अनुराधा नरेंद्र चौहान








नाम:---------अनुराधा चौहान जन्मतिथि:-18/10/1970 जन्मस्थान:-ग्वालियर शिक्षा:-बी.ए सृजन की विधाएं:-लघुकथा, कहानी, कविता,विचारात्मक लेख आदि सम्मान:-भावों के मोती,कलम की यात्रा एवं साहित्य पीडिया से साहित्यिक सम्मान संप्रति (पेशा/व्यवसाय):-गृहणी
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भावों के मोती
विषय- सुख/दुःख

रात की चौखट पर
ठिठक कर रुक जाते हैं
मेरी किस्मत के उजाले
दुःख की रात ढलती नहीं
सुख का सूरज आता नहीं
यह कैसी परीक्षा ज़िंदगी की
जब भी उजाले की ओर
बढ़ने लगते हैं मेरे कदम
कहीं से तेरी यादों का झोंका
आकर मुझसे लिपट जाता
बीत जाती है हर रात 
तेरी यादों की चारपाई पर
मेरा वक़्त रुका है वहीं
अभी भी तेरे इंतज़ार में
रात की चौखट पर बैठा
अंधेरे की काली चादर ओढ़
मैं दर्द के लहरों संग मचलता
आँसुओं के समंदर में डूबता
तुम्हें तलाशती आँखें हरपल
मुझे भरोसा आज़ भी है
तू आएगी एक दिन लौटकर
रात की चौखट पर
आज भी बैठकर करता हूँ 
मैं तेरा इंतज़ार अक्सर
काश मेरा चाँद आए
चाँदनी के उजाले साथ लेकर
रात की चौखट पर आकर
तारे आस के टिमटिमा दे
भरोसा है मुझे भरोसे पर
मेरी ज़िंदगी में तेरा प्यार 
रात की चौखट पार कर
ले जाएगा उजालों की ओर
***अनुराधा चौहान***©स्वरचित

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समय अपनी रफ्तार से भागता है 
पता ही नहीं चलता
जीवन की यह गाड़ी कब
ज़िंदगी का
सुहाना सफर छोड़कर
एक अनजाने अनचाहे
सफ़र पर चल पड़ती है
जहाँ एक-एक करके
दूर होते जाते अपने
हाथों से हाथ छूटने लगता
यह कैसा मोड़ ले जाती ज़िंदगी
जहाँ हार सिर्फ हार दिखाई देती
उम्मीद की किरण धूमिल हो जाती
यही शाश्वत सत्य है ज़िंदगी का
जहाँ आकर 
हर इंसान हार जाता है
मृत्यु पर किसी का
बस नहीं चलता
चोट पर चोट लगती जाती है
फिर भी खड़े होकर कर्म करते जाना
यही मानव जीवन की नियति है
कहते हैं सब हिम्मत से काम लो
रुको मत आगे बढ़ो 
यादों को साथ लेकर
दुनियाँ तो आनी-जानी है
जीवन मृत्यु की कहानी है
मुश्किल होता है संभलना
इस खालीपन को जीना
बहार में भी पतझड़-सी ज़िंदगी
वृक्ष से शाखाओं का गिरना
सारी रौनकें लेकर 
निकल जाता वक़्त
हम कोसते रह बस उस जाते लम्हे को
***अनुराधा चौहान***©स्वरचित

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घर सेे निकला था
रोजी-रोटी तलाशने
जेब में संभाल कर रखे थे
माँ के आँसू,
पिता का आशीष
पत्नी के अरमान
बच्चों की ख्वाहिशें
लिए चंद रुपए
खाई दरबदर की ठोकरें
सच्चाई की दौलत जेब में लिए
मेहनत कर पैसे कमाए
हर काम के लिए
करता औरों की जेब गरम
गरीब के पैसे ख़ाकर
भ्रष्टाचारियों को न आए शरम
सच्चाई हारने लगी
झूठ पांव पसारने लगा
गांव से आया सच्चा इंसान
धीरे-धीरे भ्रष्टाचारी बनने लगा
दोष उसका नहीं 
दोष रसूखदारों का है
पैसे वालों को सारी सुविधाएं
गरीब की कौन सुनता है
धूप में बदन जलाकर
मेहनत कर पसीना बहाते
फिर भी जरुरत पूरी न हो पाए
ना ही बच्चों को पढ़ा पाते
तंगहाली में कब फट जाती जेब
गिरकर मिट्टी के मिल जाते
पत्नी के अरमान
बच्चों की ख्वाहिशें
माँ के आँसू, पिता का आशीर्वाद
करने सबकी जरुरतें पूरी
करने लगा सबकी जी हुजूरी
***अनुराधा चौहान***©स्वरचित
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तन्हा तन्हा -सी है अब
यह ज़िंदगी तुम बिन
कुछ यादें कुछ बातें
कुछ लम्हे तेरे वादे
कैसे भूल जाऊं ज़िंदगी
जो ज़ख्म तूने दिए थे
यह दर्द और बेकरारी
छाई जीवन में उदासी
है दामिनी तड़कती
घटाएं शोर करती
हवाओं ने रुख़ है बदला
आई यह रात काली
जो फासले हमारे दरमियान
वजह थी तेरी बेरुखी
मन में मेरे हरपल
यादें तेरी है बसी हुई
मैंने हर अपमान सहा
हर रिश्ते का मान रखा
जब चोट लगी दिल को
बिखर गए सपने सभी
बह गए इन आँसुओं में
इस दिल के सारे भरम
गलतियां तुम्हारी नहीं
विचार हमारे मिले नहीं 
चाह थी सात जन्मों की
संग जीने-मरने की
पर कुछ कदम भी हम
एक-दूजे के साथ न चल सके
***अनुराधा चौहान***©स्वरचित
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ २/४/१९
भावों के मोती
विषय-मति/बुद्धि/दिमाग

वक़्त की बेहरमी ने
तोड़े मन के सारे भरम
कभी दिल टूटकर बिखरा
यह वक़्त यूँ बदला
चल दिए छोड़कर अपने
जिगर पर मार के खंजर
वक़्त की यह कैसी मनमानी
मरता दिखे आँखों का पानी
बुद्धि विवेक सब भूल बैठे
वक़्त के चुभे शूल ऐसे
अपनापन पहचान खो रहा
अपना ही अब घाव दे रहा
मति के मारे इंसान सारे
आपस में ही लड़ते रहते
आपसी प्रेम की भूले भाषा
वक़्त के साथ बढ़ती अभिलाषा
इंसानियत पर हावी हो रहा
वक़्त अपने रूप बदलकर
अच्छा हो या बुरा ही सही
वक़्त न रुकता किसी के लिए भी
दिल दिमाग दोनों खुले रखकर
चलो वक़्त से कदम मिलाकर
***अनुराधा चौहान***©®स्वरचित

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विषय - मैं / स्वयं

मैं धर्म हूँ बेबस खड़ा
ज़ख्मी होकर आज पड़ा
अपनों के बीच अपने लिए 
लड़ रहा ज़िंदा रहने के लिए
भूल गए इंसानियत का धर्म
बने आज एक दूसरे के दुश्मन
हाँ मैं धर्म हूँ बेबस खड़ा
ना कोई माना ना कोई मानेगा
एकता थी वजूद मेरा 
बटा हुआ हूँ आज टुकड़ों में
जातियों के नाम पर
नफ़रत के पैग़ाम पर
अंतिम साँंस गिन रहा
मैं धर्म हूँ बेबस खड़ा
मानता है जो मुझे
संवारता जो मुझे
प्रेम बांटता फिरे
उपेक्षित वो इस जहाँ में
अभिशप्त हो जी रहा 
मैं स्वयं के हाल पर
मानव की मानसिकता पर
द्रवित हो उठा आज
अश्रू बहाकर देखता
धरा से मिटते खुद को आज
मैं धर्म हूँ बेबस खड़ा
***अनुराधा चौहान***©स्वरचित



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तन्हा तन्हा -सी है अब
यह ज़िंदगी तुम बिन
कुछ यादें कुछ बातें
कुछ लम्हे तेरे वादे
कैसे भूल जाऊं ज़िंदगी
जो ज़ख्म तूने दिए थे
यह दर्द और बेकरारी
छाई जीवन में उदासी
है दामिनी तड़कती
घटाएं शोर करती
हवाओं ने रुख़ है बदला
आई यह रात काली
जो फासले हमारे दरमियान
वजह थी तेरी बेरुखी
मन में मेरे हरपल
यादें तेरी है बसी हुई
मैंने हर अपमान सहा
हर रिश्ते का मान रखा
जब चोट लगी दिल को
बिखर गए सपने सभी
बह गए इन आँसुओं में
इस दिल के सारे भरम
गलतियां तुम्हारी नहीं
विचार हमारे मिले नहीं 
चाह थी सात जन्मों की
संग जीने-मरने की
पर कुछ कदम भी हम
एक-दूजे के साथ न चल सके
***अनुराधा चौहान***©स्वरचित

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7/4/19
भावों के मोती
विषय-स्वतंत्र लेखन
👀❄❄❄👀
कुछ कहती हैं यह आँखें
भेद खोलती हैं यह आँखें
कभी हँसती कभी रोती
मन की बात बताती आँखें

आँखों आँखों में ही कितने

प्रीत के गीत सुनाती आँखें
कभी हँसती और मुस्काती
दिल का हाल बताती आँखें

मन का दर्पण बनती आँखें

चंचल-सी यह सुंदर आँखें
काजल-सी काली कजरारी
मन को बड़ा लुभाती आँखें

विरहा का दर्द छलकाती

दिल के घाव छुपाती आँखें
प्रिय से कर दिल की बातें
सजनी की शरमाती आँखें

ममता के रस में डूबी

आशीष का रस बरसाती
कभी पैनी नजर बनकर
दिल में गहरे उतर जाती आँँखें

***अनुराधा चौहान***©स्वरचित✍
🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼
नजाना सा सफर था
कुछ लम्हों का यह मिलन था
अनजानी राह में 
मंजिल की चाह में 
अजनबी एक-दूजे से
अनजानी डगर थी
चला सिलसिला बातों 
ख्यालों से ख्याल मिले
नयनों से नयन मिले 
अहसास कुछ छलक पड़े
अधरो पर मौन लिए 
कुछ क़दम और साथ चले
मन में छिपे हुए भाव 
नयनों से झलक उठे
हृदय की धड़कन में 
गीत कोई बजने लगा
अनजाना सफर 
अब पहचाना लगने लगा
ख्यालों में तुम संग 
ख्वाब कोई बुन गया
मुँद गई पलकें सहसा 
तस्वीर तेरी झलक गई
सांँसों की डोर 
तुम संग बंध गई
प्रीत का अहसास 
मन को लुभाने लगा
साथ हमसफ़र का 
मन को रास आने लगा
जाने कब मैं बन गई 
तेरे जीवन की रागिनी
बातें कब तेरी
मन को रास आने लगी
पतझड़ के मौसम में
बहार खिलखिलाने लगी
अधरो पर थिरक उठे 
बोल किसी गीत के
जीवन का अर्थ नही 
अब बिना मेरे मीत के
साथ कुछ लम्हों का 
मेरे दिल में समा गया
साथी जन्मों के साथ 
मैंने तेरा है पा लिया

***अनुराधा चौहान***© स्वरचित
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लो फिर बिगुल बज उठा
तारीफों का शोर मचा
अपने मुंह सब मियां मिट्ठू
नचाते सब हथेली पर लट्टू

आजकल हम पर बड़े मेहरबान
मत से मतलब मतदान है पास
वोटों की खातिर हमसे है काम
पास में आ गए हैं अब चुनाव

मत दो या मत दो
पर अपने कर्तव्य का पालन करो
मत मतदाता का अधिकार है
अपने मत का दान करो

देखो,सोचो और समझो
वोट देने का हक न छोड़ो
सही समझो और सही चुनो
मतदान करो हाँ जरूर करो

बड़े बड़े वादे बड़े बड़े नाम
कैसे भी सभी को जीतना है चुनाव
वोटों की राजनीति में लगे सब
बातें हैं बड़ी-बड़ी काम हैं कम
***अनुराधा चौहान***© स्वरचित

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विषय-फुरसत

यह अधूरे ख्व़ाब‌ मेरे
तेरी यादों में दिन-रात भींगे
तुझको इतनी फुरसत न थी
कभी जो मुड़कर भी देखे
गलतफहमियाँ थी यह मेरी 
जिन्हें मैं पाल बैठी थी
जो ख्व़ाब सजाए थे आँखो में
उन्हे सच मान बैठी थी
बैरन निंदिया आँखो से ओझल
तन्हाई से बातें करती थी
पल-पल बिखरते ख्व़ाबो के
टुकड़ों को समेटा करती थी
चाँदनी रातों में झांँकती झरोखे से
जाने कितनी रातें निकलीं
आँखो ही आँखो में
टूटते तारे सी आज मेरी ज़िंदगी
ज़िंदा होकर भी आज मैं ज़िंदा नहीं
जाने कितनी बार गुजरी मैं तेरी गलियों से
पूछती थी मैं पता फूलों और कलियों से
फुरसत मिले कभी तो आकर तू देख जरा
आज भी मैं वहीं इंतजार करती तेरा
***अनुराधा चौहान***© स्वरचित

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भावों के मोती
विषय-मति/बुद्धि/दिमाग


वक़्त की बेहरमी ने
तोड़े मन के सारे भरम
कभी दिल टूटकर बिखरा
यह वक़्त यूँ बदला
चल दिए छोड़कर अपने
जिगर पर मार के खंजर
वक़्त की यह कैसी मनमानी
मरता दिखे आँखों का पानी
बुद्धि विवेक सब भूल बैठे
वक़्त के चुभे शूल ऐसे
अपनापन पहचान खो रहा
अपना ही अब घाव दे रहा
मति के मारे इंसान सारे
आपस में ही लड़ते रहते
आपसी प्रेम की भूले भाषा
वक़्त के साथ बढ़ती अभिलाषा
इंसानियत पर हावी हो रहा
वक़्त अपने रूप बदलकर
अच्छा हो या बुरा ही सही
वक़्त न रुकता किसी के लिए भी
दिल दिमाग दोनों खुले रखकर
चलो वक़्त से कदम मिलाकर
***अनुराधा चौहान***©®स्वरचित
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अश्कों की बारिश
अश्रु नीर बन बहने लगे
विरह वेदना सही न जाए
इतने बेपरवाह तुम तो न थे
जो पल भर मेरी याद न आए

चटक-चटककर खिली थी कलियाँ
मौसम मस्त बहारों का था
मैं पतझड़-सा जीवन लेकर
ताक रही थी सूनी गलियां

फूल पलाश के झड़ गए सारे
बीते गए दिन मधुमास के
गर्म हवाएं तन को जलाती
बैठी अकेली मैं अश्रु बहाती

शरद भी बीता बसंत भी बीता
विरह की अग्नि बरसने लगी
नयनों से अश्कों की बारिश
मैं पल-पल तेरी बाट निहारूँ

लौटकर आना देर न करना
मन का मेरे विश्वास न टूटे
नयना मेरे तेरी याद में भींगे
कहीं सब्र का मेरे बांध न टूटे
***अनुराधा चौहान***स्वरचित

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भावों के मोती
८/३/१९
विषय-नारी/ वीरांगना
तृतीय प्रस्तुति
-----------------
नारी का जीवन
जैसे नदिया की धारा
उनसे अपेक्षा का
नहीं कोई किनारा
बेटों को सीने से लगाते
उनको किनारा कर देते
बेटी पराया धन होती
यह सीख सदा उनको देते
प्यार सदा उनको मिलता
वह एहसास नहीं मिलता
उस घर को अपना कह सके
वह अधिकार नहीं मिलता
ब्याह कर के वह जब भी
अपने ससुराल जाती हैं
गृहलक्ष्मी बन कर भी
वह सम्मान न पाती हैं
सुबह से उठ कर काम करे
रखे सभी का खूब ख्याल
फिर भी बात बात में मिलता
उनको पराए होने का एहसास
नारी के जीवन की
यह कड़वी सच्चाई है
कितना भी समर्पण कर लें
फिर भी कहलाती पराई हैं
नारी बिना घर स्वर्ग नहीं
यह बात सभी स्वीकार करें
उनसे अपेक्षाएं रखते हो
उन्हें उनके अधिकार भी दें

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भावों के मोती
८/३/१९
विषय-नारी/ वीरांगना
तृतीय प्रस्तुति
-----------------
नारी का जीवन
जैसे नदिया की धारा
उनसे अपेक्षा का
नहीं कोई किनारा
बेटों को सीने से लगाते
उनको किनारा कर देते
बेटी पराया धन होती
यह सीख सदा उनको देते
प्यार सदा उनको मिलता
वह एहसास नहीं मिलता
उस घर को अपना कह सके
वह अधिकार नहीं मिलता
ब्याह कर के वह जब भी
अपने ससुराल जाती हैं
गृहलक्ष्मी बन कर भी
वह सम्मान न पाती हैं
सुबह से उठ कर काम करे
रखे सभी का खूब ख्याल
फिर भी बात बात में मिलता
उनको पराए होने का एहसास
नारी के जीवन की
यह कड़वी सच्चाई है
कितना भी समर्पण कर लें
फिर भी कहलाती पराई हैं
नारी बिना घर स्वर्ग नहीं
यह बात सभी स्वीकार करें
उनसे अपेक्षाएं रखते हो
उन्हें उनके अधिकार भी दें
**अनुराधा चौहान***©स्वरचित

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अब और नहीं💠
मानवता की एक ही पुकार
अब और नहीं अब और नहीं
वीरों की शहादत और नहीं
दानवता का बढ़ रहा अत्याचार
कब तक सहेंगे पीठ पर वार
अब आमने-सामने हो वार
पुलवामा के हादसा देख
दहल गया पूरा हिंदुस्तान
वीरों की शहादत को देख
मानवता चित्कार कर उठी
अब और नहीं अब और नहीं
वीरों की शहादत और नहीं
पाकिस्तान को सबक सिखाना है
अब कड़े कदम उठाना है
मसूद अजहर के सिर पर
रखा है जिस-जिस ने हाथ
मिल के करो उसका बहिष्कार
उठो जागो हुंकार भरो
पाकिस्तान को जवाब दो
अब और नहीं अब और नहीं
आतंकवाद अब और नहीं
***अनुराधा चौहान***© स्वरचित

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घुल रहा सांसों में जहर
जिम्मेदार तो हम ही हैं
खो रही रौनक फिजाएं
जिम्मेदार तो हम ही हैं
जहर भरी चलती हवाएं
क्यों करते अब परवाह
इंसान ही इंसान को मारे
नफ़रत का भरकर जहर
जहर बनकर नशा लील रहा
नौनिहालों का जीवन
कारखानों से बहते जहर ने
लीला नदियों का जीवन
कल-कल कर बहती नदी
अब आती गंदी नाले सी नजर
रासायनिक मिलावट से हुआ
खाना-पीना भी अब ज़हर
आतंकवाद का जहर लीले है
मासूम लोगो का जीवन
मर रहा है हर आम इंसान
भ्रष्टाचार का जहर है ऐसा
इस जहर को मार सके
वो तोड़ अब कहाँ से लाएं
इस जहर के कहर से तो
अब ऊपरवाला भी न बचाए
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित रचना

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विषय-दाग
****************
धरती के बिछौने पर
आसमांँ की चादर ओढ़े
थर-थर काँंपता
बचपन फुटपाथ पर
भूख से तड़पता
दो रोटी की आस में
अमीरों के शहर में
उन्हें दिखते यह दाग से
कूड़े के ढेर पर
ढूंढते रोटी के टुकड़े
इस संसार का
एक यह भी जीवन है
जर्जर काया लिए
अभाव में तरसते
झेलते ज़िंदगी का दर्द
रोजी-रोटी को तलाशते
सांझ को निढाल हो
फिर भूख को ओढ़कर
करवटें बदलते हुए
गरीबी जिंदगी का
बदनुमा दाग बन
लील जाती ज़िंदगियांँ
न खाने को भोजन
न इलाज की सुविधा
एक दिन वहीं सड़क पर
लाश बनकर पड़े रह जाते
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित रचना

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लघु कविताएं
****-----****
(१)
चलें हवाएं बड़ी जोर
कहीं लौ न बुझ जाए
शमा की चाहतों में
परवाना जला जाए
कैसी है यह मोहब्बत
जो सदियों से मशहूर है
जल जाता है परवाना 
शमा की लौ जले ज्यों
यह अनबोली चाहतें हैं
अपनी ही लौ में जीतीं
परवाने के जलने पर भी
रोशन जहाँ को करती
(२)
लौ जले मन में सदा
देशभक्ति के भाव की
लौ जले मन में सदा
नारी के सम्मान की
लौ जले मन में सदा
हम एक थे हम एक हों
लौ जले मन में सदा
न जात-पात का भेद हो
लौ जले मन में सदा
बेटी पढ़े बेटी बढ़े
लौ जले मन में सदा
आतंकवाद जड़ से मिटे
लौ जले मन में सदा
भारत की हम शान बने
लौ जले मन में सदा
जग में ऊँचा नाम हो
***अनुराधा चौहान*** स्वरचित

झरे पात पतझड़ में 
सूनी हो गईं डालियां
ऋतुराज ले आया बहारें
फूल उठी हैं कलियांँ
अंबर में ऊषा की लाली
पेड़ों पर सुर्ख पलाश
कुछ झर कर धरती बिछे
चहूँ और लाल ही लाल
दहकते अंगारों जैसे
मखमली लाल पलाश
अनुराग भर रहे मन में
नव पल्लव के पात
सुर्ख होती फुगनियों पर
चहकते पंछियों का शोर
नव प्रसून खिले उठे
लो आई बसंती भोर
सूरज की किरणों से
दहक उठे सुर्ख अंगारे
चली फागुनी बयार
उमंग हर मन में भरने
खिले पलाश वन-वन
प्रकृति खिली कण-कण
डाल डाल फूले पलाश
बह रही बसंती बयार
मन में भरता उल्लास
अनुराग भरा यह मधुमास
***अनुराधा चौहान***© स्वरचित

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
प्रिय आ जाओ
हिय में हूक उठी
फूली अमराई
कोयलिया कूक उठी
कलियांँ चटकी
फुलवारी खिल उठी
फूलों पर हो रहा
भंवरों का गान 
प्रिय आ जाओ
हिय में हूक उठी
फूल उठी सरसों 
आई ऋत मनभावन
पीली चूनर ओढ़ धरा
दिखलाती अपना यौवन
प्रिय आ जाओ
हिय में हूक उठी
पेड़ों के झुरमुट से
झांकती धूप
झील के पानी में
दिखे तेरा ही रूप
याद तेरी तड़पाए
विरह की आग जलाए
प्रिय आ जाओ
हिय में हूक उठी
मौसम बहारों का
ले आया ऋतुराज
देर न कर प्रिय आ जाओ
कहीं बीत न जाए मधुमास
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित रचना

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27/2/19
भावों के मोती
विषय- विजयपथ
---------------------------
विजयपथ पर निकल पड़े हैं
वो लेकर सीने में आग
दुश्मन भी दहल गया
देख अपना यह अंजाम
पुलवामा के हादसे में
वीरों को हमसे छीना था
घुस कर उनके घर में मारा
दुश्मन का छलनी छीना था
एक के बदले दस-दस मारे
गिन-गिन कर लिया हिसाब
यह भारत के वीर जवान हैं
कभी भी नहीं मानते हार
यह तो सिर्फ छोटी सी झलक थी
पूरी पिक्चर अभी बाकी है
संभल जाओ आतंक के मसीहा
वरना समूल नाश हो जाएगा
जो घाव दिया है तुमने हमको
वही हाल तुम्हारा हो जाएगा
विजयपथ पर निकले हैं अब
पीछे मुड़कर ना देखेंगे
वीरों की शहादत पर सेना की
यह तो सिर्फ श्रद्धांजली थी
बदला तो अब शुरू होगा
हर दर्द का गिनकर हिसाब होगा
जल उठी है हर सीने में अब
यह आग है केवल क्रांति की
***अनुराधा चौहान***© स्वरचित


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टूटी बुढ़ापे की लाठी
बिछड़ गए माँ के लाल
बच्चों से छिना पिता का साया
मिट गया सिंदूर,टूट गई चूड़ियाँं
पथराई आँंखे लिए बैठा पिता
बिलखती माँ तस्वीर लगा सीने से
कहां गया मेरी आंँखों का नूर
एक झटके में उजड़ी दुनियांँ
सपने हो गए चकनाचूर
हँस-खेल कर निकले घर से
फिर आने का वादा करके
हँसते गाते तय करते मंज़िल
एक झटके में ख़त्म हुआ जीवन
वीरों की शहादत पर अब
धरती माँ चित्कार कर उठी
पहले उरी अब पुलवामा
अब तो कुछ शर्म करो
अब धीरज नहीं अब रण करो
कब तक चलेगा कत्लेआम
कब तक यूंँ शहीद होंगे जवान
अब आर-पार की लड़ाई करो
मानवता की हत्या कर गई
पाकिस्तान की नापाक हरकतें
आदिल अहमद, मसूद अजहर
जिनके साए में पलते यह अजगर
आतंक के उस माई-बाप को
इस दुनिया से ही खत्म करो
अब सांत्वना नहीं कर्म करो
दुश्मन का संहार करो
सर्वनाश करो सर्वनाश करो
***अनुराधा चौहान***© स्वरचित
देश के वीर सपूतों को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि

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9/2/19
ऋतुराज वसंत
🌸🍁🍁🌸
बसंती हवाओं में
झूमतीं फसलें
महकती अमराई
सूरज की किरणों से
धरती इठलाई
पीले लहराते
सरसों के खेत
जैसे पीली चूनर
ओढ़कर गोरी
झूम उठी
साजन से मिलकर
धूप ने भी
बदले हैं कुछ तेवर
लगती है अब
थोड़ी गरमाती
कोयल कूह-कूह
का मधुर गीत सुनाती
फूलों के ऊपर
मोती-सी
बिखरी ओस की बूँदें
सूरज की
किरणों से शरमातीं
बसंत ऋतु में
प्रकृति का
अनुपम नजारा
होता है
बहुत ही प्यारा
रंग बिरंगे फूलों पर
भंवरों की गुनगुनाहट
त्यौहारों की सौगात
लेकर आया है ऋतुराज
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित रचना


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तेरे होने का ख्याल
दिल से जाता नहीं
तू यहीं है यहीं कहीं है
यह एहसास जगाता है


काट कर खुशियों की डोर
तुम चले गए जाने कहां
जुड़ सके काश यह डोर
ऐसा कब होता है यहां

काश मिल जाती कोई पतंग
जो पंहुचा देती मेरा पैगाम
किस गांव जा बसे तुम
नहीं है वहां का कोई नाम

शायद इतना सा ही था
तेरे मेरे साथ का बंधन
तुम्हें भूल पाऊं कभी भी
ऐसा नहीं आता कोई पल

रिश्ते की इस पतंग का
बड़ा कमजोर था धागा
किस्मत से न लड़ पाया
जिंदगी से टूट गया अभागा

हाथ में ले टूटा मांजा
सूने आकाश को तांकते हैं
दिख जाए कहीं वो सूरत
जिसके लिए दिन-रात तरसते हैं

बहुत कमजोर होती है
जिंदगी की यह लड़ियां
कब टूटकर बिखर जाएं
जीवन की यह घड़ियां

अनमोल धरोहर जीवन की
होते हैं यह रिश्ते सभी
इन्हें संजोकर रखना
रिश्ते बिना जीवन नहीं

तब तक कदर नहीं होती
जब रिश्ते करीब होते हैं
बिछड़ जाते हैं जब कहीं
तो मिलने को तरसते हैं
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित रचना

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*"माँ की मुस्कान"*
एक रात एक कली खिली
भोर हुई तो फूल बनी
यौवन की दहलीज पर आकर
किसी के घर का नूर बनी
बनी किसी के गले का हार
चेहरे की मुस्कान बनी
भूल गई दर्द वो अपना
सबके दर्द की दवा बनी
पायल,बिछिया,बिंदी,महावर
जीवन का श्रृंगार बने
वात्सल्य भरा हृदय लेकर
वंश बेल को लगी सींचने
सबकी खुशियां चुनते चुनते
अपनी उम्र को भूल गई
छुट गया साथ साथी का
अपने दम पर खड़ी रही
वक्त बदला,लोग बदले
पर उसकी मुस्कान न बदली
आंखों में छिपा बहुत कुछ
पर उसकी पहचान न बदली
बालों में चांदी सी चमक
पायल की कम होती खनक
बुझने लगी मुस्कान उसकी
मुख फेरती संतान उसकी
कल तक जो गोदी में पला था
बेटा आज दूर खड़ा था
आंखों में छलकने लगे थे आंसू
जिनको सबसे लगीे छुपाने
बड़े चाव से जो घर था सजाया
उस घर में पसंद नहीं उसका साया
माँ थी अपने जिगर के टुकड़े की
अब उसी की नौकरानी बन गई
फिर भी कोई गिला नहीं
बेटा फिर भी बुरा नहीं
देती रही दिन-रात दुआएं
बेटे की बढ़ती रहें खुशियां
पर आंखों पर पट्टी बंधी थी
माँ की तकलीफ़ कहाँ दिखती थी
सबसे बड़ा बोझ थी सिर पर
कब उतरेगा फिक्र यही थी
छोड़ दिया एक दिन बेबस
वृद्धाश्रम में जाकर उसने
रोती रही बेटे को पकड़ कर
पर उसने न देखा पलट कर
कैसा यह कलयुग का प्राणी
जिसने माँ की कदर न जानी
जब तक जरूरत,तब तक मा-ँबाप हैं
चलना सीखा तो वो बेकार हैं
जिस माँ की मुस्कान थी प्यारी
देदी उसी को दर्द की बीमारी
क्यों भूलते यह दुनियां गोल है
जो बोओगे उससे मिले दूना मोल है
***अनुराधा चौहान***



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२५/१०/१८
भावों के मोती
विषय-क्षण
--------*--------
हर क्षण बदलता जीवन
हर क्षण बदलती काया
मत करो गुरूर जीवन पर
कब बदले इसकी माया
क्षण क्षण फिसलती
जिंदगी देती है संदेश
कर्मों की गाति तेज कर
नहीं तो हो जाएगी देर
गर्व करो न इस तन पर
क्षणभंगुर है यह काया
गले लगाले किस क्षण आकर
कोई जाने न मौत की माया
क्षण में बदलती किस्मत का
खेल किसी से न जाना
कब राजा से रंक बने
कब कोई रंक से राजा
क्षण में बदलती किस्मत की रेखा
क्षणभंगुर यह जीवन बना है
इक क्षण में मिट जाने को
जिंदा दिलों में रहना है तो
अपने सत्कर्मों से
एक पहचान बनालो
***अनुराधा चौहान*** मेरी स्वरचित कविता

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२४/१०/१८
भावों के मोती
विषय -चित्रलेखन
------------------------
खुशियों भरा यह सुंदर समां
दिल में रहे हरदम बसा
जीवन की अद्भुत यादों के
पल सहेज ले तस्वीर बना
सुंदर प्रकृति का नज़ारा
मन को भाए प्यारा प्यारा
मन की चिंताओं को भूल
समेट रहे सब खुशी भरपूर
हरदम ऐसे पल रहे पास
जीवन में न हो कोई उदास
निराशा को झटक एक तरफ
आ रख लें सुंदर तस्वीर खींच कर
जीवन की हैं खुशियां बसी
इन छोटी छोटी बातों में
बीते सदा मुस्कुराते जिंदगी
इन पलों की हसीं यादों में
बेटे बहुओं से भरा परिवार
जीवनसाथी की मधुर मुस्कान
प्यारे प्यारे छोटू छोटी
खींच रहा हूं मैं सेल्फी
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित कविता
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१४/१०/१८
भावों के मोती
विषय-स्वतंत्र लेखन
विध-कविता
************
नई नवेली दुल्हन
झांक रही थी दरवाजे की ओट से
सांवली सलोने चेहरे पर
अजीब सी बैचेनी लिए
हर आहट पर बैचेन होती
काली अंधेरी रात में
चंदा बादलों संग अठखेली करता
कभी घुप्प अंधेरा
कभी चांदनी करती राह उजियारा
सन्नाटे में लिपटी रात
गुमसुम सी राह निहारे
बार बार चांद को ताकती
जैसे कह रही हो
मत सता न छुप बादलों में
इंतजार में डूबी
लम्हा लम्हा बिखरती सी
चांद भी बेबसी समझ
निकल आया बादलों से
चांदनी रोशन करती गलियारों को
कुछ चमक उतर आई
उसकी काली आंखों में
देख किसी साए को
पल प्रतिपल समीप आते
निकल आई वो भी
दरवाजे की ओट से
जैसे दो-दो चांद निकल आए
एक बादलों से एक दरवाजे की ओट से
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित कविता

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१२/१०/१८
भावों के मोती
विषय-अभिलाषा
विधा-कविता
**************
मासूम आंखें करें सवाल
क्यों मुझसे उपेक्षित व्यवहार
अंश आपका वो भी है
अंश आपका मैं भी हूं
फिर क्यों आपके दिल में
मेरे लिए यह दूरी है
बेटे की हर अभिलाषा पूरी
मैं कभी कुछ भी मांगू न
मेरी बस यही अभिलाषा
मुझको भी प्यार मिले जरा सा
मैं रोशन करती नाम आपका
फिर भी शाबाशी बेटों को
मैं इतना लाड़ लगाती पापा
पर आपका प्यार बेटों को
थोड़ा प्यार मुझे भी करलो
बस इतनी सी अभिलाषा है
आप जान से प्यारे मुझे
यह कैसे समझाऊं मैं
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित कविता

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८/१०/१८
भावों के मोती
विषय"घर/सदन/मकान/गृह"
विधा-लघु कविता
🏠🏠🏠🏠
मकां तो सब बनाते हैं
खूब शान से सजाते हैं
रखते हैं हर साधन
धन भी खूब लगाते है
रंगते है महंगे कलर से
प्यार का रंग नहीं भरते
मकां तो सब बनाते हैं
पर घर नहीं बनाते हैं
घर बनता है प्यार से
घर बनता है एहसास से
घर की नींव होती है माँ
जो बांधती है रिश्तों को
भावनाओं की दिवारों से
रंगती प्यार के रंग से
संस्कारों की महक भरती
पिता घर की छत जैसे
बचाते गम की धूप से
मुश्किल की जो बारिश हो
छा जाते है छतरी से
माँ बाप की छाया में
कई रिश्ते पनपते हैं
वो भरते रंग हैं घर में
मकां को घर बनाते हैं
अगर रिश्ते न हो घर में
वह घर नहीं मकां होता
मकां तो सब बनाते हैं
पर घर नहीं बनाते हैं
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित कविता

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7/10/18
भावों के मोती
🌸🌹🌸
केसरी नंदन राम दुलारे
भक्तों के तुम रखवाले
हे वीर प्रतापी शोर्यवान
दुष्ट सदा तुमसे भय खाते
पवनपुत्र वीर बजरंगी
राम-लखन के तुम हो संगी
राम मुद्रिका सीता को दे आए
श्री राम का संदेश सुनाए
विकट रूप जब तुमने रखा
क्षण में रावण की लंका दी जला
संजीवनी को समझ नहीं पाए
पूरा पर्वत संग ले आए
गदा तुम्हारे हाथ में सोहे
राम सिया सदा मन मोहे
दिल में छवि उनकी बसाए
तुम भक्त प्रिय राम सिया के
अंजनी मां के पुत्र तुम प्यारे
भूत पिसाच नाम से भागे
भानू को देख सदा मुस्कुराते
लीला था उन्हें मधुर फल जान के
चरणों में तेरे शीश झुकाते
प्रभू सबके तुम कष्ट मिटाते
श्रीराम की जो करते पूजा
उनके शीश पर हाथ है तेरा
पवनपुत्र श्री हनुमान
करते हम तुमको प्रणाम
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित रचना
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7/10/18
भावों के मोती
🌸🌹🌸
केसरी नंदन राम दुलारे
भक्तों के तुम रखवाले
हे वीर प्रतापी शोर्यवान
दुष्ट सदा तुमसे भय खाते
पवनपुत्र वीर बजरंगी
राम-लखन के तुम हो संगी
राम मुद्रिका सीता को दे आए
श्री राम का संदेश सुनाए
विकट रूप जब तुमने रखा
क्षण में रावण की लंका दी जला
संजीवनी को समझ नहीं पाए
पूरा पर्वत संग ले आए
गदा तुम्हारे हाथ में सोहे
राम सिया सदा मन मोहे
दिल में छवि उनकी बसाए
तुम भक्त प्रिय राम सिया के
अंजनी मां के पुत्र तुम प्यारे
भूत पिसाच नाम से भागे
भानू को देख सदा मुस्कुराते
लीला था उन्हें मधुर फल जान के
चरणों में तेरे शीश झुकाते
प्रभू सबके तुम कष्ट मिटाते
श्रीराम की जो करते पूजा
उनके शीश पर हाथ है तेरा
पवनपुत्र श्री हनुमान
करते हम तुमको प्रणाम
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित रचना

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५/१०/१८
भावों के मोती
विषय-सफर
🌹🍁🌹🍁🌹
जिंदगी के सफर में
न हो सच्चा हमसफर
बहुत मुश्किल होता है
जीवन का यह सफर
मिलते हैं सफर में फूल
तो मिलते हैं कांटे भी
मीत मिले मन का
तो सुख-दुख आपस में बांटे भी
खड़ी हो जाती है जिंदगी
सफर में दोराहे पर
कहां से शुरू हो फिर
जो पंहूचा दे मंजिल पर
हर डगर आसान मिले
यह तो जरूरी नहीं
टूट कर संभल जाना
जीवन की रीत यही
धूप छांव जीवन के
हर डगर पर मिलती है
जब तक जिंदगी जाकर
मौत से नहीं मिलती है
होता है सफर पूरा
छूट जाते है रिश्ते
सिर्फ कर्म ही इंसान के साथ है जाते
तय करो प्यार से सफर
जब तक है जिंदगी
बाद में तो सिर्फ इंसान के नाम ही रह जाते
***अनुराधा चौहान***स्वरचित रचना
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३/१०/१८
भावों के मोती
(२) रचना
वक्त के साथ
पंचतत्व शरीरा
माटी में मिला
माटी है शान
बोलते कर्मवीर
देते हैं जान
माटी चंदन
धन्य भारत देश
करें प्रणाम
पग पखारे
विशाल समंदर
माटी वंदन
माटी आंचल
सजग हिमालय
खड़ा विशाल
माटी के लाल
जगत मशहूर
देश की शान
***अनुराधा चौहान*** स्वरचित हाइकू
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३/१०/१८
भावों के मोती
विषय-माटी
मेरे देश की हर बात निराली
बड़ी ही पावन इसकी माटी
कण कण में इसके लहू मिला
आजादी के मतवालों का
इस माटी की शान की खातिर
वीरों ने अपनी कुर्बानी दी
श्रीराम,कृष्ण और गौतम,नानक
सब इसकी गोद में पले बढ़े
निच्छल निर्मल पावन गंगा
इसके सीने पर सदा बहे
खड़ा हिमालय सीना ताने
इस माटी के आंगन में
खेतों से यह सोना उगले
भरे सुखों से सबका जीवन
हरे-भरे पेड़ों से शोभित
इस की माटी का आंचल
अनगिनत भरी सीने में इसके
शोर्य वीरों की शोर्य गाथा
सतयुग,त्रेता,द्वापर,कलयुग
सब युगों की यह जीवनदाता
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित रचना
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

1/10/18
भावों के मोती
विषय-गुलशन प्रीत
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
कैसा फिजाओं में जहर घुला 
मौसम भी सहमा सहमा हुआ
कभी गूंजती थी इस गुलशन में
किलकारियां मासूम परियों की
अब सब उजड़ा उजड़ा है
गुलशन में उदासी का पहरा है
धुंआ धुंआ सी होती जिंदगी
प्रीत कहीं खोती सी दिखती
संवेदनाएं भी दम तोड़ रही
अपने पराए की मारामारी
भाईचारे ने जान गंवा दी
कब लौटेंगी फिर से बहारें
कब हंसी की गूंजे आवाजें
अब कर्म हमें ही करना है
इस गुलशन को महकाना है
***अनुराधा चौहान***स्वरचित

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ बसंती हवाओं में
झूमतीं फसलें
महकती अमराई
सूरज की किरणों से
धरती इठलाई
पीले लहराते
सरसों के खेत
जैसे पीली चूनर
ओढ़कर गोरी
झूम उठी
साजन से मिलकर
धूप ने भी
बदले हैं कुछ तेवर
लगती है अब
थोड़ी गरमाती
कोयल कूह-कूह
का मधुर गीत सुनाती
फूलों के ऊपर
मोती-सी
बिखरी ओस की बूँदें
सूरज की
किरणों से शरमातीं
बसंत ऋतु में
प्रकृति का
अनुपम नजारा
होता है
बहुत ही प्यारा
रंग बिरंगे फूलों पर
भंवरों की गुनगुनाहट
त्यौहारों की सौगात
लेकर आया है ऋतुराज
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित रचना


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@



लघुकविता
----------*----------
खोल मन के किवाड़
आने दो प्रेम की बाढ़
सब विषाद बह जाने दो
खुशियों को लहराने दो
क्या रखा अकेले जीने में
घुट-घुट कर दर्द सहने में
बीत चली अब साल पुरानी
नई साल की करो अगवानी
नववर्ष की जब मचेगी धूम
बुरी बातों को जाना तुम भूल
द्वार दिल के रखना खोलकर
खुशियां न लौटे मुंह मोड़कर
देख दिल के बंद दरवाजे
किसी को भी नहीं लगते प्यारे
चलो मिटाएं मन से द्वेष
बना रहे सभी का मनप्रेम
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित रचना

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

जाने कितने रंग भरे
तूने इस सुंदर संसार में
हरा रंग धरा का आंचल
फैला ऊपर नीला अंबर
लाल गुलाबी नीले पीले
फूल यहां सतरंगी खिलते
हर रंग की अलग कहानी
चित्रकार की कैसी नादानी
दर्द के रंग रंगा नारी का रूप
ममता से भरा उसका स्वरूप
फुरसत के रंग जीवन से मिटा
भेदभाव के रंग भर बैठा
यह कैसा चित्रकार है
भर रहा था रंग ले तूलिका
जब वह अपने हाथ में
काश थोड़ा फर्क करता
वो इंसान और हैवान में
जीना आसान हो जाता
इंसान का जहान में
रंग बिरंगी इस दुनिया में
रंग इंद्रधनुषी भरे हुए
पर कितना सुन्दर होता
सब प्रेम के रंग रंगे होते
***अनुराधा चौहान***
मेरी स्वरचित कविता

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


सत्य अहिंसा और धर्म का
सबको पाठ पढ़ाने वाले
राष्ट्रपिता तुम भारत के
भारत का मान बढ़ाने वाले
कष्ट सहे बहुतेरे तुमने
पर शीश न तुमने झुकने दिया
हम सब की आजादी के लिए
अपना सब कुछ बलिदान किया
अभिमान चूर कर अंग्रेजों का
भारत को स्वतंत्र किया
कर्मवीर तुम भारत के
भारत माँ सच्चे लाल
अंग्रेजों से छीन कर देदी
आजादी हमको बिना हथियार
शत् शत् नमन बापू तुमको
याद रखें सब सदियों तुमको

***अनुराधा चौहान*** मेरी स्वरचित कविता
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
मेरे देश की हर बात निराली
बड़ी ही पावन इसकी माटी
कण कण में इसके लहू मिला
आजादी के मतवालों का
इस माटी की शान की खातिर
वीरों ने अपनी कुर्बानी दी
श्रीराम,कृष्ण और गौतम,नानक
सब इसकी गोद में पले बढ़े
निच्छल निर्मल पावन गंगा
इसके सीने पर सदा बहे
खड़ा हिमालय सीना ताने
इस माटी के आंगन में
खेतों से यह सोना उगले
भरे सुखों से सबका जीवन
हरे-भरे पेड़ों से शोभित
मेरे देश की माटी का आंचल
अनगिनत भरी सीने में इसके
शोर्य वीरों की शोर्य गाथा
सतयुग,त्रेता,द्वापर,कलयुग
सब युगों की यह जीवनदाता
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित रचना
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
कोई आकर्षण था
उसकी आंखों में
या कोई लगाव
उस अनदेखे चेहरे से
जब भी गुजरती मैं
उसकी गली से
खिड़की से झांकती
उसकी बैचेनी भरी आंखें
जैसे वो मेरा ही
इंतजार कर रहा हो
कोई राज छिपा था
उसकी आंखों में
अक्सर ठिठक जाते थे
मेरे कदम देखकर
उसकी आंखों को
कुछ कहना चाहती थी
पर कह नहीं पाई
कोई बंधन रोके था
अब जब नहीं दिखाई
देती मुझे उसकी आंखें
तो एक बैचेनी लिए
गुजरती हूं अब भी
उसकी गली से मैं
इस इंतजार में शायद
फिर नजर आ जाए
छिपकर देखती आंखें
तो इस बार पूछूंगी
उसकी बैचेनी का राज
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित रचना

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
जिंदगी के सफर में
न हो सच्चा हमसफर
बहुत मुश्किल होता है
जीवन का यह सफर
मिलते हैं सफर में फूल
तो मिलते हैं कांटे भी
मीत मिले मन का
तो सुख-दुख आपस में बांटे भी
खड़ी हो जाती है जिंदगी
सफर में दोराहे पर 
कहां से शुरू हो फिर
जो पंहूचा दे मंजिल पर
हर डगर आसान मिले
यह तो जरूरी नहीं
टूट कर संभल जाना
जीवन की रीत यही
धूप छांव जीवन के
हर डगर पर मिलती है
जब तक जिंदगी जाकर 
मौत से नहीं मिलती है
होता है सफर पूरा 
छूट जाते है रिश्ते
सिर्फ कर्म ही इंसान के साथ है जाते
तय करो प्यार से सफर 
जब तक है जिंदगी
बाद में तो सिर्फ इंसान के नाम ही रह जाते
***अनुराधा चौहान***स्वरचित रचना

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जीवन की इस डगर में
कहीं छांव कहीं धूप है
कहीं चुभते कांटे कहीं महके फूल है
कदम संभल कर रखना
लक्ष्य से नहीं फिसलना
जीवन की आंधियों में
हिम्मत से काम लेना
कर्मों का सबके ऊपर
रहता है लेखा-जोखा
सदमार्ग से भटकने का
फल सबको है भुगतना
जीना भी क्या वो जीना 
जो अपने लिए जिए
करो सत्कर्म ऐसे
जहां में नाम गूंजे
कभी हौंसला डिगे तो
आंखों को बंद करना
जो शहीद हुए वतन पर
उनको तुम याद करना
दे गए हमें आजादी
आजाद वतन कर गए
वो हो गए कुर्बान 
पर नाम अमर कर गए
जब तक यह जहां है
उनका नाम अमर रहेगा
सम्मान में सदा उनके 
यह शीश झुका रहेगा
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित कविता
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मनभावन ऋतु सावन आई
संग अपने खुशहाली लाई
चहुं ओर बिखरी हरियाली
हरियाली की देख के शोभा
मस्त मगन सब झूम उठे
देख के उनका यह नर्तन
थिरक उठी नन्ही बूंदें भी
चली पवन पुरवाई
गाए कोयल मतवाली
सुन कोयल की तान
दामिनी तड़ तड़ तड़के
दामिनी की तड़क से
सावन भी जम कर बरसे
चली नदियां इठलाती
मोर पपीहा नाच उठे
करने वसुंधरा का श्रृंगार
इंद्रधनुष निकल के आया
देख धरा की धानी चूनर
झरनों ने सुमधुर राग सुनाया
यह सुंदर छवि देख
तरुवर झूम के गाएं
विरहणी को यह संदेश सुनाएं
पिया मिलन की ऋतु आई
सखी पड़ गए झूले
सावन ऋतु आई
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित रचना
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

वो हैं गरीब जरूर
पर स्वाभिमान से जीते
करते अथक परिश्रम
भरने को पेट अपना
न चाह व्यंजनों की
सूखी रोटी से पेट भरना
न बिस्तर का कोई रोना
पत्थर ही है बिछोना
तकलीफें सदा घेरे
फिर भी नहीं रुकते
धूप हो या हो बारिश
निरंतर कर्म करते
हमारे सपनों के संग
वो खुद के सपने बुनते
वो ढोते गिट्टी गारा
तब बिल्डिंगें संवरती
हमारी सुविधाओं के
यही महल खड़े करते
फिर भी गरीबी इनकी
कभी मिटती ही नहीं है
बारिश में छत टपकती
आंखों को नम करती
देखा आंखों ने सपना
इक मकान हो अपना
पर मंहगाई कमर तोड़े
और जीना कैसे छोड़े
बच्चों का पेट भरने में 
पूरी जिंदगी गुजरती
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित कविता
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आया नवरात्रि का त्यौहार
बोलो मैया की जय-जयकार
सबके दुःख मिटाने वाली
दुर्गा है यह यही है काली
अंत भी इनसे आरंभ भी इनसे
यही है प्रकृति यही प्रलय भी
सौंदर्यवान करुणा की मूरत
नव रूपों की छटा अनुपम
असुर सदा तुमसे भय खाते
मां असुरों ने आज फिर घेरा
चारों ओर अंधकार घनेरा
अंधियारे को फिर से हटाने
मां आ जाओ फिर पाप मिटाने
रक्तबीज फिर जिंदा घूमते
बेटियों का जीना दूभर करते
जागो मां छोड़कर साधना
धरती का संताप हरो मां
फिर से तुम उद्धार करो मां
बोलो मिल कर सब जय जय मां
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित कविता

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
आंखें बंद करती हूं 
तेरा ख्याल आता है
मुझको अब हर घड़ी
तेरा इंतजार रहता है
बेकरार करती है मुझे
आंखों की कशिश तेरी
बिखर के न रह जाए
मेरे ख्बावों की यह लड़ी
पूछना चाहता है दिल
क्या तेरे दिल में है
यह वहम है मेरे दिल का
या तू भी मुश्किल में है
कशिश मेरे प्यार की
तुम महसूस करते हो
हो अनजान तुम सच में
या अनजान बनते हो
विचारों की गहराई में
डूबती-उतरती रहती हूं
क्या है तेरे मेरे दरम्यान
यह समझ नहीं पाती हूं
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित कविता
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

मासूम आंखें करें सवाल

क्यों मुझसे उपेक्षित व्यवहार

अंश आपका वो भी है

अंश आपका मैं भी हूं

फिर क्यों आपके दिल में

मेरे लिए यह दूरी है

बेटे की हर अभिलाषा पूरी

मैं कभी कुछ भी मांगू न

मेरी बस यही अभिलाषा

मुझको भी प्यार मिले जरा सा

मैं रोशन करती नाम आपका

फिर भी शाबाशी बेटों को

मैं इतना लाड़ लगाती पापा

पर आपका प्यार बेटों को

थोड़ा प्यार मुझे भी करलो

बस इतनी सी अभिलाषा है

आप जान से प्यारे मुझे

यह कैसे समझाऊं मैं

***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित कविता
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

कोई धुन बनाऊं
या गीत कोई गाऊं
पर सुकून के पल
कहां से लाऊं
कोई कविता लिखूं
या कोई गजल
मन बैचेन रहे हरपल
रहूं धरती पर
देखूं आसमान
पर शांति के पल
नहीं आसपास
दिखावे के दंभ में
डूबा संसार
अपनों के लिए दिलों से
गुम होता प्यार
मोबाइल से ही चलते
अब सारे रिश्ते
हकीकत में किसी को
किसी की खबर कहां
जब से फसा मोबाइल में मन
लगा जीवन में दीमक बन
सिमट रहें हैं सबके मन
कैसे कोई धुन बने सरगम
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित कविता

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

************
नई नवेली दुल्हन
झांक रही थी दरवाजे की ओट से
सांवली सलोने चेहरे पर
अजीब सी बैचेनी लिए
हर आहट पर बैचेन होती
काली अंधेरी रात में
चंदा बादलों संग अठखेली करता
कभी घुप्प अंधेरा
कभी चांदनी करती राह उजियारा
सन्नाटे में लिपटी रात
गुमसुम सी राह निहारे
बार बार चांद को ताकती
जैसे कह रही हो
मत सता न छुप बादलों में
इंतजार में डूबी
लम्हा लम्हा बिखरती सी
चांद भी बेबसी समझ
निकल आया बादलों से
चांदनी रोशन करती गलियारों को
कुछ चमक उतर आई
उसकी काली आंखों में
देख किसी साए को
पल प्रतिपल समीप आते
निकल आई वो भी 
दरवाजे की ओट से
जैसे दो-दो चांद निकल आए
एक बादलों से एक दरवाजे की ओट से
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित कविता
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मेरी अश्कों के मोती बहते हैं बार-बार
तुझसे लगा कर प्रीत मेरा हो रहा बुरा हाल
पुकारता है दिल तुझे 
एक बार तो आकर मिल मुझे
देख जनाजा अपने प्यार का
टूट कर बिखरे सपनों का
झूठे वादे ओर इकरार का
बिखरती हुईं साँसों को
अब भी है तेरा इंतजार
मचल रही है रूह जिस्म से
साथ छोड़ जाने को बेकरार
बेबसी के बादल गहराने लगे
आकर एक बार मुझे तू लगाले गले
जिस्म से रूह अब होती जुदा
आ बता दे मुझे हुई क्या खता
तू मिला न गिला है मुझे जिंदगी से
दूर होती हूँ अब मैं तेरी जिंदगी से
अश्क भी सूखते जिस्म भी छूटता
अब तुझ से यह नाता यहीं टूटता
प्रीत मेरी थी मेरे साथ ही मिट जाएगी
जान जाने पर तुझे याद मेरी आएगी
***अनुराधा चौहान*** मेरी स्वरचित रचना
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"भाषा"19 जुलाई 2019

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