सुमित्रानंदन पन्त





"लेखक परिचय"

01)नाम:- सुमित्रा नन्दन पन्त
02)जन्मतिथि:- सहित):-20 मई 1947
03)जन्म स्थान:-इन्दौर मध्य प्रदेश
04)शिक्षा:- डिप्लोमा इन इलेक्ट्रिकल इन्जीनियरिंग
05)सृजन की विधाएँ:- कविता
06)प्रकाशित कृतियाँ:-कोई नहीं
07)कोई भी सम्मान:- कोई नहीं
08)संप्रति(पेशा/व्यवसाय):-इलेक्ट्रिकल पैनल्स का निर्माण
09)संपर्क सूत्र(पूर्ण पता):-176,विजय बाड़ी, पथ नम्बर 2, सीकर रोड, जयपुर। राजस्थान
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च्चों को समर्पित
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तुम्हारी किलकारी भी तो, मन्त्रों सी होती परिपूर्ण,
क्योंकि इसमें मुख्यरूप से प्रकृति ही होती है घूर्ण,
मैं भी ऐसे मधुर क्षणों में, तुम्हारे चरणों में लोट जाता हूँ,
तुम्हारे मृदुल चरण प्रहारों के बीच मुस्कराता हूँ,
मेरी तो है यह भी पूजा,मैं गीत खुशी के गाता हूँ,
तुम किलकारी में डूबे रहते, मैं धन्य हो जाता हूँ।


तुम्हें हँसाने की प्रक्रिया भी,कोई तप से कम नहीं है,
दुनियाँ की किसी खुशी से, यह खुशी भी कम नहीं है,
तुम्हारे हँसने से ही केवल,ऐसा उजाला हो जाता
मेरे मन का अंधियारा भी,तुम्हारी निश्छलता में सिमट जाता।

कृष्ण तुम्हारा आव्हान करता,तुम भी ज़रूर आना,
मेरे मन की बगिया को,आकर के महका जाना,
वैसी ही लकुटी कामरिया दूँगा जैसी तुम पहना करते थे,
साहित्यिक शैली में जिसको , मन का हरना कहते थे,
नन्हीं सी बाँसुरिया दूँगा,मोर पंख भी दे दूँगा,
तुम्हें लुभाने के लिये,एक छोटा शंख भी दे दूँगा,
तुम आओ , तुम आओ , प्रियतम देखो तुम आओ,
प्रकृति को फिर से खिलाओ,पाँञजन्य शंख बजाओ।

¤ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

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पत्थरबाजों अब तो समझो
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आतंकी गतिविधि में तुम,देखते रहे मरीचिका
अब समझ में आई तुम्हें ,इसकी घोर विभीषिका
पत्थरबाजों तुम देख रहे, इस करतूत में अपना भविष्य
स्वर्ग की घाटी नरक बनाते ,तुम गुरु और शिष्य।





धारा 370 का तुमने, किया नहीं कभी सम्मान
मिला हुआ था यह तुम्हें ,कितना बड़ा सुन्दर वरदान
भारत माँ के आँचल का अरे, कुछ तो कर देते गुणगान
तुम तो लेने ही लगे, छल से योद्धाओं के प्राण।


आतंकी आका तुम्हारे ,अब नहीं छुप पायेंगे
अब हमारे योद्धा भी, रणभेरी अवश्य बजायेंगे
तुम समझो अपने हित को, और नादानी मत करो
वरना तुम्हारी प्रगति के, अरमान यूँ ही जल जायेंगे।
मुख्य धारा में बने रहते, भविष्य करते अपना सुनहरा
तुम्हीं देख लो यौवन तुम्हारा, रहता होगा डरा डरा
तुम्हें भी लगता होगा ,अब मरा, और तब मरा
आतंकियों का संग होता, देख लो कितना दर्द भरा।
पाक के चेहरे पर, है घबराहट
उसने सुनी है ,विनाश की आहट
आसमान को, वह अब ताक रहा
मिल जाये कोई,बस अब राहत
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तुम्हारे हाथ सारी कमान
तुम्हीं तो हो हमारी शान
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मानवीय मर्यादा भंग हुई
केसर क्यारी बदरंग हुई
मन की गली यूँ तंग हुई
शान्ति हतप्रभ और दंग हुई।





पत्थरबाजो़ का जमघट था
प्रहार झेलता संयम पट था
सब कुछ लगता अटपट था
सिकुड़ता हुआ शौर्य तट था।


हथियार थे पर एकदम मौन
इनकी चुप्पी को तोडे़ कौन
शस्त्र उठाने की आज्ञा नहीं बिल्कुल
इतने विवश थे आज के द्रोण।
धधक रहे मन में सबके शोले
हर योद्धा शस्त्रों की शैली में बोले
मुद्दतों बाद ही आई ऐसी घडी़
अब संयम की तुला में र्क्यों धैर्य तोले।
ऐसी गूँजा दो अपनी ललकार
शत्रु करने लगे अब हाहाकार
लाहौर कराची तक पहुँचे
तुम्हारी रौद्र पूर्ण यह हुंकार।
अब सब कुछ ही निपटाना है
शौर्य का दिया वहीं जलाना है
मन में ठान लो बस एक बात
अपना ध्वज वहीं फहराना है।
जय हिन्द जय भारत
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रणबाँकुरों से
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आतंकियोंं की मिटा दो सारी कहानी
बढ़ रही है इनकी दिनों दिन हैवानी
पिला दो इनको अब ऐसा तुम पानी
कि देखते रहें ये मौत की सुनामी।
जय भवानी से गूँज रहा कोना कोना
छीन लो जीवन का अब इनसे बिछौना
इनका तो हर आचरण ही है बौना
हम रहे सवा तो ये रहे पौना।
लाहौर कराची की ओर हो जाओ अग्रसर
अपने पगों की गति अब बढा़ओ तत्पर
जल थल और ये वायु बह रही
सर सर
कहते है सब कुछ अब तुम पर ही निर्भर।
ये तीनों मार्ग ही हैं अब तुम्हारे
इनका हर पल ही तुमको पुकारे
भारत की ज़मीं के तुम हो सितारे
कशमीर की घाटी तुम्हें अब निहारे।
कश्मीर का सौन्दर्य लाना है
विस्थापितों को पुनः बसाना है
अब नहीं करना है समझौता कोई
केवल तिरंगा वहाँ फहराना है।
जय हिन्दी जय भारत

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कश्मीरी वादियों से
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अब खींचो सदा के लिये, अपने हाथ की लगाम
अब धारा 370 का, नहीं रहा कोई काम
हिन्दू भाइयों को फिर से, अब शीघ्र बसाना होगा
उनको अच्छी तरह फिर से ,अपने घरों में लाना होगा।
ये पीओ के क्या है, सब कुछ तो हमारा है
कश्मीर की बहारों ने ,अदब से हमें पुकारा है
यहाँ की वादियों को ,स्वच्छ अभियान में लाना होगा
हर आततायी को यहाँ से, अब तुरन्त निपटाना होगा।
अभी ही अवसर है ,अभी हर कोई जागा है
जयचन्दों के षणयन्त्रों का ,टूट रहा अब धागा है
आज जन जन का एक ही ,झलक रहा इरादा है
घाटी दुष्टों से मुक्त करेंगे, हम सबका यह वादा है।
आज हर जगह ही एक ,अदभुत चेतना जागी है
आज बेचैन हो रहा, हर निर्मम
अपराधी है
आज हटा दो नक्शे से, हर वो आतंकी चेहरा
जिसने मानवता की सीमा,यूँ एकदम लांघी है।
केसर की क्यारी लहराये
पूरी घाटी को फिर से महकाये
हमारी वीर भारतीय सेना
अपने तिरंगे को गर्व से लहराये
जय हिन्द

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आरपार होने दो
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पाक !तुझे अब धूल चटानी होगी
पाक! तुझे तेरी नानी याद दिलानी होगी
पाक !तुझे अब मुँह की खानी होगी
पाक ! तेरी बन्द आतंकी मनमानी होगी।
उन्नीस सौ इकहत्तर अब याद दिलाना होगा
लाहौर कराँची को निशाना बनाना होगा
यदि चैन की नींद लेनी है तो
वहाँ तिरंगा अब फहराना होगा।
सारे भुलाने होंगे अब आपसी मतभेद
भूलना होगा अब प्रकट करना कोई खेद
हमारे रणबाँकुरों को शौर्य दिखाने दो
पाक के माथे पर झलकना चाहिये स्वेद।
ऐसा नहीं की शक की सुई इन पर घूमी है
पाक तो आतंकियों की जन्म भूमि है
अब इस जड़ को ही मिटाना होगा
यह पूरे देश की पीड़ा है जो अन्दरूनी है।
अब छद्म से! माँ की न कोई गोद छूटे
अब छद्म से! सुहागन का न कोई श्रृंगार लूटे
अब छद्म से! बच्चों का न हाथ पिता से रुठे
अब छद्म से! भाई बहन का न सम्बन्ध टूटे।
कब तक शौर्य का लहू बहेगा?
कब तक योद्धा पत्थर सहेगा?
कब तक वीर वह चुप रहेगा?
कब तक शस्त्र से वह कुछ न कहेगा?
इतिहास का प्रश्न यह सदा बनेगा
इसका पन्ना देखना लहू से सनेगा
इसी तरह ही बहेगी यदि रक्त धारा
तो फिर राष्ट्रीय पर्व कोई कैसे मनेगा।
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बहुत हो चुका
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कब तक खोयेंगे आखि़र ,इस तरह हम अपने लाल
क्यों नहीं गूँजा देते हम, जय महाकाल जय महाकाल
आततायियों दुष्टों की, सफल क्यों होती षणयन्त्री चाल
क्यों नहीं इनके उदर से,खंज़र हम देते निकाल।
बोल दो एक बार में,जय भवानी, जय भवानी
मिटा दो एक बार में, इनकी सारी ही निशानी
कहाँ समझ पाते हैं ये, प्यार भरी शान्त वानी
अब तो समाप्त कर दो, इनकी सारी ही कहानी।
लेना होगा इनसे हिसाब, हमारे हर सपूत का
कराना होगा इनसे परिचय, अब मृत्यु के दूत का
ये तो समझेंगे केवल,शस्त्रों की ही परिभाषा
पूरी कर दो एक बार में, मृत्यु की इनकी अभिलाषा।
हमारे रणबाँकुरे इस तरह , छद्म शैली के शिकार बनें
क्यों नहीं हम इनके लिये, एक बार में हाहाकार बनें
ये हमारे मृदु भावों के, बसन्त नहीं कभी चाहते
क्यों नहीं हम इनके लिये अब, नाश भरी चीत्कार बने।
अब शस्त्रों की शैली में बोलो
अस्त्रों को ही लेकर डोलो
बाघा वाली बोर्डर पर अब
मिठाई के डब्बे मत खोलो।
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चाह बसन्त
वाह बसन्त
प्रकृति ने कर लिया,अपना अद्भुत श्रंगार
नव कोपलें दमक उठीं, सौन्दर्य हुआ साकार
पीला आंचल लहरा रहा, दे रहा संदेश
प्रियतम तुम भी धार लो ,रंगीले से परिवेश।
हवायें हैं उन्माद भरी, आंखों में खुमार
मन में भी मचल रही, बासन्ती बयार
आज दे दूॅ मैं तुम्हें ,बाहों के उपहार
बासन्ती बेला है देखो, करो नहीं इन्कार।
प्रकृति के पास निराले ,रंग बिरंगे शब्द
जितने गहरे जाओगे, हो जाओगे निशब्द
सौन्दर्य की छाई है, एक से एक आकृष्ट शैली
जिस ओर देखोगे तुम, पाओगे दुल्हन नवेली।
जीवन तो निश्चित नहीं, हो जाये कब अन्त
क्यों न फिर मनालें हम, झूम कर बसन्त
सरसों भी दिखा रही ,अपना यही मन्तव्य
थिरकने दो मन को ज़रा, छटा है कितनी भव्य।

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नन्हीं परी का दुलार
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कितना प्यारा था उसका सम्मोहन
वह दादा दादा करती जब सम्बोधन
इस बोल में भर अपनी अनुपम मिठास
वो आई मन में भर कर उल्लास।
अंगूर को कहती थी अन्नुन अन्नुन
मुझे खिलाने की उसमें चढ़
गई धुन
पहले चूसे अंगूर उसने थोड़े थोडे़
फिर मेरे लिये भी उसने रख छोड़े।
मेरे मना करने पर भी वह नहीं मानी
उसने अन्नुन खिलाने की थी ठानी
तुतलाती तुतलाती उसकी मधुर वाणी
जादू कर गई मुझ पर यह नन्हीं रानी।
प्रकृति प्रदत्त गुण नन्हीं में आया
अन्नपूर्णा की दिखी इसमें छाया
नारी मन कितना अदभुत होता
इस छोटी ने यही दिखलाया।
मेरे लिये यह अनुपम प्रसाद
मुझे तो रहेगा सदा ही याद
निश्छल निर्मल संगत में ही
ओम् ओम् के गूँजते रहते नाद।
बाल जगत को साष्टांग दण्डवत्
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अधूरा बसन्त
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तुम भी नही होते अवतरित अनन्त,
मानवता भी खो रही अपना बसन्त,
क्या यूँ ही यह सब चलता रहेगा ?
क्या हो जायेगा यूँ ही प्रलयंकारी अन्त?
हम ही करते हमारा ये जीवन अभिषप्त,
फिर कैसे होंगे हम कभी तृप्त?
हमने ही तो काटे हैं ये पेड़,
जल स्त्रोतों से करी है छेड़।
जल स्तर घटा,धरा हुई बंजर
विनाश का दिखता दूर तक मंज़र
ये वन सम्पदा का यू़ँ ही नष्ट होना
हम ही चलाते हैं हम पर अब खँज़र।
वायु प्रदूषण, वाक् शैली प्रदूषण,ध्वनि प्रदूषण,
जातपाँत वैमनस्यता के छाये ये घर्षण,
बलात्कार, और कन्या भ्रूण परीक्षण,
हम खो रहे जीवन का असली दर्शन।
मानवता के हो गये धीमे अब स्वर,
विषमतायें बढ़ातीं रहती हैं ज्वर,
आदर्शों के छाये सब ओर पतझर,
आतंकी छाया ,बढा़ती है डर।
प्रकृति! तुम धन्य, तुम देती बसन्त,
करती हो पतझर का सब ओर ही अन्त,
खुशहाल करतीं दिगदिगन्त,
तुम्हारा तो प्रभावी सारा ही तन्त्र।
हम में ही नहीं कोई है पूरा,
इसलिये ही हमारा बसन्त अधूरा,
हमारी लालसाओं ने हमको यूँ घूरा,
कि प्रेम पात्र का हो गया पूरा चूरा।

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बादल
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सुन धरा! मैं तेरा चिर प्रेमी
तू हो जाती है क्यों वहमी
क्यों रहती है सहमी सहमी
क्यों रखती कोई ग़लत फहमी।
मैं बादल हूॅ एक दीवाना
सबको दिखता पर मस्ताना
तेरे लिये ही फिरता रहता
फिर भी कहते मुझको बेगाना।
कर दूंगा सुनहरी तुझे धरा
तेरा आॅचल कर दूंगा हरा
तेरा वक्ष रहेगा भरा भरा
तुझसे निकलेगा सोना खरा खरा।
मैं तुझे बसन्ती राग सुनाऊंगा
तुझमें प्रेम पराग भर जाऊंगा
तेरी चूनर को रंग जाऊंगा
और एक नई उमंग जगाऊंगा।
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मेरी पुरानी रचना
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वृध्दजन
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अपने अनुभवों से ,ये खूब समृध्द हैं,
उम्र के इस दौर में,कहलाते लेकिन वृध्द हैं,
इनकी आँख में,समय की गहराई है,
इनके माध्यम से इन्होंने,अपनी करूणा बहाई है।
इनके होठ यौवन की ,उड़ान बतायेंगे,
कैसे छूते हैं आसमान, तरीके बतायेंगे,
इनकी बाहों में ,प्रेम के आलिंगन हैं,
इनके हाथों में,आशीषों के कंगन हैं।
लोरियों की सरिता,ये ही तो बहाते हैं,
सपनों की सुनहरी,गोद में सुलाते हैं,
रिश्तों से लबालब, गंगा में नहलाते हैं,
गरिमाओं से परिचय,ये ही तो कराते हैं।
मई हो या फिर, जून का माह,
देते हैं अपनी,शीतल छाँह,
समस्या भाँपती,इनकी निगाह,
सुझा देती,सुलभ सी राह।
ये वृध्द जन नहीं, प्रियजन हैं,
अपने अपने समय की,गर्जन हैं,
इनकी सेवा,पुर्ण्यों का अर्जन है,
एक सीमा तक,पापों का विसर्जन है।
उम्र का यह पड़ाव,माँगता है केवल जुड़ाव,
पीड़ामय होता बहुत,अवसान का यह पड़ाव,
थोड़े से कठोर शब्द,बना देते ऐसे घाव,
धीरे धीरे होता रहता,अन्त तक उनमें रिसाव।
अंग करने लगते हैं,रोज़ रोज़ विद्रोह,
सह नहीं सकते ये,कोई भी विछोह,
इनके प्रति रखते हैं,जो भी कोई मोह,
तो ईश्वर भी रखता है,उनकी सदा टोह।
अतः वृध्दों के साथ बितायें,थोड़ी सी अपनी शाम,
आत्मा को मिलेगा,एक बहुत सुखद विश्राम।

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माँ सरस्वती
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माँ सरस्वती !आप वीणा धारिणी
माँ सरस्वती !आप अज्ञान निवारिणी
माँ सरस्वती! आप विध्यादायिनी
माँ सरस्वती! आप मधुर भाषिनी।
माँ !मेरी जिव्हा में वास करो
माँ !मेरी मति में प्रवास करो
माँ !मुझ में अध्यात्म प्रकाश करो
माँ !मेरे अन्धकार का नाश करो।
तुम्हारा मिले जिसको आशीष
ऊँचा रहता उसका शीश
वह निर्णय अच्छे तत्काल लेता
नहीं बाधक होती कोई बन्दिश।
माँ! स्वीकार करो मेरे वन्दन
अर्पित तुम्हें रोली और चन्दन
शरण में तुम्हारी सदा पडा़
मै सुमित्रा नन्दन, माँ मैं सुमित्रा नन्दन।


बासन्ती अलाप
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यह प्रकृति का श्रृंगार काल है
बागों में निखर रही डाल डाल है
सौन्दर्य भी परिभाषित हो रहा
प्रकृति यौवन से मालामाल है।
पतझर के सुर विलुप्त हुए
लम्बे समय को सुप्त हुए
पेड़ पौधे और फूल पत्ते
नव जीवन से युक्त हुए।
सरसों का पीला आँचल लहराता
इठलाता झूमता मदमाता
गेहूँ जौ का दल भी मण्डराता
नये उल्लास को मन में भर जाता।
भोरों का समूह जाग उठा
खुशी में झूमता बाग उठा
तितलियों ने रंग बिखेरे
आँखें मलता उन्माद उठा।
मधुमक्खियों ने छेडी़ नई राग
झूम उठीं वो देख पराग
चंग के दीवाने थिरक उठे
मुस्कराया जब दूर से फाग।
और इस तरह फिर बसन्त आया
पतझर रोया और मुरझाया।

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अनुपम बसन्त
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बसन्त प्रकृति का प्यार है,
एक अनुपम उपहार है,
तुम ही देख लो हर ज़गह ,
ये कैसे करती दुलार है।
आओ ! हम भी ,गुनगुनालें,
अपनी ये बाहें, फैलालें
उमंग भरा यह ,बसन्त मनालें,
पीली चुनरिया को महका लें।
चलो कर लें फिर से, हाथ पीले
नये जोडे़ की तरह, हो जायें रंगीले
क्यों रहें हम, बताओ ढीले,
सौन्दर्य भाव में, क्यों न हो जायें गीले।
प्रकृति का यौवन,कितना मधुर है,
सरसों का अनुपम, बजता नुपुर है,
भँवर का भी गूँजता, मस्त सुर है,
यही प्रेमालाप का ,अनोखा गुर है।
आओ! बसन्त का अभिनन्दन कर दें,
प्रकृति का भी,वन्दन कर दें,
हमें कितनी चीजें यह, न्योछावर करती,
हम कृतज्ञता का इसमें,चन्दन भर दें।

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स्वागत तुम्हारा
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तुम आओगे सुनकर दिल झूम गया,
बहारो का दल मेरे मुँह को चूम गया,
वो मन की धरती जो बंज़र थी,
बसंन्त वहाँ शहनाई लेकर घूम गया।
अब देखना तुम, अमावस में उजियारा होगा,
मन के गगन पर, उम्मीदों का तारा होगा,
बस खुशी के ही, मधुर गीत होंगे,
पतझर से दूर अब किनारा होगा।
वक्त ने तन्हाईयों का साथ दिया था
सपनों पर मेरे कुठाराघात किया था
मन की स्थिति बहुत गम्भीर थी
घायल मेरा हर जज़्बात किया था।
जो बीत गया अब क्यों रोना
आशा के बीजों को है अब बोना
निराशायें तो हतोत्साह करतीं
जबकि जीवन तो है ख़रा सोना।

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वो पेड़
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मेरे घर के रास्ते ,में वो पेड़ था,
उम्र की कहूॅ, तो अधेड़ था,
हमने अपने नेकर युग में, उसके नीचे कई खेल खेले थे,
उस बेचारे ने हमारे, प्रहार भी झेले थे,
गर्मियों मे हमारे साथ, वो व्यस्त रहता था,
हमें खेलता देख, वो मस्त रहता था,
गुलाम लकड़ी, गुल्ली डण्डा, सतोलिये जैसे खेल थे,
पूरी ही टोली में, बहुत गहरे तालमेल थे,
छुट्टीयों मे लगता था हमें, अच्छा उसका ही संग,
वो भी देता रहता था हमें, छोटी बड़ी पतंग।
इन दिनों शायद, बसन्त से उसका विवाद है,
इसका उसे भी, अवसाद है,
वो पतझर को चाहे, फिरौति देता है,
पर हमारे लिये, बचे खुचे पत्तों से,
धूप को चुनौति, देता है,
हम ही कृतघ्न हैं, कुछ नहीं सोचते हैं,
हमेशा उसका, कुछ न कुछ नोचते हैं,
हमने कभी नहीं समझी, उसकी पीड़ा,
कौन उठायेगा फिर, उसको हरा भरा करने का बीड़ा,
मेरी कलम रूक गई,
ऑख शर्म से झुक गई।

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दिव्याँगों को समर्पित
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दिव्याँगता ऐसा कटु अभिशाप है
जिसमें जीवन का मौन विलाप है
यह कुटिलता पूर्ण दुर्भाग्य की
छद्म पूर्ण विषैली छाप है।
बसन्त में भी पतझर ताल ठोकता
गतिमान रहने पर मुआ रोकता
उमंगों की लय नहीं बनने देता
हर आरोह अवरोह पर सदा टोकता।
फिर भी यह जीवन उपवन बनाना है
इसमें ही सुन्दर मधुवन लाना है
उमंगों को कोकिला बनाकर
जीवन के मधुर गीत को गाना है।
चलो उर्जामय अनुष्ठान कर लें
कुछ उमंगमय इसमें प्राण भर लें
यह जीवन अब भी एक वीणा है
आज इसके झंकृत तार कर लें।
कोई मरुभूमि नहीं है अपना मन
आने दो किरणों को छन छन छन
अध्यात्म ज्योत भी जल जायेगी
खिल जायेगा यह अन्तरमन
कृष्णम् शरणम् गच्छामि
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तुम निराले हो शिशु
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मन हुआ भाव विभोर, कैसा अदभुत है यह शोर,
सोचा क्यों न नाच लूँ,नाचे वन का जैसे मोर,
तुम्हारी पगध्वनि भी, उकसाने लगी फिर मुझे,
पास बुलाने लगी मुझे, रिझाने भी लगी मुझे,
लेकिन मन के नृत्य की तो, होती अलग ही है विधि,
जिसका भी मन नाच ले, उसके पास ही है निधि,
तुम्हारी हर अदा पर, होठों पर एक गान होगा,
तुम्हारी हर मुस्कान पर, सामने भगवान होगा।
लोग मुझे पागल कहेंगे, यही होगी चरम सीमा,
पग उठेगा फिर गिरेगा, फिर चलेगा धीमा धीमा,
साँस के दोरौं का क्या, कब चलें कब बन्द हों,
फिर क्यों न मन की मान लूँ, क्यों बेकार द्वन्द हों,
इसलिये आज तो बस नृत्य होगा,नृत्य होगा ,नृत्य होगा,
और असल में जीवन का, पूरा ही आधिपत्य होगा।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
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उन्मुक्त उडा़न
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गीत लिख दूँ मैं सृजन का,
लहलहाते उस चमन का,
कोकिला भी गीत गाये,
बसन्त आये फिर न जाये,
जगह जगह झूले लगे हों,
ललना खड़ी हो मुस्कराये,
स्वागत करूँ खुशियों के आगमन का,
गीत लिख दूँ मैं सृजन का।
मेघ भी अपने गीत लिख दें,
जीवन के संगीत लिख दें,
धरती के लिये मीत लिख दें,
भीगी भीगी प्रीत लिख दें,
और रस्ता बन्द हो, पतझर के दमन का,
गीत लिख दूँ मैं सृजन का।
तुम भी प्रियवर मेरे आना,
तुम ही खुशियों का खज़ाना,
अग़र रहे इसमें वीराना,
अपना रंग इसमें भर जाना,
यह मौन निमन्त्रण तुम्हें है सजन का
गीत लिख दूँ मैं सृजन का।
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जब प्रकृति ने हस्ताक्षर किये
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प्रकृति ने अपने हस्ताक्षर की, जब कर ली पहली तैय्यारी,
सबसे पहले दिखी उसे,सुन्दर सी भोली नारी,
फिर उस भोली के लिये, उसने सुन्दर सा एक रंग बिखेरा,
इसी तरह बन कर आया , नर के रुप में एक चितेरा।
यहीं से फिर सृजित हुआ ,भोला सा चित्त और चितवन,
एक उमंगित मधुर राग ,और उसकी मोहक सी थिरकन,
प्रेम के मंच पर हो गये वो, प्यारी सजनी और साजन,
दोनों के दिल झूम उठे, फिर बन गये रानी और राजन।
हाँ! इसी तरह,सृष्टि में ,बिखरा सब ओर ही चन्दन,
एक सुन्दर मंच बना,हुआ दोनों का अभिनन्दन,
फिर कल्पनायें उभरीं,और हो गया, मधुर बन्धन,
यहीं से आरम्भ हुआ,मानवीय सभ्यता का वन्दन।
कृष्णम् शरणम् गच्छामि
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जीवन पर्यन्त शुभकामनाओं का इच्छापत्र
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ईश्वर का मनोरम, वह झरना,
काम जिसका, तापों को है हरना,
कराता रहे ,आपको सदा स्नान,
कहते हम, जिसको मुस्कान।
और बात बात में, हर बात
प्रभात, दोपहर, हो या रात,
खुशियाँ आयें अकस्मात,
और प्रेम की हो सुखद बरसात।
यह सब चले जीवन पर्यन्त,
ऐसी कृपा करें अनन्त,
निर्मल मन से कह रहा,
सुमित्रा नन्दन पन्त।

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तुझे मालूम है
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बसन्त आया मैं डूब गया,
पतझर आया मैं ऊब गया,
यही बात बस जानी सच,
खुशी के साथ छिपी खच खच।
दुखी हुआ तो विरक्ति हुई,
चकाचौंध में पर आसक्ति हुई,
उलझनों में इस तरह उलझा,
ना शक्ति रही, ना भक्ति रही।
अब मंच का पर्दा,गिरने को है,
अब कौन सा अभिनय ,करने को है,
अब तो जो भी है,विस्मय करने को है,
अब तो अन्तिम दूरी भी,तय करने को है।
पथ में कहीं कोई,परिवर्तन नहीं,
अब भी तेरे प्रति कोई,तड़पन नहीं,
तेरे स्मरण में ही,बीत जायें ये साँसें,
ऐसी भी मुझमें कोई, धड़कन नहीं।
फिर भी न जाने,उम्मीद क्यों ऐसी,
ना होने देगा बात,अब पहले जैसी,
तू भुला देगा,बातें पुरानी,
भूला देगा ,मेरी सारी नादानी।
और देगा तू ,अपना अवलम्ब,
नहीं करेगा,बिल्कुल विलम्ब,
नहला देगा अपनी,किरणों से ऐसे,
कि मिट जायेगा सारा,झूठा ये दम्भ।
कृष्णम् शरणम् गच्छामि

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वृक्ष उवाच
☆☆☆☆☆
तुमने आलीशान बनाये झूले,
पर तुम तो मुझको ही भूले,
मैंने ही तो पहली बार तुम्हें झूलाया था,
और ऊँचाई से परिचय करवाया था।
मेरे ऊपर रस्सी बाँध तुम झूले थे,
और खुशी में खूब फूले थे,
वातावरण सारा प्रकृति का दिखता था,
उड़ता ऑचल हवा की तरूणाई लिखता था,
बाग बगीचे गवाह थे,
सुगन्धित वायु के प्रवाह थे।
तुम्हारे आलीशान झूलों में एकाकीपन है,
इनमें वैसा नहीं यौवन और बचपन है।
मेरे ऊपर रस्सी बाँधी तुमने, लो मैं तैय्यार होगया,
मुझमें झूलने वाला , एक सुन्दर परिवार हो गया,
तुम्हारे झूलों का ,होता तो बहुत चर्चा है,
पर इसमें बताओ , आता कितना खर्चा है,
अर्थशास्त्र -समाजशास्त्र का नहीं इसमें मेल है,
केवल कुछ लोगों के आनन्द का ही यह खेल है।
मैं तो हर वर्ग का उत्साह बढ़ाता था,
ऊँचा ऊँचा उन्हें झूलाता था,
ठण्डी ठण्डी छाया दे कर,
उनके दुख भुलाता था।
अधिक कहना ,नहीं मेरी आदत है,
कुछ न कुछ देते रहना,
यह बहुत बड़ी इबादत है।
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की मैं झूठ बोलियाँ
प्रीत में केवल ,सम्मान होता है,
वहाँ नहीं ,अभिमान होता है,
एक दूजे की, श्वास होती,
और श्वास में ,ही प्राण होता है।
प्रेमपत्री में प्रेम का ,अलग स्थान होता है,
प्रियतम के चेहरे पर, चन्द्र शोभायमान होता है,
चन्द्रकिरणों की झाँई, तो देखिये,
मुख सदा उसका, ललायमान होता है।
प्रेम पथ पर ,कहाँ राहु कहाँ केतु,
वहाँ तो होता ,केवल प्रेम सेतु,
दोनों इस पर ही ,रहते न्योछावर,
बस प्रेम हेतु ,और प्रेम हेतु।
और प्रेम जब और भी, परवान चढ़ता है,
तो अध्यात्म के और भी,निशान गढ़ता है,
मन में आनन्द का,बादल घुमड़ता है,
अलौकिक हरियाली की ओर बढ़ता है।
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नन्हें होनहार
🎻🎻🎻🎻
नन्हीं सी भोली झलक
होती है कितनी मोहक
देखते ही रहो उसे अपलक
बाहों में लेने की मचती ललक।
चाहे वह नितान्त अबोध है
लेकिन फिर भी उसे यह बोध है
कि बाहों में भर लेने वाली
कौन सी माँ की सुन्दर गोद है।
इनकी प्यारी सी न्यारी मुस्कान
निश्छलता से अनुपम पहचान
और इनका करुण रुदन तो
विचलित कर देता है प्रान।
भविष्य का बच्चा है पुरोधा
इसमें ही बसता है जोधा
सँस्कार अभी से है ज़रुरी
ताकि हो विकसित यह पौधा।
बाल छटा का हर रुप मनोहर
जीवन्त उपवन की यह श्रेष्ठ धरोहर,
यही उमंगों का वसन्त लाते
उर्जामय कर देते हर घर।
बाल छवि को नमन

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गगनचुम्बी उदघोष
🏇🏇🏇🏇🏇🏇🏇🏇
माँ ! ये तिरंगा ,सदा ही लहरायेगा
बुरी नज़रों से जो देखेगा, वो मुँह की खायेगा,
हम तेरी सेना के ,तीन गौरवमय अंग हैं,
जो सदा से ही , रहते संग संग हैं,
धरती ,पाताल, आकाश, किसी को नहीं बढ़ने देंगे,
हिमालय पर किसी को , हम चढ़ने नहीं देंगे,
हमारे पास , एक से एक ,जाँबाज हैं,
जिनके अपने, अलग ही ,अन्दाज़ हैं,
ये बढ़ते हैं ,तो फिर वापस नहीं आते,
ये तो जान देने की ,सौगन्ध ही खाते,
माँ ! सच कहता, दुश्मनों का ख़त्म नामोंनिशाँ होगा,
विश्व के नक्शे पर बस,अपना हिन्दोस्ताँ होगा।
तेरी पताका, शान से लहरायेगी,
"सत्यमेव जयते" की छवि ,साफ़ ही झिलमिलायेगी।
जय हिन्द की सेना,जय हिन्द,जय हिन्द।

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गगनचुम्बी उदघोष
🏇🏇🏇🏇🏇🏇🏇🏇
माँ ! ये तिरंगा ,सदा ही लहरायेगा
बुरी नज़रों से जो देखेगा, वो मुँह की खायेगा,
हम तेरी सेना के ,तीन गौरवमय अंग हैं,
जो सदा से ही , रहते संग संग हैं,
धरती ,पाताल, आकाश, किसी को नहीं बढ़ने देंगे,
हिमालय पर किसी को , हम चढ़ने नहीं देंगे,
हमारे पास , एक से एक ,जाँबाज हैं,
जिनके अपने, अलग ही ,अन्दाज़ हैं,
ये बढ़ते हैं ,तो फिर वापस नहीं आते,
ये तो जान देने की ,सौगन्ध ही खाते,
माँ ! सच कहता, दुश्मनों का ख़त्म नामोंनिशाँ होगा,
विश्व के नक्शे पर बस,अपना हिन्दोस्ताँ होगा।
तेरी पताका, शान से लहरायेगी,
"सत्यमेव जयते" की छवि ,साफ़ ही झिलमिलायेगी।
जय हिन्द की सेना,जय हिन्द,जय हिन्द।

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छब्बीस जनवरी -- हमारा राष्ट्रीय पर्व
💦💦💦💦💦💦💦💦💦
छब्बीस जनवरी हमारा है राष्ट्रीय पर्व,
हमें आज पर तो है विशेष गर्व,
तो आज हों जायें सब वचन बद्ध,
दोहरायें बार बार ये शब्द,
अपनी गली मोहल्ला स्वच्छ रखेंगे,
अपना उज्जवल पक्ष रखेंगे,
पेड़ अब कोई न काटे,
धर्म जात कोई न बाँटे,
बस हमारे लिये राष्ट्र है, और है ये राष्ट्र ध्वज,
हमारा एक ही तिलक है,और है वह
राष्ट्र रज।
क्यों न रच दें फिर,एक सुन्दर इतिहास,
सबके मन में ,भर दें खूब उल्लास,
सोने की चिड़िया, हो जाये फिर से देश,
एक नये युग में,कर लें हम प्रवेश।
हर युवक को काम मिले,
बुज़ुर्ग को आराम मिले,
कृषक को पूरा दाम मिले,
शान्ति को विश्राम मिले।
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हमारा भारत
🎻🎻🎻🎻🎻
यह महज़ कपड़ा नहीं है कुछ गज़,
जहाँ यह खड़ा है वह थोड़ी नहीं है रज,
ये तो प्यारा तिरंगा है,
जिसे कहते हम अपने राष्ट्र का ध्वज।
यह है कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत,
गणतन्त्र के गण की खुमारी है भारत,
भाषाओं की सुगन्ध है भारत,
विविधताओं का प्रबन्ध है भारत,
सौहार्द प्रेम का मौन अनुबन्ध है भारत,
मधुर मधुर सा मकरन्द है भारत।
पुरानी सँस्कृति की पहचान है भारत,
अलग अलग धर्मों की खान है भारत,
एक अलग ही शान है भारत,
अध्यात्म की तो मुस्कान है भारत।
महत्व रखती सबके लिये छब्बीस जनवरी,
हमारी धरती रहे सदा भरपूर फसलों से हरी,
विश्व के नक्शे पर हम चमकें इस तरह,
कि लगा दें लोग प्रशंसाओं की झड़ी।
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हमारा तिरंगा
🎻🎻🎻🎻🎻
यह झंडा हमारे स्वाभिमान का प्रतीक
यह झंडा हमारे उत्थान का प्रतीक
यह झंडा हमारे आत्मज्ञान का प्रतीक
यह झंडा आन बान शान का प्रतीक।
यह झंडा हमारे नभ जल थल का
यंह झंडा हमारी सेना के शौर्य बल का
यह झंडा हमारे सुन्दर आत्म बल का
यह झंडा हमारी कृषक शक्ति के हल का।
यह झंडा लहराता किसान से
यह झंडा लहराता ज़वान से
यह झंडा लहराता हमारे उत्थान से
यह झंडा लहराता हमारे विज्ञान से।
आओ इस तिरंगे को नमन करें
चतुर्दिक विकास के हवन करें
वैमनस्यता के वमन करें
और देश को अपने चमन करें।
जय हिन्द

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प्रोफेशन में दर्शन
मैं देख रहा था ,सुन्दर ख़्वाब,
सब कुछ ही था ,लाज़वाब,
बड़बड़ाता रहा अस्पष्ट स्वर,
तू है भी या नहीं *ओ मेरे परमेश्वर*।
कुछ रहा फिर सुना सुना,
कुछ रहा था अनसुना,
प्रश्न में ही प्रश्न था,
लेकिन यह भी एक ज़श्न था
ख़्वाब ने अपना ,मुँह खोला,
और फिर मुझसे ,यूँ बोला,
तूने मैग्नेटिक फील्ड, घूमते हुए देखा है?
क्या उसे बिजली को चूमते हुए , देखा है?
तू यह चमत्कार देख करता,वाह वाह,
तूने देखा है क्या कभी, झूमता उसका प्रवाह ?
ये दाँये है, कि बाँये है,
खुश है कि, मुरझाये है,
इसकी तुझे केवल,अनुभूति है,
और वही बस तुझे, छूती है।
इसके द्वारा देखता, अंधेरे में तू प्रकाश,
और ले लेता एक दिन, इस जीवन से अवकाश;
किन्तु नहीं होता तुझे, मेरे सत्यार्थ का प्रकाश,
रहती वही चिन्ता तुझे, और उसका, बाहुपाश।
देख! फूल का खिलना ही, मेरी मुस्कान है
भँवरे का आकर्षित होना, मेरा एक गान है,
ये हरी हरी मखमली घास,
क्या नहीं देती तुझे ,मेरा कभी आभास?
मैं तेरे मन की, शक्ति हूँ,
ऑखों की अभिव्यक्ति हूँ,
जब तक तू समर्पित नहीं होता,
हर चीज़ के प्रति, आसक्ति हूँ।
तू बस मेरी , अनुभूति में नहा,
अपनी ऊर्जा , यूँ व्यर्थ न बहा,
बस अपना , हृदय मुझमें नत कर,
और कोई भी प्रश्न , अब मत कर।
जब तेरा होगा, पूर्ण समर्पण,
दिल में नहीं होगा, कोई घर्षण,
मेरे प्रति ही होगा, तेरा आकर्षण,
तब होगा तुझे, मेरा दिव्य दर्शन।
सूख गया मेरा ये हलक,
मैं बोला,लेकिन आओगे कब तलक,
प्रतीक्षारत हैं मेरी पलक,
दे दो प्रभु बस एक झलक
दे दो प्रभु बस एक झलक।
कृष्णम् शरणम् गच्छामि।
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बेमिसाल आँखें
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आँखों में था प्रणय निवेदन,
थी अनुभूति था सँवेदन,
कौतुहल भरी प्रतीक्षा थी,
माथे पर छलका था स्वेदन।
अभिनन्दन निराला आँखों का,
स्पन्दन निराला आँखों का,
वन्दन निराला आँखों का,
बन्धन निराला आँखों का।
आँखों की शैली क्या कहना,
ना कुछ लिखना और कहना,
आँखों में केवल ही बहना,
और आँखों आँखों में रहना।
आँखों के सुन्दर सम्बोधन,
आँखों के ही अनुमोदन,
कहीं कमी अग़र दिखे ,
तो आँखों में ही संशोधन।
आँखों का सुन्दर तारतम्य,
आँखों का ऐसा द्रश्य रम्य,
आँखों की क्रीड़ा मनोरम,
आँखों से आँखें होती धन्य।
आँखों से ही गीत निकलते,
आँखों से ही मीत मचलते,
आँखों में ही ,तरह तरह के,
सुनहरे सुनहरे स्वप्न ढलते।
आँखों में पलती जो उमंग
आँखों में सँवरती जो तरंग
आँखों में भरती शब्द रंग
आँखों में होती कविता संग।
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तुम्हारा प्रवेश
💝💝💝💝
पदचाप सुनाई दी नहीं किन्तु,
कोई दबाकर आया अपने पाॅव,
खिल उठा ये सूना मन का गाॅव,
मिल गई सुन्दर ठण्डी छाॅव
बसन्त ने भी ली अंगड़ाई,
कोयल भी थी खूब बतियाई
दूर दिखी जाती तन्हाई,
दिल में बजी मेरे शहनाई।
किस्मत में गूॅज उठी मल्हार,
मन के हुए तरंगित तार,
तुम आईं बन कर सदाबहार
मिला मुझे अनुपम उपहार।
जब मिलता कोई मधुर संग,
मन में भर उठती है उमंग,
मन भावन की मोहती सुगन्ध,
मुस्कान बिछाती मन्द मन्द।
स्मृति के मधुर बिछोने में
अब भी मन के कोने में
ये साँसें तरंगित हो जातीं
सपनों के फूल पिरोने में।
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यह कैसा दौर
🎻🎻🎻🎻🎻
बन्द हो गया रस्ता सम्भावनाओं का,
ये कैसा दौर है विडम्बनाओं का,
कहीं लूट कहीं गोली कहीं गाली,
दम घुट रहा भावनाओं का।
नज़दीक पेड़ों में पानी नहीं देते,
सुध हरियाली की भी नहीं लेते,
ग्लोबल वार्मिंग की बात करते हैं,
गाड़ी घोड़ों को विश्राम नहीं देते।
वाट्सएप में लोग सिमट गये,
पास पड़ोस की वार्तालाप से हट गये,
जो आपस में खूब बतियाते थे,
वो दरवाज़े भी अब पट गये।
अब सब कुछ अधूरा है,
वक्त ने सबको ही घूरा है,
बिना आपसी मेलजोल के,
कुछ भी तो नहीं पूरा है।
कमियाँ ढूँढने का क्रम जारी है
यही सबसे बडी़ बीमारी है
एक दूसरें की टाँग खींचते रहना
यह तो बहुत गम्भीर महामारी है।
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समर्पण
🎻🎻🎻🎻
सरिता सागर से है कहती,
तुम्हीं कहो कब तक चुप रहती,
सारे बन्धन तोड़ ताड़ कर ,
लो आई, मैं बहती बहती
अन्य पीड़ा तो सह भी लेती,
विरह की पीड़ा कैसे सहती,
तुम बिन अकेली कैसे रहती,
तिल तिल मैं तो ढहती रहती।
सागर बोला फैला बाहें,
मैं भी तो तकता था राहें,
गगन चुम्बी ये लहरें नहीं हैं,
ये हैं दिल से उठती आहें।
तुझको क्या बतलाऊॅ पगली,
सीमित थी तुझ तक ये चाहें।
तू आगई अब देख ये नर्तन,
नर्तन भी देखेगा नर्तन,
धन्य होगा अर्पण समर्पण,
होगा प्रफुल्लित क्षण क्षण कण कण।
प्रकृति का है यही स्पन्दन,
मैं और तू का स्वतः विसर्जन,
सृजन का यहीं से होता गर्जन,
जीवन धारा बहती छन- छन,
छन - छन, छन - छन,
छन - छन ,छन - छन।

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उस नन्हीं की बड़ी झलक
💞💞💞💞💞💞💞
खो जाना ही तो अध्यात्म है,
बाल सुलभ मुद्रा भी तो परमात्म है।
यह मुद्रा भी कितना आकृष्ट करती ,
अलौकिक आनन्द को स्पष्ट करती ।
उँगलियाँ मुँह में डाल लेना,
फिर झटके से निकाल देना,
करवट बदलना, उलट जाना,
फिर एक दम से पलट जाना,
अपने आप में मुस्कराना,
किलकारी मीठी गुँजाना,
हर मुद्रा ही निराली होती,
यहीं पर मेरी झुर्रियाँ,मतवाली होती।
कविता अपना यहाँ, भोला रुप लेती है,
सर्दी की सुनहरी धूप,देती है,
अलँकारों का ,श्रँगार करती है,
उमंगों के,उपहार भरती है।
यहीं से अध्यात्म की ,लहर भी अँगड़ाई लेती है,
नन्हीं राधा!अलसाई दिखाई देती है,
तो कृष्ण की तान सुनाई देती है,
अलग अलग भावों की,मुस्कान दिखाई देती है।
आयु को नये आयाम मिलते हैं,
कभी राधा तो कभी घनश्याम मिलते हैं,
जीवन के नये पैगाम मिलते हैं,
आत्मा को अनोखे विश्राम मिलते हैं।
राधे कृष्ण राधेकृष्ण राधेकृष्ण।
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बाल भंगिमा
उछलती कूदती वो आगई पास
मन में भर अदभुत उल्लास
शरारत भरे कुछ लक्षण थे
पर सब ही बड़े विलक्षण थे।
दंतावली बहुत मनोहर थी
जो चंचलता की धरोहर थी
तुतलाते तुतलाते बोल थे
जो बहुत ही अनमोल थे।
यह थी अलग ही रस धारा
सम्मोहन भरा इसमें सारा
शिकायत आग्रह विरोध सबका
अपूर्व सा था एक नज़ारा।
यह नहीं केवल बाल उवाच था
बल्कि खुशी का सुन्दर नाच था
इसमें थिरकन थी उन्माद की
अनोखी लय भरे आह्लाद की।
यह भी तो है एक बसन्त
जो नीरवता का करता अन्त
बाल मुस्कान झरती झर झर
कहाॅ रहेगा फिर पतझर।
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

हमारी सेना ज़िन्दाबाद
हम सोकर बिताते हैं रैना
पर जागी रहती है सेना।
जब कहीं आ जाती बाढ़
होने लगता सब उजाड़
जब अनुशासन सीमा भंग होती
आतंकी प्रवृति उद्दण्ड होती
जब युद्ध के बादल छाते हैं
रण पिशाच मण्डराते हैं
जब प्राकृतिक आपदा होती है
सब्र अपना माद्दा खोती है
जब देश सम्मान की बात आती
तब जिव्हा एक ही गान गाती।
हमारा हर योद्धा ही हीरा है
इसने हर बाधा को चीरा है
सागर लहरों को झेला है
शत्रुओं को दूर तक ठेला है
पर्वतों की ऊंचाई नापी है
शत्रु की रुह भी कांपी है
बर्फीली घाटियों को इन्होंने चूमा है
इनके शौर्य से चप्पा चप्पा झूमा है
इनके सहारे देश सुरक्षित है
इनकी बाहों में अभिरक्षित है।
सेना हमारी वह पूंजी
जिसकी ललकार आकाश तक गूंजी।
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पक्षियों का दर्द
💝💝💝💝💝
तुम्हें देनी तो चाहिये हमें राहत,
पर करते तुम ही हमें आहत,
बढ़ चढ़ कर खूब बताते हो,
पर हम पर ज़ुर्म ही ढाते हो।
पेड़ काटे,हमारा घर उजाड़ दिया,
हमारा तो जीवन ही बिगाड़ दिया,
अगर बुरा न मानों तो साफ़ कहूँ,
तुमने तो हमें ज़िन्दा ही गाड़ दिया।
तुम करते रहते हो बस छल,
हम भूख से रहते विकल,
न खाने को मिलते कोई फल,
और न निकालते तुम कोई हल।
तुम खेलते हो खूब हथकण्डे,
हम नहीं समझते ये सब धन्धे,
छत पर लगाते भी हो परिंडे,
पर जल कण होते हैं सदा गंदे।
पतंगें क्या उड़ीं,हमारे पर कट गये,
हम तो जीते जी,मौत से सट गये,
हमारे कई साथी, यूँ ही निपट गये,
तुम्हारे नौनिहाल तो,छत पर ही डट गये।
हमारे पथ में बड़ी ही उलझन है,
जून में सूर्य की भयंकर तपन है,
तो जनवरी में गलन ही गलन है,
आत्म रक्षा की समस्या भी बडी़ गहन है।
हमारे रस्ते में पानी नहीं है,
खाने के लिये धानी नहीं है,
किसी को कोई हैरानी नहीं है,
हमारे लिये कोई दानी नहीं है।
तुम हमें बस,पेड़ दे दो,
छोटे दे दो, अधेड़ दे दो,
हमारी ख़ैरियत,इनमें ही है,
हमें हमारी बस ख़ैर दे दो।
खोल दो हमारी उडा़न के फा़टक
और बन्द कर दो सारे नाटक।
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आज का छतनामा
🎻🎻🎻🎻🎻🎻🎻
आज सुबह से ही, छतों में शोर था
सब ओर, पतंगों का ही जो़र था
रिकौर्डेड गानों का ,पुरजोर गुँजन था
यह सँक्रान्त का ही ,समझो अभिनन्दन था।
पतंगों के ,अलग अलग रंग थे
पर पंछी बेचारे, बहुत तंग थे
वो काटा वो काटा ,के हुड़दंग थे
पति पत्नी ,बाप बेटा,इस उत्सव में संग थे।
पकोडो़ं की ,अलग ही बहार थी
चटनी की ,सबसे अधिक दरकार थी
गजक रेवडी़ ,अपने परिवार में साकार थी
पतंग उडा़ते उडा़ते, टपकती खूब लार थी।
चलो पतंगों के ही बहाने, उमंंगें तो उड़ती हैं
एक तरह से ये ,आकाश से भी जुड़ती हैं
पूरा जोश खरोश, भरा रहता
ये मस्ती भरे, सुन्दर पथ की ओर मुड़ती हैं।
पतंग उडा़ने लायक थी ,आज सारे दिन वायु
छत पर भी उमंगित थी, आज तो हर आयु
आज छतें भी, खूब खूब आबाद रहीं
अपनी मौज़ में दिखे, छत पर कुछ अल्पायु।
पटाखेबाजी के जोश, बिल्कुल अटपटे रहे
अति उत्साही लोग, छत पर ही डटे रहे
रौशनी वाली पतंगें भी, अन्धेरे में उड़ गईं
नई उमंगें नई तरंगें ,युवाओं से जुड़ गईं।
सूर्य मकर राशि में आये,हुआ इस तरह उनको नमन
सूर्य ही तो करते हैं, हमारी धरती को चमन।
कृष्णम् शरणम् गच्छामि
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नन्हीं बाला
💞💞💞💞💞
नन्हीं सी प्यारी वह बाला,
देती अपनी मोहक हाला,
मेरी आयु का जर्जर प्याला,
भी हो जाता है मतवाला।
पीड़ा के वार बेकार गये,
सब हार गये,सब हार गये,
और दुआयें !मुझपर,वार गये।
मेरी आँखों का वह जाला,
मेरी पीड़ा का वह छाला,
मेरी दहकती वह ज्वाला,
एकाकीपन का पृष्ठ काला,
सारे अंगार बेकार गये,
सब हार गये,सब हार गये,
और दुआयें! मुझ पर वार गये।
जब खिन्नता से पड़ता पाला,
चले जाता हूँ उसकी शाला,
उसकी मुस्कानों की ले माला,
लगाता उद्विग्नता पर मैं ताला।
उदासी के वार बेकार गये,
सब हार गये,सब हार गये,
और दुआयें !मुझ पर वार गये।
तेरी भक्ति का पुट , इसमें मैंने डाला,
एक भक्त रुप में ,अपने को ढाला,
मैंने माना ,तेरी इसे दिव्य बाला,
इसके सहारे ही ,जपता मैं तेरी माला।
तेरा यह सुन्दर मधुआलय, मेरे लिये है पूजालय,
तू दे दे मुझे अपनी उर्जा,और कर दे इसे तू उर्जालय।
कर दे इसे तू उर्जालय,कर दे इसे तू उर्जालय।

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पोती के साथ के पल
🎻🎻🎻🎻🎻🎻
मैं हँसा,वह समझी, उसकी शरारत का अनुमोदन
खिलखिला उठा, दादा दादा का सम्बोधन
वह उछलती कूदती ,आ गयी पास मेरे
दूर कर दिये उसने ,रस्ते के सारे अवरोधन।
सम्मोहित, हो गयीं दिशायें
शीतल शीतल ,चली हवायें
मन की वीणा, के तार खुले
झन झन करते ,वे हिले डुले।
चेहरे पर ,पूरा उल्लास
उमंगों का, अदभुतआभास
समझ न आने ,वाली भाषा
और उस पर फिर ,चढ़ती श्वास।
कैसे वर्णन करुँ, इस रस का
यह नहीं है मेरी ,कलम के बस का
उसकी दादा, कहने की शैली
मन के हर, कोने में फैली।
एक शरबती अन्दाज़,प्यारा प्यारा
भोलेपन की तरावट में,डूबा न्यारा
मोहिली मुद्राओं में, खिल उठा
मन का यह सूना,उपवन सारा।
बाल सुलभ, भोली मुस्कान
प्रकृति काअनुपम,इसमें गान
भर देती सदा,उमंगित प्रान
इनकी अपनी अलग ही शान।
बाल जगत को नमन
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एक उड़ान
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
चलो आकाँक्षाओं की पतंग उड़ायें,
उड़न खटोले वाले गीत गायें
उल्लास के कुछ रंग जमायें,
थोड़ी थोड़ी उमंग लायें।
चलो घूम आयें आसमान,
कह रही है मस्त तान,
यह आशा बड़ी है आलीशान,
धरती तो हमने ली है छान।
मिल के आयें बादलों से,
हो जायें बस पागलों से,
उस काली घटाको चूम आयें,
जो ढकी रहती है काजलों से।
थामें रखना बस प्रेम डोर,
इसमें ही जीवन का निचोड़,
यही रखेगी भाव विभोर,
इसमे किलकारी सा शोर।
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@
कृष्ण विनय
♧♧♧♧♧♧
राधा! आज मैं सब कुछ ,भूल जाऊँगा,
मुरली भी मैं ,बिल्कुल नहीं बजाऊँगा,
मैंने यह झूला , लगाया देख लो,
आज मैं केवल ,तुमको ही झुलाऊँगा।
राधा! कुछ तो, मेरी मान लो,
इन होठों पर ,मद भरी मुस्कान लो,
और, अब न रुठोगी कभी,
मन में यह भी, ठान लो।
आज तुम बरसाने भी ,नहीं जाओगी,
यहीं माधुर्य अपना , बरसाओगी,
तुम्हें सौगन्ध ,इस चान्दनी की,
मेरे मन में, रमणीयता ही लाओगी।
मेरा मन भी , देखो तुम पर निर्भर है,
तुम बिन ,सब कुछ ही पतझर है,
मै बताऊँ कैसे ,तुम्हारी अनदेखी,
आँखों से बहाती ,झर झर है।
कहने दो यदि कहते ,लोग मुझे ईश्वर,
तुम तो सुनो पर, आर्त मेरे स्वर,
तुम से ही कह सकता हूँ ,पीड़ा मेरी,
तुम्हारे बिना जो हो जाती, अक्सर मुखर।
जो रहता सदा , बिन राधा तृष्ण,
वही है वही तो है, पागल "कृष्ण",
बस यही है , यही है, मेरा परिचय,
जहाँ राधा , वहाँ मेरी है जय,
जहाँ राधा ,वहाँ मेरी है जय।
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

तुम्हारा जादू
तुम्हारा केश दल , अब भी है घना,
तुम दिखती , अब भी नवयौवना,
बिना श्रँगार ही ,जब देखती हो इस तरह,
लगता है !चन्द्र उल्लास टपक रहा छना छना।
तुम्हारे बोल ये ,अब भी मधुर हैं,
इनमें शायद बसे, सातों ही सुर हैं,
तुम्हारे होठों की, ये मुस्कराहट
शायद बज रहे ,धीमें नुपुर हैं।
क्यों ना शब्द, फिर जाग जायें,
प्रीत भरी ,कोई राग गायें,
छन्दों से ,मन को सजायें,
तुम्हारी सुगन्ध को,महकायें।
चाँदनी के पृष्ठ पर, तुम निखरती आज भी
तुम्हें देख हर छटा, खूब सँवरती आज भी
उपमाओं की सभा में, लग जाती एक होड़ सी
हर उपमा तुम्हें ही सजाने ,उमड़ती है आज भी।

स्कूल में प्रवेश करते बच्चों के एक समूह पर
📝📝📝📝📝📝📝📝📝
मैं अक्सर सोचा करता हूँ,
क्या करुँ मन्दिर जाकर,
इनमें ही है राधा पगली,
इनमें ही है करुणाकर।
यह निश्छलता की बहती धारा,
प्रकृति ने ही जिसे निखारा,
निर्मलता दे इसे सँवारा,
सारा भोलापन इस पर वारा।
जहाँ हैं ये वहीं हैं धाम,
वहीं आत्मा का विश्राम,
चाहे कोई पुकारो नाम,
हँसते मिलेंगे राधे श्याम।
जहाँ कहीं भी भावना बहती,
वहीं कहीं कविता भी रहती,
अन्तरमन के उदगार आते,
अपनी शैली में यह सबको कहती।
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मोह
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तुतली तुतली प्यारी बात
मन को मोहता वार्तालाप
उसके नन्हें भोले हाथ
छू गये मेरा तपता माथ
खुशी की मोहक पदचाप
मेरा मन रही थी माप।
उसने मरोड़ मेरे कपोल
अमृत होठों का डाला घोल
एक से एक रस अनमोल
बोल रहे थे मीठे बोल।
यह एक तरफा था संवाद
कितना अनुपम यह प्रसाद
अप्रतिम मोह का अनुपम नाद
रहेगा मरते दम तक याद।
मेरी नन्हीं इजा का यह दुलार
एकदम एकदम खालिस प्यार
फीकी इसके आगे हर बहार
अदभुत खुमार अदभुत खुमार।
नन्हें करते अनुपम बरसात
देते सुन्दर अपनी मधुर सौगात
इनकी हर मुद्रा सुन्दर मोहक
जो पीडा़ओं को देती मात।
कृष्णम् शरणम् गच्छामि
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जीवन
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जीवन! आशा की उड़ान है,
जीवन! स्वप्न का स्थान है,
जीवन! हँसता हुआ प्राण है,
जीवन! प्रकृति का गान है।
मीरा से डूब जाओ तो,
जीवन! कृष्ण मुरली की तान है,
जीवन! तो अभ्युत्थान है,
जीवन! मुक्ति का सामान है।
जीवन! नहीं मारकाट है,
जीवन! नहीं बन्दरबाँट है,
जीवन! जांतपात की,
नहीं कोई हठी गाँठ है।
जीवन! तो एक खेल है,
मधुर मिलन की बेल है,
बहुत ही गहरे संदर्भों में,
ईश्वर से सुनहरा मेल है।
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बेटीयाँ
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ऑगन की महकती कली हैं बेटीयाँ,
दिल की एक सुन्दर गली है बेटीयाँ,
बहार की प्यारी किलकारी है बेटीयाँ,
बहुत निराली और प्यारी है बेटीयाँ।
वो आदमी हीं नहीं जो जलाते हैं बेटीयाॅ,
वो आदमी हीं नहीं जो रूलाते हैं बेटीयाॅ,
वो आदमी ही नहीं जो धमकाते बेटियाँ
वो आदमी नहीं जो गले नहीं लगाते बेटियाँ।
शीश अम्बा के आगे झुकते ,उसके मूल में भी बेटीयाॅ,
माॅ के लिये लिखते न थकते ,उसके मूल में भी बेटीयाॅ,
हमारी सॅस्कृति पर गौर करो, जो बताती है यही,
सम्पदा शक्ति और विद्या, इनके मूल में भी बेटीयाॅ।
बेटियाँ! हमारे उपवन की शान हैं
बेटियाँ!हमारे कुल की पहचान हैं
बेटियाँ!मत समझो कुछ समय की मेहमान हैं
बेटिया!तो हमारे जीवन भर की तान हैं।


वर्ष 2019 के लिए शुभकामनायें
🎻🎻🎻🎻🎻🎻🎻
पूरे मनोंभावों से सिंचित करके
राम नाम से अभिमन्त्रित करके
शुभकामनायें सजाईं हैं मधुर मधुर
आपके बिगडे़ ग्रहों के सुधरें सुर।
उन्नत पथ पर हों आप अग्रसर
बरसें प्रेम के सुन्दर ढाई अक्षर
पंख फैलायें खुशियाँ फर फर फर
जय बम भोले हर हर हर।
जीवन में इससे अधिक और क्या चाहिये
सर छिपाने के लिए बस एक छत चाहिये
मधुर वार्तालाप हों मित्रवर चाहिये
राम नाम का मौन मधुर स्वर चाहिये।
जीवन के सुन्दर कुछ आयाम
स्वस्थ तन शान्ति और विश्राम
दोनों हाथों को मिल जाये काम
प्रगति पथ न होवे कभी भी जाम।
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नये वर्ष की शुभकामनायें
खुशियां आपको मिलें अपार
सफलतायें करें आकर सत्कार 
नये वर्ष के आगमन पर
हैं मेरे ये परम उदगार।
आपकी प्रगति हो निरन्तर
बाधा न टिके कोई भी क्षण भर
बसन्त अपना जमा ले डेरा
कभी न आये सताये पतझर।
मधुर भावों की यह सौगात
भीगाये आपको यह बरसात
सोचा आपसे कर लूँ यह बात
साल का अन्तिम यह प्रभात।

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2019 की यही शुभकामनायें
सर्दी की थोड़ी सी धूप
थोड़ा थोड़ा टमाटर सूप
दो परांठे आलू के
दो टुकड़े रतालू के।
गर्मी में ठण्डी सी छाॅह
साथ में प्रियतम की बाॅह
पतली रोटी थोड़ी दाल
ठीक रहे पेट का हाल।
मिले पीने को शुध्द पानी
आसमाॅ भी हो जाये दानी
ठण्डी ठण्डी मिले हवा
सस्ती असली मिले दवा।
सब के पास हो अपनी छत
बेकारी न बिगाडे़ किसी की गत
हर हाथ को मिल जाये काम
रघुपति राघव राजा राम।
रस्ता कोई जाम न हो
लूटपाट सरेआम न हों
बेटियों से जो करे गन्दी हरकत
उसका नामोनिशान न हो।
बेकार में हड़ताल न हो
चीजों का अकाल न हो
साग सब्जी के न दाम बढ़ें
अगड़े लोग भी ऊंचे पद चढें।
पेड़ों का क्षरण न हो
कोई भी अपहरण न हो
पर्यावरण की ओर झुकाव रहे
किसी तरह का न बहकाव रहे।
झूठे वादे वालों की खैर न हो
अनर्थक साम्प्रदायिक वैर न हो
राशन कार्ड पाने वाला गैर न हो
जो भी हो पूछताछ बगैर न हो।
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अग्रिम शुभकामनायें
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नव वर्ष मंगलमय हो
💞💞💞💞💞💞💞
बादल का प्यार ,जिस तरह,धरती पर झरता है,
और धरती की प्यास, जिस तरह,वह हरता है,
उसका श्रँगार भी,जिस तरह, वह करता है,
मयूर भी मस्त हो,जिस तरह ,नृत्य करता है।
मिट्टी की सौंधी सौंधी गन्ध,माहौल को झँकृत करती है,
अपनी हरी हरी चादर को,सबके लिये विस्तृत करती है,
हमें अन्न प्रदान कर ,उपकृत करती है,
हमारी जीवन शैली को,उन्नत करती है।
उसी तरह,मेरी शुभकामनाओं का मेघ,आपको करे मस्ती से गीला,
आपकी पीड़ाओं का बन्धन ,हो सदा के लिये ढीला,
बुरे ग्रहों का रंग,पड़ जाय एकदम पीला,
ईश्वरीय रंग में सजकर,नव वर्ष आपका हो जाय सजीला।

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एक पुरानी रचना
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मेरे घर का पता बिल्कुल सरल था,
तीन ओर से रास्ता तरल था,
क्योंकि भोगोलिक स्थिति में नाले थे,
गन्दगी के कारण काले थे,
ऐसा नहीं था ढकि कोई था ही नहीं ख़ैरख्वाह ,
भाई उठती थी उसके लिये भी अच्छीख़ासी तनख्वाह,
ख़ैर अभी तो दूसरा विषय है,
रस्ता भी करना तय है।
थोड़ी दूर पर ही उबड़ खाबड़ तल थे,
पर बड़े शीतल थे,
क्योंकि वहाँ पर छोटे बड़े पेड़ों के सिवाय सात पीपल थे,
लोग न मालूम क्यों मुझसे जलने लगे,
मेरे घर को सात पीपलों वाला कहने लगे,
लोग टूटी तस्वीरें टूटे मटके डाल देते थे,
अपनी मुसीबत पीपल पर टाल देते थे,
कुछ धर्मात्मा किस्म के लोग,
कभी बना लेते थे पूजा के योग,
कोई केला चढ़ा देता कोई फूल,
फिर मेरे बेटे जाते थे भूल,
ख़ामियाज़ा बस मैं ही भुगतने को तैय्यार था,
किसी को कोई न सरोकार था,
एक बार पीपल के महत्व को लेकर सम्मेलन भी हुआ,
पर किसी ने भी उस ज़गह को नहीं छुआ,
उन पीपलों को बहुत उम्मीदें भी थीं,
उनके नाम मोटी मोटी रसीदें भी थीं,
पर अब वे सब जान गये थे,
कहाँ क्या होता है पहचान गये थे।
कालान्तर में बहुत बदलाव हुए,
पुराने नालों में तालों में पैसे के रिसाव हुए,
कुछ कटा कुछ बँटा कुछ अटा कुछ पटा,
कुछ दूसरी दिवार से सटा,
कुल मिलाकर तस्वीर बदल गई,
विकास की इबारत मचल गई,
एक बड़ा माँल हो गया,
लीजिये एक कमाल हो गया।
अब मुझे लगता है डर,
न जाने कब उजड़ जाये मेरा घर।
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बाल भंगिमायें
💞💞💞💞💞
मैं सपनों को झुला रहा था,
बचपन मुझको बुला रहा था,
वह लेटी लेटी ,उकता रही थी,
मुद्रा उसकी , बता रही थी।
उसकी हँसी,उसका आमन्त्रण था,
बस यही तो अदभुत, आकर्षण था,
मैंने भी फैलाये हाथ ,खुश होकर,
यह उसके प्रति, मेरा समर्पण था।
उसकी बाल निगाहों में,एक आशा थी,
गोद में आने की,अभिलाषा थी,
बाहर ले जाने का,आग्रह था,
घूमने की ही एक,पिपासा थी।
हँसने रोने की शैली ही,इनकी अप्रतिम भाषा,
इनसे ही प्रकट होती,इनकी आशा,अभिलाषा,
इन दो संकेतों से ही ,अपना ये काम कराते,
इनको लेकर ही करते,ये हँगामा और तमाशा।
मैं तो यही कहूँगा कि,संगत इनकी बड़ी निराली,
इनमें निर्मलता की, सुन्दर उजियाली,
ऊषा वाली है लाली,
हर बात है इनमें,मतवाली।
बाल जगत आबाद रहे।

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अनमोल लम्हें
आज ज़िन्दगी बहुत मीठा बोली,
अलंकृत उदगारों से जिव्हा खोली,
संवेदन था निमन्त्रण था,
मेरी हर शैली का समर्थन था।
आलिंगन तो स्वयम् समर्थ एक भाषा है,
केवल समर्पण है, और दूर निराशा है,
यह स्वतः ही अंकित हो जाती,
ऐसी चिर परिचित अभिलाषा है।
अटूट प्रेम ही इसकी पृष्टभूमि,
अन्तरंग भावों ने यह चौखट चूमी,
मेरा तो यह अनुभव है
हर घड़ी खुशी में मस्त झूमी।
मैं नाच उठा हो दीवाना,
मस्ती में डूबा मस्ताना,
जीवन की जटिलता भूल गया
और भूला सब ताना बाना।

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नटखट नन्हें
मैंने सुनी उसकी मोहक पदचाप
मेरे कमरे को उसने लिया था नाप
नन्हीं दंतावली की अलग पहचान थी
होठों पर एक गर्वीली मुस्कान थी।
हाथों में थोड़े खिलौने थे
मधुर भावों के बिछौने थे
कोई तो पूरा साबुत था
किसी के टूटे हुए कौने थे।
मुझे उत्साह से बतलाती थी
कितनी प्यारी तुतलाती थी
न समझ में आने वाली शैली में
कितना मुझको बहलाती थी।
मैं सम्मोहित हो हाॅ में हाॅ मिलाता था
मुझको भी अनजाने में गुप्त धन मिल जाता था
मन का मुरझाया पौधा अनायास खिल जाता था
उदासी का वो खम्भा बुरी तरह हिल जाता था।
नन्हें नन्हें अबोधों में है कितना आनन्द भरा
परमेश्वर ने इनमें कितना इसको छान छान धरा
निर्मलता का अकूत ख़ज़ाना इन के हास्य में झरा
निहाल हो गई वसुंधरा और निहाल हो गई ये धरा।
बच्चे आबाद रहें

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तुम परमेश्वर हो,
तुम सर्वेश्वर हो,
तुम देवेश्वर हो,
तुम मुक्तेश्वर हो।
तुम क्या नहीं हो,
तुम क्या नहीं हो,
तुम कहाँ नहीं हो,
तुम कहाँ नहीं हो,
पर मेरे तो सम्मुख नहीं हो,
एक बात और अनुभव की मेरे,
तुम मेरे विमुख नही हो।
क्या यें मंच बदलोगे,
मुझे आत्मिक बल दोगे,
मै अब तुम में खो जाऊँ,
तुम्हारा ही बस हो जाऊँ,
फिर सदा के लिये सो जाऊँ।


आज की रात ही कुछ और है
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आज चाँदनी कदम भरेगी, और होगी लम्बी रात,
हम दोनों मिलकर करेंगे, एक लम्बी अपनी बात,
आज मधु का मंथन होगा, तुम होगी जब मेरे साथ,
और हम एक दूजे को,देंगे मधुर मधुर सौगात।
साँसों के कम्पन में भी, गीत नये मुखरित होंगे,
आह्लाद भरे सुन्दर से ,सम्बोधन विस्तृत होंगे,
चाँद के साथ चाँदनी भी ,मदभरी सुहानी होगी ,
आज देखना हर घड़ी, अलग ही मस्तानी होगी।
नेह का काजल तुम्हारी ,आँखों में आँज दूँगा ,
और नवेली दुल्हन सी सजा ,एक उजली साँझ दूँगा,
तुम अलंकारों भरी ,बस कविता सी उतर आना,
प्रीतमय उमंग निराली, अन्दर मेरे भर जाना।
प्रकृति के श्रृंगार होते, एक से एक लुभावने,
दृश्य भी दिखाती यह, एक से एक सुहावने
हम भी क्यों न जोड़ दें, शैली में इसकी एक कड़ी,
क्यों बनायें रूठती, मुद्रा में रुप डरावने।
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अन्तिम इच्छा
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तूने पूरी करी है सारी,
अब तक मेरी अभिलाषा,
कभी न छाई मेरे मन में,
कोई भी अब तक घोर निराशा,
मुझ में कमी, कि मैं आभार तक सीमित,
बस इतनी ही मेरी भाषा,
पर तेरी कृपा का परिमाण असीमित,
और मेरे ये शब्द बस तोला-माशा
अन्तिम बार बस पूरी कर दे,
मेरी एक यही आशा,
फिर नहीं करूंगा मैं कभी,
तेरे आगे कोई तमाशा।
जब हो इस जीवन का अन्त,
दर्शन देना तुम अनन्त,
जन्म जन्मों के सँवरेंगे,
मेरे फिर अतृप्त बसन्त,
समर्पण की मुद्रा में,
सुमित्रा नन्दन पन्त,
हाँ प्रभु! सुमित्रा नन्दन पन्त।

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अपना कहा याद करो
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
गाथायें तुम्हारी हैं ,एक से एक ,मन लुभावन,
तुम्हें प्रणाम करने ही आया ,भगवन् तुम्हारे वृन्दावन,
यदा यदा ही धर्मस्य! वाली,बात प्रभु याद कर लो,
और मानवता में छा रहे ,आज के अवसाद हर लो।
तुम्हारी ही थी घोषणा, तुम्हारा ही था ये वचन,
किन्तु हमारे लिये आज भी,यह अभी तक है सपन,
आज भी झेलते वेदना,आज भी झेल रहे तपन,
मानवता को मिल रहा,ज़बरन ही देखो कफ़न।
हवायें विषाक्त हैं,स्वार्थ भरे मेल हैं,
गोपाल तुम्हारी गाय पर,लोग खेलते खेल हैं,
दुशासनों के हाथों पर,अब कहाँ नकेल हैं,
एक कालीय ही नहीं, बड़ी बड़ी व्हेल हैं।
अब तो यहाँ का,इतना बुरा हाल है,
सौ से ऊपर गाली भी ,दे चुका शिशुपाल है,
हर छोटी बात पर,बवाल ही बवाल है,
उत्तर ऐसा खोया कि,सवाल ही सवाल है।
इतना ही लिख दिया, अब और लिखना व्यर्थ है,
अब भी नहीं अवतरित हुए तो,अनर्थ ही अनर्थ है,
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एक पुरानी रचना
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लहू से लिख गई निर्भया, तुम एक करूण कहानी,
साथ ही कह गईं यह भी, लहू हमारा हुआ है पानी,
वाह री इक्कीसवीं सदी, और यहाँ की मर्दानी,
ये बात तो रजधानी की,प्रश्न शैय्या पर लेटी वीरानी।
यह ख़बर गूँजती है देखो, अवनी और उस अम्बर में,
मत भूलो निर्भया रहती है, सबके सबके ही घर में,
नींद कहाँ से आयेगी, कानून यदि है जर्ज़र में,
मानवता दम तोड़ेगी, नंगे नंगे खंज़र में।
शंकाओं के रस्ते में, फूल नहीं बिछ सकते हैं
शान्ति और प्रेम के, चित्र नहीं खिंच सकते हैं
असुरक्षा की धरती यदि ,फैलती रही इसी तरह
तो सुरक्षा की पौध कैसे,यहाँ सींच सकते हैं।
हमारी धरती, हम निर्णायक,
हम बनें ,मनुष्यता के गायक,
स्वर्ग से नहीं, आयेगा कोई,
हमें ढूँढने होंगे, अपने नायक।
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तुम्हारी देहरी से
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मेरी सुन लो मनभावन,
दे दो मुझे अपनी छावन,
मैं आया तुम्हारे वृन्दावन,
मेरे मन में ला दो तुम सावन।
मरुस्थल पसरा मन में मेरे,
प्यास रहती है मुझको घेरे,
दिखते हैं सब ओर अंधेरे,
नाराज़ हैं मुझसे ये सवेरे।
जीवन उठे अब निखर निखर,
तुम्हारी ज्योति से हो उठे प्रखर,
कृपा बरसे तुम्हारी झर झर झर,
मन हो जाये मेरा द्वारिका नगर।
तुमसे नहीं कुछ मेरा छिपा
दे दो ना अब अपनी कृपा
मन मेरा शीतल हो जाये
रहता है यह बस तपा तपा।
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ऊफ़ सर्दी
सर्दी! बड़ी बेदर्दी,
भारी रज़ाई, ऊपर धर दी,
फिर भी काँपता ही रहा,
कमरे का तापक्रम नापता ही रहा,
मुई जान ही लेगी,
अब तो प्रान ही लेगी।
ऐसे मौसम में तो, पकौड़े बनते हैं,
जिव्हा के स्वाद भी, ऐसे में ही छनते हैं,
आलू के पराँठे हों, थोड़ा हो अचार,
क्या फर्क पड़ता, यदि थोड़े हों बीमार,
लहसुन की चटनी हो, और बाजरे की रोटी,
नमक लगी सिकी हुई, मिर्च हरी छोटी
वैसे तो दही भी ठीक है,
पर चरपरी गरम चीज, एकदम सटीक है।
लेकिन यह सब मुझे खिलायेगा कौन,
रज़ाई ओढ़कर मैं अतः, पड़ा हुआ हूँ मौन।
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नदी व्दारा मार्ग दर्शन
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
सरिता जाती बहती बहती,
कानों में मेरे कहती कहती,
सागर ही उसका अन्तरतम,
हाय !दूर है मग़र प्रियतम।
वह उससे ही मिलने जाती,
अपने पथ को स्वयम् बनाती,
जो भी बाधायें पथ में आती,
अपने वेग से दूर हटाती।
बस एक धुन है ,एक लगन,
प्रियतम का बस आलिंगन,
वो भी आतुर हो, खूब बुलाता,
नटखट! पूरा गगन गूँजाता।
किन्तु तेरा प्रियतम तेरे अन्दर है,
यही मुझमें ,तुझमें अन्तर है,
तुझे तो यात्रा भीतर की करनी है,
और भीतर ही वैतरणी है।
तू पागल है, बस रटता है चार धाम,
तेरे मन मन्दिर में ही बैठे स्वयम् राम,
बस एक झीना आवरण हटा दे,
पा लेगा, वह असीम विश्राम।
अन्तर में उतर,देख फिर अन्तरतम,
अदभुत ध्वनि सुनेगा ,छम छम छम,
यह नटवर की पदचाप होगी,
विह्वलता में आँख होगी,तेरी नम।
बस यही तेरा पड़ाव है,
यहाँ आनन्द की ही छाँव है,
तू तो बस रुक जाना,
यही तेरा ठहराव है।

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बच्चों को नमन
मेरी नन्हीं परी का मधुर उल्लास
भर गया मुझमें जीवन श्वास
एक निर्मल स्त्रोत था मन के पास
अद्भुत आनन्द का लिये प्रवास।
बालपन के मोहक रुप
सर्दी की जैसे सुनहरी धूप
अपनी कला से भर देते
ढलती आयु के जर्जर कूप।
मेरी थकान भी हो गयी दूर
उर्जा से हो गया मैं भरपूर
यह ऐसा गज़ब सम्मोहन था
प्रकृति का दिखता जिसमें नूर।
ईश्वर!हमको भी कर दे मासूम
हम भी नाचें खूब झूम झूम
तेरी चौखट गीली कर देंगे
भावविह्वलता से चूम चूम।
इनमें निश्छलता का वृहद् कोष
कितना अनुपम इनका रोष
जब ये हंसते उन्मुक्त हो
गुस्सैल भी होता है ख़ामोश।
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अनुभूति
🔱🔱🔱🔱
माँ
🙏🏻🙏🏻🙏🏻
तुम्हारे प्रति तो होता माँ,एक सहज ही आकर्षण,
जग में आते ही तुम्हारा, होता है पावन दर्शन,
अपने जीवन का हर क्षण,तुम करती हो हमको अर्पण,
चाहती हो समृध्द रहे,हमारे जीवन का कण कण,
निष्ठा मेरी मुझे कोसती,और कोसता मेरा मन,
क्यों नहीं कहता है पगले,माँ से बड़ा न कोई धन,
बच्चों पर कर देती है,हँस कर सुविधा का तर्पन,
तुरन्त उनको आँचल से ढकती,गरजते जब भी काले घन।
शीतल मन्द सुगन्धित वायु,जैसे अन्तरमन छूती,
उस से भी गहरी होती,तुम्हारे प्यार की अनुभूति।
पिता
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
कन्धे में हमको घुमा घुमा कर,बोते ऊँचाई छूने के बीज,
कई बार तो लगता है ,एवरेस्ट भी अब क्या है चीज,
बात कहता मैं बिल्कुल सच्ची, है नहीं यह मेरा दम्भ,
पिता ही होते हैं,घर के दृड़ ,सुगठित स्तम्भ,
बच्चों को चाहने वाले, ये ही तो हैं परम हिता,
परमेश्वर को गोकुल छोड़ा, वो भी तो थे एक पिता,
एक विशाल ह्दय के साथ,स्नेहिल बाहें विध्यमान,
इसी में हम सँस्कारित होते, और गाते जीवन गान।
तुमने हमारे लिये सदा, मृदु भावों की माला गूँथी,
आबाद रहे हमारे दिल में,पिता तुम्हारी अनुभूति।
गुरु
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
जैसे आवश्यक है भोजन,वैसे ही आवश्यक ज्ञान
तुम्हीं तो देते यह सब, इसलिये तुम हो गुरु महान्,
तुम्हें तो हैं असँख्य प्रणाम, गुरु तुम हो,विध्या की खान,
सबसे बड़ा गिना जाता है,जग में विध्या का ही दान,
तुम्हारे माध्यम से ही होती,अध्यात्म से विलक्षण पहचान,
इसलिये ईश्वर से भी पहले,मिलता तुम्हें है सम्मान,
गुरुनानक,योगानन्द जी, और परमहंस रामकृष्ण,
आज तक मिटाते हैं,इनसे लोग अध्यात्म तृष्ण।
हमारी सफलता में सदा,तुम्हारी बोलती है तूती,
इसलिये तुम्हारे दर्शन में, ईश्वर की होती अनुभूति।

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मासूम छवि
🙏🏻🙏🏻🙏🏻
जब तुम रो देती हो, हवा द्रवित हो जाती है,
हम हँसा देते हैं तो,श्वास गर्वित हो जाती है,
हँसने रोने का, कई बार होता मन्चन,
हम धनी हो जाते, मिल जाता हमको कन्चन,
इस हूँ हाँ ,हूँ हाँ ,की कैसी ,अदभुत होती है शैली,
एक चादर एकदम निर्मल,बिल्कुल नहीं कहीं मैली,
बाल रूप की छवि में ,लक्षित होता है ईश्वरत्व,
अपने स्वर्णिम हस्ताक्षर, आकर करता है ममत्व,
मन होजाये थोड़ा निर्मल,रूक जाये थोड़ी हलचल,
यह भी तो उपलब्धि होती रूक जाये यदि थोड़ी दलदल।
बालरुप भी होती है,अध्यात्म की एक सुन्दर पुस्तक,
क्यों नहीं फिर थिरकूँ मैं,बन जाऊँ नटखट नर्तक।

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बेटी की लम्बी यात्रा
ःःःःःःःःःःःःः
जी हाँ! मैं बेटी हूँ,
थोड़ा सुस्ताने के लिये हीे लेटी हूँ,
बेटी से परदादी तक का सफर ,तय किया करती हूँ,
हरेक को जीने की, खुराक दिया करती हूँ,
मैं घर आँगन ही नहीं,भविष्य भी बुहारा करती हूँ,
अपने आश्रितों को सदा ही, सँवारा करती हूँ,
होश आते आते तो मैं,सबके काम आती हूँ,
कभी पानी पिलाती हूँ, कभी रोटी खिलाती हूँ,
नन्हें नन्हों को तो लोरी , गाकर सुलाती हूँ,
उनके होठों पर, भोली मुस्कान लाती हूँ।
कभी झिड़की सुनती हूँ,कभी बातें सुनती हूँँ,
सबके लिये पर फूल चुनती हूँ, माला बुनती हूँ,
और सबकी आवश्यकताओं के बाद ही, मेरा पृष्ठ खुलता है,
इसी पृष्ठ भूमि में, मेरा भविष्य भी धुलता है।
इस लम्बी यात्रा में,कई अनुभव मिलते हैं,
कुछ दर्द बढ़ाते हैं,.कुछ घाव सिलते हैं,
नकारात्मक लोग भी होते हैं ,
वो जब देखो तब ही, रोते हैं।
पर मैं हताश नहीं हूँ, उखड़ती हुई श्वास नहीं हूँ,
बुझा हुआ भी कोई, आत्मविश्वास नहीं हूँ,
मुझमें धरा का वँश है, मुझमें धरा का अँश है
सम्मान के मेरे बिना ,हर सम्बोधन ही अभ्रंश है।
मेरी प्रक्रति तो, सँवारना है
अपने स्नेह से, सबको ही निखारना है,
जी हाँ! मैं बेटी हूँ,बेटी हूँ,बेटी हूँ,
थोड़ा सुस्ताने के लिय हीे, लेटी हूँ।

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सबके प्रति शुभकामनाएँ
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सुगन्धित भावों का लेकर चन्दन,
ईश्वर करता मैं तुमसे वन्दन,
अष्ट सिध्दियों और नौ निधियों का,
स्वागत की सारी विधियों का,
आयोजित कर दो अधिवेशन,
मौन हों भले ही सारे सम्प्रेक्षण,
पर ये बात अवश्य हो जाये तय,
नहीं रहे इसमें कोई भी संशय,
मेरे सारे हितैशियों का, आत्मियों का,
प्रियजनों का , प्रेमियों का,
थोड़ा थोड़ा सब ये रखें ध्यान,
सबको मिले अपूर्व सम्मान,
और हर दिन की सुबह और शाम,
देती रहे खुशी के इन्हें पैगाम।
चार हाथ वाले से माँगता हूँ तो क्यों न खुलकर माँगूं,
मैं इधर उधर व्यर्थ ही पागल की तरह क्यों भागूं।
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आज तुम ना ऑसू बहाना,
दर्द अपने ना समीप लाना,
आज तो बस मुस्कराना,
कोई सुहाना गीत गाना।
लहर के भाग्य में कहाँ ठहराव है
ज़िन्दगी का अर्थ केवल बहाव है,
माना मिलता असह्य बिख़राव है,
पर समय की कब रूकती नाव है।
माना पतझर तो रूलाता है,
पर बसन्त भी तो गीत गाता है
जून का सूर्य तमतमाता है,
सर्दी में वही सुहानी धूप लाता है।
इसलिये आज केवल गीत गाओ,
जीवन में एक प्रीत जगाओ,
उपर देखो चाँद चमकता,
तुम बस इस पल को चमकाओ।


नन्हीं का सौन्दर्य बोध
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होंठों पर भीगी मुस्कान
नारी मन सौन्दर्य प्रधान 
चुना हुआ सुन्दर परिधान
केश राशि पर पूरा ध्यान।
कुछ बातें वो नारी सुलभ
छोटी में देख हुआ हतप्रभ
मेंहन्दी नेल पोलिश की बातें
उसकी स्मृति में जाने आई कब।
वो स्कैच पैन एक ले आई
शरारत भर कर मुस्कराई
मेरे जल्दी लगा दो मेंहन्दी कह
हथेली अपनी उसने फैलाई।
मुझे हो रहा था विस्मय
मेंने भी पूरा किया अभिनय
गोल गोल घूमा दिया पैन
आ गया उसके मन में चैन।
फिर उसने नेल पोलिश की करी माँग
मेंने किया उसे भरने का स्वांग
फिर झूठ झूठ में काजल लगाया
किसी तरह से उसे बहलाया।
फिर माथे पर बिंदी भी लगाई
एक काली टिक्की भी लगाई
ये नाटक अब रोज़ का काम
इसके बिना उसे नहीं विश्राम।
बच्चों की है बात निराली

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तितली रानी
🎻🎻🎻🎻🎻
तितली तुझे अपनी सुन्दरता क्या ज्ञात है?
तू किस कारण से इस जग में विख्यात है?
सब लोग अनायास ही आकर्षित होते,
ऐसी तुझमें क्या अनोखी बात है?
कारण! तेरे में छलावा नहीं है,
तेरी सुन्दरता भुलावा नहीं है,
तू प्यार की एक अनुभूति है,
कहीं कोई बहकावा नहीं है।
प्रकृति ने रंगा तुझे अदभुत रंगों में
कोमलता भर दी तेरे अंगों में
एक मस्त मस्त उड़ान भर दी
मद भरी तेरी पहचान कर दी।
तू उपवन का सौन्दर्य बढ़ाती
हर डाली ही तेरे गीत गाती
तू मधुर भावनायें भी बढ़ाती
सबके मन में प्रीत जगाती।

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पौत्री का चुम्बकीय क्षेत्र
🎻🎻🎻🎻🎻🎻🎻
उसने नीबू चूसा, और ज़बरदस्ती मुझे भी चुसाया
फिर एक शरारती ठहाका ,भरपूर भी लगाया
उसकी भाव भंगिमा,बडी़ ही नटखट थी
उसकी हर क्रिया ही, तत्पर और झटपट थी।
चूसा हुआ नीबू उसने, मेरे गाल पर हल्का सा मला
फिर दिखाने लगी अपनी, बालपन की भोली सी कला
उसने मुँह मेरा साफ किया, और लिया एक रुमाल
बार बार पोंछे उसने, मेरे बड़े प्यार से गाल।
नटखट मुस्कान भर, वह यह सब करती रही
चूसा हुआ नीबू हर बार, मेरे गाल पर धरती रही
यह छोटा सा फेशियल जैसा, मेरे चेहरे का हो गया
मैं भी पूरी तरह, इस बाल मुद्रा में खो गया।
और करुँ और करुँ,पूछती थी प्यार से
एक विशेषज्ञ की तरह,उसने सब किया अधिकार से
लोह अंश की तरह मैं उसके, चुम्बकीय प्रभाव में झूम गया
मेरे खुरदुरे गालों को, नन्हा बचपन चूम गया।
एक नई ताज़गी वह, मेरे भीतर भर गई
मेरे बुझे हुए मन को, सुन्दर तरंगित कर गई
बच्चों के भावों में, निराला एक संसार भरा
इनकी मोहक मुद्राओं से, झूम उठती है धरा।
बच्चों की दुनियां ज़िन्दाबाद।


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मेरी बहना जो अब स्मृति बन कर रह गई
मौन रह कर भी बहुत कुछ कह गई
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मेरी बहना
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पूरी गर्मजोशी उसने, अपनी मुस्कान में ही ढाल दी,
दर्द झेलते हुए भी मेरी ओर,अपनी खुशियाँ उछाल दी,
नज़र उतारने की मुद्रा में, उसने तत्काल मुझ पर,
कुछ अनमोल ऑसू निकाले, झर झर झर,
फिर हाथों को अपने, उसने हवा में उछाल दिया,
बुरी नज़रों का बोझ,पूरी हवा में डाल दिया।
वो लेटी लेटी, एकदम उठ बैठी,
बावज़ूद इसके कि, उसकी पीड़ा थी ऐंठी ऐंठी,
बावली हो गई, मुझे निहारती ही रही,
समृध्दि के मन्त्र मुझ पर, वारती रही,
उसके चेहरे पर , वात्सल्य के सारे भाव थे,
मुझ पर न्योछावर होने के, पूरे बहाव थे।
मैं किम् कर्तव्य की मुद्रा में, सोच रहा था,
अपनी ठोड़ी को, खरोंच रहा था,
यदि ये स्वस्थ होती तो क्या करती,
मेरे उपर हर चीज की बौछारें करती ।
भावुकता ने उसके माथे पर, टीका अवश्य किया होगा,
उसने अपने आपको भी,
गर्वित महसूस किया होगा।
क्योंकि मिलने वाला भाई भी,अधूरा था,
अपने आप में वह भी,कहाँ पूरा था,
उसके ऊपर भी ,कहाँ थी ठण्डी छाँव,
आया था लेकर वह भी,केवल एक पाँव।
चाहे कुछ भी हो,बहन की छाया माँ से कम नहीं होती,
पीड़ा कितनी भी हो,इतनी विषम नहीं होती।
बहनें अमर रहें


निराली आँखें
💝💝💝💝💝
आँखों की अपनी शैली है ,आँखों की अपनी बोली,
आँखों में हैं गीत प्रीत के,आँखों में महकती रंगोली,
आँखों में सत्कार की गरिमा,आँखों में आग्रह की धड़कन,
आँखों में है प्यार की ललिमा,आँखों में भोली चितवन।
हम भी तो प्रथम बार ही, मिले थे इन्हीं आँखों में,
प्रश्न भी उठे थे कई, अनायास ही आँखों में,
समाधान भी निकला था,आपस में ही आँखों में,
और छवि बन गई फिर,एक दूजे की आँखों में।
आँखों से दिल का, गहरा नाता,
यहीं से ही,प्रेम पथ भी जाता,
मधुर भावों के फूल बिछाता,
प्रियतम की तस्वीर सजाता।
सत्य कहूँ,दिखता आँखों से,प्रेम शिखर,
मस्ती से होते, जहाँ पहुँच कर तरबतर,
अनोखे झरने से झरते, झर झर झर,
आश्चर्य मग़र,नहीं दिखता कोई भी निर्झर।
शब्द जहाँ आने से डरता,
मैं उसी निःशब्दता की बात करता,
मौंन सम्प्रेक्षण होता सारा,
आखों से बस बहती धारा।
यहीं होती बस प्रेम सगाई, चिरंजीव होती तरूणाई,
हम तो रहे सतह पर केवल,नहीं देखी इसकी गहराई।
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अपने हाथों में लेकर, हथेली तुम्हारी,
आज लिखूँगा मैं, कहानी हमारी।
ज़िक्र होगा इसमें, प्यारे से गाँव का,
रोज़ थाप सुनता जो, तुम्हारे गोरे पाँव का,
और उस बूढ़े, पीपल की छाँव का,
नदिया में उस, इकलौती नाव का।
तुम जब भरने, चली थीं गगरिया,
उसी समय गरजे, बरसे बदरिया,
वो सरसों के खेत की, पीली चुनरिया,
रोमाँचित हो गई, सबकी नज़रिया।
वो तुम्हारी नज़रों के, बदलते मौसम,
दिल में करते थे, अज़ब सी छमछम,
कहते थे मुझको,तुम्ही तो हो हमदम,
अब ऐसा कर लो, रहो साथ हरदम।

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गीत लिख दूँ मैं प्रणय का,
सुनहरी किरण के उदय का।
तुम ऑख में काजल लगाना,
और थोड़ा मुस्कराना,
हाथों में मेहंदी सजा,
पास मेरे बैठ जाना।
बिन्दी का वो गोल घेरा,
ज़ुल्फ का बादल घनेरा,
सिन्दूर वाली माँग प्यारी,
जिसकी अलग होती खुमारी,
ध्यान मत रखना समय का,
गीत लिख दूँ मैं प्रणय का।
चाँद ने दिया आज निमन्त्रण,
आज होंगे प्यार के क्षण,
आज नहीं होगा नियन्त्रण,
आज नया कोई होगा मन्थन,
सुर सजेगा आज एक नई लय का,
गीत लिख दूँ मैं प्रणय का।
सुनहरी किरण के उदय का।
उमंगों को आज झूमने दो
बहारों को जुल्फ़ चूमने दो
आज स्मृति पुरानी आई है
इसे मस्त होकर घूमने दो
भय न रखो कोई क्षय का
गीत लिख दूँ मैं प्रणय का
सुनहरी किरण के उदय का।
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यौवन की पदचाप
📝📝📝📝📝
मन में भर जाती उमंग,पुलकित होता अंग अंग,
अनायास उमड़ती है तरंग,बन जाये कोई अन्तरंग,
इतनी बड़ी दुनियाँ फिर भी,पसन्द नहीं हरेक संग,
अनुकूल लगता बस एक ही,प्रेम का मीठा प्रसंग।
जीवन का यह ऐसा भाग,निकलती बस एक ही राग,
कली भ्रमर और कुसुम पराग,
दिल हो जाता, बाग बाग,
खुशी के होते ,रौशन चिराग।
आकर्षण सम्मोहन के,बनते चित्र,
होती अभिलाषा ,आये कोई अनुपम मित्र,
कल्पनायें भी होतीं इतनी विचित्र,
मानों छिड़का हो,किसीने इत्र।
मधुर सपनों का आलिंगन, अंग अंग में स्पन्दन,
यह है कैसा आकर्षण,हर्षित हो जाता हर क्षण,
प्रकृति का अनुपम दर्शन,श्रेष्ठ अर्पण और समर्पण,
मीठी सी होती तड़पन,उल्लास भी होता तत्क्षण।
अकेले न रहो बोली वय,कर लो अब तुम यह निर्णय,
कहने लगा मस्त हृदय,इस बेला में होते परिणय,
भ्रमर मिलाता अपनी लय,कलियों में होता तन्मय,
गूँज गूँज कहता देखो,जीवन का है यही परिचय।
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पर्वतों ने मुझे कहा
🔏🔏🔏🔏🔏🔏
ईश्वर ने मेरे भाग्य को ज़रा सा मोड़ा,
पहाड़ की यात्रा से मुझे जोड़ा,
थका भी , हँसा भी, फँसा भी,
पहुँच गया भीमताल, अल्मोड़ा।
पहाड़ों से मिलाप हुआ
एक मौन वार्तालाप हुआ
उनके हर संदेश ने मेरे
ह्दय को भीतर तक छुआ।
पहाड़ों ने कहा, ऊँचाई कभी समाप्त नही होती,
उत्साह बिना कोई चीज, प्राप्त नहीं होती,
हमारी ऊँचाई से बहुत ऊँचा है अध्यात्म,
उसको छूने पर, निराशा कभी व्याप्त नहीं होती।
हम तो जड़ हैं, एकदम खड़ हैं,
हम अपनी ज़गह पर ही, एकदम द्रड़ हैं,
लेकिन तेरे लिये तो मुक्त आसमान है,
अरे तेरे साथ तो स्वयम भगवान् है।
मैं कुछ कहता कहता रूक गया,
लेकिन उसके सम्मान में, मै झुक गया
एक अदना सा पर्वत अनमोल चीजे देता है
हमसे कभी कुछ भी नहीं लेता है।
और हम उसकी ऊॅचाईयाॅ उजाड़ देते हैं
उसका वक्ष फाड़ देते हैं
और यह मुस्कराती हुई वन सम्पदा
जड़ से उखाड़ देते हैं।
हमारी तो और भी लम्बी है कहानी
आॅसू बहा रहा था बेचारी नदिया का पानी।


नमन भावों के मोती
विषय पुष्प
दिनांक 21.11.2018
दिन बुधवार
पुष्प
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फूल ! तुम इतने मृदु भावों के हो प्रतीक,
कि कोई भी उपमा तुम्हारे लिये नही बैठती सटीक,
तुमसे महकता हर स्थान है,
तुम्हारा होना ही हर ज़गह की शान है ।
तुम सबको महकाते हो,
सबका आनन्द बढ़ाते हो,
हर गौरवमय परम्परा में,
सबसे पहले याद आते हो।
पर जब मैं तुम्हें देखता, मानता भाग्य को सर्वोपरि,
वो भी तो बतला देता, बात सारी खरी खरी,
तुम देव के कंठहार होते, जीवन तुम्हारा धन्य होता,
कपटी के लिये उपहार होते, जीवन तुम्हारा नगण्य होता।
तुफानों की निरंकुशता में, तुम घायल हो जब गिरते,
कितनी विपदाओं से तुम, एकसाथ एकदम घिरते,
कहाँ गरिमामय स्थिति तुम्हारी, और कहाँ यह समय की धूल,
ये ही बस उत्पीड़न भाग्य का, तुम भी तो समझोगे " फूल "।
वीर का शौर्य जब गरजता, तुम्हारी महक का निर्झर झरता,
उसकी यात्रा का पूरा पथ, तुम्हारी सुगन्ध से ही भरता।
प्रिय को जब अर्पित होते, मनोभावों से समर्पित होते,
जब राष्टृ गौरव को अर्पित होते, तो जीवन में तुम गर्वित होते,
लेकिन ये सब भाग्य है, तुम्हारी क्या होगी ऊँचाई,
और ये दुर्भाग्य है, कैसी विकट होगी रूलाई।
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मुस्कान के गढ़
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मेरे पास एक दिन आकर, पूछती थी घबराहट,
पता बता दो शीघ्र ज़रा , कहाँ मिलेगी मुस्कराहट।
मैंने देखा बदली बदली, सी इसकी है अब चाहत,
अवश्य कहीं हुई होगी, कोई न कोई सुगबुगाहट,
फिर भी मैंने कह दिया , तुम सबकी है ज़हरीली आहट,
तुम्हारे नाम भी अज़ीब से,उकताहट, झुंझलाहट, घबराहट।
ख़ैर! अब जो लिखता हूँ मैं उसको पढ़,
तू भी जान सकेगी, मुस्कराहट के थोड़े गढ़।
चन्द्रमा मुस्कराता है तो, चान्दनी खिलती है,
फूल मुस्कराता है तो, मस्त सुगन्ध मिलती है,
बादल मुस्कराता है तो, धरती मतवाली होती है,
गेहूँ जौ की छटा,मस्त और निराली होती है।
माँ मुस्कराती है तो, प्यार का सागर छलकता है,
आशीषों से ढका, मनोहर घर झलकता है,
बच्चा मुस्कराता है तो, प्रकृति निहाल होती है,
वह ज़गह खुशी से, मालामाल होती है।
लावण्य मुस्कराता है तो, दिल में शहनाई बजती है,
मधुर सपनों से भरी,सुन्दर बारात सजती है,
स्वागत मुस्कराता है तो, प्रेम की बोछार होती है,
अनूठे उत्साह में नहाई, मनुहार होती है।
कवि मुस्कराता है तो, कविता का श्रंगार होता है,
प्रकृति से यहीं पर उसका, साक्षात्कार होता है,
संगीत मुस्कराता है तो, हवा में मिठास घुलती है,
आध्यात्मिक उल्लास की, नई सुरंग खुलती है।
एक से एक अनोखे, चमत्कार होते हैं
मधुर मधुर सपनों के, जो आधार होते हैं
तू भी अब आज से, इस राह की ओर बढ़,
मिल जायेंगे तुझे भी, मुस्कान के सारे गढ़।
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बिजली उवाच
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एल्युमीनियम ताम्बे से घनिष्ट सम्बन्ध मेरा
वही करते हैं सारा प्रबन्ध मेरा
वो जहां चाहते मुझे ले जाते
उनसे है युगों से अनुबन्ध मेरा।
लाल पीला नीला रंग,
यही होता मेरा श्रंगार,
नज़र ना लगे, मुझे किसी की,
लगाते तुम , मेरे न्यूट्रल पर,
काले लम्बे, टीके की धार।
मुझे हरा रंग भी, पसन्द है,
इसमें तुम्हारी, सुरक्षा का भी प्रबन्ध है,
इंजीनियर्स इसे, अर्थ कहते हैं,
मेरे कोप में, समर्थ कहते हैं।
मैं तुम्हें नज़र नहीं आती ,
पर मेरे सब दीवाने हैं,
मेरे बिना, स्थल सारे सूने,
सूने भी मैख़ाने हैं।
अलग अलग, ऊँचाई मेरी,
अलग अलग,गहराई मेरी,
मैं तुम्हारी, चिर संगिनी,
पर नहीं देखी तुमने, परछाईं मेरी।
डेड़ वोल्ट से, चार सौ के.वी,
मैं हूँ एक, विलक्षण देवी,
जब गुस्सा , हो जाती हूँ,
काँपते, एक से एक फ़रेबी।
मैं ! नियम कायदे से, चलती हूँ,
किसी को नहीं, छलती हूँ,
जब ज्यादा ही तोड़ते, नियम मेरे,
तो पहले जलाती, फिर जलती हूँ।
तुम आरोप भी, मुझ ही पर लगाते हो,
सही काम नहीं, करवाते हो,
ज़रा सी आग , कहीं लगे,
तुम शौर्ट सर्किट बतलाते हो।
मुझे चाहिये, सदा आवरण,
मुझे पसन्द नहीं, निरावरण,
तुम मेरा इन्सुलेशन, हटाते हो,
मतलब!अपनी मौत, स्वयम् बुलाते हो।
हो चाहे तुम, पुरूष प्रधान,
पर मैं तो, ले लूँगी सम्मान,
अधिक छेडछाड़, अग़र करी तो,
दिखला भी दूँगी, आसमान।
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देश भक्ति के प्रश्न हर ज़गह ठहरे हैं
देश भक्ति के अर्थ बहुत ही गहरे हैं। 

आप अपना काम निष्ठा से कीजिए 
किसी तरह की कोई उत्कोच न लीजिए 
गुप्त बातों की नहीं कहीं चर्चा करें
सरकारी कोष में व्यर्थ न खर्चा करें। 

छिपे हुए जयचंदों का पर्दाफाश करें
आतंकी गतिविधियों वाले लोगों का नाश करें
ये देश के लिए कचरा हैं इन कचरों को साफ करें
राष्ट्र भावना रखें सदा राष्ट्र के साथ इन्साफ करें। 

देश भक्ति में प्राण गंवाना गौरव की बात है
तिरंगे में लिपट कर आना इस शौर्य भक्ति की बरसात है
देश भक्ति भी ईश्वर का वन्दन है
क्योंकि इसमें भारत माॅ का स्पन्दन है।

अपनी योग्यता झोंक दो
गद्दार को एकदम रोक दो
जो देश हित में न बात करे
उसको तुरन्त ठोक दो।

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प्रेम नृत्य
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प्रकृति जब नृत्य करती,
धरती को उपकृत करती,
सरिता जब नृत्य करती,
सिन्धु प्रेम सत्य करती।

और मन जब नृत्य करता,
अद्भुत उमंगों से भरता,
मखमली मृदुभाव को,
मन की पूरी ठाँव को,
मधुर मिलन की आस लिए 
चल पड़ता प्रिय के गाँव को।

शुरू होती यहीं से साधना,
प्रियतम की आराधना,
प्रेम की अभिव्यक्ति ले,
मधुर डोर से बाँधना 
और नेह का काजल बना
प्रियतम की आॅख आॅजना। 

प्रेम नृत्य की सुन्दर भंगिमा,
अलंकृत करती है गरिमा,
कितनी अद्भुत यह ललिमा
सब खो जाता धीमा धीमा
मेरे साथ भी रास रचालो,
कृष्ण मेरा ये जनम बचालो।




िलती है बहुत राहत
जब पूरी होती है चाहत
लेकिन चाहतें बदलतीं अनवरत
और हम होते इनके आगे नत। 

चाहतों का सदा बढ़ता अंबार
और इसी में व्यस्त रहता संसार
यही प्रकृति के चक्रव्यूह का आधार 
भूल जाता है मनुष्य भी वह निराकार। 

चाहतों ने ही बढ़ाया बाबा राज्य
चाहतों ने ही दिखाया विकृत साम्राज्य 
चाहतें कितनी बढ़ीं इनकी अविभाज्य
चाहतों ने ही गिराई फिर इन पर गाज़। 

चाहतों को रखना होगा कम
वरना बढ़ाएंगी ये अपने ग़म
वैसे तो यह शिक्षा पुरानी है
लेकिन यह हर युग की नादानी है।

अनगिनत चाहतें बिगड़ता रुप
बूढ़े लोगों को समझते तपती धूप
बचपन बस्तों के बोझ से ऊब गया
अंक मिले कम और घर का चिराग बुझ गया।

कोचिंग का इतना बढ़ गया शोर
थक गया बेचारा हर किशोर
चाहतों ने अज़ब सी फसल उगा दी
अब कैसे नाचे मन का मोर।



न भी एक आईना है
प्रकृति प्रदत्त नगीना है
जितना यह निर्मल होगा
अध्यात्म में सफल होगा। 

यह आईना बहुत गन्दा है
तभी तो आदमी दरिन्दा है
सात साल की बच्ची से घिनौनी हरकत
और वह पिशाच अभी तक ज़िन्दा है। 

मन के आईने ने चमक खो दी
मानवता बुरी तरह रो दी
सौ सौ प्रतिशत अंक ले आये
लेकिन नैतिक पढ़ाई पूरी धो दी। 

धुंधलाती आॅख पथ ढूंढती है
और संवेदना आॅख मूंदती है
जिस किलकारी पर तमन्ना लुटा दी
अपने पैरों से वही छाती रुंदती है।

आईने सब अब तो टूट गये
अहम से बुरी तरह फूट गये
फूटे फिर जुड़ते भी कहाॅ है
जोड़ने वाले भी तो रुठ गये।



ीवन देती है आशा
मुंह में हो जैसे बताशा
आगे बढ़ाती अभिलाषा 
गढ़ती नई है परिभाषा। 

आशा के पन्ने पर इतिहास होते
आशा के पन्ने पर विश्वास होते
आशा के पन्ने पर उल्लास होते
आशा के पन्ने पर सुखद प्रवास होते। 

सच है की सबको ही मरना है
सारा माल यहीं पर धरना है
फिर भी आशा जीवित रहती
वह कहती क्यों मौत से डरना है। 

आशा प्रेयसी है प्रियतम है
आशा ही सारा दमखम है
जो निराश भाव में रहता
उसको तो ग़म ही ग़म है।

आशा का श्रंगार कर दो
इसमें अपने उदगार भर दो
बाधायें जो भी आजायें
उनको साहस से पार कर दो।





ुरुर में ऐसा क्या सुरूर है
कि आदमी इस नशे में चूर है
दुनियां तो बस एक सराय है
और जाना यहां से बहुत दूर है। 

आख़री में होने चाहिए कन्धे चार
गाड़ी घोड़े आदि सब बेकार
गुरुर है सांसों का व्यापार 
उसके बाद सब अन्धकार। 

गुरुर हो बताओ तो किस बात का
वक्त अज्ञात मृत्यु से मुलाकात का
पता नहीं सुबह का और रात का
पता नहीं उस समय के हालात का।

चिता सब कुछ जला देगी
राख में बिल्कुल मिला देगी
गुरुर करने वालों समझ लो
यह तुम्हारा साम्राज्य हिला देगी। 

मरते समय कोई साथ होगा क्या पता
देखते देखते ही प्राण होंगे लापता
मौत हर गुरुर को बतायेगी धता
कोई नहीं सुनेगा तुम्हारी है क्या ख़ता





लम शिलालेख बनाती
पुरानी पुरानी बात बताती 
देश काल से अवगत कराती
एक सच्चा इतिहास लाती। 

कलम में एक से एक रस मिलते
सुन पढ़कर सब चेहरे खिलते
कई बार तो साम्राज्य भी हिलते
किसी के तो ज़ख्म भी सिलते। 

कलम से तुलसी और कलम से सूर
कलम से गौरी का घमण्ड हुआ चूर
कलम से पन्त दिनकर निराला
कलम से ही प्रेमचन्द हुए मशहूर।

कलम सबसे परिचय कराती
कलम दिलों को पास लाती
कलम यदि मंझी हो भावों से 
तो कलम ही नये गुल खिलाती। 

कलम देश काल सभ्यता की पहचान है
उस समय के रीति रिवाजों की खान है
युगों का एक जीवंत प्रमाण है
कलम ही बताती क्या होता विद्वान है।




खुश कर देती है ललिमा 
खुश कर देती हरीतिमा 
सौन्दर्य के ये अद्भुत पृष्ठ 
इनकी नहीं कोई सीमा।

प्रकृति का जब होता आॅचल हरा
उमंगों का मेला लगता सब ओर भरा
पतझर भी दिखता डरा डरा
धरती का वक्ष लगता उभरा उभरा।

पक्षियों के गूंजने लगते तब कलरव
दृश्य बदलते सुन्दर नव नव
अलौकिक होती प्रकृति की छव
चमकता प्रकृति का हर अवयव।

लगता हरी विशाल चादर बिछाई है
सब ओर नृत्य करती तरुणाई है
यह भावों की ऐसी प्रेम सगाई है
जिसमें बजती मधुर शहनाई है।

इसमें प्रकृति के अद्भुत राग
और चान्द बनता स्वयम चिराग 
उजला हो जाता हर भाग
दमकता प्रकृति का सुहाग। 

स्वरचित 



हम सोकर बिताते हैं रैना
पर जागी रहती है सेना। 

जब कहीं आ जाती बाढ़
होने लगता सब उजाड़
जब अनुशासन सीमा भंग होती
आतंकी प्रवृति उद्दण्ड होती
जब युद्ध के बादल छाते हैं
रण पिशाच मण्डराते हैं
जब प्राकृतिक आपदा होती है
सब्र अपना माद्दा खोती है
जब देश सम्मान की बात आती 
तब जिव्हा एक ही गान गाती। 

हमारा हर योद्धा ही हीरा है
इसने हर बाधा को चीरा है
सागर लहरों को झेला है
शत्रुओं को दूर तक ठेला है
पर्वतों की ऊंचाई नापी है
शत्रु की रुह भी कांपी है
बर्फीली घाटियों को इन्होंने चूमा है
इनके शौर्य से चप्पा चप्पा झूमा है
इनके सहारे देश सुरक्षित है
इनकी बाहों में अभिरक्षित है। 

सेना हमारी वह पूंजी 
जिसकी ललकार आकाश तक गूंजी।





पलकें उठीं पलकें झुकीं
कुछ क्षण के लिए रुकीं
नये कीर्तिमान हो गये
जीवन की तान हो गये। 

पलकों से पलकों का अभिनन्दन 
महका जीवन में अकस्मात् चन्दन 
शगुन गीत गूॅज उठे मन में 
महक उठे नये सुन्दर बन्धन। 

बने इस तरह समीकरण
और मिल गये अन्त:करण
पलकों का उठना और गिरना
दूर हुआ मन का क्षरण।

बधाई देने लगे अलंकरण
शब्दों ने भी किया अनुसरन
छन्द भी मुखरित हो गये
कविता का हुआ देखो वरण।




ादल धरती का मन भावन
ये जब झूमें तो हो सावन
धरती भी खुश हो हरी हरी
बिछाती हे सुन्दर बिछावन।

सावन का सौन्दर्य निराला
मन को कर देता मतवाला 
मल्हार गाती प्रकृति बाला
हर दृश्य हो जाता आला। 

सरसों का आॅचल सुन्दर पीला
विमुग्ध होता गगन भी नीला
होता रहता मन भी रंगीला
सब कुछ ही दिखता है रसीला।

सावन में सरिता बड़ी विकल
सागर मिलन की बढ़ती हलचल
तोड़ती बाधायें सारी रस्ते की
और बहती जाती है छल छल।



्रकृति ने भर दिये सुन्दर रंग
हमारे ही सारे ग़लत हैं ढंग
हम ही करते सदा उसे बदरंग
और बाद में होते रहते तंग।। 

फूलों की मधुर भव्य सुगन्ध 
अलग अलग फूलों के रंग
आम पपीता नारंगी चीकू
कितना विराट है प्रबन्ध।

हरे पेड़ों की भव्य कतार 
हरियाली बिखेरती भरमार
सबकी ही उदर पूर्ति करती
प्रकृति कितनी है उदार। 

सात रंगों का इन्द्रधनुष 
कर देता है सबको खुश
बचपन यौवन और बुढ़ापा
यह भी तो रंग की परिभाषा।

रंग में भरी प्रकृति रंग रंगीली
हर मुद्रा में होती यह नशीली
सरसों की चादर ओढ़ा देती
इसे ओढ़नी सुन्दर पीली ।



र पल है सबका अनजान 
फिर क्यों करें जीवन वीरान
क्यों न बनालें जीवन को उत्सव 
सबके हिस्से में ही लिखा श्मशान। 

इसलिये ही कर्म को योग कहा
भोग को महारोग रोग कहा
मनुष्य जीवन को ही केवल
मुक्ति में सहयोग कहा।

पल पल को मैं राम में साधूॅ
पल पल ही मैं राम आराधूॅ
इन अमूल्य सांसों से मैं 
प्रेम की उससे डोर बाॅधूं। 

जीवन का फिर यह पल पल
देगा मुझे सुन्दर प्रतिफल
मैं हो सकूंगा निश्छल
आनन्द की होगी हलचल।


तुम्हारी आहट मन में रिमझिम 
तुम्हारी मुस्कराहट मन में रिमझिम 
तुम्हारे गीत मन में रिमझिम 
तुम्हारी प्रीत मन में रिमझिम। 

बदरे की छमछम रिमझिम 
भँवरे की अनुपम रिमझिम
कजरे की प्यारी रिमझिम 
गजरे की न्यारी रिमझिम।

हरियाली प्रकृति की रिमझिम 
कवितावली कवि की रिमझिम 
सरसों में उल्लास की रिमझिम
खुशहाली लिए उल्लास की रिमझिम।

सब ओर ही बरसे रिमझिम
मानवता में हरषे रिमझिम 
बड़ी सुहानी होती रिमझिम 
महादानी भी होती रिमझिम।



ूलों का खिलखिलाना
बदरी का बरस जाना
सरिता का बहती जाना
कोयल का कहकहाना
बाल रुप का घुटने आना
और लावण्य का मुस्कराना 
यही तो खुशी का है ठिकाना। 

तपती धूप में पेड़ की छाॅव
लहरों की गोद में सुन्दर सी नाव
भूखा पेट माॅ के हाथों पुलाव
थका ह्दय और माॅ का सहलाव
निश्छल प्रेम नहीं मोल भाव
मन से बस मन का लगाव
यही जीवन का सुन्दर ठहराव
दिखावे का न हो ताना बाना
यही तो है खुशी का ठिकाना। 

बचपन की हॅसी नहीं कोई कारण
अपने हाथों किसी का दुख हो निवारण
हमारे कारण न हो कोई ह्दय विदारण
मुसीबत में किसी का कर सकें तरणतारण
न बनायें कभी भी हम कोई बहाना
यही तो है खुशी का ठिकाना।

दौलत ही सारी नहीं खुशी हमारी
होठों पर ज़रुरी हॅसी प्यारी प्यारी


पिता की फैली विस्तृत बाहें
कर देतीं जो सुगम विषम राहें
ये वो आसमाॅ जिसके नीचे
होतीं पूरी मन की चाहें।

पिता के कन्धे आकाश छुआते
हम इस पर बैठ खूब इतराते
ऊॅचाई से यही परिचय करवाते
लम्बी दूरी तक भी सैर कराते।

सच कहूॅ पिता की भी परछाई 
लेती रहती ममता की अंगड़ाई 
इसमें अद्भुत करुणा समाई
जो होती है बहुत सुखदायी।

पिता से घनी न कोई छाॅह
पिता से बलिष्ठ न कोई बाॅह
पिता से सुन्दर न कोई ठाॅह
पिता ताउम्र सुविधा बारहों माह।


पिता जनक हैं हम सबके प्यारे।
परमपिता प्रभु परमात्मा हमारे।

जिनसे हमसब पहुंचे यहाँ तक,
वही तो हैं शुभ सुखदाता हमारे।

काया हमें परमात्मा से मिली है।
जीवन में प्रगति इनसे मिली है।
संस्कृतिसंस्कारों कीजननी माता
पिता पदवी पिता बन के मिली है

संस्कृति शिक्षा पिता से मिली है।
सत्य धर्मनीति पिता से मिली है।
जो सद संस्कारों से विरत रहे हैं,
उन्हें शिक्षा नहीं पितासे मिली है।

नहीं निराश हों पिताजी सिखाते।
जिया कैसे जाऐ पिताजी बताते।
श्रम करें निशदिन पिताजी हमारे,
जिंंन्दगी से साक्षात पिता कराते।

स्वरचितः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.