कुसुम पन्त" उत्साही"


"लेखिका परिचय"

परिचय क्या दूँ अपना माँ शारदे बिना साहित्य सपना l फिर भी नाम कुसुम पंत उत्साही जन्म स्थान मोदीनगर गाजियाबाद के एक छोटा सा कस्बा गोविंदपुरी में जन्म तिथि.. 12/10/1073 मेरे हमसफर श्री मनोज कुमार पंत एडवोकेट वर्तमान मे देहरादून इन्होने ही मुझे 20वर्ष बाद लिखने के लिए होंसला बढ़ाया मै तो भूल चुकी थी लेखनी को l पिता श्री राम भरोसे जोशी माँ परमेश्वरी जोशी मेरी आयरन लेडी मेरी मार्ग दर्शक आज मै जो कुछ हूँ उन्ही की वजह से हूँ l मेरे लाडली -मनोकृति पंत (मनु ) मेरा तारा -मनोकुन्ज पंत (मन ) शिक्षा MA eng, C.C.S यूनिवर्सिटी मेरठ MA educatoin ignou B Ed चौधरी चरण सिंह विश्व विद्यालय मेरठ TE T उत्तीर्ण (उत्तराखंड ) Nursing diploma व्यवसाय अध्यापिका इंग्लिश अपना कोचिंग सेंटर प्रिय विषय हिंदी अंग्रेजी समाज शास्त्र शौक लिखना, गाना, योगा सैर प्रकाशित रचनाये काव्य स्पंदन दिल्ली स्नेह्बंधन, प्यार की सौगात, भारत माँ की व्यथा काव्य स्पंदन -पितृ विशेषांक मे *पितृ छाया *मेरी प्रथम रचना प्रकाशित हुई l अन्य रचनाएँ काव्य स्पंदन में भारत माँ की व्यथा, श्रद्धांजलि अटल, बाल कविता, यादे बचपन की, मेरी कहानी मेरी जुबानी, प्रेम की सौगात, हरियाली तीज, नन्द लाला, आदि लेख... बच्चो पर मोबाइल का प्रभाव कहानी.. अधूरा प्रेम काव्यांकुर नॉएडासे प्रकाशित रचनाये मेरे देश की सेना, स्नेह बंधन हिंदी गीत, दीपावली, होई अष्टमी, पुरुष, मेरा देश महान (व्यंग्य कविता )तड़पता दिसंबर, पुलवामा हमले में सैनिको को समर्पित रचना (बदला ),हास्य कविता पति परमेश्वर... आदि अभी हाल ही में भावांजलि काव्य पाठ में सहभागिता.. वर्तमान अंकुर के सौजन्य से (जहाँ पुरुष.. पर सुनाई गयी रचना को सभी ने सराहा l संस्मरण.. एक रु पचास पैसे बीती यादे लघु कथा.. पृष्ठ लेखनी और कहानी प्रकाशित वर्तमान अंकुर नॉएडा, लघु नाटिका... हिंदी दमन प्रथम साझा संग्रह.. पहाड़ी गूंज में " सरस्वती वंदना, पहाड़ की व्यथा, किताब पर हाइकु, तृण, रोता पनघट, नारी व्यथा आदि ) के लिए #काव्य गौरव सम्मान उत्तरांचल उजाला (उत्तराखंड )मासिक पत्रिका सम्पादिका पद जिसके लिए आदरणीय Nirmesh K Tyagiजी वर्तमान अंकुर के संम्पादक को हार्दिक आभार.. जिन्होंने मुझे इस योग्य समझा.. मेरी साहित्यिक गुरु रीता बिष्ट जिसने मुझे लेखन से जोड़ा आभार रीता मेरे पिता समान गुरु -आदरणीय सुशील दाहिमा जी राउर केला मुझे एकलव्या बुलाते है और हमेशा मुझे मेरी त्रुटियों अवगत करवाते है lकभी कभी डांट भी पड़ती है.. मुझे उत्साही नाम देने वाले यही है lनमन गुरुवर और इन्ही के मार्ग दर्शन से आज मै यहाँ तक पहुंची l आभाषी मित्र समीर अनिल जी मेरे अग्रज विनय चौधरी जो मुझे संबल देते हैl मेरे हाइकु गुरु आदरणीय ऋतुराज दवे जी इनके बिना मुझे इन विधाओं का ज्ञान ही नहीं होता हमेशा ऋणी रहूंगी इनकी l बहुत ही साधारण परिवार में जन्मी 4भाई बहन है हम जिसमे मेरा no दूसरे स्थान पर है मुझसे बड़ी सुमन दी जो nurse है. मेरा भाई मुझसे छोटा L.I.C adviserहै l सबसे छोटी बहन हेमा जोशी जो काव्यांचल परिवार में भी साथ है अपनी लेखनी से सुसोभित करती है l मेरा संस्मरण.. एक रु पचास पैसे में मेरी आर्थिक स्तिथि की झलक दिखती है.. उसे काव्यांचल में काफी सराहा गया था l मेरी साहित्यिक यात्रा 20साल पहले ज़ब युवती थी तो लिखती थी फिर शादी हुई बच्चे हुवे संयुक्त परिवार जिम्मेदारी बढ़ गयीं कलम तो छूट ही गयींथी l फिर मुझे मेरी एक मित्र आभासी दुनिया मे मिली बोली दीदी आप लिखो मैने बोला छूट गया वो बोली आप लिखो तब जून2018से दुबारा लिखना शुरू किया ऒर विभिन्न समूहों से सीखने को मिला ऒर स्नेह भी मिला आज सभी विधा में थोड़ा थोड़ा लिख लेती हूँ जैसे तांका, हाइकू,वर्ण पिरामिड आदि सब नया था पद्द लिखती थी पहले l कविता के रूप में परिचय क्या दूँ अपना, ईश के बिना साहित्य सपना, परिचय तो ईश देते है, ये धागा कभी भी खींच लेते है ll भारत की सुकुमारी हूँ, उत्तराखंड की नारी हूँ, Up में मै जन्मी हूँ, देहरादून की बुआरी हूँ l माता की कुसुम हूँ मै, पिता की जान प्यारी मै पिया के दिल में रहती हूँ, गुरु दाहिमा की उत्साही मै ll कुसुम पंत उत्साही देहरादून
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बुद्धि /दिमाग 
जब नहीं रहेगा कोई पेड़, 
कैसे पवन चला करेगी, 
कैसे ऑक्सीजन मिला करेगी, 
कैसे साँसे चला करेगी??

काटोगे अगर वृक्षों को तुम, 
ओज़ोन भी होगी गुम, 
ओज़ोन गर होगी गुम... 
हरियाली भी खो जाएगी, 
बात करो ना तुम अपनी, 
मिटटी सारी जल जाएगी ll

सम्भल जाओ ऐ इंसा जग में, 
पेड़ो पर न करो अत्याचार, 
बुद्धि से काम लेलो तुम, 
नहीं तो होगा हा हा कार ll
कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित 
देहरादून


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पराग /मकरंद 
1
पुष्प पराग 
नव जीव संचार 
प्रकृति राग 
2
है मकरंद 
महकता तन मन 
भाव सुगंध 
3
नव पराग 
खिलती है प्रकृति 
भवरें खुश 
4
नन्हे पराग 
जीवन अनुराग 
बाँटे खुशियाँ 
5
वसंत ऋतू 
जन्मे नन्हे पराग 
भू गाये राग 
कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित 

देहरादून


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हाइकु 
1
जाग जा युवा 
घटिया राजनीति 
चुनाव जुआ 
2
आज का युवा 
फैशन सरताज 
नशे का हुआ 
3
खो गया युवा 
पाश्चात्य है संस्कृति 
संस्कार भूला 
4
हुक्का के बार 
युवा हुए बेकार 
गुम संस्कार 
5
नशे में युवा 
रोये हैं माता पिता 
कौन सहारा 
6
समयाभाव 
माता पिता बताते 
युवा भागते 
कुसुम पंत "उत्साही "
स्वरचित 
देहरादून

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खबर /समाचार 
काफिया -अर 
रदीफ़ -भी नहीं है 
बे बहर 
नज़्म 
जिसे चाहते रहे दिन रात, उसे खबर भी नहीं है, 
क्या करूँ जाने जाना मरने को जहर भी नहीं है, 
इश्क के समंदर में जो गोते लगाए, 
हमारी तो अब शामो सहर भी नहीं है l

अच्छी चल रही थी जिंदगी हमारी, 
तेरे बिन जालिम गुजर बसर भी नहीं है l

ढूंढते रहे हम सुख और चैन जहाँ में, 
मेरी गजल में तो बहर भी नहीं है l

अमृत पीने की ख्याहिश तो न थी कभी, 
हमारी किस्मत में तो ज़हर भी नहीं हैl

गमे जिंदगी से नहीं घबराती " उत्साही", 
पर यहाँ तो गमो के दो पहर भी नहीं है ll
कुसुम पंत "उत्साही "
स्वरचित 
देहरादून

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हाइकू
1भावो की रँग
प्यार भरे गुब्बारे
रिश्ते उमंग
2
रंगीली होली
कान्हा हो हमजोली
राधा हो संग
3
सैनिक टोली
सरहद की होली
खून रंगोली
4
पिया के बिन
प्रियसी तड़पती
फीकी है होली
5
बसंत फ़ाग
सनम संग होली
सुरीला राग
कुसुम पंत उत्साही
स्वरचित
देहरादून


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हाइकु 
1
सृष्टि अंकुर 
मनु व सतरूपा 
अभिशापित 
2
झरते बीज 
जब हों अंकुरित 
धरा हरित 
3
प्रीत अंकुर 
भावो की होती खाद 
रिश्तो की खेती 
4
आत्मा अंकुर 
देह होती धरती 
ईश्वर किसान 
5
ज्ञान अंकुर 
अध्यात्म होती खेती 
आत्मा की पौध 
कुसुम पंत "उत्साही "
स्वरचित 
देहरादून


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ हाइकु 
1
जीवन मेला 
ईश है जादूगर 
खेलता खेला 
2
माटी इंसान 
साँसों की करामात 
ईश्वर का जादू 
3
देह खिलौना 
दिल है जादूगर 
साँसों की छड़ी 
4
है रंगमंच 
मनु कठपुतली 
ईश्वर जादू 
5
प्रकृति जादू 
हरियाली फैलती 
धरा हंसती 
6
कलम छड़ी 
शब्दों का हुआ जादू 
नाचे कविता 
कुसुम पंत "उत्साही "
स्वरचित 
देहरादून

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मोटापे ने दस्तक दी, 
बढ़ने लगा था भार, 
बीमारी मन से हुई, 
शरीर बना लाचार ll

मधु मेह ने घेरा लगाया, 
अस्थमा का हो गया वार, 
औषधि कुछ नहीं थी, 
न था कोई उपचार ll

सोच सोच के दिल भर आया, 
पति बोले क्या करू मैं
मोटी काया l
सोचा अब कुछ करना होगा, 
यही सोच कर योग अपनाया ll

छंट गया था घोर अँधेरा, 
बदन छंट गया था पूरा मेरा, 
ना कोई ओषधि ना दवाई, 
अब तो है पूरा आसमां मेरा l
कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित 
देहरादून

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शीर्षक नारी.. क्या लिखूं 

नारी क्या तेरा सम्मान लिखूं, 
लिखूं जमीं.. या आसमान लिखूं, 
गोदी में खेले जिसके देवता, 
उसको क्या पुराण लिखूं ll
नारी क्या.... 

ये जग पूरा सम्पूर्ण लिखूं, 
नारी तू है अवतार लिखूं, 
प्रभु भी है कर्जदार तुम्हारे, 
क्या स्वर्ग क्या पाताल लिखुँ? 
नारी क्या.... 

लेखनी की धार लिखूं, 
लक्ष्मी की तलवार लिखूं, 
धैर्य की अविस्मित मूर्ति सी, 
क्या सीता का अवतार लिखूं? 
नारी..... 

पन्ना धाय का त्याग लिखूं, 
चावला का अंतरिक्ष गंतव्य लिखू, 
या आतंकियों से भिड़ने वाली, 
उस नीरजा का बलिदान लिखूं ll
नारी.... 

राधा रानी का प्रेम लिखूं, 
ललिता का इंतज़ार लिखूं, 
पी गयी जो विष का प्याला, 
उस मीरा की भक्ति लिखूं ll
नारी.... 
नारी...... 
कुसुम पंत "उत्साही "
स्वरचित
देहरादून


@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ सरहद 
देखो सरहद पर कैसे वीर ने ललकारा है, 
तेरी धरती पर जाके मचाया हा हा कारा है, 
अभी तो देख आतंकी रखवाले, 
कैसे तेरा करदेंगे कबाड़ा है l

ये भारत के वीर सैनिक है, 
युद्ध कार्य तो इनका दैनिक है, 
अभी तो छूट मिली नहीं इनको, 
नहीं तो करते तेरा संहारा है ll

काहे बाज नहीं तू आता, 
बाजों को तू क्यों उकसाता, 
भूखा प्यासा मर जायेगा, 
गर नहीं रखेगा अमन चैन से नाता l

अभी जनता भड़की नहीं है, 
बुद्धि इसकी सटकी नहीं है, 
अभी भी बाज आजा मुर्ख, 
कच्ची गोलिया खेली नहीं है i ll

जय हिन्द जय भारत 
कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित 
देहरादून

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गजल प्रयास 
रदीफ़. को जी करता है 
काफिया. ए 
बेबहः 
आज फिर मुस्कुराने को जी करता है, 
आज फिर बच्ची बन जाने को जी करता है, 
मिलेगी जन्नत मुझे तेरी ही बाँहों में, 
आज तुझे आलिंगन करने को जी करता है l

इस इश्क की शायद कोई मंजिल नहीं, 
बस दिल में उतर जाने को जी करता है l

तू जब भी सामने आता है मेरे, 
तुझसे दूर जाने को जी करता है l

गर दूर हो जाये मेरी नज़र से, 
तेरे करीब आने काे जी करता है l

मालूम है तेरे इश्क में फ़ना होना, 
पर तुझ पर फ़ना होने को जी करता है l

समझ से बाहर है ये इश्क "उत्साही "
पर तुझमे समाने को जी करता है l
कुसुम पंत "उत्साही "
स्वरचित 
देहरादून

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मेरे हम सफर के लिए 
जो प्रेरणा है मेरी 
🌹🌹🌹🌹🌹
कोरा कागज बनकर सजना, 
तेरे अंगना आयी हूँ l
रंग बिरंगे अक्षर लेके, 
उन्हें शब्द बनाने आयी हूँ ll

दिल मेरा कोरा कागज होगा, 
प्रेम तेरा स्याही बनेगा, 
भावो की लेखनी से ही, 
प्रेम का इतिहास लिखेगा l

तुम ही जीवन की आस हो, 
मेरे जीवन का उजास हो, 
तेरे प्रेम बिना मेरे साजन, 
जीवन केवल आभास है 
कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित



शहीदों की चिताओं पर न लगाओ तुम मेले, 
कायरता को क्यों हमारे जवान झेले, 
लड़ कर शहीद होते तो ख़ुशी होती, 
इस कायरता का बदला सारा देश लेले l

राजनीती की रोटी मत सेको अब, 
एक जुट हो जाओ देश हित में सब, 
क्यों लाज तुम्हे नहीं आती सबको, 
क्यों देख रहे चुप रह कर सब l

क्या लाज शर्म बेच खायी है, 
शत्रुओं के आगे गर्दन झुकाई है, 
कैसे शांति दूत है भारत वासी, 
आज फिर जवानो जान गवाई है ll
अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि 
कुसुम पंत उत्साही 
देहरादून

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पंच तत्वों की हुई लड़ाई, 
सबसे बड़ा कौन है भाई, 
सबसे पहले आकाश आया, 
सब दुनिया मुझमे समाई l

दूजी अग्नि इठलाती आयी, 
ताप बिना मानव नहीं भाई, 
मेरे बिना सब कुछ शीतल, 
मुझसे ही दुनिया गरमाई l

तीजी माटी इतराती आयी, 
बोली बिन मेरे पुतला कहाँ भाई
रूप मानव का मुझसे ही है, 
मुझमे ही है दुनिया समाई l

चौथा जल कल कल कर आया, 
ये सब क्या है मेरे भाया, 
मेरे बिना कैसा शरीर, 
इक पल भी न कोई जी पायाl

अब तो हवा गुस्से मे आयी, 
बहुत सुनी तुम सबकी बढ़ाई, 
बिन मेरे श्वांस कहाँ है, 
सोचो जान कहाँ से आयी l

बोली एकता मे शक्ति मेरे भाई, 
एक दूजे मे दुनिया समाई, 
हम सब मिलकर ही रहेंगे, 
इसमें ही है सबकी भलाई l
कुसुम पंत 'उत्साही '
स्वरचित 
देहरादून 

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विषय लौ 
1प्रेम भक्ति लौ 
मीरा रहे जगाये 
श्याम को पाए 
2
तन है दिया 
कर्म बनते तेल 
साँसो की है लौ 
3
देश भक्ति लौ 
चुनते सियाचिन 
शान तिरंगा 
4
राधा की भक्ति 
अध्यात्म बनती लौ 
प्रेम थी शक्ति 
कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित 
देहरादून

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1
जीवन विष 
मन है कलुषित 
मनु भ्रमित 
2
दारु जहर 
नवयुवक डूबे 
शामो सहर 
3
जहर घूंट 
श्याम धुन में रमी 
मीरा ने पिया 
1
धुंआ जहर 
शहरो में कहर 
साँसों का काल 
5
कच्चा जहर 
उत्तराखंड पीता 
काल समाता 
6
वाणी जहर 
कलह की है जड़ 
लाती है कहर 
कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित 

देहरादून

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हाइकु 
ऋतू वसंत 
धरा मस्त मगन 
बनी दुल्हन 
2
पीत वसन 
ऋतुराज के संग 
धरा धारण 
3
धरा दुल्हन 
हरियाली चुनर 
दूल्हा वसंत 
कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित 
देहरादून

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कविता 
ऋतू आती है ऋतू जाती है, 
हर ऋतू सन्देश देकर जाती है, 
ग्रीष्म ऋतू की गर्मी हमको, 
दुःख मे जीना दिखलाती है l
ऋतू आती..... 

फिर वर्षा ऋतू इठलाती आतीहै, 
गर्मी के प्रकोप से बचाती है,
फिर रोज रोज बरस कर,
प्रियसी को ख़ूब तड़पाती है l 
ऋतू आती.... 

शरद ऋतू जब आ जाती है, 
हमको बड़ा तड़पाती है, 
शीतल ठन्डे हाथ शीत के, 
सबको जीना बतलाती है l
ऋतू आती.....

अब बसंत ऋतू आती है, 
हरियाली चहुँ और छाजाती है, 
पशु पक्षी हो या मानव, 
सबको खुशियाँ दे जाती है l
ऋतू आती.... 
कुसुम पंत 'उत्साही '
स्वरचित 
देहरादून 
उत्तराखंड

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क सवाल मचा बवाल, 
क्या सब है खुश हाल, 
या एक दूजे के होड़ में, 
धन को रहे संभाल l

धन को रहे संभाल, 
जो काम भी न आये, 
एक साँस भी न ली जाये, 
जब यमराज लेने आये l

जब यमराज लेने आये, 
तो बन जाएँ सब पराये, 
पार्थिव देह बन जाता, 
रिश्ते सब खो जाएं l

रिश्ते सब खो जाएं, 
ना रखो धन की बोरी, 
कुछ काम नेकी का करलो, 
कुछ विप्र खुश हो जाएं l

कुछ विप्र खुश हो जाएं 
तो देंगे लाख दुआएं, 
क्या पता आपको जीते जी 
परम शांति मिल जाये ll
कुसुम उत्साही 
स्वरचित 

देहरादून

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तुम पतंग मै डोर पिया जी, 
एक दूजे के छोर पिया जी, 
संग संग चलेंगे जीवन भर,
मै साँझ तुम भोर पिया जी ll

मेरे दिल के तुम चोर पिया जी, 
काहे जमाते ज़ोर पिया जी, 
दो दिल और एक जान है हम, 
मै चाँद तुम चकोर पिया जी ll
कुसुम पंत "उत्साही "
स्वरचित 
देहरादून

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हाइकु 
1
ज्ञान विज्ञान
मित्रता है महान 
मिले जहान 
2
शास्त्री विज्ञान
एडिसन महान 
रोशन जहाँ 
3
विज्ञान बातें 
भू लगाए चक्कर 
दिन व राते 
4
भाप इंजन 
जेम्सवाट जिज्ञासा 
पहिया घूमा 
5
ईश महान 
असफल विज्ञान 
मनु अज्ञानी 
कुसुम पंत" उत्साही "
स्वरचित 
उत्साही



हाय... रे इंसान.. 
क्या सच में है तू इंसान, 
घुस गया तुझमे शैतान, 
मर जाती इंसानियत तेरी, 
देखता जब तू पर नारी, 
जाग जाता तुझमे हैवान 
क्या सच में है तू इंसान.. 
जब देखता तू.. गरीब को 
फेर लेता है मुख को क्यों, 
क्यों मदद नहीं कर सकता, 
रोटी देकर उस भूखे को... 
क्यों मर जाता अंदर तक इंसान, 
क्या सच में है तू इंसान 
कुसुम पंत" उत्साही "
स्वरचित 
देहरादून

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पंछी था मैं उन्मुक्त गगन का, 
क्यूँ मुझको यहाँ कैद किया, 
क्यूँ ना समझे मेरे दर्द को, 
क्या मैने था बैर किया l

बांध दिया मुझे बंधन मे, 
क्यूँ ये अत्याचार किया, 
जरा ना सोचा मेरे बारे मे, 
क्यूँ ये आघात किया l

याद आता मुझे उन्मुक्त गगन, 
जिसमे विचरा करता था, 
इस डाली से उस डाली पर, 
खूब फुदकता फिरता था l

खूब अच्छा दाना देता मुझको, 
कभी सूखे मेवे भी देता, 
पर तू ही बता मुझको, 
कौन पिंजरे मे खुश रह सकता l

कितना लालची तू है मानव, 
क्यूँ नहीं मुझे आजाद करता, 
काहे बना है रे तू दानव, 
क्यूँ ना मेरी ह्रदय पीर समझता

माना कूक मेरी अच्छी लगती, 
तुझको वो बहुत भाती हैं,
पर जरा सोच हे मानव, 
कैद किसे है सुहाती हैl

वादा करता हूँ तुझसे मैं, 
आजाद करे जो तू मुझको, 
प्रतिदिन यहाँ पर आऊंगा, 
अपना प्यारा सा राग रोज 
तुझे सुनाऊंगा l
कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित

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1
मै हूँ लेखनी 
नाचे है पृष्ठ पर 
कवि संगिनी 
2
पृष्ठ है दूल्हा 
लेखनी है दुल्हन 
शब्द बाराती 
3
पृष्ठ आकाश 
तारे बने अक्षर 
गुरु लेखनी 
4
शब्द संसार 
लेखनी कलाकार 
कवि उद्धार 
5
दिल के पृष्ठ 
भावो की है कलम 
कवि लिखते 
कुसुम पंत उत्साही 

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स्वरचित  


डमरू 
सरल बन मुस्काता 
नहीं घबराता 
जीवन जीता 
काँटों भरा 
खिलता 
पुष्प 
तू 
फिर 
दानव 
राहगीर 
नोंच डालता 
तुझे तड़पाता 
खुशबु बिखेरता 

कुसुम पंत "उत्साही "
स्वरचित 
देहरादून
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इस वाणी ने अपने खोये, 
शूल ह्रदय में इसने बोये, 
थोड़ा मीठा जो भी बोले, 
बस सारा जग अपना होए l

पांडवो ने महल बनवाया, 
उसमे कौरव को बुलवाया, 
महल मे रचा था भ्रृमभारी 
दुर्योधन मिलने को आया l

महल ऐसा पांडव बनवाये 
जल थल कुछ समझ न आये, 
दुर्योधन हैरान हो गया, 
उसने आगे कदम बढ़ाया l

जल समझ पैर पीछे हटाया, 
थल था वो समझ ना पाया, 
द्रुपद पुत्री देख रही थी, 
अंधे का पुत्र अंधा कह डाला 

वाणी पांचाली की चुभ गयी, 
उसके दिल मेबात येलगगयी, 
फिर द्युत में उन्हें बुलाया, 
पासा शकुनि से डलवाया l

पांडव सब कुछ हार गये, 
द्रोपदी को भी वार गए, 
शूल बन गयी उसकी वाणी 
सभा मे खींची उसकी साड़ी 

कान खोल के सुन नर नारी 
कलह भी करवाती वाणी, 
सोच समझ कर तुम बोलो, 
न तो रचे महाभारत भारी l
कुसुम पंत 
स्वरचित
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अतिथि.. 
डमरू प्रयास 
9/1/2019

अतिथि भूखा जाये 
शची घबराये 
रहा चिढ़ाए 
बरतन 
रिक्त 
तो 
कान्हा 
मुस्काये 
दाना खाये 
प्रीत निभाए 
गुरु भरमाये 
ऋषि क्षुदा मिटाये 

कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित 
देहरादून

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वर्ण पिरामिड 
आहट
1
ये 
डर 
आहट 
रुकावट 
घबराहट 
सकपकाहट 
लुप्त मुस्कराहट 
2
क्यों 
हिय 
आहट 
टकराती 
घबरा जाती 
वो तिलमिलाती 
दानवता हँसती 

कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित 
देहरादून

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विधा वर्ण पिरामिड 
7/1/2018
1
है 
मन 
तरंग 
भटकता 
भव सागर 
उसे भरमाता 
मनु राह ना पाता 
2
ये 
तन 
सागर 
गहराई
नाप ना पाई 
तरंग है साँसे 
मन बना हरजाई 
कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित 
देहरादून

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बिटिया 
बिटिया है घर की फुलवारी, 
महकाती है आंगन वाडी, 
नन्ही सी चिड़िया है ये, 
चह चहाए दुनिया मे सारी l 

क्यूँ कहते बोझ है सिर का, 
ये तो ओज है जीवन का, 
प्रकाश मय करती माँ आंगन, 
चिराग है सास के घर का l

दो दो कुल का मान है ये, 
पूरे जग का सम्मान है ये, 
बेटियां हैं युग निर्माता, 
इनके कारण जग उजियाता l

एक दिन ना दिवस मनाऊ, 
रोज रोज मै उसे समझाऊँ, 
'उत्साही 'की जान है 'मनोकृति '
फैलाएगी जग मे यश और कीर्ति l
कुसुम पंत 'उत्साही '
स्वरचित 
देहरादून
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स्त्री व सृष्टि दोनों है नारी, 
चला दी तूने दोनों पर आरी, 
बन जा अब तू बन माली, 
कर दोनों की तू रखवाली l
हे मानव... 
ज़ब नहीं रहेंगी दोनों ही,
सोच जरा हे जाहिल प्राणी , 
कौन जन्म देगा नवअंकुर, 
चाहे मानव हो या अन्य प्राणी l
हे मानव कैसी है....... 
कुसुम पंत 
स्वरचित
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राह मे मिला इक साथी न्यारा, 
लगता था वो बंजारा, 
लगा लज्जा का घूँघट न्यारा, 
मैं दिल हारी वो दिल हारा
फिर जीवन मैं भी हारी , 
वो भी हारा l

मैं बेबस वो भी बेबस, 
मुझे मर्यादा की चिंता, 
उसको समाज ने मारा, 
दर्द दोनों का था न्यारा, l
फिर मैं भी...... 

जीवन एक कंटीली झाड़ी है, 
प्रीत विष की प्याली है, 
पेय लगे है बहुत ही प्यारा 
कर देता जीवन तमाम सारा l
फिर मैं.... 

राह मे रा ही देखे बहुत से, 
कुछ अच्छे कुछ सच्चे बहुत थे, 
लगता था तू सबसे न्यारा, 
मेरे मन का मीत प्यारा 
फिर मैं..... 

मेरे बचपन का मीत था वो
इस जीवन का संगीत था वो, 
प्रीत का था खेल सारा, 
गाये हरदम राग मल्हारा l
फिर मैं..... 
राह प्रीत की भाई नहीं थी
राजी मेरी माई नहीं थी, 
छोड़ ना पायी परिवार सारा
फिर छोड़ दिया उसको बंजाराl
फिर मैं दिल हारी, वो दिल हारा 
मिला था मुझको इक बंजारा l
कुसुम पंत 
स्वरचित

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बाल कविता 
बच्चो से निवेदन 
विधा गीत 
तर्ज आओ बच्चो तुम्हे दिखाए........ 

आओ बच्चो तुम्हे सिखाएं, 
भाषा ये हम ज्ञान की, 
हरियाली को तुम बचाओ, 
पुकार है हिदुस्तान की 

हरियाली गर खोयेगी तो , 
पर्यावरण दूषित हो जायेगा, 
लाले तुमको पड़ जायेंगे, 
अपने साँसो प्राण कीl
आओ...

आओ बच्चो कसम ये खाये, 
एक एक वृक्ष लगाएँगे, 
रक्षा करेंगे इस पृथ्वी की, 
पर्यावरण बचाएंगे l
आओ....... 

जीवन का सत्य है ये, 
सबको हमें बताना है, 
वृक्ष भूमि की सम्पदा है, 
इनको हमें बचाना है l
आओ....... 
कुसुम पंत 
स्व रचित
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माँ  भारती  को  समर्पित
31जुलाई  2018
कल  रात  मैने  सपना  देखा,
सपने  मे  मैने  अपना  देखा,
सोच  रही  थी  कौन  है  वो,
तभी  पास  मेरे  आ  गयी  वो

पूछा  मैने  कौन  हो  आप,
बोली  तेरी  हूं  भारत  माँ,
फटी  साडी  और  बिन  श्रृंगार,
थी  वो  मेरी  भारत माँ l

पूछा  मैने माँ  क्या  है  व्यथा?
जो  है  जर  जर  तेरी  अवस्था,
रुंधे  कंठ  से  बोला  उसने,
सीना  चीर  दिया  अपनों नेl

दुश्मन  क्या  मारेगा  उसको,
उसको  बेटो  ने  मारा  है,
बेटे  सीना  चीर रहे  है,
लहूलुहान कर  डाला  है

खड़ी  रही मै आहत मन  से,
अश्रु  धारा  मे  डूबी  रही,
बोला  मैने रुदन नहीं माँ,
अब  बेटी  करेगी  तेरी  रक्षा  माँ l

तेरे  लिए  मै  लक्ष्मी बनु
बन्दुक  अब  उठाउंगी,
घर  का  शत्रु  हो  या  बाहर का,
सबको धूल  चटाउँगी l
कुसुम  पंत
स्वरचित
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मेरा विषय पितृ छाया 
आज तेरी कमी सी लगती है, 
आँखों मे नमी सी लगती है, 
बहुत खुश नसीब होती वो संतान, 
जिसे तेरी बरगद जैसी छाया मिलती है 
आज....... 
छाया घोर अंधेरा, 
तू सूरज का उजाला होता, 
तेरी एक किरण से ही, 
तकदीर चमक ती है. 
आज....... 
माँ जन्म देती है, 
कष्ट बहुत ही सहती है, 
तेरे बिना जन्म लेना भी हकीकत नहीं लगती है. 
आज..... 
कष्ट सहकर 
अपनी ना कहकर, 
बच्चो के लिए तुम्हारी 
जान निकलती है l
आज....... 
माना की माँ अनमोल है, 
पर तेरा भी नहीं कोई तोल है, 
तेरी छत्र छाया के बिना, 
क्या कोई संतान निखरती है l
आज.....
कुसुम पंत 
स्वरचित
सभी पिताओ को समर्पित

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प्रेम की सौगात लिए आया श्रावण मास, 
मंद मंद पवन चले है 
है साजन का साथl
तीज का त्यौहार आया, लाया घेवर साथ, 
मदमस्त मगन होकर झूला झूलूँ, मै साजन के साथ l
प्रेम ...... 
मै भी झुमू तुम भी झूमो और झूमे आकाश 
प्रेम की सौगात लिए आया श्रावण मास l
ले अायो बरसात साथ मे बुझी धरती की प्यास, 
हर किसान झूम उठा बीज लिए है हाथ, 
आज मै जम कर नाचूंगी अपने पिया के साथ l
प्रेम........ 
हर दिन होती तीज ज़ब हो 
प्रीतम का साथ 
मिल जुल कर झूम उठे 
जैसे भू और आकाश 
मिलजुल के ती ज मनाऊ 
अपने पिया के साथ l
प्रेम की........ 
कुसुम पंत 
स्वरचित

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ऐ मेरी भारत माँ देदे मुझे थोड़ा सा आसमा,
रंगना चाहूं उसको मै इंद्रधनुषी रंग मे माँ.

तीन रंग का तेरा तिरंगा लहर लहर लहराएगा

बीच मे उसके चक्र आसमा नी रंग दिखायेगा 
हिम्मत नहीं किसी काफिर की उसको हाथ लगाएगा
काट डालेंगे हाथ उसके तुझे जो छूने आएगा

अपनी भारत माँ के लिए लाल तेरा मिट जायेगा
.
ऐ मेरी.....

.
मेरे रक्त का कतरा कतरा करू न्योछावर तुझको माँ

एक संकेत गर हो जाये तो लुटा दूं अपने दोनों जहाँ

पर शान पर तेरी आंच ना आने देंगे माँ

ऐ मेरी........

कुसुम पंत

स्व रचित

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16 जुलाई 2016
कोटि कोटि नमन हिंद की सेना को 

दे दिया जिसने अपना सीना देश की सीमा को. 

जाता है ज़ब घर से बीवी तिलक लगाती है, 
भीतर भीतर घुटती है, कह न किसी से पा ती है. 

बेटा पूछे पापा से घर कब तक तुम आओगे, 
बेटी पूछ रही पापा से पापा क्या तुम लाओगे?
आंसू भर नैनो मे बेटे को समझा दिया, 
भारत माँ की आज्ञा होगी तब ही हम आ पाएंगे, 
प्यारी सी बिटिया के लिए प्यारी सी गुड़िया लाएंगे. 

नमन....... 
माँ के आंसू थमते नहीं बोली की मत जाओ तुम, 
क्या पता अगली बार मिल हमें न पाओ तुम. 
ढलती शाम हो गयी माँ की दिया भी बुझने वाला है, 
तेरे सिवा लाल मेरे ना देगा कोई निवाला है. 
नमन...... 
बेटा कहता माँ मै सिर्फ तेरा लाल नहीं, 
पीठ दिखा के भागे जो वो तेरा लाल नहीं. 
भारत माँ की रक्षा करने को सेना ने बिगुल बजाया है, 
उस माँ की रक्षा करने का सुनहरा अवसर पाया है. 
नमन....... 
स्व रचित 
कुसुम पंत

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विधा कविता
शीर्षक नन्हा सिपाही 

11अगस्त 2018
माँ मुझको लेखनी दिला दो, 
शब्दों के वाण चलाऊंगा, 
नन्हा सिपाही बन कलम का, 
शब्द घात कर जाऊंगा l

तड़प रही है बहने मेरी, 
नहीं किसी को चिंता तेरी, 
सेना लड़ती सीमा पर, 
मै यहाँ लाज बचाऊंगा, l

बन कर मै कलम सिपाही, 
करू समर्थन अच्छाई का, 
करू खत्मा बुराई का, 
चोट कलम से लगाऊंगा l

मातृ भूमि है जान मेरी, 
आ न बान और शान मेरी, 
पर तलवार नहीं चलाऊंगा, 
इन नन्हे हाथो से तिरंगे को लहराऊंगा l
कुसुम पंत 
स्व रचित 
जय हिंद जय भारत

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भारत से हिन्दी लुप्त हो रही , 
जनता इसकी सुप्त हो रही, 
कैसे कह दू इसे हिंदुस्तान, 
ज़ब हिन्दी हो गयी यहाँ बलिदान l

आजाद दिवस मना रहे है, 
भूल कर आजाद को, 
नहीं याद रहा किसी को, 
उसके बलिदान को l

आंग्ल माध्यम बने विद्यालय, 
अंग्रेज सब बन बैठे है, 
बर्बाद किया अपने देश को, 
हिंद को India कहते है l

15दिन के पखवाड़े मे हिन्दी दिवस मनाते है, 
बाकी दिन अंग्रेजी के तलवे चाटे जाते l
विडंबना देखो मेरे देश की, 
सरकारी विद्यालयों में भी, 
अब तो हिन्दी गायब हो गयी

क्या यही हे मेरे देश की आशा, 
नहीं रही कोई जिज्ञासा, 
राष्ट्रभाषl का अपमान हो रहा, 
मेरा हिदुस्तान सो रहा l
कुसुम पंत 
स्वरचित 

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तीन रंगों से सजा तिरंगा, 
देश की शान दिखाता है, 
मध्य में इसके नीला चक्र, 
आसमान छू जाता है l

भगवा रंग वीरता बताता 
श्वेत है प्रतीक शांति का, 
हरा रंग हरियाली लाये, 
नीलचक्र बीच मे समय चक्र 
को बतलाये l

लहर लहर लहराये तिरंगा, 
इसकी शान मे ना आये अड़ंगा, 
इसको हाथ जो लगाए काफिर, 
देंगे उसको फांसी काफंदा l

सुनलो सब अब नर और नारी, 
खालो कसम आज ये न्यारी, 
भ्र्ष्टचार न होने देंगे, 
चाहे जान जाये हमारी l
कुसुम पंत स्वरचित 
जय हिंद जय भारत

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क्या सच मे स्वतंत्र है हम, 
हिन्दी बोलने मे आती शर्म, 

तोड़ो अपना आज ये भ्रम, 
गर्व से कहो हिंदुस्तानी है हम l

हिन्दी हमारी जान है l
सब देशों मे महान है, 
इसकी लाज रखेंगे हम, 
बढ़ाते जायेंगे अपने कदम l

हिन्दी गर होगी गुम, 
कहाँ रहेंगे हम और तुम, 
हिंद को बचाना होगा, 
हिन्दी को अपनाना होगा l
कुसुम पंत 
स्वरचित
जय हिंद जय भारत
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सुरेंद्र शर्मा जी से प्रेरित 
घैराडी बोली सुनो पंत जी, 
एक ख्वाइस पूरी करदै, 
मै बोल्यो री पंतडी, 
घणे प्रेम से बोल रही l
लागे सै आज आँखा आँखा 
मा म्हारी जेब तू तोल रही 
बोलो राणी के चावे है, 
आज मु मा गुड़ घोल रहीl

वा बोलि रे पंत जी, 
के बोलणे लागरे हो, 
आज तो आप घणे ही, 
सोणे लागरे हो l
मेरो दिल धड्कण लाग्यो, 
कुछ कुछ समजण लाग्यो 
आज जेब कॉटन अली, 
घेराडी घणी सूथरी लागरी l

बोलि मने हार दिवाओ, 
न तो छोड़ तने मै जारी, 
जो खाइश पूरी न करे तो, 
कुआँ मे डुबन मै जारी l

मन मा बड़ी ख़ुशी होरी थी, 
या चुड़ैल जान लागरी, 
पर बार स मै बोल्यो 
री या तू के कहन लागरी 
मै बोल्यो थारी खाइश सर माथे, 
पर तू कित जासे 
बैठ मेरे धोरे राणी, 
पेली करदू तने सोणे स l

खुश होके गले लाग् गी, 
जैसे हो फंदा फाँस की, 
मै बोल्यो अब ते छोड़, 
अब न है मेरे कोई होड़ l
कुसुम पंत 
स्वरचित 

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अंतस" कुसुम" का कलप रहा है lअश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि 
राष्ट्र निर्माता अटल जी को 

दैनिक लेखन 
17अगस्त 2018
"मिलूंगी उस युग निर्मातासे
ख्वाहिश थी..... 
पर विधाता ने दे दिया दुःख हिंद को..... ओह्ह्!!!

जो युग निर्माता अमर हो गया, 
नहीं कभी वो वापस आता, 
अब बस राह निहारे नैना, 
जग से रहा ना दैहिकनाताl

दो राष्ट्र कवि मिल रहे आज, 
सुभद्रा जी का जन्म दिवसहै, 
यात्रा पूर्ण हुई अटल जी की, 
आज विश्व का शोक दिवस है l

आँखों मे अश्रु सागर लहराता, 
दर्द भरा दिल तड़प रहा है, 
मन की मन मे रही ख्वाहिशे, 

कुसुम पंत 
स्वरचित 
व्यथित मन से

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मित्र हैँ आंसू 
20अगस्त 2018

आंसू की है अजब कहानी, 
जो कहीं ना जाये जबानी, 
ये अपने सच्चे मित्र हैँ, 
सबसे अच्छे इनके चरित्र हैl

ख़ुशी हो या हो गम, 
बस रहेंगे ये संग संग, 
पूछेंगे तेरा हाल,
आकर करदेंगे मालामाल l

दर्द यदि ज्यादा हो जाये, 
इनको अपने पास बुलाये, 
ज़ब ना सुने कोई आपकी, 
इन अश्रुओ कोखूब बहाएंl

सब दर्द बह जायेगा, 
खुशियों से तुझको भरदेगा, 
ज़ब भी खुशी हो या गम, 
अश्रुओं को बहाओ हरदम l

आँसुओ को कभी ना पियो
घुट घुट कर यू कभीना जिओ, 
हंसले और हँसाले तू, 
इनको मित्र बनाले तू l
कुसुम पंत 
स्वरचित


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देखो.. देखो मेरा भारत महान, 
नब्बे प्रतिशत इसमें बेईमान, 
देखो इनकी करतुते, 
बाँट रहे ज्ञान बेईमान l

जनता की जेब काटते, 
रिश्वत लेकर काम बांटते, 
खाक मे मिला यहाँ ईमान, 
मौज कर रहे है बेईमान l

इन्हे न कोई कुछ कहसकता, 
कहे तो जिन्दा न रहसकता
कोई खाये चाराकरे गुजारा, 
कोई 2g का करे घोटाला l

सब के सब बेईमानयहाँ पर
बिक रहा ईमान यहाँ पर, 
मौन रहो करो घोटाला, 
हिंद के मुँह पर लगाओताला 

विप्र गर न कर्ज चुकाए, 
हथ कड़िया उसे लग जाये, 
करोड़ो जो हजम कर जाये, 
भगा उसे विदेश ले जाये l

सेना सीमा पर मर रही है डूब रहा कर्ज मे किसान, 
झूल रहा है वो फांसी पर, 
फिर भी मेरा देश महान l
देखो ... देखो..... 
कुसुम पंत 
स्वरचित


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मेरा शीर्षक जीवन साथी 
23अगस्त 2018
प्रियतम मेरा साथ हो, 
बस हाथो मे हाथ हो,
प्रेम की बरसात हो, 
बस साजन तू मेरे साथ हो l

जीवन के सारे दुःख, 
भूल जाऊँगी इक पल मे, 
सारे सुख आ जायेंगे, 
बस तेरा विश्वाश हो l

मै हूं अर्द्धांगिनी तेरी,
तू ही है आस मेरी, 
दिन रैन मै तुझको पुजू, 
तू मेरा जगदीश है l

नहीं चाहिए धन और दौलत, 
ना मुझको मकान चाहिए, 
बस तेरे दिल के आंगन मे, 
थोड़ा सा स्थान चाहिए 

तू काम कामदेव है मेरा, 
मै, "कुसुम "रति तेरी, 
कंटक वन मे भी रह लेंगे,
बस हम दोनों साथ हों l 
प्रियतम...... 
कुसुम पंत 
स्वरचित



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24अगस्त 2018
सप्त स्वरों से बनती सरगम, 
सरगम से बने संगीत, 
संगीत से बन जाए गीत, 
गीत मिलाये मन का मीत l

सुख मे गीत दुःख मे गीत
प्रकृति का सौंदर्य प्रतीक 
इस सृष्टि के रंग अनोखे, 
कोयल गाये दिव्य गीत l

वीणा के तारों मे गीत, 
तबले की तालो मे गीत, 
स्वर बसा है तृण तृण मे, 
हर प्राणी की वाणी गीत l

गीत है यमुना, गीत है गंगा, 
सरस्वती की धारा गीत, 
स्वर बिना सृष्टि नहीं, 
कण कण मे है इसके गीत l

जीवन की बगिया है गीत 
संग मे होता ज़ब मनमीत, 
इंद्रधनुष के रंगों वाली, 
ये पूरी दुनिया है गीत 

कुसुम पंत 
स्व रचित

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हे सृजन कार 
क्यू बनाया तूने संसार, 
आज का इंसान, 
बना बैठा भगवान, 

तेरी सृजित इस प्रकृति को, 
इसने लहूलुहान किया, 
नष्ट करके इसके सौंदर्य को, 
अपना भविष्य गर्त कर रहा l

सृजन किया मनुज का तूने, 
वही उसको नष्ट कररहा, 
प्रकृति और संस्कृति को, 
अपने हाथो त्रस्त कर रहा l

नारी ने किया नर का सृजन, 
बन गया वो उसका दुश्मन, 
नन्ही कली को नोंच रहा, 
उसको नोच खसोट रहा l

संभल जा अब हे इंसान, 
हो जायेगा हा हा कार, 
सृजन कैसे हो पायेगा, 
ना आएगी फिर बहार 
कुसुम पंत 
स्वरचित



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ए चाँद तू क्यू इतराता है, 
क्यू अपनी चांदनी पर इठलाता है, 
पता है...... जल रहा... कौन, 
इस चांदनी के लिए...., 

वो सौर मंडल का राजा है, 
जो रात दिन दहकता है, 
पूरे ब्रह्माण्ड की जिम्मेदारी उस पर 
जिसके बिना पत्ता भी नहीं 
पनपता हैl

क्या अहसान है तेरा ए चाँद, 
जो तू चांदनी को चमकाता है
कभी आता कभी जाता है, 
कभी कभी तो बिल्कुल गायब होजाता है l

कभी चौथ का बनकर, 
कभी चौदवीं का बनकर, 
कभी पूनम का बनकर, 
ए चाँद तू सिर्फ इंतज़ार करवाता है l

चकोर तेरे लिए हर वक़्तरोता है, 
तेरे लिए तेरी राह तकता है, 
रोज ताकता रहता है, 
पर निर्मोही तो उसे गले नहीं लगाता हैl 
ए चाँद...... 
कुसुम पंत 
स्वरचित

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1सितंबर 2018
नारी तेरी यही कथा है, 
सुनता नहीं कोईतेरी व्यथा है, 
आज समझना तुझको होगा, 
तोड़नी तुझको कु प्रथा है l

भूल जा अपनी वो कहानी, 
आंचल मे है दूध नैनो मे पानी, 
काली तुझको बनना होगा, 
रक्त बीज की ख़त्म कहानी l

आज तू भाल उठाले, 
रक्त रंजीत करदो नाले, 
आंख उठा के देख सके न,
अपने को सूरज बना ले l

अब तू कमजोर नहीं है, 
अब मर्द का जोर नहीं है 
तोड़ दे अब सारे बंधन 
तेरे जैसा कोईऔर नहीं है l
कुसुम पंत 
स्वरचित 
आहत मन से

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3अगस्त 2018
मथुरा से गोकुल यात्रा 
मथुरा मे अष्टमी आयी, 
आज जन्म लियो कन्हाई, 
छः बालक कंस पटकाई, 
सातवां रोहणी गर्भ समायी l
आठवे में आये कृष्णा, 
मिट गयी वसु कीतृष्णा 
बंदी गृह के ताले खुल गए, 
दोनों खुशी से हिल गये l
अंक उठाये लल्ला को, 
चले गोकुल यात्रा को, 
जमनाजी उफने भारी, 
तब हरी चरण पखारी l

योगनिद्रा में गोकुल भारी, 
सो गये सब नर नारी, 
पहुँचे वसु नन्द महल मे, 
देखी भोली कन्या प्यारी,l
कन्या को अंक उठाया, 
लल्ला को पुचकारा, 
फिर इश को पुकारा, 
दिया उनको आभारा 
कुसुम पंतस्वरचित 
प्रस्तुति 2
राधे राधे



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माँ गंगा 
6अगस्त 2018
शिवजी मुझको जटा मे ध्यायेl
भगीरथ मेरे पिता कहायेll
सत्य व्रत की भार्या हूँ मै l
भीष्म मेरे पुत्र कहाये ll

पिता मुझे पृथ्वी पे लायेl 
तब अपने पूर्वज तरवायेll
आर्यव्रत धन्य होगया l
ज़ब ज़ब वो मुझमे नहायेll

गौमुख से अवतरण हुवाl
पवित्रता से आगमन हुवाll
हर्षित होगया मन मेराl
नयी दुनिया मे आगमनहुवाll

पर अब मन खिन्न हो रहा l
इंसान सिर्फ पाप धोरहाl
मैला कर कर के मुझको l
मेरी शक्ति वो खो रहा ll

सुन लो मेरी करुण पुकार l
नहीं कर सकती मै उद्धारll
मैला मुझको कर रहे हो l
अब तो गयी मै बिलकुलहारll
कुसुम पंत 
स्वरचित
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आज मै बंधन मे बंध गयी, 
मायके से ससुराल मे बसगयी
आज तक थी मै माँ बाबा की प्यारीl
एक पल मेँ मेरी दुनिया बदल गयीl

ना जानू क्या कर पाऊँगी, 
माँ बिन कैसे जी पाऊँगी l
ये कैसा बंधन मिला, 
सब कुछ कैसे सह पाऊँगी l

माथे पर पर रोली चन्दन, 
हाथो की चूड़ी खन खन, 
सब ही है श्रृंगार मेरा, 
एक तरह के ये भी बंधन l

बंधन प्रीत का प्यारा लागे, 
पियामुझे जग से न्यारा लागे, 
रहु सुहागन मै उम्र भर, 
मेरे सिंदूर को मेरी नजर ना लागे l

प्रीत कीप्यारी डोर ने बांधा, 
तुम मेरे श्याम मै तेरी राधा, 
तेरे बिना मै कुछ भी नहीं, 
मेरे बिना तू भी तो आधा l
कुसुम पंत 
स्वरचित

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विषय सागर 
जीवन एक सागर है, 
सांसे आती जाती लहरे है l
ऊपर उठती नीचे आती, 
संघर्ष करना हमें सिखाती है l

ज़ब तूफान आता है सागर मे, 
सब कुछ खोने लगता सागर मे l
जीवन में भी तूफान आते है, 
उठकर उनसे फिर मिलना सागर मे l

हम सब भव सागर मे रहते, 
तभी कष्ट बहुत है सहते l
बस थोड़ा सा उपकार करो तुम, 
अभी समय के रहते रहते l

ज़ब यम लेने तुमको आएंगे l
सोच में आप पड़ जायेंगे l
फिर अच्छे कामसोचोगे तुम,
पर यम तुमको ले जायेंगे 
कुसुम पंत स्वरचित



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तन मिला है तुझे धर्म शाला, 
साँसें मिली मनको की माला, 
जिस दिन मनके बिखर जायेंगे, 
लग जायेगा दिल पर ताला l

जीवन है साँसों की माला, 
ईश ने अब तक इन्हे संभाला, 
काहे दम्भ करे मानव तू, 
ना जाने कब जाये निकाला l

साँसों पर है प्रभु का ताला, 
छोटे बड़े मोती की माला, 
तू सोचे है श्वाँसे तेरी, 
यूँ ही तुमने जीवन गवां डाला l

संग तेरे कुछ ना जायेगा, 
खाली हाथ पड़ा रह जायेगा, 
काहे जोड़ी इतनी धन माया, 
ज़ब साँसों का संग छुट जायेगा l

साँसें तेरी शाश्वत नहीं हैँ, 
मृत्यु तेरी अटल सत्य है, 
क्यों नहीं रोक पाते साँसें, 
जो कहते हैं ईश्वर मृत है l

जिस दिन तेरा जन्म हुवा है, 
मरना भी निश्चित हुवा है, 
मृत्यु केवल सच्ची मित्र है, 
बाकी सब मोह -माया है l

अंत समय ज़ब आता है 
हा हा कार मच जाता है, 
विज्ञान कहे भगवान नहीं है, 
क्यूँ एक साँस भी नहीं दे पाता है l
कुसुम पंत 
स्वरचित 
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रूढ़िवादिता कहुँ या परम्परा, 
हर युग मे जग ने नारी को छला, 
हमेशा थोपी गयीं उस पर रूढ़िवादिता, 
बताकर पुरखो से चली आ रही परम्परा l

कभी बाल विवाह मे मारी गयीं, 
कभी सती प्रथा से जलाई गयीं, 
विरोध ज़ब भी किया उसने, 
समाज से विरक्त कर दीगयीं l

भूमि हिंद कीपरम्पराओ सेभरी, 
फिर क्यूँ पृथ्वी रक्त से रंगी, 
इज्जत रोज लूटी जा रही, 
कहाँ गयीं वो परम्परा भली l

कहने मात्र की अब परम्परा, 
कहाँ रहा विश्वास भला, 
किसकोपरवाह है संस्कारो की, 
सीना ताने बेटा बाप संग खड़ाl

परम्परा कुछ है ही नहीं, 
बस अनुकरण है एक दूजे का, 
मै गर जो आज करूँ, 
वही बच्चो की होगी परम्परा l
कुसुम पंत 
स्वरचित 

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हिंदी प्यारा सा गीत है, 
सब भाषा मे संगीत है, 
सातो स्वर इसी से आये, 
सब गीतों की मन मीत है l

हिंदी की महिमा है न्यारी, 
भोली भाली हिंद की दुलारी, 
अनेक भाषाएँ है यहाँ पर, 
सब भाषाओं की जननी प्यारी l

सब पर उदारता दिखाए, 
आंग्ल को भी गले लगाए, 
तभी तो अब सारे मिलकर, 
हिंद की माँ को आंख दिखाए l

अब तो होश मे आओ हिदुस्तानी, 
क्यूँ करदी हिंदी तुमने बेगानी, 
कैसे तुम फिर रह पाओगे, 
जब हो जाएगी ये बेगानी l
कुसुम पंत 
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दशरथ फंसे थे युद्ध मे भारी, 
धोखा दे गयीं उनकी सवारी, 
कैकेयी उनको देख रही थी l
अपनी उंगली से रथ को संभालीl

युद्ध हो रहा था भारी, 
दोनों सेना थी नर संहारी, 
साथ दिया था प्रिय रानी ने, 
रक्त से लथपथ हुई वो नारी l

जीत के बाद दशरथ बोले, 
बोलो प्रिय जो दिल बोले, 
मांगले आज तो वर दो, 
वचन दिया तुम मुँह खोलो l

बोली... नाथ कुछ नहीं चाहिए, 
बस आपका स्नेह चाहिए, 
मेरी ये धरोहर है रखलो, 
लुँगी तब, ज़ब मुझे चाहिए l

कालांतर मे मंथरा बहकाई, 
कैकेयी को वचन याद दिलाई, 
भरत लला को राजगद्दी दो, 
वन मे भेजो तुम रघुराई l

दशरथ बोले हुए अकुलाई, 
क्या हो गया राम की माई, 
कोई और वर तुम मांगो, 
यह नहीं हो सकता सहाई l

बोली... देना ये तो येही वर दो
वरना कोप भवन मे जाने दो, 
राम को राज नहीं मिलेगा, 
चौदह बरस वनवास उसे दो l

राम ने पिता के वचन निभाए, 
पुरषोत्तम जग मे कहलाये, 
माता कैकई खुश बहुत थी, 
राम ने उनको शीश नवाये l
कुसुम पंत 
स्वरचित
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तर्ज चौपाई 
मात पिता का हो सिर पर हाथा, 
न चाहूँ फिर कोई विधाता ll
सेवा करो इनकी दिन राताl
इनके सिवा नकुछ मैं चाहताll

मात धरा है पिता अकाशाl
इतना रखो इन पर विश्वाशा ll
इनकी सेवा जो कर जाता l
तीन जहाँ का आशीष पाता l

क्या काशी है क्या है काबाl
माँ पिता के चरण में जावा ll
यहीं तेरा स्वर्ग है मनवा l
बस इनमे ही मोक्ष तू पावा ll

ना तुम बंदे काशी जाओl, 
ना तुम इनका श्राद्ध मनाओll
बस जीते जी इनके हो जाओ 
आज ही श्रवण इनके बन जाओ ll

बस आशीष इनका पा जाऊँ l
अपना जन्म सफल करजाऊँ l
इनकी छत्र छाया जो पाऊँ l
जनम सफल अपना कर जाऊँll
कुसुम पंत "उत्साही "
स्वरचित 
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सुनलो अब तो ओ नर नारी l
पर्यावरण किया दूषित भारीll
फैल रही है अब बीमारी l
सृष्टि भी अब बिलकुल हारीll

ओज़ोन भी हो गई छिद्रित भारीl
तन की फैल रही बीमारी ll
ऑक्सीजन अब कहाँ हमारी l
श्वांस की फैली अब बीमारी ll

काट रहे हो वृक्ष फुलवारीl
धरती बन गई बंजर सारीll 
कहीं बाढ़ है कहीं सूखा भारी l
कैसे सहेगी प्रकृति हमारी ll

अब तो मानो बात हमारीl
वृक्ष लगाओ बारी बारीll
कसम लेलो आज ही सारे l
वापस लाओगे तुम हरयालीll
कुसुम पंत 'उत्साही '
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कभी कल्पना की चिड़िया बन कर, 
उन्मुक्त गगन में उड़ना चाहती हूँ, 
नन्हे नन्हे शब्दों के पंखो से, 
आसमां पर नाम अंकित करना चाहती हूँ l

नहीं चाहती कोई अच्छा बोले, 
बस त्रुटि निकालिए मेरी, 
गहन अध्ययन करके फिर 
मजबूत जिससे.. हो कलम मेरी, 

जीवन भी कोरा कागज है, 
अनुभव इसके अक्षर है, 
छोटे छोटे मोती अनुभव के, 
लेकर.. जीवन पुस्तक लिखना है l

कुछ कल्पना लिखना चाहती हूँ, 
कुछ कल्पना देना चाहती हूँ, 
कल्पना चावला जैसी बनकर, 
कुछ जग को देना चाहती हूँ l
कुसुम पंत 'उत्साही '
स्वरचित

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