कुसुम कोठारी।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

3 07 19
विषय - सावन 

सावन की गठरी में 
कितने अनमोल रत्न भरे ।

भूले किस्से यादों के मेले 
इंद्रधनुषी आसमान 
बरसती बुंदों की 
गुनगुनाती बधाईयां 
थिरकता झुमता तन मन 
अपनों से चहकता आंगन 
सौरभ से महकती बगिया 
मिट्टी की सौंधी सुगंध ।

सावन की गठरी में 
कितने अनमोल रत्न भरे।

नव विवाहिताओं को
पिया के साथ पहली 
फुहार का आनंद 
मायके आने का चाव 
मन को रिझाती बुलाती 
झूले की कतारें 
चाहतों की बरसती रिमझिम ।

सावन की गठरी में 
कितने अनमोल रत्न भरे।

खेती को जीवन प्राण 
किसानो को अनुपम उपहार 
जीवन की आस 
झरनों को राग 
नदियों को कल-कल बहाव 
सकल संसार को सरस सुधा ।

सावन की गठरी में 
कितने अनमोल रत्न भरे।।

स्वरचित 
कुसुम कोठारी।
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
शीर्षक - जेब 

खाली जेब, गुमगश्ता रुमानियत 

फूल दिया किये उनको खिजाओं में भी
पत्थर दिल निकले फूल ले कर भी ।

रुमानियत की बातें न कर ए जमाने
खाली जेबों की गिर्दाब में गुमगश्ता है जिंदगी भी। 

संगदिलों से कैसी परस्ती ए दिल
वफा न मिलेगी जख्म ए ज़बीं पा के भी। 

चाँद तारों की तमन्ना करने वाले सुन
जल्वा ए माहताब को चाहिये फलक भी। 

"शीशा हो या दिल आखिर टूटता" जरुर
क्यों लगाता है जमाना फिर फिर दिल भी ।

तूफानों में उतरने से डरता है दरिया में
डूबती है कई कश्तियां साहिल पर भी।

स्वरचित। 

कुसुम कोठारी।
(गिर्दाब =भंवर, ज़बीं =माथा, सर)


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


विषय - अधिकार ( हक) 

जीना हो आसानी से तो 
जीवन मे सब सहना सीखो, 

जिसको अपना सको अपना लो 
कुछ को नजर अंदाज कर लो, 

खुद के मरने से ही मिलता है स्वर्ग 
यहाँ जो मिला उसे न बनाओ नर्क, 

छीनो न "हक" निर्बल जन का 
अपनी कोशिश से पावो जितना चाहो, 

जीना नही आसान अगर तो
कर प्रयत्न आसान बनाओ ।

स्वरचित 

कुसुम कोठारी ।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

शीर्षक मैं, स्वयं 
सफर और साधन

मैं निकली सफर पर अकेली 
मंजिल क्या होनी ये पता लेकर
पर चल पडी राह बदल
न जाने किधर
भूल गयी कहाँ से आई 
और कहाँ है जाना 
किस भूल भुलैया में भटकी 
कभी चली फिर अटकी 
साथ में थी फलों की गठरी 
कुछ मीठे कुछ खट्टे,
कुछ नमकीन कसैले 
खाना होगा एक एक फल 
मीठे खाये खुश हो हो कर
कुछ रोकर 
कुछ निगले दवा समान
कुछ बांटने चाहे 
पर किसी को ना दे पाये
अपने हिस्से के थे सब 
किसको हिस्से देते
सभी के पास थे साथ थे
स्वयं के प्रारब्ध। 
अब कुछ अच्छे मीठे
फलों के पेड लगा दूं
तो आगे झोली में 
मधुर मधुर ही ले के जाऊं
अनित्य में से शाश्वत समेटूं
फिर एक यात्रा पर चल दूं
पाना है परम गति 
तो निर्मल, निश्छल, 
विमल, वीतरागी बन
मोक्ष मार्ग की राह थाम लूं
मैं आत्मा हूं 
काम, क्रोध मोह-माया,
राग, द्वेष में लिपटी 
भव बंधन में जकडी
तोड के सब जंजीरे 
स्वयं स्वरूप पाना है
बार बार की संसार
परिक्रमा से
मुक्त हो जाना है।
स्वरचित। 

कुसुम कोठारी।

फल=पूर्व कृत कर्म।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


वजह क्या थी ?

मिसाल कोई मिलेगी
उजड़ी बहार में भी
उस पत्ते सी
जो पेड़ की शाख में
अपनी हरितिमा लिये डटा है
अब भी।
हवाओं की पुरजोर कोशिश
उसे उड़ा ले चले संग अपने
कहीं खाक में मिला दे
पर वो जुडा था पेड के स्नेह से
डटा रहता हर सितम सह कर
पर यकायक वो वहां से
टूट कर उड़ चला
हवाओं के संग
"वजह" क्या थी ?
क्योंकि पेड़ बोल पड़ा उस दिन
मैने तो प्यार से पाला तुम्हे
क्यों यहां शान से इतराते हो
मेरे उजड़े हालात का उपहास उड़ाते हो
पत्ता कुछ कह न पाया
शर्म से बस अपना बसेरा छोड़ चला
वो अब भी पेड़ के कदमो में लिपटा है
पर अब वो सूखा बेरौनक हो गया
साथ के सूखे पुराने पत्तों जैसा
उदास
पेड की शाख पर वह
कितना रूमानी था।

स्वरचित
कुसुम कोठारी।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


स्वतंत्र लेखन

. इंतजार की बेताबी 

अंधेरे से कर प्रीति
उजाले सब दे दिए
अब न ढूंढना
उजालों में हमें कभी।

हम मिलेंगे सुरमई
शाम के घेरों में 
विरह का आलाप ना छेड़ना
इंतजार की बेताबी में कभी।

नयन बदरी भरे
छलक न जाऐ मायूसी में 
राहों पर निशां ना होंगे
मुड के न देखना कभी।

आहट पर न चौंकना
ना मौजूद होंगे हवाओं में 
अलविदा भी न कहना
शायद लौट आयें कभी।

स्वरचित 

कुसुम कोठारी ।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


चार लघु विधा का सृजन

1हाइकु

दिल ना मिले
दुरी है दरमियाँ
बढे फासले।
~
2ताँका

फासले अब
दरमियाँ ना रहे
सिमटने दो
ख्वाबों की अंखियों में
सुहानी यादें जगी ।
~
3सेदोका

मौसम बैरी
बरसे झिरमिर
साजन दूर तेरे
आंखें द्वार पे
राह बिछे नयन
तड़पे विरहन।
~
4वर्ण पिरामिड

रे
मिटा
फासला
मन मिला
प्रेम से रह
जीवन सफल
हो न जाए निष्फल।

स्वरचित
कुसुम कोठारी ।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

विषय - जनतंत्र 

हर विशेष दिवस पर
हर बार तिरंगा फहराते हैं
कुछ कसमे वादे होते
कुछ आश्वासनो के
परचम लहराते
हम फिर भ्रमित हो भुलते
"जनतंत्र" बन गया
लाठी वालों की भैंस 
और देश बन गया
मूक बधिरों का आवास 
लाठी वाले खूब
अपनी भैंस चरा रहे 
हम पंगू बन बैठे
विशेष दिवस मना रहे 
ना जाने देश कहां जायेगा 
हम जा रहे रसातल को 
यद्यपि दीन दुखी गारत है 
विश्व में फिर भी
सर्वोच्च भारत है 
गाना नही अब
जगना और जगाना है
ठंडे हुए लहू को
फिर लावा बनाना है 
मां भारती को
सच में शिखर पर लाना है 
मजबूत इरादों वाला
जनतंत्र बनाना है।

स्वरचित
कुसुम कोठारी ।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

विषय - परिवर्तन
बाल-गीत

एक मासूम परिवर्तन... 

सपनो का एक गांव बसालें
झिल मिल तारों से सजालें 
टांगें सूरज ओंधा, टहनी पर
रखें चाँद सन्दुकची में बंद कर
रोटी के कुछ झाड़ लगा लें 
तोड़ रोटिया जब चाहे खा लें
सोना चांँदी बहता झर झर 
पानी तिजोरियों के अंदर 
टाट पर पैबंद मखमल का
उड़े तन उन्मुक्त पंछियों सा।

स्वरचित 

कुसुम कोठारी ।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@



 भावों के मोती
26 06 19
विषय - इंद्रधनुष 


उत्तप्त धरा पर
रिमझिम बूंदों की फूहार 
ना होती किसी एक की,
सबकी सांझे होती इकसार।
इसलिए बरखा कहलाती
ऋतुओं की रानी
बंसत हो ऋतुराज चाहे,
उजड़ा सा होता बिन रानी ।
जीवन का अनुपम
श्रृंगार है बरखा
यादों की खुलती
संदूकची है बरखा 
भागती जिंदगी में
चैन के दो पल है बरखा 
जीवन का सतरंगी
"इंद्रधनुष" है बरखा ।
ले आती सुरम्य सौगातें
अम्बर का आह्लाद है बरखा
बंसत हो ऋतुराज चाहे,
ऋतुओं की रानी है बरखा।

स्वरचित 
कुसुम कोठारी

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


द्वितीय- प्रस्तुति

इंद्र धनुषी बचपन

ख्वाबों के दयार पर एक झुरमुट है यादों का
एक मासूम परिंदा फुदकता यहाँ - वहाँ यादों का ।

सतरंगी धागों का रेशमी इंद्रधनुषी शामियाना
जिसके तले मस्ती में झुमता एक भोला बचपन ।

सपने थे सुहाने उस परी लोक की सैर के
वो जादुई रंगीन परियां जो डोलती इधर उधर।

मन उडता था आसमानों के पार कहीं दूर
एक झूठा सच, धरती आसमान है मिलते दूर ।

संसार छोटा सा लगता ख्याली घोडे का था सफर
एक रात के बादशाह बनते रहे संवर संवर ।

दादी की कहानियों मे नानी थी चांद के अंदर
सच की नानी का चरखा ढूढते नाना के घर ।

वो झूठ भी था सब तो कितना सच्चा था बचपन
ख्वाबों के दयार पर एक मासूम सा बचपन।

एक इंद्रधनुषी स्वप्निल रंगीला बचपन।

स्वरचित

कुसुम कोठारी।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ 


भावों के मोती
22 06 19
विषय - गवाह

विराने समेटे कितने पद चिन्ह
अपने हृदय पर अंकित घाव
जाता हर पथिक छोड छाप
अगनित कहानियां दामन में
जाने अन्जाने राही छोड जाते
एक अकथित सा एहसास
हर मौसम "गवाह" बनता जाता
बस कोई फरियादी ही नही आता
खुद भी साथ चलना चाहते हैं
पर बेबस वहीं पसरे रह जाते हैं
कितनो को मंजिल तक पहुंचाते
खुद कभी भी मंजिल नही पाते
कभी किनारों पर हरित लताऐं झूमती
कभी शाख से बिछडे पत्तों से भरती
कभी बहार , कभी बेरंग मौसम
फिर भी पथिक निरन्तर चलते
नजाने कब अंत होगा इस यात्रा का
यात्री बदलते  रहते निरन्तर
राह रहती चुप शांत बोझिल सी।

विराने समेटे..

स्वरचित 
             कुसुम कोठारी ।
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ 


21  06  19
विषय - योग स्वास्थ्य 

योग क्या है

योग यानी जोड़ना
शरीर,मन और आत्मा को एक साथ लाना
योग आध्यात्मिक ऊंचाई है,
जो दिखाता आलोकिक संसार है
योग के स्थूल अनुभव रोगों से छुटकारा
उर्जा वान भौतिक देह स्वास्थ्य लाभ 
योग का मानसिक अनुभव मस्तिष्क से तनाव,चिंता,अवसाद और
नकारात्मक भावों से छुटकारा। 
योग का उच्चतम अनुभव
मनुष्य का आध्यात्म की ओर प्रस्थान
सांसारिक बन्धनों और चिन्ताओं से मुक्ति
परमानंद प्राप्ति को अग्रसर  
जहाँ सिर्फ आनंद ही आनंद है |

स्वरचित
कुसुम कोठारी।
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ 


भावों के मोती
20 06 19
विषय - आईना

अंधो के शहर आईना बेचने आया हूं 

फिर से आज एक कमाल करने आया हूं 
अंधो के शहर में आईना बेचने आया हूं।

संवर कर सुरत तो देखी कितनी मर्तबा शीशे में
आज बीमार सीरत का जलवा दिखाने आया हूं।

जिन्हें ख्याल तक नही आदमियत का
उनकी अकबरी का पर्दा उठाने आया हूं।

वो कलमा पढते रहे अत्फ़ ओ भल मानसी का
उन के दिल की कालिख का हिसाब लेने आया हूं।

करते रहे उपचार  किस्मत ए दयार का 
उन अलीमगरों का लिलार बांच ने आया हूं।

स्वरचित 

                        कुसुम कोठारी।

अकबरी=महानता  अत्फ़=दया
किस्मत ए दयार= लोगो का भाग्य
अलीमगरों = बुद्धिमान
लिलार =ललाट(भाग्य)
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ 



भावों के मोती
19 06 19
विषय-किनारा/तट

तट के बंधनो को तोड़ने 
विकल सी बढ़ती है लहर मतवाली 
पर किनारों के कोलाहल को सुन 
फिर लौट जाती अपने सागर की बाहों में
फिर मुक्त होने छटपटाती 
सर किनारों पर पटकती 
और लौट जाती पता नहीं क्यों?
अनसुलझी सी पहेली अनुत्तरित प्रश्न 
या ऐसे लगता ज्यों
इठलाती लहर तट पर
शीश रख कुछ पल जो सोती है 
लहर अपना कुछ हिस्सा वंहा
रेत पर ही खोती है 
इसलिये लौट लौट फिर जा
सागर के सीने में रोती है
वो मतवाली लहर सूर्य का
हाथ थाम वाष्प बन उड़ जाती है।

स्वरचित 

                   कुसुम कोठारी।
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ 




भावों के मोती
18 06 19
विषय - पदक
द्वितीय प्रस्तुति

पदक एक खास
जिंदगी के इम्तिहान में पास
जीवन आये रास
दुविधा का नाश
फिर बंधा मोहपास
स्वप्न सा उल्लास
घर में हो उजास
अपने हो आस-पास
प्रभु से अरदास
सुख का अहसास
मन में विश्वास
मंजिल हो पास
दुखों का ह्रास
जिंदगी सुखद सुवास।

स्वरचित
कुसुम कोठारी ।
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ 


.    भावों के मोती
17  06 19
विषय - नीयत

किस्मत क्या है!! 

कर्मो द्वारा अर्जित लब्ध और प्रारब्ध ही किस्मत है बस नीयत साफ रख। 

            पूर्व कृत कर्मो से
               जो संजोया है 
         वो ही विधना का खेल है 
           जो कर्म रूप संजो के
               आया है रे प्राणी 
                उस का फल तो
                 अवश्य पायेगा 
                हंस हंस बाधें कर्म 
                  अब रो रो उन्हें
                      छुडाये जा
                    भाग्य, नसीब,
                  किस्मत क्या है ? 
                 बस कर्मो से संचित
                      नीधी विपाक
                      बस सुकृति से
                  कुछ कर्म गति मोड़
                    और धैर्य संयम से
                            सब झेल
                          साथ ही कर
                           कृत्य अच्छे
                      "नीयत" रख साफ
                     और कर नव भाग्य
                         का निर्माण ।
स्वरचित 

                          कुसुम कोठारी।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ 


भावों के मोती
14/06/19
विषय - "शाख, डाली

ऋतु बसंत

देखो धरा पर कैसी
निर्मल चांदनी छाई है
निर्मेघ गगन से शशि
विभा उतर के आयी है ।

फूलों पर कैसी भीनी
गंध सौरभ लहराई  है
मलय मंद मधुर मधुर
मादकता ले आयी है ।

मंजु मुकुर मौन तोड़ने
मन वीणा झनकाई है
प्रकृति सज रूप सलज
सरस सुधा सरसाई है ।

हरित धरा मुखरित "शाखाएं" 
कोमल सुषमा बरसाई है
वन उपवन ताल तड़ाग
वल्लरियां मदमाई है। 

कुसुम कलिका कल्प की
उतर धरा पर आयी हैं
नंदन कानन उतरा है
लो, बसंत ऋतु आयी है।

स्वरचित 

       कुसुम कोठारी।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ 


भावों के मोती
12/06 /19
विषय - चक्रव्यूह

जोखिम की मानिंद हो रही बसर है ज़िंदगी
जद्दोजहद  का  एक चक्रव्यूह है ज़िदगी ।

खिल के मिलना ही है धूल में किस्म ए नक्बत
जी लो जी भर माना ख़तरे की डगर है ज़िंदगी।

बरसता रहा आब ए चश्म रात भर बेज़ार
भीगी हुई चांदनी का शजर है ज़िंदगी

मिलने को तो मिलती रहे दुआ ए हयात रौशन
उसका करम है उसको नज़र है ज़िंदगी।

माना डूबती है कश्तियां किनारों पर भी
डाल दो लहरों पर जोखिम का सफर है जिंदगी ।

स्वरचित 

                कुसुम कोठारी ।

नक्बत = दुर्भाग्य, विपदा
आब ए चश्म =आंसू
शजर =पेड़


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ 

भावों के मोती
11 06 19
विषय - घर

शहीदों  की रोती आत्मा जब धोखे में मारे जाते हैं... 

सर पर कफन बांध  कर निकले घर से
मरने से डर कैसा मरने को निकले घर से
घरवालों को पत्थर कर दिल पर पत्थर रख निकले घर से
देश पर करने निज प्राण उत्सर्ग निकले घर से
एक-एक सौ को मार मरेंगे यही सोच निकले घर से
एक एक टुकड़ा वापस लेंगे धरा का यही ठान निकले घर से
क्या पता गीदड़ यूं सीना चीर देंगे घुस के घर मे
सोये शेरों का यूं कलेजा निकाल चल देंगे घर से
मरना तो था पर ना सोचा कभी यूं मरेंगे अपने घर में
नींद में ही भेट चढ़ जायेंगे धूर्त धोखे बाज गीदड़ो के वो भी घर में ।
स्वरचित 
              कुसुम कोठारी।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ 
इंद्र नगरी में हड़कम्प मचा है
चुनावी माहौल का रंगमंच सजा है
नये इन्द्र का चुनाव है
प्रत्याशियों की लम्बी कतार है
होड़ मची भारी है
काफी उठा पटक की तैयारी है
उर्वशी, रंभा, मेनका, की बीजी सेड्युल है
मोहरें भर भर थैलियां आ रही है
फलां फलां देवता को लांछित कर
स्टिंग ऑपरेशन करवाना है
अपना पलड़ा भारी हो तभी
जब दुसरों को ब्लैक लिस्ट करवाना हो
मतदान के समय तक आधो को
रन आउट करवा देना है
फिर मुकाबला कुछ आसान होगा
वोटरो के यहां जरूरत के
हिसाब से समान पहुंच रहे हैं
सभी को अपने वोट पक्के करने हैं
मतदाताओं की बनी चांदी है
बैठे-बैठे घर में दाना पानी है
कहीं ए-सी लग रहे हैं
कहीं नये वाहन दुपहिया तीन पहिया
अपनी अपनी हैसियत अनुसार आ रहे हैं
येन केन प्रकारेण अपने वोट बढ़ाने है
तीन चार महीना टटपुंछियों को
अगर बत्ती कर
पांच साल ऐश में
पुरे जीवन पुरे परिवार की वारी न्यारी
वाह री मुर्ख जनता बेचारी
फिर-फिर उल्लू बनने की तैयारी
इंद्र की सिगड़ी जब भी जले
जहाँ भी जले सुन ले
ओ मेरी मूरख प्रजा 
सेकी तूं ही जायेगी बारी बारी
स्वीट काॅर्न की तरह
नीबू नमक
(पहले के प्रलोभन)
बस तेरे भुनने की तैयारी।
वाह रे जनता बेचारी
अर्थ, मत के चक्कर में
क्यों मति गई मारी।

कुसुम कोठारी।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ 


भावों के मोती
10 06 19
विषय - कोयल(कोयलिया) 

मन अतिथि 

कुहूक गाये कोयलिया 
सुमन खिले चहुँ ओर 
पपीहा मीठी राग सुनाये 
नाच उठे मन मोर  ।

मन हुवा मकरंद आज
हवा सौरभ ले गई चोर
नव अंकुर लगे चटकने
धरा का खिला हर पोर। 

द्वारे आया कौन अतिथि
मन में हर्ष हिलोल
ऐसे बांध ले गया मन 
स्नेह बाटों में तोल। 

मन बावरा उड़ता
पहुंचा उसकी ठौर
अपने घर भई अतिथि
बैठ नयनन की कोर।

स्वरचित 

     कुसुम कोठारी ।
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ 
भावों के मोती
10  06  19
विषय - कोयल

भुला बिसरा मधुर जमाना

जब पेड़ों पर कोयल काली 
कुहुक कुहुक  कर गाती थी
डाली डाली डोल पपीहा 
पी कहां  की राग सुनाता था
घनघोर  घटा घिर आती थी
और मोर नाचने आते थे 
जब गीता श्यामा की शादी में
पूरा गांव नाचता गाता था 
कहीं नन्हे के जन्म पर 
ढोल बधाई  बजती थी  
खुशियां  सांझे की होती थी
गम में हर आंख भी रोती थी
कहां गया वो सादा जीवन 
कहां गये वो सरल स्वभाव 
सब शहरों की और भागते 
 नीद  औ चैन गंवाते हैं 
या वापस आते वक्त साथ
थोडा शहर गांव ले आते हैं
सब भूली बिसरी बातें हैं 
और यादों के उलझे धागे हैं।

स्वरचित 

           कुसुम कोठारी ।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ 
भावों के मोती
स्वतंत्र लेखन
23  06  19

आज सखी.... (मेघ मल्हार) 

आज सखी मन खनक खनक जाए

मन की झांझर ऐसी झनकी 
रुनझुन रुनझुन बोल रही है
छेडी सरगम मधुर रागिनी
मन के भेद भी खोल रही है।

आज सखी मन खनक खनक जाए।

प्रीत गगरिया छलक रही है
ज्यो  अमृत  उड़ेल रही  है
मन को घट  रीतो प्यासो है 
बूंद - बूंद रस घोल  रही  है।

आज सखी मन खनक खनक जाए ।

काली घटा घन घड़क रही है
बृष्टि टापुर टुपुर टपक रही है
हवा सुर सम्राट तानसेन ज्यों
राग मल्हार  दे  ठुमक रही है।

आज सखी मन खनक खनक जाए ।
स्वरचित 

             कुसुम कोठारी।
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ 
शीर्षक- अलीम =बुद्धि 

अंधो के शहर आईना बेचने आया हूं 

फिर से आज एक कमाल करने आया हूं 
अंधो के शहर में आईना बेचने आया हूं।

संवर कर सुरत तो देखी कितनी मर्तबा शीशे में
आज बीमार सीरत का जलवा दिखाने आया हूं।

जिन्हें ख्याल तक नही आदमियत का
उनकी अकबरी का पर्दा उठाने आया हूं।

वो कलमा पढते रहे अत्फ़ ओ भल मानसी का
उन के दिल की कालिख का हिसाब लेने आया हूं।

करते रहे उपचार किस्मत ए दयार का 
उन अलीमगरों का लिलार बांच ने आया हूं।

स्वरचित 

कुसुम कोठारी।

अकबरी=महानता अत्फ़=दया
किस्मत ए दयार= लोगो का भाग्य
अलीमगरों = बुद्धिमान
लिलार =ललाट(भाग्य)


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


सुगंधित पराग

नंदन कानन महका आज मन में 
श्वेत पारिजात बिखरे तन मन में
फूल कुसमित, महकी चहुँ दिशाएँ 
द्रुम दल शोभित वन उर मन में
मलय सुगंधित, उड़ा पराग पवन संग 
देख घटा पादप विहंसे निज मन में
कमल कुमुदिनी हर्षित हो सरसे 
हरित धरा मुदित हो मन में
जल प्रागंण निज रूप संवारे लतिका
निरखी निरखी लजावे मन में।
कंचन जैसो नीर सर सरसत
आज सखी नव राग है मन में।

स्वरचित



@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@



अप्रतिम सौन्दर्य 

हिम से आच्छादित 
अनुपम पर्वत श्रृंखलाएँ
मानो स्फटिक रेशम हो बिखर गया
उस पर ओझल होते 
भानु की श्वेत स्वर्णिम रश्मियाँ 
जैसे आई हो श्रृँगार करने उनका 
कुहासे से ढकी उतंग चोटियाँ 
मानो घूंघट में छुपाती निज को
धुएं सी उडती धुँध
ज्यों देव पाकशाला में
पकते पकवानों की वाष्प गंध
उजालों को आलिंगन में लेती
सुरमई सी तैरती मिहिकाएँ 
पेड़ों पर छिटके हिम-कण
मानो हीरण्य कणिकाएँ बिखरी पड़ी हों
मैदानों तक पसरी बर्फ़ जैसे
किसी धवल परी ने आंचल फैलया हो
पर्वत से निकली कृष जल धाराएँ
मानो अनुभवी वृद्ध के
बालों की विभाजन रेखा
चीङ,देवदार,अखरोट,सफेदा,चिनार 
चारों और बिखरे उतंग विशाल सुरम्य 
कुछ सर्द की पीड़ा से उजड़े 
कुछ आज भी तन के खड़े 
आसमां को चुनौती देते
कल कल के मद्धम स्वर में बहती नदियाँ 
उनसे झांकते छोटे बड़े शिला खंड 
उन पर बिछा कोमल हिम आसन
ज्यों ऋषियों को निमंत्रण देता साधना को
प्रकृति ने कितना रूप दिया कश्मीर को
हर ऋतु अपरिमित अभिराम अनुपम
शब्दों मे वर्णन असम्भव।

कुसुम कोठारी।

" गिरा अनयन नयन बिनु बानी "


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

अपने वजूद के लिये
रावण लडता रहा
और स्वयं नारायण भी
अस्तित्व न मिटा पाये उसका 
बस काया गंवाई रावण ने
अपने "सिद्धांत "बो गया
फलीभूत होते होते
सदियों से गहराते गये
वजह क्या? न सोचा कभी
बस तन का रावण जलता रहा
मनोवृत्ति में पोषित
होते रहे दशानन
राम पुरुषोत्तम के सद्गुण 
स्थापित कर गये जग में
साथ ही रावण भी कहीं गहरे
अपने तमोगुण के बीज बो चला
और अब देखो जिधर
राम बस संस्कारों की
बातो, पुस्तकों और ग्रंथों में
या फिर बच्चों को
पुरुषोत्तम बनाने का
असफल प्रयास भर है, 
और रावणों की खेती
हर और लहरा रही है।

स्वरचित 
कुसुम कोठारी।


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@



नीलम शर्मा#नीलू


नदी के उपकार मानव पर

दुग्ध धार सी बहती विमल शुभ्र सरिते 
उज्ज्वल कोमल निर्मल क्षीर नीर सरिते 

कैसे तूं राह बनाती कंटक कंकर पाथर में 
चलती बढती निरबाध निरंतर मस्ती में 

कितने उपकार धरा पर, मानव पशु पाखी पर भी
उदगम कहां कहां अंत नही सोचती पल को भी 

बांध ते तुझ को फिर भी वरदान विद्युत का देती 
सदा प्यासो को नीर और खेतो को जीवन देती 

तूं कर्त्तव्य की परिभाषा तूं वरदायनी सरिते 
नमन तूझे है जगजननी निर्झरी सारंग सरिते ।

स्वरचित 
कुसुम कोठारी।



अवसर बस बीता जाता

पता है कुछ तेरा ना मेरा 
कैसी भी दुखद या सुहानी 
ये जगती सिर्फ़ रैन बसेरा 
फिर भी हर पल
एक शिकायत 
ये छूटा वो ना मिला
ऐसी आपा धापी लगी 
कि खुद से भी रहे अंजान
एक घङी भी नही जो 
स्वयं की करें पहचान 
अवसर बस बीता जाता 
मंजिल से अंजान 
टुकड़ों में बस जीवन बीते 
रहे हाथ बस रीते 
अंत तक ये जान न पाऐ 
क्या हारे क्या जीते ।

स्वरचित 

कुसुम कोठारी ।
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@



शीर्षक-युवा (नौजवान ) 

वीर देश के गौरव हो तुम
माटी की शान तुम
भूमि का अभिमान तुम
देश की आन तुम
राह के वितान तुम। 

ओ नौजवान बढ़ो चलो
धीर तुम गम्भीर तुम। 

राहें विकट,हौसले बुलंद रख
चीर दे सागर का सीना
पांव आसमां पे रख
आंधी तुम तूफान तुम
राष्ट्र की पतवार तुम। 

ओ नौजवान बढ़ो चलो 
धीर तुम गम्भीर तुम। 

भाल को उन्नत रख
हाथ में कमान रख
बन के आत्माभिमानी
शीश झुका के पर्वतों के
राह पर कदम रख। 

ओ नौजवान बढ़ो चलो
धीर तुम गम्भीर तुम। 

दुर्जनों को रौंद दे
निर्बलों की ढाल तुम
नेकियाँ हाथों में रख
मान तुम गुमान तुम
सागर के साहिल तुम। 

ओ नौजवान बढ़ो चलो
धीर तुम गम्भीर तुम। 

तूं महान कर्मकर
अर्जुन तुम कृष्ण तुम
राह दिखा दिग्भ्रमित को
गीता के संदेश तुम
अबलाओं के त्राण तुम। 

ओ नौजवान बढ़ो चलो
धीर तुम गम्भीर तुम।

स्वरचित 

कुसुम कोठारी ।
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@



एक नादान फैसला 

कहीं एक तलैया के किनारे 
एक छोटा सा आशियाना 
फजाऐं महकी महकी 
हवायें बहकी बहकी 
समा था मदहोशी का 
हर आलम था खुशी का
न जगत की चिंता 
ना दुनियादारी का झमेला
बस दो जनों का जहान था 
वह जाता शहर लकड़ी बेचता
कुछ जरूरत का सामान खरीदता
लौट घर को आता 
वह जब भी जाता 
वह पीछे से कुछ बैचेन रहती 
जैसे ही आहट होती 
उस के पदचापों की
वह दौड द्वार खोल
मधुर मुस्कान लिये 
आ खडी होती 
लेकर हाथ से सब सामान
एक गिलास में पानी देती 
गर्मी होती तो पंखा झलती 
हुलस हुलस सब बातें पूछती 
सुन कर शहर की रंगीनी 
उड़ कर पहुंचती उसी दायरे में
जीवन बस सहज बढा जा रहा था
एक दिन जिद की उसने भी 
साथ चलने की 
उसने लाख रोका न मानी
दोनो चल पडे 
शहर में खूब मस्ती की 
चाट, झूले, चाय-पकौड़े 
स्वतंत्र सी औरतें 
उन्मुक्त इधर उधर उडती 
बस वही मन भा गया 
मन शहर पर आ गया
नही रहना उस विराने में
इसी नगर में रहना 
था प्रेम अति गहरा 
पति रोक न पाया 
उसे लेकर शहर आया 
किसी ठेकेदार को सस्ते में 
गांव का मकान बेचा
शहर में कुछ खरीद न पाया
किराये पर एक कोठरी भर आई 
हाथ में धेला न पाई 
काम के लिये भटकने लगा 
भार ठेला जो मिलता करता
पेट भरने जितना भर 
मुश्किल से होता
फिर कुछ संगत बिगडी 
दारू की लत लगी
अब करता ना कमाई 
भुखा पेट, पीने को चाहिऐ पैसा 
पहले तूं-तूं मैं-मैं फिर हाथा पाई
आखिर वो मांजने लगी बरतन 
घर घर में भरने लगी पानी
जो अपने घर की थी रानी 
अपनी नादानी से बनी नौकरानी
ना वो मस्ती के दिन रात 
और आँख में था पानी 
ये एक छोटी नादान कहानी।

स्वरचित 

कुसुम कोठारी ।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


भावी पीढ़ी को क्या देगें

आजकल डर के कारण
साँसे कुछ कम ले रही हूं 
अगली पीढ़ी के लिये
कुछ प्राण वायु छोड़ जाऊं, 
डरती हूं क्या रहेगा
उनके हिस्से
बिमार वातावरण
पानी की कमी
दूषित खाद्य पदार्थ
डरा भविष्य
चिंतित वर्तमान
जीने की जद्दोजहद
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


रंग और खुशी जो ले के आई
सब कहते हैं होली
आ हमसफर तू राह बना दे
मै भी साथ हो ली
रुख पर तूने जो रंग डाला
उस दिन तेरी हो ली
आ सब गिले शिकवे भुला दें
खूब खेलें हम होली 
झनक झनक पैजनीया छनके
नाच नचाये होली
रंग गुलाल की इस महफिल में
फाग सुनाये होली 
तन सूखा मन रंग जाए
ऐसी स्नेह की होली 
चलो चलें हम आज सभी के
संग मनायें होली ।

स्वरचित
कुसुम कोठारी।
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

धोखा, झूठ, फरेब
बेरौनक जिंदगी
स्वार्थ
अविश्वास
अनिश्चित जीवन
वैर वैमनस्य
फिर से दिखता
आदम युग
यह भयावह
चिंतन मुझे डराता है
सोचती हूं अभी से
पानी की
एक एक बूंद का
हिसाब रखूं
कुछ तो सहेजूं
उनके लिये
कुछ अच्छे संस्कार
दया कोमल भाव
सहिष्णुता
मजबूत नींव
धैर्य आदर्श 
कि वो अपने
पूर्वजों को कुछ
आदर से याद करें
चैन से जी सके
और अपनी अगली पीढ़ी को 
कुछ अच्छा देने की सोचें....

कुसुम कोठारी।
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@



विधा - अलंकारिक कविता

किरणों के वस्त्र।

ये रजत बूंटों से सुसज्जित नीलम सा आकाश
ज्यों निलांचल पर हिरकणिका जड़ी चांदी तारों में

फूलों ने भी पहन लिये हैं" वस्त्र" किरण जाली के
आई चंद्रिका इठलाती पसरी लतिका के बिस्तर पे

विधु का कैसा रुप मनोहर तारों जडी पालकी है
छूता निज चपल चांदनी से सरसी हरित धरा को

स्नान करने उतरा हो ज्यों निर्मल शांत झील में
जाते जाते छोड़ गया कुछ अंश अपना पानी में

ये रात है या सौगात है अनुपम कोई कुदरत की
जादू जैसा तिलिस्म फैला सारे विश्व आंगन में।
स्वरचित
कुसुम कोठारी ।
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@



"चाँद बादल की लुक्का छिप्पी"

आज चाँद के नूर पे देखो
फिर बदरी सी छायी है ,
मौसम है कुछ महका बहका
चंद्रिका घूंघट ओट कर आयी है ,
क्या पीया मिलन को जाना है
जो यूं सिमटी सकुचायी है ,
अंखियां ऐसे झुकी कि जैसे
पहली मिलन रुत आयी है ,
कभी छुपाये खुद को
बादल के मृग छौनो में ,
कभी झांकती हटा घटा
घूंघट के कोनो से ,
निशा , चुनर तारों वाली
झिलमिल झलकाती है ,
और कभी नीला नीला
अपना आंचल लहराती है ,
आज बादलों ने देखो
चाँद से खेली छुप्पम छुपायी है ।
स्वरचित
कुसुम कोठारी ।
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


तिश्रंगी में जो डूबे रहे राहत को बेकरार है
उजड़े घरौदें जिनके वह ही परेशान है ।

रात के काफिले चले कौ़ल करके कल का 
आफताब छुपा बादलों में क्यों पशेमान है

बसा लेना एक संसार नया, परिंदों जैसे
थम गया बेमुरव्वत अब कब से तूफान है

आगोश में नीदं के भी जागते रहें कब तक
क्या सोच सोच के आखिर अदीब हैरान है

शजर पर चाँदनी पसरी थक हार कर 
आसमां पर माहताब क्यों गुमनाम है।

स्वरचित। 

कुसुम कोठारी।
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@



 किस्मत क्या है!! 

कर्मो द्वारा अर्जित लब्ध और प्रारब्ध ही किस्मत है... 

पूर्व कृत कर्मो से
जो संजोया है 
वो ही विधना का खेल है 
जो कर्म रूप संजो के
आया है रे प्राणी 
उस का फल तो
अवश्य पायेगा 
हंस हंस बाधें कर्म 
अब रो रो उन्हें
छुडाये जा
भाग्य, नसीब,
किस्मत क्या है ? 
बस कर्मो से संचित
नीधी विपाक
बस सुकृति से
कुछ कर्म गति मोड़
और धैर्य संयम से
सब झेल
साथ ही कर
कृत्य अच्छे
और कर नव भाग्य
का निर्माण ।

स्वरचित 
कुसुम कोठारी।
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


शीर्षक "जीवन जल का बुदबुदा" 

किस का गुमान कौन सा अभिमान 
माटी में मिल जानी माटी की ये शान।

भूल भुलैया में भटका
खुद के गर्व में तूं अटका
कितने आये कितने चले गये मेहमान
माटी में मिल जानी माटी की ये शान। 

एक पल के किस्से में
तेरे मेरे के हिस्से में
जीवन के कोरे पल अनजान
माटी में मिल जानी माटी की ये शान।

ना फूल झुठी बड़ाई में
ना पड़ निरर्थक लडाई में
सब काल चक्र का फेरा है नादान
माटी में मिल जानी माटी की ये शान। 

तूं धरा का तुछ कण है
आया अकेला जाना क्षण में
समझ ले ये सार मन में कर सज्ञान 
माटी में मिल जानी माटी की ये शान। 

किसका गुमान...
स्वरचित 

कुसुम कोठारी ।

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

1 झुलसी धरा
मुरझाई लताऐं
बिना जल के ।

2 प्यासी नदिया
कृषकाय झरने
पानी की आस ।

3 सूने चौबारे
पशु हैं कलपते
नीर की कमी।

4 पानी के बिन
गर्मी में झुलसता
कर्फ्यू सा गांव।

5 फटी है धरा
किसान लाचार से
जल ही नही।

6 क्षरित वृक्ष
रेत आंखो में झोंके
आजा रे पानी।

7 प्यासे हो कुवे
फ्रिज ए सी के ठाठ
बिकता पानी।

स्वरचित।
कुसुम कोठारी
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@



जीवन पल पल एक परीक्षा
महाविलय की अग्रिम प्रतिक्षा।

अतृप्त सा मन कस्तुरी मृग सा 
भटकता खोजता अलब्ध सा
तिमिराछन्न परिवेश में मूढ मना सा
स्वर्णिम विहान की किरण ढूंढता
छोड घटित अघटित खोजता ।
जीवन पल पल एक परीक्षा...

महासागर के महा द्वंद्व सा
जलता रहता बङवानल सा
महत्वाकांक्षा की धुंध मे घिरता
खुद से ही कभी न्याय न करता
सृजन में भी संहार ढूंढता ।
जीवन पल पल एक परीक्षा...

कभी होली भरोसे की जलाता
अगन अबूझ समझ नही पाता
अव्यक्त लौ सा जलता जाता 
कभी मन प्रस्फुटित दिवाली मनाता
खुश हो मलय पवन आस्वादन करता ।
जीवन पल पल एक परीक्षा....

भ्रमित मन की रातें गहरी जितनी 
"उजाला" दिन का उतना कमतर
खण्डित आशा अश्रु बन बहती
मानवता क्षत विक्षत चित्कार करती
मन आकांक्षा अपूर्ण अविचल रहती।
जीवन पल पल एक परीक्षा ....

कुसुम कोठारी।
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@



2 लघु कविता। 
1सिसकती मानवता 

सिसकती मानवता
कराह रही है
हर ओर फैली धुंध कैसी है
बैठे हैं एक ज्वालामुखी पर
सब सहमें से डरे डरे
बस फटने की राह देख रहे 
फिर सब समा जायेगा
एक धधकते लावे में ।

2 ममानवता का दिवाला

पद और कुर्सी का बोलबाला
मानवता का निकला दिवाला
अधोगमन की ना रही सीमा
नस्लीय असहिष्णुता में फेंक चिंगारी
सेकते स्वार्थ की रोटियाँ
देश की परवाह किसको
जैसे खुद रहेंगे अमर सदा
हे नराधमो मनुज हो या दनुज।
स्वरचित। 

कुसुम कोठारी


" शहीदों की रोती आत्मा" 

सर पर कफन बांध कर निकले घर से

मरने से डर कैसा मरने को निकले घर से
घरवालों को पत्थर कर दिल पर पत्थर रख निकले घर से
देश पर करने निज प्राण उत्सर्ग निकले घर से
एक एक सौ को मार मरेंगे यही सोच निकले घर से
एक एक टुकड़ा वापस लेंगे धरा का यही ठान निकले घर से
क्या पता गीदड़ यूं सीना चीर देंगे घुस के घर में
सोये शेरों का यूं कलेजा निकाल चल देंगे घर से
मरना तो था पर ना सोचा कभी यूं मरेंगे अपने घर में
बेखबरी में ही भेट चढ़ जायेंगे, धूर्त धोखे बाज गीदड़ो के, वो भी घर में।

कुसुम कोठारी।


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
मन की अगणित परतों मे दबी ढकी आग 
कभी सुलगती कभी मद्धम कभी धीमी फाग।

यूं न जलने दो नाहक इस तेजस अनल को 
सेक लो हर लौ पर जीवन के पल-पल को।

यूं न बनाओ निज के अस्तित्व को नीरस
पकालो इस लौ पर आत्मीयता की मधुर पायस।

गहराई तक उतर के देखो सत्य का दर्पण
मन की कलुषिता कर दो इस लौ में तर्पण ।

अज्ञान का कोहरा ढकता मति लौ को कुछ काल
मन मंथन का गरल पी शिव बन, उठा निज भाल।
स्वरचित 
कुसुम कोठारी
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@


दस्तक दे रहा दहलीज पर कोई 
चलूं उठ के देखूं कौन है
कोई नही दरवाजे पर
फिर ये धीरे धीरे मधुर थाप कैसी
चहुँ और एक भीना सौरभ
दरख्त भी कुछ मदमाये से
पत्तों की सरसराहट
एक धीमा राग गुनगुना रही
कैसी स्वर लहरी फैली 
फूल कुछ और खिले खिले
कलियों की रंगत बदली सी
माटी महकने लगी है
घटाऐं काली घनघोर, 
मृग शावक सा कुचाले भरता मयंक
छुप जाता जा कर उन घटाओं के पीछे
फिर अपना कमनीय मुख दिखाता
फिर छुप जाता
कैसा मोहक खेल है
तारों ने अपना अस्तित्व
जाने कहां समेट रखा है
सारे मौसम पर मद होशी कैसी
हवाओं मे किसकी आहट
ये धरा का अनुराग है
आज उसका मनमीत
बादलों के अश्व पर सवार है
ये पहली बारिश की आहट है
जो दुआ बन दहलीज पर
बैठी दस्तक दे रही है
चलूं किवाडी खोल दूं
और बदलते मौसम के
अनुराग को समेट लूं
अपने अंतर स्थल तक।
कुसुम कोठारी।

No comments:

"गुमनाम"12नवम्बर 2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें   ब्लॉग संख्या :-564 Satya...