त्रिलोकी मोहन पुरोहित


                                     

                                    "लेखक परिचय"
*नाम पुस्तक :-"संवाद के लिए"
लेखक : श्री त्रिलोकी मोहन पुरोहित
*जन्म तिथि - 10फरवरी 1958
*पिता:-श्री लक्ष्मीनारायण पुरोहित
*माता :-श्रीमती गीता देवी पुरोहित
*शिक्षा - पोस्ट ग्रेजुएशन (हिंदी, संस्कृत), बी. एड.
*सृजन की विधाएँ - सभी

*प्रकाशित कृतियाँ -
1)सत्य के नहीं होते पंख
2)सधे हाथों की थाप
3)श्री मनहरण चरित्र (प्रबंध काव्य)
*प्रसारण:-आकाशवाणी एवँ दूरदर्शन से काव्य पाठ एवं कहानी वाचन
*संपादन :- स्मृति, प्रस्तुति, प्राकट्य, उद्धव, दिव्य पथ, कवि-मन, जयवर्धन l

*प्राप्त सम्मान - सारस्वत सम्मान- श्रीनाथ साहित्य संगम नाथद्वारा गोकुलानंद तैलंग सम्मान -श्री द्वारकेश राष्ट्रीय साहित्य परिषद कांकरोली l
महाप्रभु वल्लभाचार्य सम्मान-श्री वल्लभाचार्य तृतीय पीठ कांकरोली
जिला कलेक्टर राजसमंद द्वारा सम्मान l
मनोहर मेवाड़ स्मृति हिंदी-साहित्य सम्मान
जॉइंट्स ग्रुप द्वारा हिंदी सेवी सम्मान मगसम दिल्ली द्वारा शतक वीर एवं रजत रचना प्रतिभा सम्मान
मगसम पटना शाखा द्वारा रजत रचना प्रतिभा सम्मान
मगसम दिल्ली द्वारा लाल बहादुर साहित्य रत्न सम्मान
काव्य विभूषण साहित्य मंडल नाथद्वारा, राजसमंद
*संप्रति - अकादमिक निदेशक, सोफिया संस्थान, कांकरोली, भावा राजसमंद


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

प्राण-सी हो सांस-सी हो,
भूल से न भूलिए।
झूलती-सी माल-सी हो,
झूल के न झूलिए।।

गंध सनी हो
सूत्र लिए,
हो कमल के ताल-सी।

तुम हृदय पे
झूल रही,
मोतियों के माल-सी।

तुम वही गलहार-सी हो,
कंठ लग न खोइए।
प्राण-सी हो सांस-सी हो,
भूल से न भूलिए।।

झूल रही हो
वक्ष लगी,
त्रास नित छोड़ती-सी।

चूम रही हो
सूत्र छूती,
आस तक जोड़ती -सी।

चेतना -सी धार -सी हो,
कामना न मोड़िए।
प्राण-सी हो सांस-सी हो,
भूल से न भूलिए।।

देख लो तुम
पूर्व दिशा ,
नूतती आदित्य को।

बांचती हुई
सह रवि के,
साम-से साहित्य को।

सर्जती -सी मोहिनी हो,
नेह को न तोड़िए।
प्राण-सी हो सांस-सी हो,
भूल से न भूलिए।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित
कांकरोली, राजसमन्द।।राज।।




@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

पिघले भी तो रेत - रेत हो,
फिर पिघला किस काम का?
दम निकले भी मिले न मंजिल,
दम निकला किस काम का?

आँखें सिकती
लाल हुई तब,
सुर्ख रेत का झरना-भरना।

कहाँ राह थी
कैसी मंजिल,
एक सदी का जमना-मिलना।

खुली आँख थी लुटे गाँव थे,
फिर मिलना किस काम का?
दम निकले भी मिले न मंजिल,
दम निकला किस काम का?

बस्ती भर में
होता था तय,
जागें हम सब बारी-बारी।

सब को सोना
कौन जागता,
चौपट थी तब पहरेदारी।

रहो जागते सुन-सुन लुटते,
फिर जगना किस काम का?
दम निकले भी मिले न मंजिल,
दम निकला किस काम का?

चिल्लाते हो
कह मुक्ति-मुक्ति,
मुक्त किया तो अब रोते हो।

बंधन तोड़े
बाहर लाए,
स्वर्ण सुबह में भी सोते हो।

व्यर्थ उबलकर भाप हो रहे,
फिर तपना किस काम का?
दम निकले भी मिले न मंजिल,
दम निकला किस काम का?

अब भी होना
शेष रहा क्या,
केसर का खूनी होना?

सेबों के वे
हरे-भरे से,
बागों का धूनी होना?

तुम जलते वे हाथ तापते,
फिर जलना किस काम का?
दम निकले भी मिले न मंजिल,
दम निकला किस काम का?

आज नहीं तो
कल होना है,
घाटी से सब अपना होगा।

केसर का भी
सेबों का भी,
भारत भर भी अपना होगा।

सब मिलने को तुम से उत्सुक,
फिर बटना किस काम का?
दम निकले भी मिले न मंजिल,
दम निकला किस काम का?

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, वेस्टर्न मॉल, पुणे.।।महाराष्ट्र।।


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

हिन्दी-दिवस की शुभकामनाएं मित्रों । आपके लिए -
हिन्दी है धरती का सागर,
कई हिलोरे बूँद बना हूँ ।
रलमल में खोने का भय है,
इसीलिए अवधूत बना हूँ।

बूँद बना पर
भाप नहीं हूँ,
रसधारा का आप बना हूँ।

शीत-तरल पर
ताप नहीं हूँ,
सरगम का आलाप बना हूँ।

अनुभूत मंत्र-सी जनभाषा,
उसका ही तो दूत बना हूँ।
रलमल में खोने का भय है,
इसीलिए अवधूत बना हूँ।

अवधूत भाव
रखे दिगम्बर,
राख पुताकर डोल रहा हूँ।

नयन विनत कर
हृदय उच्च कर,
विकट ग्रंथियाँ खोल रहा हूँ।

अनुष्ठान-सी सब की भाषा,
वहीं बटुक का सूत्र बना हूँ।
रलमल में खोने का भय है,
इसीलिए अवधूत बना हूँ।

सूत्र भले ही
कह कच्चा-सा
सूत्रधार हूँ पुष्पमाल का।

सम्बन्धों में
सच सीधा-सा,
घृत-कपास हूँ दीपमाल का।

यज्ञ-ज्वाल सी हिन्दी-भाषा,
आहुति मानो पूत बना हूँ।
रलमल में खोने का भय है,
इसीलिए अवधूत बना हूँ।

उगल रहे सब
कालकूट ही,
नीलकंठ का दूत बना हूँ।

जटाजूट धर
मृगछाला ले,
माता के अनुकूल बना हूँ।

हिन्दी का यह शंखनाद कह,
इसका घोष अकूत बना हूँ।
रलमल में खोने का भय है,
इसीलिए अवधूत बना हूँ।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, सेन्ट्रल मोल, चिन्चवाड, पुणे ।। महाराष्ट्र ।।



@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

हीरे सा इक तारा देखूँ
दूर क्षितिज के पास।
देखूँ तेरा दाँत दमकता,
बहुत दिनों के बाद।।

जब भी कोई
हल मिलता है,
गुनगुन करती अपने में।

जल तरंग-सी
उठती-गिरती,
आतुर होती बहने में।

हँसता-खिलता चाँद देखता,
स्याह जलद के पार।
देखूँ तेरा दाँत दमकता,
बहुत दिनों के बाद।।

धुँआ-धुँआ
देख रसोई,
मान लेता कि दिन उजला।

सारी दिक्कत,
गई भाड़ में,
वह ही होता क्षण हल्का।

निर्मल जल ले झरना निकले,
पर्वत से उस पार।
देखूँ तेरा दाँत दमकता,
बहुत दिनों के बाद।।

संकेतों में
चहक-चहक कर,
देती न्यौता अँखियों से।

छूकर देखूँ
विस्मय से जब,
मुझे रोकती अँखियों से।

तभी दमकता सूरज उगता,
गहन रात के बाद।
देखूँ तेरा दाँत दमकता,
बहुत दिनों के बाद।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, अप साउथ कैफे, ऊंदरी, पुणे।। महा।।


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


डर लगता तुमको कभी-कभी,
उम्र की खड़ी ढलानों से।
जैसे रहे नदी के तट पर,
गिरते तेज मुहानों से।।

उम्र, उम्र है
आती-जाती,
छपती हुई खबर के ज्यों।

कभी गुनगुनी
कभी उबलती ,
जमती बर्फ परत के ज्यों।

पथरा जाती होगी आँखें,
बने-बनाए बहानों से।
जैसे रहे नदी के तट पर,
गिरते तेज मुहानों से।।

तंग घाटियाँ
ले निकली यह,
झरनों और फुहारों-सी।

कभी झूमती
कभी बरसती,
बूँदों और बहारों-सी।

स्पंदन रुक ही जाता होगा,
हिलते हुए मचानों से।
जैसे रहे नदी के तट पर,
गिरते तेज मुहानों से।।

जाने का है
इक क्षण निश्चित,
फिर भी पैर जमाई-सी।

भोर-दुपहरी
संध्या रानी,
गहन निशा सुरमाई-सी।

ठगे-ठगे रह जाते होंगे,
लुटते देख मकानों से।
जैसे रहे नदी के तट पर,
गिरते तेज मुहानों से।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, यमुनानगर, पुणे. (महा.)


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


घर से निकला अपनापन ले,
नब्ज टटोलूँ महानगर की।
कई कथाएँ स्वयं बोलती,
हैं कुछ घर की कुछ बेघर की।।

साथी मेरे
कुछ नन्हे-से,
राजपथों पर वे बिखरे हैं।

वहीं-कहीं पे
नन्दलाल से,
राधा के घुंघर बिखरे हैं।

करुण कथाएँ मौन लिए हैं
क्षीण भवन की दीन शहर की।
कई कथाएँ स्वयं बोलती,
हैं कुछ घर की कुछ बेघर की।।

आती-जाती
देख रहा हूँ,
राधा खींचे घर की गाड़ी।

अंगुलियों पे
अंक जोड़ती,
भींच होंठ में अपनी साड़ी।

अंदर हलचल वही समझता,
आग जानता विरल डगर की।
कई कथाएँ स्वयं बोलती,
हैं कुछ घर की कुछ बेघर की।।

धूप झेलता
कृष्ण यहीं पे,
फुटपाथों को नाप रहा है।

संध्या कैसे
आग जलेगी,
चिंता कर-कर काँप रहा है।

अन्तर जलता बिना धूम ले,
कहीं सुर्खियाँ गई अधर की।
कई कथाएँ स्वयं बोलती,
हैं कुछ घर की कुछ बेघर की।।

देना चाहें
ज्ञापन सुख का,
किस को दें भी अर्जी सुख की।

गहरे अक्षर
नित-नित छपती,
वे निगोड़ी विज्ञप्ति दु:ख की।

गई हाथ से खेती-बाड़ी,
चिंता साले गुज़र-बसर की।
कई कथाएँ स्वयं बोलती,
हैं कुछ घर की कुछ बेघर की।।

चढी धूप में
सिमटी छाया,
वैसे सिमटे दु:ख में काया।

महानगर की
भाग-दौड में,
गाँव-नगर को घायल पाया।

तथाकथित सुख को पाने में,
गाँव पकड़ता डगर शहर की।
कई कथाएँ स्वयं बोलती,
हैं कुछ घर की कुछ बेघर की।।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, मुंबई ( महाराष्ट्र)



@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

घायल सब विष सने तीर से,
नित्य साधते कम लगते?
वह भी घायल मैं भी घायल,
नभ-धरती सब नम लगते।।

बंटा हुआ नभ
पहले से था,
छिदा हुआ अब हाथ लगा।

अग्नि-पिंड-सा
बना हुआ था,
तपा हुआ निर्वात लगा।

जले हुए सब अग्नि-तीर से,
नित्य जलाते कम लगते?
वह भी घायल मैं भी घायल,
नभ-धरती सब नम लगते।।

खींच-तान में
चिन्दी-चिन्दी,
धरती है यह कागज़-सी।

पांडव-कौरव
कुरुक्षेत्र में,
झेल रही बिन कारज ही।

घायल सब ही नाग-तीर से,
नित्य काटते कम लगते?
वह भी घायल मैं भी घायल,
नभ-धरती सब नम लगते।

उसको पूछा
आँसू क्यों है?
वह बोला बस अपनों से।

विकल्प मिले न
भूख-प्यास के,
वे बहलाते सपनों से।

घायल सब ही पाश-तीर से,
नित्य बाँधते कम लगते?
वह भी घायल मैं भी घायल,
नभ-धरती सब नम लगते।

दर्द पूछता
भोला मुझको,
बोलूँ रोना है तेरा।

देख रहा हूँ
ठगा-ठगा-सा,
फिर भी चुप है स्वर तेरा।

घायल सब ही ब्रह्म-तीर से,
नित्य बाँधते कम लगते?
वह भी घायल मैं भी घायल,
नभ-धरती सब नम लगते।

दिवस एक ही
उचित रहेगा,
स्वानुभूति जिस दिन होगी।

आँख खुलेगी
सत्य दिखेगा,
प्रतिक्रिया उस दिन होगी।

रोक हस्त विष सने तीर से,
आग - बबूला कम लगते?
वह भी घायल मैं भी घायल,
नभ-धरती सब नम लगते।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।।राज।।


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


प्रेम-पंथ से चंदा चलकर,
नर्म भाव ले धरा निहारे।
मानों घायल अंतर को वह,
पूर रहा है प्रेम सहारे।।

मृदुल प्रेम का
बल लेकर के,
धरा निरंतर घूम रही है।

मर्म भले ही
छिदा हुआ पर,
धवल चंद्रिका चूम रही है।

देखा घायल धरा यहाँ पे
चंद्र बुलाए बादल कारे।।

बादल देखे
मरी नदी है,
जिस पे उगते बीहड़-बस्ती।

कहीं खो गई
जल की धारा,
पाट नदी का खोता मस्ती।

स्याह दिवस वे आने वाले,
चंद्र मौन ले यही उचारे।।

कर्णधार ही
नाव डुबाने,
लगे हुए हैं तत्पर होकर।

वक्ष नदी का
बाँट दिया है,
स्वर्ण बटोरे तत्पर होकर।

नदी मरी तो मरे शहर तक,
चंद्र निशा में यही विचारे।।

पंच तत्व पर
भुवन सजा है,
पानी खोती जाए नदिया।

नदी-सरोवर
शुष्क देख कर,
हरित वनों की झरी पत्तियाँ।

आग लगाती पवनें बहती,
चंद्र थामता डरे सितारे।।

बदली पिघली
मेह बरसती,
नदिया तो प्यासी की प्यासी।

बस्ती बैठी
कंठ दबाकर,
पैर पटकती नदी रुआँसी।

जैसे-तैसे धरा घूमती
चंद्र चीखता धरा उबारें।
मानों पसरे अंतर को वह,
पूर रहा है प्रेम सहारे।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, कांकरोली, राजसमन्द ।।राज।।


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


बरसाती मौसम का गीत।
गुमसुम बैठे रहें कहाँ तक,
जमती अंदर-बाहर काई।
हटा अर्गला वातायन की,
अपनेपन की आहट आई।।

मेघावली से
कहीं छिटककर
इक छोटी सी बदली आकर,
पहले अटकी
फिर ठिठकी वह
दो पर्वत के मध्य पसरकर।

पल भर की ही
उस वेला में
अटकी-ठिठकी भले हेतु पर,
मानो आकर
ठिठकी मुग्धा
मर्यादा से भरे सेतु पर ।

गीत प्रीत का सुनते भी हो,
देखे-समझें सागर जाई।
हटा अर्गला वातायन की,
अपनेपन की आहट आई।।

मध्य वहीं तो
खडा़ हुआ हूँ
तनता हूँ भी ताडासन में,
बदली के वे
कोमल टुकड़े
पकड़ धरूँ ले शीर्षासन में।

मुझपर बदली
छा-छा जाती
मानो मुग्धा विह्वल होती,
मेरे मुख को
ढक अलकों से
उष्ण अश्रु से मुझे भिगोती।

खुला निमंत्रण सावन देता,
उसने जो ऋतु पावस पाई।
हटा अर्गला वातायन की,
अपनेपन की आहट आई।।

अपने अन्दर
सुखद क्षणों को
खरे कोष-सा खूब पकड़ कर,
यायावर सा
घूम रहा हूँ
बरसाती मौसम के अन्दर।

बदली की इस
टुकड़ी के पीछे
अपनी धुन में दौड़ रहा हूँ,
मेघदूत को
संकेतित कर
अपने सुख-दुःख खोज रहा हूँ।

प्रतिक्रिया में सब होता है,
सबने अपनी चाहत बोई।
हटा अर्गला वातायन की,
अपनेपन की आहट आई।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित , राजसमंद


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


" रात" विषयाधारित सृजन-
रात श्यामली बाँध रही अब।
श्रम पर चादर डाल रही अब।।

दिन के जगमग
उजियारे में,
लगता सब कुछ
देख चुकी है।

हंस बने कुछ
बकुल वंश के,
उनकी पाँखें
लेख चुकी है।

दिन अनुगामी आँक गई अब।
बगुलों को भी जान गई अब।।
रात श्यामली बाँध रही अब।
श्रम पर चादर डाल रही अब।।

तथाकथित उन
हंसों ने तो,
भरी उड़ानें
खग-शिशु पर।

पंख खोलकर
छाया कर-कर,
चोंच मारते
खग-शिशु पर।

रात श्यामली जान गई अब।
घायल के वह साथ हुई अब।।
रात श्यामली बाँध रही अब।
श्रम पर चादर डाल रही अब।।

घायल हैं वे
चीख रहे थे,
श्रमकण भी वे
सींच रहे थे।

प्राण समेटे
दौड़े-भागे,
अपनी चीखें
भींच रहे थे।

रात श्यामली मान गई अब।
कोमल आँखें आँज रही अब।।
रात श्यामली बाँध रही अब।
श्रम पर चादर डाल रही अब।।

रक्तिम दिन वे
फिर आ सकते,
शोषक फिर से
जुड़ आ सकते।

घायल भी वह
फिर सम्मुख हो,
शोषक से फिर
लड़ आ सकते।

रात श्यामली साथ हुई अब।
घायल को यों साध रही अब।।
रात श्यामली बाँध रही अब।
श्रम पर चादर डाल रही अब।।

भारी पद को
चाँप रही है,
गाँव-शहर सब
थाप रही है।

श्रम परिहर कर
पूर चेतना
दर्द-देह का
तार रही है।

रात श्यामली आप हुई अब।
नई चेतना सान रही अब।।
रात श्यामली बाँध रही अब।
श्रम पर चादर डाल रही अब।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, आशापुरा जी, नाडोल एवं रणकपुर।। राजस्थान।।


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


"संवाद" विषयाधारित रचना-
संवादों की धरती पर ही,
सम्बन्धों की फसलें उगती।
अंगुलियाँ संवाद रचाती,
रिक्त धरा रंगोली सजती ।।

धरती तो है
धरती-सी यह
फिर भी उसके
भेद बहुत हैं।

जहाँ सरस-सी
हरी-भरी-सी,
जहाँ शुष्क-सी
क्लेश बहुत हैं।

धरती-घन संवाद हुआ तब,
बंजर भी वह धरती फलती।
अंगुलियाँ संवाद रचाती,
रिक्त धरा रंगोली सजती ।।

धरती-घन का
संवाद नहीं,
वह धरती ही
परती लगती।

वहीं अम्ल की
खूब चली है,
नमक भरी वह
धरती लगती।

संवादों का लिए सहारा,
सरसी-जैसी धरती बनती।
अंगुलियाँ संवाद रचाती,
रिक्त धरा रंगोली सजती ।।

हुआ नहीं है
संवाद जहाँ,
रिक्त रहा सब
दर्प भरा तब।

ध्वंस चला था
नष्ट हुआ सब,
धूलि उड़ी बस
दर्द झरा तब।

धूम भरी-सी यज्ञभूमि में,
समिधा-जैसी धरती दहती।
अंगुलियाँ संवाद रचाती,
रिक्त धरा रंगोली सजती ।।

संवाद लिए
घन जल बनता,
तप्त धरा फिर
वह हर्षाता।

कहीं ताल में
कहीं नदी में,
धरा पूरता
हलचल करता।

हरितवर्ण की ओढ़ ओढ़नी,
दुल्हन-जैसी धरती सजती।
अंगुलियाँ संवाद रचाती,
रिक्त धरा रंगोली सजती ।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।।राज।।


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


"सौभाग्य" विषयाधारित रचना-
गहरे तट पर जर्जर नोका, निज भाग कहूँ वह खूब मिली।
भाग्य भरोसे नहीं रहा पर, सौभाग्य कहूँ वह खूब मिली।।

घाट भरे जल गहरे होते,
सेवार सने चिकने होते।
भय-विस्मित गहराई जानूँ,
हस्ती डूबे जितने होते।

दूर झूमती जर्जर नोका,
देती वह मानो आमंत्रण।
शिथिल बंध झनकार लगाते,
रव भरते मानो हो कंकण।

वहीं घाट पतवार मिली भी, निज भाग कहूँ वह खूब मिली।
भाग्य भरोसे नहीं रहा पर, सौभाग्य कहूँ वह खूब मिली।।

डूब गए हस्ती जिस थल पे,
क्षीणकाय की क्या चल सकती?
कर्णधार जिसके प्रिय तुम हो,
भला कौन वेला छल सकती?

जर्जर नोका भले मिली हो,
प्रियवर सूत्र लिए हैं कर में।
मैं प्रिय-जैसा प्रिय मुझ-जैसे
हम-जैसे कौन चराचर में।

संगत प्यारी प्रिय! तुम्हारी, निज भाग कहूँ वह खूब मिली।
भाग्य भरोसे नहीं रहा पर, सौभाग्य कहूँ वह खूब मिली।।

एक तरफ झंझा बलशाली,
जर्जर नोका थी हलवाली।
सम्मुख गहरी थी जलराशि,
उसके आगे भू तलवाली।

मकरों की बारात भरी थी,
महाभोज की बारी लगती।
भूखी आँखें देख-देख कर,
अनायास चित्कारी लगती।

नोका तुमसे ही तब सधती, निज भाग कहूँ वह खूब मिली।
भाग्य भरोसे नहीं रहा पर, सौभाग्य कहूँ वह खूब मिली।।

छप-छप छप-छप करती नोका,
मकर छकाती आगे बढ़ती।
शंशय रहित हुए जो बैठा,
सुखकर हो मंझधारे बढ़ती।

प्रिय के कर पतवार देखकर,
जलचर देखे मुग्धभाव से।
हिंसक आँखे लिए मृदुलता,
स्वागत रचती मित्रभाव से।

झंझा रुकती पवन चूमती, निज भाग कहूँ वह खूब मिली।
भाग्य भरोसे नहीं रहा पर, सौभाग्य कहूँ वह खूब मिली।।

भूतल अब सम्मुख दिखता भी,
दर्पण-जैसा जल मिलता भी।
गहरे जल से पार उतरने,
उजले तट का हल मिलता भी।

सेवार तटों पर भय बैठा,
वह वहीं रहा अब मायावी।
उत्सुक हूँ जीवन से मिलने,
सम्मुख प्रियघर मधुछाया भी।

लोक देखता प्रियकर ग्रंथि, निज भाग कहूँ वह खूब मिली।
भाग्य भरोसे नहीं रहा पर, सौभाग्य कहूँ वह खूब मिली।।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।।राज।।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@



कलश भरी-सी प्यास मिली,
अंजलि भर बरसात मिली।
भौंचक होते जीवन को,
रचती मात बिछात मिली।।

बंसी के जब
रंध्र-रंध्र से,
मीठी-सी धुन
कानन पहुंचे।

मृग मधु धुन के
श्रुतिपथ पर चल,
श्रुतिसुख के ही
कारण उलझे।

मीठी धुन की बात और है,
मृग को मधुर बिछात मिली।
भौंचक होते जीवन को,
रचती मात बिछात मिली।।

बधिक देश में
कौन पूछता,
तथागतों को
मनोकामना।

जलपान हेतु
वे आये या,
व्यथा कथन की
मनोभावना।

बधिक देश अंधा-बहरा
चुप में बिछी बिछात मिली।
भौंचक होते जीवन को,
रचती मात बिछात मिली।।

है बडभागी
राधा रानी,
बंसीधुन सह
हरि-साथ मिला।

है बडभागी
मीरा रानी,
प्रिय के पथ पे
हरि-दाग मिला।

राधा हो या हो मीरा ,
खूब गूँथी बिछात मिली।
भौंचक होते जीवन को,
रचती मात बिछात मिली।।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द ।।राज।।



@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

जब भी मिले तुझे वीराना,
रचना-गढ़ना कर लेना।
भले रेख हो रंग-रूप ना,
रेत-घरौंदा रच लेना।।

थप-थप थपकी
लग मरु कण पर,
लेती मरु राशि आकार।

कच्चे मन के
कोमल कर से,
होती मरु राशि साकार।

थप-थप ज्यों तोड़े वीराना,
लय लेती ध्वनि भर लेना।
भले रेख हो रंग-रूप ना,
रेत-घरौंदा रच लेना।।

खालीपन हो
वन या मन का,
वर्तुल पवन वहीं भरती।

पीत पत्र सह
उष्ण रेत भर,
मीठे स्वप्न वही चरती।

बहुत जलाऊ है वीराना,
बचने को रस भर लेना।
भले रेख हो रंग-रूप ना,
रेत-घरौंदा रच लेना।।

चाक-माट ले
कुम्भकार ज्यों,
सूनापन भर करे सृजन।

वीराना भी
देख छिपा है,
कुम्भकार से कुम्भ रचन।

भरता जाता है वीराना,
मिट्टी कर में भर लेना।
भले रेख हो रंग-रूप ना,
रेत-घरौंदा रच लेना।।

होने लगता
जब भी मन का,
धरा तजे पाँव सर्वदा।

खोने लगता
जब भी मन का,
खोज चले छाँव सर्वदा।

बिना सूचना बने वीराना,
पकी धूप को भर लेना।
भले रेख हो रंग-रूप ना,
रेत-घरौंदा रच लेना।।

पीत धूप की
रज्जु पकड़ कर,
प्रियवर! सदन चले गायन।

वीराना भी
लाचार हुआ,
अंतर-बहिर् भरे सावन।

नहीं रहेगा यह वीराना,
आँख प्यार से भर लेना।
भले रेख हो रंग-रूप ना,
रेत-घरौंदा रच लेना।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।। राज.।।



@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

"पतंगा" शीर्षक के संदर्भ में प्रस्तुत सृजन । यह सृजन 11 जून 19 का है। प्रसंग-गर्भित होने से आनंद लीजिए-
प्यार के पीछे बन पतंगे,
प्यार को पाने डोल रहे।
जलना-मरना निश्चित है ही,
फिर भी परों को खोल रहे।।

कहाँ दीप से
परिचय उसका,
खींच रहा है नेह समर्पण।

उसी नेह का
बल लेकर के,
दीप-पतंगे का है अर्पण।

गंग में निजता कर प्रवाहित,
प्रेमी जन सब डोल रहे।
जलना-मरना निश्चित है ही,
फिर भी परों को खोल रहे।।

कौन सरोवर
मृदा कहाँ की,
नेह कहाँ का प्रश्न नहीं।

किस उपवन का
किस झुरमुट का,
क्षीण परों का प्रश्न नहीं।

प्रश्न गौणकर दीप - पतंगे,
समाधान में डोल रहे।
जलना-मरना निश्चित है ही,
फिर भी परों को खोल रहे।।

परदुःख में ये
कातरता ले,
दीप-पतंगे जले-मरे हैं।

यह कातरता
नेह सनी सी,
परिचय में जले-मरे हैं।

मान मरण अमरत्व लिए ये,
मरण - पर्व में डोल रहे।
जलना-मरना निश्चित है ही,
फिर भी परों को खोल रहे।।

इसी नेह में
दीप बने हम,
बने हुए या क्षीण पतंगे।

अधिकारों के
समर क्षेत्र में,
जलें-मरें रह मस्त मलंगे।

मस्त - मलंगे लड़ते - मरते,
संवेदन हो डोल रहे।
जलना-मरना निश्चित है ही,
फिर भी परों को खोल रहे।।

काला साया
तभी रहेगा,
जब तक नाहीं ललकारें ।

भय भी वह
तब तक भरेगा,
जब तक नाहीं दुत्कारें।

दीप - पतंगे डूब नेह में,
साया झिड़के डोल रहे।
जलना-मरना निश्चित है ही,
फिर भी परों को खोल रहे।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।।राज।।



@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

"कोयल" शीर्षक केंद्रित सृजन
सुबह-सुबह ही गाती रहती,
कोयल पगली दीवानी।
निर्मल वात मिलाती स्वर में,
घायल करती मस्तानी।।

मध्य निशा तक
मृदु स्मृतियाँ आ,
कर जाती है मानस-मंथन।

शेष निशा में
सुख से सो लूँ,
पूर्व शयन के पुनर्प्रवंचन।

आँख लगे उसके पहले ही,
दर्द बहाती दीवानी।
निर्मल वात मिलाती स्वर में,
घायल करती मस्तानी।।

कुहू-कुहू कर
उड़-उड़ जाती,
मैं अलसाया रह जाता।

अंतर मन में
पियू-पियू भर,
मैं मुरझाया रह जाता।

कैसे समझाऊँ भी अपनी,
हृदय बींधती दीवानी।
निर्मल वात मिलाती स्वर में,
घायल करती मस्तानी।।

दायित्वों की
प्यारी गठरी,
लूम झूम करती सिर से।

प्रिय की मधुर
स्मृति घटिका भी,
टिक-टिक करती है फिर से।

पकी जामुनी आँख रसीली,
पथरा जाती दीवानी।
निर्मल वात मिलाती स्वर में,
घायल करती मस्तानी।।

सहकर्मी भी
छिप-छिपकर,
व्यथा-दशा को आँक रहे ।

कल्पित होकर
अनुमान लगा,
सब अपनी-अपनी हाँक रहे।

क्या जाने मैं साधक कैसा,
शूल चुभाती दीवानी।
निर्मल वात मिलाती स्वर में,
घायल करती मस्तानी।।

स्पंदन मेरा
प्रिय-प्रिय गाता,
प्रियवर यह क्या कम लगता?

निशा स्मरण में
दिवस तरण में,
बिता रहा क्या कम लगता?

मधु चाहे जितना भी घोलो,
तुच्छ दिखाती दीवानी।
निर्मल वात मिलाती स्वर में,
घायल करती मस्तानी।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।।राज।।


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


नभ दहका धरा जली, घर भट्टी सा होने लगा।
दो नयनों में वर्षा, घर सावन सा होने लगा।।

सरल प्रवासी
घर तक आया,
भीषण आतप
सम्मुख पाया।

नयनों में श्रम
झाँक रहा भी,
तन टूटन को
माँज रहा भी।

स्वागत में दो आँखें, घर पावन सा होने लगा।
दो नयनों में वर्षा, घर सावन सा होने लगा।।

इधर-उधर से
पवन झपटती,
वदन चूमती
सिसकी भरती।

भाव भरे से
हृदय भाग पे,
दे - दे थपकी
हिचकी भरती।

सिसकी से हिचकी से,घर कानन सा होने लगा।
दो नयनों में वर्षा, घर सावन सा होने लगा।।

दहक रही थी
चार दीवारें,
वे भी अब
सब शरमाती।

दो नयनों का
जल कहता है,
नाहक ही तुम
सब गरमाती।

उपालम्भ के चलते, घर भावन सा होने लगा।
दो नयनों में वर्षा, घर सावन सा होने लगा।।

गलबहियाँ थी
सखियाँ इसमें,
चुम्बन झूला
झूल रहे हैं।

मधुर मिलन के
मधु प्रसंग में,
आग गगन की
भूल रहे हैं।

लगे प्रेम के बिरवे , घर आसन सा होने लगा।
दो नयनों में वर्षा, घर सावन सा होने लगा।।

घर की स्मृतियाँ
आकर्षण सी,
अपनी वीथी
अपनी होती।

धूल - धुंध से
गर्म धूम तक,
धवल चंद्रिका
अपनी होती।

अपनेपन के चलते, घर पारण सा होने लगा।
दो नयनों में वर्षा, घर सावन सा होने लगा।।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द ।।राज.।।



@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

पूर्वाग्रह की प्राचीरों ने,
रोक दिया था गलियारा।
जिसने पानी बनना जाना,
पार करेगा गलियारा।।

शीतल पानी
द्रवीभूत हो,
भू पर बसता बह जाता।

रिमझिम करता
गायन करता,
तन-मन में रस भर जाता।

रस का बल ले सिर को ताने,
वह पाएगा गलियारा।
जिसने पानी बनना जाना,
पार करेगा गलियारा।।

तरल-सरल सा
शीतल जल सा,
गरल आग पर वह भारी।

आग स्वयं जल
खाक हुई है,
जल के सम्मुख वह हारी।

प्राचीरो में आग मरी तो,
तब रोया था गलियारा।
जिसने पानी बनना जाना,
पार करेगा गलियारा।।

केवल ज्वाला
भरी आग का
नहीं दे रही सम परिचय।

जल की धारा
खरी आग का,
यहीं दे रही नम परिचय।

जब भी जल में आग घुली थी,
गुलजार हुआ गलियारा।
जिसने पानी बनना जाना,
पार करेगा गलियारा।।

अभी अभी ही
पानी लाया,
आग की ठंडी मधु धारा।

मधु धारा के
आगे हारा,
दशकों का विष दृढ़ पारा।

पारा पानी नहीं बना तो,
देता है कोना गलियारा।
जिसने पानी बनना जाना,
पार करेगा गलियारा।।

प्रतिक्रिया का
अपना शासन,
जल बूँदों सा भाता है।

उग्र आग का
रोधन करने,
छमछम करता गाता है।

प्रतिक्रिया सह मधु अनुशासन,
गुन्जन भरता गलियारा।
जिसने पानी बनना जाना,
पार करेगा गलियारा।।

प्रियवर भरना
आग हृदय में,
पर गीली-गीली मीठी सी।

कुछ - कुछ हँसती
कुछ - कुछ गाती,
कुछ - कुछ बंकिम दीठी सी।

पत्थर पिघले बहते पानी,
खिल ही जाता गलियारा।
जिसने पानी बनना जाना,
पार करेगा गलियारा।।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, पुणे, ।। महाराष्ट्र ।।



@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

कौन समझ पाएगा दुःख को, जिसको पीता रहता हूँ।
तार - तार ज्यों जीर्ण दुशाला, सश्रम सीता रहता हूँ।।

ताना थामने लगता हूँ तो,
बाना फिसला है जाता।
सूचि-सूत्र का युग्म बनाता,
अंगुल कंपन कर जाता।

यह मात्र नहीं अशक्ति तन की,
सदा लगी है तन-मन की।
झंझा चलती अन्दर - बाहर,
धुनती रहती दुःख धुनकी।

कौन समझ पाएगा धुन को, जिसको गाता रहता हूँ।
तार - तार ज्यों जीर्ण दुशाला, सश्रम सीता रहता हूँ।।

पता नहीं कब चिट्ठी आई,
आकर के वह चली गई।
क्षीण हुई पदचाप दूत की,
ध्वनि छल करती चली गई।

इधर - उधर वातायन खोलूँ,
रिक्त-रिक्त सी गली मिली।
मेरे सम्मुख पदचिह्न बने हैं,
ओस बूँद तक जली मिली।

कौन समझ पाएगा धुर को, जिस पर फिरता रहता हूँ।
तार - तार ज्यों जीर्ण दुशाला, सश्रम सीता रहता हूँ।।

हटकर करने के फेरे में,
जग को वैरी कर डाला।
सुखकर करने को डेरे में,
कदली बदरी कर डाला।

इक प्याला पियूँ दाएं कर से,
दूजा बाएं भर डाला।
चंदन - चौवा गए भाड़ में,
अग्नि पिंड से भर डाला।

कहता हूँ भी सारे पुर को, आग जलाए रहता हूँ।
तार - तार ज्यों जीर्ण दुशाला, सश्रम सीता रहता हूँ।।

उसी आग को लेकर तुम तक,
आया हूँ भी बतलाने।
राख हुआ बस उड़ता रहता,
आया हूँ भी दिखलाने।

देख सको भी तेरे शासन,
तृषित रहा तेरी बस्ती।
त्रास लिए भी गाता रहता,
यही रही मेरी मस्ती।

कौन ले रहा मेरी सुध को, प्यासा झरता रहता हूँ।
तार - तार ज्यों जीर्ण दुशाला, सश्रम सीता रहता हूँ।।

आग - नदी - झंझा सब देखी,
अब तेरी स्मित को देखूँ।
त्रास-प्यास का समाधान स्मित,
इक वही शमन को देखूँ।

प्रज्ञा-पोषित इस अग-जग में,
प्रियवर हम तो अज्ञ रहे।
त्रास - प्यास का तर्पण करने,
प्रियवर तुम ही यज्ञ रहे।

कौन सुनेगा मेरे सुर को, तुझको गाता रहता हूँ।
तार - तार ज्यों जीर्ण दुशाला, सश्रम सीता रहता हूँ।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, यमुनानगर, ।।महाराष्ट्र।।
सश्रम - परिश्रम
सूचि-सूत्र - सुई धागा
वातायन - खिड़की
धुर - अक्ष, धुरी
कदली - केला
बदरी - बेरी की झाड़ी
तृषित - प्यासा
त्रास - कष्ट
स्मित - मुस्कान
अज्ञ - अज्ञानी
यज्ञ। - अनुष्ठान





@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
गहन निशा के ढलने तक तुम,
रुके हुए थे उस तट पर।
हुई भोर यह जैसे - तैसे,
हम आते हैं उस तट पर।।

नहीं पसीजे
करुणा के सह,
जब कि तुम हो करुणाकर।

नहीं देखते
तुम से मिलने,
आये भी हैं यायावर।

शीतल धारा मध्य देखते,
चंद्रभाग के इस तट पर।
हुई भोर यह जैसे - तैसे,
हम आते हैं उस तट पर।।

सूत्र स्नेह का
बिंदु एक तुम,
इक बिंदु हम प्राणाधार।

इसी तंत्र पर
सब आते जाते,
हम फिसले हैं कर्णधार।

हाथ थाम लो नई भोर में,
शिथिल नाव है इस तट पर।
हुई भोर यह जैसे - तैसे,
हम आते हैं उस तट पर।।

सुनता आया
इस सुकृति के,
कुशल सरस तुम सुकृतिकार।

छंद-बंध नत
इस कृतिकर में,
पूरो प्रिय हम निराकार।

अर्धचंद्र आँखों में लेकर,
पूनम देखूँ इस तट पर।
हुई भोर यह जैसे - तैसे,
हम आते हैं उस तट पर।।

नाव चली भी
लूम - झूम कर,
लहरें लोलती सर्पाकार।

उत्साहित हूँ
प्रिय से मिलने,
प्राणों का लिए उपहार।

जयमाला कह या वरमाला,
साँस बनी है इस तट पर।
हुई भोर यह जैसे - तैसे,
हम आते हैं उस तट पर।।

सारी जगती
तन के जैसे,
रत्नजटित प्रिय अलंकार।

में घट कोरा
मृदा लिए हूँ,
मेरे प्रिय हो कुम्भकार।

रिक्त करों से नहीं लौटना,
इच्छित लाऊँ इस तट पर।
हुई भोर यह जैसे - तैसे,
हम आते हैं उस तट पर।।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, पंढरपुर ।।महाराष्ट्र।।
करुणाकर - करुणा के सागर
यायावर - घुमक्कड़
कर्णधार - उद्धारक , खेवैया
सुकृति - सृजन, पुण्य, रचना, धर्म
सुकृतिकार - सृजनधर्मी, पुण्य




@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

प्यार की पहली घंटी बजती,
खुलते देखे सारे द्वार।
हँसती धरा पहाड़ लिए तभी,
पिघले धीरे से संसार।।

बजती घंटी,
रस से झरती,
पंथी मालामाल हुए।

दोनों हाथों
सुख भरते हैं,
चलते पंथ निहाल हुए।

मानो स्वर्णिम राशि ही बहती,
पंथी करने लगे विहार।
हँसती धरा पहाड़ लिए तभी,
पिघले धीरे से संसार।।

चिंता अपनी,
कहाँ रही अब
सुपरिचित पूरा परिवेश।

हाथ थामने
हाथ बढ़े अब
हाथ लगे सहज संदेश।

हर चिट्ठी - पत्री ले आती,
अपनी नेह भरी मनुहार।
हँसती धरा पहाड़ लिए तभी,
पिघले धीरे से संसार।।

परतें पिगली
धवल हिमानी,
अब धरती भी गरमाई।

ऐंठ मारती
श्याम धुमानी,
अब चिमनी भी शरमाई।

अनायास अब मौसम बदला,
लेकर सांसों का श्रृंगार।
हँसती धरा पहाड़ लिए तभी,
पिघले धीरे से संसार।।

खारा सागर
भेजे घन को,
तब चूमे अंबर धरती।

धरती भूली
पीड़ा अपनी,
रंग हरा अंचल भरती।

मीठा पानी अब लहरता,
छनता जाता पीछे खार।
हँसती धरा पहाड़ लिए तभी,
पिघले धीरे से संसार।।

प्यार की घंटी
बजती रहना,
कुछ संवरा यह संसार।

छोड़ उदासी
तत्पर रहना,
यह जादुई सा संसार।

खुली - खुली ही राहें होती,
प्यारे जीवन का उपहार।
हँसती धरा पहाड़ लिए तभी,
पिघले धीरे से संसार।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, अमेनोरा, मगरपट्टा ।।महाराष्ट्र।।




गाती वनप्रिया गीत दूर से,
जगा जाती सोई स्मृतियाँ।
होती प्रथम किरण तब सम्मुख,
जगा जाती तंद्रित कलियाँ।।

वनप्रिया यजन को
जान रहा हूँ,
स्वर यजन-मंत्र को
मान रहा हूँ।

वनप्रिया यजन ही
करता विगलित।
स्वर यजन-मंत्र ही
करता विचलित।

विरह - विदग्ध गाती वनप्रिया,
हिला जाती दर्द अवलियाँ।
होती प्रथम किरण तब सम्मुख,
जगा जाती तंद्रित कलियाँ।।

अवलियाँ झूलती
लहर उठाती,
रुनक-झुनक करती
प्रहर उगाती।

वह वेला प्रथम ही
प्राण-भार सी।
स्मृतियाँ शिलीमुखी
प्राण-मार सी।

प्रिय - प्रिय पुकारती वनप्रिया
होती निर्झर तब अंखियाँ।
होती प्रथम किरण तब सम्मुख,
जगा जाती तंद्रित कलियाँ।।

अश्रु - वृष्टि के कण
छम-छम करते,
स्मृति में दु:ख आ-आ
सुख क्षण भरते।

दु:ख भरते - झरते
स्मृतियों के दल,
प्रिय सहचर बनते
स्मृतियों के बल।

वसंत - लेख पढती वनप्रिया,
पत्रांकन करती अंगुलियाँ।
होती प्रथम किरण तब सम्मुख,
जगा जाती तंद्रित कलियाँ।।

समझो भी कुछ
प्रियवर हमको,
शयन जागरण तक
जीते तुमको।

गुण - गंध रूप सब
अब बहने में,
प्रिय कहाँ रहे भी
हम अपने में।

वन की अरि, बनी वनप्रिया,
जली भुनी अभी ही अमिया।
होती प्रथम किरण तब सम्मुख,
जगा जाती तंद्रित कलियाँ।।

प्रिय!अब सुध-बुध
हाथ नहीं है,
अब कहने जैसे
हाल नहीं है।

अब जीवन नौका
छूट रही है,
कर्णधार बिना ही
टूट रही है।

अग्निमुखी सी हुई वनप्रिया,
कंठहार बनाती रसिया।
होती प्रथम किरण तब सम्मुख,
जगा जाती तंद्रित कलियाँ।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, वेस्टर्न मॉल, ओन्ध।। महाराष्ट्र।।


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

शीर्षक 'पहेली' केंद्रित सृजन
उलझन-सुलझन लेकर चलती,
दुनिया एक पहेली सी।
उलझन में यह सूत्र - गुच्छ सी,
सुलझी मधुर रसीली सी।।

मिलती है जब
मकड़ जाल सी,
उलझन के सह
फिसलन रखती।

अष्टपदी सी
दंश मारती,
साँसों तक में
अनबन भरती।

द्वंद्व - फंद से भरी पहेली ,
दुलहन नई - नवेली सी।
उलझन में यह सूत्र - गुच्छ सी,
सुलझी मधुर रसीली सी।।

गिरि-गह्वर रख
जटिल-कुटिल सी,
नद-निर्झर भर
सहज-सरल सी।

भागदौड़ में
चली रेख सी,
सुख वेला में
चित्र लेख सी।

नहीं पहेली ऐसी - वैसी,
मायावी - अलबेली सी।
उलझन में यह सूत्र - गुच्छ सी,
सुलझी मधुर रसीली सी।।

सुख की बदली
जब ले आती,
रुनझुन-रुनझुन
पायल बजती ।

घोर त्रास ले
धुंध उमड़ती,
उठ-उठ गिर-गिर
साँकल बजती।

प्रहसन रचती चित्र पहेली,
रंग भरी रंगोली सी।
उलझन में यह सूत्र - गुच्छ सी,
सुलझी मधुर रसीली सी।।

शांतमना ही
सुलझन करते,
उद्विग्न हुए वे
उलझन भरते।

इस जीवन की
तीक्ष्ण धार में,
शांतमना ही
फल से भरते।

चन्द्र कला सी चलित पहेली,
अभिव्यक्ति अनबोली सी।
उलझन में यह सूत्र - गुच्छ सी,
सुलझी मधुर रसीली सी।।

भारी बंधन
खोल-खाल आ,
सांकल सारी
तोड़-ताड़ आ।

समझ-बूझकर
साथ-साथ आ,
अपनी मस्ती
जोड़-जाड़ आ।

विषम सूत्र सी दीर्घ पहेली,
सरसी स्नेह सहेली सी।
उलझन में यह सूत्र - गुच्छ सी,
सुलझी मधुर रसीली सी।।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, ट्रंकीला बीच रिसोर्ट ।। महाराष्ट्र ।।




जुड़े चरण ना प्यार के मग से,
क्या जाने मनुहार को।
जिसने चोट ना खाई उर पर,
जाने नहीं दुलार को।।

उर्मिल लहरें
सागर से चल,
तट से हिलमिल
ढल ही जाती।

तट की रज भी
लहरों से मिल,
जल से मिलने
बह ही जाती।

द्रवित हुआ जो रहता नहीं जो,
बूझे ना संसार को।
जिसने चोट न खाई उर पर,
जाने नहीं दुलार को।।

आमन्त्रण पर
दुहरा नित ही
नेह छिपा सा
तब अरूप ही।

संवेदन रह
आसन मारे,
विनत हुआ है
तब सरूप ही।

धरती झुककर न चूम सके जो,
देखे नहीं कगार को।
जिसने चोट ना खाई उर पर,
जाने नहीं दुलार को।।

इस अनंग से
प्रेम को लेकर
नदी विनत हो
निकली जाती।

बन संवेदन
सबसे मिलती,
सागर मिलने
पिगली जाती।

देख दर्द जो पिगल सके नहीं,
जाने नहीं कहार को।
जिसने चोट ना खाई उर पर,
जाने नहीं दुलार को।।

भूख भूख से
जानी जाती,
तृषा तृषा से
है पहचानी।

अपने जैसे
वही खोजता,
फटी बिवाई
जिसने जानी।

जहाँ नयन जुड़ चार हुए नहीं,
जाने नहीं सहार को।
जिसने चोट ना खाई उर पर,
जाने नहीं दुलार को।।

तेरी - मेरी
चलती सांसे,
उन जैसी ही
सबकी सांसे।

दौड़ - धूप में
सभी लगे हैं
कुछ थके हुए
रहे रुआंसे।

जग को सज्जित कर सके नहीं है,
मिले नहीं करतार को।
जिसने चोट ना खाई उर पर,
जाने नहीं दुलार को।।

प्रिये! सुनो भी
दुनिया चलती
प्रेम की उर्मिल
धारा लेकर।

रुचिकर होने
सोती-जगती
आशाओं का
तारा लेकर ।

सद्आशा से हुआ फलित नहीं,
दिखे नहीं भरतार को।
जिसने चोट ना खाई उर पर,
जाने नहीं दुलार को।।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, कोकण ।।महाराष्ट्र।।



@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

"अजनबी" शीर्षक केंद्रित सृजन
दूर करें अभी अपरिचय का,
काला-नीला कृष्ण दुशाला।
पूर चलें भी अब परिचय का,
तेरा - मेरा प्यार का प्याला।।

अपरिचय यही
हृदय - क्षेत्र ले,
सघन दुखों की
फसलें बोता।

इक क्षण में ही
हृदय हांक कर,
तत्क्षण ही यह
फल को ढोता।

माहुर सा है अपरिचय यह,
यह जीवन पर भारी ताला।
पूर चलें भी अब परिचय का,
तेरा - मेरा प्यार का प्याला।।

है परिचय यह
चेटक की चंटी,
क्षण-क्षण में यह
सुख ले आती।

दुःख की फसलें
स्वतः शुष्क हो,
सुख की फसलें
उग - उग आती।

घातक सा है अपरिचय यह,
सुख की फसलों पर है पाला।
पूर चलें भी अब परिचय का,
तेरा - मेरा प्यार का प्याला।।

तजना भी अब
ग्रंथन कर से,
मुक्त हुए तुम
मिलना हर से।

परिचय ही तो
ध्यान धारणा,
निराकार की
पूर्ण पारणा।

विचलन सा है अपरिचय यह,
साधक माने शापित छाला।
पूर चलें भी अब परिचय का,
तेरा - मेरा प्यार का प्याला।।

सरिता बहती
तोड़ बंध को
भू परिचय को
सन्मुख होती।

उदधि उर्मियाँ
ऊभ - चूभ हो
तट परिचय को
उन्मुख होती।

सन्मुख - उन्मुख की वृत्ति ही,
जीवन - मंगल की शुभ शाला।
पूर चलें भी अब परिचय का,
तेरा - मेरा प्यार का प्याला।।

हस्त बढ़ाकर
पहल कीजिए,
तोड़ अहं के
अंध बंध को।

तभी प्रेयसी
जीवन - मंगल
खोल देता है
नंद - रंध्र को।

जीवन - वृत्ति नंदन - वन सी,
वही पहनता सुख की माला।
पूर चलें भी अब परिचय का,
तेरा - मेरा प्यार का प्याला।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, मल्लिकार्जुन।। महाराष्ट्र।।




"उदर" विषयाधारित सृजन
उत्सव अपने फीके लगते,
रिक्त उदर के साथ।
नर्तन-गायन अनुचित लगते,
रिक्त उदर के साथ।।

झरने नदिया
वे ताल तलैया,
बहुत भले हैं
जब तृप्ति है साथ।

चाँद सितारे
वे मौसम प्यारे,
गले उतरते
संतुष्टि के साथ।

प्रेम उपकरण अनुचित बनते,
तिक्त उदर के साथ।
नर्तन-गायन अनुचित लगते,
रिक्त उदर के साथ।।

भोला बचपन
परिपक्व हो चलता,
बोझिल-बोझिल
दायित्वों के घर।

स्वप्न आँख में
तिरने को लगते,
मारें ठोकर
धरती सह अम्बर।

सदा स्वप्न मुश्किल ले आते,
भृत्य उदर के साथ।
नर्तन-गायन अनुचित लगते,
रिक्त उदर के साथ।।

शुष्क उदर नित
आ राह किनारे,
दिनचर्या में
हैं भाग्य सहारे।

कोमल शिशु कर
मांगे मधुकरी जब,
श्रीमंतों से
मिलती दुत्कारें।

आग उगलती साँसे उनकी,
उग्र उदर के साथ।
नर्तन-गायन अनुचित लगते,
रिक्त उदर के साथ।।

प्रासादों के
सम्मुख बौनी सी,
गास-फूस की
तिरपाली दुनिया।

शहनाई से
क्या काम वहाँ पर,
बिक जाती है
दीनों की मुनिया।

वर्ग-विभाजन उचित नही है,
लुप्त उदर के साथ।
नर्तन-गायन अनुचित लगते,
रिक्त उदर के साथ।।

एक दिवस ही
श्रीमंतों देखो,
गर्म पथों पर,
बिना छाँव के घर।

भूख-प्यास का
आघात देखकर,
अनुभव करना
जीता जन मर-मर।

जीना-मरना बिना प्रयोजन,
तप्त उदर के साथ।
नर्तन-गायन अनुचित लगते,
रिक्त उदर के साथ।।

जल की शीतल
चल बूँद मिलाने,
श्रम सीकर के
उजड़े उपवन में।

मृदल मधुर स्वर
चल उच्चारित कर,
श्रम सहकारी
मुरझे मधुबन में।

आज भारती साथ चाहती,
दग्ध उदर के साथ।
नर्तन-गायन अनुचित लगते,
रिक्त उदर के साथ।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, पुणे ।।महाराष्ट्र।।



@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

'झरना' विषयाधारित सृजन-
बरसाती पलकों में आँखें,
खोज रही है यहाँ-वहाँ।
हर मौसम में झर-झर झरती,
झरने सी है जहाँ-तहाँ।।

स्वर्णकोष सा
खोज रहा हूँ
गुण-ग्राहक सा
जहाँ-तहाँ ।

अन्तर स्थित
इतर कोष से
सब नाहक सा
यहाँ-वहाँ ।

तृषित चिरैया बनती आँखें,
पंख पसारे यहाँ-वहाँ।
हर मौसम में झर-झर झरती,
झरने सी है जहाँ-तहाँ।।

सपनों वाली
इस दुनिया में,
इठलाते अब
सब शीशे।

पाषाणों में
रत्न दबे हैं
इतराते अब
सब शीशे।

शंकाओं को ढोती आँखें
प्रश्न पूछती यहाँ-वहाँ।
हर मौसम में झर-झर झरती,
झरने सी है जहाँ-तहाँ।।

मौसम इतना
आवारा है
करना चाहे
अभिसारण।

अधमों ने भी
डाले डेरे
करते रहते
अधिमारण।

आग लिए रतनारी आँखें,
यज्ञ कुंड सी यहाँ-वहाँ।
हर मौसम में झर-झर झरती,
झरने सी है जहाँ-तहाँ।।

फलित शाख पर
सुमन झूलते
आकर्षण से
भय भरते।

सम्मुख कंटक
प्रथमा होकर
संकर्षण से
विष झरते।

पीयूष खोजती सब आँखें,
जली-कटी सी यहाँ-वहाँ।
हर मौसम में झर-झर झरती,
झरने सी है जहाँ-तहाँ।।

कभी-कभी इस
उदधि आँख में
बढ़-चढ़ आता
उग्र ज्वार।

तोड़ तटों को
भू पर आता
बतलाने को
स्वाधिकार।

गीत जागरण गाती आँखें,
सरिता सी है यहाँ-वहाँ।
हर मौसम में झर-झर झरती,
झरने सी है जहाँ-तहाँ।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, पुणे।।महाराष्ट्र।।


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


पुष्प मिले या मिले सुगंध ही,
सार सुमन का वही मिलता।
रूप कोई भी लिए मिला हो,
प्यार वही का वही मिलता।।

नील पटों सा
नभ जो फैला
उसमे तव मुख
भावन देखा।

रजनी पथ पे
देख चंद्र को
तेरा सस्मित
आनन देखा।

सरस रूप तुम ज्यों प्रकृति देवी,
भाव वही का वही मिलता।
रूप कोई भी लिए मिला हो,
प्यार वही का वही मिलता।।

गहन पीड़ की
लहरें चढ़ती
प्रेम - तटों को
पावन देखा।

छिप जाएं तव
हृदय-अंक में
तब कानन में
सावन देखा।

दूर - दूर ना दिखते कहीं पर,
अनुराग मुझे वही मिलता।
रूप कोई भी लिए मिला हो,
प्यार वही का वही मिलता।।

भारी मन ले
बैठ गए तो,
भोले प्राणी
बहला देते।

मंद-मंद सी
पवन बहाते,
दे-दे थपकी
सहला देते।

लगता है कि तुम आसपास हो,
अनुभव मुझे वही मिलता।
रूप कोई भी लिए मिला हो,
प्यार वही का वही मिलता।।

उछल कूदती
सरिता भरिता,
पास बिठा
रंजन करती।

स्वर सरगम से
कविता धरिता,
पीड़ाओं का
भंजन करती।

तुम सहचरी ही रूप-गंध हो,
विश्वास मुझे वही मिलता।
रूप कोई भी लिए मिला हो,
प्यार वही का वही मिलता।।

ज्ञात नहीं है
कितना दुर्भर,
बिना साथ के
चलते रहना।

मुक्त हुई है
नाव धार में,
इस धारा में
बहते रहना।

हस्त लिए हैं साथ तुम्हारा ,
अनुबंध मुझे वही मिलता।
रूप कोई भी लिए मिला हो,
प्यार वही का वही मिलता।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, पुणे ।।महाराष्ट्र।।


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


हुए प्रवासी फिर-फिर मित्रों।
छोड़ उदासी फिर-फिर मित्रों।
बने संवादी फिर -फिर मित्रों।
बंटे उजासी फिर-फिर मित्रों।।

आवास सदन
जो अपने हैं,
परदेशी भी
सब अपने हैं।

घर-गाँव-गली
जो अपने हैं,
वे सब के सब
भी अपने हैं।।

चले ताजगी फिर-फिर मित्रों।
छोड़ें बासी फिर-फिर मित्रों।
बने संवादी फिर -फिर मित्रों।
बंटे उजासी फिर-फिर मित्रों।।

भीनी सौरभ
छोड़ के आएं,
अंतर तक अब
पैठ के आएं।

तरुणाई को
चेत के आएं,
सरल स्नेह को
सेव के आएं।।

सजल हुए हैं फिर-फिर मित्रों।
टीस मिटाने फिर-फिर मित्रों।
बने संवादी फिर -फिर मित्रों।
बंटे उजासी फिर-फिर मित्रों।।

हंकी भूमि तो
पहले से है,
बीज वपन भी
पहले से है।

मुझे प्रतीक्षा
पहले से है,
मीठा सा फल
पहले से है।

हाथ बढ़ा लें फिर-फिर मित्रों,
खाई पाटें फिर-फिर मित्रों।
बने संवादी फिर -फिर मित्रों।
बंटे उजासी फिर-फिर मित्रों।।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, पुणे, महाराष्ट्र ।।



@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

लेकर तेरा हम अवलम्बन,
जग ही सारा घूम गए।
अग्निशिखर से वल्लरियाँ तक,
पथ-कंकर तक चूम गए।।

जमे हुए थे
हिम - खण्डों से,
अंश नहीं था ऊष्मा का ।

स्पंदन पर
जड़ता का आसन,
अंश नहीं था सुष्मा का।

लेकर तेरा हम अवलम्बन,
भुजपाशों में झूल गए।
अग्निशिखर से वल्लरियाँ तक,
पथ-कंकर तक चूम गए।।

सन्निधि पाकर
जड़ता तक भी
स्वतः विसर्जित होने लगी।

ऊष्मा जैसी
पाकर के ऊष्मा,
सुषमा स्पंदित होने लगी।

ले स्पंदन में तव अवलम्बन,
अपने में ही झूम गए।
अग्निशिखर से वल्लरियाँ तक,
पथ-कंकर तक चूम गए।।

जीवन में है
जड़ता ही मारक,
उसका किसी में काम नहीं।

जीवन है वह
सृजना का साथी,
सृजना कहीं बदनाम नहीं।

धड़कन में ले तव अवलम्बन,
सृजना में ही डूब गए।
अग्निशिखर से वल्लरियाँ तक,
पथ-कंकर तक चूम गए।।

कल-कल करती
जो जीवन धारा,
रसवंती वही रस भरती।

झर-झर झरती
वर्षण जो करती,
वही बदली ही यश भरती।

रस से यश तक ले अवलम्बन,
पीड़ाएँ तक भूल गए।
अग्निशिखर से वल्लरियाँ तक,
पथ-कंकर तक चूम गए।।

आश जगे जब
जीवन को लेकर,
तब लुहारी लगती प्यारी।

प्यास बुझे जब
जीवन को भरकर,
तब दिहाड़ी लगती न्यारी।

भरी दुपहरी ले तव अवलम्बन,
सूर्ख धूप को लूट गए।
अग्निशिखर से वल्लरियाँ तक,
पथ-कंकर तक चूम गए।।

बंधे हस्त ले
जीने से उत्तम,
लय से सहज रचे अनुबंध।

जमे चरण ले
रहने से उत्तम,
निर्भय गतिज रचे सम्बन्ध।

संकल्पों सा तव अवलम्बन,
बंधन सारे छूट गए।
अग्निशिखर से वल्लरियाँ तक,
पथ-कंकर तक चूम गए।।

प्रिये ! सुनो भी
मर-मर कर रहना,
जीवन हेतु संस्कार नहीं।

उल्लास लिए ही
भर-भर कर चलना,
जीवन हेतु संस्कार सही।

शिव सा सुन्दर तव अवलंबन,
प्यार को तुमसे बूझ गए।
अग्निशिखर से वल्लरियाँ तक,
पथ-कंकर तक चूम गए।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।।राज.।।


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


कभी-कभी लिए मौन समाधि,
कर लेते प्रेमी प्रतिकार।
प्यार के पथ में चुप्पी ले कर,
कर लेते प्रेमी स्वीकार।।

जब भी अपना
छोड़ चले तो,
आँख भीगती ही जाती।

प्राण सालती
नित्य प्रतीक्षा,
साँस छीनती ही जाती।

सजल आँख सह लिए प्रतीक्षा,
कर लेते प्रेमी सत्कार।
प्यार के पथ में चुप्पी लेकर,
कर लेते प्रेमी स्वीकार।।

विजय पताका
किये समर्पित,
जीत मान ली है जाती।

प्रियतम को ही
सर्व समर्पण,
रीत मान ली है जाती।

प्रीत के पथ पे मृग छौना सा,
कर लेते प्रिय अहंकार।
प्यार के पथ में चुप्पी लेकर,
कर लेते प्रेमी स्वीकार।।

दंश दुंदुभी
बजती रहती,
जीवन दाजन से भरता।

एक सहारा
शपथ सदा ही,
जीवन मापन से चलता।

मौन के पहरे दंश झेलते,
सह लेते प्रेमी व्यवहार।
प्यार के पथ में चुप्पी लेकर,
कर लेते प्रेमी स्वीकार।।

प्रेम पंथ भी
तीक्ष्ण नुकीले,
नहीं तजेंगे अंतर-मन।

छील डालते
चला-चलाकर,
जग कहता वे सुंदर-जन।

करे हृदय हा-हाकार भले ही,
रखते हैं प्रेमी विस्तार।
प्यार के पथ में चुप्पी लेकर,
कर लेते प्रेमी स्वीकार।।

इंद्रधनुष हो
जो फैली थी,
गहन तमस में खो जाती।

बनती मीरा
शेष कथा बस,
लिए हलाहल सो जाती।

प्रेम के पथ में जटिल सलीके,
ये होते प्रेमी संस्कार।
प्यार के पथ में चुप्पी लेकर,
कर लेते प्रेमी स्वीकार।।

बदली जैसी
पूर्णाहुति में,
हो ही जाता जग न्यासी।

पृष्ठ रचेंगे
कथा कहेंगे,
गीत कहेंगे संन्यासी।

उपहास लिए शुष्क अनुक्रम,
यही रहे प्रेमी उपहार।
प्यार के पथ में चुप्पी लेकर,
कर लेते प्रेमी स्वीकार।।

पूरी अद्भुत
सप्त पदी ये,
जिसमें भरा विसर्जन है।

मंत्र आहूति
यजन प्रेम में,
माना शुद्ध समर्पण है।

प्यार के पथ मधु से मीठे,
रच लेते प्रेमी संसार।।
प्यार के पथ में चुप्पी लेकर,
कर लेते प्रेमी स्वीकार।।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।।राज.।।


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

जीवन के सरगम में मिलते, ऊंचे - नीचे स्वर सारे।
छूट गया जब भी स्वर कोई, टूट गया सरगम प्यारे।।

किसी एक से काम सरा तो,
खुलकर के बतला देना।
किसी एक से रुका काम तो,
वह भी तुम बतला देना।

कई रंग के संयोजन से,
धवल दिवस है उग आता।
जब भी कोई रंग रुका तो,
धवल दिवस है चुग जाता।

मृदा न्यौतती जब जीवन को, नहीं स्वप्न रहे कुँवारे।
छूट गया जब भी स्वर कोई, टूट गया सरगम प्यारे।।

लहर प्राण की भर-भर आए,
नाद नेह का भर जाता।
प्राण रुके तो पक्व पत्र सा,
नाद नेह का झर जाता।

ज्यों बंसी के रंध्र-रंध्र तक,
राज रहा है सरगम का।
हर सरगम के बंध-बंध में,
साज सजा है धड़कन का।

सप्त स्वरों के सरगम से ही, प्यारे लगते स्वर खारे।
छूट गया जब भी स्वर कोई, टूट गया सरगम प्यारे।।

जब भी चलते पथ को देखूँ,
सब को ही पथ झेल रहा।
आने -जाने के क्रम से ही,
पथ से पथ का मेल रहा।

घुटने के बल रेंग रहा कल,
आज वही जन दौड़ रहा।
हर्ष लिए जन दौड़ रहा था,
आज वही पथ छोड़ रहा।

इंद्रधनुष को रचने में ही, गाती सरगम बौछारें।
छूट गया जब भी स्वर कोई, टूट गया सरगम प्यारे।।

सुरभित सुमन झूम-झूम कर,
रंजित राग दिखाता है।
अलि-कली को चूम-चूम कर,
निज अनुराग सिखाता है।

मुकुलित सुमन कल ना रहेगा,
पर राग वहाँ झूमेगा।
अलि - कली भी कल ना रहेंगे,
अनुराग वहाँ झूमेगा।

सदा नव्यता चाह लिए ही, बजता सरगम घर-द्वारे।
छूट गया जब भी स्वर कोई, टूट गया सरगम प्यारे।।

प्रणय निवेदन के बल पर ही,
सांसों को आधार मिला।
जीवन भूषण रचता रहता,
प्रणय भाव सुनार मिला।

प्रणय वशीभूत देख रहे हैं,
नट-नागर का नृत्य सदा।
वही छेड़ते नाना सरगम,
वही सिखाते नृत्य सदा।

सुनो प्रिय श्री नम्र निवेदन, बने रहे प्रणय हमारे।
छूट गया जब भी स्वर कोई, टूट गया सरगम प्यारे।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।। राज.।।


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@



क्षीण सुखों की
झलक दिखाकर,
अपने पथ वह लौट गई।

वर्तमान में
पुनः अतीत सा
मुझे अकेला छोड़ गई।।

मन्द्र - मधुर - शीतल पवनों ने,
रुक-झुक कर तब बहलाया।
वह अतीत की हुई कथा सी,
रुक-झुककर तब सहलाया।

विस्मृत कर के
सघन त्रासदी,
अन्य लोक से जोड़ गई।

वर्तमान में
पुनः अतीत सा
मुझे अकेला छोड़ गई।।

लो पुनः प्रवास मुझे मिला है,
यही मेरी तो नियति थी।
इसी मध्य रस - धार बही थी,
कृपा पूर्ण बस प्रकृति थी।

विरल पथों से
मुझे हटा वह,
स्वप्न सोर में छोड़ गई।

वर्तमान में
पुनः अतीत सा
मुझे अकेला छोड़ गई।।

शपथ लिए मैं घूम रहा हूँ,
नहीं त्रासदी जीतेगी।
हुए प्यार में भले बटोही,
यही त्रासदी हारेगी।

बनी-ठनी सी
है प्रकृति रानी,
निर्वासन में मोड़ गई।

वर्तमान में
पुनः अतीत सा
मुझे अकेला छोड़ गई।।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द ।।राज.।।


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


रुके चरण से स्वर्ग मिले ना,
उठे चरण से सहज मिला है।
परिवर्तन निज कर ले आते,
स्वर्ग पथों पे विनत मिला है।।

उदासियों के
महल बड़े हैं,
उनसे बाहर
आकर देखें।

चिंताओं के
जाल तने हैं,
उनसे बचके
आकर देखें।

चिंता के सब जाल तोड़ आ
महल उदासी छोड़-छाड़ आ।
निर्भय रह परिवर्तन करता
उसको स्वर्ग सहर्ष मिला है।।

जलद रुके भी
हाथ रुके ना,
भीषण आतप
चरण रुके ना।

फसलें श्रम से
मरे कभी ना,
फल प्रत्याशा
झरन रुके ना।

विगत अतीत से मोह न रखना,
वर्तमान को अंक लगाना।
कर्म - युक्त उदयाचल रचता,
स्वर्ग उसे तो खूब मिला है।।

निष्ठा से ही
गंगा उतरी,
सगर पुत्र की
वय फिर उबरी।

अन्तरबल से
मृत्यु हारती,
सावित्री तक
कांत तारती।

जीत - हार को आँक कभी ना,
निज विश्वास छोड़ कभी ना।
जिसने साध लिया सुलक्ष्य को,
स्वर्ग उसे तो सरस मिला है।।

विकट घटी में
जो झंझा को,
ललकार रहा
वह दीवाना।

दुर्गम भू पर
विकट पंथ को,
दुत्कार रहा
वह मस्ताना।

जो झंझा को खेल मानता,
नव पंथों का सृजन साधता।
जिसने की है स्वीकार सर्जना,
स्वर्ग उसे ही पूर्ण मिला है।।

उल्लास भरा
जिसका जीवन,
प्रेम पगा है
उसका जीवन।

विश्वास लिए
जो जीता है
शिव सा बिरला
विष पीता है।

विष का शोधन जो जान गया ,
अमृत को वही पहचान गया।
अमरों सा जीवन जो जीता,
स्वर्ग उसे हर बार मिला है।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।।राज.।।


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


विकल्प तुम्हारे खुले हुए,
खोलें अब नीम नयन।
स्वर्णिम सूर्योदय को लेकर,
करे अभी असीम चयन।।

श्याम पटों की
पृथुल यवनिका,
स्वर्ण - मयूख को
रोके क्यों?

कटु धूम्र भरी
संधि के रहते,
धवल दिवस अभी
रोके क्यों?

हाथ निरंतर आएं अवसर,
ये कहना भीम कथन।
सर्व विकल्प अभी खुले हुए,
खोलें अब नीम नयन।।

पृथुल पटों की
श्याम यवनिका,
झूल रही तो
खोलें भी।

स्वर्णिम सूर्य को
उदयाचल में,
उदय निमंत्रण
बोलें भी।

उष्ण चेतना से घट भरिए,
त्यजना तल्लीन शयन।
विकल्प तुम्हारे खुले हुए,
खोलें भी नीम नयन।

श्याम पटों की,
अंध यवनिका,
रोक रही है
दिवसों को।

हटे यवनिका
हो परिवर्तन,
देख भी पाएँ
दृश्यों को।

रुद्ध कंठ भी बढ़-चढ़ करते,
प्राणों को कुलीन नमन।
विकल्प तुम्हारे खुले हुए,
खोलें भी नीम नयन।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।। राज.।।


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


तेरे आँचल की मृदुता में,
प्यार भरा संसार।

जिसको माना
मैंने अपना,
वह होता इक सपना।

छाँव के हेतु
अन्वेषण में,
पीत धूप का हँसना।

तप्त मरुत सह रोते देखे,
जले-भुने कचनार।
तेरे आँचल की मृदुता में,
प्यार भरा संसार।

दग्ध देह को
लेकर चलते,
प्यारा अंचल पाया।

मानों भीषण
आतप चलते,
छाँव पुलिन ही पाया।

शेष धरा पर पुष्प शुष्क से,
रहे सुप्त सी धार।
तेरे आँचल की मृदुता में,
प्यार भरा संसार।

तेरे अंचल
अवलम्बन में,
जीवन की रही चाह।

पतझड़ विदा
हुआ जीवन का,
भर-भर लिए उत्साह।

नर्म धरा पर प्रेम अंकुरित,
हुआ प्रथम ही बार।
तेरे आँचल की मृदुता में,
प्यार भरा संसार।

अंचल तेरा
जो छाया तो
होती सरस फुहार।

शेष धरा पर
नव पल्लव के,
सुस्वागत में बौछार।

गहन उदासी जब भी पकड़े,
प्रिय देना विस्तार।
तेरे आँचल की मृदुता में,
प्यार भरा संसार।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।।राज।।


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
अनुभूति के अश्व न मारें, देखो भी परिवेश।
समय जकड़ जड़ता धारे,पद पत्थर आवेश।।

कौन नहीं नभ छूना चाहे,
दिन में बारम्बार।
कौन नहीं सुख को माँगे,
दुःख का है अम्बार।

घायल खग से जन बैठे यों,
सहलाते हैं पंख।
अंगारों के अतिवर्षण में,
भरे आग से अंक।

जग में कुछ ऐसा भी कर दें, सुख का हो उन्मेष।
समय जकड़ जड़ता धारे, पद पत्थर आवेश।।

वीथी - वीथी रक्तिम बूंदे,
बतियाती है आग।
आँगन - आँगन है सूनापन,
कर्राते हैं काग।।

श्रीमंतों ने सोख लिया है,
हम से रंगी फाग।
अपने जीवन मे आ बैठा,
चिंताओं का भाग।

तुम से है जीवन की आशा, मिले सुखद संदेश।
समय जकड़ जड़ता धारे,पद पत्थर आवेश।।

पता नहीं क्यों चिट्ठी - पत्री,
गुमनामी में डाली।
कहीं डाकिया अटका बैठा,
मनमानी को पाली।

लोग कहे भाई तो अपने,
करते टाँग खिंचाई।
सद्कर्मों की खूब कर रहे,
फिर-फिर कर सिकाई।

वे दिल्ली के केवल आशिक, हमें चाहिए देश।
समय जकड़ जड़ता धारे, पद पत्थर आवेश।।

उत्तर से दक्षिण तक फैला,
भरतों का यह देश।
पूरब से पश्चिम तक पसरा,
नर-सिंहों का देश।

इससे पालित विश्व रहा है,
अब भी है पालक।
वर्तमान का आँचल थामे,
अब भी है साधक।

जीवन से जो खेल खेलते, समझें त्रुटि विशेष।
समय जकड़ जड़ता धारे,पद पत्थर आवेश।।

प्रेम के पलने में जो रखते,
अनुभूति अनायास।
सब को लेकर आगे चलते,
साथ रहे सायास।

स्नेह - सूत्र वे पकड़े रहते,
बैठे इक ही नाव।
हाथ सभी के साथ चले तो,
बढ़े साथ ही पांव।

घातक साथ चले कभी ना, तथाकथित दरवेश।
समय जकड़ जड़ता धारे,पद पत्थर आवेश।।

दरवेशों की झोली देखो,
स्वर्ण-रजत के ढेर।
ऊपर से कदली वृक्ष सरीखे,
अंदर कंटक बेर।

झूठ - मूठ की बातें कहते,
वे ही उनके मंत्र।
मकड़ जाल से जाले बुनते,
वे ही उनके तंत्र।

इक दिन जनता रोष भरेगी, कोप करेगा देश।
समय जकड़ जड़ता धारे,पद पत्थर आवेश।।

आवेशित जनता दहाड़ती,
हिल जाते दिग्पाल।
प्रखर लहर सी लहराती यह,
छिप जाते भूपाल।

अवरोधक को कुचल डालती,
करती वज्राघात।
सूरज - चंदा तक झुक जाते,
थम जाते दिन-रात।

भोले हो क्यों रहते मद में, जनता करे प्रवेश।
समय जकड़ जड़ता धारे,पद पत्थर आवेश।।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।।राज.।।


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


लगे हुए सब तय करने में,
जीवन के परिमाप।
सब ही जाने बंध से बढ़ता,
जीवन में अनुताप।।

जब खग नापे
नील गगन को,
लिए हुए उल्लास।

बिना बंध के
फिर से आता
लिए हुए उत्साह।

बंधन तन का हो या मन का,
बोता है संताप।
सब ही जाने बंध से बढ़ता,
जीवन में अनुताप।।

निर्बन्धित हो
जल सरिता का
करता है कल्लोल।

मानों उसका
घर भू सारा
बहती ले हिल्लोल।

बंधन में आ सरिता भरती,
लहरों में संताप।
सब ही जाने बंध से बढ़ता,
जीवन में अनुताप।।

बंधन केवल
लेकर आता
विकृत सा बौनापन।

मुक्ति पथों से
केवल आता
सुकृत सा विस्तारण।

कर पाना बौना वट जंगम,
सृष्टि में अभिशाप।
सब ही जाने बंध से बढ़ता,
जीवन में अनुताप।।

क्या बंधन को
देखा तुमने
नभ में घन के साथ।

क्या बंधन में
सौरभ देखी ।
बहे पवन के साथ।

बंध रहित जीवन की वृत्ति,
सोखे सब परिताप।
सब ही जाने बंध से बढ़ता,
जीवन में अनुताप।।

सम्बन्धों की
परिभाषा समझें
ज्यों गंगा का पानी।

बंधन की भी
परिभाषा जानें
काला सागर पानी।

सहचर होकर मुक्ति भरें तो,
व्यर्थ सभी परिमाप।
सब ही जाने बंध से बढ़ता,
जीवन में अनुताप।।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।। राज.।।


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


तारक सह जब आए शशि-श्री, नभ की चादर सज जाती।
हुई रुआँसी निशा देख यह, नव उमंग से भर जाती।।

नील वर्ण का ओढ़ दुशाला,
निशा चरण धरती आई।
स्वयं निराकृति को अनुभव कर,
त्रास भरण भरती आई।

नर्म - गर्म हो पवनें बहती,
मानों फूँक रही है श्वांस।
बंसीवन से बंसी बजती,
मानो खोज रही उल्लास।

नीलमणि सम नील दिशाएँ, सरगम ले - ले सज जाती।
हुई रुआँसी निशा देख यह, नव उमंग से भर जाती।।

छिटक गया है दैव योग से,
किसे सुनाए अपना दुःख।
अंतर ज्वाला और भड़कती,
स्मृतियों में जब बसता सुख।

उसी योग में जब ले आता,
अपना कोई स्नेह सरस।
अपनों का अवलंबन पाकर,
त्रास भागता हुआ विवश।

अवलंब बना चंद्र विहंसता, रजत ज्योसना भर जाती।
हुई रुआँसी निशा देख यह, नव उमंग से भर जाती।।

जिनके उर पर भाव खेलते,
लूट लिए जाते जग में।
फलित वृक्ष विनम्र हो रहते,
चूंट लिए जाते मग में।

मुक्तामाल जग करे समर्पित,
खालीपन तो खलता है।
लूट-चूंट में ठूंठ हुआ जन,
सदा सशंकित रहता है।

करतलियाँ तब सहलाने आ, नव स्पंदन से भर जाती।
हुई रुआँसी निशा देख यह, नव उमंग से भर जाती।।

प्रिये! कहीं भी नहीं अकेली,
प्रिय शशि-श्री भी है सहचर।
प्रिय भाव भरे ही रखते अपने,
जैसे नभ में हैं नभचर।

निशा सांवली होकर भी नित,
शशि-श्री सह वह जी जाती।
रजत रेशमी ओढ़ दुशाला,
लोक त्रास तक पी जाती।

तभी प्रकृति स्निग्ध भाव ले, नदी प्रेम की भर जाती।
हुई रुआँसी निशा देख यह, नव उमंग से भर जाती।।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द ।। राज।।


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


बसंत के साथ
अनंग आता या नहीं
पर वह होता जरूर
बेचारा मारा गया कभी
त्र्यम्बक के कोप में
सविनय होकर बोलो भी
शुभ हो प्रेम-दिवस।

हमारे पास मदनोत्सव
उनके पास ल्यूपरसेलिया
नाम का ही अंतर
शेष प्रेम तो
एक समान और शाश्वत
उत्सुक हो सहर्ष गाओ भी
शुभ हो प्रेम-दिवस।

फतवे के आगे
कसमसा कर
मर जाता था प्रेम
तब साहस करके संत
प्रेम को देने लगे आधार
वही संत का अंत
प्रेम फिर भी शाश्वत
करुण पुकार लगाओ भी
शुभ हो प्रेम-दिवस।

प्रेम के रंग कई पचास
क्योंकर छोड़े निःश्वास
सबका मूल और अनुकूल
पेड़-पुष्प-लता समूह
सर-सरिता-सुमन समूह
रवि-मयंक-तारक गण
दिनचर्या में हर मानव गण
व्यस्त सदा ले प्रेम-सूत्र
लिखकर मीठा खत भेजो भी
शुभ हो प्रेम-दिवस।

-त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


विवश हुए जन बंधन में आ मन का अर्पित करते हैं।।
खारे जल में ज्यों अक्सर जन सुमन विसर्जित करते हैं।

पवन थपेड़े मारे जाए
बेचारा तन भी थकता।
पानी सिर से ऊपर जाए
बेचारा मन भी मरता।

प्राणों को हरने को आतुर
जो जीवन के संवाहक।
करें निवेदन भले कहीं भी
नहीं सुने अपने तारक।।

दहते अंतर उबल - उबल कर सुखद विसर्जित करते हैं।
खारे जल में ज्यों अक्सर जन सुमन विसर्जित करते हैं।।

सुन्दर मन की सौगात भले
जग में रहे सदा अतुल्य।
उसे स्वजन ठुकराते क्षण में
नहीं मानते वह अमूल्य।

ऐसे क्षण वैरागी होकर
थपकी खाते अनजाने।
अपने जन अपने ही जन पर
आघात करे मनमाने।

दरकन - टूटन के रहते ही नयन विसर्जित करते हैं।
खारे जल में ज्यों अक्सर जन सुमन विसर्जित करते हैं।।

हर आँसू की बूँद बढ़ाती
अंतर की गहरी टूटन।
प्रतिक्रिया के चलते उठती
यहाँ-वहाँ पर तीक्ष्ण अगन।

फिर तो पवन लिए उष्णता
झकजोर डालता है सब को।
आँख तरेरे पानी भी तब
पुरजोर मारता है सब को।

विकट घड़ी में स्वयं हाथ से स्वर्ण विसर्जित करते हैं।
खारे जल में ज्यों अक्सर जन सुमन विसर्जित करते हैं।।

समझ सको तो समझो भी तुम
सगा नहीं है आलोड़न।
सदा काटता निर्दयता से
दो धार लिए आरोपण।

मानस फिर उद्वेलित होता
स्वर विद्रोही भर जाते।
ज्वालामुखी मुख खोल दिखाती
भू पर कंपन भर जाते।

रचन डूबता जाता है तब सृजन विसर्जित करते हैं।
खारे जल में ज्यों अक्सर जन सुमन विसर्जित करते हैं।।

दोनों हाथों सुख लाने को
आँसू - हिचकी को समझें।
कौन घोलती क्षार सभी में
लवणी चुटकी को समझें।

अम्ल - फुहारों में जीवन का
सरगम मरता ही जाता।
तीक्ष्ण धूप भी तपिश लगाए
वन तक मुरझा ही जाता।

आघातों के चलन - कलन पर मूल्य विसर्जित करते हैं।
खारे जल में ज्यों अक्सर जन सुमन विसर्जित करते हैं।।

सुख - सुविधा सह अधिकारों को
पद के पीछे आँक रहे।
मानो समझे चौराहे पर
विजिया को ले फाँक रहे।

सत्ता को लेकर जनगण को
दो राहों पर डुला रहे।
मानों ज्वाला के स्वागत में
घृत-घट ओंधे झुला रहे।

तप जाता है जब भी तन-मन स्वधन विसर्जित करते हैं।
खारे जल में ज्यों अक्सर जन सुमन विसर्जित करते हैं।।

- त्रिलोकी मोहन पुरोहित, राजसमन्द।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

No comments:

"स्वतंत्र विषय लेखन "08दिसम्बर 2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें   ब्लॉग संख्या :-589 अभी सक्रिय है ...