नीलम अग्रवाल





दिमाग और दिल की,
आपस में बनती नहीं।
दिल कुछ और करना चाहे,
दिमाग की कुछ और रजा है।
जीना भी यारों,बन गयी सजा है।
एक को मनाऊं तो दूजा रूठ जाए,
एक की सुनूं तो दूजा आंसू बहाए।
इस अजीब कसमकस में जां बेहाल है।
कोई बताए मुझे क्या करूं मैं,
दौनो की ही जरूरत पड़ती बार-बार है।
स्वरचित- निलम अग्रवाल, खड़कपुर

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बिषय- उपकार
मानो उपकार उस प्रभु का

जिसने मानुष तन दिया।
मात-पिता, भाई-बहन
प्यारा सा परिवार दिया।

खाने को अन्न, रहने को घर
प्रकृति का संसार दिया।
हवा, पानी,सुरज, चन्द्रमा
फूलों का उपहार दिया।

माना शिकायतें बहुत है।
मगर उनका प्यार भी देखो।
नित शीश झुका झुका कर
उनका शुक्रिया अदा करो।
स्वरचित
निलम अग्रवाल, खड़कपुर

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विषय- फासले
फासले इतने हो गये,
तेरे मेरे दरमियां,
जिसे मिटा पाना
होगा नहीं आसां।

तुम भी वही हो
मैं भी वहीं हूं
फिर भी कुछ तो
बदल गया है यहां।

चाहतों के चाँद को
लग मया ग्रहण
जज्बातों की तपिश
हो गई धुंआ धुंआ।

स्वरचित
निलम अग्रवाल, खड़कपुर


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भावों के मोती
शीर्षक- जनतंत्र
जनतंत्र में न हनन हो
किसी के अधिकारों का
ऊंच-नीच, जाती-धर्म, छुआ-छूत
ना आने पाए, सम्मान हो 
वैगेर भेदभाव के,
सबके ही विचारों का।
सभी को मिले समान सुविधाएं
और आजादी अभिव्यक्ति की
पर किसी हाल में न होने देंना
निंदा अपनी मातृभूमि की।
जान की तरह सम्हालकर रखना
इज्जत अपनी जन्मभूमि की।।
स्वरचित
निलम अग्रवाल, खड़कपुर

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शीर्षक- परिवर्तन
परिवर्तन है नियम इस संसार का

कौन भला इससे बच पाया है।
आज जो मेरा है, 
क्या पता कल तेरा हो जाएगा।
आज जहां अंधेंरा है,
कल उजाला हो जाएगा।
मौसम की तरह
लोगों को बदलते देखा है।
अपनों को अपनों से
किनारा करते देखा है।
मुस्कुराती आंखों में
अश्कों को उभरते देखा है।
दुनिया के रंगमंच में
किरदार बदलते रहते हैं।
कल के नायक को
खलनायक में ढलते देखा है।
ना करना अहंकार अपने धन का
कल जो सिंहासन पर विराजे थे
आज उन्हें राहों पर चलते देखा है।

स्वरचित कविता
निलम अग्रवाल, खड़कपुर

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शोर्षक- इन्द्रथनुष
इन्द्रधनुष से चुराकर सात रंग
मैंने ख्वाबों में अपने रंग भरे।
वक्त के नीर ने,पता नहीं क्यों,
रंग सारे हौले हौले धो दिए।

एक बार फिर, वर्षों के उपरांत
चाह जगी है, देखूं उन ख़्वाबों को।
तितलियों से रंग लेकर भरूंगी
आज ही अपने रंगहीन ख्वाबों को।
स्वरचित
निलम अग्रवाल, खड़कपुर

अहसासों के रंगों ने,हर सै पर अपना जादू चलाया।
मदहोश सबको बनाने, लो फिर फागुन आया।।
हवाओं में उड़ रहा हर तरफ, लाल, गुलाबी,हरा गुलाल,

धवल धरती की चुनरिया,हो गई शर्म से लाल।
खुशीयों से प्रकृति का कण-कण, तन-मन हर्षाया।
मदहोश सबको बनाने,लो फिर फागुन आया।।
छनछन करती चुड़ियां, छम-छम करती पायलीया।
भौंरे तितलियां,नर नारियां, मदमस्त हो गई ये दुनिया।
सब पर प्रीत की भांग के नशे ने अपना रंग जमाया।।
मदहोश सबको बनाने,लो फिर फागुन आया।
स्वरचित- निलम अग्रवाल, खड़कपुर


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शीर्षक- अंकुर
बीज भावों के

बो दिए हृदय में।
आंसुओ से सिंचती रही
रोज सुबह शाम मैं।

वक्त गुजरा अंकुर फूटे
कविता के रूप में।
हौले हौले अंकुर ये
पहले पौध फिर पेड़ बना।

खुशी-दर्द, घृणा-प्रेम के
अनगिनत फल लगते रहे।
पतझड़ बसंत,बारीश गरम
सम भाव से सहते रहे।।
स्वरचित कविता
निलम अग्रवाल, खड़कपुर


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तुझसे दूर जाना अब तो, 
नामुमकिन सा लगने लगा।
समझ में बिल्कुल नहीं आता
कैसा ये रोग मुझको लगा।
तन के रोग की तो है जहां में
दवाएं कई, इलाज हजार।
मन का मर्ज, किसी वैद्य को
समझाए से समझ न आता।
ना नींद है,ना चैन है मुझको
हर क्षण भार सा क्यूं लगे,
मौत भी मयस्सर हुई नहीं
दर्दे अब और सहा न जाता।
स्वरचित- निलम अग्रवाल, खड़कपुर


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दिनभर के काम से थककर
रात को जब आती हूं बिस्तर पर
तुम्हारी याद के काले-काले बादल
छा जाते हैं मेरे सुने सुने दिल पर
और बरस पड़ती हैं आँखे मेरी
बेऋत की बरसात की तरह।

काश कि कोई झोंका हवा का
उड़ा ले जाए इन बादलों को
दूर कहीं विराने में बरसने के लिए।
ताकि मैं सो सकूं सुकून से।
मेरे पत्थर बन चुके दिल को,
अब जरूरत नहीं रही इनकी।।
स्वरचित- निलम अग्रवाल, खड़कपुर


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कौन कहता है कि नारी अकेली है, अबला है, बेचारी है।
हर क्षेत्र में एक-एक नारी,सौ-सौ पुरूषों पर पड़ी भारी हैं।।
आखिर क्यों उन्हें बेबश, लाचार और हीन समझा जाता है,
जबकि नारी ही पुरुष की, जन्मदाता भाग्य विधाता हैं।
नारी श्रद्धा है, प्रेम है ,विश्वास है, और सबसे खास है।
नारी जन्म ही नहीं देती,हर इंसान के जीने की आस है।
दया, क्षमा, सहनशीलता की यूं तो ये प्रतिमा है,
मगर बन जाती दूर्गा, काली जब बढ़ जाती यातना है।
जुल्म अगर करना गलत है,तो सहना महापाप है।
चुप्पी भी एक हदतक सही है वरना यह भी तो शाप है।।
जबतक नारी समझती रहेगी, खुद को पुरूष की दासी,
कौई कभी-भी ना दूर कर सकेगा, उसके जीवन की उदासी।
अपने हक के लिए नारी को खुद ही आगे बढ़ना होगा।
अन्याय अत्याचार के खिलाफ, डटकर लडना होगा।
स्वरचित- निलम अग्रवाल ,खड़कपुर


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ मेरी गुड़िया सो री।
तुझे सुनाऊं लोरी।
सपना सलोना कोई

आएगा चोरी चोरी।
आओ चंदा मामा,
बनेंगे हमजोली।
मत खेलो तुम तारों 
हमसे आंख-मिचौली।
हौले हौले हवा चली
रात भी अब ढली
बांध रे निंदिया रानी
प्रीत की अब डोरी।
मेरी गुड़िया गोरी
दुध भरी कटोरी।
सो री, गुड़िया,सो री।
तुझे सुनाऊं लोरी।।
निलम अग्रवाल, खड़कपुर

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उजाले को चाहो मगर,
अंधेरे से यूं नडरो।
बुरा यहां कोई नहीं,

सोचो जरा गौर करो।।

क्या भरोसा है यहां,
वक्त के थपेड़ो का,
आज जो उठा रहा है,
कल वो ही डूबो देगा।
अपने गैर का फर्क भूल
गम सबसे उधार करो
बुरा यहां कोई नहीं
सोचो जरा गौर करो।

धुप छांव दुनिया है,
गम और खुशीयां है।
नेह का बंधन ही,
हर मर्ज की दवा है।
मर्ज घातक हो जाए
इससे पहले उपचार करो।
बुरा यहां कोई नहीं
सोचो जरा गौर करो।
निलम अग्रवाल, खड़कपुर

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जहर सी है जिन्दगी, अमृत सा है मां का प्यार।
धूप सी है जिन्दगी, छांव सा है मां का प्यार।।
ईश्वर प्रदत्त शायद, यही सर्वोत्तम उपहार है,

पहली खुशबू,पहला अहसास है मां का प्यार।
धैर्य, ममता की पुंजी, सहनशीलता की कुंजी है,
हौसलों की एक सही मिसाल है मां का प्यार।

 जो भी मांगोगे मिल जाएगा वैगेर किसी ना-नुकुर के,
भानुमती का अदृश्य पिटारा है मां का प्यार।
असफलता में भी होता है सफलता का गुमान,
बिगडी हर बात बनाने वाला होता है मां का प्यार।
नामुमकिन इस अहसास को शब्दों में कह पाना,
ऐसा दुआओं का अखंड भंडार है मां का प्यार।
निलम अग्रवाल, खड़कपुर
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मेरे दिल की दहलीज पर
न रखा आज तक किसी ने कदम।
घर के बंद दरवाजों पर

न हुई आज तक कहीं कोई दस्तक।
इंतजार करता रहा,
ख़ामोशी से बैठा रहा।
हद हो गई अब तो इंतजार की,
अब किसी के आने की
कोई उम्मीद नहीं बची।
अपनी ख्वाहिशों की,
खुद मैंने चिता जला दी।।
निलम अग्रवाल, खड़कपुर
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सुर्य की तरह जलकर,
नीत ज्ञान प्रकाश फैलाएं।
लक्ष्य एक ही हो हमारा,

अज्ञान को समूल मिटाएं।।

प्रेम,दया, सद्भाव का,
हरओर झंड़ा फहराएं।
उमंग, आनन्द, संस्कार का,
घर घर में दीप जलाएं।।

तितलियों सी पलकों पर,
रंग-बिरंगे ख्वाब सजाएं।
पंखुड़ियों से लबों पर,
मासुम मुस्कान सजाएं।।

सारा जहां है हमारा,
यही सोच कर कदम बढाएं।
लोभ, क्रोध, घृणा को,
हर दिल से दूर भगाएं।।
निलम अग्रवाला, खड़कपुर
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भावों के मोती
शीर्षक- दर्पण/ आइना
तु मेरा आईना,ओ पीया
दिखे तुझमें अक्श मेरा।
संवर जाती हूं मैं देख तुझे
निखर जाता है रूप मेरा।

बिन देखे तुझे कैसे मैं रहूं
ये विरहा के पल कैसे सहूं
तुझे देख के शाम होती है
देख तुझे होता है सबेरा।
स्वरचित
निलम अग्रवाल, खड़कपुर

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भावों के मोती
शीर्षक- नीयत
अगर कदम बढ़ाओगे
नीयत  अपनी साफ रखकर,
तो मंज़िल जरूर मिलेगी।
सच्चे लोगों के साथ,
हमेशा ईश्वर रहता है,
कामयाबी का स्वाद वही चखता है।
तुम अपना कर्तव्य करते रहना।
दुनिया की परवा न करते हुए
बस आगे बढ़ते रहना।
स्वरचित- निलम अग्रवाल, खड़कपुर

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भावों के मोती
शीर्षक- शाख/ डाली
शाख से टूट कर फूल
  कभी खिल नहीं सकते।
मां-बाप से बिछड़ कर 
  हम खुश रह नहीं सकते।
जिसने हमें दी जिंदगी
  करेंगे हम उनकी बंदगी।
तभी हंसेगी आंगन में चांदनी।
  अंधेरे दिल में होगी रोशनी।
सांसों के बिना जिस्म का
    कोई मोल नहीं होता।
संस्कार के बैगेर शीक्षा का
    कोई मतलब नहीं होता।
हम सब लताएं बैगेर सहारे
    आगे बढ़ नहीं सकते।
आंखें हैं मां-बाप हमारी
    सही राह जो हमें दिखाते।

स्वरचित- निलम अग्रवाल, खड़कपुर

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"गुमनाम"12नवम्बर 2019

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