सारिका विजयवर्गीय "वीणा"

#स्व_परिचय भाग 2
तिथि -29 मार्च से 31 मार्च 2019 तक
वार - शुक्रवार से रविवार तक
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मीठा नमन -"प्रिय मंच "

*जय माँ शारदे 🙏🙏

*क्या दूँ परिचय अपना,

मैं खुद अपने से अपरिचित हूँ।

पाने को परिचय अपना,

मैं खुद ही बहुत लालायित हूँ।

* नाम-सारिका आनंद प्रकाश

*उपनाम- "विजयवर्गीय"

*साहित्यिक नाम - "वीणा"

*पिता का नाम - "रमेशचंद्र विजयवर्गीय

*माता का नाम- चंद्रकांता विजयवर्गीय

*जन्म स्थान - इंदौर

*जन्मतिथि-२२/४

*वर्तमान रहवासी- नागपुर(महाराष्ट्र)

*शिक्षा-एम. ए.(समाजशास्त्र- स्वर्णपदक अलंकृत),रामदेव बाबा और जनार्दन स्वामी योगामण्डल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उतीर्ण की।

*व्यवसाय या पेशा- गृहलक्ष्मी,मोहल्ले के कुछ बच्चों को पढ़ाती हूँ, योगा क्लास भी ली हैं मैंने, मुझे सीखने का बहुत शौक है जब भी कुछ नया सीखने को मिलता हैं जरूर सीखती हूँ....साथ ही वक्त आने पर जो जिम्मेदारी मुझे दी जाती हैं उसे मैं पूरी लगन से निभाती हूँ....

शौक-सिलाई,कड़ाई,क्रोशिया,पेन्टिंगबनाना, स्वादिष्ट व्यंजन बनाना आदि मेरे शौक है।

*प्रकाशित रचनाओं की संख्या- 35/40 शायद याद नही।

शिक्षक पिता की पुत्री होने के कारण पठन-पाठन में बचपन से ही रुचि रही हैं।
मुझे पत्र लिखने का बहुत शौक था, राखी के त्यौहार पर में राखी के साथ अपने मौसेरे,ममेरे, चचेरे भाइयों को लंबा सा, प्यारा सा पत्र लिखकर भेजती थी।...उसके एक-एक शब्द, उनके घर के प्रत्येक सदस्यों के दिल को छू जाते थे, हर साल राखी पर सबको राखी से ज्यादा मेरे खत का इंतजार रहता था...शादी के बाद एक साल तक दोस्तों और परिवार वालों को मैं खत लिखती रही,शनैःशनै पारिवारिक उत्तरदायित्व बढ़ने से मेरा लिखना बिल्कुल ही बंद हो गया।
एक दिन बच्चों के हाथ मेरी डायरी लग गई। उन्होंने बोला मम्मी आप फिर से क्यों नही लिखना शुरू करती। मेरी बिटिया ने मुझे कुछ साहित्यिक समूहों से जोड़ दिया।और फिर मेरी लेखन यात्रा जो चालू हुई कि अभी तक नही थमी।



*प्रकाशित रचनाओं का विवरण -
रचनाएँ प्रकाशित ---स्कूल की पत्र - पत्रिकाओं में,समाचार पत्र-दैनिक भास्कर, नवभारत व समाज की पत्रिकाएँ, विजयवर्गीय समाज व विजयवर्गीय वाणी में मेरी रचनाओं का प्रकाशन हुआ है।तथा साझा -संग्रह " क्षितिज शब्दों का आसमान" में मेरी कुछ लघुकथाएँ प्रकाशित हुई है....
व सांझा-संग्रह में ही कुछ कविताएँ जल्द ही प्रकाशित होने वाली है....

*सम्मान- उपलब्धियाँ-- समाजशास्त्र में स्वर्णपदक अलंकृत !....आदरणीया सुमित्रा महाजन के द्वारा ,५१००रु. ,स्वर्णपदक व ट्रॉफी द्वारा सम्मानित।
स्नातक और स्नाकोत्तर में *मैरिट में आने पर समाज द्वारा ट्रॉफी से सम्मानित।
अग्रवाल समाज नागपुर के "सुरभी मंडल" की महिलाओं को योग - प्रशिक्षण देने पर ट्रॉफी द्वारा सम्मानित।

विभिन्न समूहों द्वारा समय-समय पर रचनाओं को सराहा और पुरस्कृत किया गया है....

इसके अलावा मन में भावों को शब्दों के माध्यम से व्यक्त करने का हुनर मिला ईश्वर से। यही सर्वोत्तम उपलब्धि है जीवन की।

*लेखन का उद्देश्य-
लिखना मेरा शौक है ...पारिवारिक ज़िमेदारियाँ पूरी करने के बाद जो समय बचता है वो अपने लेखन को दे देती हूँ... जिससे मुझे आत्मसंतुष्टि
मिलती है .... साथ ही साथ परिवार और समाज में मान-सम्मान मिलता है.....
मेरा उद्देश्य मानसिक रूप से पिछड़े लोगों को यह बताना की स्त्री घर के दायित्व निभाते हुए अपना नाम कमा सकती है।
साथ ही "सबका साथ सबका विकास" नारे को ध्यान में रखते हुए सबके साथ प्रेम और मित्रता का व्यवहार बनाये रखना चाहती हूँ। और सबसे यही उम्मीद करती हूँ....
अंत में, मैं बस यही कहना चाहती हूँ, कभी किसी को कम मत समझो, क्या लेकर आये थे क्या लेकर जायेगे, झूठे अहम का त्याग करना चाहिए,प्यार दो प्यार लो,मान दो मान लो।
शुक्रिया।
©सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)

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विधा - छंदमुक्त

आशा का एक
नन्हा सा दीप जला मन में,
कर रही नित नया-नया सृजन
आज नही तो कल,
उभरेगी, निखरेगी जरूर मेरी कलम।

सोचूँ, ले विश्वास को साथ,
रच डालूँ, लिख डालूँ
एक-एक शब्द ऐसा जो,
छूकर हर हृदय को गहराई से
कर देगा विवश.......
नयनों को, नीर बहाने को,
मस्तिष्क को, सोचने को और
दिल को, महसूस करने को।

चाह बस इतनी सी,
जीऊँ जब तक इस धरा पर,
लेखनी बने मेरी #साथी और,
दिलाती रहे मुझे सबका,नेह और विश्वास।

चाहती हूँ....….
चुरा समय से कुछ पल अपने लिए,
जी भर जीना,
लिखना चाहती एक नई परिभाषा,
लिए बेशुमार स्नेह और दुलार
#साथी कलम के #साथ,
समझाना चाहती हूँ प्यार की भाषा।

........बस मन यही एक छोटी सी आशा,
जी, हाँ बस यही एक............😊🙏🙏

स्वरचित
©सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
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नागपुर (महाराष्ट्र)


1)
मैं, मेरा शब्द
अभिमान घोतक
होता पतन।

2)
"मैं" नही हम 
मिले अपनापन
जन समूह।
3)
"मैं" और मेरा,
दुश्मन बढ़ोतरी,
करता क्लेश।
4)
"मैं" उदगार,
कर्म जायेंगे स्वर्ग,
रहे धरा पे।
स्वरचित
©सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर ( महारष्ट्र)
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भावों के मोती
विषय-नारी
तिथि-8/3/2019
रचना क्रमांक-4
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वो भूली -बिसरी बाते,
तुझ संग गुजारी जो ,
वो यादें याद आती है।
वो तेरा पहला स्पर्श,
वो तेरा पहला छुअन,
अंतर्मन को मेरा प्रिये,
ममत्व से भर गया।
पाकर तुझे लाड़ली,
रोम-रोम मेरा पुलकित हो उठा।
आई जो गोद मे तू मेरी,
लगे जैसे कोई मुराद हुई पूरी।
पा तुझे बन गई मैं #नारी
सम्पूर्ण #नारीत्व को प्रिये मैने पा लिया।
मैंने अपनी रातों की नींद,
दिन का चैन बिटिया,
तुझको समर्पित किया।
तेरा प्यार से तुतलाकर बुलाना,
वो नर्म बाहों का आलिंगन
तेरा, बड़ा ही याद आता है।
शनै:शनै ज्यों तुम बढ़ती गई,
वैसे - वैसे माँ तुम मेरी बनती गई।
बन सखा,सहेली मुझे बहलाया,
जब रोती थी ,मैं तो,
तुमने ही मुझे हँसाया
पर कहते है ये दुनिया की रीत
बेटी तो जाती वहाँ,जहाँ उसका मीत
मेरे आँगन की परी भी न जाने ,
कब हो गई सयानी,
बनकर किसी के दिल की रानी,
संग उसी के घर चली।
पर पास है ,तू मेरे हमेशा,
कभी ख़्वाबों में,कभी यादों में।
याद कर तुझ संग बिताए वो पल,
जी उठती मैं फिर हरपल।
..........जी उठती मैं फिर हरपल।


@सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)

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नमन :भावों के मोती
दिनांक-८/३/२०१९
विषय-नारी
विधा-हाइकू

1)
देवी स्वरूपा
सारा जग पूजता,
कष्ट मिटाए।
2)जादूगरनी,
नारी मनमोहनी,
चित्त चोरनी।
3)गुणों की खान,
सहस्त्र भुजा नारी,
पीड़ा हरती।
4)निःस्वार्थ प्रेम,
ममता की मूरत,
नारी ही सृष्टि।
5)प्रेम की भाषा,
नारी की परिभाषा,
मनवा प्यासा।
@सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर(महाराष्ट्र)

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नमन भावों के मोती
दिनांक---08/03/2019.
विषय---नारी
विधा----क्षणिका
1)
बच्चों का पेट पालने के लिए,
होना पड़ा उसे देह व्यापार में लिप्त,
क्योंकि......
पुरुष प्रधान समाज में,
उसे मिल रही थी नारी होने की सजा।
2)
नौकरीपेशा स्त्री संभाल रही,
घर-बहार की जिम्मेदारी,
खो रही स्वास्थ्य, सुख-चैन,
क्योंकि........
पुरूष का अहम उसे घर में,
नारी की मदद करने की इजाजत नहीं देता....
©सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर(महाराष्ट्र)
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भावों के मोती
७/३/१९
विषय-मौन।
१)
मन का मौन,
परमानन्द प्राप्ति,
आत्मिक शांति।
२)
शाब्दिक मौन,
झंझटों से आराम,
कलह मुक्ति।
३)
मौन पसरा,
भावों की बही गंगा,
जग सुनता।
©सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर(महाराष्ट्र
)


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(चंद हाइकू)
1)मस्त पवन
देशप्रेम बयार,
वाघा बॉर्डर।
2)चली पवन,
जोश में भारतीय,
स्वागत वीर।
3)भारत माता
अभिनंदन लाल
मलय टीका
©सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर(महाराष्ट्र)


प्रेम-दिवस पर विशेष
आजकल के नवयुवकों का प्रेम देख जी जाता उबल है।
यादकर हीर- रांझा का प्रेम नेत्र हो जाते सजल है।
वेलेंटाइन डे के नाम पर जो करते वह फूहडपंती,
दूसरे दिन के समाचार जान, दिल जाता दहल है।
वन- उपवनों में क्यों ये नवयुवान बेतुके रास रचाते,
करते व्यर्थ अपना जीवन और वे लगते बेक़ल है।
अरे !..पागलों प्रेम करना है तो राधा-कृष्ण सा पवित्र करो,
नाम के तुम्हारे जमाना, गायेगा सदियों तक गजल है।
"वीणा" करती बस प्रश्न यही, यह कैसा चला चलन,
'प्रेम-दिवस' के नाम पर क्यूँ, पीना पड़ रहा गरल है।
@सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर(महाराष्ट्र)
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भावों के मोती
९/०२/२०१९
विषय- ऋतुराज, बसन्त, शारदे, सरस्वती।
1)पीली चुनर,
ओढ़े माँ सरस्वती,
आया बसंत।
2)ये ऋतुराज,
काम रति के संग,
फैलाते प्रेम।
3)कवि कल्पना,
मधुमास अंबर,
ऊँची उड़ान।
4)पर्व बसंत,
ऋतु परिवर्तन,
धरा महकी।
5)भाव संदेश,
मधुमास डाकिया,
पिया लुभाता
6)कृपा शारदे
मूढ़मति मानव
तिमिर मिटा।
@सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर(महाराष्ट्र)

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भावों के मोती
१/२/२०१९
पिरामिड-छलावा
१)
है
मोह
जंजाल
भ्रमजाल
रिश्ते भुलावा
दुनिया छलावा
अपनत्व दिखावा
२)
है
भ्रम
छलावा
मन ठगा
फिल्मी दुनिया
बहकता युवा
बचता पछतावा
@सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर(महाराष्ट्र)
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भावों के मोती
31/1/2019
है
छाया
कोहरा
मन मेरा
घना अँधेरा
छटता तुषार
आई जो बहार।
@सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर(महाराष्ट्र)

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भावों के मोती
२९/०१/२०१९
वार - मंगलवार
विषय- संत
संत तराशे
मानव कच्चा घड़ा
आकार पाता।
इंसा किरण
संत रूपी सूरज
प्रकाश फैला।
संत की कृपा
इहलोक सुधरा
जीव बदला।
संत चरण
बड़भागी मानव
पड़े आँगन।
प्रभु की कृपा
संत का समागम
आत्मउद्धार
जीवन नाव
भव पार लगाये
संत खिवैया।
मन में द्वंद्व
संत का आशीर्वाद
हरता पीड़ा।
संत कलम
मन कोरा कागज
चित्र उकेरे।
संत दर्शन
भावनाओं की कुँजी
खोलता भाग्य।
मानते लौहा
प्राचीन संतवाणी
विज्ञान युग।
@सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)
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भावों के मोती
28/012019
विषय - पूजा
मौला- पंडित
जनता है भ्रमित
पाखण्ड पूजा
जीवन पूजा
सफलता मंदिर
श्रम के फूल।
लगन पूजा.
विद्यार्थी का जीवन
लक्ष्य न दूजा।
धरती पूजा
श्रम फूल चढ़ाता
किसान आस्था।
पूजा का फल
माता-पिता की सेवा
अच्छी संतान।
मिलता मेवा
निःस्वार्थ भाव पूजा
करता सेवा।
भाव मंदिर
प्रतियोगिता पूजा
कर्म के फूल।
वोट माँगते
जनता को पूज
ते

चुनावी नेता।

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भावों के मोती मंच नमन
दिनांक -२५/०१/२०१९
विषय -गणतंत्र दिवस
दुनिया में भारत का परचम लहराना है साथियों।
मन मन में हिंदुस्तान को बसाना है साथियों।



माँ भारती के प्रति हर कर्तव्य को हमें है निभाना,
जन-जन के दिल में देशप्रेम बढ़ाना है साथियों।

शहीद वीरों की बहुमूल्य कुर्बानियां बेकार न जाए,
हमारे "गणतंत्र" का सम्मान हर दिल से कराना है साथियों।

आओ "गणतंत्र दिवस" की बेला पर करें हम यह प्रतिज्ञा,
चुनकर लाएँगे वही नेता जिससे देश को महकाना है साथियों।

"गणतंत्र दिवस" के दिन संविधान हमारा लागू हुआ,
माँ भारती का जो हुआ सम्मान उसमें और इजाफा लाना है साथियों।

तिरंगा हमारी आन -बान-शान व माँ धरती अभिमान है
सबसे प्यारा सबसे न्यारा हिंदुस्तान हमारा दुनिया को ये बताना है साथियों।

कहे वीणा जात- पात, भेदभाव की तोड़कर दीवारें दोस्तों,
हमें तो सिर्फ "हम हिंदुस्तानी हैं" का नारा लगाना है साथियों।

@सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)
@ सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
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भावों के मोती
विषय - बोझ
दिनांक २२/०१/२०१९
हाँ मैं!.......
मासूम हूँ.... ....बोझ नही।
कोमल हूँ...... कमजोर नही।
भावुक हूँ......गँवार नही।
समझदार हूँ...... चालक नही।
पढ़ी-लिखी हूँ..... बत्तमीज नही
हाँ मैं आज की नारी हूँ.....
सहती हूँ निभाने के लिए....
सहती तो लगती सहेली
वरना बन जाती पहेली।
अति के अत्याचारों का करती
पुरजोर विरोध मैं.......
न समझो मुझे कमजोर,
अधिकारों के लिए लड़ जाऊँगी,
अपनों की खुशी के लिए मर जाऊँगी।
चाहत बस इतनी सी है.....
पाने को प्यार और सम्मान की है।
चाहती हूँ मैं भी जीना.....
खुले आसमान में उड़ना।
चाहती हूँ रहना मैं, मर्यादा में,
पर नही चाहती कोई बंधन।
आत्मा पर पड़े हर बोझ मैं,
अब हटाना चाहती हूँ ।
हाँ!.....मैं जीना चाहती हूँ।
बदलो अपनी तुम सोच,
ना समझो नारियों को बोझ
बहुत मार लिया मन अपना,
अब देखने लगी हूँ सपना।
घर के साथ बाहर की भी,
बागडोर अब मैं सँभालूंगी।
बोझ तेरा हल्का कर प्रिये,
साथ तेरा मैं निभाऊंगी।
@सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर(महाराष्ट्र)
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नमन भावों के मोती
विषय - आहट
पिरामिड
वो
नन्ही
आहट
पदचाप
हर्षित मन
पुलकित तन
महकता जीवन
@सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)
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भावों के मोती
काफ़िया - आना
रदीफ़ - चाहता हूँ
जिंदगी में तेरी आना चाहता हूँ।
बन के साथी साथ पाना चाहता हूँ।
जिंदगी तेरी खुशगवार बना कर के,
साथ तेरे मुस्कुराना चाहता हूँ।
देख तुमको लब पे आई जो गजल है,
बैठ तुमको मैं सुनाना चाहता हूँ।
दिल की बातें दिल में ना रह जाये दब के,
हर वो बात जुबा पे लाना चाहता हूँ।
तबस्सुम सी बिखर जाये तेरे मुख पर
हर वो नगमा "वीणा" गाना चाहता हूँ।
@सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर ( महाराष्ट्र)
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भावों के मोती
विषय - बेटी/तनया
तिथि - ४/१/१९
1)दर्द की दवा 
"तनया"जो मुस्काये
हरती पीड़ा
2)"बेटी" हँसती
आँगन महकाती
दो कुल खिले
3)"बेटी" गुलाब
पंखुड़ी महकाती
घर बगिया
4)"बेटी" किरण
सुबह का उजाला
तम मिटता
5)काज सँवारे
तनया होशियार
बाबुल प्राण
@सारिका विजयवर्गीय"वीणा"

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भावों के मोती
26/12/2018
विषय - किवाड़/ दरवाजा
पहले किवाड़ के दोनों भाग जब खुलते थे।
खिलखिलाने के स्वर हवा में गूंज उठते थे।
खुशियाँ आँगन में बच्चों के रूप में हँसती थी।
बहन, भाभियाँ आपस में करती खूब मस्ती थी।
किवाड़ों के पीछे संयुक्त परिवार रहता था।
जहाँ अपनापन भाइयों में खूब बसता था।
हर दिन होता था घर में त्यौहार,
खूब सजता था हँसी- ठिठोली का दरबार।
किन्तु अब किवाड़ बन गए दरवाजे।
जो बड़े- बड़े घरों में खूबसूरती से साजे।
अब दरवाजों का सिर्फ एक पट खुलता है।
सारे घर - भर में तो सन्नाटा पसरा रहता है।
लोगों का आना- जाना नही सुहाता है।
अब एकल परिवार ही सबको खूब भाता है।
इस तथाकथित समाज में किवाड़ के दोनों पट।
अब मिलते है बस बंद होने पर ही झट।
अपनी लाचारी और बेबसी पर वो खूब रोते है।
बस उन्मुक्त रूप से खुलने के लिए तरसते है।
............खुलने के लिए तरसते है।
@सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)

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काव्य सृजन -१९७
विषय -दिवाली
तिथि -०७-११-२०१८
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लो भाई दीवाली आई, लाई सर्वत्र बाहर है।
दीपों से जगमग होंगे अब सबके घर - द्वार है।
पाँच दिवस का महापर्व दीवाली जन-मानस हर्ष उल्लास से मनाता है।
भारतवासियों का सबसे बड़ा त्यौहार यही कहलाता है।
अमृत औषधि पात्र ले धन्वन्तरि जी ने किया त्यौहार का शुभारंभ।
रूप -चौदस ,छोटी दीवाली करती दीवाली का आरंभ।
चौदह वर्ष पश्चात सियाराम वन से लौट आयोध्या आये।
स्वागत में उनके जनमानस ने गा मंगलगीत दीप जलाये।
एकम के दिन छप्पन भोग बना अन्नकूट महोत्सव मनाते।
गोवर्धन धारी की कर पूजा लीला उनकी सब सुनाते।
यम द्वितीया या कह लों तुम भाई दूज, को पर्व खिल उठता खूब।
इस दिन जो भाई- बहन नहाते माँ यमुना में पाते वो बैकुंठ।
दीपावली पर श्री गणेश, माँ लक्ष्मी जी, माँ सरस्वती का धरते ध्यान।
जन्म - जन्म की दरिद्रता से पाते मुक्ति और पाते अमूल्य ज्ञान।
मेल- मिलाप और भाई - चारे को यह त्यौहार बढ़ाता है।
सबके घर- घर में सुख- समृद्धि और खुशियाँ भर- भर लाता है।
©सारिका विजयवर्गीय "वीणा"

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नमन भावों के मोती
28-10-2018
दिन ;-रविवार
विषय:-दीप
विधा :- दोहा
1)सियाराम वन भोग के,जो आये घर द्वार।
जन-जन खुशियाँ बाँटता दीपक जले हजार।
2)दीप जले जो स्नेह का, हरता उर की पीर ।
नव पीढ़ी को ज्ञान दे, बहता प्रेम समीर ।
3)मिट्टी का दीपक जला, भागा है अँधियार।
जब गरीब हँसता मिले, रोशन हो संसार।
©सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)
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भावों के मोती
तिथि-२७/१०/२०१८
वार-शनिवार
आज का दिन बड़ा ही पवित्र,पावन है
हर सुहागिनों का बड़ा ही मनभावन है।
आज चाँद से सजदे की अनमोल रात है,
लब पे तो साजन जी की ही बात है ।
हाँ!...आज कार्तिक माह की चौथ को,
ले करवा सजा पूजा का थाल हाथ में,
संग सखी, सहेलियों,बहनों के साथ में,
सुहागिन लगाती मेहंदी, माँग है सजाती
ओढे लाल चुनरिया करती सोलहा श्रृंगार है।
आस्था, प्रेम-विश्वास का यह बड़ा ही
प्यारा सा सुहागिनों का त्यौहार है।
निर्जला व्रत रख करती पिया जी के लिए
चौथ माता से लंबी उम्र की कामना है।
गगन में चमक चाँद इतरा रहा है,
मन मेरा पिया के आसपास मंडरा रहा है।
आज चाँद अपने पूरे शबाब पर है।
लुका-छिपी खेल सुहागिनों को बहला रहा है।
पर ऐ चंदा मैं भी हार न मानूँगी,
नारी हूँ सहना आता है मुझे,
अपने प्रिय साजन जी के लिए आज
हँसते-मुस्कुराते हुए भूख- प्यास सह जाऊँगी।
चाँद जब तू चमकेगा अम्बर पे,
छलनी से तुझमें में प्रीतम को निहारूँगी
जल-ग्रहण कर पिया जी के हाथ से,
हृदयतल तक तृप्त हो जाऊँगी।
देखेगे जो वो एक नजर प्यार से
मुरझा हुआ चेहरा खिल जाएगा।
हे चंदा!....चमकेगा एक चाँद गगन में तो,
.......धरा पर भी यह चाँद चमकेगा।
.........धरा पर भी यह चाँद चमकेगा।
©सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)

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स्वतंत्र सृजन
तिथि -21/10/18
वार- रविवार
सच्चा सुख बिकता नही बाजारों में,
मंदिर, मस्जिद या गुरूद्वरों में।
वह तो बस,बसा होता है यारों,
मासूमों की किलकारियों में।
जो चाहत है तुझे सच्चे सुख की,
बेशुमार प्यार और अपनेपन की।
तो यारा पाने के लिए सच्चा सुख,
निःस्वार्थ भाव से सेवा कर हर इंसान की।
बड़े -बुजुर्गों को देकर सम्मान
सभी से कर स्नेह का आदान - प्रदान
जो देगा तू बेबस नारी के चेहरे पर मुस्कान
तभी तो सच्चे सुख का तुझे मिलेगा वरदान।
तभी तो सच्चे सुख का तुझे मिलेगा वरदान......
© - सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर ( महाराष्ट्र
)
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भावों के मोती
20/10/2018
कुमकुम लगाके नारी,
साजन मन को लुभात।
सिंदूर लगाके लगे वो,
देवी दुर्गा माँ साक्षात।
कुमकुम बढ़ाता नारी सौंदर्य,
वो करती जब सोलह श्रृंगार,
इठलाती, बलखाती,उतरती,
साजनजी के मन द्वार।
माँग में सजा कुमकुम,
पति की लंबी उम्र दर्शाता।
भारतीय समाज की,
अनोखी परंपरा को बतलाता।
कुमकुम है सौभाग्य की पहचान।
इससे जुड़ा हर नारी का मान।
स्वरचित-"सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
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भावों के मोती
दैनिक कार्य - स्वतंत्र लेखन
दिनाँक - 14-10-2018
वार - रविवार
सुन मेरी प्यारी भोली बहना,
करवा कंघी हो जा तैयार,
तुझे आज माँ से मिलना है।
लगाया माँ ने धरा पर आज,
अपना अदभुत दरबार,
देखने हमें चलना है।
न देखी तूने माँ की ममता,
प्रश्न ये जगमाता से करना है।
क्यों जन्मते ही माँ का उठा साया,
हम मासूमों पर कहर है ढाया?..
क्यों माँ को हमारी है छीना?.…
क्यों बिन माँ के हमको है जीना?...
क्यों माँ होके बालकों के दर्द से है वो अंजान?..
हाँ!...शायद मूरत है इसलिए वो है बेजान।
बहना!..माँ जगदंबा से ऐसे अनगिनत,
सवालों के जवाब हमें लेना है।
जल्दी से तैयारी कर ले बहना,
दरबार में आज से उसके
डेरा हमें अब है डालना।
द्रवित जरूर होगा माँ का मन,
पुकार सुन जरूर आयेगी अम्बे।
हम मासूमों को भेजा है धरा पर तो,
ममता भी लुटायेगी जगदम्बे।
हाँ!...ममता भी लुटायेगी जगदम्बे।
स्वरचित-सारिका विजयवर्गीय"वीणा"

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भावों के मोती
माँ " शब्द मे संपूर्ण नियति समाई हुई है।माँ शब्द सबसे छोटा होते हुए अपने आप मे परिपूर्ण है।माँ शब्द कि व्याख्या करना असंभव है ।यह वो मोती की माला है,
जिसे शब्दों मे नही पिरोया जा सकता।🙏
माँ की महिमा अपरंपार,
जिसे भुला न पाये ये संसार।
दर्द में मरहम बनती है,
सुख में दूर खड़ी मुसकुराती है।
माँ ममता का अनंत गहरा सागर है,
प्यार से सराबोर लबालब भरी गागर है,
जो छलके तो मन में अथाह प्यार भर दे।
दिल का कोना - कोना आनंद से भर दे।
माँ तो है दुर्गा का अवतार,
अपने सहस्त्रों हाथों में उठाये,
सम्पूर्ण परिवारक कार्य,
माँ की महिमा अपरंपार ,
जानें जो वो हो जाये निहाल।
सादा जीवन उच्च विचार माँ,
अनवरत लीला की महारास माँ।
पूर्णिमा में चाँद का प्रकाश माँ तो,
ईश्वर द्वारा लिखा सुंदर महाकाव्य है माँ।
दुनियाँ की सबसे सुंदर सूरत है माँ,
दुःख की धूप में, सकून की छाया है माँ।
बिछड़ने के बाद पल-पल याद आती माँ,
प्रभु द्वारा तराशी ममता की मूरत है माँ।
पल - पल की चिंता करती माँ ,
हमारे लिए ही जीती और मरती माँ।
माँ की ममता का कोई तोल नही,
कर्ज़ चुका सके ऐसा कोई मोल नहीं।
वो तो यारों अनमोल है .......
वो तो यारों अनमोल है..
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भावों के मोती
न उजाला है, न अँधेरा है।
अभी तो हुआ बस,
साँझ का ही बसेरा है।
दादाजी थामे कोमल हाथ,
प्यारे से पोते - पोतियों का।
ले रहे आनंद मासूमों की,
मदमस्त,अठखेलियों का।
कहते है सूद से ज्यादा,
होता है ब्याज़ प्यारा।
उम्र के इस पड़ाव में लगता है,
बच्चों का साथ बड़ा ही न्यारा।
पा साथ उन प्यारे बच्चों का,
बुढ़ापे का सफर हो जाता सुहाना।
पकड़े हाथ बच्चों का,
ले चले घुमाने को दादा।
मस्त हो चला दादा-पोते का
ये प्यारा अनमोल नाता।
दादा के पास है जो,
ज्ञान का बहुमूल्य भंडार।
हँसते - गाते दे रहे वो आज,
बच्चों पास है मेरे बस,
ज्ञान की ही सिर्फ कुंजी।
दे रहा हूँ मैं तुमको,
संस्कारों की पोटली।
रखना इस पोटली को तुम,सदा संभाल
विरासत है ये मेरी जिसे,
पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ाने की
जिम्मेदारी है तुम राजदुलारों की....
जिम्मेदारी है तुम राजदुलारों की....

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भावों के मोती
चित्र आधारित रचना
३०/९/२०१८
रविवार
निधिवन का आज,
पत्ता- पत्ता महक रहा है।
उन्मुक्त गगन में विचर रहा,
हर पंछी चहक रहा है।
राधा संग रास रचाये,
आज मोरे बाँके - बिहारी।
ललिता आदि सखियाँ दूर खड़ी,
ये अनुपम दृश्य है निहारी।
राधारानी का ले हाथों में हाथ कन्हैया,
नाचे संग राधारानी ता-ता-थैया।
भवँरे, तितलियाँ फूलों का,
है रसपान कर रहे।
कान्हा जो बजाये बाँसुरी,
तोता - मैंना भी बहक रहे।
रंग - बिरंगे वृक्षों का है,
पत्ता- पत्ता भी खिल रहा।
जैसे पाने को सानिध्य गोपाल का,
गोपियों का दिल है मचल रहा।
सुन कान्हा की मधुर वंशी,
राधारानी दीवानी हो गई।
अपने प्रीतम प्यारे की बाँहों में,
वो दीवानी, मस्तानी खो गई।
युग- युग तक राधानाम
दुनिया में अमर रहेगा।
राधे कृष्ण- राधे कृष्ण,
ये जमाना गुनगुनाता रहेगा।
©सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र
)
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भावों के मोती
विषय- ख़ामोश
#खामोश लफ़्ज और बोलती निगाहें।
न कह कर भी बहुत कुछ कहती है।
तेरे मन की अनकही परतों को यूँ ही,
अनायास मेरे सामने खोल देती है।
तेरा-मेरा रिश्ता है यूँ कुछ खास,
बिन अधरों को खोले #खामोशी से,
कह जाता मुझे तेरे दिल का हाल।
हाँ!.... ...ये एहसास ही तो है,
तेरे लिए मेरे जज़्बात ही तो है।
#खामोश निगाहों को मैं पढ़ सकूँ।
अनकही बातों को मैं, समझ सकूँ।
भावों से भरा है मेरा अंतर्मन,
ईश्वर ने जोड़ा तुझसे यूँ संग,
#खामोशी से पढ़ रहा हूँ मैं,
तेरे भावों को, अनकहे अल्फाज़ो को।
तुझ पर भी चढ़ रहा मोरा रंग,
आज नही तो कल तेरे अधर खुलेंगे,
#खामोश लफ़्ज भी यह कह उठेंगे।
अपने आप से मैं अब बेगानी हुई
प्रेम में..... मैं तेरी दीवानी हुई,
जैसे श्याम दीवानी मीरा जोगन हुई....
जैसे श्याम दीवानी मीरा जोगन हुई....
©सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)
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"आप सभी स्नेही मित्रगणों को बिटिया- दिवस की हार्दिक बधाइयाँ"।💐💐💐💐😊🙏
भावों के मोती
तिथी-23/9 २०१८
वार -रविवार
मन में आज कुछ खास है।
नभ को छूने की आस है।
हूँ बेटी करूँगी नाम रोशन,
चली पाने मंजिल,साथ विश्वास है।
बाबुल मोरा चला था ब्याहने।
छोड़ घर चली बाबुल,अकेली।
कर रही रेलवे स्टेशन पर बैठी,
रेलगाड़ी का बेसब्री से इंतजार।
नभ पर छाए कारे-कारे बदरा,
कर रहे संध्या को आमंत्रित।
दामिनी भी दम -दम दमक रही,
इस नजरे को मैं गुमसुम ताक रही।
मन मैं उथल-पुथल मची है,
पर जंग जितने की मन में पड़ी है।
टाँग काँधे किताबों से भरा झोला,
बाट जोह रही रेलगाड़ी की।
मेघ भी आतुर बरसने को,
मन भी बेताब कुछ करने को।
मैं छोटे से कस्बे की बिटिया,
चल पड़ी अपनी पहचान बनाने को।
माँ- बापू मैं, लौट फिर आऊँगी,
साथ भरपूर प्यार, सम्मान लाऊँगी।
तब होगा आपको नाज मुझ पर,
मुख से आपके यह जरूर कहलाऊँगी।
हे प्रभु!....
"अगले जन्म भी मोहे यही बिटिया दीजे"
"अगले जन्म भी मोहे यही बिटिया दीजे"..
©सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
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नमन - भावों के मोती
दिनाँक -9-9-18
वार - रविवार
स्वतंत्र सृजन-मुक्तक
मिला जो मन का मीत है।
मन वीणा, बजाये संगीत है।
लगे *ज़िंदगी का सफ़र सुहाना।
अब संग साथी, निभाना प्रीत है।
©-सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)

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जल सृजन
काफ़िया-आ
रदीफ़-था।
देखने को तुझे नजर भर।
हर मोड़ पर निहारता था।
इश्क आग का दरिया है।
उसमें कूदा मैं अकेला था।
आया था जो, दर पर तेरे मैं।
तुझे देखने का बहाना था।
आँखों में नींद लिए सपनें हजार।
अगले दिन मिलने का वादा था।
जब से लड़े ये नैना तुझसे।
दिन-रात का चैन खोया था।
मिलने बगीचे में बुलाना एक बहाना था।
बस तेरे साथ कुछ वक़्त बिताना था।
जुल्फ़े जो सवारी उसने।
मन मेरा बहका-बहका था।
चाहत को मेरी यूँ रुसवा न कर।
इश्क में तेरे फना होने का इरादा था।
चाहत को उसने,मेरी नाम दे दिया।
भरी महफ़िल में,दिया ये इनाम था।
"वीणा"दामन तेरा खुशियों से भरने का।
सात जन्म का ये, मेरा वादा था।
©सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर(महाराष्ट्र)
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भावों के मोती
नमन मंच
तिथी ३/८/२०१८
वार - सोमवार
आज तो मैया यशोदा बाँध ओखल से कृष्ण मुरारी को।
समझा रही चौसठ कलाओं के ज्ञाता मदनमुरारी को।
दिखा उंगली, समझाए मैया कान्हा तू क्यों मोहे इतना सताए।
घर का भंडार भरा माखन से फिर क्यों माखन तू चुराए।
तेरे कारण कान्हा गोपियाँ नित उलहना मोहे देती जाए।
यशोदा अपने लल्ला को माखन क्यों नही खिलाए।
आज तो हद कर दी तूने कान्हा, डपटते हुए कहे मैया।
घर में ही कर दी चोरी सब सखा, संग बलदाऊ भैया।
यशोदा महल में बलदाऊ, सखा छिप सब मैया की डांट सुन रहे।
भोली सूरत बना वो चित्तचोर मईया यशोदा को समझा रहे।
मेरी प्यारी, भोली मैया मैंने माखन नहीं खायो है।
वो तो ग्वालबाल सबने बरबस मुख पर लपटायो है।
रही बात गोपियों की मैया वो तो मोह से बहुत जलती है।
ताके बालकों से मैं दिखूं सुंदर इसलिए झूठी डाँट खिलाती है।
त्रिलोकीनाथ प्रेमवश मैया से यह बंधन स्वीकारत हैं।
देखत हरि की बाल लीला देवगण मन ही मन हर्षावत है।
स्वरचित- रचना क्रमांक-01
©-सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)
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भावों के मोती
विषय - स्वतंत्र लेखन
तिथी - २/९/२०१८
वार -रविवार
नंद - यशोदा का लाल बड़ा नटखट भयों रे।
#सरेआम गोपियन ने छेड़ सताई रियों रे।
मुरली की तान मुरलीमनोहर ऐसी छेड़ गयों रे।
सुन, सुधा-बुध बिसरा गोपिया#बदनाम भई रे।
जो भी मानव ले कृष्ण से पहले "श्रीराधा"नाम।
जीवन में #आराम से प्रेमरस बरसाई दियों रे।
माखनचोर, मटकी फोड़ माखन चुराई रियों रे।
गोपियन की नींद# हराम कर मज़ा ले लियों रे।
गीता काअमर ज्ञान जग को ऐसो सुनाई गयों रे।
मानव के लिए मोक्ष का #इंतजाम कर गयों रे।
©सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)
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भावों के मोती
वार -शनिवार
तिथी- १/९/२०१८
विषय- "नारी"
क्यों पूछ रहे परिचय मेरा,
मैं तो एक नारी हूँ।
पहले पिता के ,फिर पति के,
अब बेटे के नाम से जानी जाती हूँ।
न मेरा कोई स्वतंत्र परिचय,
मैं तो पुरूषों के नाम से जानी जाती हूँ।
हे ये बिडंबना इस समाज की,
पाने को पहचान अपनी,सदैव संघर्ष में करती हूँ।
जो स्त्री पाना चाहती है अपना स्वतंत्र परिचय,
वही पुरुषों के अहम की वली - वेदी पर चढ़ जाती है।
नही देख सकता नर - नारी को बढ़ता अपने से आगे,
और स्त्री भूल जाती इस दंभी पुरूष समाज मे,
अपना स्वयं का परिचय पाना।
अपना स्वयं का परिचय पाना ......
©सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर ( महाराष्ट्र)

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बाँध रही बहन भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र।
बना साक्षी दीप-लौ को, अपने स्नेह का मित्र।
राखी त्यौहार को खुशबू से भर दे, स्नेहबंधन का यह इत्र।
दीप-लौ उकेर रही भाई-बहन के आत्मिय लगाव का चित्र।
बँधवा राखी कलाई पर, भाई रखे शीश पर हाथ।
दे वचन कहे बहना, हर विपत्ति में निभाऊंगा साथ।
सुन बातें देख मुख भाई का, मंद मंद मुस्कुरा रही बहना।
हाथ देख शीश पर अपने, गर्व से फूला ना समाई रही बहना।
साल भर का सबसे प्यारा त्यौहार है राखी।
सचमुच देखा जाए तो स्नेह का संसार है राखी।
राजा बलि ने भी प्रेमधागा माँ लक्ष्मी से बँधवाया था।
वही रक्षा सूत्र जीवन में उसके रक्षक बन काम आया था।
राखी त्यौहार, भारतीय हिंदु संस्कृति की अनुपम भेंट है।
जहाँ भाई - बहन को अटूट- बंधन में बाँधे मात्र एक डोर है।
©-सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)
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भावों के मोती
विषय -तीज
तिथी - १३/८/२०१८
वार - सोमवार
सावन की तीज लाई खुशियों की बयार।
प्रकृति अपने शबाब पे संग रिमझिम फुहार।
कर सोलह श्रृंगार प्रिया ,पिया मन भाएँ,
झूल प्रीतम की बाहों में वो हौले-हौले मुस्काए।
सर्वत्र धरा पर हरियाली छाई रे।
सखियों संग तीज की धूम मचाई रे।
प्रेम में साजन के खुद को नचाई रे।
आम्बुआ के पेड़ पर झूला सजाई रही।
सखियाँ संग मल्हार गीत गाए रही।
ले रही सावनी बयार का आनंद,
गौरी सकल परिवार को हरषाये रही।
घेवर , मालपुआ, मिष्ठान बनाई के।
चित्त में साजनजी का ध्यान धराई के।
पाने को अखंड सौभाग्यवती का वरदान,
शिव - गौरा को भोग रही लगाई रे।
©-सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)

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भावों के मोती
विषय - भारत देश
अनुपम, अतुलनीय, अद्वितीय, सुंदर भारत देश है मेरा।
संजोए समेटे संस्कृति की धरोहरो को, ऐसा भारत देश है मेरा।
क्या होली, क्या दिवाली, क्या ईद, क्या बैसाखी
हर त्योहारों का रंग यहां खूब जमता है ,ऐसा भारत देश है मेरा।
संयुक्त परिवार आज भी दिखते जहां गांवन में,
सज्जनता ,मानवता जहां सीखे बच्चे लालन- पालन में ,ऐसा भारत देश है मेरा।
यहाँ किसान धरती से सोना उगलाते हैं ,और जवान भारत मां के लिए, सीमा पर जान लुटाते हैं ,ऐसा भारत देश है मेरा
परंपरा के नाम पर भारत वासियों को जोड़ें, ये देश मेरा
इसलिए तो कहलाता यह दुनिया का गहना, ऐसा भारत देश है मेरा।
"जय - हिंद"
©-सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)
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भावों के मोती
विषय - संतोष / धैर्य
जीवन के संघर्ष में संतोष ही काम आएगा।
धारा जो धैर्य तू जग जीत जीत जाएगा।
जरा सी अधीरता से बनता काम बिगड़ाएगा।
जीवन मे सफलता न कभी तू पाएगा।
धर मन संतोष ध्यान जो कर्म पर लगाएगा।
तो मेहनत का रंग तेरा निखर सामने आएगा।
माना मतलबी जमाने मे धैर्य मुँह ताकत दिखेगा।
पर जीत का जश्न यारा "संतोष" ही मना कर जाएगा।
©सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)
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भावों के मोती
विषय- परदेस
वार - शनिवार
तिथि- १६/६/२०१८
परदेस तो है भाई पर "देश"
मुझे तो प्यारा लागे अपना देश
गली - मोहल्ले की पुकार नही परदेस में
चाचा -ताऊ का दुलार नही परदेस में
गाँव की मिट्टी की खुशबू कहाँ से लाये परदेस में
माँ के हाथ की चूल्हे की रोटी न पाए परदेस में
पैसा ही पैसा है भाई परदेस में
पर मन का चैन नही परदेस में
परदेसी बन जो छोड़ा तूने अपना देश
टूटेगें ना जाने कितने दिल जाने से तेरे परदेस।
जाने से तेरे परदेस........
©सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
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भावों के मोती
स्वतंत्र लेखन
आज फिर एक प्रेमी युगल पर हुआ व्रजपात,
जला दिया गया उनको ,उनके अरमानों के साथ।
धधक - धधक कर जल रही थी, ज्वाला और,
मूक - दर्शक बन निहार रहा था गाँव सारा ।
बस कसूर यही था उन प्रेमी - पंछियों का,
उन्मुक्त हृदय से उड़ जाना चाहते थे वे गगन में।
पर रास न आया कुछ तथाकथित सामाजिक ठेकेदारों को,
व दे दी आहुति अग्नि में, उस प्रेमी जोड़े की।
और मूक दर्शक बन निहार रहा था गाँव सारा।
और मूक दर्शक बन निहार रहा था गाँव सारा।
© सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर ( महाराष्ट्र)
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चाहे कितने भी बिछाओ तुम हमारी जिंदगीमें अदावत के शूल
हम तो खिलायेंगे तुम्हारी जिंदगी में मोहब्बत के फूल ।
हम अपनी दीवानगी से तुम्हारे संगदिल हृदय को मोम कर देंगें।
तुम भी करने लगोगे बेपनाहमोहब्बत वअदावत जाओगे भूल।
©- सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र )
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"भावों के मोती"
तिथि -६ -५-२०१८
वार -रविवार
विषय -बचपन
विधा - कविता


पचपन में दिन याद आते बचपन के,
वो अल्हड़, अलमस्त साथी दीवाने बचपन के,
जिंदगी की भागा-दौड़ी में बड़े होकर,
न जाने कहाँ खो गये साथी बचपन के।

वो साथ -साथ घर से स्कूल जाना,
बगिया में जा आम चुराना,
एक- दूसरे से रूठना -मनना,
न जाने कहाँ खो गए वो साथी बचपन के।

पहले आते थे बेझिझक घर एक - दूजे के।
जल अलाव सेक छोड़-भुट्टे खाते थे मिल जुल के,
बड़े हुए तो भूल गए स्नेह बचपन के,
न जाने कहाँ खो गए वो साथी बचपन के।

ना जाने कहा खो गए वो साथी बचपन के।

*सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
*नागपुर (महाराष्ट्र)

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पहले किवाड़ के दोनों भाग जब खुलते थे।
खिलखिलाने के स्वर हवा में गूंज उठते थे।

खुशियाँ आँगन में बच्चों के रूप में हँसती थी।
बहन, भाभियाँ आपस में करती खूब मस्ती थी।

किवाड़ों के पीछे संयुक्त परिवार रहता था।
जहाँ अपनापन भाइयों में खूब बसता था।

हर दिन होता था घर में त्यौहार,
खूब सजता था हँसी- ठिठोली का दरबार।

किन्तु अब किवाड़ बन गए दरवाजे।
जो बड़े- बड़े घरों में खूबसूरती से साजे।

अब दरवाजों का सिर्फ एक पट खुलता है।
सारे घर - भर में तो सन्नाटा पसरा रहता है।

लोगों का आना- जाना नही सुहाता है।
अब एकल परिवार ही सबको खूब भाता है।

इस तथाकथित समाज में किवाड़ के दोनों पट।
अब मिलते है बस बंद होने पर ही झट।

अपनी लाचारी और बेबसी पर वो खूब रोते है।
बस उन्मुक्त रूप से खुलने के लिए तरसते है।
............खुलने के लिए तरसते है।

@सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)
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विषय - लेखन/लेखनी

अरी ओ कलम!........तू है बड़ी कमाल।
मनोभावों को कोरे कागज पर देती तू उकार।
क्या कहूँ लेखनी तू तो है, बड़ी बेमिसाल।
लेखक के भावों को देती तू खूब सम्मान।
लेखनी अपने अद्भुत #लेखन से,
जैसा चित्र चाहे वो देती तू ,
कोरे कागज पर उतार।
कभी खिलाती किसी के हृदय में,
प्रेम के मधुर पुष्प तो,
कभी बिखेरती किसी के
चेहरे पर तबस्सुम।
कभी अपनी तीखी कटार से,
कर देती तू घायल।
अरी ओ लेखनी!...लेखन का तेरे,
हर व्यक्ति है कायल।
नौ रसों का रसास्वादन कराती,
अंतर्मन को तरह - तरह का स्वाद चखाती।
भावों के रंग बिखेर तू,
सफेद कागज को कर देती रंगीन।
हर लेखक के दिल में बसती,
लेखनी बन उसकी जीवन संगीन।

@सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)
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सुन मेरी प्यारी भोली बहना,
करवा कंघी हो जा तैयार,
तुझे आज माँ से मिलना है।
लगाया माँ ने धरा पर आज,
अपना अदभुत दरबार,
देखने हमें चलना है।
न देखी तूने माँ की ममता,
प्रश्न ये जगमाता से करना है।
क्यों जन्मते ही माँ का उठा साया,
हम मासूमों पर कहर है ढाया?..
क्यों माँ को हमारी है छीना?.…
क्यों बिन माँ के हमको है जीना?...
क्यों माँ होके बालकों के दर्द से है वो अंजान?..
हाँ!...शायद मूरत है इसलिए वो है बेजान।
बहना!..माँ जगदंबा से ऐसे अनगिनत,
सवालों के जवाब हमें लेना है।
जल्दी से तैयारी कर ले बहना,
दरबार में आज से उसके
डेरा हमें अब है डालना।
द्रवित जरूर होगा माँ का मन,
पुकार सुन जरूर आयेगी अम्बे।
हम मासूमों को भेजा है धरा पर तो,
ममता भी लुटायेगी जगदम्बे।
हाँ!...ममता भी लुटायेगी जगदम्बे।

स्वरचित-सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
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न उजाला है, न अँधेरा है।
अभी तो हुआ बस,
साँझ का ही बसेरा है।

दादाजी थामे कोमल हाथ,
प्यारे से पोते - पोतियों का।
ले रहे आनंद मासूमों की,
मदमस्त,अठखेलियों का।
कहते है सूद से ज्यादा,
होता है ब्याज़ प्यारा।
उम्र के इस पड़ाव में लगता है, 
बच्चों का साथ बड़ा ही न्यारा।
पा साथ उन प्यारे बच्चों का, 
बुढ़ापे का सफर हो जाता सुहाना।
पकड़े हाथ बच्चों का,
ले चले घुमाने को दादा।
मस्त हो चला दादा-पोते का
ये प्यारा अनमोल नाता।
दादा के पास है जो,
ज्ञान का बहुमूल्य भंडार।
हँसते - गाते दे रहे वो आज,
बच्चों पास है मेरे बस,
ज्ञान की ही सिर्फ कुंजी।
दे रहा हूँ मैं तुमको,
संस्कारों की पोटली।
रखना इस पोटली को तुम,सदा संभाल
विरासत है ये मेरी जिसे, 
पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ाने की
जिम्मेदारी है तुम राजदुलारों की....
जिम्मेदारी है तुम राजदुलारों की....
©सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)


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गजल सृजन 
काफ़िया- अते

रदीफ़- रहना है।
तिथि - २७/७/२०१८
वार - शुक्रवार

गुरु गुणों की खान सदा उनकी सुनते रहना है।
गुरु सेवा मार्ग में आए रुकावटें सहते रहना है।

कर तू तन -मन से सेवा प्रिय गुरुवर की।
निरन्तर हरि -मिलन के सपने बुनते रहना है।

गुरू - मुख से निकले जो अमृतवाणी।
शब्द-शब्द हृदयगंगा में उतारते रहना है।

सरल नही डगर गुरुसेवा की प्यारे।
सफलता की सीढ़ी चढ़ते रहना है।

जीवन बगिया कंटीले काँटों से भरी पड़ी।
बन फूल गुलाब तुझे हमेशा महकते रहना है।

कर संकल्प गुरुचरणों में लगा कर सच्ची प्रीत ।
बन सदशिष्य भवसागर से पार उतरते रहना है।

"वीणा" भी लगा चुकी अरज गुरु चरणों में।
निगाहें ऐ करम गुरुवर सदा बरसते रहना है।



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#खामोश लफ़्ज और बोलती निगाहें।
न कह कर भी बहुत कुछ कहती है।
तेरे मन की अनकही परतों को यूँ ही,
अनायास मेरे सामने खोल देती है।
तेरा-मेरा रिश्ता है यूँ कुछ खास,
बिन अधरों को खोले #खामोशी से,
कह जाता मुझे तेरे दिल का हाल।
हाँ!.... ...ये एहसास ही तो है,
तेरे लिए मेरे जज़्बात ही तो है।
#खामोश निगाहों को मैं पढ़ सकूँ।
अनकही बातों को मैं, समझ सकूँ।
भावों से भरा है मेरा अंतर्मन,
ईश्वर ने जोड़ा तुझसे यूँ संग,
#खामोशी से पढ़ रहा हूँ मैं,
तेरे भावों को, अनकहे अल्फाज़ो को।
तुझ पर भी चढ़ रहा मोरा रंग,
आज नही तो कल तेरे अधर खुलेंगे,
#खामोश लफ़्ज भी यह कह उठेंगे।
अपने आप से मैं अब बेगानी हुई
प्रेम में..... मैं तेरी दीवानी हुई,
जैसे श्याम दीवानी मीरा जोगन हुई....
जैसे श्याम दीवानी मीरा जोगन हुई....

©सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)


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विषय - संतोष / धैर्य

जीवन के संघर्ष में संतोष ही काम आएगा।
धारा जो धैर्य तू जग जीत जीत जाएगा।

जरा सी अधीरता से बनता काम बिगड़ाएगा।
जीवन मे सफलता न कभी तू पाएगा।

धर मन संतोष ध्यान जो कर्म पर लगाएगा।
तो मेहनत का रंग तेरा निखर सामने आएगा।

माना मतलबी जमाने मे धैर्य मुँह ताकत दिखेगा।
पर जीत का जश्न यारा "संतोष" ही मना कर जाएगा।
©सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)


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अनुपम, अतुलनीय, अद्वितीय, सुंदर भारत देश है मेरा।
संजोए समेटे संस्कृति की धरोहरो को, ऐसा भारत देश है मेरा।

क्या होली, क्या दिवाली, क्या ईद, क्या बैसाखी
हर त्योहारों का रंग यहां खूब जमता है ,ऐसा भारत देश है मेरा।

संयुक्त परिवार आज भी दिखते जहां गांवन में,
सज्जनता ,मानवता जहां सीखे बच्चे लालन- पालन में ,ऐसा भारत देश है मेरा।

यहाँ किसान धरती से सोना उगलाते हैं ,और जवान भारत मां के लिए, सीमा पर जान लुटाते हैं ,ऐसा भारत देश है मेरा

परंपरा के नाम पर भारत वासियों को जोड़ें, ये देश मेरा
इसलिए तो कहलाता यह दुनिया का गहना, ऐसा भारत देश है मेरा।
"जय - हिंद"

©-सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)
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मेरे मन की वीणा के तार जो छेड़े तुने,
गीत बन मेरे लब पर तू छा गई।
जीवन में मेरे तू बन के आई बहार,
धीरे-धीरे संगीत बन समा गई।

देखी जो तेरी सुंदर - सलोनी छबि तो,
शायर बन गीत गुनगुनाने लगा,
जुबां से निकले ऐसे प्रेम गीत,
बिन साज के दिल का संगीत बजने लगा।
©-सारिका विजयवर्गीय "वीणा"




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बाँध रही बहन भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र।
बना साक्षी दीप-लौ को, अपने स्नेह का मित्र।

राखी त्यौहार को खुशबू से भर दे, स्नेहबंधन का यह इत्र।
दीप-लौ उकेर रही भाई-बहन के आत्मिय लगाव का चित्र।

बँधवा राखी कलाई पर, भाई रखे शीश पर हाथ।
दे वचन कहे बहना, हर विपत्ति में निभाऊंगा साथ।

सुन बातें देख मुख भाई का, मंद मंद मुस्कुरा रही बहना।
हाथ देख शीश पर अपने, गर्व से फूला ना समाई रही बहना।

साल भर का सबसे प्यारा त्यौहार है राखी।
सचमुच देखा जाए तो स्नेह का संसार है राखी।

राजा बलि ने भी प्रेमधागा माँ लक्ष्मी से बँधवाया था।
वही रक्षा सूत्र जीवन में उसके रक्षक बन काम आया था।

राखी त्यौहार, भारतीय हिंदु संस्कृति की अनुपम भेंट है।
जहाँ भाई - बहन को अटूट- बंधन में बाँधे मात्र एक डोर है।

©-सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)



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#खामोश लफ़्ज और बोलती निगाहें।
न कह कर भी बहुत कुछ कहती है।
तेरे मन की अनकही परतों को यूँ ही,
अनायास मेरे सामने खोल देती है।
तेरा-मेरा रिश्ता है यूँ कुछ खास,
बिन अधरों को खोले #खामोशी से,
कह जाता मुझे तेरे दिल का हाल।
हाँ!.... ...ये एहसास ही तो है,
तेरे लिए मेरे जज़्बात ही तो है।
#खामोश निगाहों को मैं पढ़ सकूँ।
अनकही बातों को मैं, समझ सकूँ।
भावों से भरा है मेरा अंतर्मन,
ईश्वर ने जोड़ा तुझसे यूँ संग,
#खामोशी से पढ़ रहा हूँ मैं,
तेरे भावों को, अनकहे अल्फाज़ो को।
तुझ पर भी चढ़ रहा मोरा रंग,
आज नही तो कल तेरे अधर खुलेंगे,
#खामोश लफ़्ज भी यह कह उठेंगे।
अपने आप से मैं अब बेगानी हुई
प्रेम में..... मैं तेरी दीवानी हुई,
जैसे श्याम दीवानी मीरा जोगन हुई....
जैसे श्याम दीवानी मीरा जोगन हुई....

©सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)



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न उजाला है, न अँधेरा है।
अभी तो हुआ बस,
साँझ का ही बसेरा है।

दादाजी थामे कोमल हाथ,
प्यारे से पोते - पोतियों का।
ले रहे आनंद मासूमों की,
मदमस्त,अठखेलियों का।
कहते है सूद से ज्यादा,
होता है ब्याज़ प्यारा।
उम्र के इस पड़ाव में लगता है, 
बच्चों का साथ बड़ा ही न्यारा।
पा साथ उन प्यारे बच्चों का, 
बुढ़ापे का सफर हो जाता सुहाना।
पकड़े हाथ बच्चों का,
ले चले घुमाने को दादा।
मस्त हो चला दादा-पोते का
ये प्यारा अनमोल नाता।
दादा के पास है जो,
ज्ञान का बहुमूल्य भंडार।
हँसते - गाते दे रहे वो आज,
बच्चों पास है मेरे बस,
ज्ञान की ही सिर्फ कुंजी।
दे रहा हूँ मैं तुमको,
संस्कारों की पोटली।
रखना इस पोटली को तुम,सदा संभाल
विरासत है ये मेरी जिसे, 
पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ाने की
जिम्मेदारी है तुम राजदुलारों की....
जिम्मेदारी है तुम राजदुलारों की....
©सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)



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सुन मेरी प्यारी भोली बहना,
करवा कंघी हो जा तैयार,
तुझे आज माँ से मिलना है।
लगाया माँ ने धरा पर आज,
अपना अदभुत दरबार,
देखने हमें चलना है।
न देखी तूने माँ की ममता,
प्रश्न ये जगमाता से करना है।
क्यों जन्मते ही माँ का उठा साया,
हम मासूमों पर कहर है ढाया?..
क्यों माँ को हमारी है छीना?.…
क्यों बिन माँ के हमको है जीना?...
क्यों माँ होके बालकों के दर्द से है वो अंजान?..
हाँ!...शायद मूरत है इसलिए वो है बेजान।
बहना!..माँ जगदंबा से ऐसे अनगिनत,
सवालों के जवाब हमें लेना है।
जल्दी से तैयारी कर ले बहना,
दरबार में आज से उसके
डेरा हमें अब है डालना।
द्रवित जरूर होगा माँ का मन,
पुकार सुन जरूर आयेगी अम्बे।
हम मासूमों को भेजा है धरा पर तो,
ममता भी लुटायेगी जगदम्बे।
हाँ!...ममता भी लुटायेगी जगदम्बे।

स्वरचित-सारिका विजयवर्गीय"वीणा"




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"खेल"24मई 2019

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