देश के दुश्मन को देश का
शीश काटकर दे देंगे
ज़हरीली इनकी बातें हैं
यह ज़हर बीजते जाते हैं
नई - नई इनकी बातें हैं
बातों के भीतर घातें हैं
यह रहे तो जाने क्या होगा
यह रहे तो बहुत बुरा होगा
दिल - दिमाग पर छाया जो
उस भ्रमजाल का कटना ज़रूरी है
इन चेहरों के पीछे की
हर चाल समझना ज़रूरी है
यह रहें न रहें कोई फर्क नहीं
विषैले विचार का मरना ज़रूरी है
जब देश धर्म पर आन पड़े
सौगंध प्रताप की खाते हैं
खड़ग उठाकर हाथों में
सिर पर कफन सजाते हैं
नए सौदागर आए हैं
दिल - दिमाग पर छाए हैं
नई - नई इनकी बातें हैं
बातों के भीतर घातें हैं . . . !
५-७-२०१७ -वेदप्रकाश लाम्बा
०९४६६०-१७३१२
* ताज़ा - ताज़ा शहीद हुए श्रीमंत उस जुंडली के नायक थे जो सूर्य (श्री अशोक चक्रधर) के मुंह पर थूकने को प्रयत्नशील थी । * १०-१-२०१८

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एक बार फिर से यादों की पोटली में से एक गीत प्रस्तुत है ; यह गीत ५-३-१९७३ को लिखा गया था ।
* * *
* * * और हम उदास हैं . . . ! * * *
शबाब पर है शहर की रात
और हम उदास हैं
चल चुके हैं घर से वो
आ रहे हैं राह में
कैसे दिलफ़रेब अपने क़यास हैं
और हम उदास हैं . . .
ये कुमकुमों की रौशनी
बिखरी हुई है दूर - दराज़
चूड़ी के बजने की दूर से
आ रही है आवाज़
कुछ नहीं कहीं नहीं
ख़्यालात की बस ये है परवाज़
और हम उदास हैं . . .
वक्त होगा मेहरबाँ
खिलेंगे फूल दुआओं के
मिलेंगे जब वो हमनशीं
वादे होंगे वफ़ाओं के
वीराँ मगर है रहगुज़र
सिर्फ़ साये हैं ये हवाओं के
और हम उदास हैं . . .
फिर तेरे शहर में आज
आए हैं लुटने को हम
दिल पुकारे नाम तेरा
ओ सनम ओ सनम
तू है कहाँ नामेहरबाँ
चिराग़े - सहरी देख ले
बुझ रहा है दम - ब - दम
और हम उदास हैं . . . !
९४६६०-१७३१२ वेदप्रकाश लाम्बा

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••••• अटल जी नहीं रहे •••••
स्तब्ध नहीं नि:शब्द हूँ मैं
अश्रुओं का अंतिम लब्ध हूँ मैं
मात्र एक दर्शक इतिहास का
स्वच्छंद नहीं प्रतिबद्ध हूँ मैं
कांटों से रार ठानी नहीं
टेढ़ी - तिरछी चाल जानी नहीं
सौ बार गिरा सौ बार उठा
पथिक, हार तूने मानी नहीं
इक दिन था देश डोल रहा
इक उत्पाती बिलों को खोल रहा
विश्वपंचायत में जग ने देखा
नर - नाहर इक बोल रहा
विपदा जब आई भारी
जागे तब सब नर - नारी
नगर - प्रांत सब घोष हुआ
अब की बारी अटलबिहारी
राजपरिवार से मुक्त कराया देश को
लोकतंत्र है क्या समझाया देश को
भाषा - बोली सब अलग - अलग
फिर भी एक बताया देश को
फूले गुब्बारों जैसा फूले कौन
जनमत कर लांछित झूले कौन
हंसने वालो कल जग हंसेगा
बोल तुम्हारे भूले कौन
नीचों ने नीचे बोल कहे
वो सब छाती तूने सहे
शिष्य नरेन चमकता भुवनभास्कर
कैसे मानूं अटल जी नहीं रहे
नंगों के दिन में लिहाफ लहे
आवरण छिन्न - भिन्न रहे तहे
कुकर्मों की लंका जल रही
कैसे मानूं अटल जी नहीं रहे
सूरज निज - स्थान से जब टले
पतितपावनी जिस दिन नहीं बहे
वाणी तेरी गूँजे तब भी कवि
कैसे मानूं अटल जी नहीं रहे . . . !
समय रुककर गीत नया इक गा रहा
राहें अनजानी नवपथिक छा रहा
चले गए अटल जी नहीं गए
बीच गगन भारतरत्न जगमगा रहा !
वेदप्रकाश लाम्बा
९४६६०-१७३१२ --- ७०२७२-१७३१२
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 * * अभी रात शेष है * * *
पुन: स्मरण करें आज
कैसे देश श्मशान हुआ था
पंख काटकर सोन-चिरैया के
स्वतंत्रता का गान हुआ था
बलिदानी शव बने थे सीढ़ी
लगाम थामना आसान हुआ था
सूरज उगते बदला नहीं दिनांक
बीच रात स्वामी गुणगान हुआ था
पुन: स्मरण करें आज . . . . .
नर्म गद्दों पर भारत की खोज उधर
इधर आकाश चूमता लाशों का अंबार
लाठी गोली फांसी माँ के सपूतों को
गोलमेज़ पर बैठे वार्ताकार यार
घर छिनने लुटने की खुशी मनाएं वो
नहीं धरती से जिनका सरोकार
काला पानी की कंदराओं में क़ैद भारत
हंसता इंडिया निभा रहा है भाईचार
पुन: स्मरण करें आज . . . . .
स्तन कटे माताओं-बहनों के
युवती बाला बालिका करतीं चीत्कार
धरती से उखड़ गए धरती के लाल
व्यर्थ रही गूँजती चीख-पुकार
और यह अंत नहीं था नासूर का
फैलता अंग-अंग धरता स्वआधार
निर्लज्ज हत्यारिन कानी यह सत्ता
बापू चाचा दोनों हुए सवार
पुन: स्मरण करें आज . . . . .
जब जेहलम का रंग लाल हुआ
छिन गया गुरु का ननकाना
ढाकेश्वरी पुत्रों के रक्त से नहा गई
रामसुत का लवपुर हो गया बेगाना
दुर्जनों को आँच लगी जब लगने
खिलाफती खेल खेल गया मनमाना
कुत्सित अँधी वासना का कीड़ा
सब सत्ताधीशों का जाना-पहचाना
पुन: स्मरण करें आज . . . . .
आग लगी रावी चिनाब के पानी में
बुझी नहीं अभी है जल रही
भूखी-प्यासी जनता बेचारी
वादों के अंगारों पर चल रही
अभी रात शेष है अंधियारी
यह बात हवा ने कल कही
यह जो दिख रहा प्रकाश है
सपनों की चिता है जल रही
पुन: स्मरण करें आज . . . . .
चमड़ी का रंग बदला सत्ताधीशों का
धरा तप रही अभी कैसे चरण धरें
विश्वगुरु को लांछित कर रही
पामारों की रीति-नीति का वरण करें
हम दास कभी थे औरों के
इसी कारण पुन:-पुन: स्मरण करें
विषैली मन:स्थिति जो दासता की
सबसे पहले इसका मरण करें
पुनः स्मरण करें आज . . . . .
भाषा-भूषा सब स्वदेशी हो
माँ भारती के गीत गाएं हम
हिंदी हैं हम वर्ण कर्मानुसार
सागर की लहरों-से मिल जाएं हम
जो कट गए जो बंट गए
वो सब वापिस लौटाएं हम
न कुरेदें रिसते ज़ख़्मों को
राम का राजतिलक-दिवस मनाएं हम . . . !
पुन: स्मरण करें आज . . . . . !
वेदप्रकाश लाम्बा
९४६६०-१७३१२ --- ७०२७२-१७३१२
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* * * कलम का शऊर * * *
समझने को बाकी न कुछ समझाने को
तेरा किरदार काफी है तुझे डराने को
शराफत हुई लाअनत इंसानियत तोहमत हो गई
मेहमान बन के लूटा रहज़न ने आशियाने को
न गिला है कोई न शिकवा न शिकायत
मैं ही ठहर गया था ज़रा-सी देर सुस्ताने को
गाल बजाना हाथ नचाना बेअदबी आँखों की
धरती खूब समझती है अब तेरे हर बहाने को
कलम हाथ में हो तो रब का शुक्र अदा कर
उसकी रहमत है यह ख़लकत सजाने को
शमशीर-सी चमके है हिंदी की सोहबत में
बेशउरी में रह तैयार सिर कटाने को
मैं उठा ही था कि लोग कहते हैं
इक शख़्स फिर लौट गया ज़नानख़ाने को
हाथों में हाथ माँ के जाये सब साथ-साथ
इतना हुनर काफी है बिगड़ी बनाने को
वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२
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* * * रंग जीवन के * * *
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सागर से क्यों नदियाँ मिलती हैं
क्यों भोर में कलियाँ खिलती हैं
बिन मांगे माँ का प्यार मिले
क्यों कलसी को आधार मिले
रंग जीवन के पहचानो तुम
अँखियों का दिल से क्या नाता
बिन कहे कुछ बातें जानो तुम
रंग जीवन के पहचानो तुम . . . . .
जी चुके को सांसें और नहीं
क्यों निर्बल का है ठौर नहीं
छाया में क्यों छाया खो जाए
दिल अपना पराया हो जाए
बहती धारा से रार न ठानो तुम
प्रीत सरीखी पवन कब चुभती तीर-सी
बिन कहे कुछ बातें जानो तुम
रंग जीवन के पहचानो तुम . . . . .
जलती बाती फिर क्यों नाम नहीं
शाख से छिटके का कोई धाम नहीं
धन-संपदा माटी की ढेरी हो जाए
कब सत्ता चरणों की चेरी हो जाए
अपने को बस अपना मानो तुम
सुख और दु:ख के साथी क्यों बदलें
बिन कहे कुछ बातें जानो तुम
रंग जीवन के पहचानो तुम . . . . .
सूरज कब शीतल परभात का
मुख से दूर निवाला हाथ का
काहे कापालिक वामाचारी नहीं सरल
काहे बिन स्नान दान जीवन गरल
प्रेमगीत गगन-सा तानो तुम
डूबने वाला उतरे पार क्यों
बिन कहे कुछ बातें जानो तुम
रंग जीवन के पहचानो तुम . . . . .
सपनों के लिए सोना होगा
हँसने के लिए रोना होगा
जगती आँखों दीखे यह जगती
कागद की नाव नहीं चलती
कर्म छलनी भाग्य को छानो तुम
लाभ-हानि से विचलित नहीं वणिक
बिन कहे कुछ बातें जानो तुम
रंग जीवन के पहचानो तुम . . . . . !
वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२
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* * * ज़ख़्मों के फूल * * *
सुकूँ गया जहान का
मील के पत्थर हिल गए
वो गए तो गए सौगात में
कुछ नग़मे मिल गए
गुम हो गईं परछाईयाँ
उगती सवेर में
मेहरबानियों से उनकी
ज़ख़्मों के फूल खिल गए
वीरानियाँ ख़ामोशियाँ
और दौलत सर्द आहों की
बदले में सिर्फ़ यारो
यारों के दिल गए
कहाँ तक उलझता
मैं बिगड़े नसीब से
उसकी खुली ज़ुबान
मेरे होंठ सिल गए
उनके यहाँ से सिर्फ़ हम उठे
इधर की क्या कहें
लबों की लज़्ज़त आँखों के पैमाने
गालों के तिल गए
मासूम - सा सवाल इक
नश्तर - सा चुभ गया
"अब कब मिलोगे ?"
अहसास नर्म - नाज़ुक छिल गए
कोई कहे न उनकी ख़ता
जानता हूँ मैं
राहे - वफ़ा दुश्वार बहुत
होश के भी होश हिल गए ।
वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२
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* * * * * पुकार * * * * *
आओ मोहन
मोहन आओ
पलक बिछाऊं करूँ सुआगत
ब्याकुल मन मन नहीं मानत
कूकर जात बहुत खिजावत
हुई अति इति बन धाओ
मेरी देह समाओ
आओ मोहन
मोहन आओ
बिसरी नींद राह तकत हैं
नयना कोर नेह भीजत हैं
मलेछ मलिन गारी बकत हैं
हुई सौ - सौ छिमा बिसराओ
चक्र सुदरसन लाओ
आओ मोहन
मोहन आओ
बंसीधर केसव गोपाला
जग अँधियारा सूरज काला
अघाये का मइया भयी निवाला
करो दोफार पुनि न मिलाओ
वाम सीधे सीधा वाम गिराओ
आओ मोहन
मोहन आओ
हे वासदेव यसोदानन्दन
जमुना तीरे घनन - घना - घन
पिरथवी माता पत्थर का वन
विसादग्रस्त धनुर्धारी आन समझाओ
बुद्धि बोझ हटाओ
आओ मोहन
मोहन आओ
खायो माखन मटकी फोरी
गोपिन पकरी तुमरी चोरी
ठहरा मैं चोर पास नहीं कौरी
मोरे मुँह न लगे समझाओ
नवराजन पाठ पढ़ाओ
आओ मोहन
मोहन आओ
नरनायक हे रणवीरा
हे रणछोड़ अनुपम मतिधीरा
दामोदर सुत हीरा का हीरा
निस्तेज हुई जात चमकाओ
सीधी राह दिखाओ
आओ मोहन
मोहन आओ । ।
वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२
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* * * माँ, मेरी माँ ! * * *
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अवाक् देखता मैं तेरे हाथ को
विमान की तरह से नीचे को आ रहा
दिल के दालान में खलबली मची हुई
नयनदीपों का जोड़ा जगमगा रहा
अवाक् देखता मैं तेरे हाथ को . . . . .
इक घुटने पर सिर दूजे पाँव झूलते
आनन्द गर्म गोद का ठंडी में आ रहा
दुग्धपान लालसा भ्रमर-सी गूँजती
पीयूष-युगल तेरा आँचल हिला रहा
अवाक् देखता मैं तेरे हाथ को . . . . .
प्रेम से सना हुआ भीगा दुलार से
कौर मीठा-मीठा मुख मेरे समा रहा
वैकुंठधाम धरा का वो भूलता नहीं
मनमहंत आज भी उत्सव मना रहा
अवाक् देखता मैं तेरे हाथ को . . . . .
दृष्टिडोर अटकी चलभाषी में आज माँ
समय का सितार धुन नई बजा रहा
नवकुसुम खिलते-हँसते नित नई भोर में
कैसा उगा दिवस नया काँटे सजा रहा
अवाक् देखता मैं तेरे हाथ को . . . . .
हाथ आँख व्यस्त सब ज्ञान बांचते
यंत्र मनुज मनुज यंत्र में बदल रहा
स्पर्शसुख स्वप्न हुआ आधी रात का
सोने को रोने को बचपन मचल रहा
अवाक् देखता मैं तेरे हाथ को . . . . .
चिरैया हुई लोप अब हम चिंचिया रहे
पुष्पगुच्छ कागद कागद की तितलियाँ
नहीं लौटेंगे वो दिन दिल मानता नहीं
बस तू न बदलना माँ, मेरी माँ . . . !
अवाक् देखता मैं तेरे हाथ को . . . . . !
वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२

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* * * बस एक शब्द, माँ * * *
आसकिरण जन्मी शुभ-लाभ प्रथम बार मिले
शाला ऊंची प्रेम की घुटने कई-कई बार छिले
उर - अंचल बरसी सुगंध झूम - झूमके
भाग्यबली मन-उपवन सुनहरी संस्कार खिले
चलता-चलता पथिक ठहर जाए जहाँ
वहीं चरण पूजता लक्ष्य, हाँ - हाँ - हाँ . . .
वो पंछियों की पंगत घर लौटती सजन
हृदय की धड़कनें नित निज खोजतीं सजन
आशीष शीश धरके यूँ पूत चल दिए
आँखों की पुतलियाँ सब सहेजतीं वचन
बिन छत की दीवारें कहलाएं घर कहाँ
सिसकता है सूनापन साँ - साँ - साँ . . .
पाँव नीचे धरती सिर पर गगन तना
मेरे साथ - साथ चलता पेड़ इक घना
मैं मेरी मुझको अपने साथ ले चली
जीवन की धूप तीखी तीखी है रे मना
बरसती है आग मेरा बचपन गया कहाँ
गोद का झूला आँचल की छाँअ-छाँअ-छाँअ . . .
टकरा के पर्वतों से वो लौटती पवन
जाड़े के दिनों में आषाढ़ की तपन
वो त्रिभुवन की सत्ता अंगुली से थामना
हाथों के दिलासे होंठों की वो छुअन
स्मृतिवन में आती-जाती सब तितलियाँ
एक शब्द शेष रहा माँ - माँ - माँ . . . !

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* * * चींटी की चाहत * * *
जब होता दिन राम के आने का
खुशियाँ बरसा करती थीं
दिन गिन-गिन कर इस दिन को
अँखियाँ तरसा करती थीं
जब होता दिन राम के आने का . . .
सूरज देवता देर से जगते
साँझ ढले घर को दौड़ पड़े
नन्हें सूरज मुंडेरों पर
राह बुहारते खड़े-खड़े
सूरज देवता देर से जगते . . .
वो पीपल बाबा की पाखी सखियाँ
बिरवे जनतीं जहाँ-तहाँ
जीवन खिलता दसों दिशाओं
राम दीखते कहाँ-कहाँ
वो पीपल बाबा की पाखी सखियाँ . . .
आसन जमाते देवों के देव
गंगा झरती झर-झर-झर
ठंडी में बाहर निकले कौन
भंडारे भर लो भर-भर-भर
आसन जमाते देवों के देव . . .
सबके मन उमंग हुलसती
पाँव न टिकते धरती पर
भगवा पीला हरियाला भोजन
पा जाते हम देहरी पर
सबके मन उमंग हुलसती . . .
रंग-बिरंगा भोजन और वो दिन
भूले से न भूले हैं
कैसे-कैसे भोग बताते परबाबा
कैसे सुख के झूले झूले हैं
रंग-बिरंगा भोजन और वो दिन . . .
मंदिर गूँजती शंखध्वनि
घंटी बोले टन टन टनटन टन
धर्मध्वजा आकाश झुलाकर
राम लौटते जन्मभूमि आपन
मंदिर गूँजती शंखध्वनि . . .
जैसे छाया जैसे धूप
आती जाती आती हैं
कैसा खेल हुआ कैसे
बड़ी अम्मा बताती हैं
जैसे छाया जैसे धूप . . .
बाबा नानक बता गए
बारात पाप की लाया नरभक्षी
राम के घर पर छल-बल से
अपने नाम की टांगी तख़्ती
बाबा नानक बता गए . . .
गोद बिठाया गले पड़ा
दूजा पंचेन लौट गया
अलादीन आन खड़ा बीच में
घर शंकर का हो ओट गया
गोद बिठाया गले पड़ा . . .
मंगलगान बिखर गए सब
धूमधड़ाम बमभड़ाम का शोर यहाँ
अमावस की काली रात नहीं
प्रदूषण की अब भोर यहाँ
मंगलगान बिखर गए सब . . .
हम चींटी बजरंगबली-सी बली
विष दे दे हमको मार दिए
मानुष अब सब एकै न पहिचानबे
अंजुरि भर-भर जीवनीरक्त पिए
हम चींटी बजरंगबली-सी बली . . .
घर-द्वारे त्रिकोण-बहुकोण ज्यामिति
झूठे रसगंधहीन फूल पाती
गरल रसायन चम-चमकीले
सब के सब जीवनघाती
घर-द्वारे त्रिकोण-बहुकोण ज्यामिति . . .
धीरज धरो छाया सरकेगी
जिस दिन गूंगे बोलेंगे
नपुंसक होंगे भस्मीसात
शिव जब नेत्र तीसरा खोलेंगे
धीरज धरो छाया सरकेगी . . .
अभी सियाराम सरयू पार खड़े
इस पार उतारा हो कैसे
युगप्रवर्तक सब पथभ्रष्ट हुए
फिर युग यह न्यारा हो कैसे
अभी सियाराम सरयू पार खड़े . . .
अँधी लालसा सत्ता की
कैसा अँधा मोड़ लिया
ले-लेकर नाम राम का
राम का घर ही तोड़ दिया
अँधी लालसा सत्ता की . . .
हम चींटी की अरदास सुनो
छिमा करो हे नरनारायण
घर नया बने जब तक हे हरि !
मन-मन्दिर कर दो पावन
हम चींटी की अरदास सुनो . . .
सत्य सनातन जग उजियारा हो
रंगोली घर-द्वार खिले
कनक-अक्षतचूर्ण रंगीन भोज
प्रभु ! हमें अगली बार मिले
सत्य सनातन जग उजियारा हो . . . !
वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२
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* * * * * नवजीवन * * * * *
कपोल - कल्पित कथा नहीं
शाश्वत यह सत्य है ।
आज के दिन लौट आए
मान - सम्मान प्राण मेरे ।।
झूम कर जीवन के अँगना
तब ही खुशियाँ नाच उठीं ।
तब ही सौभाग्य चिरायु हुआ
कष्ट हुए अवसान मेरे ।।
दुर्युक्तियों , दुर्योगों और
दुरात्माओं का नाश कर ।
आज के दिन लौट आए
धाम अयोध्या राम मेरे ।।
प्रियवर, मेरे नहीं तेरे नहीं
वे सब के हैं . . . . . ।
सब के मन आह्लाद हो
लक्ष्मी कृपा सब पर बिखेरे ।।
माँ सरस्वती मेरी जिह्वा पर
स्वयं विराजमान हों . . . . . ।
आज का दिन मंगलमय हो
कृपा करें भगवान मेरे ।।
।। वेदवीणा ।।
वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२
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। । ओ३म् । ।
* * * * * * * हे राम मेरे प्राण ! * * * * * * *
जय - जयकार रहे तेरी सदा
अयोध्या के राजा
करूँ तेरे गुणों का गान मैं
तू आ कि न आ जा
करूँ तेरे गुणों का गान मैं . . . . .
माँ जानकी की असीम कृपा
घर में क्लेश नहीं है
तू आये तो मैं धन्य - धन्य
न आये तो कुछ विशेष नहीं है
बच्चे थे अधिक भूखे
बेर कोई अब शेष नहीं है
मेरे मन के भावों का यदि
जँचे तो भोग लगा जा
करूँ तेरे गुणों का गान मैं . . . . .
भाग्य प्रबल नहीं था राजा दशरथ का
मिली न जो इक बेटी
बेटी है घर का ताज
समाज में होने न दे हेठी
वो कर्मों का फल था शूर्पणखा
सोने की लंका समेटी
महकता है मेरा परिवार - घर
बेटियों ने स्नेह से है साजा
करूँ तेरे गुणों का गान मैं . . . . .
भरत जैसे अनुज मेरे
कहा कभी टालते नहीं
मेरे लव - कुश कभी भी मेरा
अश्व थामते नहीं
बहुत दूर अयोध्या अभी विश्राम करो
हँस देते हैं बालक मानते नहीं
म्लेछ मरणहार छोड़ सभी
करते हैं मेरे काजा
करूँ तेरे गुणों का गान मैं . . . . .
नराधमों के दुराचार से अब
नार कोई शिला नहीं होती
करे तुरन्त अग्नि - स्नान कहीं
मिल जाए धरती पे सोती
बहुतेरी यहाँ जी रहीं - विष पी रहीं
जीवन - नर्क को ढोती
न विधान यहाँ अपना रहा
न मन से स्वदेशी हैं राजा
करूँ तेरे गुणों का गान मैं . . . . .
तू आए तो भरत को दिखाना
बिन तेरे क्या अनर्थ हुआ है
लक्ष्मण की सेवा - त्याग
उर्मिला का तप व्यर्थ हुआ है
मची है मारकाट यहाँ
जनसेवा का क्या अर्थ हुआ है
इक राजा की प्रजा थे तब
अब हर मोड़ पे राजा
करूँ तेरे गुणों का गान मैं . . . . .
हे राम मेरे प्राण तेरे बिन
मेरा कौन ठिकाना
हे हरि कौन हरे दु:ख
भरे सुख का खज़ाना
हनुमंत को लाना साथ में
रजतकेशी जाम्बवंत बुलाना
वही कहेंगे उड़कर वत्स
कुकर्मों की लंका पर छा जा
करूँ तेरे गुणों का गान मैं . . . . .
तू आए तेरा स्वागत किंतु
अयोध्या मत आना
अपनों ने तेरे ढहा दिया
तेरा घर वो पुराना
वो भोग रहे राजसुख और तू
आकाश तले छहों ऋतुएं बिताना
बेच खाये धर्म पाखंडी
अब शेष नहीं लाजा
करूँ तेरे गुणों का गान मैं . . . . . !
वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२
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* खोए हैं उनके नैना कहाँ *
खूब चमकती रही बिजलियाँ
बिन बरसे ही बादल गया
बुझ रहा दिल मेरा
खोए हैं उनके नैना कहाँ
बात उन्हीं पर आ रुकती है
दुनिया भर की बातों में
भीजन को तरसे है मन
प्रेम-पगी बरसातों में
उस दिन का रस्ता देखें अँखियाँ
जब होगा हाथ तुम्हारे हाथों में
निखरे बिरवे प्रेम के
महके दिशाओं के सब कोण यहाँ
अधरों के फूल नहीं खिले, पर
मन का पंछी मौन कहाँ
खोए हैं उनके नैना कहाँ . . . . .
भँवरे जब-जब फूलों पर
बैठ-बैठ उड़ जाते हैं
तरुणाई फूलों की वही
प्यासे प्यास बुझाते हैं
पवन झकोरों संग इठलाते
रुनगुन-गुनगुन प्रेमधुन गाते हैं
मेरे जीवन की बगिया में
कब आएगा वो समाँ
धरती पर होंगे चाँद-तारे
घर होगा अपना आसमाँ
खोए हैं उनके नैना कहाँ . . . . .
प्रेम-रोग जग धुँधला दीखे
भीतर बिखरा उजियारा हो
मिलन ही औषध एक आस बस
शेष सभी अँधियारा हो
जगत-नियन्ता नियति संग-संग
खेले खेल इक न्यारा हो
हलधर लौटते गाँव को
बज रहीं जैसे शहनाईयाँ
ऊँची उठती मुंडेर घर की
गहरी होती आँगन की गहराईयाँ
खोए हैं उनके नैना कहाँ . . . . . !
_वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२_

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* आज *
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चुपचाप नदी के कूलों ने
पीछे को हटना सीख लिया
बलि चढ़ती देखी पेड़ों की
पहाड़ों ने सिमटना सीख लिया
माँ नर्मदा हुई बंदिनी
बिलखती है अकुलाती है
यमुना सतलज बहनों जैसे
संतानों से मिलने आती है
ब्रह्मपुत्र भटकता है रस्ता
जब याद जवानी आती है
देख के छिनती सांसें गंगा की
कोसी पछाड़ें खाती है
सांसों का आश्रय पवनदेव
विकास की कारा अधीन हुए
मोल से बिकती है वायु
जीवन के मोल क्षीण हुए
दाएं बाएं कोई बसे
किसी से न कोई नाता है
बैठ द्रुतगति यानों में
मानव किससे मिलने जाता है
छूट रहा है धर्म यहाँ पर
नियमों का पालन छूटेगा
वो दिन भी अब दूर नहीं
हिम का आलय टूटेगा
जनमन की कहने वालों को
मिलता नहीं है जोड़ यहाँ
राजा के रथ में कौन जुटेगा
इसकी लगती होड़ यहाँ
युगों ने गाए वेद-पुराण
इस युग की कोई ऐसी साध नहीं
नर-नारी अब सुमेल कहाँ
व्यभिचार जहाँ अपराध नहीं
हे नाथ ! सौंपा था जिसे
यह संसार चलाने को
मानव-बुद्धि का ठौर नहीं
प्रस्तुत निज नीड़ जलाने को . . . !
वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२
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* * * क्यूँ प्रात नहीं होती * * *
निर्जन नीरव-सा घर-आंगन
नयनन हुई-बीती का मोती
लौट गए हैं चन्द्रमा, क्यूँ
प्रात नहीं होती . . . . .
कोई लाख पुकारे पीछे से
धरती को खींचे नीचे से
ठहरेंगे न हम अब लौटेंगे
आस की दीखे जलती ज्योति
नयनन हुई-बीती का मोती . . . . .
हाथों में पवन की परछाईं
हुलसती-झुलसती हिरदे ज्योति . . . . .
अपना न रहा जो बीत गया
वो प्रेम-प्याला रीत गया
अधरों के छूने से पहले
इक प्यास बुझानी है होती
नयनन हुई-बीती का मोती . . . . .
कोई क्या जाने कोई कहाँ गया
बहुत बूझ-बुझावन है होती . . . . .
भेजे कोई पाती सातों दिन
सपनों से सुरीली रातों बिन
लिख-लिख धरता जाए कोई
मन कागद अंसुवन मसि होती
नयनन हुई-बीती का मोती . . . . .
आकाश को छूते छूकर लौट रहे
सब शब्दों की नई कहानी होती . . . . .
दृष्टि सीमा के पार नहीं
यहीं कहीं प्रेमाधार यहीं
दूर-दूर तक जा बिखरे
वो बात बेगानी है होती
नयनन हुई-बीती का मोती . . . . .
प्यास के पाँव है पीर बड़ी
वीथि वही पथिक नए ढोती . . . . .
सांझ का तारा मीत कहाँ
प्रीत कहाँ और गीत कहाँ
नादान सुरों को छेड़ तनिक
रह जाए न वंशी सोती
नयनन हुई-बीती का मोती . . . . . !
वेदप्रकाश लाम्बा
२२१, रामपुरा, यमुनानगर (हरियाणा)
९४६६०-१७३१२
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विश्वास लुटेरे
* * *
दिखती नहीं पहली-सी ताकत भुजाओं में
सपनीली आँखों का पानी घुल गया हवाओं में
यूँ तो दिखते हैं अब भी स्वप्न सुहावने
आस का पंछी दुबका बैठा वादों की कंदराओं में
भीजा तन मन भीजा गात भीजी अँखियाँ बावरी
बेड़ी तेरे नाम की चाव से पहनी पाँव में
इक तू और तेरा खेल दोनों मन को मौन करें
धूप नहीं अब हम जलते हैं तेरे कद की छाँव में
तुझसे पहले जितने बहुरे बाँके तिरछे मनचले
विश्वास-लुटेरे सहभागी सब सपनों की हत्याओं में
न मांग हमसे पहली-सी वो गलबहियाँ
इतना नीचे झुक न सकेंगे जितना सत्यकथाओं में
९४६६०-१७३१२ वेदप्रकाश लाम्बा
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* * * अचरज * * *
अचरज धरती अम्बर तारे
अचरज चाँद खिले
मैं मतिहीन महकता अचरज
अचरज सपने फूले
भूलूं गलियां साजन की
साजन मोहे भूले
अचरज चाँद खिले . . . . .
तरुवर बीज बीज तरुवर
पीर धरती सहे
स्वर्ण-पादुका चरणन सोहे
मेधा महती रहे
दश आनन दसों दिशाओं
नाभि ढहती रहे
पीर धरती सहे . . . . .
साँच को आँच भरी दुपहरी
ठकुरसुहाती होंठ सिले
जग अंधियारा नयना बिन
नयनन भुवन हिले
विद्या ज्योति जगते नयना
जगती नयन मिले
ठकुरसुहाती होंठ सिले . . . . .
अचरज रोग जीवन-लिप्सा
ज्योति सफल उपचार
पिंड मुंड ब्रह्मांड ठहरे
प्रेम सकल आधार
हे मेरे दिवस के दिनकर
तेरी रहे जयकार
ज्योति सफल उपचार . . . . .
कही-सुनी धरी रही सब
ज्योति साथ रही
मैं से मैं निकल गई जब
मैंने बात कही
माटी मीत अगन दहकती
अंत में राख रही
ज्योति साथ रही . . . . . !
वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२
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(यह कविता आठ जुलाई सन् दो हज़ार पन्द्रह को लिखी गई)
* पश्चाताप ! *
कोरी जाँच-पड़ताल नहीं
न मनभाती बात ।
ऐसा - ऐसा हो चुका
उसे कहें इतिहास ।।
ताज बनाया नशेड़ी - कामी ने
जिसके मन आदर न सत्कार ।
पुत्री का पापी नारकी
बाड़े में औरतें पाँच हज़ार ।।
सीकरी नगर बसाने वाला
निरक्षर निपट गँवार ।
अनूप झील का भेद न जाना
झूठों का सरदार ।।
दो दिन ठहरा नरपिशाच
बस गया औरंगाबाद ।
कर्णावती तो झूठ था
सच्चा अहमदाबाद ।।
लाहौर से कोलकाता जोड़ने वाला
दो दिन चैन से सोया न ।
इक - दूजे के बनाए मकबरे
मरने पर कोई रोया न ।।
भिश्ती चिश्ती भंगी औलिया
सब की कब्रें आलीशान ।
ढूँढे-से मिलते नहीं
सुँदर उनके मकान ।।
भूखे - नंगे बसते थे हम
कुछ नहीं था हमारे पास ।
गज़नी ग़ौरी अब्दाली जैसे
आते थे छीलने घास ।।
जब तक बल और वीर्य था
सिकंदर जैसे पिट गए ।
बुद्धम शरणम् गच्छामि कूकते
राजा दाहिर कट गए ।।
ज़ंजीरों में कट गए
इक हज़ार दो सौ पैंतीस साल ।
फिर छाती पर चढ़ बैठे
दुर्जनों के दत्तक लाल ।।
भोपाल को मरघट करने वाला
हँस रहा हिनहिना रहा ।
नाम बदलकर आज भी
बेशर्मी से दनदना रहा ।।
इक मैगी छूटी क्या हुआ
अपनी करनी पर इतरा रहा ।
आज भी अपने देश को
बड़े चाव से नेस्ले खा रहा ।।
रोज़ी-रोटी छीनने वाले
खुश हैं साथी पर, कुलघाती पर ।
मस्तक नाम लिखाया उनका
पैरों पर और छाती पर ।।
लुटेरे फिर से लौट रहे हैं
हाड़-माँस अब नोंचेंगे ।
फरियाद करें न रो ही पावें
ऐसा कसके दबोचेंगे ।।
मिलकर अपने दत्तक पुत्रों से
क्या सुँदर जाल बुना है ।
हाय री किस्मत ! इन जयचंदों को
हमने आप चुना है ।।
२७-३-२०१६ --वेदप्रकाश लाम्बा
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* * * प्रेम बिना जीवन * * *
भाग्य - रेखा के भाल पर दुर्दिन
इस तरह करते हैं नर्तन
वो कहें जाने की और जग देखे
यूँ नाटक का अवसान होता है
प्रेम बिना जीवन श्मशान होता है . . . . .
यूँ नाटक का अवसान होता है . . . . .
तेरे बिना दिन ये रात सरीखे . . . . .
लगता है पीछे कुछ छूट गया है
शीशे का सामान भीतर टूट गया है
पंख जले छाँव में स्वप्न - परी के
तेरे बिना दिन ये रात सरीखे
तूफ़ान के साये में भला दीपदान होता है
यूँ नाटक का अवसान होता है . . .
मैं कहूँ तू सुने अब वो वक्त कहाँ है . . . . .
फूलों का रंग वही है मगर चमक नहीं है
इकतरफा लगी आग में अब दहक नहीं है
रहे आबाद गुज़रा वो समां कम्बख़्त जहाँ है
मैं कहूँ तू सुने अब वो वक्त कहाँ है
आज के कांधे पे रखकर सिर बीता नादान रोता है
यूँ नाटक का अवसान होता है . . . . .
उड़ता हुआ पंछी इक जगह ठहर गया है . . . . .
मदहोश नहीं करते अब हवा के तराने
जलाता है न जगाता है चाँद किसी भी बहाने
ये अध्याय प्रेम - ग्रंथ का नया - नया है
उड़ता हुआ पंछी इक जगह ठहर गया है
यहाँ पढ़ चुके का घर न कोई सामान होता है
यूँ नाटक का अवसान होता है
प्रेम बिना जीवन श्मशान होता है . . . . . !
वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२
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* * * * * पुकार * * * * *
आओ मोहन
मोहन आओ
पलक बिछाऊं करूँ सुआगत
ब्याकुल मन मन नहीं मानत
कूकर जात बहुत खिजावत
हुई अति इति बन धाओ
मेरी देह समाओ
आओ मोहन
मोहन आओ
बिसरी नींद राह तकत हैं
नयना कोर नेह भीजत हैं
मलेछ मलिन गारी बकत हैं
हुई सौ - सौ छिमा बिसराओ
चक्र सुदरसन लाओ
आओ मोहन
मोहन आओ
बंसीधर केसव गोपाला
जग अँधियारा सूरज काला
अघाये का मइया भयी निवाला
करो दोफार पुनि न मिलाओ
वाम सीधे सीधा वाम गिराओ
आओ मोहन
मोहन आओ
हे वासदेव यसोदानन्दन
जमुना तीरे घनन - घना - घन
पिरथवी माता पत्थर का वन
विसादग्रस्त धनुर्धारी आन समझाओ
बुद्धि बोझ हटाओ
आओ मोहन
मोहन आओ
खायो माखन मटकी फोरी
गोपिन पकरी तुमरी चोरी
ठहरा मैं चोर पास नहीं कौरी
मोरे मुँह न लगे समझाओ
नवराजन पाठ पढ़ाओ
आओ मोहन
मोहन आओ
नरनायक हे रणवीरा
हे रणछोड़ अनुपम मतिधीरा
दामोदर सुत हीरा का हीरा
निस्तेज हुई जात चमकाओ
सीधी राह दिखाओ
आओ मोहन
मोहन आओ । ।
वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२
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* १-१-१९७३ को लिखा गया था यह गीत *
* * *
हा ! प्राण - सखा . . . . . !
* * *
बिन काजल कजरारी पलकों ने
तपती - जलती मरुभूमि में
जल - शीतल कितना बरसाया
उर की काँखें तक भीग गईं
दल - बादल का मन भर आया
ये कैसा विधि का विधान हुआ
हा ! कैसा शर - संधान हुआ
हुआ तार - तार मेरा चीर - चीर
बसी पोर - पोर में पीर - पीर
कैसा निर्दय मन - उपवन पर पतझर छाया
उर की काँखें तक भीग गईं . . . . .
वो लता - कुञ्ज वो नदी - तीर
वो मधुर मिलन औ' मधु - समीर
वो खिलती चाँदनी रातों में
बस बीत गई जो बातों में
तिरती-उतराती यादों ने कब-कब कितना तड़पाया
उर की काँखें तक भीग गईं . . . . .
पथ - प्रदीप सब शूल हुए
तुम दिनकर दिन में हूल हुए
तुम्हें देख कुसुम जो खिलता था
हा ! प्राण - सखा वो झर आया
उर की काँखें तक भीग गईं
दल - बादल का मन भर आया . . . . . !
वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२
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* यादों के झरोखे से *
* यह गीत १५-४-१९७३ को लिखा गया था *
* * * प्राण ! तुम बिन . . . . . ! * * *
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प्राण ! तुम बिन कौन-सा
स्वप्न करूं साकार मैं
नदिया हो बिन नीर जैसे
सुर-स्वरहीन हूं सितार मैं
प्राण तुम बिन कौन-सा . . .
मेघ-दल जब भी गगन में
घनघनाते आ गए
पवन झकोरे कुंज-गलियन में
सरसराते आ गए
मधु के लोभी भंवरे जब-जब
गुनगुनाते आ गए
स्मृतियों के धुंधलके
मन-पटल पर छा गए
न सुर ही मुझसे कोई सजा
न तुम्हें सका पुकार मैं
प्राण ! तुम बिन कौन-सा
स्वप्न करूं साकार मैं . . .
मौन भावना तृषित कामना
तृण-तृण कर जल रही
शशि के दरस को आंख रवि की
दीप-शिखा-सी जग रही
युगों-युगों की प्यासी निशि-बाले
दिन के पीछे चल रही
सिसकती-बिखरती मेरी आस ने
इक बात मुझसे कल कही
आज का दिन और जी लूं
फिर तजूं संसार मैं
प्राण ! तुम बिन कौन-सा
स्वप्न करूं साकार मैं . . .
गिरि का अंचल विस्तार पथ का
और समां ये मदभरा
प्रणय की प्रथम वेदना से
पीत हुई ज्यों वसुंधरा
यौवन की वेला विरह की अग्नि
झुलसाती है ज़रा-ज़रा
कवि की मदिर कल्पना तुम
स्वप्न हो इक रंग भरा
राग-रंगपूरित कल्पित-कथा का
कब तक बनूं आधार मैं
प्राण ! तुम बिन कौन-सा
स्वप्न करूं साकार मैं . . . !
वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२

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। । ॐ । ।
* भजन *
हे त्रिनेत्र त्रिशूलधारी
तीनों लोकों से न्यारे
मां गौरां के हृदयेश्वर
प्राणवल्लभ प्रीतम प्यारे

मेरे नयना बस जाओ
मेरे सूरज - चांद - सितारे
मेरे नयनों के उजियारे . . . . . !
आस का पंछी उड़ - उड़ जाए
ढूंढे रैन बसेरा
काली रात लगे मनभावन
दिन लगे दु:खों का डेरा
कभी इस पार कभी उस पार
मन डोले तुझको पुकारे
मेरे नयनों के उजियारे . . . . . !
पेड़ की जड़ धरती में बांधी
ऊपर फूल खिलाए
माली सींचे भरी दुपहरी
जामुन बन्दर खाए
लूट गए सुख - चैन लुटेरे
सब छूट गए हैं सहारे
मेरे नयनों के उजियारे . . . . . !
कब साथी छूटे कोई तारा टूटे
कोई समझ नहीं पाए
फूल - फूल भटकती मधुमख्खियां
मधु भालू पी जाए
बात सब बिगड़ी दुनिया उजड़ी
बन गए हैं हम बेचारे
मेरे नयनों के उजियारे . . . . . !
इक सुत तेरा देवों का रक्शक
दूजा गणपति कहावे
निर्धन - निर्बल पर आन पड़ी है
ज़रा कह दे किसको बुलावे
बलवानों के सब बन जाते
मेरी बिगड़ी कौन संवारे
मेरे नयनों के उजियारे . . . . . !
नाथों के नाथ भूतों के स्वामी
जटाओं में गंगा - धारा
भस्मरचैया मुखड़ा भोला
मनोहर सुन्दर प्यारा
तेरा हूं मैं तेरा ही हूं
मेरे दु:ख - सुख तेरे सारे
मेरे नयनों के उजियारे . . . . . !
१५-१०-२०१६. वेदप्रकाश लाम्बा

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"स्वतंत्र विषय लेखन "08दिसम्बर 2019

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