रीता बिष्ट





लेखिका परिचय

नाम :- रीता बिष्ट जन्मतिथि :- 02/09/1981
जन्मस्थान :- देवभूमि उत्तराखंड शिक्षा :- स्तानक सृजन विधायें :- स्वतंत्र लेखन पीरामीढ, हाई हू कू प्रकाशित कृतियाँ :- भावांजलि, पिता विशेषां
कोई सम्मान :- मेरी अभिव्यक्ति मेरा कलम सम्मान उत्तराखंड उजाला सम्मान भावों के मोती का सर्वश्रेष्ठ समान
पेशा :- गृहणी



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वक्त का पहिया बदलता हैं 
कभी दुःख तो कभी सुख जीवन में आता हैं 
हर इन्सान लड़ रहा हैं अपने दुखों से 
तकलीफें बहुत हैं जीवन में 
वक्त नहीं हैं किसी के पास किसी का दुःख सुनने का .

जिंदगी भी क्या गजब करती हैं 
दुःख देकर हमें आजमाती हैं 
फिर हमें वक्त के भरोसे छोड देती हैं 
फिर हर दिन एक नया इम्तिहान लेकर कुछ सबक नया सिखाती हैं .

सुख दुःख हैं बहती नदिया 
जो कभी रूकती नहीं हैं 
दुःख कभी आता हैं कभी सुख आता हैं 
यही तो हैं वक्त का एक काल चक्र .

जिंदगी को कभी दुःख से मिलने दीजिये 
मुश्किलों में जीना आ जायेगा
दुःख दर्द के सागर में तैरना सीख जाओगे 
जिंदगी की इस कड़ी धूप में छाँव की मंजिल पर पहुँच जाओगे .
स्वरचित:- रीता बिष्ट



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जीवन का वास्तविक सत्य 
कब तक दूर रहोगे मृत्यु से 
कुरुर समय आयेगा
तब प्रभु की शरण में जाओगे.

क्यों दुराचारी अत्यचारी बनते हो 
मन की आवाज की सुनो 
सबके सुख दुःख की सोचो 
मृत्यु के बाद भी सबकी धड़कन में रहो .

एक ही जीवन कई बार मृत्यु होती हैं 
मृत्यु के बाद दिलों में जो बसता हैं 
वही सच्चा जीवन हैं 
कितना बड़ा हैं ये जीवन .

मृत्यु के दरवाजे पर खड़ी हूँ 
हर बार जिंदगी को बदलते देख रही हूँ 
जिंदगी का हैं ये सत्य 
जो कल तक बात नहीं करते थे आज आंसू बहा रहे हैं .
स्वतचित:- रीता बिष्ट

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कुछ तो लोक लाज शर्म कर लो 
ऐ देश की गद्दी पर बैठे विपक्ष के सत्ताधारी 
जो सैनिक राष्ट्र के लिये हुये कुर्बान 
उनकी कुर्बानी का मत करो ऐसे अपमान.

मत करो उन वीरों को अपमानित 
जिनके कतरे कतरे पर सम्पर्ण हैं निहित 
समस्त राष्ट्र जिन पर करता हैं अभिमान 
मत करो उन पर गलत शब्द बोलकर अपमान .

सेना और सैनिक का कर अपमान 
नेता अपने आप को समझते हैं बहुत महान 
उनकी वीरता को सरेआम करते हैं नीलाम 
भूल जाते हैं उनकी निःस्वार्थ देशभक्ति को देना मान .

छोड़ देते शब्दों के तीखे बाण 
करते हैं गली मोहल्ले तरीके की घटिया राजनीति 
भूल जाते मर्यादा और भाषा 
भूल जाते हैं सेना के परिवार का मान और सम्मान.

इस कुरीति को हमें रोकना होगा 
सेना और सैनिक के मान के लिये लड़ना होगा 
ऐसे लोगों को देशद्रोह के लिये जेल में भरना होगा 
इनको हमें फांसी के फंदे पर लटकाना होगा .
स्वरचित:- रीता बिष्ट

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जरा संभलकर चलना दुनियाँ के बाजार में 
अभी जिंदगी के कई बदलते रंग देखने बाकी हैं 
ज़रा सी जेब क्या खाली हुई 

जिंदगी में रिश्ते और रिश्तों के मायने बदल जाते हैं .

जेब चाहें हमारी खाली हो 
दिल के अमीर हैं हम 
इन्सान के जेब से नहीं 
दिल से रिश्ता जोड़ते हैं हम .

मिली हैं जिंदगी खुशियाँ बाँटने के लिये
क्यों भागते हो दौलत के पीछे 
क्या करोगे दौलत से जेब भरकर 
दुनियाँ से कफन में लिपटकर विदा होना हैं .

जिंदगी में सब कुछ पैसों से भरी जेब नहीं हैं
धनवान को पड़े देखा हैं हालात से मजबूर 
होते देखा हैं मिट्टी में उसका गर्व होते चूर 
देखा हैं उसे अपनों से होते दूर .
स्वतचित :- रीता बिष्ट


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असत्य के खिलाफ हूँ मैं 
सत्य के साथ हूँ मैं 
लोकतंत्र की पहचान हूँ मैं 

भारत का आम इन्सान एक मत दाता हूँ मैं .

कमजोरों बेबसों का सहारा हूँ मैं 
जनता का हथियार हूँ मैं 
नारी शक्ति का आत्मसम्मान हूँ मैं 
राजा हो या रंक सबके लिये एक समान हूँ मैं .

किसी के लिये रोशनी की किरण हूँ मैं 
दुष्टों भरष्टचारियों के लिये अन्धकार हूँ मैं 
आजाद गगन का पंछी हूँ मैं 
देश के गौरव की पहचान हूँ मैं .
स्वरचित :- रीता बिष्ट



@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ ना कोई शिकवा हैं ना कोई शिकायत हैं
कौन अपना हैं कौन पराया हैं 
सोचने की ये फुरसत नहीं 

दिल से तो सारा जहाँ अपना हैं .

आज वो आये बड़े वक्त बाद 
बैठे हम भी बड़ी फुरसत से 
बातें होगी दिल से दिल की 
एक दशक के बाद इश्क मोहब्बत की .

इतना आसान नहीं हैं 
हर दिल कागज पर लफ्जों को उतारना 
फुरसत के पल ढूँढने पड़ते हैं 
कभी खुद को अपनों से दूर करना पड़ता हैं कभी अपनों से फुरसत के लम्हें चुराने होते हैं.

कभी फुरसत मिले तो 
फिर से आ जाना बचपन की गलियों में 
मिल जाये फुरसत तो बचपन को फिर जीना हैं 



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मासूम अल्हड़ सी उम्र हैं 
दिमाग पर उम्र से ज्यादा भारी बोझ हैं 

जिंदगी में एक साथ कई उलझनें हैं 
लगता हैं नटखट बचपन शैतानी भरा बचपन गुम हैं .

मन को एक बार बचपन के दिमाग से मिलाकर तो देखो
एक बार बच्चा बनकर शैतानी करके तो देखो 
लुका-छुपी का खेल दोस्तों के संग खेलकर तो देखो
दुनियाँ की सबसे बड़ी दौलत मिल जायेगी .

मन दिमाग को एक मासूम बच्चा बनकर रहने दो 
हर फरेब तकलीफ से गुजर जाओगे 
मासूम बच्चे के मन में किसी से बैर नहीं होता हैं 
हर तरफ जिंदगी खुशी और प्यारी लगने लगेगी.
स्वरचित:- रीता बिष्ट

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ चलो एक साथ चलें हम 
होठों पर खुशियाँ जो लायें वो उगती प्रभात हैं हम 
एक दूसरे का अटूट साथ हैं हम 

एकदूसरे का आत्मविश्वास हैं हम .

हम दोनों का साथ और रिश्ता हैं बड़ा निराला 
जिंदगी भर का ये साथ जिसे दिल से हमने संभाला
साथ एक दूसरे के हम रहते ये हैं दस्तूर 
कभी हँसते कभी रोते फिर दूर भी कभी नहीं होते .

मुझे रिश्तों का भरे बाज़ार से कुछ नहीं लेना देना 
जिंदगी में तुम्हारा साथ मेरे लिये ये बहुत हैं 
तुम प्रेम से एक बार मुस्करा दो 
जिंदगी की धूप और छाँव में इतना काफी हैं .

तुम्हारे साथ मिल जाने से जिंदगी में बहार आई 
दिल की चाहतों को फिर मंजिल मिल गई 
पतझड़ में फिर से फूल खिल गये
तुम्हारा साथ मिल जाने फिर से नवजीवन मिल गया .
स्वरचित:- रीता बिष्ट

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कुछ तो लोक लाज शर्म कर लो 
ऐ देश की गद्दी पर बैठे विपक्ष के सत्ताधारी 
जो सैनिक राष्ट्र के लिये हुये कुर्बान 
उनकी कुर्बानी का मत करो ऐसे अपमान.

मत करो उन वीरों को अपमानित 
जिनके कतरे कतरे पर सम्पर्ण हैं निहित 
समस्त राष्ट्र जिन पर करता हैं अभिमान 
मत करो उन पर गलत शब्द बोलकर अपमान .

सेना और सैनिक का कर अपमान 
नेता अपने आप को समझते हैं बहुत महान 
उनकी वीरता को सरेआम करते हैं नीलाम 
भूल जाते हैं उनकी निःस्वार्थ देशभक्ति को देना मान .

छोड़ देते शब्दों के तीखे बाण 
करते हैं गली मोहल्ले तरीके की घटिया राजनीति 
भूल जाते मर्यादा और भाषा 
भूल जाते हैं सेना के परिवार का मान और सम्मान.

इस कुरीति को हमें रोकना होगा 
सेना और सैनिक के मान के लिये लड़ना होगा 
ऐसे लोगों को देशद्रोह के लिये जेल में भरना होगा 
इनको हमें फांसी के फंदे पर लटकाना होगा .
स्वरचित:- रीता बिष्ट


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जिंदगी का यही हैं एक उसूल 
संभलना भी खुद ही हैं 
गिरना भी खुद ही हैं 

फिर जिंदगी का एक फलसफा ढूँढना हैं .

इन्सान के जीने का भी अजब उसूल हैं 
दोस्त बना लेता हैं दिल में तस्वीर बना लेता हैं 
दुश्मन बना लेता हैं नजरों से उतार लेता हैं 
यही जिंदगी का दस्तूर उसूल हैं .

उसूल तो बहुत हैं जिंदगी के 
कभी डरकर जीना पड़ता हैं 
कभी मुस्करा कर चलना पड़ता हैं 
उसूल के नाम पर चलना ही तो जिंदगी हैं .
स्वरचित:- रीता बिष्ट


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अँधेरे से उजालों की ओर भी एक दुनियाँ हैं 
वहाँ भी खुशियों का एक प्यारा जहाँ हैं 
हौसलों के पंख तो फैलाओ हे राह के मुसाफिर 

जिंदगी में आगे बढ़ने का हर दिन एक नया मौका खड़ा हैं .

इस मौके को एक बार जरा आजमा कर तो देखो
एक मौके को एक बार पहचान लो जज्बे के संग 
जीने और उम्मीद के मिलेंगे कई रंग 
चलो फिर से ढूंढे आगे मौके और ढंग .

मौके बार बार नहीं मिलते हैं 
अनकही बातों को छोड़कर 
अब तो दो जिंदगी को एक नया अवसर 
चल पढ़ो जिंदगी का एक नये सफर .
स्वरचित:- रीता बिष्ट


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चलो युवा आगे कदम बढ़ाओ 
बुलंदियों पर रखो कदम 
ऊँचें नभ पर फैलाओ अपने पंख 

दिखाओ दो दुनियाँ को अपना दम.

बदल दो पवन के वेग को 
बदल दो सरिता की धारा को 
बदल दो पीढ़ियों से सड़ी गली विचारधारा को 
लिख दो मेहनत परिश्रम की नई कहानी को .

नव युग नव सृष्टि का करो आगाज 
दिनकर की किरणों संग लिखो खुद का भूत भविष्य 
ये मत सोचो कितनी कठिन हैं डगर 
हर दिन करो तय एक नया सफर .

बन जाओ आज के जागरूक युवा तुम 
क्रांति की लिखो एक नवीन अध्याय तुम 
मोदी और कलाम की तरह देश का बढ़ाओ मान 
भगत चंद्रशेकर सुभाष के सपनों के भारत का करो निर्माण .

रुको नहीं तुम झुको नहीं तुम 
चाहे राहें हो तूफानी या पथरीली 
हिम्मत धैर्य और वीरता की बनो मिशाल 
मिलकर चलो कदम आगे बढ़ाओ एक संग ताल से ताल .
स्वरचित:- रीता बिष्ट

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बेचैनी इस कदर थी दिल में हमारे 
खुद से ही खफा हो गये हम 
जब आती उनके आने की खबर 

आँखें बिछाये बैठे रहे राह पर हर पहर .

ख़बर हमें लगती कभी उनके आने की 
कभी उनके चले जाने की 
कभी उनका खत पढ़कर दिल को तसल्ली देते हम 
कभी खुद से रूठकर दिल को समझा लेते हम .

सब दिखावे का हाल पूछते हमारा 
कोई ना बन पाया हमारा सहारा 
कभी दिल से खबर पूछ लिया करो ऐ नादां इन्सान 
फिर कहते हो हमें ख़बर नहीं की .

ख़बरें ऐसे ही चलती रही
खबरों के सहारे एक रोज वो हमें मिले 
फिर से इश्क मोहब्बत हुई 
फिर से जिंदगी ख़बरों के सहारे आबाद हुई .
स्वरचित:- रीता बिष्ट
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टूट जाती हूँ जब दुनियां के फरेब से 
अपना ही अक्स ढूँढ लेती हूँ शीशे में
ना हमारी मोहब्बत में फरेब हैं ना धोखा

बस तुमने ही नहीं समझा ना हमें एतबार के लिये रोका .

इतने धोखे खाये हैं दुनियाँ में 
अब मोहब्बत में यकीन नहीं 
मैं खुद ही कश्मकश में हूँ 
मोहब्बत पर एतबार करूं कैसे .

ये धोखा करने वाले भी हुनर रखते 
कभी इस दिल से कभी उस दिल से खेलते हैं 
फिर भी मासूम बनकर चहेरा छुपाये फिरते हैं
हर दिन धोखे का एक नया चहेरा लगाये फिरते हैं .
स्वरचित:- रीता बिष्ट

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रात भर जागती रही मैं बेचैन आँखों से 
जाने किसकी याद मुझे सता रही थी 
बेचैन होकर चलकदमी करती रही हैं

कभी करवट बदल बदल कर सोचती रही .

तुम्हारे इश्क में गुमसुम सी रही ऐ नींद 
करवट बदल कर अपने दिल का इज़हार करती रही 
करवटों में उलझी ही रही मैं 
तुम्हारा चहेरा ख्वाब में ढूंढती रही.

मैं करवट बदलती रही रात से सुबह हो गई 
ना जाने कब दिल की बात आंसू में बह गई 
दिल का दर्द जबां पर आ गया 
दिल ने फिर से एक नई करवट ली .
स्वरचित:- रीता बिष्ट

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पुष्प सी कोमल काया
सबको देती हैं अपनी छाया 
शक्ति का नाम हैं नारी 

ममता क्षमा प्रेम का नाम हैं नारी .

प्रेम समर्पण अर्पण हैं नारी 
उदारता त्याग की परिभाषा हैं नारी 
जीवन में खुशियों की अमृत बरसाती नारी
जिसके कदमों में हैं दुनियाँ सारी.

शक्ति का अनुपम रूप हैं नारी 
बंजर धरा पर महकते फूलों की क्यारी हैं नारी 
अजेय हैं नारी जिस पर चलती हैं दुनियाँ सारी
संसार का मजबूत स्तम्भ हैं नारी .
स्वरचित:- रीता बिष्ट
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दिल में आज मेरी बहुत बेचैनी सी हैं 
तस्वीर तेरी देखी दिल को कुछ राहत मिल गई 
याद तेरी दिल में मेरे कुछ इस तरह से आई 

जिंदगी के बंजर रूह पर खुशियों की मुस्कान दे गई .

सब जिंदगी में खुशी का ही सुकून ढूँढ रहे हैं 
हर नई उम्मीद से ख़ुशी का पता पूछ रहे हैं 
बस दिल की राह और राहत को तलाश रहे हैं 
इसी सोच में जिंदगी जिये जा रहे हैं .

तुम मेरी जिंदगी का अहम हिस्सा 
तुम्हारी मेरी मोहब्बत का अजब हैं किस्सा 
आरजू हैं बस मेरे दिल की यही 
बनकर रहें हम हमेशा हमराही .
स्वरचित:- रीता बिष्ट

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@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ अपने घर में हम आज होली दिवाली ईद मना रहे हैं 
सरहद पर देश के जवान हरदम पहरा दे रहे हैं 
नमन मेरे देश के उन महान वीर बेटों को 

जो देश की खातिर हरपल अपना फर्ज निभा रहे हैं.

हर तूफ़ान हर डर को हँसते हँसते सह लेते हैं 
तपती धूप सर्द हवाओं में भी देश के प्रहरी बनते हैं 
अपने घर परिवार को छोड़ दिया हैं फर्ज की खातिर 
सरहद पर लुटा दिया हैं अपना समस्त जीवन .

बड़ी अजब कहानियाँ हैं सरहद पर वीरों की 
हो जाते हैं कुर्बान सीना तानकर 
इनकी देशभक्ति वीरता का हर कोई कायल हैं 
इनके जज्बे और वीरता के आगे दुश्मन भी घायल हैं .
स्वरचित:- रीता बिष्ट

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संकल्प दृढ़ विश्वास कर लो अपार 
ह्रदय से कर लो अथक प्रयास 
खुले नैनों से स्वपन देखो 

छू लो ऊँचा आकाश .

लक्ष्य पर निशाना साधो 
कभी ना हो ह्रदय से उदास 
नित संकल्प से करो दिवस की शुरुवात
करो लो ऊँचा मकाम बनकर निष्काम.

जीवन में कर लो संकल्प महान 
ह्रदय के संकल्प को रखना हैं सदैव बरकरार 
बिखर जाने के चाहे विकल्प हो हज़ार 
गिर कर भी संकल्प लेकर कदम आगे कदम बढ़ाना हैं हर बार .

संकल्प ही विजय का प्रथम कदम हैं 
उद्देश्य से मत भटको ऐ राह के पथिक 
राष्ट्र की कीर्ति को ऊँचा करने की तुम करो संकल्प 
लेकर ह्रदय में ढृढ़ अटूट ललक .
स्वरचित :- रीता बिष्ट .

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दय में जीत का जज्बा लेकर आई वीरों की सेना 
धरती गगन में गूँज उठी हैं शूरवीरों की जय घोष की 
विजयपथ पर चल पढ़े हैं देखो भारत माता के लाल 
युद्ध भूमि में करके आयेंगे कुछ कमाल .

मुख पर महाराणा प्रताप शिवाजी सा तेज हैं 
उनके हर प्रहार कुछ नवीन सा जोश हैं 
देखकर उनके अदम्य साहस को शत्रु कापें थर-थर
चल पड़े हैं लेकर जीत की पताका विजय पथ पर .

ये हिन्द के शेरों और शूरवीरों की सेना हैं 
शत्रु के खेमे में मचा हैं देखकर इनको कोलाहल 
मन में लिया हैं इन्होंने आज प्रण
या तो विजयपथ पर रखना हैं कदम या तो राष्ट्र को समर्पित करना हैं जीवन .
स्वरचित:- रीता बिष्ट

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याद आता हैं मुझे वो प्यारा बचपन 
जिसमें था कितना अपनापन 
मन में चाँद को छू लेने की आरजू थी 
ना हंसने और रोने की कोई वजह थी .

किस्से और कहानी में जिंदगी थी 
बेपरवाह बचपन में प्यारी ख़ुशियाँ थी 
वो बचपन की बेशकीमती ख़ुशी खो गई हैं 
किस्से और कहानियां एक ख्वाब सी हो गई हैं .

उदास हैं मेरे बचपन का वो मोहल्ला 
लुका-छुप्पी खेलने वाले बच्चे इंटरनेट में खो गये हैं 
फिर से थमा दो मुझे वो बचपन का बस्ता 
जिंदगी का बोझ बहुत बड़ा हो गया हैं .

झूठ बोलते थे पर दिल के सच्चे थे हम 
उन दिनों की बातें बड़ी प्यारी थी जब बच्चे थे हम 
कोई फिर से दे दो मुझे वो मासूम बचपन 
वो कागज की कश्ती वो रिमझिम बरसता सावन .

मुझे फिर से खेल खेलने हैं बचपन के खेल पुराने 
फिर से गाने हैं बचपन के प्यारे तराने 
जी भर के हँसना और मुस्कराना हैं फिर 
मुझे एक बार बचपन जीना हैं फिर.
स्वरचित:- रीता बिष्ट



तकदीर का हाल देखो मेरा 
कुछ ख्वाब टूट गये हैं 
कुछ अपनों ने तोड़ दिये 

कुछ हमें तकदीर के हवाले करके चले गये.

तकदीर भी देखो क्या कमाल करती हैं 
हर कदम पर एक नया रंग दिखाती हैं 
कभी हँसाती हैं कभी रुलाती हैं 
आसमान देने से पहले जमीन पर गिराती हैं .

नजर मेरी जमीं पर हैं 
उम्मीद की लहरों के सहारे खड़े हैं हम 
इंतजार हैं तकदीर मेरी बदल जायेगी 
कभी तो मेरी ये जिंदगी बदल कर नया रुख अपनायेगी.
स्वरचित:-रीता बिष्ट



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हर रिश्ता हम कुछ इस तरह से निभाते रहे 
दिल पर गहरी चोट खाकर भी मुस्कराते रहे 
अब नहीं सुननी हैं दिल की बात 

दिल की बात सुनकर हर रिश्ते में खा ली हैं मात.

जिंदगी के इस सफर में कई सबक सीखने बाकी हैं 
ठोकरे खाकर ही जिंदगी जीने का अंदाज बाकी हैं 
कुछ जिंदगी का दर्द सीखना अभी बाकी हैं 
दिल में एक और चोट खानी बाकी हैं .

जिनके दिल में चोट गहरी लगती हैं 
वो दिल से रोते हैं 
मेरे हालातों ने मुझे सिखाया हैं 
सपने टूटकर बिखर जाते हैं पर पूरे नहीं होते हैं .
स्वरचित,,:- रीता बिष्ट



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जीने की कला को जानने में 
हमने सारी जिंदगी बिता दी 
क्या जिंदगी के नये अनुभव से 

फिर मिल पायेगी हमे जिंदगी .

किसी के सहारे जिंदगी जीना बेकार हैं 
किसी से आस करना बेजार हैं 
दौलत से नहीं कला और कलाकार से प्रेम करो 
दौलत तो एक छलावा हैं कला और कलाकार ही अमिट हैं .

दिल की दुनियां से जुडी हूँ 
दिल को पाक साफ़ रखती हूँ 
फिर चाहे जिंदगी कितनी ही दर्दनाक क्यों ना हो 
हर दर्द को सहकर जिंदगी की कला सीखती हूँ .

दो कदम चलकर थक जाती हूँ 
फिर भी नई उम्मीद से आगे कदम बढ़ाती हूँ 
जीने की एक नई कला सबके दिल में जगाती हूँ 
मंजिल की चाह में फिर से कलाकार बनकर उभरती हूँ .

कलाकार हूँ शब्दों से कलाकृति बनाती हूँ 
जिनको सच्चे दिल और भावों से सजाती हूँ 
जिसमें किसी को मेरी कला और भाव नजर आते हैं 
किसी को बेकारी और नीरसता .

बिना किसी की परवाह किये 
हर भाव से अपनी कला को सजाती हूँ 
मन के कलाकार को हर पल जीना सिखाती हूँ 
जिंदगी को हर कदम एक नई कला और कलाकार से मिलाती हूँ .
स्वरचित:- रीता बिष्ट

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आजाद होना हैं हमें पिछड़ी रूढ़िवादी सोच से 
ऊँची उड़ान भरनी हैं हमें आसमान में 
ऊपर उठना हैं हमें सिसकती मानवता से 

एक नया सूरज उदय करना हैं हमें नवयुग में .

आजादी लानी हैं हमें खोखली मानसिकता से 
अपने जमीर को फिर से जगाना हैं 
सबके दिल में फिर से मानवता को लहराना हैं 
फरेब झूठ मक्कारी को सबके दिल से मिटाना हैं .

फिर से आदर्शशों की नींव को जगाना हैं 
फिर से मानवता को जग में जगाना हैं 
महक मानवता की फिर से सबके दिल में जगाना हैं 
कलयुग में फिर से आगाज करना सतयुग की मानवता का .
स्वरचित:- रीता बिष्ट

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उम्मीदों की गीली मिट्टी पर 
कदम मेरे हर बार फिसलते रहे 
अश्क कहर बनकर हर बार गिरते रहे 

फिर भी उम्मीद का दामन मैं थामे रही .

हर इन्सान मिट्टी का खिलौना हैं 
सबको मिट्टी में मिल जाना हैं 
इस मिट्टी की देह को मिटटी में जाना हैं 
ये जानकर हर इन्सान फिर भी अनजाना हैं .

ना जाने कैसी हैं ये मिट्टी की सौंधी सी महक 
कभी बचपन की प्यारी यादों जैसी 
कभी बीते हुये यादों और मन की कल्पना जैसी 
कभी धुंधली यादों की पोटली जैसी .

मेरी तो बस इतनी सी हैं पहचान 
दिल में मेरा समस्त हिन्दुस्तान 
मिल जाये मेरा तन ये जब मिट्टी में 
कफ़न हो मेरा तिरंगे में लिपटी हो तन में मिट्टी वतन की .
स्वरचित:- रीता बिष्ट


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यादों का कोई मोल नहीं होता हैं 
जो बीत गया पल वो अनमोल होता हैं 
बस बंद आँखों में उसका अहसास होता हैं 

दूर होकर भी वो पल कुछ ख़ास होता हैं .

हमारे पास यादों का पिटारा कुछ ख़ास हैं 
जो हर पल मन के पास हैं 
बीते पल की वो बातें हैं कितनी प्यारी 
जिसमें हैं खुशियाँ सारी.

पुराने साल के साथ दिन बीते गये
अपने प्यारे अजीज रिश्तें कहीं दिल में रह गये
मुलाक़ात हो ना हो पर उनकी सूरत आँखों में हैं 
कभी ख़ुशी में कभी गम में हम उनको याद कर ही लेते हैं .

बीते साल की यादों का बसेरा आँखों में हैं 
कल एक नये साल का सवेरा आने वाला हैं 
बीते साल की बातों में आपका साथ था 
उम्मीद हैं ये साथ हमेशा संग रहे
नववर्ष की हार्दिक बधाई सभी को .
स्वरचित:- रीता बिष्ट





नजरों से नजरें मिलाकर किया तुमने हमें घायल 
अपनी मदहोश अदाओं का हमें बना दिया कायल 
मेरी वफ़ा का बहुत खूब फर्ज निभाया तुमने 

दिल हमारा लेकर बीच राह में तड़पता हुआ हमें छोड़ दिया .

अजीब सी वीरानी थी तुम्हारे दिल की गली में 
देखते रहे हम हैरत और परेशां होकर 
बेचैन होकर नाम तुम्हारा लेते रहे 
दिल भी टूटकर हमारा चकनाचूर हो गया किसी को टूटने की आवाज भी नहीं आई .

दिल की बात हैं सबसे अलग और निराली 
सूरत से नहीं अल्फाज से मोहब्बत करती हैं 
सूरत का क्या वो तो वक्त की आँधी में बदल जाता हैं
पर दिल के अल्फाज तो हमेशा दिल में उतरकर हर दिल में अपना आशियाँ बना लेते हैं.

हमारे दिल की गहराई में मत डूब जाना 
मासूम सा दिल हैं हमारा कभी खिलवाड़ ना करना 
तुम पर बेइंतहा ऐतबार हैं हमें 
दिल हमारा तोड़ ना देना .
स्वरचित:- रीता बिष्ट


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शहर की उजली रोशनी मुझे बेकार सी लगती हैं 
वैसे तो खुला खुला सा हैं शहर का सारा उन्मत गगन 
फिर भी दिल में कुछ उदास सा लगता हैं 

ये शहर की भीड़ भाड़ मुझे बंद किवाड़ सी लगती हैं .

इस चकाचौंध में जिंदगी जंजीर जकड़ी कैद सी लगती हैं
बंद किवाड़ में मन की हसरत बाढ़ में डूबी हुई लगती हैं 
उलझा हुआ हैं मन मेरा ना जाने ऐसे क्यों 
बंद किवाड़ में खुशियाँ मेरी उजाड़ सी लगती हैं .

कहने को खुशियाँ हैं जमाने भर की 
लेकिन ख़ुशी का वास्तविक किवाड़ बंद हैं 
संग हैं सब अपने मेरे साथ कदम कदम चलने को 
पर बेबस और बेखुदी का किवाड संग लेकर .

लगता हैं जिंदगी की किवाड़ मुझे राह में भूल गई हैं 
मैं उसकी गलियों से गुजरती हूँ जिंदगी की चाह में 
मैं उसकी दहलीज पर ख़ुशी की चाह में दस्तक देती हूँ 
वो हर बार मुझे राह में छोड़कर किवाड़ बंद कर देती हैं .
स्वरचित :- रीता बिष्ट


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मैं छोटा सा दीपक हूँ 
जलता हूँ घर की दहलीज पर अँधेरा मिटाने के लिये.


मैं दीपक हूँ दुश्मनी मेरी अंधेरों से 
फिर भी हवायें दुश्मनी निभाती हैं मुझसे 
ना जाने क्यों .

कभी मेरी बाती जलती हैं इधर कभी उधर 
कभी गुजर जाता हूँ मैं भयंकर तूफ़ान से कभी बुझ जाता हूँ एक ही झोंके में .

मैं दीपक हूँ रोशनी हूँ घर द्वार का 
आफताब और पहरेदार हूँ परिवार का .

दिन भर तुम उजालों में रहते हो 
रात को मैं ही तुम्हारी अँधेरे घर का उजाला हूँ .

प्रेम से फूंक मारो तो बुझ जाता हूँ 
नफरत से तो और भयानक बन जाता हूँ .

दिन के उजालों में मुझे भूल ना जाना 
रात की ख़ामोशी में तुम्हें मेरी ही ज़रूरत होगी .
स्वरचित :- रीता बिष्ट


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दिल की बात को हमने कोरे कागज पर लिख दिया 
खामोश भी रहे और बहुत कुछ कह भी दिया .


ये ज़रूरी नहीं हैं हर बात जबां से की जाये 
ख़ामोशी भी कभी कभी दिल की बात बयां कर देती हैं .

मोहब्बत की गलियों में जिस दर्द-दे दिल 
ने कोहराम मचाया था 
बेवफा होकर वो दिल खामोश हो गया .

उसने जब अपने इश्क का ईजहार किया 
तब हमारे लबों में ख़ामोशी छा गई .

हमारी इस ख़ामोशी का दुनियाँ वालों 
ने ऐसा तूफ़ान मचाया 
हमारी ख़ामोशी ही इश्क की गलियों में बदनाम हो गई .

हमने जो किया खामोश होकर किया 
हमारी ख़ामोशी ही इश्क का अल्फाज बन गई .

खामोश होकर कुछ कह भी नहीं पाये
और उनके इश्क में ख़ामोशी से दूर हो गये.

उनकी जुदाई के गम में हमने अश्क बहाये
खामोश होकर हर दर्द को सहा.

दिल भी टूटा हमारा जब वो किसी और के हो गये
हमारी ही ख़ामोशी ही हमारी दुश्मन बन गईं और 
दर्द ख़ामोशी का हमें उम्र भर का दे गईं.
स्वरचित: - रीता बिष्ट


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 दिल में बसी हैं कुछ यादें 
कुछ बातें कुछ मुलाकातें 
कुछ बिन बादल बरसातें 

कुछ दिन और रातें .

कभी याद आती हैं बचपन की बातें 
कभी दिल को भावुक कर जाती हैं वो प्यारी यादें जिन्हें सुनाते हैं हम खुशी से अपने बच्चों को 
उन यादों में होता मासूम बचपन .

बचपन की यादें कितनी प्यारी थी 
लगता था मुठ्ठी में जीवन की खुशियाँ सारी थी 
वो कल्पना के पंख लगाकर बेखौफ उड़ना 
वो दोस्तों के संग हर बात पर खुश होना कभी लड़ना .

यादें होती हैं अनमोल 
दिल में रहती हैं हरदम बातें और यादें बनकर 
दिल की डोर से होता हैं उनका बंधन 
जिंदगी के साथ चलती हैं हर कदम .
स्वरचित :- रीता बिष्ट


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कल्पना की कलम से दिल में ख्याल आया 
उनको कलम की स्याही से कागज में लिख उतार दिया .


कभी मन की कल्पना को बयां कर दिया 
कभी कल्पना की उड़ान से एक नई कहानी लिख दी .

कुछ दिल के अहसास लिख दिये
कुछ मन में उठे कल्पना और ख्याल लिख दिये.

सब कहते हैं मैंने तो कल्पना से दिल 
भरे जज्बात लिख दिये
कुछ कहते हैं मैंने जिंदगी के कुछ ख़ास लम्हें
लिख दिये.

मैंने तो बस मन की कल्पना से कुछ अरमान लिखे 
सबने जिसे सराहा मन से 
दिल में मेरी कल्पना को एक नया आयाम दिया 
सबने अपने सच्चे मन से .
स्वरचित:- रीता बिष्ट




धरा हमारी कितनी प्यारी 
जिसमें हैं हमारी ख़ुशियाँ सारी
प्यारी सी हैं हरियाली 

प्रकृति में हैं छाई हैं फूलों की क्यारी.

कहीं हैं सुन्दर पहाड़ पर्वत 
कहीं हैं हरे भरे वृक्ष
कहीं हैं बहती जीवनदायनी बहती सरिता और झरने
कहीं हैं खूबसूरत प्यारे पंछी और वन्य जीव .

लेकिन आज का मानव
बन गया हैं दानव
लोभ लालच में आकर 
नष्ट कर रहा हैं अनमोल प्रकृति को .

जंगल काट कर रहा हैं बेखौफ होकर 
जिससे कहीं भूकंप कहीं बाढ़ का हो रहा हैं आगाज 
मानव जीवन बन रहा हैं बेहाल 
जीवन हो रहा हैं बेहाल .

रोक लो इस महाकृत्य को 
रोक लो इस तूफ़ान बर्बादी को 
प्रकृति हैं हमारी माँ 
जीवन देती हैं हमें.

इसे रखो संजो कर
आने वाली पीढ़ी के लिये
खिलकर इसे फिजा में 
बिखरने दो .
स्वरचित:- रीता बिष्ट

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नारी और पत्थर 

नारी हूँ मैं जगत जननी हूँ कई रूप हैं मेरे 
पर पत्थर की मूर्त बनकर सदियों से समाज के बंधन से जकड़ी हूँ मैं 
हर पीड़ा और दर्द को सहना आदत हैं मेरी 
तभी तो पत्थर की बुत प्रतिमा बनकर खड़ी हूँ .

जिन्दा लाश बनने से पत्थर की बनना बेहतर हैं 
क्योंकि जीवित होने पर मवेशी से दुर्दशा मेरी बत्तर हैं 
मंदिर में देवी की प्रतिमा बनकर पूजी जाती हूँ 
हर दुःख दर्द और प्रताड़ना से दूर रहती हूँ .

अपने नैनो के अश्क खुद ही पीती हूँ 
हर पल घुट-घुट कर जीती और मरती हूँ 
हर दिन ह्रदय में एक नया भारी पत्थर रखती हूँ 
दुनियाँ के हर नये रंग में मजबूर होकर ढलती हूँ .

शिल्पकार की कला से पत्थर से तरासी जाती हूँ 
उसके हस्त कौशल से नये रूप रंग में उभरती हूँ 
पत्थर की मूर्त बनकर मंदिर की शोभा बनती हूँ 
खण्डित होकर एक दिवस मिट्टी में मिल जाती हूँ .
स्वरचित:- रीता बिष्ट

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हिन्द देश के हैं वासी हम 
हिंदी भाषी हैं हम 
हिंदी की बोली हमारी 

हैं बहुत ही मीठी और प्यारी .

हिंदी हैं हमारी विरासत हमारी पहचान 
हिंदी बोलना हैं हमारी हैं शान 
अपनी मातृभाषा पर हम सबको हैं बहुत अभिमान 
हिंदी भाषा हैं जग में सबसे महान .

हिंदी के कई रूप अवधी बघेली ब्रज 
कई हैं इसके स्वरूप 
महान ज्ञानियों ने लिखे इस भाषा में पुराण 
ऋषियों मुनियों और वेदों की हिंदी ने जग में कराई पहचान .

हिंदी की कथा कहती हैं कई कहानियाँ
दादा दादी नाना नानी की जबानियाँ
हिंदी का फैला हैं विश्व स्वरूप 
देश विदेश में हिंदी ने फैलाया हैं डंका.

हिंदी भाषा पर हमे हैं गर्व 
हमें हैं फक्र हिंदी भाषा पर 
आओ जन जन से हिंदी की पहचान कराये 
अपनी भाषा को विश्व में सबसे अलग पहचान दिलाएं.
स्वरचित :- रीता बिष्ट

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रूठी हैं ये जिंदगी 
मना हम लेंगे 
बस साथ मेरा बनाये रखना .

दिल के बंधन से हम तुम्हें बाँध ही लेंगे .

हमारी बातों से बिखर ना जाना 
हमारी हर बात को दिल ना लगाना 
तुम्हारी चाहत ही मेरी जिंदगी हैं 
इस अटूट बंधन को बस दिल से निभाना.

रिश्ता हैं जन्मों का मेरा तुम्हारा 
भरोसा हैं प्यार भरा 
चलो छोड़कर बन जायें एक दूसरे का सहारा 
एक हो जायें छोड़कर जग सारा .

बंधन ये अटूट हैं 
बंधन हैं ये गहरा 
सारे छोड़कर गिले शिखवे 
एक होकर जोड़ ले ये बंधन 
स्वरचित :- रीता बिष्ट







कदम कदम बढ़ते जाओ 
धैर्य और संतोष से जीवन को ख़ुशी से सजाओ .


हिम्मत और हौसलों से आगे बढ़ते जाओ 
पर चहेरे पर धैर्य और मुस्कान सजाओ .

राह में हर कठिन डगर को पार कर जाओ 
पर धैर्य और जज्बे के संग चलते जाओ .

मंजिल को पाने की कामना मन में ठानों
पर धैर्य रूपी ज्ञान को अपनी ताकत बनाओ .

हैं इतिहास साक्षी जिन्होंने धैर्य की नाव पर पग रखा 
उन्होंने हर कठिन डगर को पार कर मंजिल को पाया .

धैर्य को बना लो अपना साया 
फिर देखो कैसे मिलती हैं मंजिल की डगर .
स्वरचित:- रीता बिष्ट

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भारत देश की क्या कहूं कथा जबानी 
मेरा देश हैं सबसे अलग और जुदा हैं इसकी कहनी.


ऊँचा हिमालय शीश झुकाता 
विशाल सागर इसके पग पखारता .

अलग अलग हैं यहाँ की वेश-भूषा 
अलग अलग हैं बोली भाषा .

अनेकता में एकता का हैं प्रतीक देश मेरा 
सबसे निराला हैं देश हैं मेरा .

विश्व में सबसे अलग पहचान हैं इसकी 
सबसे जुदा शान हैं इसकी .

तीन रंग का तिरंगा हमारा प्यारा 
जो सारे जग से न्यारा .

मोदी कलाम योगी नानक भगत की धरती हमारी 
जिनके आगे नमस्तक हैं दुनियाँ सारी.
स्वरचित:- रीता बिष्ट




नाम था अटल 
ह्रदय के थे सजल 
गीत नये युग के गाते थे 

दिल में सबके बस जाते थे .

कुशल राजनीतिज्ञ देश के रत्न 
दिल में था जिनका सबके लिए अपनापन 
विशाल ह्रदय सम्राट महान कवि 
सबके दिलों में बसा लेते थे अपनी छवि .

ग्वालियर के नौ निहाल 
अटल जी थे बेमिशाल 
करूँ मैं उनको वंदन 
अर्पण करूँ उनको श्रद्धा सुमन .
स्वरचित :- रीता बिष्ट

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ह्रदय में समाई हैं विशाल अपेक्षायें
गोते लगा रही हैं ह्रदय के भवसागर में .


बूँद-बूँद बनकर मचल रही हैं ह्रदय की अपेक्षायें
मन के द्वार पर बनकर सायें की तरह .

छोटा सा ह्रदय हैं पर विशाल हैं अपेक्षायें
कभी तो पूर्ण होगी मन की अभिलाषायें .

दिनकर की राह चली हूँ पूरी करने ह्रदय की अपेक्षायें
पूनम के चाँद की तरह मन मस्तिष्क में समाई हैं अनन्त कामनायें.

गगन को छूने की कभी हैं अपेक्षायें
कभी तितली बनकर उडने की .

प्रकृति की हरियाली में खो जाने की 
कभी पंछी बनकर उड़ने की .

दिल में समाई हैं अनन्त अपेक्षायें
अनंत अभिलाषाये.
स्वरचित:- रीता बिष्ट

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कोरे कागज़ पर कलम के अल्फाजों से 
दिल के अरमान लिखती हूँ 
कुछ जिंदगी के नये अफ़साने कुछ तराने के 
कुछ गीत गजल लिखती हूँ .

कलम से कभी प्रकृति की हरियाली कभी 
नभ में उड़ते चहकते पंछियों की आवाज 
लिखती हूँ .

कभी किसी का कभी अपना दर्द 
कभी ख़ुशी दिल की कलम से 
बयां कर अपने जज्बात लिखती हूँ .

कभी अपना बच्चपन कभी अपने बच्चों 
का बच्चपन लिखती हूँ कभी गीत कभी 
गजल कभी कोई कहानी कोई कविता 
दिल की कलम से लिखती हूँ कभी आने 
वाले कल के नये अरमान लिखती हूँ .

जो भी लिखती हूँ दिल से निष्काम 
भाव से लिखती हूँ .
स्वरचित :- रीता बिष्ट
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 ईश्वर हैं एक धरती हैं एक 
अम्बर हैं एक खुशियाँ हैं अनेक .


सबको बनाने वाला ईश्वर हैं एक 
ईश्वर की महिमा हैं बड़ी प्यारी 
जिसके दिल में हैं खुशियाँ सारी.

निराकार रूप हैं जिसका 
ह्रदय की धड़कन में आवाज हैं उसकी 
हर रूप में ईश्वह का रूप बसता हैं .

कभी प्रकृति में कभी पंछियों की चहक में 
कभी मासूम बच्चपन में कभी किसी के 
ईमान में कभी किसी के फरेब में .

पहचान लो ईश्वर के स्वरूप को 
अच्छे रूप में उसका गुणगान करो 
उसकी भक्ति में ढल जाओ सबकी 
नैया को पार लगाने वाला ही 
ईश्वर हैं .
स्वरचित:- रीता बिष्ट

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
पहले किसी के संदेश खत का रहता था इंतजार 
जिसमें था सच्चा प्यार ख़ुशी थी बेशुमार.

अब तो खत संदेश सबको लगता हैं बेकार 
व्हाट्सप्प फेसबुक ने कर ली जिसकी जगह 
अख्तियार.

वो भी क्या दिन जब सबको संदेश खत का इंतजार था


 बहन को भाई माँ बाप के संदेश का इंतजार था .

दिल में सच्चे जज्बात संदेश रूपी प्यार था 
वक्त की आँधी ने सबको उड़ा दिया हैं .

जिंदगी को एक नये मोड़ पर खड़ा कर दिया है 
जिसमें सिर्फ दिखावे का प्यार हैं .
# रीता बिष्ट


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
बहुत खूबसूरत होती यादों की कसक 
बहुत प्यारी होती हैं यादों की अनमोल महक .


महक तो जिंदगी में बसी हैं ऐसे 
जैसे जिंदगी का साया साथ चलता हैं .

कभी बच्चपन की यादों की महक 
कभी यौवन की यादों की महक .

कभी ना भूलने वाले अनमोल यादों की महक 
जिस महक में कभी अपनों का साथ तो कभी 
अपनों की याद होती हैं .

महक कभी खूबसूरत यादों की होती हैं 
कभी प्यारी बातों की .
स्वरचित :- रीता बिष्ट


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ हर पल एक नये सफर में जिंदगी चलती हैं 
कभी ख्वाब सजाती हैं कभी हकीकत बयान 
करती हैं .


जिंदगी के हर पल हर मोड़ में एक नया
रंग दिखता हैं कभी ख़ुशी आती हैं कभी 
तन्हाई कभी रुस्वाई .

हर पल जिंदगी को जिओ नये अन्दाज में 
कल में नहीं जिओ आज में जिओ अपने ख़ुद
के अंदाज में जिओ .
# स्वरचित रीता बिष्ट


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
रिमझिम-रिमझिम हुई बरसात 
सभी खुशियों के संग नाचने लगे एकसाथ .


मयूर और मोरनी मस्त होकर करने लगे नृत्य 
कोयल मस्त होकर गाने लगी मन मीत .

सूखी बंजर धरती हुई हरी भरी 
रिमझिम बरसात की देखो कैसे झड़ी लगी .

घुमड़-घुमड़ कर बादल गरजे 
फिर बरखा रानी रिमझिम-रिमझिम बरसे .

कितनी प्यारी हरी भरी लगी ये धरती 
रिमझिम बरखा के आने से फिर लगे 
नव यौवन सी ये धरती .
स्वरचित:- रीता बिष्ट

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
जीवन खुशियों का मेला हैं 
पल दो पल का झमेला हैं 
कभी इन्सान सबके संग हैं तो 

कभी अकेला हैं .

छोड़ दो गमों को भूल जाओ जीवन की परेशानियाँ
मुस्करा कर गीत ख़ुशी के गाओ 
जीवन में ख़ुशी के साज सजाओ 
कल क्या होगा मत सोचो 
बस आज ख़ुशी मनाओ .
स्वरचित:- रीता बिष्ट



@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
कभी जमीं कभी आसमां हैं पिता 
एक हिम्मत एक हौसला हैं पिता .


जीवन की कठिन राह में देता 
सहारा हैं पिता .

धूप में छाँव की तरह 
रेगिस्तान में गाँव की तरह 
एक मजबूत ढ़ाल हैं पिता हैं .

एक कठिन परिश्रम एक समर्पण 
का नाम हैं पिता जीवन में हमारे 
सपनों में उड़ान भरने का 
नाम हैं पिता .
स्वरचित:- रीता बिष्ट


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ जीवन में दायित्व कई पड़े हैं 
तभी तो हम राहों में खड़े हैं .


मुश्किल हैं ये राहों का सफर 
जिसमें कभी दिन हैं तो कभी पहर.

जिंदगी में सब रिश्ते निभाना भी एक कला हैं 
कोई इसमें माहिर तो कोई निर्बल अकेला हैं .

हर मोड़ पर जिंदगी चलती हैं दायित्व से 
कभी माता-पिता का दायित्व बनकर 

कभी पुत्र पुत्री का दायित्व बनकर 
जो भी हो दायित्व दिल से निभाओ ईमानदारी 
से निभाओ .

दायित्व में हर दायित्व को अपना फर्ज 
और कर्ज मानकर निभाओ.
स्वरचित:- रीता बिष्ट

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
जिंदगी की राहों के मुसाफिर हैं हम 
कभी यहाँ ख़ुशी हैं तो कभी गम .


हर दिन जिंदगी की राह में एक नई कहानी हैं 
कुछ समझदारी कुछ नादानी हैं .

चल मुसाफिर बेफिक्र होकर मंजिल की राह पर 
मत सोच विचार क्या होने वाला कल .

जिंदगी जीने का का नाम 
यहाँ बस हर दिन एक नया मुकाम हैं कभी सुबह कभी शाम.

मुसाफिर बनकर जीना कहाँ आसान हैं 
जिंदगी में हर पल जिंदगी में एक नया इम्तिहान हैं .
स्वरचित:- रीता बिष्ट

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

राह का भटका हुआ मुसाफिर हूँ मैं 
हर कदम आगे बढ़ते जाता हूँ .


मंजिल की तलाश में हर दिन एक नया ख्वाब सजाता हूँ 
आँखों में मंजिल की हर दिन एक नई हैं .

लगता कभी मंजिल कभी दूर तो कभी पास हैं 
फिर भी मंजिल को पाने की हर दिन एक नई आस मन में जगाता हैं .

मंजिल को पाने की तलाश हैं 
ह्रदय में कुछ कर गुजरने की प्यास हैं 

आखिरी मोड़ तक राह में चलकर 
मंजिल को बस पाने की चाह हैं .
स्वरचित:- रीता बिष्ट


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
त्यौहारों का मेरा देश 
अनेक भाषायें अनेक वेश .


अटूट दाग़ों का मिलन 
भाई बहन का रक्षा बंधन .

आस्था भक्ति और विश्वाश का पर्व
मेरा देश हैं त्यौहारों का महापर्व.

कभी खुदा की ईदी हैं 
कभी राम की लीला हैं .

कभी कृष्ण की भक्ति में समाई
जन्मआष्ट्मी हैं 

कभी होली कभी दिवाली
मेरे देश की हर बात मतवाली हैं .
स्वरचित:- रीता बिष्ट

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ जिजीविषा खो गई हैं मन में
ढूँढ रही हूँ कहीं उसे मन के आशियाने में.


हर पल इंतजार हैं मुझे इसका 
ह्रदय के तहखाने में .

गीत गजल गाती हूँ जिजीविषा के हर दिन 
कभी तो मिलेगी मुझे जिजीविषा एक दिन .

मैंने ख्वाब देखे हैं जिजीविषा भरे मन के दर्पण में 
कभी तो पूरे होंगे दिल के अंतर्मन में.

नैनों में ख्वाब सजाये हैं जिसके 
लौट कर एक वापस तो आएंगे .
स्वरचित:- रीता बिष्ट


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
कदम कदम बढ़ते जाओ 
धैर्य और संतोष से जीवन को ख़ुशी से सजाओ .


हिम्मत और हौसलों से आगे बढ़ते जाओ 
पर चहेरे पर धैर्य और मुस्कान सजाओ .

राह में हर कठिन डगर को पार कर जाओ 
पर धैर्य और जज्बे के संग चलते जाओ .

मंजिल को पाने की कामना मन में ठानों
पर धैर्य रूपी ज्ञान को अपनी ताकत बनाओ .

हैं इतिहास साक्षी जिन्होंने धैर्य की नाव पर पग रखा 
उन्होंने हर कठिन डगर को पार कर मंजिल को पाया .

धैर्य को बना लो अपना साया 
फिर देखो कैसे मिलती हैं मंजिल की डगर .
स्वरचित:- रीता बिष्ट


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भारत देश की क्या कहूं कथा जबानी 
मेरा देश हैं सबसे अलग और जुदा हैं इसकी कहनी.


ऊँचा हिमालय शीश झुकाता 
विशाल सागर इसके पग पखारता .

अलग अलग हैं यहाँ की वेश-भूषा 
अलग अलग हैं बोली भाषा .

अनेकता में एकता का हैं प्रतीक देश मेरा 
सबसे निराला हैं देश हैं मेरा .

विश्व में सबसे अलग पहचान हैं इसकी 
सबसे जुदा शान हैं इसकी .

तीन रंग का तिरंगा हमारा प्यारा 
जो सारे जग से न्यारा .

मोदी कलाम योगी नानक भगत की धरती हमारी 
जिनके आगे नमस्तक हैं दुनियाँ सारी.
स्वरचित:- रीता बिष्ट


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ ह्रदय में समाई हैं विशाल अपेक्षायें
गोते लगा रही हैं ह्रदय के भवसागर में .


बूँद-बूँद बनकर मचल रही हैं ह्रदय की अपेक्षायें
मन के द्वार पर बनकर सायें की तरह .

छोटा सा ह्रदय हैं पर विशाल हैं अपेक्षायें
कभी तो पूर्ण होगी मन की अभिलाषायें .

दिनकर की राह चली हूँ पूरी करने ह्रदय की अपेक्षायें
पूनम के चाँद की तरह मन मस्तिष्क में समाई हैं अनन्त कामनायें.

गगन को छूने की कभी हैं अपेक्षायें
कभी तितली बनकर उडने की .

प्रकृति की हरियाली में खो जाने की 
कभी पंछी बनकर उड़ने की .

दिल में समाई हैं अनन्त अपेक्षायें
अनंत अभिलाषाये.
स्वरचित:- रीता बिष्ट

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
गीत खुशियों के मैं गाने लगी हूँ 
जबसे तुम जिंदगी में आये हो .


कभी गुनगुनाने लगी हूँ गजल 
कभी गीत कभी कोई काफिया .

मन हो रही हैं उथल पुथल 
कैसी हैं ये अजब हलचल .

मन मेरा बावरा हुआ जाये 
कभी गीतों के राग गुनगुनाये .

कभी गीत संगीत की 
दुनियाँ में खो जाये 
हर पल एक नई कहानी सुनाये .

कर्णप्रिय गीत का मेरा 
एक जहाँ बन गया हैं 
जहाँ मैं और मेरे गीतों की 
अपनी ही यादें और बातें हैं .
स्वरचित:- रीता बिष्ट


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ सृष्टि का करते हैं ईश्वर सृजन 
तभी नव निर्मित होते हैं धरती गगन 
सृजन की लीला न्यारी 

जग में सबसे अलग और प्यारी .

सृजन का रूप कण कण में 
मानवता के हर पग पग में 
माँ पिता का प्रेम हैं संतान में सृजन 
प्रकृति का मनोहारी रूप हैं सृजन .

सागर की लहरों में सृजन 
लता की शाखाओं की सृजन .

मन में होती हैं हर पल सृजन 
सम्पूर्ण विश्व हैं एक सृजन .
स्वरचित :- रीता बिष्ट

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

इन्सान में इंसानियत मिट गई हैं 
साये हैं इन्सान के पर इंसानियत की आत्मा मर गई हैं .


चंद सिक्कों में इंसानियत बिक रही हैं भरी महफ़िल में बेगैरत होकर 
फिर भी सीना तानकर अपने आप को इन्सान बता रहे हैं.

इन्सान का वजूद जीते जी कब्र में दफन हो गया हैं 
आदमी की इंसानियत जीने से पहले ही मर गई हैं .

इस दुनियाँ में इंसानियत शर्मसार हैं 
यहाँ तो अपनों को छोड़कर सबको गैरों पर ऐतबार हैं .

अपनों से नहीं रुतबे शोहरत दौलत से रिश्ते निभते हैं 
ऐसे यहाँ दुनियाँदारी चलाई जाती हैं .

प्रेम अपनापन का कोई मोल नहीं 
बस शर्तों पर हर रिश्ते निभाये जाते हैं.

यहाँ दूसरों को नीचे गिराकर इंसानियत निभाई जाती हैं 
ऐसे ही दुनियाँ को एक नई रीत समझाई जाती हैं .

स्वरचित:- रीता बिष्ट

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
नारी की महागाथा करूं मैं क्या गुणगान 
नारी की ममता इस सृष्टि में सबसे महान .


कभी माँ बनकर ममता लुटाती 
कभी जीवन संगिनी बनकर पति का हर पग साथ निभाती.

कभी बहू कभी बेटी बनकर साथ
निभाती 
चाहे तपती धूप हो या गर्म रेतीली 
हवा का झोंका पर कभी हिम्मत नहीं हारती .

नारी का जीवन क्या हैं आसान 
हथेली पर हर कदम रखनी होती जान .

नारी का जीवन हैं एक त्याग तपस्या
जिसमें हर पल एक नया अनुराग हैं एक नई समस्या .

दिल का उजाला सपने बुननेमें बीत गया 
रात्रि संतान को लोरी सुनाने में जिस घर को 
मकान से घर बनाया उस घर में मेरे नाम का
जिक्र भी ना था . 

हर कदम कुर्बान होती हूँ 
हर कदम दुःखों के भवसागर फिर भी कर जाती हूँ .

नारी हूँ जीना चाहती हूँ 
किसी मंदिर के देवी की तरह पूजे जाने 
की चाह नहीं अपने वजूद आत्मसम्मान 
के संग पहचान बनाना चाह हैं मेरी .

स्वरचित:- रीता बिष्ट


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
मुरलीधर की महिमा सबसे प्यारी 
जैसे महकते फूलों की सुगंध प्यारी 
कभी ग्वाल न संग गैया चऱायें

कभी नटखट बनकर माखन चुरायें.

मैया यशोदा बाबा नंद के हैं 
आँखों के तारे
सारे गोकुल के हैं राज दुलारे 
यमुना तीरे बंसी बजैया 
अपनी ताल धुन पर सबको नचैया.

मेरे कान्हा की सावंली मोहक छवि अति प्यारी 
ब्रज की सारी गोपियाँ कान्हा के रूप पर बलिहारी
कानों में कुंडल सिर पर मोर मुकुट पैरों में नूपुर साजे
अधरों में मोहक मुस्कान संग मुरली बाजे .

कभी नटखट बनकर मैया यशोदा को सताये 
कभी नटखट बनकर घर घर जाकर माखन चुराये
कभी मधुबन में राधिका संग रास लीला रचाये 
कभी चितचोर बनकर गोपियों का ह्रदय चुराये.

कभी वासुदेव कृष्ण का रूप धरकर पार्थ को 
गीता ज्ञान दियो 
कभी सारथी बनकर महाभारत की महागाथा 
में पार्थ को ज्ञान और ध्यान का पाठ पढायो.

गिरधर की हर महिमा हैं प्यारी 
समस्त सृष्टि में हैं न्यारी 
कृष्ण में समाई हैं धरा सारी
जय हो गिरधर मुरारी .
स्वरचित:- रीता बिष्ट


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रूठी हैं ये जिंदगी 
मना हम लेंगे 
बस साथ मेरा बनाये रखना .

दिल के बंधन से हम तुम्हें बाँध ही लेंगे .

हमारी बातों से बिखर ना जाना 
हमारी हर बात को दिल ना लगाना 
तुम्हारी चाहत ही मेरी जिंदगी हैं 
इस अटूट बंधन को बस दिल से निभाना.

रिश्ता हैं जन्मों का मेरा तुम्हारा 
भरोसा हैं प्यार भरा 
चलो छोड़कर बन जायें एक दूसरे का सहारा 
एक हो जायें छोड़कर जग सारा .

बंधन ये अटूट हैं 
बंधन हैं ये गहरा 
सारे छोड़कर गिले शिखवे 
एक होकर जोड़ ले ये बंधन 
स्वरचित :- रीता बिष्ट

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हिन्द देश के हैं वासी हम 
हिंदी भाषी हैं हम 
हिंदी की बोली हमारी 

हैं बहुत ही मीठी और प्यारी .

हिंदी हैं हमारी विरासत हमारी पहचान 
हिंदी बोलना हैं हमारी हैं शान 
अपनी मातृभाषा पर हम सबको हैं बहुत अभिमान 
हिंदी भाषा हैं जग में सबसे महान .

हिंदी के कई रूप अवधी बघेली ब्रज 
कई हैं इसके स्वरूप 
महान ज्ञानियों ने लिखे इस भाषा में पुराण 
ऋषियों मुनियों और वेदों की हिंदी ने जग में कराई पहचान .

हिंदी की कथा कहती हैं कई कहानियाँ
दादा दादी नाना नानी की जबानियाँ
हिंदी का फैला हैं विश्व स्वरूप 
देश विदेश में हिंदी ने फैलाया हैं डंका.

हिंदी भाषा पर हमे हैं गर्व 
हमें हैं फक्र हिंदी भाषा पर 
आओ जन जन से हिंदी की पहचान कराये 
अपनी भाषा को विश्व में सबसे अलग पहचान दिलाएं.
स्वरचित :- रीता बिष्ट

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नारी की हैं जुदा कहानी
वचन की डोर से बधीं हैं जिंदगानी .


हर पल अपना वचन निभाये
सबका हर पल साथ निभाये.

कभी घर की बेटी का फर्ज वचन निभाये
कभी लक्ष्मी बनकर सबके के लिए ख्वाब सजाये .

कभी बहन पत्नी बनकर घर का मान बढ़ाये 
हर कदम वचन की डोर को दिल से अपनाये .

जीवन नारी का वचन की डोर 
कभी इस ओर कभी उस ओर.

नारी बनना नहीं हैं आसान 
हर पल रखना पड़ता हैं वचन का ध्यान .

हर पल काँटों में चलकर वचन निभाना हैं 
खुद को डाली से तोड़कर सबको जोड़ना हैं .
स्वरचित :- रीता बिष्ट


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नारी और पत्थर 

नारी हूँ मैं जगत जननी हूँ कई रूप हैं मेरे 
पर पत्थर की मूर्त बनकर सदियों से समाज के बंधन से जकड़ी हूँ मैं 
हर पीड़ा और दर्द को सहना आदत हैं मेरी 
तभी तो पत्थर की बुत प्रतिमा बनकर खड़ी हूँ .

जिन्दा लाश बनने से पत्थर की बनना बेहतर हैं 
क्योंकि जीवित होने पर मवेशी से दुर्दशा मेरी बत्तर हैं 
मंदिर में देवी की प्रतिमा बनकर पूजी जाती हूँ 
हर दुःख दर्द और प्रताड़ना से दूर रहती हूँ .

अपने नैनो के अश्क खुद ही पीती हूँ 
हर पल घुट-घुट कर जीती और मरती हूँ 
हर दिन ह्रदय में एक नया भारी पत्थर रखती हूँ 
दुनियाँ के हर नये रंग में मजबूर होकर ढलती हूँ .

शिल्पकार की कला से पत्थर से तरासी जाती हूँ 
उसके हस्त कौशल से नये रूप रंग में उभरती हूँ 
पत्थर की मूर्त बनकर मंदिर की शोभा बनती हूँ 
खण्डित होकर एक दिवस मिट्टी में मिल जाती हूँ .
स्वरचित:- रीता बिष्ट

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धरा हमारी कितनी प्यारी 
जिसमें हैं हमारी ख़ुशियाँ सारी
प्यारी सी हैं हरियाली 

प्रकृति में हैं छाई हैं फूलों की क्यारी.

कहीं हैं सुन्दर पहाड़ पर्वत 
कहीं हैं हरे भरे वृक्ष
कहीं हैं बहती जीवनदायनी बहती सरिता और झरने
कहीं हैं खूबसूरत प्यारे पंछी और वन्य जीव .

लेकिन आज का मानव
बन गया हैं दानव
लोभ लालच में आकर 
नष्ट कर रहा हैं अनमोल प्रकृति को .

जंगल काट कर रहा हैं बेखौफ होकर 
जिससे कहीं भूकंप कहीं बाढ़ का हो रहा हैं आगाज 
मानव जीवन बन रहा हैं बेहाल 
जीवन हो रहा हैं बेहाल .

रोक लो इस महाकृत्य को 
रोक लो इस तूफ़ान बर्बादी को 
प्रकृति हैं हमारी माँ 
जीवन देती हैं हमें.

इसे रखो संजो कर
आने वाली पीढ़ी के लिये
खिलकर इसे फिजा में 
बिखरने दो .
स्वरचित:- रीता बिष्ट

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कल्पना की कलम से दिल में ख्याल आया 
उनको कलम की स्याही से कागज में लिख उतार दिया .


कभी मन की कल्पना को बयां कर दिया 
कभी कल्पना की उड़ान से एक नई कहानी लिख दी .

कुछ दिल के अहसास लिख दिये
कुछ मन में उठे कल्पना और ख्याल लिख दिये.

सब कहते हैं मैंने तो कल्पना से दिल 
भरे जज्बात लिख दिये
कुछ कहते हैं मैंने जिंदगी के कुछ ख़ास लम्हें
लिख दिये.

मैंने तो बस मन की कल्पना से कुछ अरमान लिखे 
सबने जिसे सराहा मन से 
दिल में मेरी कल्पना को एक नया आयाम दिया 
सबने अपने सच्चे मन से .
स्वरचित:- रीता बिष्ट
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"भाषा"19 जुलाई 2019

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