अशोक राय वत्स





लेखक परिचय



नाम --अशोक कुमार राय लेखन नाम--अशोक राय वत्स जन्म तिथि--३१ मार्च १९७३ जन्म स्थान--ग्राम-रैनी , जिला मऊ, उत्तरप्रदेश शिक्षा-एम .ए . अंग्रेजी, बी. एड. सृजन की विद्या--तुकान्त, अतुकान्त, छंद, मुक्तक, वीर रस व श्रृंगार रस। प्रकाशित कृतियाँ- भावांजली साझा संग्रह, नव पल्लव साझा संग्रह, देश के विभिन्न समाचारपत्रों में२२७ कविताएं प्रकाशित। प्राप्त सम्मान-देवल आशीष सम्मान, वर्तमान अंकुर द्वारा, न्यूज़ 24×7 द्वारा स्वर्ण पदक , काव्य गौरव, के साथ भावों के मोती द्वारा प्रदत्त ११ सम्मान, विभिन्न कवि सम्मेलनों से प्राप्त प्रशंसा पत्र व सम्मान। संप्रति--निजी संस्थान में अंग्रेजी भाषा का शिक्षण कार्य /व्याख्याता अंग्रेजी। पता-अशोक राय वत्स 80 B नारायण नगर विस्तार ,बेनाड़ रोड, दादी का फाटक जयपुर राजस्थान 302012 ईमेल- raiashok316@gmail

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रंग अबीर में भीग रहा हर गोरी का अंतरमन है,
फागुन की ठंडाई ने ली ये कैसी अंगड़ाई है।

ढोल मंजीरों की धुन पर नाची अब तन्हाई है,
गुझिया पापड़ के थाल सजे पर भाई सबको ठंडाई है।

देखो देखो इठलाई सी होली फिर से आई है।
बच्चों की छोड़ो बूढ़ों ने भी अब तो ली अंगड़ाई है,

भेदभाव को दूर भगाने की कसमें सबने खाई हैं,
रंग अबीर की बौछारों संग खुशियाँ घर घर आई हैं।

देखो होली अपने संग सबकी खुशहाली लाई है।
देखो होली अपने संग सबकी खुशहाली लाई है।।
(अशोक राय वत्स) स्वरचित
जयपुर


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"मौसम ने ली अंगड़ाई है"
मुखड़ा हुआ गुलाबी देखो,
गोरी कैसे शर्माई है।
होली के रंग ने दिल में
पिया मिलन की आश जगाई है।

खेतों में सरसों ने देखो ,
कैसे ली अंगड़ाई है।
होली के दिन आने से,
मौसम में मादकता छाई है।

आंगन वाले आम की डरिया,
देखो कैसे झुक आई है।
पिया मिलन की आश में गोरी,
मन ही मन इठलाई है।

घर से लेकर बगिया तक में,
रौनक फिर से आई है।
देखो बाबा के होठों पर,
कैसी मस्ती छाई है।

बच्चे से लेकर बूढे तक में,
उमंग नई अब छाई है।
गोरी डूबी मस्ती में,
धरती ने ली अंगड़ाई है।

होली के मौसम में देखो,
सब पर मादकता छाई है।
अब दोष न देना जग वालों,
हर मन में मस्ती छाई है।

होली के मौसम में देखो,
गोरी मिलने को आई है।
यदि मन बहके मेरा लोगों,
मत कहना लाज न आई है।

होली के मौसम में देखो।
मौसम ने ली अंगड़ाई है।।
(अशोक राय वत्स) स्वरचित
जयपुर


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आज फिर वह दिन याद आया है,
जब दिल हमारे मिले थे।
प्रथम प्यार प्रथम भाव 
दिल में अंकुरित हूआ।
भूल चुका था मैं जिसको,
वह फिर से सामने आई थी।
वह सकुचाई सी आई थी,
मन मेरा भी घबराया था।
आकर जब हौले से बोली,
दिल में संगीत हुआ झंकृत।
जब नैन उठाकर देखा उसको,
दिल धड़का जोरों से मेरा था।
बिन कहे हमारी आँखों ने
सब कुछ ही तो कह डाला था।
कुछ शब्द अधरों तक आए थे,
पर फिर से उर में समा गए।
बस आंखों की भाषा से ही,
हमने एक दूजे को सराहा था।
कुछ ही पल को हम साथ रहे,
पर पूरा जीवन हमने जीया 
पूरा जीवन हमने जीया
स्वरचित (अशोक राय वत्स)
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"शीर्षक-अंकुर"



जादू था उसकी बातों में,
हर पल वह हमें लुभाती थी।
उसकी उन शोख अदाओं पर,
कुर्बान जवानी होती थी।
आती थी पवन के झोंके सी
मन को शीतल कर जाती थी।
उसकी चंचल अदाओं से,
मन उदगारों से भरता था।
आगे चल कर उदगार यही,
कविता का रूप धरते थे।
उसके आने से रौनक थी
महफिल की शमा जल जाती थी।
कैसे बतलाऊँ मैं सबको,
उससे मेरा क्या रिश्ता था।
जो भी था बस अहसास मात्र,
दिल में राहत भर जाती थी।
मैं नाम नहीं दे पाया था
वह रिश्ता ही कुछ ऐसा था।
वह रिश्ता बस प्यारा सा था।।
वह रिश्ता बस प्यारा सा था।।
(अशोक राय वत्स) स्वरचित
जयपुर
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वह बदलते रहे करवटें इसकदर,
दूर होती गई नींद उनसे हर कदम।
कास साहस रखा होता थोड़ा भी उसने,
जुदा होती न निदिया आंखों से इस कदर ।
वह छुपाते रहे राज हमसे सदा,
इसलिए हो गए देखो ओझल यहाँ से।
चलो हम चले कुछ कदम तो बढाएं,
कब तलक केवल करवट बदलते रहेंगे।
करो कुछ जतन दूर बेचैनी करो,
छोड़ करवट बदलना काम दिल से करो।
(अशोक राय वत्स)स्वरचित
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करवाता हूं परिचित सबको आज नई बिमारी से।
रग रग में है फैल रही
यह देश खोखला कर रही ।
कहते हैं इसको भ्रष्टाचार
खून सभी का चूस रही।
इस का मारा हर दम रोए
करे न अच्छा कार्य।
आगे चलकर वह भी बरे
भ्रष्टाचारी कार्य ।
इससे बच कर रहना है सबको,
इससे घातक कुछ और नहीं
जन जन को आज जगाना है।
भ्रष्टाचार रूपी बिमारी को
जड़ से हमें मिटाना है।
(अशोक राय वत्स)
स्वरचित जयपुर




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"गंगा मैया धन्य हो गई"

संगम तट पर बरस रहा है, देवों का आशीष।
देखो जिसको लगा हुआ है, पाने को आशीष।।
माँ गंगा के जयकारे से, गूंज रहा संगम का तट।
लगा रहे सब मिलकर डुबकी, क्या राजा क्या रंक।।
कुंभ का आगाज हो गया, निकला जुलूस विशाल।
संत समाज है मग्न हो रहा, लगा रहा जयकार।।
गंगा के पावन तट पर है, बरसा स्नेह अपार।
कोई अर्पित करे अर्ग ,तो कोई सेवा में मसगूल।।
कोई खोया राम धुनि में, कोई लिए समाधि लीन।
नागा बाबा को तुम देखो, मल रहे हैं भभूत।।
संगम तट की मोहकता का ,कैसे करूँ बखान।
शब्द नहीं हैं उर मे मेरे, जो कर पाऐं गुणगान।।
योगी जी की व्यस्था ने, मन है सबका मोह लिया।
वत्स देता साधुवाद उन्हें, जो किया सफल आयोजन यह।।
ऐसे सपूत को नमन मेरा, जिसने नाम बढाया संगम का।
प्रयाग राज को पहुँचाया है, विश्व पटल के हर कोने में।।
बारमबार नमन है मेरा, माँ भारती के लाल को।
गंगा मैया भी धन्य हो गई, देख भव्यता संगम की।।
गंगा मैया भी धन्य हो गई, देख भव्यता संगम की।।
(अशोक राय वत्स) स्वरचित
जयपुर

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घूंघट सम्मान नजर का है
इससे सबको मिलता आदर।
तहजीब सिखाता है हमको
इसमें सम्मान बड़ों का है।
घूंघट में सब राज छिपे होते
इससे व्याकुलता बढती है।
कभी सम्मान दिलाता है घूंघट
तो कभी गिराता मान हमारा।
गोरी के मनो भावों को छिपाता
कभी बढाता प्यार है।
जब भी दीदार हुआ गोरी का
मन मेरा हर्षित होता है।
उसके मुख मंडल की आभा को
यह हर पल और बढाता है।
मानो तो यह सम्मान दिलाए
ना मानो तो बस पर्दा है।
यह तुम पर निर्भर करता है,
कैसी अब सोच तुम्हारी है
यदि मानो तो यह इज्जत है
ना मानो तो आडम्बर है।
(अशोक राय वत्स)
स्वरचित। जयपुर
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सच्चा संत तो बस वो है
जिसको न हो अभिमान।
क्रोध, काम, माया अरु लोभ,
फटकें ना जिसके पास।
दिल पावन जिसका गंगा जल सा,
मन शीतल हो चांदनी जैसा।
संत वही बस है अच्छा,
जिसका मन भेद न करता है।
दुख आएं चाहे जीतने,
वह तनिक नहीं घबराता है।
अपने हिस्से के सुख देकर,
जो मन ही मन हर्षाता ।
वह मोह न करता जीवन का,
सेवा करता बस इश्वर की।
ऐसा सुन्दर मन रखता जो,
बस संत वही कहलाता है।
बाकी के सब बस ढोंगी हैं,
जो नित बाजार सजाते हैं।
अपने छल कपट के बल,
जनता का शोषण करते हैं।
ऐसे लोगों के कारण ही,
पृथ्वी पर विपदा आती है।
लेकिन मैं यह भी कहता हूँ,
संतो से है दुनिया कायम।
उनके पुन्य कर्मो से ही,
अब तक है यह धरा कायम।
(अशोक राय वत्स) स्वरचित

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"कलम न कभी रूकने पाये"
हे इश्वर मदद करो इतनी
मैंने अब कलम उठाई है।
ताकत भर दो इसमे इतनी,
कर्तव्य मार्ग से डिगे नहीं।
आएं चाहे संकट जितने,
यह सत्य मार्ग से हटे नहीं।
अंधियारे घोर निराशा में भी,
अबला की लाठी बनी रहे।
मेरी कविता तलवार बने,
जो हर अबला की रक्षार्थ उठे।
इसमें भर दो शक्ति इतनी,
हर निर्बल की यह ढाल बने।
हे इश्वर शक्ति दो इतनी,
यह कलम निरंतर चले योंहीं ।
आएं संकट चाहे जितने,
यह कर्तव्य मार्ग पर डटी रहे।
निज प्राणों की बलि देकर भी,
यह सत्य मार्ग पर डटी रहे।
हे इश्वर शक्ति दो इतनी,
यह कलम न कभी रुकने पाए।
यह कलम न कभी रुकने पाए।।
(अशोक राय वत्स) स्वरचित

जयपुर 
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कहने को है चित्र मात्र,
पर भाव छिपे बहु तेरे हैं।
मानों तो कहता है मन व्यथा,
ना मानों तो है छाया मात्र।
चित्र कहे हर पल के भाव,
करता है सच्चाई का चित्रण।
यह है एक मात्र कला,
जो बिन बोले सब कहती है।
यदि तुम्हें समझना है चित्रों को
मन की आँखों से देखो तुम।
यदि तुम ऐसा न कर सको,
देखो कलाकार के नयनों से।
हर भाव समझ में आएंगे,
मन में भाव रहेंगे राहत के।
तुम समझोगे इस दुनिया को,
और हर पल हर्ष मनाओगे।
(अशोक राय वत्स ) स्वरचित
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विषय--प्रवाह
क्षणिका

प्रवाह तेज पानी का
गौरव वाणी का प्रवाह से
प्रवाह खत्म
जीवन का सार

प्रवाह युक्त जीवन
सरस सरल उपवन
प्रवाह विहीन
मृत प्रायः 
(अशोक राय वत्स) स्वरचित
जयपुर
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गजल
इश्क मेरा उन्हें ,रास आने लगा है।
इसलिए पास मेरे ,वह आने लगा है।।

ख्वाहिशें अपने दिल की बताई हैं उसने
इस कदर प्यार हमसे, जताने लगा है

देख कर हमको नजरें, झुकाली हैं उसने
मानो इस कदर इश्क में वो, लजाने लगा है

हसरतें अपने दिल की, जताई हैं ऐसे
कि इश्क के दरिया में हमको, बहाने लगा है

अपनी मासूमियत से यों, रिझाया है हमको
कि उसमें हमदम , हमें नजर आने लगा है

इस कदर याद करता है ,वो अब हमें
कि दर्द सीने मे हर पल, सताने लगा है

दीदार सपने उसका , हुआ आज ऐसे
हमराज उसमें हमें ,नजर आने लगा है

इस कदर नशा उसका, चढा आज हमको
कि खुदा उसमें हमें ,नजर आने लगा है

रुखसत हो जाएगी ,जो वत्स उसे ना मिला
हर धड़कन में दिल उसका, ये कहने लगा है।
(अशोक राय वत्स) स्वरचित
जयपुर
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विषय--शूल
भारत ऋषियों की भूमि है,
देवों ने इसको सींचा है।
ये शब्द शूल से चुभते हैं,
भारत में कायर रहते हैं।
बलिदानों की है भूमि यह,
वीरों से अटि पड़ी है यह।
जिस रोज न होंगे वीर यहाँ,
उस रोज न होगी भूमि यह।
साहित्य , कला की भूमि यह,
नित होते नए सृजन इस पर।
ये शब्द शूल से चुभते हैं
अज्ञानी इस पर बसते हैं।
संगीत बसा हर रग रग में,
कण-कण में इसके ईश्वर है।
ये शब्द शूल से चुभते हैं,
यह धरा सर्वथा नीरस है।
हर मन में इसके प्यार भरा,
हर कोना इसका उपजाऊ है।
यह शब्द हृदय में चुभते हैं,
बंजर इसकी हर क्यारी है।
अभिमान त्याग कर कहता हूँ,
यह देश स्वर्ग से भी प्यारा है।
जिस रोज ना होंगे वीर यहाँ,
उस रोज ना होगी धरा यहाँ।।
(अशोक राय वत्स) स्वरचित
जयपुर
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"दीप जलाएं"
आओ मिल जुल पर्व मनाएं,
मिल जुल कर सब दीप जलाएं।
खुशहाली का है पर्व दिवाली।
मिल जुल कर सब खुशी मनाएं।।

नफरत को हम दूर भगाएं,
प्यार मोहब्बत को फैलाएं।
ऐसा है यह पर्व निराला।
हर घर में हम दीप जलाएं।।

चलो चलें अब सब भेद मिटा दें,
ऊंच नीच का पाप हटा दें।
इस कदर मनाएं हम दीवाली।
हर दिल को खुशियों से भर दें।।
(अशोक राय वत्स)जयपुर
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धनतेरस है आ गई,
खुशियाँ जग में छा गई।
शुभ हो सबका दिन ये,
यह मंगल कामना छा गई।

देखो दीपक सज रहे,
जगमग हैं बाजार।
जिसको जैसा चाहिए,
सबकुछ है तैयार।

प्रभु से इस अवसर पर,
मैं मांग रहा उपहार।
जन जन में खुशहाली छाए,
भर जाएं सब भंडार।

हाथ जोड़ विनती करुं,
मन भरे हर्ष उल्लास।
घर घर लक्ष्मी का वास हो,
निर्धनता क हो नाश।
(अशोक राय वत्स)जयपुर


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दीप जलादो दिवाली का,
यह प्रेमदीप प्रभु के मन का
आजाओ लक्ष्मी को पूजें,
यह दीप पर्व है खुशहाली का।

यह पर्व हमें हर्षाता है,
प्रभु राम की याद कराता है।
जग में फैले भाईचारा ,
सतयुग की याद दिलाता है।

प्रभु ने रावण संहार किया,
विभीषण को लंका दान किया।
महलों का वैभव त्याग करके,
पृथ्वी को राक्षस विहीन किया।

मेरी विनती स्विकार करो,
सबको विद्या का दान करो।
इस कदर मनाओ दिवाली,
सबके मन से तम नाश करो।।
(अशोक राय वत्स) जयपुर
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"खेल"24मई 2019

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